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सरदार के बाद खिलाड़ी मुश्‍िकल में

तलाश के बाद होगी रिलीज खिलाड़ी 786


सन ऑफ सरदार एवं जब तक है जान के बीच की टक्‍कर खत्‍म हो गई, दोनों फिल्‍में बॉक्‍स ऑफिस पर अच्‍छा धन जुटाने में सफल रही। अगर आंकड़ों को देखते तो सन ऑफ सरदार ने यशराज ग्रुप को कड़ी टक्‍कर देते हुए जीत हासिल की, क्‍यूंकि अजय देवगन की फिल्‍म केवल 2000 स्‍क्रीनों पर रिलीज हुई, जबकि जब तक है जान करीबन 2500 स्‍क्रीन पर। यशराज फिल्‍म का खर्च 85 से 90 करोड़ के बीच बताया जा रहा है, जबकि सन ऑफ सरदार का खर्च केवल 65 से 75 के बीच बताया जा रहा है।

वैसे अजय देवगन बॉक्‍स ऑफिस क्‍लेकशन को देखने के बाद काजोल एवं बच्‍चों के साथ गोवा रवाना हो चुके हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सन ऑफ सरदार पूरी तरह सफल रहा। जब तक है जान को वो रिस्‍पांस नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था, कहीं न कहीं यशराज बैनर्स को निराशा हाथ लगी है, भले ही फिल्‍म अपना खर्च निकालने में कामयाब हो जाए।

फिल्‍मों के बढ़ते बजट के कारण सितारों के बीच अब युद्ध तो चलता ही रहेगा। अब आगे रिलीज होने वाली दो फिल्‍मों के बीच टक्‍कर का माहौल बताया जा रहा है, क्‍यूंकि अमीर खान की फिल्‍म तलाश नवंबर अंत में रिलीज हो रही है और सिनेमा हालों को पहले से हर बुक कर दिया गया है। सुनने में आया है कि सिंगल स्‍क्रीन मालिकों को फिल्‍म को लगातार दो हफ्ते लगाए रखने को कहा गया है, जो अक्षय कुमार की खिलाड़ी 786 के लिए शुभ संकेत नहीं, क्‍यूंकि एक्‍श्‍ान फिल्‍मों को हमेशा कमाई सिंगल स्‍क्रीन से हुई है, जबकि रोमांस भरपूर फिल्‍मों को मल्‍टीप्‍लेक्‍स से, और अक्षय कुमार एक्‍शन फिल्‍म लेकर आ रहे हैं। गौर तलब है कि नवम्‍बर अंत में आमिर की तलाश रिलीज हो रही है, वहीं दूसरी तरफ उसके अगले हफ्ते अक्षय कुमार की खिलाड़ी 786 रिलीज हो रही है।

 अब देखना यह है कि आमिर खान ने सिंगल स्‍क्रीन वालों को जो आदेश दिया है, उसको टिका पाने में उनकी फिल्‍म तलाश कामयाब होती है या नहीं। फिल्‍म प्रोमो देखने से एक बात तो साफ होती नजर आ रही है कि फिल्‍म की कहानी एक सख्‍त पुलिस ऑफिसर के आस पास घुमती है, जिसके बेटे को किसी ने अगवा कर लिया है, और उसको बचाने के लिए पुलिस अधिकारी एक कॉलगर्ल का सहारा लेगा, मगर कहा जा रहा है कि फिल्‍म में रहस्‍यमयी है, ऐसे में अब देखना यह है कि फिल्‍म के गीतों में नजर आ रही कहानी के पीछे वो कौन सा रहस्‍य है, जिसके कारण फिल्‍म से जुड़े लोगों ने कहा, फिल्‍म को दो हफ्ते टिकाए रखना?

उधर, अक्षय कुमार पूरी ऊर्जा में नजर आ रहे हैं, क्‍यूंकि उनकी ओह माई गॉड ने बॉक्‍स ऑफिस पर खूब कमाई की है, भले ही शिरीष कुंदर का जोकर पिट गया हो। इसके बाद रिलीज हो गई सलमान खान की दबंग टू, और 2012 का अंत।

मेंढ़क से मच्‍छलियों तक वाया कुछेक बुद्धजीवि

अमेरिका और भारत के बीच एक डील होती है। अमेरिका को कुछ भारतीय मेंढ़क चाहिए। भारत देने के लिए तैयार है, क्‍यूंकि यहां हर बरसाती मौसम में बहुत सारे मेंढ़क पैदा हो जाते हैं। भारत एक टब को पानी से भरता है, और उसमें उतने ही मेंढ़क डालता है, जितने अमेरिका ने ऑर्डर किए होते हैं। भारतीय अधिकारी टब को उपर से कवर नहीं करते। जब वो टब अमेरिका पहुंचता है तो अमेरिका के अधिकारियों को फोन आता है, आपके द्वारा भेजा गया टब अनकवरेड था, ऐसे में अगर कुछ मेंढ़क कम पाएगे तो जिम्‍मेदारी आपकी होगी। इधर, भारतीय अधिकारी पूरे विश्‍वास के साथ कहता है, आप निश्‍िचंत होकर गिने, पूरे मिलेंगे, क्‍यूंकि यह भारतीय मेंढ़क हैं। एक दूसरे की टांग खींचने में बेहद माहिर हैं, ऐसे में किस की हिम्‍मत कि वो टब से बाहर निकले। आप बेफ्रिक रहें, यह पूरे होंगे। एक भी कम हुआ तो हम देनदार।

जनाब यहां के मेंढ़क ही नहीं, कुछ बुद्धिजीवी प्राणी भी ऐसे हैं, जो किसी को आगे बढ़ते देखते ही उनकी टांग खींचना शुरू कर देते हैं। आज सुबह एक लेख पढ़ा, जो सत्‍यमेव जयते को ध्‍यान में रखकर लिखा गया। फेसबुक पर भी आमिर खान के एंटी मिशन चल रहा है। कभी उसकी पूर्व पत्‍नी को लेकर और कभी गे हरीश को लेकर, लोग निरंतर आमिर को निशाना बना रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि आमिर कुछ नया नहीं कर रहे, वो पुराने घसीटे पिटे मुद्दे उठाकर हीरो बनने की कोशिश कर रहे हैं। पैसे के लिए कर रहे हैं। राजस्‍थान पत्रिका में दवेंद्र शर्मा लिखते हैं कि टैलीविजन वाले असली हीरोज को आगे लाएं, क्‍यूंकि लोग असली हीरोज को देखना चाहते हैं।

चलो एक बार मान भी लेते हैं कि आमिर खान पैसे कमाने के लिए यह सब कर रहा है। वो लोगों की निगाह में हीरो बनना चाहता है। फिर मैं बुद्धिजीवियों से सवाल करता हूं कि आखिर आमिर खान कौन है। तो लाजमी है, जवाब आएगा अभिनेता। मेरा अगला सवाल होगा, अभिनेता क्‍या करता है। तो उनका जवाब होगा अभिनय। लोग भी तो यह कह रहे हैं कि आमिर अभिनय कर रहे हैं, अगर आमिर अभिनय नहीं करेगा तो कौन करेगा।

अगर इस अभिनय से किसी को फायदा होता है तो बुराई क्‍या है। पिछले दिनों एनडीटीवी न्‍यूज एंकर रविश कुमार ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर लिखा कि उसको अंग्रेजी पत्रिका आऊटलुक नहीं मिली, क्‍यूंकि उस पर आमिर का फोटो छपा था। जाने अनजाने में ही सही, लेकिन आऊटलुक को फायदा तो हुआ। अब लोगों को आमिर में रुचि कुछ ज्‍यादा होने लगी है, मतलब लोग आमिर को सुनना चाहते हैं, उसके बारे में पढ़ना चाहते हैं। हम को खुशी होनी चाहिए कि जो मुहिम कुछ आम लोगों ने शुरू की। आज उन मुद्दों को आमिर खान जैसी हस्‍ती का समर्थन मिल रहा है, चाहे वह अभिनय के तौर पर ही सही।

न आना इस देस लाडो हो, अगले जन्‍म मोहे बिटिया कीजिये हो या चाहे बालिका बधु हो टेलीविजनों की एक अच्‍छी पहल थी बुराईयों के खिलाफ। बुराई के खिलाफ आवाज न सही, तो एक हूक ही काफी है, क्‍यूंकि डूबते को तिनके का सहारा होता है। बुराई के खिलाफ उठी आवाज को हम दबाने में जुट जाते हैं, और फिर कहते हैं कि बुराई तेजी से बढ़ रही है। बुराई के खिलाफ उठ रही आवाज को सुनो। आमिर है या अन्‍ना है, गली का कोई आम आदमी है। यह मत देखो। अगर कुछ कर नहीं सकते, तो करने वालों को मत रोको।

मैं एक छोटी सी कहानी कहते हुए अपनी बात को विराम देने जा रहा हूं। एक बच्‍चा दौड़ दौड़ कर समुद्र के किनारे गिरी हुई मछलियों को वापिस समुद्र में फेंक रहा था, तो उसके दादा ने कहा, बेटा किस किस को बचाओगे, तो बच्‍चे ने कहा, लो यह तो बच गई। लो यह भी बच गई। एक एक मच्‍छली को उठाकर वापिस समुद्र में फेंकते हुए बच्‍चा उक्‍त वाक्‍य बोलता हुआ आगे बढ़ रहा था। उम्‍मीद है कि बुराई के खिलाफ लड़ने वाले ऐसे ही आगे बढ़ते रहें। बोलने वाले बोलते रहेंगे।

"सत्यमेव जयते" को लेकर फेसबुक पर प्रतिक्रियाओं का दौर


Ajit Anjum
स्टार प्लस पर सत्यमेव जयते देख रहा हूं ....जिंदगी लाइव की ऋचा अनिरुद्ध की याद आ रही है ....कंसेप्ट के लेवल पर बहुत कुछ मिलता जुलता ...एंकर , गेस्ट से लेकर दर्शकों को रोते देख रहा हूं ...इमोशनल और शॉकिंग मोमेंट ....कोख में बेटियों के कत्ल की दास्तां ....

आमिर चाहते तो वो भी दस का दम वाला पॉपुलर फार्मेट चुन सकते थे ...चाहते तो गेम शो कर सकते थे ...लेकिन आमिर ने ऐसा शो करने का फैसला किया है ..इसलिए वो बधाई के पात्र हैं ...अब ये शो हिट हो या न हो ( तथाकथित रेटिंग के पैमाने पर ) मैं अपनी राय नहीं बदलूंगा ......सत्यमेव जयते बहुतों को अच्छा लगा होगा ...बहुतों तो चलताऊ ...बहुतों को ऐवैं ....कुछ साथियों ने मेरे स्टेटस के जवाब में ये भी लिखा है कि इसे रेटिंग नहीं मिलेगी ...... न मिले ..लेकिन क्या उसके आधार पर आप मान लेंगे कि ऐसे शो की जरुरत नहीं ...तो फिर क्या सिर्फ लोग दस का दम या नच बलिए या नाच गाने वाला ही शो देखना चाहते हैं ...अगर यही सच है कि तो फिर क्यों कहते हैं कि कोई चैनल गंभीर मुद्दों को उठाने वाला शो नहीं बनाता ....मैं तो स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर को भी इसके लिए बधाई देता हूं ..जिन्होंने हर हफ्ते चार करोड़ ( शायद ) खर्च करने ये जोखिम लिया है ...चाहते तो इससे आसान रास्ता पकड़ सकते थे ...दस का दम या नच के दिखा जा या फिर कोई गेम शो बना सकते थे ...लेकिन सत्यमेव जयते बनाया ...ये एंटरटेनमेंट चैनल का सरोकारी चेहरा है ...

सत्यमेव जयते जैसे शो के लिए आमिर को सलाम ....ऐसे शो की जरुरत थी ... कम से कम ऐसे लोग तो शर्मिंदा हों जो बेटियां को दुनिया में आने से पहले मार देते हैं ...कोख में कत्ल करते हैं क्योंकि उन्हें बेटा चाहिए ....और हां , ऐसे काम सासु माएं ज्यादा करती हैं और करवाती है ...जो खुद भी एक मां होती है ...औरतों की कंडिशनिंग ऐसी होती है कि जब वो बहु होती तो उसकी भूमिका अलग होती है ..बेटी होती है तो अलग होती है और सास होती है तो अलग होती है ...हमने बचपन से अपने आस पास ऐसे माहौल को देखा है , जहां बेटा चाहिए ..बेटा ही होना चाहिए ..बेटी से वंश कैसे चलेगा ..जैसे गूंजते सवालों के बीच गर्भ में बच्चा पलता है .....

पहले तो लोग कहते हैं कि चैनलों पर कोई गंभीर कार्यक्रम नहीं होते ...समाज को झकझोरने वाले मुद्दों पर शो नहीं बनते ..चैनलों पर सरोकार वाले शो नहीं दिखते ...जब बनते हैं तो कहते हैं बहुत घिसा -पिटा था ...नया क्या है ..बहुत गरिष्ठ है ...अपच है ..बहुत गंभीर है ...इतना बोझिल शो इंटरटेनमेंट पर कोई क्यों देखेगा ...अरे भाई साहब , भ्रूण हत्या से जुड़े शो में आप दस का दम या केबीसी का मजा क्यों तलाश रहे हैं ...ये तो वही बात हुई न कि पी साईनाथ के लेख में रागदरबारी या पेज थ्री का मजा खोज रहे हैं ...तो फिर हिन्दू नहीं , दिल्ली टाइम्स ही पढ़िए न ....



Shivam Misra 
‎"सत्यमेव जयते" मे आज अमीर खान ने एक बेहद जरूरी मुद्दे को अपनी आवाज़ दी है ... एक सार्थक प्रस्तुति जो हमारे समाज के एक बेहद दुखद और घिनोने रूप को सामने लाती है|

यह कैसी हवस है ... कैसी चाहत है 'कुल दीपक' पाने की जो हर साल लगभग दस लाख बेटियों की हत्या कर रही है ... उनके पैदा होने से पहले ही ????

मैं अमीर खान और उनकी पूरी टीम को इस सार्थक प्रयास के लिए साधुवाद देता हूँ !

समय आ गया है जब हमे मिल कर अपनी खुद की और समाज की यह घिनोनी सोच बदलनी होगी !

बेटियों की हत्या बंद करनी ही होगी !

Sachin khare
मित्रों,
मैं नहीं जानता आमिर खान को किन्तु मैं बस एक बात जानता हूं उन 100 डाक्टरों को जेल में होना चाहिये और उनकी दुकान बंद होनीं चाहिये जिन्हें #Satyamevjayate की उस डाक्यूंमेंट्री में दिखाया गया है..

यदी आपके पास उनके नाम और अन्य जानकारियां हैं तो साझा कीजिये.. उन्हें उनके अंजाम तक अब हम पहुंचायेंगे.. कानूंन को जो करना है करता रहे किन्तु तबतक उनकी दुकान बंद करनीं ही होगी..

इस विचार को फेसबुक पर अपनें तरीके से फैला दीजिये.. छोड़ना नहीं है इन कसाइयों को..

वन्दे मातरम..

अजय कुमार झा
आज भांड बन चुके टीवी चैनलों और जोकर बन चुके समाचार चैनलों की चौबीस घंटों की बकर से , अलग तो निश्चित रूप से लगा "सत्यमेव जयते " । मुद्दा - कन्या भ्रूण हत्या ..समस्या , पीडित , विशेषज्ञों , खबरनवीसों , आरोपियों से सीधे बात करने के साथ बहुत सारा दृश्य फ़िल्मांकन भी ..और आखिर में कम से कम एक प्रयास भी ..,,मुझे तो प्रभावित किया , इस कार्यक्रम ने, लेकिन बहुत से अन्य पहलू भी हैं अभी इस मुद्दे से जुडे हुए ..... जल्दी ही लिखूंगा

नई दुनिया के संपादक  Jaideep Karnik
आमिर खान ने बता दिया की आज देश को सपने दिखाने की बजाय सच दिखाकर जगाना जरूरी है!  

Srijan Shilpi
आमिर खान ने जो पहल की है, देश के मानस को जगाने की, अपने दौर की सबसे अहम समस्याओं को समझने और उनका हल तलाशने की वह न सिर्फ काबिलेतारीफ है, बल्कि उसमें हम सब का सहयोग अपेक्षित है। एक कलाकार वह करके दिखाने जा रहा है, जो वास्तव में लोकतंत्र के चारों स्तंभों को मिलकर बहुत पहले कर लेना चाहिए था, पर वे विफल रहे। आमिर की पहल सफल हो.....सार्थक हो!

@Ravish Kumar NDTV
जितना दर्शकत्व को समझा है उससे यही जाना है कि बड़ा ही निष्ठूर तत्व है । सत्यमेव जयते इसलिए नहीं देखेगा कि आमिर ने बनाया है या इरादा नेक है। ग़रीबी दूर करने का एक ही जादू , दूरदृष्टि पक्का इरादा जैसे स्लोगनों की हालत देख चुका है । हाँ अगर बात में दम है, कहने के तरीके में दम है तो वह सिर आँखों पर लेगा । आमिर ने एक बड़ी चुनौती उठाई है और हमें दी भी है । मैं देख नहीं सका हूं । प्रतिक्रियाओं में आए उतार चढ़ाव के आधार पर कह रहा हूं । एक ही नाकामी समझ आ रही है । लोग आमिर के बारे में ज़्यादा बातें कर रहे हैं, कन्या भ्रूण हत्या के बारे में कम । अगर यही हकीकत है तो सत्यमेव जयते फेल । दिल पे लगेगी तभी बात बनेगी । दिल पे आमिर को नहीं लगाना था, मुद्दे को लगना था । वर्ना ग्रामीण मंत्रालय के तहत आने वाले तमाम मुद्दों के ब्रांड एंबेसडर की तरह बनकर रह जायेंगे । उम्मीद तो यही है कि सत्यमेव जयते सफल हो । पैसे की दरिद्रता का रोना रोने वाले नूझ पैनलों के दौर में आमिर के नाम पर करोड़ों रुपये लगाने का इरादा एक नई उम्मीद है । बेहतर कंटेंट पर मार हो तो लड़ाई जमेगी वर्ना इसलिए लोग प्राइमटाइम नहीं देखेंगे कि रवीश कुमार सो काॅल्ड अच्छा बंदा है बल्कि तभी देखेंगे जब इसमें दम होगा । देखने की रोचकता होगी । सत्यमेव जयते देखने के लिए बेचैन हूं । इसे चलना चाहिए । टीवी का भला होगा और कमाई भी । फिर जल्दी ही आप चिरकुट भौकालेंकरों से मुक्त हो जायेंंगे । देखिये प्राइमटाइम अजय देवगन के साथ । आमिर को शुभकामनायें ।





'सचिन' की जगह 'आमिर' होता तो अच्‍छा लगता

मैं सचिन की जगह आमिर का नाम किसी फिल्‍म के लिए नहीं बल्‍कि राज्‍य सभा सांसद के लिए सुझा रहा हूं। दोनों ही भारत की महान हस्‍तियों में शुमार हैं। दोनों ही अपने क्षेत्र में दिग्‍गज हैं। दोनों का कद काठ भी एक सरीखा है। मगर सोच में अंतर है, जहां आमिर खान सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखता है, वहीं सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के मामलों में भी ज्‍यादा स्‍पष्‍ट राय नहीं दे पाते। सचिन को क्रिकेट के मैदान पर शांत स्‍वभाव से खेलना पसंद है, मगर आमिर खान को चुनौतियों से आमना सामना करना पसंद है, भले ही उसकी फिल्‍म को किसी स्‍टेट में बैन ही क्‍यूं न झेलना पड़े।

न मैं आमिर का प्रसंशक नहीं हूं, और न सचिन का आलोचक। मगर कल जब अचानक राज्‍य सभा सांसद के लिए सचिन का नाम सामने आया तो हैरानी हुई, यह हैरानी मुझे ही नहीं, बल्‍कि बहुत से लोगों को हुई, केवल सचिन के दीवानों को छोड़कर।

हैरानी तो इस बात से है कि उस सचिन ने इस प्रस्‍ताव को स्‍वीकार कैसे कर लिया, जो भारतीय क्रिकेट टीम की कप्‍तानी लेने से इसलिए इंकार करता रहा कि उसके खेल पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सचिन का नाम सामने आते ही हेमा मालिनी का बयान आया, जो शायद चुटकी से कम नहीं था, और उसको साधारण समझा भी नहीं जाना चाहिए, जिसमें हेमा मालिनी कहती हैं कि राज्‍यसभा रिटायर लोगों के लिए है। अगर हेमा मालिनी, जो राज्‍य सभा सांसद रह चुकी हैं, के बयान को गौर से देखते हैं तो पहला सवाल खड़ा होता है कि क्‍या सचिन रिटायर होने वाले हैं?

नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता, क्‍योंकि कुछ दिन पहले तो ख़बर आई थी कि सचिन ने कहा है, अभी उनमें दम खम बाकी है, और वह लम्‍बे समय तक क्रिकेट खेलेंगे। अगर सचिन अभी और क्रिकेट खेलना चाहते हैं। यकीनन वह रिटायर नहीं होने वाले, तो फिर राज्‍य सभा सांसद बनने का विचार उनके मन में कैसे आया?

मुझे लगता है कि क्रिकेट जगत से जुड़े कुछ राजनीतिक लोगों ने सचिन को फ्यूचर स्‍िक्‍यूर करने का आइडिया दे दिया होगा। यह आईडिया भी उन्‍होंने सचिन के अविवा वाले विज्ञापन से ही मारा होगा, क्‍यूंकि हक मारना तो नेताओं की आदत जो है। यह याद ही होगा न, इस विज्ञापन में सचिन सबको लाइफ स्‍क्‍ियूर करने की सलाह देते हैं।

सचिन की जगह आमिर को मैं इसलिए कहता हूं, क्‍यूंकि वह सामाजिक मुद्दों को लेकर बेहद संवेदनशील है, उसके अंदर एक आग है, जो समाज को बदलना चाहती है। अगर सचिन राजनीति में कदम रखते हैं तो मान लीजिएगा कि भारतीय राजनीति को एक और मनमोहन सिंह मिल गया। चुटकला मत समझिएगा, क्‍यूंकि मुझे चुटकले बनाने नहीं आते।

चलते चलते इतना ही कहूंगा, देश की राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी, जो देश की प्रथम नागरिक हैं, ऐसे लोगों का चुनाव करें, जो राजनीति में आने की दिली इच्‍छा रखते हों,और जिन्‍दगी में वह समाज सुधार के लिए अड़ भी सकते हों, वरना राज्‍य सभा में अगर कुछ कुर्सियां खाली भी पड़ी रहेंगी तो कोई दिक्‍कत नहीं होगी जनता को, क्‍यूंकि न बोलने वाले लोगों का होना भी न होने के बराबर है, जैसे कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी, पता नहीं कब बोलते हैं, बोलते भी हैं तो इंग्‍लिश में जो ज्‍यादातर भारतीयों को तो समझ भी नहीं आता, जबकि मैडम सोनिया हिन्‍दी में भाषण देती हैं, जो मूल इटली की हैं, इसको कहते है डिप्‍लोमेसी।

आमिर खान की सफलता के पीछे क्या?

'तारे जमीं पर' एवं 'थ्री इड्यिटस' में देश के शिक्षा सिस्टम के विरुद्ध आवाज बुलंद करते हुए आमिर खान को रुपहले पर्दे पर तो सबने देखा होगा। इन दोनों फिल्मों की अपार सफलता ने जहां आमिर खान के एक कलाकार रूपी कद को और ऊंचा किया है, वहीं आमिर खान के गम्भीर और संजीदा होने के संकेत भी दिए हैं।

इन दिनों फिल्मों में आमिर खान का किरदार अलग अलग था। अगर 'तारे जमीं पर' में आमिर खान एक अदार्श टीचर था तो 'थ्री इड्यिटस' में एक अलहदा विद्यार्थी था, जो कुछ अलहदा ही करना चाहता था। इन किरदारों में अगर कुछ समानता नज़र आई तो एक जागरूक व्यक्ति का स्वाभाव और कुछ लीक से हटकर करने की जिद्द। इन दोनों किरदारों में शिक्षा सिस्टम पर सवालिया निशान लगाने वाले आमिर खान असल जिन्दगी में केवल 12वीं पास हैं। यह बात जानकर शायद किसी को हैरानी हो, लेकिन यह हकीकत है।

आमिर खान ने अपना कद इतना ऊंचा कर लिया है कि कोई पूछने की हिम्मत भी नहीं कर सकता कि आप कितने पढ़े हैं। शायद यह सवाल उनकी काबलियत को देखते हुए कहीं गुम हो जाता है। कभी कभी लगता है कि आमिर खान ने देश के शिक्षा सिस्टम से तंग आकर स्कूली पढ़ाई को ज्यादा अहमियत नहीं दी या फिर उसने जिन्दगी की असली पाठशाला से इतना कुछ सीख लिया कि स्कूली किताबें उसके लिए आम किताबें बनकर रहेगीं।

ऐसा नहीं कि आमिर खान को पढ़ने का शौक नहीं था, आमिर खान ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि वो घर पहुंचते सबसे पहले टीवी रिमोट नहीं बल्कि किताबें उठाते हैं। उनके बारे में किरण राव तो यहाँ तक कहती हैं, "वो पढ़ने के इतने शौकीन हैं कि टॉयलेट और कार में किताबें साथ ले जाते हैं"। वो बात जुदा है कि वो किताबें स्कूल पाठ्यक्रम की नहीं होती। अगर आज आमिर खान एक सफल अभिनेता, फिल्म निर्माता और फिल्म निर्देशक हैं, तो इसमें उसकी स्कूल पढ़ाई नहीं बल्कि वो किताबी ज्ञान है, जो उसने छ: साल की उम्र से अब तक विद्वानों की किताबें पढ़कर अर्जित किया है।

सफलता की जिस शिखर पर आमिर खान आज पहुंच चुके हैं, वहां पहुंचते बहुत सारे व्यक्ति जमीं छोड़ देते हैं, पैसे और शोहरत के घुम्मड में सोचने की शक्ति तक खो देते हैं, लेकिन जिन्दगी की असल पाठशाला में पढ़े आमिर इसलिए बरकरार हैं कि उन्होंने कभी दौलत और शोहरत को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया। और कभी जमीं नहीं छोड़ी।

आमिर अपने किरदारों में इस तरह ढल जाते हैं, जैसे वो असल जिन्दगी में ही उन किरदारों को जी रहे हो। इस तरह का ढलना उस व्यक्ति के बस में ही हो सकता है, जो महावीर के उस कथन को जानता हो, जिसमें कहा गया है कि अगर कुछ सीखना है तो अपने दिमाग के बरतन को पूरी तरह खाली कर लो। तभी उसमें कुछ नया ग्रहण कर पाओगे। आमिर खान के किरदारों में दोहराव नाम की चीज आज तक नहीं देखने को मिली। यह बात भी इस तरह संकेत करती है कि आमिर खान कुछ नया करने से पहले अपने आपको पूरी तरह खाली कर लेते हैं, और फिर नए किरदार को नए विचार को अपने भीतर समा लेते हैं।

इसके अलावा मुझे आमिर खान की सफलता और उसके युवापन के पीछे उसका स्पष्टवादी सोच का होना बहुत ज्यादा नजर आता है। आमिर खान को कई बार मीडिया से बात करते हुए देखा है, वो अपनी बात पूरी स्पष्टता और निर्भय होकर कहता है। उसकी स्पष्टवादी नीति है, जो उसको 44 साल की उम्र में भी युवा रखे हुए है। किसी विचारक ने लिखा है कि अगर आप ताउम्र युवा रहना चाहते हो तो अपनी सोच को इतना स्पष्टवादी बना दो, अस्पष्टता बाकी न रहे। स्पष्टवादी व्यक्ति चिंतारहित हो जाता है और भयमुक्त हो जाता है, वो करनी में यकीन करता है। आमिर खान युवा पीढ़ी के लिए एक अदार्श व्यक्ति है, और आमिर खान से युवाओं को सीखना चाहिए।
भार
कुलवंत हैप्पी