महात्मा गांधी के एक श्लोक ''अहिंसा परमो धर्म'' ने देश नपुंसक बना दिया!

जब खुद में लड़ने का दम नहीं था तो गीता के श्लोक को आधा करके लोगों को नपुंसक बना दिया। भारत में अहिंसा के पुजारी का ढोंग करने वाले महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं की सभा में हमेशा यही श्लोक पढ़ते थे लेकिन हिन्दुओं को कायर रखने के लिए गांधी इस श्लोक को अधूरा ही पढ़ता था।


ऐसी सैंकड़ों बातें आपको इंटरनेट पर तैरती हुई मिल जाएंगी, जब आप ''अहिंसा परमो धर्म:'' श्लोक को कॉपी पेस्ट करके गूगल सर्च में खोजने निकलेंगे। इस साहित्य को लिखने वाले आपको बताएंगे कि ''अहिंसा परमो धर्म'' अधूरा श्लोक है जबकि पूरा श्लोक तो 'अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च:' है, जिसका अर्थ है कि अहिंसा परम् धर्म है, तो धर्म के लिए हिंसा भी परम् धर्म है।

महात्मा गांधी का शरीर तो नत्थू राम गोडसे ने गोलियों से मार डाला। अब गोडसे के अनुयायी की ओर से महात्मा गांधी के विचारों को मारने की कोशिश पुरजोर चल रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया पर कॉपी पेस्ट चलन के कारण उनके सफल होने की संभावनाएं ज्यादा हैं।

दिलचस्प बात तो यह है कि नरफत की आबोहवा पैदा करने के लिए लिखने वाले बेहतर जानते हैं कि भारत में कितने लोग ग्रंथों को पढ़ते हैं। इसलिए वह नफरत का जहर पिलाने के लिए ग्रंथों के श्लोक का शहद सा इस्तेमाल करते हैं। धर्म से जुड़े हुए लोग गटकने में देर भी नहीं करते।

गुरूवार को मेरा माथा ठनक गया, जब मैंने एक फेसबुक पोस्ट पर प्रतिक्रिया के रूप में, 'आधी-अधूरी कहावत के कारण...  1948 में जिसका "वध" किया, उसने केवल इतना ही सिखाया...  "अहिंसा परमोधर्मः", लेकिन बचा हुआ खा गया... "धर्महिंसा तथैव च".... ठीक से पूरा नहीं पढ़ने का नतीजा बुरा ही होता है... :D, पढ़ा।

धार्मिक साहित्य में मेरी अधिक रुचि नहीं है। हालांकि, मैं अपने और दूसरे धर्मों का बराबर सम्मान करता हूं। मैंने भी इस बात को ठीक से समझने का प्रयास किया। हो सकता है कि महात्मा गांधी ने ऐसी चतुराई की हो, क्योंकि आखिर महात्मा गांधी चतुर बनिया थे, जैसा हाल ही में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था।

मगर, जब मैं खोजने निकला, तो सबसे पहले इंटरनेट पर मुझे वो साहित्य मिला, जो उपरोक्त प्रतिक्रिया का समर्थन कर रहा था। मुझे भी पहली दफा लगा कि महात्मा गांधी ने तो सच में देश को नपुंसक बना दिया।

लेकिन, यह अर्ध सत्य था। मुझे लगता है कि अर्ध सत्य भी कहना उचित न होगा। यह तो मनगढ़त नफरत फैलाने वाला साहित्य था। मैंने खोज अभियान जारी रखा, तो मुझे एक धार्मिक वेबसाइट विद्यासागर डॉट नेट मिली, जो जैन समाज की थी।

जैसे ही मैंने वेबसाइट खोली, तो दिमाग के कपाट खुले रह गए। मैं दंग रह गया, वेबसाइट तो कुछ और ही कह रही थी। दरअसल, आम तौर पर कहा जाता है कि अहिंसा परमो धर्मः भगवान महावीर की देन है।

मगर, वेबसाइट का कहना है, विश्वास कीजिए अहिंसा परमो धर्मः का सर्वप्रथम उल्लेख जैन धर्म के शास्त्रों में नहीं अपितु महाभारत के अनुशासन पर्व की गाथा ११५-२३ में मिलता है।

और उसके नीचे अहिंसा परमो धर्म: का पूरा श्लोक दिया गया है, जो कुछ निम्न प्रकार है।

अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो तपः।
अहिंसा परमो सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते।
अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो दमः
अहिंसा परम दानं, अहिंसा परम तपः
अहिंसा परम यज्ञः अहिंसा परमो फलम्‌।
अहिंसा परमं मित्रः अहिंसा परमं सुखम्‌॥
महाभारत/अनुशासन पर्व (११५-२३/११६-२८-२९)

अब तो आप भी समझ गए होंगे कि किस तरह एक विचारधारा भारत के धार्मिक सौंदर्य को खत्म करने पर उतारू है। पहले पहल तो मैं इस पर कुछ लिखना ही नहीं चाहता था। लेकिन, फिर याद आया कि ईच्छाई से बुराई इसलिए जीत जाती है कि ईच्छाई चुप चाप और शांत रहना पसंद करती है।

हालांकि, मैं यह नहीं कहता कि धर्म की रक्षा के लिए हथियार उठाना बुरा है। जब मुगलों के अत्याचार बढ़ने लगे तो सिख पंथ की स्थापना करने वाले दशम गुरू श्री गुरू गोबिंद सिंह जी ने भी हथियार उठाया। लेकिन, स्वयं की रक्षा के लिए हथियार उठाना, और किसी पर हमला करने के लिए हथियार उठाने में अंतर होता है।

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