Showing posts with label अमिताभ बच्चन. Show all posts
Showing posts with label अमिताभ बच्चन. Show all posts

बाजारवाद में ढलता सदी का महानायक

इसमें कोई शक नहीं कि रुपहले पर्दे पर अपने रौबदार एवं दमदार किरदारों के लिए हमेशा ही वाहवाही बटोरने वाला सदी का महानायक अमिताभ बच्चन अब बाजारवाद में ढलता जा रहा है, या कहूं वो पूरी तरह इसमें रमा चुका है। ऐसा लगता है कि या तो बाजार को अमिताभ की लत लग गई या फिर अमिताभ को बाजार की।

एक समय था जब अमिताभ की जुबां से निकले हुए शब्द लोगों के दिल-ओ-दिमाग में सीधे उतर जाते थे, उस वक्त के उतरे हुए शब्द आज भी उनकी जुबां पर बिल्कुल पहले की तरह तारोताजा हैं। उस समय कि दी यंग एंग्री मैन की छवि को आज का बिग बी टक्कर नहीं दे सकता। सत्य तो ये है कि आज का बिग बी तो उसके सामने बिल्कुल बौना नजर आता है।

सदी के इस महानायक का हाल एक शराबी जैसा हो गया है, जिसको देखकर कभी समझ नहीं आती कि शराब को वो पी रहा है या फिर शराब उसको पी रही है। आज बाजार अमिताभ को खा रहा है या अमिताभ बाजार को समझ नहीं आ रहा है, बस सिलसिला दिन प्रति दिन चल रहा है। असल बात तो यह है कि बीस तीस साल पुराना लम्बू और आज के बिग बी या अमिताभ बच्चन में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है।

जहां बीस तीस साल पहले लम्बू बड़े पर्दे पर गरीबों दबे कुचले लोगों की आवाज बनता या उनका प्रतिनिधित्व करता हुआ एक दी यंग एंग्री मैन बन गया था, वहीं आज का अमिताभ बच्चन एक पूंजीवादी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए बाजार के लिए वस्तु बनकर रह गया या फिर टैग बनकर रह गया।

आज का बिग बी किसी को याद नहीं, अगर याद है तो सब को बीस तीस साल पुराना वो ऊर्जावान और शक्तिशाली अमिताभ बच्चन या फिर विजय दीना नाथ चौहान। जिसकी आवाज लोगों के कानों में आज भी गूंजती है, जिसके होने का आज भी अहसास होता है। वो कई साल पुराना हो चुका है, लेकिन आज भी तारोताजा है खेतों में लगी हुई सब्जियों की भांति। इस बात की पुष्टि तो पिछ्ले दिनों बिग बॉस के पहले दिन ही हो गई थी, जब बिग बी के सामने आने वाले बिग बॉस के मेहमान कल वाले अमित जी को याद कर रहे थे, जब अमिताभ उनकी उम्र का हुआ करता था। इन प्रतियोगियों को आज का अमित तो दिखाई ही नहीं देता। आज का बिग बी तो दी यंग एग्री मैन के कारण दौड़ रहा है।

अमिताभ बच्चन के 'दी यंग एंग्री मैन' से 'बिग बी' बनने के पीछे शायद '90 के दशक दौरान हुआ घाटा ही है, इसके बाद जब अमिताभ फिर से उदय हुआ तो उसका नया रूप था बिग बी। उसने विजय दीना नाथ चौहान का पल्लू छोड़ दिया, और खुद को बिग बी में ढाल लिया। जो अब पैसे की कीमत को समझने लगा था, उसको समझ आ गया था कि अब उसको बाजारवाद में ढलना होगा, नहीं तो वो खत्म हो जाएगा। किसी ने सत्य ही कहा है कि पैसा कुछ नहीं, अगर समझो तो खुदा से कम नहीं।

बीपीएल के विज्ञापन से विज्ञापन जगत में कदम रखने के बाद अमिताभ ने कई उत्पादों की बिक्री को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया, जिसके साथ अमिताभ का नाम जुड़ गया, उसका नसीबा खुल गया। इस दौर में अमिताभ पैसा खींच रहा है खुद के लिए और कुछ कारोबारी कंपनियों के लिए। शायद इस लिए लोगों के जेहन में दी यंग एंग्री मैन का नया रूप नहीं उतर रहा, बिग बी भा रहा है तो उसके पिछले युग के कारण, वैसे भी भारत में एक धारणा तो है कि आदमी अपने पिछले जन्मों का किया हुआ इस जन्म में खाता है, वैसे भी अमिताभ बच्चन का बिग बी दूसरा जन्म ही है। एक सवाल छोड़कर जा रहा हूं आपके सामने कि बाजारवाद में ढलना अमिताभ की मजबूरी है या समय की जरूरत?