उर्दू साहित्य की बहती त्रिवेणी 'रेख़्ता''

अमेरिकी उपन्यासकार, संपादक, और प्रोफेसर टोनी मॉरिसन ने लिखा है कि जो किताब आप पढ़ना चाहते हैं, यदि बाजार में उपलब्ध नहीं है, यदि अभी तक लिखी नहीं गर्इ तो वो किताब आपको लिखनी चाहिए। यह कथन उस समय मेरे सामने सच बनकर आया, जब मैं शायरोशायरी की तलाश में भटकता हुआ रेख़्ता डाॅट ओआरजी पर पहुंचा।

दरअसल, रेख़्ता का जन्म भी कुछ इस तरह हुआ है। रेख़्ता के जनक संजीव सर्राफ, जो पेशे से व्यवसायी हैं, एक हिन्दी दैनिक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में बताते हैं कि उनको उर्दू शायरी पढ़ने का पुराना शौक था, मगर, कुछ शब्द जब उनको समझ नहीं आते थे, तो उनको घुटन महसूस होती थी। दरअसल, यह बहुत सारे लोगों के साथ होता है, लेकिन, जो साहस संजीव सर्राफ ने किया, वो हर कोर्इ नहीं सकता।

उनके इस प्रयास ने न जाने कितने लोगों की समस्या को हल कर दिया। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि रेख़्ता हिन्दी, इंग्लिश (लिप्यंतरण) एवं उर्दू में उपलब्ध है। इस पर गजल, कविता, शेयर, वीडियो, कहानियों सहित न जाने साहित्य कृतियों के कितने ही प्रारूप उपलब्ध हैं। यदि आप उर्दू शेयरोशायरी का शौक रखते हैं। या कभी कभार आपको उर्दू शायरी के शब्द समझ में नहीं आते तो आप बेहिचक इस वेबसाइट पर जा सकते हैं। रेख्ता डाॅट आेआरजी उर्दू साहित्य ही नहीं बल्कि उर्दू इंग्लिश शब्दकोश भी है।

मैं रेख़्ता डाॅट आेरआरजी के लाजवाब प्रयास को देखकर बेहद उत्साहित हुआ। विशेषकर इस बात से कि आज भी लोग हैं, जो लीक से हटकर करने का साहस रखते हैं। इस वेबसाइट पर एक भी विज्ञापन नहीं है, जिसको देखकर हम कह सकें कि यह तो केवल व्यावसायिक दृष्टि से खड़ी की वेबसाइट है। आपको इस वेबसाइट पर लिखित से लेकर वीडियो प्रारूप में उूर्द साहित्य उपलब्ध करवाया जा रहा है। मैं तो रेख़्ता को उर्दू साहित्य की देवनागरी, इंग्लिश एवं उर्दू में बहती त्रिवेणी कहता हूं। रेख़्ता उर्दू बोली का पुराना नाम है। यह भी मुझे इस वेबसाइट से पता चला। आप इस वेबसाइट के दशर्न कर स्वयं तय कर सकते हैं कि यह किस तरह का लाजवाब एवं सराहनीय साहस है।

राहुल गांधी बोल रहे हैं !

मेरी मां मुझे अक्सर कहती थी कि समय पर काम होते हैं आैर बे समय केवल सिर पटकना होता है। आज मां तो नहीं है, लेकिन उनकी कही बात मुझे याद आ रही है, क्योंकि कांग्रेस के उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी आज जगह जगह सिर जो पटक रहे हैं।

मैं साफ कर दूं कि राहुल गांधी की वापसी कांग्रेस के लिए उम्मीदजनक, आशा की किरण, डूबने वाले तिनके का सहारा आदि हो सकती है। मगर, देश के आम नागरिक की नजर में केवल मौकापरस्ती या अवसरवाद है।

इस बात में कोर्इ शक नहीं है कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष वापसी के बाद काफी सक्रिय हो चुके हैं। मगर, इस बात का राष्ट्र के सुनहरे भविष्य से कोर्इ लेन देन नहीं है, क्योंकि अब तक सत्ता उसी परिवार के हाथों में रही है, जिस परिवार के उत्तराधिकारी राहुल गांधी हैं।

गत दिवस फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के नए अध्यक्ष गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ विरोध कर रहे छात्रों के समर्थन में खड़े होते हुए कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ''लोकतांत्रिक रूप से अगर ज्यादातर छात्र यह कहते हैं कि उन्हें वह अध्यक्ष के रूप में स्वीकार नहीं है तो उनको वहां नहीं होना चाहिए।''

मैं सोच रहा हूं कि सच में ये राहुल गांधी बोल रहे हैं, जिनका स्वयं की पार्टी में निरंतर विरोध होता रहा है, जिनको हटाने के लिए पार्टी के भीतर जद्दोजहद चलता रहा है। क्या राहुल गांधी को उस समय लोकतंत्र की परिभाषा नहीं आती थी ? या केवल मौका देखकर शब्दों से खेलना राहुल गांधी ने भी सीख लिया है ?

राहुल गांधी भले ही वापसी के बाद चातुर या शब्दों से खेलने वाले नेता बनकर लौट आए हों, मगर, उनके भीतर एक सशक्त लीडर आज भी कहीं मरा पड़ा है। आप केवल शब्दों की हेरफेर से नेता नहीं बन सकते, नेता का अर्थ अगुआ होता है, जो एक भीड़ का नेतृत्व करता है, जो सामने से आने वाली चुनौतियों को भीड़ से पहले भांपता है, आैर उनसे निबटता है।

पहले संसद के सत्र के दौरान राहुल गांधी लापता हो गए थे। अब वापस लौटते हैं, तो संसद के सत्र की कार्यवाही आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही। इस तरह सदन का अपमान करना किसी भी नेता या पार्टी को शोभा नहीं देता। हालांकि, विपक्ष का हमेशा एेसा ही रवैया रहा है, मगर, अच्छे नेता समय के ढांचों को बदल देते हैं। उम्मीद करता हूं कि राहुल गांधी अपनी पार्टी का नेतृत्व करते हुए संसद के सत्र की कार्यवाही को बहाल करवाएंगे। मौकापरस्ती का समय नहीं, बल्कि एक अच्छा विपक्ष बनने का समय है।