मोहनजो दरो से मेलूहा वाया बाहुबली

मोहनजो दरो अमरी गांव के एक युवक और मगरमच्‍छ के बीच होने से टकराव से शुरू होती है। अमरी का युवा श्‍रमन गांव वालों के लिए नायक है, जैसे बाहुबली का शिवा, मुट्ठी भर लोगों के लिए। एक सपना श्‍रमन को एक अनजान शहर की तरफ खींचता है, जैसे पर्वत की ऊंचाई शिवा को।

श्‍रमन का पालन पोषण श्‍रमन के चाचा चाची करते हैं, तो शिवा का पालन पोषण भी उनके माता पिता द्वारा नहीं होता। दोनों अभिभावकों की जिद्द के विपरीत अपने सपनों के शहर जाने के लिए उत्‍सुक होते हैं। दोनों का युद्ध एक करूर राजा या प्रधान से होता है।


एक के सामने मोहनजो दरो तो दूसरे के सामने महिषमति है। एक को वहां के लोग मिलती शकल सूरत से पहचानते हैं तो एक को उसके बताए हुए चिन्‍हों से। एक मोहनजो दरो का उत्‍तराधिकारी है तो एक महिषमति का उत्‍तराधिकारी।


श्‍रमन की मां जिन्‍दा नहीं है जबकि शिवा की मां बेटे का राह देख रही है। मोहनजो दरो में प्रधान और उसका बेटा है तो महिषमति में भल्‍लाला और उसका बेटा है। श्‍रमन के पास सेना वेना कुछ नहीं है, जैसे कि शिवा के पास सेना वेना कुछ नहीं था।

जब बाहुबली देख रहा था तो सोच रहा था कि प्रभास की जगह इस फिल्‍म में ऋतिक रोशन फिट बैठता है। मगर, मुझे नहीं पता था कि आशुतोष गोवरिकर उसी किरदार को किसी नई कहानी के साथ उतारेंगे।

मोहनजो दरो को आशुतोष गोवरिकर ने साधारण तरीके से रखा है। पंडित स्‍वीकार लेता है कि किस तरह श्‍रमन की पिता की मौत में उसका हाथ है, जो मोहनजो दरो में उतना ही ईमानदार है जितना कि महिषमति में कट्टपा। हालांकि, कट्टपा ने बाहुबली को क्‍यों मारा सवाल आज भी बरकरार है।

महिषमति का दीवाना भी एक लड़की को दिल दे बैठता है और मोहनजो दरो जाने का चाहक श्‍रमन भी। दोनों ही किरदार मेलूहा के मृत्‍युंजय के नायक शिव से प्रेरित हैं। हालांकि, दोनों के साथ तोड़ मरोड़ की गई है।

बाहुबलि में शिवा के साथ नंदी नहीं था जबकि मोहनजो दरो में नंदी के रूप में एक लड़के का किरदार रचा गया है, जो श्‍रमन के साथ इस तरह रहता है, जैसे मेलूहा पहुंचने पर शिव के साथ नंदी।

हालांकि, ऋतिक रोशन अपने किरदार में गजब के लगते हैं। ऋतिक रोशन के आगे प्रभास का अभिनय बहुत कमतर है। पूजा हेगड़े की जबरदस्‍त बॉलीवुड एंट्री है। विलेन के रूप में कबीर बेदी और अरुणोदय सिंह मन जीत लेते हैं। फिल्‍म के अन्‍य कलाकार भी बेहतरीन उम्‍दा अभिनय करने में सफल होते हैं।

मेरे हिसाब से आशुतोष गोवरिकर एक साल लेट हो गए, यदि यह फिल्‍म बाहुबलि से पहले आई होती तो रिकॉर्ड तोड़ बिजनेस करती। अब मोहनजो दरो देखते हुए सिर्फ ऐसा महसूस होता है कि केवल किरदार और चेहरे बदले हैं, बाकी तो वैसी ही है, जैसी बाहुबली और बस थोड़ा सा कहानी में फेरबदल है।

हालांकि, फिल्‍म के अंत में एक फकीर मिजाज के जखीरा का मरना और दूसरी तरफ एक लालची करूर महिम का मरना जीवन की वास्‍तविकता को प्रकट करते हैं।

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