Black Money - काला धन, मोदी सरकार और इंद्र की अप्सराएं

Publish In Swarn AaBha
भारत की जनता को लुभावना किसी बच्चे से अधिक मुश्किल नहीं और यह बात भारतीय नेताओं एवं विज्ञापन कंपनियों से बेहतर कौन जान सकता है। इस बात में संदेह नहीं होना चाहिए कि वर्ष २०१४ में हुए देश के सबसे चर्चित लोक सभा चुनाव लुभावने वायदों एवं मैगा बजट प्रचार के बल पर लड़े गए। इस प्रचार के दौरान खूबसूरत प्रलोभनों का जाल बुना गया, जो समय के साथ साथ खुलता नजर आ रहा है।

देश में सत्ता विरोधी माहौल था। प्रचार के दम पर देश में सरकार विरोधी लहर को बल दिया गया। प्रचार का शोरगुल इतना ऊंचा था कि धीमे आवाज में बोला जाने वाला सत्य केवल खुसर फुसर बनकर रहने लगा। जनता मुंगेरी लाल की तरह सपने देखने लगी एवं विश्वास की नींद गहरी होती चली गई कि अब तर्क की कोई जगह न बची। जो ऊंचे स्वर बार बार दोहराया गया, वो ही सत्य मालूम आने लगा। इस देश की जनता को पैसे की भाषा समझ आती है और विपक्षी पार्टी ने इसी बात को बड़े ऊंचे सुर में दोहराया, जो जनता को पसंद भी आ गया।

नौ जनवरी को यूट्यूब पर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक भाषण को अपलोड किया गया था, जिसमें उन्होंने तत्कालीन सरकार पर धावा बोलते हुए कुछ यूं कहा था, ‘‘ये जो चोर-लुटेरों के पैसे विदेशी बैंकों में जमा हैं न, उतने भी हम एक बार ले आये न, तो हिंदुस्तान के एक-एक गरीब आदमी को मुफ्त में 15-20 लाख रुपये यूं ही मिल जायेंगे। ये इतने रुपये हैं..। सरकार आप चलाते हो और पूछते मोदी को हो कि काला धन कैसे वापस लायें? जिस दिन भाजपा को मौका मिलेगा, एक-एक पाई हिंदुस्तान में वापस आयेगी और इस धन को हिंदुस्तान के गरीबों के काम में लगाया जायेगा।’’

मगर हैरानी उस दिन हुई जब २ नवंबर २०१४ रविवार को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आकाशवाणी प्रसारण पर जनता से दूसरी बार रूबरू होते हुए 'मन की बात' प्रोग्राम में कहा, ''कालाधन कितना है, इसके बारे में न मुझे मालूम है, न सरकार को मालूम है, किसी को पता नहीं है। पिछली सरकार को भी इसकी जानकारी नहीं थी। मैं आंकड़ों में नहीं उलझना चाहता कि यह एक रूपया है, लाख है, करोड़ है या अरब रुपए है। बस कालाधन वापस आना चाहिए।''

उम्मीद तो यह थी कि सत्ता पाने के बाद चुनावी सभा में सुनने वाला स्वर पहले से अधिक प्रगाढ़ होगा, लेकिन मिला उम्मीद के विपरीत। सरकार में आते ही नरेंद्र मोदी के तेवरों में नरमी नजर आने लगी। समय बीतने लगा, जनता का ध्यान दूसरे मामलों की तरफ खींचने की कोशिश की जाने लगी। 'स्वच्छ भारत अभियान' उसकी कड़ी का एक हिस्सा है। मगर सरकार को समझना होगा कि काला धन, महंगाई एवं बाहरी सुरक्षा जैसे मुद्दों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। काले धन पर तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि सत्ता तक पहुंचाने में इस मुद्दे का बहुत बड़ा योगदान है।

राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ मीडिया कर्मी पुण्य प्रसून वाजपेयी के अनुसार आज से 25 बरस पहले पहली बार वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले के कमीशन का पैसा स्वीस बैंक में जमा होने का जिक्र अपनी हर चुनावी रैली में किया था। इस काले धन के अश्वमेघ पर सवार होकर वीपी पीएम बन गए, मगर बोफोर्स घोटाले का एक भी पैसा स्वीस बैंक से भारत नहीं आया। सबसे हैरानीजनक बात तो यह है कि इस अश्वमेघ घोड़े पर सवार होकर गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश की सत्ता तक पहुंच गए। मगर अब उनकी सरकार का रवैया भी पुरानी संप्रग सरकार से अधिक अच्छा नहीं है। देश से काला धन बाहर भेजने वालों की सूची को सार्वजनिक न करने के लिए विदेशों के साथ संधि का हवाला दिया जाता है, जो केवल एक बहाना है। देश हित की बात करने वाली सरकार देश विरोधी तत्वों का नाम उजागर करने से पैर पीछे क्यों खींचती है ? इस मामले में यूटर्न क्यूं लेती है ?

जनता को काले धन का अर्थ केवल इतना समझ आता है कि घोटालों से की कमाई को विदेशों में छुपाना होता है। मगर काला धन केवल विदेशों में हो यह कहना भी उचित नहीं, देश के अंदर भी काला धन बहुत है। काला धन वो पैसा है, जो आप ने अज्ञात स्रोत से प्राप्त किया है एवं उसके सामने आप ने सरकार को कर प्रदान नहीं किया। देश के बड़े बड़े घराने अरबों का कर चोरी करते हैं, जिसको अन्य स्रोतों के जरिए पुनः अपने कारोबार विस्तार में लगाते हैं, ताकि उनका कारोबार निरंतर प्रफुल्लित हो।

एक नौकरीपेशा व्यक्ति लगभग अपने सभी कर अदा करता है, क्योंकि उसके पास कानूनविद नहीं हैं, और उसके पास इतना धन भी नहीं होता, जिसको बचाने के लिए वो किसी कानूनविद को तैनात करे। पिछले दिनों एक वकील से मुलाकात हुई, वकील के अनुसार एक बिजनसमैन अपने ग्रुप के अंतर्गत बहुत सारी कंपनियां बनाता है एवं उनमें कर्मचारियों की संख्या उन नियमों को ध्यान में रखकर करता है, जो उसको सरकारी कर अदा करने से बचाते हैं। इस तरह उसकी आमदनी में इजाफा होता है, मगर यह एक तरह से कर चोरी करने का तरीका है एवं चोरी करने वाला एक तरीके से काला धन एकत्र करता है, जिसको वो किसी बैंक में जमा नहीं करता, बल्कि किसी अन्य स्रोत के जरिये पुनः अपने कारोबार में निवेश करवाता है।

यदि देश की सरकार काले धन के खिलाफ असल रूप में काम करना चाहती है तो उसको देश के कारोबारियों के खिलाफ लोहा लेना होगा, जो कोई भी राजनीतिक पार्टी लेने से डरेगी। वर्ष २०१४ के लोक सभा चुनावों का शोर विदेशों तक में सुनाई दिया। प्रचार प्रसार पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए। सवाल उठता है कि आखिर प्रचार प्रसार के लिए इतना पैसा आया कहां से ? राजनीतिक पार्टियों को चंदा कहां से आता है ? इसके पीछे कौन सी लॉबी काम करती है ? अभी चुनाव कमिशन ने राजनीतिक पार्टियों को अपना चंदा सार्वजनिक करने को कहा था तो सभी विरोधी पार्टियां एक सुर में हो गई एवं चुनाव आयोग को अपना आदेश वापिस लेने के लिए कहने लगी। आखिर डर किसी बात से लगता है ? कहीं चुनाव प्रचार में लगने वाला धन काला तो नहीं ? क्योंकि ईमानदारों के पास तो जरूरतें पूरी करने के लिए पैसा नहीं, राजनीतिक पार्टियों का पेट भरने के लिए कहां से होगा ? राजनेता एक तरह से बेरोजगार एवं वालंटियर होते हैं, मगर जैसे ही नेताओं को सत्ता मिलती है तो उनके कच्चे मकान आलीशान महलों में तबदील हो जाते हैं ? यदि इस पैसे का हिसाब मांगा जाए तो शायद देश को उसका काला धन मिल सकता है ? एवं स्विस की बैंक में पड़ा काला धन, वैसा ही है,  जैसी इंद्र की अप्सराएं, जो किसी ने देखी नहीं, लेकिन उन अप्सराओं के साथ गृहस्थ जीवन भोगने के लिए लोग अपना वास्तविक गृहस्थ तक त्याग देते हैं। भारतीय जनता को उस बच्चे की भांति नहीं होना चाहिए, तो चांद को पाने की कामना करता है, उसको वास्तविकता को समझना चाहिए। काला धन देश के भीतर ही इतना घूम रहा है, यदि उसको सही व्यवस्था बनाकर रोक दिया जाए तो देश का भला हो सकता है। देश की सरकारों ने कर लगाए, लेकिन उससे बचने के लिए कुछ कानूनविद पैदा कर दिए। देश के सरकारी ही नहीं बल्कि प्राइवेट संस्थानों में निष्पक्षता के साथ सोशिल ओडिट होनी चाहिए। हिसाब किताब में पारदार्शिता होनी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो शायद काला धन ढ़ूंढ़ने के लिए देश की जनता को स्विस बैंक की तरफ देखने की जरूरत न पड़े। मगर इस तरह का संभव होना मुश्किल है, क्योंकि कारोबारी परिवारों ने राजनीतिक पार्टियों को बड़े स्तर पर हाइजैक कर लिया है। यह कारण है कि चुनावी रैलियों में हुंकार भरने वाले नेता भी सत्ता में आने के बाद नरम होने लग जाते हैं।

मुझे लगता है कि काला धन किसी बैंक में नहीं मिलेगा, चाहे वो भारतीय बैंक हो या स्विस बैंक क्योंकि जिसको पैसे से पैसा बनाने की लत लग जाए, वो बैंक के मामूली ब्याज से पैसे को नहीं बढ़ाएगा, बल्कि वो अपने कारोबार में उसको निवेश कर कर दुगुना करता रहेगा। देश में बाहर से निवेश होने वाले पैसे पर भी सरकार को पैनी निगाह रखनी होगी, कहीं यह भारत में हुए घोटालों का पैसा ही तो भारत में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा तो निवेश नहीं किया जा रहा है। भारत में यदि विदेशी कंपनी भी निवेश करती है तो उसके पैसे के स्रोत की पूरी जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए।

ध्यान रहे कि बैंकों का लेन देन तो आज नहीं तो कल ट्रेस हो सकता है, मगर दो नंबर का पैसा हमेशा बिना हिसाब किताब के गुप्त रास्तों से सीमाएं पार करता है।

रॉबर्ट वाड्रा के लिए कांग्रेस मीडिया को नसीहत क्यों देती है ?



रॉबर्ट वाड्रा न कांग्रेसी है और न मनमोहन सरकार के दौरान किसी मंत्री पद पर रहा। हां, रॉबर्ट वाड्रा सोनिया गांधी का दामाद है, जो अब पूरा विश्व जानने लगा है, लेकिन जब भी रॉबर्ट वाड्रा पर उंगली उठती है तो कांग्रेसी क्यों सफाई देने लगते हैं। उसको इस तरह बचाने लगते हैं, जैसे रॉबर्ट वाड्रा सोनिया गांधी का नहीं, बल्कि कांग्रेस का दामाद है।

जब मीडिया ने रॉबर्ट वाड्रा को घेरा तो रविवार को कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला और दिग्विजय सिंह ने वाड्रा का बचाव करते नजर आए। सुरजेवाला ने कहा कि रॉबर्ट वाड्रा न तो किसी सार्वजनिक पद पर हैं, न किसी राजनीतिक दल के पदाधिकारी हैं। ऐसे में उनकी निजता का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को निजी समारोहों में अप्रिय सवालों को बार-बार पूछने से बचना चाहिए।

कितनी अजीब बात है कि मीडिया को नसीहत देते हुए रणदीप सुरजेवाला स्वयं भूल गए कि रॉबर्ट वाड्रा सोनिया गांधी के दामाद है, न कि कांग्रेस के, यदि याद है तो ऐसा बयान देना बिल्कुल उचित नहीं है। मीडिया को नसीहत उस समय देनी चाहिए, जब आप स्वयं नियम का पालन करते हों।

एक अन्य बात मीडिया को एक बात समझनी चाहिए कि पत्रकारिता की गरिमा बनाए रखने के लिए संयम, समझ एवं अच्छी सोच का होना जरूरी है। वाड्रा पर आरोप हैं, जो अभी सिद्घ नहीं हुए, इस माहौल में आप हर जगह एक सवाल पर स्पष्टीकरण लेते अच्छे नहीं लगते हैं।