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कहो..... भीड़ नहीं हम.....

आस पास के लोगों से..... सतर्क हो जाइए..... क्‍योंकि पता नहीं कौन सा नकाबपोश..... काले धन का मालिक हो..... मखौटों के इस दौर में सब फर्जी हैं..... हां..... मैं..... आप..... हम सब फर्जी हैं।

चौंकिए मत..... सच है.....। कबूतर की तरह आंखें भींचने से क्‍या होगा?.....। याद कीजिए..... 35 लाख का घर..... और 22 लाख के दस्‍तावेज..... आखिर किसने बनवाये। बेरोजगार बेटे बेटी को 3 से 5 लाख रिश्‍वत देकर..... सरकारी नौकरी किसी ने दिलवाई.....। आखिर कौन पूछता है..... दामाद ऊपर से कितना कमा लेता है.....।

ऐसे ही तो..... जमा होता है काला धन..... काले धन वाले भी..... तो शामिल हैं ईमानदारों में..... और नोटबंदी का करते हैं जमकर समर्थन..... कहते हैं..... मिट जाएगा काला धन..... और खत्‍म होगी रिश्‍वतखोरी..... हां..... स्‍लीपर सैल की तरह..... हम में भी..... कहीं न कहीं..... छुपे बैठे हैं चोर.....

दम है तो पकड़िये..... रिश्‍वत लेते..... जो पकड़ा गया..... रिश्‍वत देकर छूट जाएगा..... सड़क पर ट्रैफिक वाला रसीद काटता है..... तो आप बड़े आदमी को फोन लगा लेते हैं..... ईमानदार कर्मचारी की बैंड खूब बजती है..... और तमाश देखते हैं हम सब.....

ट्रैफिक सिग्‍नल पर खड़ा शहरी 60 सैकेंड इंतजार नहीं कर सकता..... लेकिन..... गरीबों को लाइन में लगने पर खूब ज्ञान उड़ेल रहा है.....

युवान बेटा पिता के कहने पर बिजली का बिल भरने नहीं जाता..... कहीं..... लाइन बड़ी हुई तो डार्लिंग बुरा मान जाएगी..... फेसबुक पर उस गरीब को ज्ञान बांटता है..... जो 14 घंटे मजदूरी करता है..... और मिलता है बाबा जी ठुल्‍लू.....

बुरा तो लगता है..... कड़वी बात का..... जो कल तक..... मोदी की नोटबंदी का..... सबसे बड़ा समर्थक था..... पकड़ा गया बड़े नोटों के साथ.....

सब चुप रहेंगे..... कोई नहीं बोलेगा..... क्‍योंकि..... सच बोलने के लिए..... नकाब हटाने होंगें..... अपने स्‍वार्थों की बलि..... देनी होगी.....। इसलिए..... जो चल रहा..... चलने दें..... तमाशा देखें..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम.....

125 करोड़ जनता..... 11 क्रिकेटर..... जमकर देखते हैं..... गाली निकालते हैं..... जीते तो जश्‍न मनाते हैं..... पर्दे पर अजय मेहरा देखकर..... खून खौलने लगता है..... घर आते आते..... थका हरा घसीट पीटा आम आदमी..... भीतर से निकलता है..... जैसे अदालीन के चिराग से जिन्‍न.....

हम को अचानक..... बोलने वाला प्रधानमंत्री मिलता है..... हम खुशी के मारे झूम उठते हैं..... क्‍योंकि..... हम बोल नहीं सकते..... कोई तो आया बोलने वाला.....

फिर अचानक..... बोलना भी..... सिरदर्द करने लगता है.....

फिर..... आशावाद..... फिर..... चलो देखते हैं..... और फिर..... मैं..... आप..... सब..... तमाशबीन हो जाते हैं.....

तमाशबीन होने का भी..... अपना ही एक मजा है.....

टीवी के सामने बैठकर..... सचिन को शॉट मारना सिखाते हैं..... फिल्‍म निर्देशक को..... निर्देशन के गुर..... किसी लड़ने वाले को..... नायक से खलनायक..... खलनायक से नायक बनाते हैं.....

कोई चौपालों में..... कोई ड्राइंग रूम में..... कोई चाय के गल्‍ले पर बैठकर..... देश बदल रहा है..... पान मसाले का पीक..... मुंह से थू थू हुए..... स्‍वच्‍छता का ज्ञान झाड़ा जा रहा है..... सुन रहे हैं हम..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम

असल जीवन में..... काले को सफेद करने की दौड़..... सोशल मीडिया पर..... ज्ञान खूब बघारा जा रहा है..... किसका दामन..... कितना मैला..... हर कोई..... लिए प्रमाण पत्र..... घूम रहा है.....

कांग्रेस के दौर में..... शहीद हुए तो एक के बदले दस..... भाजपा के दौर में शहीद हुए..... तो सवाल मत पूछिए..... रैलियों में सुर ऊंचा है..... संसद में सिर नीचा है.....

क्‍यों नहीं..... हम नेता चुनते..... क्‍यों..... हर बार हम..... कांग्रेस..... बीजेपी..... चुनें..... क्‍यों नहीं..... हम सरकार से..... तीखे सवाल करते..... चाहे कांग्रेस की हो..... चाहे बीजेपी की हो.....

क्‍यों नहीं..... हर सवाल हमारा मौलिक होता..... क्‍यों..... हम पढ़े लिखे होने के बाद भी..... कॉपी पेस्‍ट..... नकल करते हैं..... सभ्‍य समाज हैं..... फिर भी..... चर्चा नहीं..... बहस करते हैं..... तर्क नहीं दे पाते..... तो गाली गालौच करते हैं.....

भीड़ नहीं तो..... क्‍या हैं हम..... एक ने लिखा..... चोर..... तो हम भी..... लिखते हैं..... चोर..... इंटरनेट है..... पर तथ्‍य..... क्‍यों नहीं खोजते हम..... पढ़े लिखे हैं हम..... यह क्‍यों नहीं सोचते..... एक ही वीडियो..... कभी कांग्रेस का हो जाता है..... कभी भाजपा का..... और अंधे हम..... करते हैं..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड.....

कहो..... भीड़ नहीं हैं हम..... बताओ..... भेड़ नहीं हम..... युवा हैं हम..... किसी के गुलाम नहीं हम..... बीरबलता नहीं..... नचिकेतता चाहिये हमें..... बुरे हैं तो बुरा कहो..... सच्‍चे हैं तो सच्‍चे कहो..... झूठ के लिबास में..... तारीफ नहीं चाहिये.....

कहो..... भीड़ नहीं हम.....

हे प्रभु! मेरी क्षमा याचना तो लेते जाएं।

हे प्रभु! मैं बहुत परेशान हूं। मुझे समझ नहीं आता कि मैं क्या करूं ? दिशा से उम्मीद लगाउं बदलाव की ? रोज सोचता हूं कि मेरी समस्याएं भी चर्चा का विषय बनेंगी। इस उम्मीद को दिल में लिए रोज सुबह शाम समाचार की दुनिया में नजर दौड़ाता रहता हूं। सोचता हूं कि शायद अख़बारनवीस मेरी समस्या का समाधान लाएं। कोर्इ ख़बर, खुशख़बर पाती जैसी बनकर सामने आए। जिसको पढ़कर मैं झूम उठूं। जैसे सावन में कोर्इ मोर। मगर, अब तक एेसा हुआ नहीं। रोज घिसीपिटी ख़बरों के साथ कुछ मसालेदार रोचक समाचार आते हैं। हे प्रभु! आज कल तो बाॅलीवुड गाॅशिप से ज्यादा राजनीतिक गाॅशिप को जगह दी जाती है।

पहले मन खुश तो हो जाता था। जब समाचारों में आता था कि विश्व सुंदरी ने अपने पुराने प्रेमी मित्र को छोड़कर नामी गरामी अभिनेता के पुत्र से विवाह रचा लिया। रैंप पर चलते हुए एक माॅडल टाॅप लैस हो गर्इ। आज बाॅलीवुड की बिंदास माॅडल ने भारत की जीत पर न्यूड होने की घोषणा की।

मगर, आज कल तो अजीबोगरीब समाचार आते हैं। लोक सभा में पूछा जाता है कि सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान यात्रा पर हरी साड़ी क्यों पहननी। तो सुषमा स्वराज उसके पीछे का महत्व बताती है कि बुधवार को वे ग्रीन साड़ी ही पहनती है। अच्छा होता प्रभु साथ में बता देती कि बुधवार को हरी साड़ी पहनने से क्या लाभ होता है। मेरे जैसे गरीब के भाग्य खुल जाते, क्योंकि प्रभु आप ने बुधवार का दिन तो सबके लिए बनाया है ना।

हे प्रभु! अगली ख़बर यादव सरनेम से जुड़ी है। आपको जानकार हैरानी होगी, वैसे आप तो जानीजान हैं। फिर भी बता देता हूं, मेरे मन की भड़ास निकल जाएगी। बाबूराम गौर ने यादव समाज में खुलासा किया कि बीजेपी ने उनको यादव सरनेम का इस्तेमाल नहीं करने दिया। यदि करते तो वे मुख्यमंत्री नहीं बनते, यहां तक के उनको टिकट भी नहीं मिलता। सबसे दिलचस्प बात तो यह थी कि उसी सरनेम का इस्तेमाल करने भर मध्य प्रदेश को नर्इ रेलगाड़ियां मिल सकती थी।

हे प्रभु! यदि आपकी भी कोर्इ शर्त है तो बताएं, मैं सरनेम छोड़ो। नेम बदलने को तैयार हूं। अब आप भी राजनेताआें की तरह मुंह नहीं फेरो प्रभु। मेरी अगली बात तो आप से ही जुड़ी हुर्इ है। आप सुना होगा कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं आैर आज एक मंदिर में भगवान का प्रवेश वर्जित कर दिया।

आप चकित नहीं हों, प्रभु! यह बात राहुल गांधी की है। मैं भी मानता हूं, वे युवा है। मगर, दिल्ली के मुख्यमंत्री को अड़चन है। उनको ही नहीं, अन्य राजनेताआें को भी अड़चन है। इस बात को स्वीकार करने में कि राहुल गांधी युवा हैं। मगर, यह अड़चन दुविधा बन सकती है। यदि इस बात को गंभीरता से देश की अदालत ले ले। आपको तो पता ही होगा कि नेशनल हेराल्ड केस चल रहा है। जो कभी ख़बर देने के लिए शुरू किया गया था, आज ख़बरों में है। हालांकि, उनकी कोर्इ ख़बर नहीं लेता, जिनके लिए उसको शुरू किया गया था। चकित करने वाली बात तो यह है, प्रभु। यदि राहुल गांधी को दोषी पा गया, तो उनको जज बाल सुधार गृह भेजेंगे या बड़ी जेल।

हे प्रभु! मुझे क्षमा करना। यदि आपको मैंने बेफिजूल की ख़बरों से प्रताड़ित किया हो। मगर, आपको पता है कि भारत की सवा सौ करोड़ आबादी का एक बड़ा हिस्सा, इस तरह की ख़बरों से रोज परेशान होता है। मगर, परेशान करने वालों को आप भी दंड़ित नहीं करते। थोड़ा सा बुरा लगता है। हे प्रभु! कहां भाग लिए। मेरी क्षमा याचना तो लेते जाएं।

रॉबर्ट वाड्रा के लिए कांग्रेस मीडिया को नसीहत क्यों देती है ?



रॉबर्ट वाड्रा न कांग्रेसी है और न मनमोहन सरकार के दौरान किसी मंत्री पद पर रहा। हां, रॉबर्ट वाड्रा सोनिया गांधी का दामाद है, जो अब पूरा विश्व जानने लगा है, लेकिन जब भी रॉबर्ट वाड्रा पर उंगली उठती है तो कांग्रेसी क्यों सफाई देने लगते हैं। उसको इस तरह बचाने लगते हैं, जैसे रॉबर्ट वाड्रा सोनिया गांधी का नहीं, बल्कि कांग्रेस का दामाद है।

जब मीडिया ने रॉबर्ट वाड्रा को घेरा तो रविवार को कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला और दिग्विजय सिंह ने वाड्रा का बचाव करते नजर आए। सुरजेवाला ने कहा कि रॉबर्ट वाड्रा न तो किसी सार्वजनिक पद पर हैं, न किसी राजनीतिक दल के पदाधिकारी हैं। ऐसे में उनकी निजता का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को निजी समारोहों में अप्रिय सवालों को बार-बार पूछने से बचना चाहिए।

कितनी अजीब बात है कि मीडिया को नसीहत देते हुए रणदीप सुरजेवाला स्वयं भूल गए कि रॉबर्ट वाड्रा सोनिया गांधी के दामाद है, न कि कांग्रेस के, यदि याद है तो ऐसा बयान देना बिल्कुल उचित नहीं है। मीडिया को नसीहत उस समय देनी चाहिए, जब आप स्वयं नियम का पालन करते हों।

एक अन्य बात मीडिया को एक बात समझनी चाहिए कि पत्रकारिता की गरिमा बनाए रखने के लिए संयम, समझ एवं अच्छी सोच का होना जरूरी है। वाड्रा पर आरोप हैं, जो अभी सिद्घ नहीं हुए, इस माहौल में आप हर जगह एक सवाल पर स्पष्टीकरण लेते अच्छे नहीं लगते हैं।

Inspiring Story— मछुआरा और बिजनैसमैन

एक बार एक मछुआरा समुद्र किनारे आराम से छांवमें बैठकर शांति से बैठा था । अचानक एक बिजनैसमैन ( कंप्यूटर/ आईटी फील्ड वाला ) वहाँ से गुजरा और उसने मछुआरे से पूछा "तुम काम करने के बजाय आराम क्यों फरमा रहे हो?"

इस पर गरीब मछुआरे ने कहा "मैने आज के लिये पर्याप्त मछलियाँ पकड चुका हूँ ।"

यह सुनकर बिज़नेसमैन गुस्से में आकर बोला" यहाँ बैठकर समय बर्बाद करने से बेहतर है कि तुम क्यों ना और मछलियाँ पकडो ।"

मछुआरे ने पूछा "और मछलियाँ पकडने से क्या होगा ?"

बिज़नेसमैन : उन्हे बेंचकर तुम और ज्यादा पैसे कमा सकते हो और एक बडी बोट भी ले सकते हो ।

मछुआरा :- उससे क्या होगा ?

बिज़नेसमैन :- उससे तुम समुद्र में और दूर तक जाकर और मछलियाँ पकड सकते हो और ज्यादा पैसे कमा सकते हो ।

मछुआरा :- "उससे क्या होगा ?"

बिज़नेसमैन : "तुम और अधिक बोट खरीद सकते हो और कर्मचारी रखकर और अधिक पैसे कमा सकते हो ।"

मछुआरा : "उससे क्या होगा ?"

बिज़नेसमैन : "उससे तुम मेरी तरह अमीर बिज़नेसमैन बन जाओगे ।"

मछुआरा :- "उससे क्या होगा ?"

बिज़नेसमैन : "अरे बेवकूफ उससे तू अपना जीवन शांति से व्यतीत कर सकेगा ।"

मछुआरा :- "तो आपको क्या लगता है, अभी मैं क्या कर रहा हूँ ?!!"

बिज़नेसमैन निरुत्तर हो गया ।

मोरल – "जीवन का आनंद लेने के लिये कल का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं । और ना ही सुख और शांति के लिये और अधिक धनवान बनने की आवश्यकता है । जो इस क्षण है, वही जीवन है।

दोस्तों दिल से जियो"

अब हिन्‍दुओं की भावनाएं आहत नहीं हुई


आजकल बाजार में एक नया नारा गूंज रहा है '' हर हर मोदी, घर घर मोदी'' अगर इस नारे को पहले कांग्रेस ने उठा लिया होता, और कहा होता कि ''हर हर गांधी, घर घर गांधी'', सच में हिन्‍दुयों की भावनाएं आहत हो जाती, लेकिन अब ऐसा नहीं, क्‍यूंकि हर हर महादेव की जगह मोदी को रखा है, और जिनकी भावनाएं आहत होती हैं, वो कथित हिन्‍दु इस नारे को बड़े शौक से लगा रहे हैं, शायद बोलने से झूठ सच हो जाए, लेकिन असंभव है।
अगर भाजपा के कुछ मोदीवादियों ने मोदी को महादेव की जगह फिट कर ही दिया है तो मुझे इससे एक अन्‍य बात भी याद आ रही है। शायद हर हिन्‍दु भाई को ज्ञात होगी कि हिन्‍दु धर्म में 'त्रिदेव' का सर्वाधिक महत्व है यानि ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश, दूसरे क्रम में कहूं तो निर्माता, पालक व विनाशक।

इस क्रम में अगर मोदी को महादेव कहा जाता है, तो बीजेपी के तीन शीर्ष नेता हुए, पहला अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्‍होंने बीजेपी को एक अलग पहचान दी, स्‍वयं लोगों के प्रधान मंत्री होकर विदा हुए, दूसरा जो बीजेपी को आगे लेकर चले, जिनको पालक कहा जा सकता है यानि एलके आडवाणी, अब बीजेपी का पूरा भार, तीसरे कंधे पर है, जिसको नरेंद्र मोदी के नाम से जाना जाता है, जिसको उनके दीवानों ने हर हर महादेव वाले जयघोष में फिट कर दिया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि दूसरे राजनीतिक दल अब मोदी को बीजेपी का विनाशक मान रहे हैं, एनडीए की बड़ी पार्टियां दूर हो चुकी हैं। अब देखना है कि मोदीवादियों के हर हर मोदी, घर घर मोदी, बीजेपी को किस डगर पर लेकर जा रहे हैं।

नोट :- यहां मैंने केवल अपने विचार रखें हैं, हो सकता है कि दूसरों से मेरे विचार मेल न खाएं, लेकिन आप अपने विचार रख सकते हैं, जिनका मैं पूरा सम्‍मान करूंगा।

Publicly Letter : गृहमंत्री ​सुशील कुमार शिंदे के नाम

नमस्कार, सुशील कुमार शिंदे। खुश होने की जरूरत नहीं। इसमें कोई भावना नहीं है, यह तो खाली संवाद शुरू करने का तरीका है, खासकर आप जैसे अनेतायों के लिए। नेता की परिभाषा भी आपको बतानी पड़ेगी, क्यूंकि जिसको सोशल एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया के शब्दिक ​अ​र्थ न पता हों, उसको अनेता शब्द भी समझ में आना थोड़ा सा क​ठिन लगता है। नेता का इंग्लिश अर्थ लीडर होता है, जो लीड करता है। हम उसको अगुआ भी कहते हैं, मतलब जो सबसे आगे हो, उसके पीछे पूरी भीड़ चलती है।
 
अब आप के बयान पर आते हैं, जिसमें आप ने कहा कुचल देंगे। इसके आगे सोशल मीडिया आए या इलेक्ट्रोनिक मीडिया। कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्यूंकि कुचल देंगे तानाशाही का प्रतीक है या किसी को डराने का। आपके समकालीन अनेता सलमान खुर्शीद ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नंपुसक कहा, क्यूंकि वो दंगों के दौरान शायद कथित तौर पर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाए, लेकिन जब मुम्बई पर हमला हुआ था, तब आपके कुचल देंगे वाले शब्द किस शब्दकोश में पड़े धूल चाट रहे थे, तब कहां थे सलमान खुर्शीद जो आज नरेंद्र मोदी को नपुंसक कह रहे हैं।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया को तो शायद आप पैसे खरीद लें, क्यूंकि उसको पूंजीपति चलाते हैं, जो विज्ञापन के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया को कुचलना आपके हाथ में नहीं, क्यूंकि इसको खरीदना आपके बस की बात नहीं। सोशल मीडिया का शब्दिक अर्थ भी समझा देता हूं, लोगों का मंच। जो लोग सरकार बनाने की हिम्मत रखते हैं, उनको कुचलना आपके लिए उतना ही मुश्किल है, जितना घोड़े का घास के साथ दोस्ताना बनाए रखना।

आपके बयान बदलने से एक बात तो पता चलती है कि आप थोथी धमकियां देते हैं। वरना, अपने बयान पर अटल रहते, और मीडिया को कुचल देते, आज तक आप गूगल व फेसबुक से जानकारियां हासिल नहीं कर पाए, कुचलने की बात करते हैं। क्या किसी की अ​भिव्यक्ति को दबाना असैवंधानिक नहीं ? आपको इलेक्ट्रोनिक मीडिया व सोशल मीडिया का अंतर पता नहीं, तो संवैधानिक व गैर संवैधानिक का अंत क्या खाक पता चलेगा।

आजकल मोदी जी ने खूब अपना पुराना धंधा पकड़ा हुआ है। अपने पुराने दिनों को याद कर रहे हैं, इससे शायद उनको चुनावी फायदा मिल जाए, लेकिन अगर आप ने गृहमंत्री होकर कांस्टेबल वाली हरकतें न छोड़ी तो कांग्रेस को भाजपा वाले कुचल देंगे। और सलमान खुर्शीद को अच्छे से उनके बयान का अर्थ भी समझा देंगे।

जय रामजी की। इसका अर्थ बात शुरू करना भी होता है और संवाद बंद करना भी। जहां लिखा है, वहां इसका अर्थ संवाद बंद करना है। फिर से जय रामजी की। 

एक वोटर के सवाल एक पीएम प्रत्याशी से

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश की सत्ता संभालने के लिए आतुर हैं, राजनेता हैं आतुर होना स्वभाविक है, जीवन में प्रगति किसे पसंद नहीं, खासकर तब जब बात देश के सर्वोच्च पदों में से किसी एक पर बैठने की। एक राजनेता के रूप में मेरी शुभइच्छाएं आपके साथ हैं, लेकिन अगर आप स्वयं को स्वच्छ घोषित करते हैं, देश को एक सूत्र में पिरोने की बात करते हैं, स्वयं को दूसरी राजनीतिक पार्टियों के नेतायों से अलग खड़ा करने की कोशिश करते हैं तो एक वोटर के रूप में आप से कुछ सवाल पूछ सकता हूं, सार्वजनिक इसलिए पूछ रहा हूं क्यूंकि वोटर सार्वजनिक है, हालांकि वो वोट आज भी गुप्त रूप में करता है।

पहली बात, आप अपना पूरा दांव युवा पीढ़ी पर खेल रहे हैं। जिनको अभी अभी वोट करने का अधिकार मिला है, या कुछेक को कुछ साल पहले। जहां तक मुझे याद है यह अधिकार दिलाने में कांग्रेस के युवा व स्वर्गीय प्रधान मंत्री राजीव गांधी का बड़ा रोल रहा है, युवा इसलिए, उनकी सोच एक युवा की थी, जो कुछ करना चाहता था, देश के युवायों के लिए। दूसरी बात, मैं जो सवाल आप से सार्वजनिक रूप में पूछने जा रहा हूं, यह भी उस महान व्यक्तित्व की सोच से मुहैया हुए यंत्रों के कारण।

पहला सवाल। मैं आपको वोट किस लिए करूं। व्यक्तिगत ईमानदार होने के चलते तो वो मौजूदा प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह भी हैं। लेकिन आपके निशाने पर निरंतर मनमोहन सिंह रहें हैं, यकीनन मैं आपको व्यक्तिगत ईमानदार होने के लिए तो वोट नहीं कर सकता है, क्यूंकि आपके समूह में भी येदिरप्पा जैसे महान लोग हैं, जो कभी पार्टी से बाहर होते हैं तो कभी पार्टी के अंदर। क्या आप व्यक्तिगत रूप में जिम्मेदारियों का निर्बाह करेंगे, अगर आपकी पार्टी का कोई भी नेता भ्रष्टाचार में सम्मिलित हुआ तो आप अपने पद से उसी वक्त त्याग पत्र देंगे?

दूसरा सवाल, आपके चेहरे का नकाब ओढ़कर भाजपा जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। हर कोई चढ़ते सूर्य को सलाम करता है, इसमें बुरी बात नहीं, लेकिन भाजपा जब कहती है कि गुजरात में गोधरा दंगों के बाद पिछले एक दशक में कोई दंगा नहीं हुआ, यह नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धि है, लेकिन पिछले तीस सालों में देश के अंदर सिख दंगे भी नहीं हुए, जिसमें कांग्रेस की भागीदारी रही हो। मेरा सवाल तो यह है कि क्या आप सत्ता में आने के बाद दंगा पीड़ितों के साथ न्याय कर पाएंगे चाहे वो गोधरा के हों या चाहे दिल्ली के?

तीसरा साल। कांग्रेस आरटीआई, आरटीई, खाद्य सुरक्षा, या यूनिक कार्ड जैसी कुछ पारदर्शिता लाने वाली भी लेकर लाई, चलो आपके कहने अनुसार कांग्रेस ने यह कदम उठाकर भी कुछ अच्छा नहीं किया होगा, लेकिन अब सवाल आपके दस सालों का है, मैं इसलिए तो आपको मुबारकबाद दूंगा कि गुजरात में आपके आने के बाद कभी राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हुआ, लेकिन क्या आप चुनावों के दौरान कांग्रेस की कमियां गिनाने की बात छोड़कर अपने दस सालों का तैयार विकास मॉडल पेश करेंगे, अपने मंच से? आपके आंकड़े तो पता नहीं कौन प्रदान करता है, लेकिन मैंने कुछ आंकड़े जुटाएं हैं, जिनको आप चुनौती दे सकते हैं, जब आपकी सरकार 2002 में आई तो आपके पास 127 सीटें थी, लेकिन 2007 में आपके पास 117 सीटें रहीं, अबकी बार आपके पास 116 सीटें। अगर विकास का ग्राफ बढ़ा है, तो सीटों में गिरावट क्यूं ?

चौथा सवाल। मैंने आपकी रैलियों को निरंतर सुना। सुनना भी चाहिए था, आ​ख़िर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार जो हैं, लेकिन आप हर राज्य में रैली करते हुए, उनकी भाषा में उतर जाते हैं, ताकि उनके दिलों में जगह बनाई जाए, कभी कभी भूल जाते हैं कि शायद कुछ बातों का आपकी राजनीति पार्टी से कोई लेन देन नहीं। मुझे याद है कि आप ने हिमाचल में कहा, जब यहां का बेटा जागता है तो पूरा भारत सोता है, शायद सीमा पर खड़े भारत के कोने कोने से नौजवान आपके इस बयान से आहत हुए होंगे, नहीं हुए तो मैं जानना चाहूंगा कि चुनावी लाभ के लिए कुछ भी कह देना जरूरी है?

तेलंगाना बिल पास बंद कमरे में, कुछ ​िट़्वटर पर चर्चा​






देश में बदलाव के लिए कुछ तरीके

देश के पढ़ लिख रहे युवायों को सरकारी कार्यालय में पार्ट टाइम जॉब्स देनी चाहिए। अच्छे काम वालों को पढ़ाई खत्म होने पर पक्का किया जाए, अगर उनकी इच्छा हो तो।

देश में युवायों को एक ही क्षेत्र में एक साथ दाखिले लेने पर प्रतिबंध हो। उनको अलग अलग कार्य क्षेत्र चुनने के लिए करियर गाइंड्स प्रदान की जाए।

गांवों के आस पास ग्रामीण उद्योगों की स्थापना की जाए। कृषि के साथ साथ किसान या उनके युवा बच्चे इनमें अपनी इच्छा अनुसार अंशकालिक रूप में काम करें। देश में स्वदेशी चीजों के चलन पर जोर देने के लिए, सरकार को स्वयं प्रचार का जिम्मा उठाना चाहिए।

देश के अंदर सरकारी कामों के लिए कोल सेंटर बनाने चाहिए, ताकि हर सरकारी काम की जानकारी तुरंत मिल सके, हर सरकारी काम ओनलाइन होना चाहिए, अगर मोबाइल फोन, बैंकिंग जैसी पेचीदा चीजों की जानकारी पल में मिलती है तो सरकारी​ विभागों के कामों की क्यूं नहीं हो सकती।

सरकारी कामों के लिए विंडो सिस्टम जरूरी है। विंडो सिस्टम पर फाइलों की पूरी जांच पड़ताल हो, अधिकारी केवल खानापूर्ति के लिए साइन करें। एजेंटों को यहां से दूर रखा जाए, जिस अधिकारी का संपर्क एजेंट से पाया जाए, उसको अच्छे रूप में जुर्माना किया जाए, ताकि दूसरे संपर्क साधने से पूर्व सोचें। देश में बेरोजगार बहुत हैं, उनको चेकिंग के लिए रखा जा सकता है। चेकिंग मामले में बदलाव जरूरी है, हर दिन, वो ही व्यक्ति​ नहीं जाएगा।

राजनीतिक पार्टियां यूं क्यूं नहीं करती

हर राजनीति देश के विकास का नारा ठोक रही है। सब कहते हैं, हमारे बिना देश का विकास नहीं हो सकता, सच में मैं भी यही मानता हूं, आपके बिना देश का विकास नहीं हो सकता, लेकिन एकल चलने से भी तो देश का विकास नहीं हो सकता, जो देश के विकास के लिए एक पथ पर नहीं, चल सकते, वो देश को विकास की बातें तो न कहें। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश को एकता का नारा देते हैं, लेकिन खड़े एकल हैं, जहां जाते हैं, वहां की सरकार की खाटिया खड़ी करते हैं। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि दो इंच कील की जगह चार इंच हथोड़े की चोट से ठोक देते हैं। कांग्रेस समेत देश की अन्य पार्टियां भी कुछ यूं ही करती हैं, वो देश के विकास का मोडल रखने को तैयार नहीं। टीवी चैनलों ने तो केजरीवाल सरकार को गिराने के लिए निविदा भर रखी है, जो गिराने में सशक्त होगा, उसको निवि​दा दी जाएगी। लेकिन क्यूं नहीं देश की राजनीतिक पार्टियां एक सार्वजनिक मंच पर आ जाएं। अपने अपने विकास मोडल रखें, जैसे स्कूल के दिनों में किसी प्रतियोगिता में बच्चे रखते थे, जिसका अच्छा होगा, जनता फैसला कर लेगी। इससे दो फायदे होंगे, एक तो टेलीविजन पर रोज शाम को बकबक बंद हो जाएगी। दूसरा भारतीय क्रिकेट को फिर से टेलीविजन में स्पेस मिल जाएगी। एंटरटेनमेंट में बहुत सी महिलायों को होंठ ख़राब हो चुके हैं, उ​सकी ख़बरें! अमिताभ बच्चन की पोती पढ़ने लग गई, हालांकि अभी तक बॉलीवुड में किसी के बच्चे पढ़ने नहीं ​गए, मुझे ऐसा लगता है, क्यूंकि कभी ख़बर नहीं आई! वो भी आने लग जाएंगी। पांच पांच सौ करोड़ जो विज्ञापन पर खर्च करना है, वो बच जाएगा, पता है वो भी जनता से वसूल किया जाएगा! थूक से पकौड़े बनाए जा रहे हैं, मूत से मछलियां पकड़ाई जा रही हैं! मुझे नहीं दिखा, कहीं गुजरात के मुख्यमंत्री ने गुजरात मोडल रखा हो, केवल बस इतना कहते हैं, मैंने इतनी भीड़ कभी नहीं देखी, सच में घर बैठ आडवाणी को बुरा लग जाता है! राहुल गांधी कुली कुली चिला रहे हैं, मोदी चाय चाय! इन दोंनो के प्रेमी आम आदमी पार्टी हाय हाय चिला रहे हैं! अनुयायी बड़ी गंदी चीज है, आंख पर पट्टी बांध लेती हैं, अपने नेता का भाषण सुनने के बाद कान में रूई डाल लेती है! दूसरी पार्टियां करें तो रासलीला, हमारे वाले करें तो रामलीला! घोर अत्याचार है!

एक बच्ची की मौत, अख़बारों की ​सुर्खियां

बठिंडा शहर के समाचार पत्रों में एक बच्ची की मौत की ख़बर प्रकाशित हुयी, जिसका इलजाम पुलिस पर लगाया जा रहा है, क्यूंकि नवजात बच्ची की बेरोजगार महिला शिक्षकों के संघर्ष के दौरान मौत हुई है। पुलिस ने धरने पर बैठी महिलायों से रात को रजाईयां छीन ली थी, ठंड का मौसम है। बच्ची को ठंड लगी, अस्पताल में दम तोड़ दिया। मौत दुनिया का एक अमिट सत्य है, मौत का कारण कुछ भी हो सकता है ठंड लगना, पुलिस की मार या खाना समय पर न मिलना आदि। अगर अरबों लोग हैं तो मौत के अरबों रूप हैं। किसी भी रूप में आकर लेकर जा सकती है। लेकिन सवाल तो यह है कि हमारी मानवता इतनी नीचे गिर चुकी है कि अब हम नवजातों को लेकर सड़कों पर अपने हक मांगने निकलेंगे। पुलिस सरकार का हुकम बजाती है, यह वो सरकार है, जिसको हम अपनी वोटों से चुनते हैं। चुनावों के वक्त सरकार पैसे देकर वोटें खरीदती है और हम अपने पांच साल उनको बदले में देते हैं। गिला करने का हक नहीं, अगर सड़कों पर उतारकर हम अपने हकों की लड़ाई लड़ सकते हैं तो कुछ नौजवान आप में से देश की सत्ता संभाल सकते हैं। अपने भीतर के इंसान को जगाओ। मासूम शायद आपके भीतर का इंसान जगाने के लिए सोई हो, अगर आपको नींद में सरकार के खिलाफ नारेबाजी करनी है तो आपकी मर्जी। बच्ची की नींद आपका जागरण होना चाहिए। बच्चों को सड़क पर लेकर हक मांगने मत निकलें, हो सके तो उनका भविष्य सुरक्षित करने के लिए स्वयं निकलें।

जाति आधारित सुविधाएं बंद होनी चाहिए

अगर आने वाले समय में भारत को एक महान शक्ति के रूप में देखना चाहते हैं। अगर चाहते हैं कि देश एक डोर में पिरोया जा सके तो आपको सालों से चली आ रही कुछ चीजों में बदलाव करने होंगे। हम हर स्तर पर बांटे हुए हैं। जब मैं एक राज्य से दूसरे राज्य में जाता हूं तो मेरी बोली से लोग कहते हैं, तू पंजाबी है, तू मराठी है या गुजराती है। मगर जब कोई व्यक्ति अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर पहुंचता है तो कोई पूछता है तो आप अचानक कहते हैं इंडियन। जगह बदलने से आपका अस्तित्व बदल गया।

राज्य स्तरीय सोच को छोड़ो। आगे बढ़ो। धर्म व जाति की राजनीति से उपर आओ। स्वयं आवाज उठाओ। मेरे माता पिता ने शिक्षक की फीस रियायत देने वाली पेशकश को ठुकरा दिया था, यह कहते हुए कि इसकी जगह किसी दूसरे बच्चे की कर दो। हम अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं। उन दिनों सरकारी स्कूलों की फीस कुछ नहीं हुआ करती थी, लेकिन रियायत लेना मेरे पिता को पसंद न था। गांव में पीले कार्ड बनते थे। हमारे पास भी मौका था बनवाने का। पिता ने इंकार कर दिया। वो अनपढ़ थे, लेकिन समझदार थे।

रियायत केवल उनको दी जाएं, तो सच में उनके हकदार हैं, न केवल जान पहचाने वालों, सिफारिश वालों को। धर्म के नाम पर तो बिल्कुल नहीं। न अल्पसंख्यक के नाम पर न बहु संख्यक के नाम पर। असली पैमानों पर आदमी को रियायत दी जाए, जब उनका स्तर सुधरे, तो उनको आउट किया जाए, दूसरों को चुना जाए, जो इनके पहले वाले स्तर पर हैं। जब आप धर्म, जाति के नाम पर खैरात बंटती है तो बुरे प्रभाव पड़ते हैं, जनरल सोचता है आने वाले समय में निम्न वर्ग हावी हो जाएगा, दोनों में तकरार चलती है, घृणा की दृष्टि से देखता है, अच्छे नंबर लेकर आने वाले को भी, कुछ को तो अपनी जात छुपानी पड़ती है, कहीं उसकी काबलयित पर शक न कर लिया जाए।

यह कार्य राजनीतिक पार्टियां तब तक नहीं करेंगी, जब तक आम लहर नहीं बहेगी, क्यूंकि राजनीतिक पार्टियां हवा या लहर के गधे पर सवार होती हैं, क्यूंकि उनको कुर्सी चाहिए।

Gujarat Govt.- गरीबी यूपी बिहार के कारण, तो अमीरी के दावेदार आप कैसे ?

गुजरात के वित्त मंत्री नितिन पटेल ने कहा है कि प्रदेश में यूपी, बिहार से आए लोगों के कारण गरीबी बढ़ी है क्यूंकि गुजरात सरकार बाहरी लोगों को भी बीपीएल कार्ड मुहैया करवाती है। अपनी इज्जत बचाने के लिए हर बहाना जरूरी है।

अगर गरीबी के लिए यूपी बिहार के लोग जिम्मेदार हैं, तो अमीरी एवं विकास के लिए गुजरात सरकार को स्वयं का ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए। गुजरात के अंदर निवेश बाहरी राज्यों से, विदेशों से हो रहा है। उनमें यूपी, बिहार, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र न जाने कितने राज्यों के अमीर आदमी शामिल हैं, जो गुजरात के विकास के लिए जिम्मेदार हैं।

नैनो को लेकर तो गुजरात कुछ नहीं कहता। मारूति का कारखाना लगने वाला है, उसको लेकर गुजरात सरकार कुछ नहीं कहती, लेकिन इज्जत बचाने के लिए यूपी बिहार के लोग आंख में खटक रहे हैं, जो केवल आपको सूरत में मिलेंगे, जो कम वेतन में स्थानीय लोगों से अधिक कार्य करते हैं। अगर वे कम पैसों में ​अधिक श्रम करते हैं तो गुजरात के व्यापारियों को अधिक उत्पादन एवं पैसा मिल रहा है।

गुजरात सरकार बिहारियों को बिठाकर नहीं खिला रही, वे मेहनत करते हैं, खाते हैं। जिनको गुजराती, बिहारी में फर्क नजर आता है, वे देश को एक तार में पिरोने का दावा कैसे कर सकते हैं। गुजरात के सूरत में केवल आपको बिहार यूपी वाले मिलेंगे, लेकिन पंजाब की तो रग रग में हैं, वहां तो कहावत है कि अगर अब बिहारियों को पंजाब से अलग कर दिया तो कृषि मर जाएगी। अगर सूरत में ऐसा कर दिया तो जाए तो बुरे दिनों से गुजर रहा हीरा कारोबार, साड़ी कारोबार मर जाएगा।

अमूल का संस्थापक वर्गीज कुरियन मद्रास में पैदा हुआ था, लेकिन अमूल से विश्व में गुजरात को प्रसिद्ध कर गया। ऐसे कई नाम और भी होंगे। यूपी बिहार पर निशाना साधने वाले नितिन पटेल को शायद आंकड़ा विभाग ने गलत जानकारी उपलब्ध करवा दी, ​यूपी बिहार से अधि​क राजस्थानी हैं, लेकिन वहां स्वयं भाजपा की सरकार है, वे करीबी पड़ोसी है, उंगली उठानी उचित नहीं।

नरेंद्र मोदी देश को जोड़ने का झंडा उठा रहा है। सरकार इस तरह लोगों को तोड़ने वाले बयान दे रही है।

समुदाय राजनीति बंद होनी चाहिए

समाचार : रामेश्वरम के निकट पंबम में मछुआरों के विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करते सुषमा ने कहा, 'नरेंद्र मोदी ने एक मछुआरों को राज्यसभा का सदस्य बनाया हैं।'

वह यहां मछुआरा समुदाय के चुन्नीभाई गोहिल का जिक्र कर रही थी, जिन्हें बीजेपी ने पिछले सप्ताह गुजरात से राज्यसभा का सदस्य नामांकित किया है।

इसके साथ ही बीजेपी की इस वरिष्ठ नेता ने वादा किया कि अगर उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में जीतती है, तो वह एक अलग मत्स्य पालन मंत्रालय का गठन करेगी और मछुआरों की रिहाइश की आस-पास अच्छे स्कूल और अस्पताल स्थापित किए जाएंगे।

युवारॉक्स व्यू : आखिर यह क्या बात है ? लोक सभा चुनाव नजदीक हैं, और भाजपा ने गुजरात से चुन्नीभाई गोहिल को राज्य सभा सदस्य नियुक्त किया। और भाजपा की मैडम उसको हथियार बना रही हैं। हद नहीं तो क्या है ? यूं वादे करना भ्रष्टाचार प्रलोभन नहीं तो क्या है ? तो बीजेपी को अब चाय वालों के पास जाना चाहिए, कहना चाहिए देखो नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया। पार्टी में कुछ वकील होंगे, कुछ छोटे कारोबारी होंगे। उधर, जदयू को भी न्यूज पेपर समुदाय से मदद मांग लेनी चा​हिए, प्रभात ख़बर के संपादक को राज्य सभा सदस्य नामांकित किया है। यह समुदाय आधारित राजनीति बंद होनी चाहिए। अगर कोई वादा करना है तो देश के लिए करो।

चुनावों के लिए राम मंदिर का मुद्दा काम नहीं आया तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एकता का नारा लेकर सरदार पटेल को लेकर आए। एकता का अर्थ केवल भाजपा के समर्थन करना है। देश बनाने की बात न करते हुए सरदार पटेल के पुतले पर जोर दिया जा रहा है। सरदार पटेल जो अपना कद बना गए, क्या यह पुतला उससे अधिक उंचा कद बनाएगा सरदार पटेल का नहीं, ये तो केवल नरेंद्र मोदी का नाम इतिहास में दर्ज करवाएगा, लोग सरदार पटेल के पुतले को देखेंगे, नरेंद्र मोदी को याद करेंगे। यादों में पुतले बनाने से बेहतर है, सरदार पटेल के, भगत सिंह के, सुभाष चंद्र बोस समेत अन्य शहीदों के स्वप्नों का मुल्क बनाएं। एकता का नारा देने से देश, एक जुट नहीं होगा। अहिंसक राष्ट्रपति का देश आज सबसे उग्र है। टटोलकर देख लो। बस हिम्मत नहीं, जुटा पाता, भीतर को तूफान उठ रहे हैं, बस कंधे एवं भीड़ ढूंढ़ रहे हैं, ताकि इल्जाम उन पर न आए।

कांग्रेस को लेकर मीडिया की नीयत में खोट, निष्‍पक्ष पत्रकारिता नहीं

मीडिया की अपनी सोच कर चुकी है। वो अब सोशल मीडिया को केंद्र में रखकर ख़बरें बनाने लगा है। हालांकि इसका असर प्रिंट मीडिया पर नहीं, बल्‍कि वेब मीडिया एवं इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया पर अधिक दिखता है। कांग्रेस का विज्ञापन शुरू हुआ तो नमो के चेलों ने लड़की हसीबा अमीन को लेकर दुष्‍प्रचार करना शुरू कर दिया। 

वेब मीडिया भी उसी धुन में निकल पड़ा। हालांकि विज्ञापन में स्‍पष्‍ट शब्‍दों में लिखा है, युवा कांग्रेस कार्यकर्ता। जो लोगों को गला फाड़कर बताने की जरूरत कहां रह जाती है, हां अगर कोई अभिनेत्री होती, स्‍वयं को कांग्रेस कार्यकर्ता कहती तो समझ में आता गला फाड़ना। अगर अमेरिकन होती तो समझ में आता गला फाड़ना। 

नंबर दो बात, राहुल गांधी की इंटरव्‍यू के बाद जो मीडिया ने समझ बनाई, वो भी हैरानीजनक है। उसका इंटरव्‍यू इतना बुरा नहीं था, सच तो यह है कि अर्नब गोस्‍वामी राहुल गांधी को सुनना नहीं चाहता था, वे तो केवल उसके गले में उंगली डालकर उलटी करवाना चाहता था, ताकि नरेंद्र मोदी के गले से भी आवाज निकल आए। राहुल गांधी की इंटरव्‍यूह पर सवाल उठाने वाले नरेंद्र मोदी का इंटरव्‍यू क्‍यूं याद नहीं कर रहे , जब वह लाइव इंटरव्‍यू क्रोधित होते हुए छोडकर भाग गया था।

भारतीय राजनीति 99 के फेर में

पिछले एक साल में भाजपा के प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने हर स्तर पर विज्ञापनों से बहुत खूबसूरत जाल बुना। असर ऐसा हुआ कि देश में एक संप्रदाय का जन्म होता नजर आया। मोदी के अनुयायी उग्र रूप में नजर आए। मानो विज्ञापनों से जंग जीत ली। सत्ता उनके हाथ में है। जो शांत समुद्र थे, एकदम तूफानी रूख धारण करने लगे। अब उनको दूसरे समाज सेवी भी अपराधी नजर आने लगे, खासकर दिल्ली में, क्यूंकि ​दिल्ली फतेह होते होते चुंगल से छूट गई।

ख़बर है कि कांग्रेस प्रधान मंत्री पद की दौड़ में राहुल गांधी को उतारने का मन बना चुकी है। कांग्रेस राहुल गांधी को ऐसे तो उतार नहीं सकती, क्यूंकि सवाल साख़ का है, मौका ऐसा है कि बचा भी नहीं जा सका। अब राहुल को उतारने के लिए कांग्रेस पीआर एजें​सियों पर खूब पैसा लुटाने जा रही है। यकीनन अगला चुनाव मूंछ का सवाल है। इस बार चुनाव को युद्ध से कम आंकना मूर्खता होगी। युद्ध का जन्म अहं से होता है। यहां पर अहं टकरा रहा है। वरना देश में चुनाव साधारण तरीके से हो सकता था। भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता चाहती है। अगर उसकी चाहत सत्ता न होती तो शायद वह अपने पुराने बरगद के पेड़ को न काटती। अटलजी की तबीयत ठीक नहीं, वो राजनीति को समझ भी नहीं पा रहे, लेकिन फिर भी नेता उनके साथ फोटो खिंचवाने जाते हैं, उनकी एक झलक पाने जाते हैं, लेकिन एक बरगद का पेड़ खड़ा है, जो राजनीति की चरमसीमा को देख रहा है, उसको साइडलाइन कर दिया। युद्ध के लिए युवा सेनापति की जरूरत थी, जो नरेंद्र मोदी के रूप में मिला।

नरेंद्र मोदी ने पूरा देश में अपना प्रभाव छोड़ने के लिए विज्ञापनों पर दिल खोलकर पैसा खर्च किया। कांग्रेस ने एक भी पत्ता बाजार में नहीं फेंका। वो सिर्फ मूक दर्शक की भांति देखती रही। मगर जब बात राहुल गांधी वर्सेस नरेंद्र मोदी की आई तो कांग्रेस ने बख्तर कस लिए। अब युद्ध में युवराज है तो बिना तैयारी के युद्ध लड़ा नहीं जा सकता, अगर मोदी को बाजार से चेहरा संवारने वाले मिल सकते हैं तो कांग्रेस को भी मिल सकते हैं। देश अगर प्रभावित होता है तो विज्ञापनों से। उसकी खुद की सोच कभी काम करती, तो शायद छह दशक बाद आजादी का रोना न रो रहा होता।

इस युद्ध में पीआर एजें​सियों की चांदी होने वाली है। जन साधारण का तो पता नहीं। उसको तो उम्मीदों व झूठे वादों का अंबार जरूर मिल सकता है। शाहरुख खान की चैन्ने एक्सप्रेस ने जब बॉक्स आ​फिस पर दो करोड़ बटोरे तो आमिर खान पर तीन सौ करोड़ कमाने का दबाव था। एक समय सफलता व प्रतिष्ठा आपको गुलाम नजर आती है, लेकिन वास्तव में अगर देखें तो यह आपको अपना गुलाम बना लेती है। शीर्ष पाने में दिक्कत कम है, शीर्ष पर बने रहने के लिए दिक्कत ज्यादा।

शीर्ष को बचाने में जीवन खत्म हो जाता है। कहते हैं कि सम्राट की मालिश करने एक नाई आता था, जिसको मालिश के बदले सम्राट एक सिक्का देता था। नाई बहुत खुश रहता था। उसकी खुशी से सम्राट को जलन होने लगी। सम्राट ने अपने वजीर को कहा, उसकी खुशी का कारण बताओ, मुझे उसकी खुशी से जलन होने लगी है। वजीर तेज दिमाग था। रात को नाई के घर पर 99 सिक्कों से भरा थैला फेंक आया। अगली सुबह नाई उठा, उसने सिक्कों से भरा थैला उठाया। गिने तो 99 सिक्के थे। अब नाई ने सोचा, अगर आज एक सिक्का मैं बचाने में सफल हुआ तो मेरे पास 100 सिक्के हो जाएंगे। धीरे धीरे धन का संग्रह हो जाएगा। नाई अब सिक्के जुटाने के लिए सोचने लगा, जो परेशानी का सबब बना। सम्राट उसको परेशान देखकर पूछता है, तुम्हारी परेशानी का कारण तो बताओ। उसने कहा, कुछ नहीं, मैं ठीक हूं। सम्राट ने कहा, पहले जैसी खुशी नहीं है। कहीं वजीर ने तो कुछ नहीं कहा। अब नाई को समझ आया कि उसको जो एक थैला मिला था, वह वजीर द्वारा फेंका गया होगा। इस फेर से बाहर निकला मुश्किल है, जो निकल गया वह खुश हो गया। 

राहुल-कांग्रेस की छवि चमकाने को 500 करोड़ का ठेका

fact 'n' fiction : राहुल गांधी को लेने आये यमदूत

सुबह सुबह का समय था। राहुल गांधी अपने बिस्‍तर पर नींदफरमा थे। आंख खुली तो देखा, उसके बिस्‍तर के पास दो लोग खड़े हैं। राहुल ने चौकते हुए पूछा, आप कौन हैं ? सामने से उत्‍तर आया .. यम ऐम्‍बेसी से आये हैं। राहुल तपाक से बोले ... क्‍या मैं प्रधान मंत्री बन गया ?

नहीं.. नहीं.. यमन ऐम्‍बेसी से नहीं, यम लोक वाली ऐम्‍बेसी से आये हैं। तो आप यहां क्‍यूं आये ? राहुल ने परेशानी वाले लिहाजे में पूछा। दरअसल हमारे लोक में एक रियालिटी शो का आयोजन होने जा रहा है। उसी के सिलसिले में आपको लेने आये हैं, आपका नाम राहुल है न ? यम दूतों ने पूछा।

राहुल ने हौसला भरते हुये कहा, हां मेरा नाम राहुल है, लेकिन मुझे पता है, आप बिग बॉस बना रहें हैं, जहन्‍नुम का अओ, और जन्‍नत का वओ कंसेप्‍ट पर, लेकिन इस शो में पहले भाग ले चुका राहुल मैं नहीं, वे राहुल महाजन हैं।

नहीं.. नहीं ... वो नहीं चाहिए। हम को ऐसा प्रतिभागी चाहिये जो लम्‍बा खेल सके। अच्‍छा.. अच्‍छा.., आपको राहुल द्राविड़ की तलाश कर रहे हैं। हां.... हां... मुझे पता है वे अच्‍छा क्रिकेट खेलते हैं। टेस्‍ट में तो उनको द वॉल का टैग भी मिला हुआ है, तो क्‍या आपको उसका एड्रेस दूं।

नहीं... नहीं... खिलाड़ी नहीं चाहिए, हम को संजीदगी भरा अभिनय करने वाला चाहिये, जो चेहरे से गंभीर नजर आये। अच्‍छा.... अच्‍छा.... अब समझा। आपका को राहुल बॉस की तलाश है, लेकिन वो तो बॉम्‍बे रहते हैं, और आप गलती से दिल्‍ली आ गये। कहो तो वीआईपी कोटे में रिजर्वेशन करवा दूं।

नहीं.... नहीं..... ऐसा प्रतिभागी चाहिए, जो लीड कर सके। जिसमें लीडरशिप क्‍वालिटी हो, जैसे एक सफल बिजनसमैन में होती है। ओके... ओके.... देट्स गूड। आपको राहुल बजाज की जरूरत है। हां, उनके पास राजनीति और सफल बिजनसमैन का अनुभव है। वे आपके लिये बिल्‍कुल शूट हैं। तो आप उनसे मिलना चाहेंगे।

नहीं.... नहीं... हम को ये क्‍वालिटी किसी एक ही व्‍यक्‍ति में चाहिये। हमको  इतने सारे प्रतिभागियों की जरूरत नहीं। हमें तो बस ऑल इन वन चाहिये।

सुझाव दे दे तंग आ चुके राहुल गांधी ने दूतों के हाथों से वारंट पेपर छीना और टुकड़े टुकड़े कर दिया। सालो ! सुबह सुबह बनाने के लिये मैं ही मिला आपको। सालो ! पप्‍पू समझा, क्‍वालिटियां नरेंद्र मोदी की, और नाम राहुल का।

हंसते हंसते यमदूत दौड़ गये। पीछे एक चिट छोड़ गये। हम तो फर्जी यमदूत थे। भले ही सीबीआई से जांच करवा लेना।

Disclaimer : fact 'n' fiction  सीरीज में व्‍यक्‍तियों के नाम असली हो सकते हैं, लेकिन इसकी लेखन शैली व कंटेंट पूर्ण रूप से काल्‍पनिक है। कुछ असली तथ्‍यों को आधार बनाकर कल्‍पना से इसकी रचना की जाती है।



कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : सोनिया गांधी के नाम मल्‍लिका शेरावत का पत्र

नमस्‍कार, सोनिया गांधी जी। आज सुबह जब दरवाजे के नीचे से कुछ अख़बार आये, हर सुबह की तरह। मैंने उनको दौड़कर उठाया। शायद किसी सुर्खी में मेरा नाम हो, लेकिन एक सुर्खी ने मुझे पत्र लिखने के लिए मजबूर कर दिया। उस सुर्खी में पूर्व सेना अध्‍यक्ष वीके सिंह का नाम था, और उन पर किसी गुप्‍तचर एजेंसी की स्‍थापना व गलत इस्‍तेमाल करने का आरोप था।

सोनिया जी, यह वीके सिंह वहीं हैं ना, जो पिछले दिनों मेरे मूल राज्‍य हरियाणा के रेवाड़ी शहर में नरेंद्र मोदी के साथ नजर आये थे, एक पूर्व सैनिक रैली में। मुझे लगता है शायद उसी कार्य के लिए वीके सिंह सम्‍मानित किये जाने के प्रयासों का हिस्‍सा है यह सुर्खी। और एक संकेत है कि इस तरह के कार्य करने वाले अन्‍य लोगों को भी किसी न किसी रूप से सम्‍मानित किया जा सकता है, मैं सम्‍मानित नहीं होना चाहती, मुझे सम्‍मान पसंद नहीं, क्‍यूंकि मैं तो पहले ही बेरोजगारी का शिकार हूं, सम्‍मान वाले व्‍यक्‍ति तो छोटा मोटा काम नहीं कर सकते। रोजगार पाने के मकसद से तो गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्‍मदिवस पर गीत गाया था, शायद किसी को मेरी आवाज पसंद आ जाये, और किसी रैली में मुझे नृत्‍य प्रदर्शन के लिये बुला लिया जाये, क्‍यूंकि अमीरों के लिए मेरा ठुमका अब काम का नहीं रहा, उनको सनी लियोन के ठुमके अच्‍छे लगते हैं, करोड़ों रुपये खर्च कर देते हैं, दुबई तक बुला लेते हैं।

इस सदी की शुरूआत में मैंने घर छोड़ा, शादीशुदा जीवन छोड़ा, क्‍यूंकि आम जिन्‍दगी जीना मेरे के लिए मुश्‍िकल था, और आपकी मनरेगा योजना तो मेरी कमर तोड़कर रख देती, इतनी नाजुक हूं, इतना वजन नहीं उठा सकती, पौष्‍टिक आहार उतनी लेबर में नहीं मिलता। अधिक लेबर के लिए कभी कभी यौन शोषण से भी गुजरना पड़ता है, लेकिन मुम्‍बई की चमकीली दुनिया में होने वाले यौन शोषण जितना मेहनताना और नाम नहीं मिलता। यहां नाम के साथ इज्‍जत मिलती है।

इस ख्‍वाहिश में मुम्‍बई आई। पहली फिल्‍म ख्‍वाहिश ही करने को मिली। इस फिल्‍म में चुंबन से काम चल गया। कहते हैं कि अगर गुड देने से बंदा मर जाये तो जहर देने की जरूरत क्‍या, अगर किस देकर इज्‍जत बच जाये, और पैसा मिल जाये तो बुराई क्‍या है ?


पहली फिल्‍म में 17 चुंबन देकर रिकॉर्ड बनाया। कुछ और फिल्‍में मिल गई। मर्डर से मैंने तलाकशुदा स्‍त्री रीमा लांबा का मर्डर कर दिया, और मल्‍ल्‍िका शेरावत बनकर उभरी। अब 17 चुंबन का असर खत्‍म हो चुका है, क्‍यूंकि यहां पर 27 चुंबन वाली मॉर्डन जमाने की गर्ल परिणीति चोपड़ा आ गई। अब तक की सभी फिल्‍मों में चुंबन और अंतरंग सीन दिये हैं, आप घर लाकर अकेले में देख सकती हैं।

मैं चुंबन से आगे बढ़ने का प्रयास करती कि उस जगह को सनी लियोन नामक एक विदेशी बाला ने भर दिया। अच्‍छा खासा उसको वहां काम मिल रहा था, लेकिन भट्ट परिवार उसको भारत खींच लाया, यह वही परिवार है, जिसने मुझे मार्डर जैसी फिल्‍म से बॉलीवुड में इतने साल रहन बसर करने का लाइसेंस दिला दिया, वरना इस शहर में टिकना बेहद मुश्‍िकल था।

अब मैं बेरोजगार हूं, केआरके की तरह। नाम तो सुना होगा केआरके। एसआरके नहीं, केआरके, इस बंदे का पूरा नाम है कमाल राशिद ख़ान। यह भोजपुरी फिल्‍मों में नहीं चले, तो बॉलीवुड चले आये, देशद्रोही पहली फिल्‍म बनाई, आज तक उसकी का दूसरा भाग बना रहे हैं। बनाने की गति इतनी धीमी कि एक्‍टर यूट्यूब के जरिये एक फिल्‍म क्रिटिक्‍स बन गया। वैसे भी हमारे धर्म गुरू कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर। ऐसे में कोई न कोई शैतानी तो होई जाती है। जैसे पिछले दिनों नरेंद्र मोदी के जन्‍मदिवस पर मुझे से हुई,  आप तो समझदार हैं, समझ ही गई होंगी, क्‍यूंकि आपका विपक्ष के साथ अच्‍छा अनुभव रहा है।

एक समय था, जब राम गोपाल वर्मा का नाम चलता था। आजकल उनका केवल टि्वट खाता चलता है। उनकी हालत भी मेरी जैसी है। कल तक हीरोइनें उनकी फिल्‍म में आने के लिए तरसती थीं, लेकिन अब स्‍थिति वैसी तो नहीं, अब वे हीरोइनें के लिए तरसते हैं। तभी तो उन्‍होंने पिछले दिनों मिस अमेरिका नीना दावुलूरी की तारीफ करने के बजाय सनी लियोन की तारीफ की, क्‍यूंकि उनको पता है चांद की तारीफ करने से चांद जमीन पर नहीं आयेगा, लेकिन जो पास है उसको कह दे दिया जाये, शायद कोई मौका हाथ लग जाये। राम गोपाल वर्मा को भी उम्‍मीद होगी कि इस टि्वट के बाद उनके बेरोजगारी भरे दिन खत्‍म हो जायेंगे और सनी लियोन उनको अपनी किसी विदेशी फिल्‍म के लिए बतौर एक्‍टर साइन कर लेगी, वैसे भी एक्‍टर डायरेक्‍टर बन रहे हैं, और डायरेक्‍टर एक्‍टर बन जायें तो इसमें बुराई क्‍या है।

सोनिया जी, इस सुर्खी से पहले भी मुझे संकेत मिल गये थे, जब आपने अदानी समूह को 200 करोड़ के जुर्माने वाला प्रेम पत्र भेजा था। उससे पहले इंफोसिस को 582 करोड़ का, और बाबा रामदेव के नाम तो काफी पैसा बोलता है, यह सभी लोगों ने वो ही भूल की, जो पिछले दिनों वीके सिंह ने रेवाड़ी में की। आप समझदार हैं, अब विस्‍तार से लिखूंगी, तो ज्‍यादा स्‍याही और पेज बिगड़ेगा।

मेरे पास इन दिनों काम नहीं, और जो कमाया था, उसको रोजगार पाने के लिए उड़ा रही हूं, उम्‍मीद है कि एक औरत होकर एक औरत की मजबूरी को समझेंगी। मैं सब कुछ रोजगार के लिए कार रही हूं, जब राहुल बाबा का जन्‍मदिवस आयेगा, मैं तब भी गाउंगी, अगर आप मुझे कहीं से लोक सभा की टिकट देना चाहें तो मैं चुनाव भी लड़ना चाहुंगी, लेकिन सीट पर जीत कंफर्म हो। ख़तरे वाली सीट पर बैठना, और सफर करना मुझे पसंद नहीं, क्‍यूंकि स्‍थिति पहले ही खराब है।

मुझे उम्‍मीद है कि मेरे द्वारा पिछले दिनों किये गए नरेंद्र मोदी संबंधित कार्यों के लिए आप मुझे सम्‍मानित नहीं करेंगी।
Disclaimer : fact 'n' fiction सीरीज में व्‍यक्‍तियों के नाम असली हो सकते हैं, लेकिन इसकी लेखन शैली व कंटेंट पूर्ण रूप से काल्‍पनिक है। कुछ असली तथ्‍यों को आधार बनाकर कल्‍पना से इसकी रचना की जाती है।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : दिग्‍गी सुर्खियों से गैरहाजिर, तो जनपथ होना पड़ा लाइन-हाजिर

बुधवार की सुबह। सोनिया अपने आवास पर गॉर्डन में टेंशन भरी मुद्रा में घूम रही थी, मानो कोई बड़ा विज्ञापन छूटने के बाद संपादक। बस इंतजार था, बयानवीर दिग्‍विजय सिंह का। कब आयें, कब लेफ्ट राइट सेंटर किया जाये।

दरवाजे खुले एक गाड़ी आई। गाड़ी में वो सवार थे, जिनका इंतजार था। पास आये, मैडम का चेहरा और आंखें लाल। साथ आये सलाहकार ने पूछा, मैडम क्‍या गुस्‍ताखी हुई ? जो इतना गुस्‍से में हैं। तुम को शर्म आनी चाहिए, अब गुस्‍ताखी पूछते हो ? अख़बार और टेलीविजन चैनलों से समझ नहीं पड़ता, आख़िर चूक कहां हो रही है ? गुस्‍से में लाल पीली मैडम ने साजो सामान समेत की चढ़ाई। मैडम आप साफ साफ बतायें बात क्‍या हुई, दिग्‍विजय सिंह का सलाहकार बोला।

नरेंद्र मोदी ने रेवाड़ी पहुंचकर हम पर हल्‍ला बोला। कोई प्रतिक्रिया नहीं, हमारी ओर से। मोदी का जन्‍मदिवस ऐसे मनाया गया, जैसे देश का कोई उत्‍सव, कोई प्रतिक्रिया नहीं हमारी ओर से। वहां नरेंद्र मोदी बयान के ड्रोन दागे जा रहा है, ताकि हमारा जनपथ ध्‍वस्‍त किया जाये, और आप गुस्‍ताखी पूछते हो ? मुझे बिल्‍कुल पसंद नहीं, पाकिस्‍तान निरंतर सीमा पर हमले करे, और आप मनमोहन सिंह जैसी चुप्‍पी धारण किये बैठे रहें।

गुस्‍ताखी, मैडम, दरअसल कुछ दिनों से दिग्‍विजय सिंह अचानक मौनव्रत में चले गये। कारण कुछ समझ नहीं आ रहा है, और हमने ऑनलाइन एचआर सिस्‍टम में सिक लिव के लिए अपलाई कर दिया था, और आपको सीसी में राहुल के साथ रखा गया था। शायद अमेरिका ने हमारा मेल आप तक पहुंचने नहीं दिया, वे अभी तक हमारी इंग्‍लिश को रीड नहीं कर पायें होंगे, वे संदिग्‍ध किस्‍म के लोग हैं, इसी कारण ब्राजीलियन राष्‍ट्रपति ने वहां का दौरा रद्द कर दिया, बेचारी के साथ भी ऐसा ही हुआ था।

अच्‍छा अच्‍छा। ठीक है। कब तक ठीक होंगे हमारे दिग्‍गी महाराज। सलाहकार ने जवाब दिया, कुछ भी कहना मुश्‍किल है, डॉक्‍टरों को समझ नहीं आ रहा है। शकील मियां बोले, कहीं किसी विरोधी पार्टी ने काला जादू तो नहीं कर दिया। मैडम ने आदेश दिया, जाओ गाड़ी से लेकर घर तक की तलाशी लो, अगर संदिग्‍ध चीज मिले तो फौर लेकर आओ। कुछ समय बाद तलाशी दल लौटा, साथ में एक टॉफी कवर लिये। कवर पर लिखा हुआ था सेंटर फ्रेश। कवर देखते ही शकील का दिमाग चकराया। मैडम समझ गया, यह काले जादू का नहीं, सेंटर फ्रेश का कमाल है। जुबान पर रखे लगाम। मैडम ने जोर से तमाचा शकील के गाल पर जड़ दिया, कमबख्‍त यह जुबान पर लगाम लगती है, हाथों पर नहीं, इससे टि्वटर तो अपडेट हो सकता था। 

जाओ, अंदर से मेटॉस मिन्‍ट लेकर आओ। शकील, मैडम गुस्‍ताखी माफ, मेटॉस मिन्‍ट तो बारा रैली पर जाने से पहले राहुल बाबा खत्‍म कर गये। ओ सिट। चलो डीएचए वाला पाउडर लाकर दूध में घोल कर पिला दीजिये। सेंटर फ्रेश की मार रहे झेल दिग्‍विजय सिंह को डीएचए वाला दूध में घोलकर पाउडर पिलाया गया, बुधवार शाम तक असर दिखा, जब दिग्‍विजय सिंह की जिज्ञासा उभरकर सामने आई, सबसे पहला सवाल दागा, अगर नरेंद्र मोदी सबसे धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति हैं, तो सबसे अधिक सांप्रदायिक व्यक्ति कौन? 

बयानवीर के के जिज्ञासा भरे सवाल के बाद मैडम का कुछ ऐसा हाल था। 


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : entrance exam बाबाओं के लिए 'न बाबा न'

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आध्‍यात्‍िमक गुरूओं पर लग रहे यौन शोषण के आरोपों के कारण कहीं देश की सर्वोच्‍च अदालत वेश्‍यावृत्‍ति संबंधी पूछे गये सवाल की तरह सरकार से इस बार भी न पूछ ले कि अगर आध्‍यात्‍मिक गुरूओं द्वारा किये जा रहे यौन शोषण को रोकना संभव नहीं तो इसको वैधता दे दी जाये।

इस बात से डरते हुए देश की सरकार ने इस मामले पर गंभीरता से सोचने का विचार किया है। सरकार चाहती है कि बाबाओं को भी entrance exam से गुजरना चाहिए। इस प्रस्‍ताव पर काल्‍पनिक लोक सभा में पहली बार में नेताओं की राय मांगी गई।

मलंगनगर से सांसद मलंग दास ने सुझाव देते हुए कहा कि बाबाओं को कुछ महीनों तक रेड लाइट इलाकों में रखा जाये, और उनके व्‍यवहार पर पैनी निगाह रखी जाये। अगर बाबा बनने के इच्‍छुक आवेदनकर्ता यहां से पास होते हैं तो उनको जर्मनी के उन बीचों पर तीन महीने के लिए छोड़ा जाये, जहां पर महिलायें व पुरुष नग्‍न अवस्‍था में मौज मस्‍ती करते हैं। जर्मन में ऐसे बीच हैं, जहां पर महिलायें और पुरुष नग्‍न अवस्‍था में घूमते मिल जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह महिला पुरुष बराबरता के विचार को प्रत्‍साहित करने के लिये अपनाया गया तरीका है। ऐसे बीचों पर तीन महीने गुजराने पर अगर बाबा बनने की तीव्र इच्‍छा खत्‍म नहीं होती तो उनको बाबा बनने का आज्ञा पत्र दिया जाये।

ग्रामीण क्षेत्र से आये सांसद ने अपने बैल का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे हमारे गांव में साँड़ से बैल बनाने के लिए साँड़ को नसबंदी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वैसे ही बाबाओं को भी नसबंदी प्रक्रिया से गुजारना चाहिए। सांड से बैल बनाये पशु को हम भैंसों और गायों के बीच रखते हैं, वहां ऐसी शिकायत नहीं आती, लेकिन साँड़ को वहां पर रखना हमेशा रिस्‍की रहता है।

एक अन्‍य सांसद ने सुझाव दिया कि हर बार की तरह इस बार भी क्‍यूं नहीं महिलाओं के लिए लक्ष्‍मण रेखा खींच दी जाये। अगर छोटा सुखी परिवार चाहिये तो ऑपरेशन महिलायें करवाती हैं, अगर अनचाहा गर्भ ठहर जाये तो गर्भनिरोधक गोलियां, महिलाओं के लिए। बाबाओं के मामले में ऐसा किया जा सकता है कि अगर महिलायें बाबाओं से एकांत में मिलती हैं, और उनके साथ रेप होता है तो उसकी जिम्‍मेदार महिला होगी, और उसके खिलाफ बाबा के ब्रह्माचार्य तोड़ने के आरोप में केस चलाया जायेगा।
महिला सांसद ने इस बात पर कड़ा एतराज जताते हुए संसद में हंगामा कर दिया और सुझाव प्रतिक्रियाओं का दौर थम गया व लोक सभा की कार्यवाही अगले सेशन तक के लिए स्‍थगित कर दी गई।

फेक टॉक के फर्जी सूत्रों से ख़बर मिल रही है कि अगर 2014 लोक सभा चुनावों के बाद भाजपा की अगुवाई वाली सरकार सत्‍ता में आई तो नरेंद्र मोदी अपने खास समर्थक बाबा रामदेव को मंत्री पद देने के लिये एक नये मंत्रालय को अस्‍तित्‍व में लायेंगे। इस मंत्रालय का नाम धर्म मंत्रालय होगा, और नये बाबाओं को यहां से स्‍वीकृति लेनी होगी।

यहां उल्‍लेखनीय है कि दिग्‍विजय सिंह के बयान के अनुसार बाबा रामदेव के पास आज से दस साल पहले साइकिल को पंक्‍चर लगवाने के पैसे नहीं थे, लेकिन आज उनके पास 11 सौ करोड़ की संपत्‍ति है। कहीं न कहीं,  दिग्‍विजय सिंह का यह बयान युवा पीढ़ी को बाबा बनने की तरफ प्रेरित करता है, राजनीति में भी इतनी ग्रोथ मिलना मुश्‍िकल है।

बाबा के करीबी फर्जी सूत्रों से सुनने में आया है कि बाबा यौन शोषण मामले को लेकर बेहद संवेदनशील हैं, उन्‍होंने अभी से इसके लिए खाका तैयार कर लिया है। अगर कोई बाबा यौन शोषण में लिप्‍त पाया गया तो उसको अगले 5 साल तक निरंतर 24घंटे कपाल भाति  प्राणायाम व भस्त्रिका प्राणायाम करना होगा, बिना कुछ खाये पीये। अगर बीच में रूका तो उसके ऊपर एक डंडे वाला पहरेदार होगा, जो रूकने पर लठ का इस्‍तेमाल करने के लिए स्‍वतंत्र होगा।

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कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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