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हैप्पी अभिनंदन में इंदुपुरी गोस्वामी

हैप्पी अभिनंदन में आज, आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से रूबरू होने जा रहे हैं, वो पेशे से टीचर, लेकिन शौक से समाज सेविका एवं ब्लॉगर हैं। वो चितौड़गढ़ की रहने वाली हैं, ब्लॉगिंग जगत में आए उनको भले ही थोड़े दिन हुए हैं, लेकिन सार्थक ब्लॉगिंग के चलते बहुत जल्द एक अच्छा नाम बन गई हैं। जी हाँ, आज आप हैप्पी अभिनंदन में कान्हा की दीवानी यानी आज की मीरा एवं मेरी निगाह में दूसरी मदर टरेसा इंदुपुरी गोस्वामी से मिलने जा रहे हैं। आओ जाने, वो क्या कहती हैं ब्लॉग जगत एवं अपने बारे में :-

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग के अलावा आप असल जिन्दगी में क्या करती हैं, और कुछ अपने बारे में बताएं?
इंदुपुरी गोस्वामी :
सरकारी स्कूल में टीचर हूँ। हिंदी और इंग्लिश लिटरेचर में एम.ए. हूँ। बचपन से लिखने का शौक था और पढ़ने का तो इतना कि बहुत जल्दी उसमें डूबना सीख गई थी। दसवी ग्यारहवी कक्षा तक आते आते मैंने साहित्य की प्रसिद्ध रचनाओं के अलावा रूसी, अंग्रेजी, उर्दू, और संस्कृत साहित्य के अलावा खलील जिब्रान को खूब पढ़ चुकी थी।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आपने कदम कब और कैसे रखा?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ब्लॉग की दुनिया में आए बहुत कम समय हुआ है। कब आई ये तो देख कर बताना पड़ेगा। इक्कतीस अगस्त दो हजार नौ तक मुझे कम्यूटर का माऊस भी चलाना नहीं आता था तो ये तो पक्की बात है कि उसके बाद ही आई हूँ। ब्लॉग की दुनिया में आने के लिए कीर्ति जी ने ही मुझे कहा कि आप अपना ब्लॉग बनाइये आप कई लोगों को नेक कामों से जोड़ सकती हैं, उन्हें मोटिवेट कर सकती हैं और लिख भी सकती हैं। और मैं आ गई ब्लॉग की दुनिया में।

कुलवंत हैप्पी : समाज सेवा के क्षेत्र में कैसे आई एवं सेवा करते हुए कैसा महसूस करती हैं?
इंदु गोस्वामी :
लोगों की छोटी मोटी मदद करा करती थी, उसी के चक्कर में दैनिक भास्कर के सम्पादक श्री कीर्ति राणा जी से परिचय हुआ, उन्हीं ने मेरा परिचय उदयपुर, जयपुर, दिल्ली, मुंबई के कई एडिटर्स और दयालु लोगों से मिलाया, जो जरुरतमंदों को मदद करने में मेरा हाथ बंटाते थे। वैसे मैं आज तक मिली उनमें से किसी से भी नहीं। मेरा सारा काम फोन से होता है और लोग मुझ पर यकीन करते हैं, डोनर्स भी। वे न पूछे पर मैं उन्हें एक एक पैसे का हिसाब बताती हूँ. उनकी भी मेहनत का पैसा है भाई। समाज सेवी और मैं? बिलकुल नहीं भैया। सच कहूँ, असली समाज सेवी तो वो होते हैं, जो एक 'एप्पल' किसी गरीब को देते हैं और दस व्यक्ति मिल कर फोटो खिंचवाते हैं, पेपर्स में देते हैं। मैंने तो कहीं कुछ किया तो अगले रोज किसी और नेता, समाजसेवी का फ़ोटो अखबार में उस काम का क्रेडिट लेते हुए देखा एवं पढ़ा।

लगभग बीस साल पहले मेरे पति श्री कमल पुरी गोस्वामी जी यहाँ से जॉब छोड़ कर विदेश चले गये थे। जॉब भी अच्छा था पैसे भी। बच्चे बड़ी क्लासेस में आ गए थे मेरा इंडिया छोड़ना पॉसिबल नहीं था। गवर्नमेंट जॉब था मेरा कैसे जाती? इनके बिना कभी रही नहीं। लोगों की मदद करने की आदत...तो बस अपने आपको इसी में व्यस्त कर लिया। अब घर, बच्चे, मेरी नौकरी और मेरा ये काम.....सुकून मिलने लगा। जीने का एक मकसद सा मिल गया। धीरे धीरे पति, बच्चे और कई ऐसे लोग जुड़ गए जो मेरे लिए फील्ड में काम करने लगे।

जहाँ भी रही, आस पास के बेरोजगार इधर उधर भटकते रहने वाले नौजवान को भी जोड़ लिया, जो मोहल्ले, शहर, आस पास के गांवों के विकास के लिए काम करने लगे। विकलांगों, विधवाओं की पेंशन से लेकर, इंटेलिजेंट बच्चे जो 'डिजर्विंग' थे और आगे पढ़ नहीं पा रहे थे। उनके लिए फीस, ड्रेस, बुक्स सबके खर्च के लिए दानदाताओं से रूपये इक्कठे करना, सामान कलेक्ट करना, पहुँचाना सब काम मेरे ऐसे ही नौजवान करते हैं। हा हा हा.. बहुत सुकून है बाबू इसमें।

लगभग ढाई सौ तीन सौ स्टुडेंट्स को मदद दी जाती है। जानते हो उसमें से कुछ ऑफिसर्स बन चुके हैं। एक विशाल बारेगामा एयर क्राफ्ट मेंटिनेंस का कोर्स करके बेंगलोर में जॉब कर रहा है, रत्न वैष्णव जिंक में ऑफिसर है, जिंक, सीमेंट इंडस्ट्रीज़, टीचिंग में कई बच्चे पहुँच गये। आ कर मिलते है, बताते हैं कि मैं मिलती भी नहीं इन 'डिजर्विंग' बच्चों से। सीधे किसी डोनर को सौंप देती हूँ। 'ये' बच्चा है आप जब तक उनकी पढाई का खर्च उठा सकें. पार्ट टाइम जॉब भी दिलवा देते हैं जिस से खुद कमा कर पढाई कर सके। मदद का मतलब लोगों को निक्कमा बनाना भी नहीं। केंसर पीड़ित कुछ बच्चों के लिए कई लोग आगे आए, इसमें दैनिक भास्कर के सर्कल इंचार्ज राजेश पटेल, यही नाम है शायद। उन्होंने बहुत मदद की।

इसके अलावा मुंबई के नेलेक्तेद चिल्ड्रन को निःसन्तान दम्पत्तियों को गोद दिलवाना भी मेरे जीवन का मकसद है। कई बच्चे बहुत ही अच्छे परिवारों में गए हैं। कई है बाबू मददगार भी और काम भी क्या क्या बताऊँ छोडो, बस लोगों को कहूँगी अपने बच्चों के लिए करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी या मजबूरी पर किसी एक बच्चे को काबिल बनाने में मदद कर दीजिये, बहुत बहुत सुकून मिलेगा। नेत्र-दान, देह-दान करने और मृत्यु भोज न करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करती हूँ, इनकी शुरुआत पहले खुद से फिर अपने परिवार से करने के बाद लोगों को कहती हूँ। नहीं कहती नहीं एक्सामपल रख दिया, लोग फोलो कर रहे हैं। मैं अपने जीवन से बहुत खुश हूँ अपने पापा की लाडली थी और ईश्वर की भी मैं अपने दोनों 'बापों' को शर्मिंदा नहीं होने दूँगी। ऊपर जाते ही गले लगायेंगे मुझे. हम सब 'ऐसा' जी सकते हैं ,हैप्पी।

कुलवंत हैप्पी : श्री कृष्ण भगवान की प्रतिमाएं एवं उनको समर्पित कविताएं बताती हैं आप कृष्ण भगत हैं, क्या कभी उन्होंने कोई करिश्मा दिखाया?
इंदुपुरी गोस्वामी :
मैं क्या बताऊँ? हाँ जीवन मैं ऐसा थोडा बहुत जरूर किया है कि तुम जैसा नन्हा सा दोस्त और वे लोग जो मुझे प्यार करते है वे गर्व कर सकते हैं। मैं नास्तिक नहीं हूँ, पर पूजा पाठ नहीं होता मुझसे। कृष्ण.. नाम न लो उस दुष्ट का। इतना प्यारा दोस्त और प्रियतम है मेरा कि आवाज भी नहीं देती कि ऐसे आ खड़ा होता है, जैसे मुझ पर ही नजर गडाए बैठा रहता है। जासूसी करता है रात दिन मेरी दुष्ट कहीं का। एक बार नहीं बाबू कई बार अलौकिक अनुभव दिए इस अब कहोगे कितनी गालियाँ देती है अपने दोस्त को और जाने कितने सन्गठन खड़े हो जायेंगे 'ऐसा' बोला, पर...जब भी परेशान होती हूँ बुला कर कह देती हूँ 'लल्ला। इस परेशानी को पकड़ तो, सुबह दे देना, अभी सोने दे, और 'वो' शायद मेरे लिए रात भर जागता भी होगा। मेरे आंसू उसकी आँखों से बहते हैं, ये भी मैं जानती हूँ कि विकट से विकट परिस्थिति में जब लगा ये इंसानों के बस की बात नहीं उसमें से उसने यूँ निकाल लिया कि हम आश्चर्यचकित रह गए। हर बार किसी न किस रूप में वो मेरे साथ था कभी, कहीं मिलता है तो उसके गले लग कर खूब रोती हूँ और झगडती हूँ' दुष्ट। तू मेरे आस पास ही मंडराता रहता है क्या? मेरी आँखों में से वो झांकता है, मुझ में सांस लेता है।

बस अगरबत्ती भी नहीं जलाती. नाराज तो होता होगा। पर....उसे बहुत बहुत प्यार करती हूँ दोस्त की तरह, माँ की तरह, प्रेमिका की तरह तो कभी छोटी सी 'छुटकी' बन कर। मत पूछो, वो मेरा क्या है? सशरीर होता तो जाने कितनी अंगुलियां उठ चुकी होती अब तक मुझ पर। हा हा हा.. इश्वर ने एक पत्ता भी व्यर्थ नहीं बनाया। उसकी सर्वश्रष्ठ कृति 'मनुष्य' है। उसे वो यूँ ही थोड़े भेजेगा दुनिया में? नाम, प्रसिद्धि सब समय के साथ मिट जाते हैं, मगर कुछ ऐसा जरूर है करने को सबके लिए जिससे सुकून मिलता है। बस उसी के लिए करें पर ...करें जरूर और दिल की आवाज सुने वो कभी 'मिस गाईड' नहीं करती।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत को आप क्या मानती हैं सोशल नेटवर्किंग या अभिव्यक्ति का प्लेटफार्म?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ब्लॉग की दुनिया सोशल नेटवर्किंग और अभिवक्ति का सबसे प्यारा, खूबसूरत और सशक्त माद्यम है। यहाँ अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं और अच्छे साहित्य की भी। मैंने कई ऐसा लोगों को पढा, जिन्हें कोई नहीं जानता, जिनके ब्लॉग पर दो तीन कमेंट्स भी नहीं पर कमाल लिखा था। जिन्हें पढ़ते हुए कब मेरी आँखों से आंसू बह निकलते थे पता ही नहीं चलता था। अरे बाबा! इसी ब्लॉग ने मुझे पद्म सिंह श्रीनेत जैसा प्यारा बेटा दिया, समीरजी जैसा दादा, ललितजी पाबला भैया जैसे भी, अनामिका जैसी बेटी महेश सिन्हा, मुकेश जी, हेप्पी जैसे छोटे छोटे प्यारे दोस्त दिए और....अपना ई-गुरु जैसा भतीजा दिया।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में होने वाली गुटबाजी पर आप क्या कहना चाहेंगी?
इंदुपुरी गोस्वामी :
बस फालतू की गुटबाजी, विवाद अपने बस की बात नहीं। सब मेरे मैं सबकी। कोई मेरा नही मैं किसी की नहीं। हा हा हा।

कुलवंत हैप्पी : कोई विशेष संदेश देना चाहेंगी?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ईश्वर की शुक्रगुजार हूँ। उसने मुझे जीवन में बहुत अच्छे अच्छे लोगों से मिलाया। जिंदगी से या' उससे' कोई शिकायत नहीं।
 
चक्क दे फट्टे : सुनो शयाम (नेता का प्रेस सचिव), कल एक प्रेस नोट तैयार किया था "आतंकवादियों पर सरकार कारवाई करे'। हाँ जी। फ्यूड से आतंकवादी हटाकर वहाँ नक्सली लिखकर मेरी ओर से रिलीज कर देना।