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नरेंद्र मोदी, मीडिया और अरविंद केजरीवाल

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी से अधिक मीडिया पीड़ित कोई नहीं होगा। मोदी जितना तो बॉलीवुड में भी आपको मीडिया पीड़ित नहीं मिलेगा। ग्‍यारह साल तक निरंतर मीडिया के निशाने पर रहे। मीडिया का विरोधी सुर इतना कि उनको पांच इंटरव्‍यूओं को छोड़कर भागना पड़ा।

2012 ढलते वर्ष के साथ एक नए नरेंद्र मोदी का जन्‍म हुआ। यह ग्‍यारह साल पुराना नरेंद्र मोदी नहीं था। इस समय नए नरेंद्र मोदी का उदय हो रहा था। गुजरात की सत्‍ता चौथी वार संभालने की तरफ कदम बढ़ रहे थे। गुजरात की जीत उतनी बड़ी नहीं थी, जितना बड़ा उसको दिखाया गया।

इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ एपको वर्ल्‍ड, पीआर एजेंसी का, जिसने अपने हाथ में मीडिया रिमोट ले लिया था। 2012 की जीत बड़ी नहीं थी। इसका तथ्‍य देता हूं, जब नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात में मुख्‍यमंत्री बने तो उनकी सीटें 127 थी, दूसरी बात सत्‍ता में आए तो उनकी सीटें 117 तक घिसककर आ गई थी। अंत 2012 में यह आंकड़ा महज 116 तक आकर रुक गया।

मगर मोदी का कद विराट हो गया, क्‍यूंकि मीडियाई आलोचनाओं के बाद भी नरेंद्र मोदी निरंतर गुजरात की सत्‍ता पर काबिज होने में सफल हुए। ग्‍यारह साल का वक्‍त नरेंद्र मोदी आज भी नहीं भूलते, तभी तो उन्‍होंने न्‍यूज ट्रेडर जैसे शब्‍द को जन्‍म दिया। हालांकि दिलचस्‍प बात तो यह थी कि नरेंद्र मोदी ने हर न्‍यूज चैनल को अपना इंटरव्‍यू दिया, ताकि अपनी बात पूरे देश तक पहुंचा सके, लेकिन किसी भी न्‍यूज ट्रेडर का नाम नहीं लिया।

नरेंद्र मोदी इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया से त्रसद थे, तभी उन्‍होंने शुरू से ही सोशल मीडिया पर जोर दिया। नरेंद्र मोदी 2007 के आस पास सोशल मीडिया पर पूरी तरह सक्रिय होने लगे। अलग अलग भाषाओं में अपनी वेबसाइट का संचालन किया, ताकि लोगों से जुड़ा जाए। 2012 तक आते आते नरेंद्र मोदी मीडिया के लिए टीआरपी का सबसे बड़ा मटीरियल बन चुके थे।

अब आजतक को राखी सावंत और इंडिया टीवी को भूत प्रेत दिखाने की अधिक जरूरत महसूस न हो रही थी। जी न्‍यूज के नवीन जिंदल के साथ रिश्‍ते बिगड़े, तो कांग्रेस सबसे बड़ी दुश्‍मन के रूप में जी न्‍यूज के सामने खड़ी हो गई। इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया को एक दूसरे की नकल करने की लत है।

इस लत की वजह देश में एक माहौल बनता है। उसकी माहौल में बड़े बड़े बुद्धिजीवी अपने दिमाग से कुछ नए शब्‍दों के साथ मसाले बनाते हैं, जो अख़बारों के कोरे कागजों को काले करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया सोशल मीडिया पर, और प्रिंट मीडिया इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव में अपना जीवन बसर कर रहा है।

जहां 2012 में डिजीटल कैंपेन व वन मैन शो के दम पर सरकार बनाने में नरेंद्र मोदी कामयाब हुए, वहीं मीडिया ने भाजपा के भीतर उनकी साख को जन्‍म दिया। अंतिम सांसों पर पड़ी बीजेपी को उम्‍मीद की किरण नजर आई। डूबते को तिनके का सहारा वाली कहावत इस समय सही समझ पड़ रही थी।

बीजेपी ने वरिष्‍ठ नेताओं की नाराजगी को मोल लेते हुए नरेंद्र मोदी को गोआ में पीएम पद का उम्‍मीदवार घोषित कर दिया। यहां पर एलके आडवाणी का विरोध सुर्खियों में रहा। जैसे कि सब जानते ही थे कि नरेंद्र मोदी यहां से पार पाएंगे एवं एक मजबूत नेता बनकर उभरेंगे। वही हुआ, अंत मीडिया ने नरेंद्र मोदी को मजबूत नेता घोषित कर दिया।

उधर, अरविंद केजरीवाल के साथ अन्‍ना अंदोलन अपनी शिखर पर था। सरकार की जड़ों को हिला चुका था। सरकार विरोधी माहौल तैयार हो चुका था। अब सरकार पूरी तरह ध्‍वस्‍त होने के किनारे थे। अनुमान लगने लगे थे कि सरकार आज गिरी या कल गिरी।

इस बीच पांच राज्‍यों के चुनाव आए। बड़ी दिलचस्‍प बात थी कि नरेंद्र मोदी को मध्‍य प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए नहीं जाने दिया गया, लेकिन फिर भी शिवराज चौहान की सरकार ने भाजपा को बहुत बड़ी जीत दिलाने में सफलता हासिल की, जो जीत नरेंद्र मोदी की 2012 की जीत से तो काफी बड़ी थी। मध्‍य प्रदेश के साथ साथ भाजपा ने चार राज्‍यों में अच्‍छा प्रदर्शन किया, लेकिन अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में बनी आम आदमी पार्टी ने दिल्‍ली में नरेंद्र मोदी की लहर वाली भाजपा की हवा निकाल दी। मीडिया ने अपने एग्‍जिट पोल में अरविंद केजरीवाल की पार्टी को आठ सीटें प्रदान की। नतीजे आए तो आंखें खुली की खुली रह गई। पूरा मीडिया जगत अवाक रह गया। स्‍वयं आम आदमी पार्टी को झटका लगा।

आम आदमी पार्टी 28 विधायकों के साथ दिल्‍ली विधान सभा पहुंची। आम आदमी पार्टी ने विपक्ष में बैठने की बात कही, और कहा कि बड़ी पार्टी बीजेपी सरकार बनाए। अब बीजेपी ने इंकार कर दिया। मीडिया ने ख़बर चला दी कि अरविंद केजरीवाल अपनी जिम्‍मेदारी से भाग रहे हैं, जब उनको कांग्रेस बिना शर्त समर्थन दे रही है तो सरकार बनानी चाहिए।

अरविंद केजरीवाल ने जनता के बीच जाकर समर्थन मांगा। तथाकथित कहो या असली, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाई। उम्‍मीद नहीं थी कि अरविंद केजरीवाल सत्‍ता में पहुंचते ही अपनी खांसी की परवाह किए बिना अपनी सरकार को काम में लगा देंगे। अरविंद केजरीवाल ने पुराने नेताओं की तरह किसी भी आभार रैली का आयोजन नहीं किया। सीधे काम में जुटे गए। घर पर पंचायत बुलाई तो कुछ शरारती लोगों ने हल्‍ला कर दिया। इसके बाद मीडिया को लगने लगा कि अब बीजेपी की लहर को झटका लगा सकता है।

उन्‍होंने अरविंद केजरीवाल के कुछ ऐसे वीडियो चलाने शुरू कर दिए। जैसे मैं राजनीति में नहीं जाउंगा। मैं कोई पद नहीं लाउंगा। मैं किसी सरकारी घर में नहीं रहूंगा। मैं सुरक्षा नहीं लूंगा वगैरह वगैरह। न जाने कितनी ऐसी बातें, जो आम आदमी यूं कह जाता है। यह बातें संगीन जुर्म तो नहीं हैं। काम की बात को छुपा दिया गया, अब नए शब्‍द का इस्‍तेमाल शुरू हुआ नौटंकीबाज, जो सोशल मीडिया से आया। सोशल मीडिया पर बीजेपी कार्यकर्ता सबसे तेज थे, उन दिनों। अब मीडिया का एक ही काम था, अरविंद केजरीवाल को अविश्‍वसनीय सिद्ध करना।

जो द्वेषराग नरेंद्र मोदी के प्रति था, अब को विरोधी राग अरविंद केजरीवाल के प्रति पैदा हो गया। स्‍थितियां बदल चुकी थी, अब अरविंद केजरीवाल बदलाव का चेहरा बनकर उभर रहे थे। इस बात से कोई मुकर नहीं रहा था कि अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी के लिए मुसीबत बन सकते हैं।

सरकार के विरोध में जनता हो चुकी थी। सिर्फ फैसले पर मोहर लगनी बाकी थी। अब पीआर एजेंसी भी तेज हो चुकी थी। नरेंद्र मोदी भी अपनी जीत के लिए कमर कस चुके थे। निरंतर रैलियां, उनका लाइव प्रसारण। टीवी पर निरंतर आने से तो निर्मल बाबा ने भी बड़े बड़े साधु संतों को पीछे छोड़ दिया था।

अब जनता एक प्रभाव में जीने लगी थी। अब आम आदमी पार्टी की सकारात्‍मक बाद केवल और केवल सोशल मीडिया पर थी, जो उसके समर्थक लिखते थे। और कहीं नहीं। सबसे दिलचस्‍प बात जो इस पूरे घटनाक्रम को देखने को मिली, पूरे देश में आम आदमी पार्टी के वर्करों पर तबाड तोड़ हमले हो रहे थे। मीडिया में कहीं भी चर्चा नहीं हो रही थी। सर्वे बताते हैं कि नरेंद्र मोदी से अधिक अगर मीडिया में किसी को स्‍पेस मिली वो केवल और केवल अरविंद केजरीवाल को मिली, प्राइम टाइम में। मगर सर्वे यह नहीं बताते कि मीडिया ने अरविंद केजरीवाल को लेकर नकारात्‍मक ख़बर कितनी स्‍पेस में दिखाई। इंडिया टीवी ने निरंतर प्राइम समय पर नरेंद्र मोदी को हीरो, तो केजरीवाल को जीरो दिखाया।

जी न्‍यूज का नरेंद्र मोदी के प्रति साधुवाद यह मीडिया में लम्‍बे समय तक याद रखा जाएगा। वहीं, आजतक पर भाजपा की तरफ से निशाने कसे गए, और कहा गया कि अरविंद केजरीवाल के अंदोलन के पीछे आजतक का हाथ है। सोशल मीडिया पर निरंतर हमलों के बाद आजतक ने भी अपनी ख़बरों की तस्‍वीर को बदलने की कोशिश की। एबीपी न्‍यूज ने अरविंद केजरीवाल को दिखाया, उसके दोनों पक्षों को निरंतर दिखाया।

मगर स्‍थितियां ऐसी भ्रमक हो चुकी थी कि कांग्रेस व अरविंद केजरीवाल की बात झूठी और नरेंद्र मोदी की बात सच्‍ची लगने लगी थी। अरविंद केजरीवाल की पुरानी बातों पर हो हल्‍ला करने वाले मीडिया ने नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की खोज करने की कोशिश नहीं की, क्‍यूंकि इसकी पीआर एजेंसी आज्ञा नहीं देती थी।

मोदी की चुनावी रैलियों में आंकड़े गलत होने के बावजूद मीडिया ने उसकी निंदा नहीं की। सवाल एक ही अंत में पूछता हूं कि आखिर ग्‍यारह साल बाद नरेंद्र मोदी से मीडिया को इतना प्‍यार क्‍यूं उमड़ा ? जन अंदोलन से निकलकर आया अरविंद केजरीवाल, जिसको मीडिया ने स्‍टार बनाया, वो एकदम से नौटंकीवाला कैसे बन गया ? विशेषकर दिल्‍ली की जीत के बाद।

चलते चलते एक और दिलचस्‍प बात कहते चलूं कि ग्‍यारह साल नरेंद्र मोदी के खिलाफ ट्रायल चलाने वाला मीडिया हार गया, और अंत नरेंद्र मोदी जीत गया। दूसरे क्रम अरविंद केजरीवाल के मामले में भी कुछ ऐसा ही होने वाला है, अगर आम आदमी पार्टी यूं जुटी रही। अगर आम आदमी ने हताश होकर एक बार फिर दम तोड़ दिया तो क्‍या कहना।

बैंड—बाजा, बारात और 'आप' की टोपी

वाराणसी में निकली आप की टोपी पहने बारात की ख़बर।
हिसार (हरियाणा) चुनाव की खुमारी अब सिर चढ़कर बोलने लगी है। राजनीतिक पार्टियों के समर्थक अपने-अपने दल के लिए प्रचार का कोई तरीका नहीं छोड़ रहे हैं। इसी कड़ी में हरियाणा में जिला सिरसा के गांव सलारपुर के एक युवक ने भी आम आदमी पार्टी के प्रचार-प्रसार के लिए अनोखा तरीका अपनाया।

आम आदमी पार्टी के इस पक्के समर्थक मुकेश धंजु ने अपनी शादी में सेहरा तो पहना, मगर उस पर टोपी पहनी 'आप' की। उसने बारात में शामिल होने वाले दोस्तों-रिश्तेदारों को भी 'आप' की टोपी पहनने का आग्रह किया। दूल्हे के आग्रह को कोई ठुकरा नहीं पाया। दूल्हे की बहनों और महिला बारातियों ने भी सिर पर टोपी पहनकर बारात में शिरकत की। गांव सलारपुर से 'आप' की टोपी पहने मुकेश धंजू की बारात ऐलनाबाद पहुंची।

दुल्हे मुकेश ने बताया कि मैं हमेशा से ही भ्रष्टाचार विरोधी विचारधारा का रहा हूं। मैं 'आप' के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की नीतियों से प्रभावित रहा हूं। इसी से प्रभावित होकर और प्रेरणा लेकर मैं शुरू से ही केजरीवाल के साथ जुड़ा हुआ हूं और उनके आंदोलनों में बढ़चढ़ कर भाग लेता रहा हूं। जहां भी मुझे मौका मिलता है, भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने से मैं नहीं चूकता।

अब चुनावी माहौल में सोमवार को जब मेरी शादी हुई, तो मैंने इसे भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने और सिरसा से 'आप' प्रत्याशी का चुनाव प्रचार करने का यह अनूठा तरीका सूझा और मेरे परिवारवालों और मित्रों ने भी इसमें उसका पूरा सहयोग किया।

दूल्हे के दोस्त प्रदीप सचदेवा ने बताया कि मुकेश आम आदमी पार्टी के आंदोलन को देश के नवनिर्माण का सच्चा आंदोलन मानते हैं, इसलिए इन पलों को यादगार बनाने के लिए ही उसने यह कदम उठाया। दूल्हे के दोस्त और पार्टी के डॉक्टर कुलदीप, पंकज कामरा, प्रदीप सचदेवा और मंगल सिंह ने अपनी ओर से मुकेश के उज्जवल वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए उसे शुभ कामनाएं दीं।

स्रोत : नवभारत टाइम्स डॉट कॉम

अरविंद केजरीवाल से नाराज श्री श्री! क्यूं ?

फेसबुक पर आजकल एक ख़बर को बड़े जोर शोर से शेयर किया जा रहा है, जिसमें अरविंद केजरीवाल की बुराई करते हुए नजर आते हैं पूजनीय श्री श्री रविशंकर जी।

अब नाराजगी का कारण बता देता हूं। मैं लम्बे समय से इस संस्थान के टच में हूं, अपरोक्ष रूप से। नरेंद्र मोदी व श्री श्री में बहुत निकटता है, जो 2012 के विधान सभा चुनावों से निरंतर जारी है।

पिछले महीने मोदी की किताब 'साक्षी भाव' को रिलीज भी श्री श्री ने किया। उसी शाम को अहमदाबाद में भोज भी रखा गया, जहां अपने भक्तों से कहा गया, लक्ष्मी कमल पर वास करती है, ध्यान रहे।

बात यहां कहां खत्म होती है, मथुरा से चुनाव मैदान में हेमा मालिनी हैं, जो गुरू की अनुयायी हैं, उनके घर अ​द्वितीय का उद्घाटन भी श्री श्री ने अपने कर कमलों से किया।

दिल्ली पूर्व चुनाव लड़ने वाले बीजेपी के उम्मीदवार महेश गिरि कौन हैं ? बता देता हूं, 16 साल की उम्र में घर छोड़कर हिमालय निकल गए। कुछ समय बाद गीर में आकर रहने लगे एवं गुरु दत्तात्रेय पीठ ​गीर के पीठ प्रमुख बने। यहां 2002 में वो श्री श्री के सन्निध्य में पहुंच गए। अध्यात्म से दिल भर गया तो राजनीति की तरफ चहल कदम शुरू कर दी।

अब चुनाव श्री श्री के शिष्य मैदान में हों, मोदी की तरफ से भोज उपलब्ध करवाया गया हो, तो लाजमी है कि नरेंद्र मोदी का राह रोकने वाला, उनको ​रास्ते से भटक गया लगेगा। हालांकि अरविंद केजरीवाल ने श्री श्री की प्रतिक्रिया को उस तरह लिया, जैसे श्री श्री अपनी सत्संग में कहते हैं। साक्षी भाव, स्वीकार करें।





लेकिन स्वयं श्री श्री साक्षी भाव का अ​र्थ क्यूं भूलते जा रहे हैं। वहां तो कोई तारंग नहीं होती, जो हो रहा होता है, वह होता है। वहां तो मौन की गूंज होती है। लेकिन राजनीति में अपने शिष्य उतारकर श्री श्री अब राजनीति में प्रवेश कर चुके हैं।

केजरीवाल से इ​सलिए नाराज!

एक थका मंदा आदमी नौकरी से घर पहुंचा। पत्नि ने ठंडे पानी का गिलास मुस्कराते हुए दिया। पति ने गिलास को पकड़ा, जैसे थका मंदा आदमी पकड़ता है। थोड़ी देर बाद पत्नि चाय लेकर आई और बोली। बड़े दिनों से मेरा मन कर रहा है कि आप एक दिन के लिए नौकरी से छुट्टी ले लेते, तो हम यहां आस पास किसी पि​कनिक वाली जगह पर घूम आते।

पति ने कहा, बॉस छुट्टी नहीं देगा। तुम को पता है कि इन दिनों मुझे ​आफिस में बहुत अधिक काम रहता है। पत्नि बोली, 365 दिनों में से सिर्फ इन्हीं दिनों काम रहता है, तो दूसरे दिन तुम क्या करते हो, अगर मुझे पहले बताया होता तो वो दिन चुन लेती, नहीं नहीं ऐसा नहीं, काम तो हर रोज रहता है। पत्नि तपाक से बोली, यही तो मैं भी कहना चाहती हूं, काम तो हर रोज रहता है, लेकिन छुट्टी तो कभी कभार ली जाती है।

नहीं, छुट्टी नहीं मिलेगी। बॉस मुझे आफिस से निकाल देगा। बाद में इतनी अच्छी जॉब भी नहीं मिलेगी। अच्छा तो यह बात है, हम से ज्यादा नौकरी प्यारी है। जब तुम दोस्त की पंचायत बिठाते हो, और अरविंद केजरीवाल को भगोड़ा कहते हो तो तब तुम को समझ नहीं आती कि उसने तो आपसे भी बड़ी कर्सी छोड़ी केवल देश में बदलाव के लिए, जो आज तक प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार ने नहीं छोड़ी और तुम से अपनी पत्नि की खुशी के लिए बॉस की नाराजगी मोल नहीं ली जा सकती।

भगोड़ा वो नहीं तुम हो! जो अपनी सुविधा के लिए मोह पाल लेते हो, वो तो मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर फिर भाग दौड़ में लग गया, हालांकि उसको पता भी नहीं कि उसकी पार्टी लोक सभा चुनावों में टिकेगी कि नहीं, लेकिन विश्वास है कि हम लौटेंगे, अच्छे बहुमत से!

दूसरे को गाली देने से बेहतर है कि आप कुछ करने की क्षमता व विश्वास रखें। अगर काबिलयत हुई तो हजारों राहें होंगी, नहीं तो एक दिन वो भी छूट जाएगा, जो तुम्हारे पास है। यूं गुस्से में बुड़बुड़ाते हुए पत्नि वहां से निकल गई। पति सोच रहा था, सच में मैं इसको खुश नहीं कर पा रहा, तो केजरीवाल पूरे इंडिया को किस तरह खुश रख सकता है।

उसने फालूत की पंचायत करनी छोड़ दी और घर के बाहर लिखकर लगा दिया, अगर मैं नहीं कर सकता तो यह न सोचें कि कोई दूसरा भी नहीं कर सकता।



Chauraha Express 

मोदी काठमांडू सीट से लड़ेंगे !

पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधान मंत्री पद के लिए उम्मीदवार चुने गए। इस बात से देश को खुशी होनी चाहिए थी, लेकिन अफसोस के देश के भीतर राजनीतिक पार्टियां उनको रोकने के लिए चुनाव मैदान में उतर गई। बड़ी हैरानीजनक बात है, भला कोई इस तरह करता है। माना कि देश में लोकतंत्र है, लेकिन किसी की भावनायों को भी समझना लोकतंत्र का फर्ज है कि नहीं।

बेचारे मोदी कहते हैं कि भ्रष्टाचार रोको। तो विरोधी कहते हैं मोदी रोको। मोदी कहते हैं कि गरीबी रोको तो विरोधी कहते हैं मोदी रोको। कितनी नइंसाफी है। वाराणसी से चुनाव लड़ने का मन बनाया था लेकिन मुरली मनोहर जोशी कहने लगे पाप कर बैठे जो वाराणसी से लड़ बैठे।​ स्थिति ऐसी हो चुकी है कि भाजप से न तो मुरली मनोहर जोशी को पाप मुक्त करते बनता है न ही पाप का भागीदार बनाते बनता है।

राजनाथ सिंह : आप बनरास से लड़े
नरेंद्र मोदी : जीतने की क्या गारंटी है ?
राजनाथ सिंह : गारंटी चाहिए तो arise इनवेटर ले आएं।

भाई गारंटी तो चाहिए क्यूंकि मुरली मनोहर जोशी के दीवाने भी अड़चन पैदा कर सकते हैं। अंत नरेंद्र मोदी ने फैसला किया है कि वो काठमांडू से चुनाव लड़ेंगे। वहां शांति हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वहां उनको कोई रोकने वाला भी नहीं है। सबसे सुरक्षित सीट। फिर क्या हुआ अगर काठमांडू नेपाल में है। अब भारत में तो सभी बेचारे मोदी को रोक रहे हैं, यह भी कोई लोकतंत्र है।

सही। नरेंद्र मोदी को काठमांडू से चुनाव लड़ना चाहिए।

परिवर्तन किसे चाहिए.... सत्ता की भूख

देश को बदलने की बात करने वाले। देश को सोने की चि​ड़िया बनाने का दावा करने वाले बड़ी हैरत में डाल देते हैं, जब वह सामा​जिक मुद्दों को लेकर सत्ता में आई पार्टी पर सवाल​ उठाते हैं। उसका स्वागत करने की बजाय, उसको गिराने की साजिश रचते हैं, गिराने की हथकंडे अपनाते हैं।

देश को बदलने की बात करने वाली भाजपा के नेता अरविंद केजरीवाल की टोपी को लेकर सवाल उठा रहे हैं। अगर भाजपा देश का भला चाहती है तो उसको हर समाज सुधारक में मोदी नजर आना चाहिए न कोई दूसरा। मगर सत्ता पाने की चेष्ठा। आगे आने की अभिलाषा ऐसा होने नहीं देती। यह हालत वैसी है जैसे मरुथल में कोई भटक जाए। उसको प्यास लगे व मृग मरीचिका को झील समझने लगे। ​जिसके पास पानी की बोतल होगी, जिसको प्यास न होगी, उसको मृग मरीचिका लुभा न सकेगी।

मगर राजनेतायों को पद प्रतिष्ठा से प्रेम है। देश की जनता पहाड़ में जाए। नेता को ढोंग रचता है। जनता का मिजाज देखकर बाहर के कपड़े बदल लेता है। उसको समाज सुधार से थोड़ी न कुछ लेना है। एक दिन गधे पर सवार होकर मुल्ला नसीरुद्दीन बाजार से निकल रहा था, किसी ने पूछा किस तरफ जा रहे हो, मुल्ला ने कहा, गधे से पूछ लो। जिस तरफ ले जाएगा, चले जाएंगे। हमारी कहां मानता है।

देश का भला मोदी करे या अरविंद करे। क्या फर्क पड़ता है। देश का भला होना चाहिए। मगर नेता सोचते हैं, भला होना चा​हिए, लेकिन हमारे चुने नेता द्वारा होना चाहिए। शायद दुनिया इसी बहाने याद कर ले। इसमें सुख है, कोई याद कर ले। इस लालसा की आग में आदमी जलता जा रहा है। सिकंदर को याद कर लेता है, हिटलर को याद कर लेते हैं, लेकिन इससे उनको क्या फायदा होता है।

अरविंद की टोपी नजर आती है। उसके भीतर कुछ करने की आग नजर नहीं आती, क्योंकि लालसा ने आंख पर पट्टी बांध दी है। डर है कहीं, हमारे खेले दांव को अरविंद ​बिगड़ न दे। कहीं इस बार भाजपा सत्ता पाते पाते रह न जाए। लालसा बड़ी है, देश बड़ा नहीं है।

मोदी का कुर्ता नजर नहीं आता, नजर आती है तो अरविंद की टोपी। बड़ी दिक्कत है। टोपी तो अन्ना भी पहनते हैं। अन्ना से भी मोहभंग हो जाता, अगर वह नेतायों की रोजीरोटी छीन लेते। नेता ने अरविंद का साहस न देखा, देखा तो केवल टोपी को। टोपी ने कुर्सी छीन ली। कुर्सी पर बैठने का स्वप्न अधूरा रह गया। सालों से बुना था।

देश का भला करने वाले न टोपी देखते हैं, न पार्टी देखते हैं, न अरविंद देखते हैं, न नरेंद्र देखते हैं । वह तो केवल देश का विकास देखते हैं।

अरविंद केजरीवाल कुछ तो लोग कहेंगे

बड़ी हैरानी होती है। कोई कुछ लेता नहीं तो भी देश के कुछ बुद्धिजीवी सवाल उठा देते हैं, अगर कोई लेता है तो भी। अब आम आदमी मुख्यमंत्री बन गया। वो आम आदमी सुरक्षा लेना नहीं चाहता, लेकिन मीडिया अब उसको दूसरे तरीके से पेश कर रहा है।

सुनने में आया है, अरविंद केजरीवाल ने सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। सुरक्षा के रूप में उसको दस बारह पुलिस कर्मचारी मिलते, लेकिन अब उसकी सुरक्षा के​ लिए सौ पुलिस कर्मचारी लगाने पड़ रहे हैं। अब भी सवालिया निशान में केजरीवाल हैं ?

शायद बुद्धिजीवी लोग घर से बाहर नहीं निकलते या घर नहीं आते। शायद रास्तों से इनका राब्ता नहीं, संबंध नहीं, कोई सारोकार नहीं। वरना,उनको अर​विंद केजरीवाल के शपथग्रहण कार्यक्रम की याद न आती, जहां पर सौ पुलिस कर्मचारियों को तैनात किया गया था। कहते हैं आठ दस से काम चल जाता है, अगर अरविंद सुरक्षा के लिए हां कह देते तो। सच में कुछ ऐसा हो सकता है, अगर हो सकता है तो नरेंद्र मोदी की राजधानी, मेरे घर के पास आकर देख लें।

मोदी गोवा से, दिल्ली, यूपी, बिहार से निकलता है, लेकिन मेरे शहर की सड़कों पर सैंकड़े से अधिक पुलिस कर्मचारी ठिठुरते हैं। मोदी की सुरक्षा के कारण हमको दिक्कत भी है, लेकिन फोकट की अधिक सुरक्षा भी। सड़क के दोनों तरफ पुलिस कर्मचारी होते हैं, मोदी का कोई नामोनिशां नहीं होता। जब मोदी निकलता है तो स्कोर्पियो का काफिला निकलता है, जो बख्तर बंद होता है। क्या इसका खर्च अ​रविंद केजरीवाल की सुरक्षा के लिए तैनात किए पुलिस कर्मचारियों से कम है।

पुलिस कर्मचारी, जनता के सेवक हैं। किसी मुख्यमंत्री या किसी नेता के नहीं। बंदूक रक्षा करती तो राजीव गांधी, इंदिरा गांधी सुरक्षित होती। भय किस बात का। मौत का। मौत ने तो काल को वश में करने वाले रावण को नहीं छोड़ा तो आम आदमी क्या है ? सुरक्षा का जिम्मा किसके हाथों में है, जो आम आदमी है, जिसके परिवार की सुरक्षा ऐसी पुलिस चौं​कियों के छाये में है, जहां चौंकियां तो हैं, पुलिस कर्मी नहीं।

बड़े अजीब हैं बुद्धिजीवी। कथा सुनाते हैं बैल, शिव व पार्वती की। और खुद की भूल जाते हैं। कहते हैं शिव पार्वती बैल पर बैठकर जा रहे थे। तभी रास्ते में दो लोग मिले, कहने लगे दोनों जानवर पर अत्याचार करते हैं। पार्वती ने पत्नी धर्म निभाया और नीचे उतर गई, शिव को बैठे रहने दिया। कुछ आगे गए तो कोई और मिला, उसने कहा, कैसा निर्दयी है, पत्नि चल रही है, आप आराम से बैठकर जा रहा है। शिव भी उतर गए। कुछ दूर गए तो दूसरे लोग मिल गए कहने लगे। यह लोग भी कैसे हैं, पास में सवारी है, लेकिन पैदल चलकर अपने एवं बैल के पैर थका रहे हैं। इससे अच्छा होता तो घर छोड़ आते।

सच में जितने मुंह उतनी बातें। अरविंद केजरीवाल जमाना है कुछ तो कहेगा। मैं भी तो कुछ कह रहा हूं।

लोकपाल बिल तो वॉट्सएप पर पास हो गया था

अन्ना हजारे। आज के गांधी हो गए। ठोको ताली। कांग्रेस व भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने लोक पाल बिल पास कर दिया। कहीं, आज फिर एक बार अंग्रेजों की नीति को तो नहीं दोहरा दिया गया। गांधी को महान बनाकर सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह जैसे किरदारों को दबा दिया गया।

सत्ता पाने की चाह में पागल पार्टियां ​दिल्ली में बहुमत न मिलने की कहानी गढ़ते हुए सरकार बनाने से टल रही हैं। आज भी राजनीतिक पार्टियां भीतर से एकजुट नजर आ रही हैं। शायद वह आम आदमी के हौंसले को रौंदा चाहती हैं, जो आप बनकर सामने आया है।

वह चाहती हैं कि आप गिरे। डगमगाए ताकि आने वाले कई सालों में कोई दूसरा आम आदमी राजनेता को नीचा​ दिखाने की जरूरत न करे। आठ साल से लटक रहा बिल एकदम से पास हो जाता है। अन्ना राहुल गांधी को सलाम भेजता है। उस पार्टी का भी लोक पाल को समर्थन मिलता है, जिसका प्रधानमंत्री उम्मीदवार, बतौर मुख्यमंत्री अब तक अपने राज्य में लोकायुक्त को लाने में असफल रहा है।

मुझे लगता है कि शायद अन्ना ने राहुल गांधी को भेजे पत्र के साथ एक पर्ची भी अलग से भेजी होगी। जिस पर लिखा होगा। क्या एक और अरविंद केजरीवाल चाहिए? राहुल के कान खड़े हुए होंगे। यकीनन उसने वॉट्सएप के जरिए ​पर्ची का डिजीटल संस्करण राजनेतायों के ग्रुप को भेजा होगा।

वहां भी कुछ वैसा ही हुआ होगा। नेताओं ने सोचा होगा। देश में हर चीज के लिए कानून है। लेकिन अपराध कहां रूकते हैं। यहां आज भी ट्रै​फिक सिग्नल टूटते हैं। कानून बनाने से अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। जल्द से जल्द पास करवा दो। पास तो वॉट्सएप पर ही हो गया होगा, लेकिन खानापूर्ति के लिए संसदीय कार्यवाही जरूरी है। कानून तो टूट भी सकता है, लेकिन अगर एक और केजरीवाल पैदा होगा तो हमारा बना बनाया चक्रव्यूह टूट जाएगा। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस से बेहतर तो महात्मा गांधी को बनाए रखना आसान है। क्यूं महात्मा गांधी, सरदार पटेल को गद्दी देने की बजाय नेहरू को सौंपेगा। गांधी अहिंसावादी है। वह सिस्टम के खिलाफ शांति से लड़ता है। तब तक कई साल गुजर जाते हैं। हमारी कई पीढ़ियों का इंतजाम हो जाता है।

लोक पाल बिल पास हो गया। ठोको ताली। आज के बाद ​देश में रिश्वत, घोटाले खत्म हो जाएंगे। हम भ्रष्ट नेताओं से मुक्त हो चुके हैं। कल का इंतजार करें।

एक ख़त आम आदमी पार्टी के नाम

नमस्कार। सबसे पहले आप को बधाई शानदार शुरूआत के लिए। कल जब रविवार को न्यूज चैनलों की स्क्रीनें, क्रिकेट मैच के लाइव स्कोर बोर्ड जैसी थी, तो मजा आ रहा था, खासकर दिल्ली को लेकर, दिल्ली में कांग्रेस का पत्ता साफ हो रहा था, तो भाजपा के साथ आप आगे बढ़ रहे थे, लेकिन दिलचस्प बात तो यह थी कि चुनावों से कुछ दिन पहले राजनीति में सक्रिय हुई पार्टी बाजी मारने में सफल रही,हालांकि आंकड़ों की बात करें तो भाजपा शीर्ष है, मगर बात आप के बिना बनने वाली नहीं है। यह बात तो आपको भी पता थी कि कुछ समीकरण तो बिगड़ने वाला है, मगर आप ने इतने बड़े फेरबदल की उम्मीद नहीं की थी। अगर आपको थोड़ी सी भी भनक होती तो यकीनन सूरत ए हाल कुछ और होता। आप प्रेस के सामने आए, बहुत भावुक थे, होना भी चाहिए, ऐसा क्षण तो बहुत कम बार नसीब होता है। अब आप को अपने कार्यालय के बाहर एक शेयर लिखकर रखना चाहिए,

मशहूर हो गया हूं तो जाहिर है दोस्तो, अब कुछ इलजाम मेरे स​र भी आएंगे
जो गुरबत में अक्सर नजर चुराते थे, अब देने बधाई मेरे घर भी आएंगे

मगर अब आप विपक्ष में बैठने की बात कर रही है, जो सही नहीं। नतीजे आप ने बदले हैं, मुख्यमंत्री को आप पार्टी ने हराया है, तो यकीनन सत्ता आप के हाथों में होनी चाहिए। गेंद को बीजेपी के पाले में धकेलने का मतलब दिल्ली की जनता के साथ किए वचनों से किनारा करना है। अगर कांग्रेस व भाजपा को उखाड़ना चाहते थे, लेकिन अब सत्ता से छीनकर दूसरे को देना चाहते हैं। न इंसाफी है। क्यूंकि आटे में नमक जितना तो गुनाह माफ है। पूरी सत्ता पुरानी पार्टी के हाथ में देने से अच्छा है, कुछ कांग्रेसियों को साथ ले लो, क्यूंकि राजनी​ति में अच्छे लोग भी होते हैं। मैं फिर कहता हूं, आप को सत्ता संभालनी चाहिए, राजनीति व जंग में सब जायज है। अगर आप अब पीछे हटते हैं तो शायद दिल्ली की जनता के साथ न इंसाफी होगी, क्यूंकि आप का विपक्ष में बैठना, स्वयं को सुरक्षित करना होगा। क्यूंकि आप के ज्यादातर राजनीतिक प्रतिनिधि राजनीति से दूर रहे हैं, उनको प्रजातंत्र में शासन करना अभी से नहीं आएगा, शायद इसलिए आप सत्ता के लोभी नजर नहीं आ रहे, या फिर वह एक माहौल बना रहे हैं, ताकि जनता का समर्थन मिल जाए, व बड़ी सुखद के साथ कांग्रेस के साथ चले जाएं।

केजरीवाल अब आप सत्ता से केवल एक फैसला दूर हैं, लेकिन मैं भी जानता हूं, और आप भी कि फैसले लेने से अधिक चुनौतीपूर्ण कार्यकाल होगा, क्यूंकि आप को उन वायदों पर पूरा उतरना होगा, जो सीना ठोक कर किए हैं, अगर भाजपा आती है तो उनको पांच साल सुरक्षित रहने का मौका मिल जाएगा, और राजनीति में स्वयं को परिपक्व कर पाएंगे। मगर मैं दूसरे नजरिये से सोचता हूं, अनाड़ी आदमी संभालकर वाहन चाहता है, तो धीमा चलता है, मगर अच्छा चलता है, अगले साल देश में क्रांति का बिगुल बज सकता है, अगर आप विपक्ष की बजाय सत्ता संभालें। आपको सकारात्मक रहना है तो विपक्ष के साथ रहें, अपनी रखें, व उनकी सुनें।   

मगर मेरा निजी ख्याल है कि आप केजरीवाल को राजनीति में उतरने के बाद, इतना स्नेह व समर्थन पाने के बाद अब कदम पीछे नहीं हटाना चाहिए, उनको कांग्रेस के साथ दिल्ली में सरकार बनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए, इससे दो फायदे होंगे, उनके नेताओं को भी कुछ सीखने को मिलेगा, और आपको भी कांग्रेस के अनुभवियों से सीखने को मिलेगा।

आप के साहस को सलाम। मगर अब आप को वह फैसला लेना है, जो दिल्ली के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। विपक्ष में बैठकर शायद मांगों को पूरा करवाना वैसा ही जैसे मनमोहन सिंह के निजी तरीकों को सोनिया गांधी की मंजूरी के बाद लागू करना, सत्ता आप को अपने हाथ में लेनी चाहिए। रोटी तो दिल्ली वासियों ने परोस दी है, लेकिन निवाला तोड़कर मुंह में स्वयं को डालना होगा, दिल्लीवासियों के विश्वास का कर्ज अदा करना होगा।

बाकी जीत आपकी, फैसला आपका। देश इंतजार में है। मैं भी। चलते चलते एक और शेयर आपके नाम।

हक़ीकत की तह तक पहुँच तो गए लेकिन सच में ख़ुद को उतारेंगे कैसे।
न जीने की चाहत, न मरने की हसरत यूँ दिन ज़िन्दगी के गुज़ारेंगे कैसे।

Aseem Trivedi का पत्र संतोष कोली की मृत्‍यु के बाद

साथियों, बहुत दुखद खबर है कि आज संतोष कोली जी हमेशा के लिए हम सब से दूर चली गयीं. अब उनकी वो निर्भीक और निश्चिंत मुस्कराहट हमें कभी देखने को नहीं मिलेगी. अन्ना आंदोलन के सभी मित्रों में संतोष जी मेरी फेवरिट थीं. उनसे मिलकर आपके भीतर भी साहस और सकारात्मकता बढ़ जाती थी. मैं दावे से कह सकता हूँ कि समाज के लिए उनके जैसे निस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोग आपको बहुत मुश्किल से देखने को मिलेंगे.

दामिनी आन्दोलन के दौरान एक दिन वो बता रही थीं कि अब वो एक गैंग बनाएंगी और ऐसी हरकतें करने वालों से अच्छी तरह निपटेंगी. बाद में उनके फेसबुक पेज पर नाम के साथ दामिनी गैंग लिखा देखा. खास बात ये है कि उनके साहस और आक्रोश में बहुत सहजता थी. ये वीर रस कवियों की तरह आपको परेशान करने वाला नहीं बल्कि आपको बुरे से बुरे क्षणों में भी उम्मीद और सुकून भरी शान्ति देने वाला था. समय समय पर उनके परिवार के सदस्यों से भी मिलने को मिला जो संतोष जी के साथ उनके संघर्ष में कंधे से कंधे मिलाकर साथ दे रहे थे. आज के फाइव स्टार एक्टिविज्म के दौर में एक बेहद साधारण परिवार से आयी संतोष जी का जीवन अपने आप में एक उदाहरण पेश करने वाला था. अपने साधारण और सहज अंदाज़ में वो जन साधारण के साथ कनेक्ट और कम्युनिकेट करने की अद्भुत क्षमता रखती थीं. सुन्दरनगरी में लोगों का उन पर विश्वास देखने योग्य था.

लेकिन दुर्भाग्य ही है कि उनके साथ बहुत थोड़ा सा समय ही बिताने को मिला और बहुत गिनती की मुलाकातें ही मेरे हिस्से आयीं. मुझे आज भी याद है जब वो करीब साल भर पहले जंतर मंतर पर अन्ना, अरविन्द के अनशन के दौरान जनता को संबोधित कर रही थीं, उनका बेहद सहज और उन्मुक्त अंदाज़ अपने आप में एक सन्देश देता लग रहा था. करीब दस दिन चले उन अनशन के दौरान ही उनके साथ काफी समय बीता और उनको अच्छी तरह समझने का मौक़ा मिला. सेव योर वॉयस अभियान के दौरान इंटनरेट सेंसरशिप के खिलाफ राजघाट पर हमारा पहला प्रोटेस्ट हो या 66A के खिलाफ जंतर मंतर पर हमारा अनशन, संतोष जी ने अपने मित्रों के साथ पहुचकर हमारा पूरा साथ दिया.

लेकिन अफ़सोस है कि ज़िंदगी की लड़ाई में हम चाहकर भी उनका साथ नहीं दे पाए और उनकी इस असमय विदाई को स्वीकार करने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं बचा. लेकिन हमें विश्वास है कि संतोष जी हमेशा हमारे लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेंगी और सहज और निर्भीक रूप से अपने कर्त्तव्य पथ पर चलने के लिए हमें प्रेरित करती रहेंगी. काश वो एक बार ठीक हो पातीं और लोगों का उनके प्रति प्रेम और सम्मान देख पातीं कि कितनी शिद्दत से लोगों ने उनके लिए प्रार्थनाएं कीं उनके स्वस्थ्य होने की दुआएं कीं और काश कि हम सब उनके साथ कुछ और समय बिता पाते.

लेकिन इतना दूर जाकर भी आप हमारे साथ रहेंगी सतोष जी, आपकी यादें जनसंघर्ष की प्रेरणा बनकर हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगी और स्वार्थपरता के इस अमानवीय दौर में निस्वार्थ सेवा भाव के बीज अंकुरित करती रहेंगी.

अरविंद केजरीवाल के बहाने स्‍विस यात्रा

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने अंबानी भाइयों के स्विस बैंक में खाते होने का दावा करते हुए दो बैंक ख़ातों को उजागर किया है, जिनको केजरीवाल अम्‍बानी बंधूओं का बता रहे हैं। अरविंद केजरीवाल के खुलासों की चर्चा से बॉलीवुड भी अछूत नहीं, हालिया रिलीज हुई फिल्‍म 'खिलाड़ी 786' में पुलिस कर्मचारी का किरदार निभा रहे जोनी लीवर मिथुन चक्रवर्ती को धमकी देते हैं कि वो 'केजरीवाल' को बता देगा।

केजरीवाल खुलासे पर खुलासा किए जा रहे हैं, लेकिन सरकार इस मामले में कोई सख्‍़त कदम उठाती नजर नहीं आ रही, जो बेहद हैरानीजनक बात है, उक्‍त खाते अम्‍बानी बंधुओं कि हैं या नहीं, इस बात की पुष्‍टि तो स्‍विस बैंक कर सकती है, मगर निजता नियमों की पक्‍की स्‍विस बैंक ऐसा कभी नहीं करेगी, क्‍यूंकि उसने खाताधारक को एक गुप्‍त कोड दिया होता है, जिसका पता खाताधारक के अलावा किसी को नहीं होता, और तो और स्‍विस बैंक, हर दो साल बाद खाता धारकों के खाते बदल देती है, आप एक ख़ाते को आजीवन नहीं रख सकते।

स्‍विस को हम कितना जानते हैं, बस इतना कि वहां पर हमारा काला धन पड़ हुआ है। मगर स्‍विस एक ऐसा देश है, जहां की सरकार अपने नागरिकों के प्रति पूर्ण रूप से वफादार है। भले ही स्‍विस की धरती पर धार्मिक ग्रंथ नहीं लिखे गए, भले ही मानवता का पाठ वहां पर कई शताब्‍दियों तक न पढ़ाया गया, मगर फिर भी स्‍विस सरकार मानवता धर्म का पालन बाखूबी करती है।

हिन्‍दुस्‍तान में धर्म के भीतर भले ही औरत को सबसे ऊंचा दर्जा मिला हो, मगर वास्‍तविकता हम सब जानते हैं, मगर स्‍विस के भीतर औरत को बेहद सुरक्षित रखा गया है, अगर कोई व्‍यक्ति अपनी पत्‍नी को छोड़ना चाहता है तो बेहिचक छोड़ दे, लेकिन अपनी सरकारी संपत्ति उसके नाम करके।

विकलांगों के लिए अलग संस्‍थानों का प्रबंध स्‍विस में है, जहां पर विकलांगों की हर इच्‍छा पूर्ण की जाती है, चाहे काम वासना से जुड़ी हुई ही क्‍यूं न हो। पैदल चलने वालों के लिए वाहन वालों को रूकना पड़ता है। बुजुर्ग को पहले रास्‍ता क्रोस करने की इजाजत है।

कोई भी बिजनस शुरू करने से पूर्व आपको एक तयशुदा राशि सरकार को डिपोजिट करनी होती है, जिसके बाद आप सरकार से लोन भी ले सकते हैं, अगर बिजनस नहीं चला तो सरकार आप पर लोन राशि वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव नहीं डालेगी, मगर आगे से लोन भी नहीं देगी।

अगर आपकी एक समयाविधि के बाद नौकरी चली जाए तो आपको सरकार अपनी और से कुछ पैसे वेतन के रूप में देती है, और उसके साथ साथ आपको नि:शुल्‍क कोर्स करवाती है, ताकि आप जल्‍द से जल्‍द नए काम के लिए तैयार हो सकें। बच्‍चों के लिए एजुकेशन खर्च सरकार वाहन करती है, जो बहुत बड़ी रकम के रूप में प्रतिमाह अभिभावकों को मिलता है।

महिलाओं के मजबूत पक्ष के कारण स्‍विस में मूल निवासियों की जनसंख्‍या बेहद कम हो रही है, जो स्‍विस सरकार को गंवारा नहीं। इसलिए अब वहां पर सरकार स्‍विस नागरिकों को शादी करने एवं परिवार बढ़ाने के प्रति सजग कर रही है।

वैसे तो स्‍विस बैंक की जानकारियां किसी को मिलती नहीं, लेकिन फिर भी एक जानकार द्वारा बताई गई जानकारी के अनुसार स्‍विस बैंक में भारत का इतना काला धन पड़ा है कि अगर वो भारत वापिस आ जाए तो भारत के नागरिकों को 2050 तक नौकरी करने की जरूरत न पड़े, और बेरोजगारी भत्‍ते के नाम पर मोटी राशि प्रदान की जा सकती है।

आम आदमी का खुलासा ; अदानी के हाथों में खेलता है मोदी

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (एएपी) के राष्‍ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल मंगलवार को एक और खुलासा करने के दावे के साथ मीडिया से रूबरू हुए। इस बार अरविंद केजरीवाल ने गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने बनाते हुए कहा कि निजी कंपनियों के हाथों में खेल रहे हैं। इससे पूर्व अरविंद केजरीवाल भाजपा अध्‍यक्ष नितिन गड़करी को निशाना बना चुके हैं, जिसको लेकर भाजपा अभी तक दुविधा में है।

गुजरात चुनावों की तरफ ध्‍यान दिलाते हुए केजरीवाल ने कहा कि चुनावों में एक तरफ मोदी हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस। हमारे पास कागजात हैं जो ये साबित करते हैं कि दोनों मिलकर निजी कंपनियों का फायदा करवाते हैं। हमारे कागजात के मुताबिक अगर कांग्रेस मुकेश अंबानी की दुकान है तो क्या मोदी सरकार अदानी की दुकान है।

उन्‍होंने नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार आरोप लगाते हुए कहा कि 14306 एकड़ जमीन मात्र 1 रुपये से 32 रुपये प्रति यूनिट के भाव से क्यों दे दी जबकि एयरफोर्स को 8800 रुपये प्रति यूनिट के भाव से। ये सरकार देश के लिए काम कर रही है या प्राइवेट कंपनियों के लिए।

उन्‍होंने कहा कि भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी खुद को दूध का धूला हुआ के तौर पर पेश कर रहे हैं, जबकि वो पूरी तरह भ्रष्‍ट नेता हैं।

युवारॉक्‍स व्‍यू

आम आदमी को इस तरह के बयानों से बचना होगा। वरना यह आम आदमी के लिए घातक हो सकते हैं, ऐसे आम आदमी अपनी विश्‍वनीयता खो देगा, क्‍यूंकि जितनी तेजी सकारात्‍मकता नहीं फैलती, उससे कई गुना रफतार से नकारात्‍मकता फैलती है, अगर एक बार नकारात्‍मकता फैल गई तो मिथुन चक्रवर्ती की तरह भले हर साल डेढ़ दर्जन फिल्‍में बाजार में उतारो, कोई देखने नहीं आएगा। मिथुन दा तो फिर उभर आए, अपनी उपस्‍थिति दर्ज करवाने में सफल हो गए, मगर अरविंद के लिए मुश्किल हो जाएगा, अन्‍ना तो उभर आएंगे। मीडिया का चस्‍का बुरा है। मीडिया से दूरी बनाएं, सही दिशा की ओर कदम बढ़ाएं।
                                                                               आम आदमी  से मतलब अरविंद केजरीवाल न्‍यू पार्टी

'आम आदमी' की दस्‍तक, मीडिया को दस्‍त

अन्‍ना हजारे के साथ लोकपाल बिल पारित करवाने के लिए संघर्षरत रहे अरविंद केजरीवाल ने जैसे 'आम आदमी' से राजनीति में दस्‍तक दी, तो मीडिया को दस्‍त लग गए। कल तक अरविंद केजरीवाल को जननेता बताने वाला मीडिया नकारात्‍मक उल्‍टियां करने लगा। उसको अरविंद केजरीवाल से दुर्गंध आने लगी। अब उसके लिए अरविंद केजरीवाल नकारात्‍मक ख़बर बन चुका है।

कल जब अरविंद केजरीवाल ने औपचारिक रूप में आम आदमी को जनता में उतारा तो, मीडिया का रवैया, अरविंद केजरीवाल के प्रति पहले सा न था, जो आज से साल पूर्व था। राजनीति में आने की घोषणा करने के बाद अरविंद ने कांग्रेस एवं भाजपा पर खुलकर हमला बोला। मीडिया ने उनके खुलासों को एटम बम्‍ब की तरह फोड़ा। मगर बाद में अटम बम्‍बों का असर उतना नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था, और अरविंद केजरीवाल को मीडिया ने हिट एंड रन जैसी नीति के जन्मदाता बना दिया, जो धमाके करने के बाद भाग जाता है।

मुझे पिछले दिनों रिलीज हुई ओह माय गॉड तो शायद मीडिया के ज्‍यादातर लोगों ने देखी होगी, जिन्‍होंने नहीं देखी, वो फिर कभी जरूर देखें, उस में एक संवाद है, जो अक्षय कुमार बोलते हैं, जो इस फिल्‍म में भगवान कृष्‍ण का किरदार निभा रहे हैं, कि मैं तो केवल मार्ग दिखा सकता हूं, जाना तो तुम्‍हें खुद ही पड़ेगा। अरविंद केजरीवाल ने तो मीडिया के सामने साबूत रख दिए, अब वो साबूत कितने सच्‍चे हैं या झूठे हैं इसकी पैरवी तो मीडिया को करनी चाहिए।

अगर यह काम भी केजरीवाल को करना है तो उनको खुद का मीडिया हाऊस खोल लेना चाहिए, और हर ख़बर को खुद ढूंढ़े एवं प्रकाशित करें। उसके बाद उनका संपादकीय उठाकर मीडिया वाले ख़बर बना लेंगे, जैसे बाला साहेब के संपादकीय के साथ होता था या अमिताभ बच्‍चन के िट्वटर स्‍टेट्स के साथ होता है।

एक अख़बार नया इंडिया ने अपने संपादकीय में अरविंद केजरीवाल के पार्टी उतारने के घटनाक्रम को आम आदमी का पाखंड टाइटल देकर प्रकाशित किया है, वहीं दूसरी तरफ नवभारत टाइम्‍स ने 'आप' भी दूसरी राजनीतिक पार्टियों से अलग नहीं? के टाइटल से आप एवं अन्‍य पार्टियों में सामानता ढूंढ़ने की कोशिश की।

एक व्‍यक्‍ति ने तो केजरीवाल पार्टी को खुजलीवाल पार्टी की संज्ञा दी है। सोचने वाली बात है कि संजय दत्त राजनीति में उतरते हैं, बराक ओबामा राजनीति में उतरते हैं या इमरान ख़ान तो हम उनको 24 घंटे कवरेज देते हैं, उनकी छोटी छोटी बातों को बड़ा बड़ा कर लिखते हैं, उनके प्रति लिखते हुए हम आशावाद में पूरी तरह लिपटे हुए होते हैं, जब अरविंद केजरीवाल के रूप में कोई आम आदमी राजनीति में दस्‍तक देता है तो हम को दस्‍त क्‍यूं लगने लगते हैं, या कहें कुत्ते का कुत्ता वैरी, मतलब आम आदमी का आदमी दुश्‍मन।

कहीं मीडिया को इस बात का मलाल तो नहीं कि उनका स्‍टार बनाया हुआ अरविंद केजरीवाल उनसे पहले संसद तक न पहुंच जाए। मेरे हिसाब से सकारात्‍मक रवैया अपनाते हुए मीडिया को कदम दर कदम चलना चाहिए, अगर वो अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी को लेकर सकारात्‍मक सोच नहीं रख सकते तो नकारात्‍मकता का जनमत भी तैयार करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।

अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी ने एक साहस किया, उसका नतीजे भले ही कैसा क्‍यूं न हो। जनता पार्टी अकेले स्‍वामी डटे हुए हैं, यह वो पार्टी है, जिसने 1977 में कांग्रेस का भ्रम तोड़ा था, भले ही यह पार्टी लम्‍बा समय न टिकी, और दो ढांचों में ढल गई एक जनता पार्टी और दूसरी भारतीय जनता पार्टी। जनता पार्टी से मोहभंग होने के बाद देवानंद साहेब ने नेशनल पार्टी के गठन के लिए बहुत सी कोशिशें की, जो फिल्‍म सितारों को राजनीतिक मंच तक लाने का प्रयास था, मगर देवानंद के हाथ असफलता लगी। आज बॉलीवुड के सितारें राजनीति में हैं, लेकिन उस तरह से नहीं, जिस तरह से देव साहेब उनको लाना चाहते थे, आज ज्‍यादातर सितारे कांग्रेस या भाजपा के सहारे हैं, लेकिन देवानंद उनको उनकी पार्टी देना चाहते थे, उस समय देवानंद के पास करण जौहर के पिता जैसा धमाकेदार प्रवक्‍ता था।

हो सकता है कि जो काम देवानंद करना चाहते थे, वो अब अरविंद केजरीवाल की टीम करे। अरविंद केजरीवाल को अपना गढ़ मजबूत करते हुए कुछ क्षेत्रियों संगठनों से हाथ मिलाना चाहिए, जो जनहित के लिए बड़ी पार्टियों को छोड़कर अपनी पार्टियों को अस्‍तित्‍व में लाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

अगर बराक ओबामा को अमेरिका की जनता दूसरा मौका दे सकती है तो अरविंद केजरीवाल को भी एक मौका देना बनता है। बाकी आपकी मर्जी।

आम आदमी का तोड़

यह तो बहुत ही न इंसाफी है। ब्रांड हम ने बनाया, और कब्‍जा केजरीवाल एंड पार्टी करके बैठ गई। आम आदमी की बात कर रहा हूं, जिस पर केजरीवाल एंड पार्टी अपना कब्‍जा करने जा रहे हैं। गुजरात में चुनाव सिर पर हैं, कांग्रेस अपने चुनाव प्रचार में चीख चीख कर कह रही थी, कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ।

मगर आम आदमी तो केजरीवाल एंड पार्टी निकली, जिसकी कांग्रेस के साथ कहां बनती है, सार्वजनिक रूप में, अंदर की बात नहीं कह रहा। अटकलें हैं कि कांग्रेस बहुत शीघ्र अपने प्रचार स्‍लोगन को बदलेगी। मगर आम आदमी का तोड़ क्‍या है?

वैसे क्रिएटिव लोगों के पास दिमाग बहुत होता है, और नेताओं के पास पैसा। यह दोनों मिलकर कोई तोड़ निकालेंगे, कि आखिर आम आदमी को दूसरे किस नाम से पुकार जाए। वैसे आज से कुछ साल पूर्व रिलीज हुई लव आजकल में एक नाम सुनने को मिला था, मैंगो पीप्‍पल।

अगर आम आदमी मैंगो पीप्‍पल बन भी जाता है तो क्‍या फर्क पड़ता है। पिछले दिनों एक टीवी चैनल का नाम बदल गया था। हुआ क्‍या, हर जगह एक ही बात लिखी मिली, सिर्फ नाम बदला है। वैसा ही सरकार का रवैया रहने वाला है आम आदमी के प्रति।
आम आदमी की बात सब करते हैं, लेकिन उसके लिए काम कोई नहीं करता। स्‍वयं आम आदमी ही नहीं करता। सरकारी दफ्तरों में बैठा कर्मचारी या अधिकारी आम आदमी नहीं, लेकिन फिर भी वो आम आदमी के काम नहीं आता, जब तक आम आदमी, आम फीस से ज्‍यादा नहीं देता। आम आदमी को कुर्सी पर बैठा आम आदमी इस तरह ऊपर से नीचे घूर के देखता है, जैसे काम के लिए आया व्‍यक्‍ित किसी बाहर दुनिया से आया हो।

एक आम आदमी को दूसरा आम आदमी लूट रहा है, चाहे वो आम वाला हो या सेब वाला क्‍या फर्क पड़ता है। अमीरों के हाथ में एप्‍पल "मोबाइल" है तो गरीब रेहड़ी वाले से जाकर मैंगो का भाव भी नहीं पूछता, कहीं वो गले ही न पड़ जाए।

सड़क पर खड़ा ट्रैफिक कर्मचारी किसी वीआईपी इलाके से नहीं आता, लेकिन वो भी शाम तक जेब भरने के तरीके ढूंढता है। उसकी नजर के सामने से सैंकड़ों व्‍हीकल गुजरते हैं, एक ही नियम तोड़ते हुए, लेकिन वो कुछेक को रोकता है। कुछ आम आदमी मोबाइल पर वीआईपी से बात करवाकर निकल जाते हैं तो कुछ गांधी छाप देकर।

आम आदमी सब्‍जी लेने निकलता है, वो सब्‍जी वाले आम आदमी से जिरहा करता है, लेकिन सरकार के खिलाफ झंडा उठाने के लिए समय नहीं। देश की जनसंख्‍या किसी ने बढ़ाई वीआईपी लोगों ने या आम आदमी ने। जॉब्‍स के लिए पैसे की सिफारिश कौन करता है वीआईपी या आम आदमी। गांधीछाप देकर जॉब्‍स पर लगा आम आदमी, आम आदमी से गांधीछाप की उम्‍मीद करता है।

आम आदमी का तोड़ आम आदमी के पास है, और किसी के पास नहीं।

जी हां, सठिया गए केजरीवाल

@अरविंद केजरीवाल ने संसद को लिखे जवाबी पत्र में कहा, मैं संसद की इज्‍जत करता हूं, लेकिन दागी सांसदों की नहीं, उनका यह जवाब सुनने के बाद बिहार को कई साल पिछले धकेल देने वाले लालू प्रसाद यादव कहते हैं, केजरीवाल सठिया गए हैं। मुझे नहीं लगता कि लालू मियां कुछ गलत कह रहे हैं, क्‍योंकि जब तक कोई हिन्‍दुस्‍तानी सठिएगा नहीं तो परिवर्तन आएगा नहीं, जब सिंहम में बाजीरॉव सिंहम सठियाता है तो जयकंद शिकरे के पसीने छूटते हैं। वहीं फिल्‍म ए वेडनेसडे में जब आदमी की सटकती है तो पुलिस कमिश्‍नर से लेकर पुलिस मंत्रालय तक पसीने से तर ब तर होता है। पता नहीं, पिछले दिनों किसकी सटकी कि पूरे देश के मंत्रियों को बौखलाहट के दौरे पड़ने शुरू हो गए, अभी तक पसीने छूट रहे हैं, अंदर खाते एक दूसरे को बचाने के लिए सुरक्षा कवच तैयार किए जा रहे हैं। कितनी हैरानी की बात है कि उंगली सरकार पर उठी, लेकिन सेनाध्‍यक्ष के खिलाफ आवाजें बाहर से बुलंद हुई, क्‍यों कि नेताओं को पता है कि अगर आग पड़ोस में लगती है तो आंच उनके घर तक भी आएगी।

@लालू प्रसाद यादव, अभी तक तो कुठ पढ़े लिखे व्‍यक्‍ितयों की सटकी है, और नेताओं के पसीने छूटने शुरू हो गए, लेकिन जब हर हिन्‍दुस्‍तानी की सटकेगी तो नेताओं का हश्र क्‍या होगा अंदाजा लगाना जरा मुश्‍किल सा लग रहा है। वो दूर नहीं, जब हर हिन्‍दुस्‍तानी की सटकेगी, क्‍योंकि घरों में बैठकर टीवी देखने वाले दिल से निकली आवाजों को सुनते हैं, जुबां से नहीं, क्‍योंकि जुबां को पलटते हुए देर नहीं लगती। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं, मिस्र की क्रांति की, जो गत साल वहां घटित हुई। वहां पर भी 26 वर्षीय 'आसमा महफूज़' की सटकी थी, और उसने फेसबुक पर आकर इतना कहा था, मेरा मरना तय है, तो क्‍यूं न अपने देश के लिए मर जाउं, उसके बाद जो मिस्र के लोगों की सटकी, उसका पता तो पूरे विश्‍व को है, यहां तो अन्‍ना हजारे से लेकर केजरीवाल तक कई सिरफिरे घूम रहे हैं, सच कहूं तो इस गुलशन में फूल कम कांटें ज्‍यादा हैं, लालू प्रसाद यादव जी थोड़ा पल्‍लू संभालकर चलें।

चलते चलते एक और बात कहना चाहता हूं, जैसे कि आपने सेनाध्‍यक्ष वीके सिंह के बारे में आपने कहा था कि वह फर्स्‍टेड है, और उसके बाद प्राइम टाइम एडटीवी इंडिया में पहुंचे एक व्‍यक्‍ित ने कहा था कि वीके सिंह, चटटान पर तब तक सिर पटकेंगे, जब तलक वह चकना चूर न हो जाए, इस बात पर गौर फरमाने लायक है। जिसने यह शब्‍द कहें, वह वीके सिंह नहीं था, लेकिन उसके शब्‍द बताते थे कि वह वीके सिंह से बेहद प्रभावित है, तो हो सकता है कि कल को आपको हर चौराहे पर केजरीवाल, वीके सिंह या उनके हमशकल मिले, जरा बचकर मोड़ से।