News Nation - नमो लहर — यूपी में बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता हाशिए पर

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की कथित लहर पर सवार पार्टी के प्रत्याशियों को अब उत्तर प्रदेश के कभी दिग्गज रहे वरिष्ठ नेताओं की जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया और मैनेजमेंट के सहारे ही उन्हें अपनी नैया पार होती दिख रही है। आलम यह है कि यूपी भाजपा के कई बड़े नेता हाशिए पर डाल दिए गए हैं या फिर वे खुद नाराज होकर नेपथ्य में चले गए हैं।

कभी भाजपा के दिग्गजों में गिने जाने वाले उत्तर प्रदेश के ये नेता क्या कर रहे हैं, खुद भाजपा कार्यकताओं को ही नहीं पता है। भारतीय जनता पार्टी में कभी यूपी के नेताओं की तूती बोलती थी। एक लंबी श्रृंखला थी मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र, विनय कटियार, केसरी नाथ त्रिपाठी, ओम प्रकाश सिंह, सुरजीत सिंह डंग, सत्यदेव सिंह, हृदय नारायण दीक्षित, सूर्य प्रताप शाही समेत कई ऐसे नाम हैं जिनका सहयोग लेने से भाजपाई कतरा रहे हैं।

सूत्र बताते हैं कि भाजपा नेतृत्व ने इन्हें हाशिए पर डाल दिया तो अब प्रत्याशी भी इनमें से ज्यादातर लोगों के कार्यक्रमों की मांग नहीं कर रहे हैं। बनारस से कानपुर जाने के लिए मजबूर किए गए दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी की स्थिति खराब है। भाजपा के तीन शीर्ष नेताओं में शामिल जोशी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का उदय पचा नहीं पा रहे हैं। अब वह कानपुर में ही उलझे हुए हैं। सूत्र बता रहे हैं कि उनका कार्यक्रम कोई भी प्रत्याशी नहीं चाह रहा है। उसे डर है कि पता नहीं क्या बोल जाएं और बनी बनाई हवा का रुख मुड़ जाए।

कलराज मिश्र यूपी के बड़े नेता हैं। यूपी का कोना-कोना छानने वाले और कार्यकताओं को नाम से जानने वाले कलराज देवरिया तक सिमट कर रह गए हैं। देवरिया से बाहर निकल नहीं पा रहे हैं। बजरंगी नाम से प्रसिद्ध विनय कटियार अब किनारे हो गए हैं। लल्लू सिंह से शीतयुद्ध में ऊर्जा खत्म करने और लगातार तीन चुनाव हारने के बाद अब कोई प्रत्याशी उनके कार्यक्रम की मांग नहीं कर रहा है। पार्टी लगभग जबरिया उनका कार्यक्रम लगा रही है।

पटेल की प्रतिमा के लौह संग्रहण अभियान में लगाए गए ओम प्रकाश सिंह को अभियान को सफलतापूर्वक पूरा नहीं कर पाने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। गठबंधन में उनके पुत्र अनुराग सिंह की दावेदारी वाली मिर्जापुर सीट एक विधायक वाली पार्टी अपना दल के खाते में चली गई। अनुराग ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया और ओम प्रकाश सिंह नेपथ्य में चले गए। वैसे खबर यह भी है कि उनके कार्यक्रमों की मांग न के बराबर है। सीट न मिलने से नाराज केसरी नाथ त्रिपाठी भी कोप भवन में जा चुके हैं।

हृदय नारायण दीक्षित जैसे वरिष्ठ नेता को भी पार्टी ने राजनाथ सिंह को जिताने की जिम्मेदारी देकर बांध रखा है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही नाराज हैं। सपा में जाने की खबरें आई थीं, लेकिन मामला बन नहीं पाने की वजह से पार्टी के भीतर ही घुटन महसूस कर रहे हैं। प्रदेश में उनकी सक्रियता शून्य है। सत्यदेव सिंह एवं सुरजीत सिंह डंग जैसे नेता कहां हैं, किसी को खबर नहीं है।

बीजेपी उम्मीदवारों में भी सबसे अधिक मांग मोदी की है। उसके बाद राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, उमा भारती और लक्ष्मीकांत वाजपेयी की। वरुण गांधी जैसा युवा और तेजतर्रार नेता भी यूपी की बजाय केवल अपने चुनाव क्षेत्र तक सिमटे हुए हैं। योगी आदित्यनाथ का इस्तेमाल भी गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों तक हो रहा है। भाजपा को अब नेताओं की नहीं, लहर का ही आसरा है।

आईएएनएस की रिपोर्ट

Short Story - बाबूजी की बात, और नत्‍थासिंह

नत्‍था सिंह बहुत भोला - भाला इंसान था। जब खेतों के किनारे लगे पेड़ों पर फूल आने वाले होते तो वो उनके पेड़ों के आस पास भंवरों की तरह मंडराने लगता, फूल आते ही उदास होकर घर लौट जाता। अब भी पेड़ों पर फूल आने वाले थे, और नत्‍था सिंह भी। नत्‍था सिंह आया - बाबू जी ने उससे पूछा, जब फूल आने वाले होते हैं तो तुम यहां खुशी खुशी आते हो, लेकिन फूल आने के बाद तुम उदास होकर यहां से निकल जाते हो।

नत्‍था सिंह ने कहा, मैं गुलाबी फूल लेने के लिए यहां आता हूं, लेकिन आपके पेड़ हर मौसम में पीले रंग के फूल देने लगते हैं। तो बाबूजी कहते हैं कि अरे पगले, हमने बबूल के पेड़ उगाएं हैं, तो बबूल के फूल ही आएंगे, गुलाब के कैसे आ सकते हैं। गुलाब के फूलों के लिए गुलाब का पौधा लगाना पड़ता है।

नत्‍थे को बात समझ आई या नहीं, लेकिन मुझे एक बात समझ जरूर आ रही थी। बाबूजी कह रहे थे कि अगर बबूल का पेड़ लगाएंगे तो बबूल के फूल आएंगे, और अगर गुलाब का पौधा है तो गुलाब के फूल। शायद इसका संबंध कहीं न कहीं हमारे विचारों की खेती से भी है। हम अपने भीतर जो पेड़ पौधे लगाते हैं, शायद शब्‍दों में - अपने व्‍यवहार में - उसी पौधे के फूलों को खिलते हुए देखते हैं।

Fiction - टिकट टू पाकिस्‍तान

सुबह सुबह का समय था, सूर्य निकलने में देर थी, चिड़ियां की चीं चीं सुनाई दे रही थी। देव अफीमची खुशी के मारे नाच रहा था। द्वारकी हैरान थी, आखिर आज देव अफीमची बिना चीखे चिल्‍लाए। बिना हाय बू किए। बिना काली नागिन यानि अफीम खाए कैसे उठ गया। भीतर की महिला ने द्वाकी को बेचैन कर दिया, आखिर ऐसा क्‍या हुआ कि देव अफीमची, सुबह सुबह वो भी सू्र्य निकलने से पहले बिस्‍तर से खड़ा हो गया। द्वाकी मन ही मन में सोचने लगी, जब तक पता नहीं चलेगा, तब तक किसी काम में मन नहीं लगेगा।

आज ऐसा लग रहा था, जैसे देव अफीमची को अल्‍लादीन का चिराग मिल गया, और उसकी मनोकामना पूर्ण होगी। आज देव अफीमची द्वाकी को अपने पुराने दिनों की याद दिला रहा था, जब देव अफीमची युवा था, जब दोनों की नयी नयी शादी हुई थी। देव अफीमची, दूसरे नौजवानों की तरह सुबह सुबह इस तरह बड़े शौक से खेतों की तरफ निकलता था।

आज देव अफीमची को, अपनी जवानी की दलहीज लांघे हुए साठ साल हो चले हैं। इस उम्र में जवानी वाला जोश तो भगवान को भी चिंता में डाल दे, यहां तो फिर भी द्वाकी के रूप में एक महिला थी। बिना पूछे कैसे रह सकती थी, लेकिन सीधे सीेधे तो पूछना भी न आता था, कोई तो बात चलानी पड़नी थी।

अपनी स्‍टीक के सहारे चलते हुए द्वाकी देव अफीमची के करीब पहुंची। जो एक बैग में कपड़े भर रहा था। आस पास कुछ चीजें बिखरी हुयी थी। उन चीजों को द्वाकी ने पहले कभी नहीं देखा था, भले ही इस घर में आए हुए द्वाकी को साठ साल से अधिक का समय हो चुका था। भले ही इस मकान को घर बनाने में द्वाकी ने अपने जीवन का एक एक पल लगाया, लेकिन उस बैग के आस पास बिखरी हुयी चीजें द्वाकी ने कभी नहीं देखी थी। अब उसके मन में एक नहीं, बहुत सारे अनजाने सवाल जन्‍म लेने लगे।.......... जारी है

Standpoint - 'हिंदु परिषद' के आगे 'विश्व' क्यूं ?


आप सोच रहे होंगे। यह अटपटा सवाल क्यूं ? बिल्कुल मुझे भी 'विश्व' अटपटा लगता है, जब मैं इस संस्थान के प्रमुख के बयानों को सुनता हूं। देखता हूं या कहीं पढ़ता हूं।

बड़ी अजीब बात है कि आप भारत को एक कट्टर देश बनाने की सोच रखते हैं, लेकिन शब्द विश्व जैसा इस्तेमाल करते हैं। अगर आप भारत को सीमित रखना चाहते हैं, तो सच में 'विश्व' जैसा शब्द एक देश की ऐसी संस्था को शोभा नहीं देता।

यह शब्द वैसा ही है, जैसा दक्षिण भारत की एक राजनीतिक पार्टी indian christian secular party में 'सेकुल्यर'शब्द है। अगर सेकुल्यर हो तो क्रिचियन शब्द क्यूं ? वैसे ही अगर विश्व हिन्दु परिषद भारत को हिन्दु राष्ट्र बनाना चाहती है तो राष्ट्र शब्द स्टीक हो सकता है, लेकिन विश्व शब्द नहीं क्यूंकि राष्ट्र को विश्व की संज्ञा नहीं दी जा सकती।

31 मार्च 2013 को 'हिंदु संगम' समारोह का आयोजन हुआ। इस समारोह में विश्व हिंदु परिषद के प्रमुख प्रवीण तोगड़िया ने कहा था, ''2015 के बाद गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित कर दिया जाएगा, क्यूंकि 18000 गांवों में विहिप की मौजूदगी हो जाएगी।''

एक अन्य ख़बर भी आई थी, जिसमें उन्होंने कहा था, अगर मैं ​देश का प्रधानमंत्री बना तो मुस्लिम समुदाय से मतदान का अधिकार छीन लूंगा। मुझे लगता है​ कि इस देश में लोकतंत्र का वो आखिर दिन होगा क्यूंकि उस दिन भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक व्यवस्था वाला देश न रह जाएगा। शायद भारत में उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी छीन जाएगी। जिसकी लाठी, उसकी भैंस की कहावत जैसी व्यवस्था बचेगी।

एक ताजे घटनाक्रम के अनुसार भावनगर में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने चुनावी मौसम में मुसलमानों को निशाना बनाया है। तोगड़िया ने मुसलमानों को चेतावनी देते हुए कहा है कि वे हिंदू बहुल इलाकों से घर खाली करें। गुजरात के भावनगर में तोगड़िया ने शनिवार रात को विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर एक मुस्लिम बिजनेसमैन के घर के बाहर हंगामा भी किया। इस मुस्लिम बिजनेसमैन ने हिंदू बहुल क्षेत्र में हाल ही में घर खरीदा है। वीएचपी और बजरंग दल ऐसे सौदों का विरोध कर रहे हैं। तोगड़िया ने मुस्लिम बिजनेसमैन को 48 घंटों के भीतर खाली करने की धमकी दी और कहा यदि ऐसा नहीं किया गया तो उनके दफ्तर पर पत्थर, टायर और टमाटरों से हमला किया जाएगा। तोगड़िया ने हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं से कहा कि वे इस घर को अपने कब्जे में ले लें और इस पर बजरंग दल का बोर्ड टांग दें।

यह घटनाक्रम गुजरात का है। जहां मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो बीजेपी की तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार हैं, जो मुस्लिम समुदाय को साथ लेकर चलने का भरोसा दिला रहे हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों हाथों में अब लड्डू कैसे रखेंगे, जैसे वो रैलियों में कहते आए हैं। आरएसएस व विहिप की नजदीकियां किसी से छुपी नहीं, और आरएसएस का ही एक चेहरा बीजेपी है। 2015 तक गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित करने का ऐलान भी अहमदाबाद शहर में हुआ। शायद इस मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री को अपना स्टेंड क्लीयर करना चाहिए।

नफरत की आंधी में भारत ने हमेशा अपना गौरव खोया है। नफरत से पैदा हुए दंगों में मरने वाले चाहे हिन्दु हो, चाहे मस्लिम, लेकिन छवि देश की खराब होती है। भारत को पाकिस्तान न बनाएं। देश को विकास की जरूरत है। किसी भी धर्म के विनाश की नहीं।
प्रवीण तोगड़िया, तुम आधुनिक भारत के लिए कलंक हो। खुलेआम धमकियों और भड़काऊ टिप्पणियों को वापस लेने के लिए हम तुम्हें 48 घंटे का वक्त दे रहे हैं। 21 अप्रैल 2014

Standpoint - इंटरव्यू या बेआबरू होने का नया तरीका

आज सुबह सुबह कंप्यूटर चलाया। राज ठाकरे के साथ अर्णब गोस्वामी का इंटरव्यू देखने के लिए, लेकिन बदकिस्मती देखिए, मैं आईबीएन ख़बर की वेबसाइट पर पहुंच गया, जहां सीएनएन आईबीएन के चीफ इन एडिटर राजदीप सरदेसाई राज ठाकरे का इंटरव्यू ले रहे थे।

इंटरव्यू देखते वक्त ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि राज ठाकरे राजदीप सरदेसाई की क्लास लगा रहे हों। एक चैनल के चीफ इन एडिटर को बता रहे थे, इंटरव्यू और इंट्रोगेशन में कितना अंतर होता है।

बोलने को भौंकना जैसे शब्दों से संबोधित किया गया। इंटरव्यू में किस मुद्रा में बैठा जाता है। इंटरव्यू कर रहे हैं तो पीछे हटकर बैठें। आपको अर्णब गोस्वामी नहीं बनना है। इंटरव्यू में आवाज उंच्ची नहीं होती। इंटरव्यू चल रहा है, राजदीप सरदेसाई स्वयं को रोके हुए हैं।

राज ठाकरे अनाप शनाप बोले जा रहे हैं। सवाल तो यह है कि इस तरह का बदतमीजी पर इंटरव्यू करना चाहिए ? अगर इस इंटरव्यू को दिखाया गया तो क्यूं ? इसके पीछे की मजबूरी क्या ? क्या राज ठाकरे का इंटरव्यू इतना महत्वपूर्ण है कि चीफ इन एडिटर जैसे पद पर बैठा व्यक्ति अपनी इज्जत को दांव पर लगाए। कहीं इज्जत की ध​ज्जियां उड़ाने का हमने नया तरीका तो नहीं खोज लिया।

आज राज ठाकरे ने किया। कल कोई और करेगा। इज्जत मालिकों की नहीं, पत्रकारिता की खत्म हो रही है। सोचने की जरूरत है। मीडिया जिस तरह अपनी गरिमा को खत्म कर रहा है, ऐसा लग रहा है कि भारत में अब पत्रकार कम, और पीआर एजेंट ज्यादा होंगे।

फेसबुक पर अब बता सकेंगे दोस्तों को लोकेशन

न्यूयार्क। युवाओं में सर्वाधिक प्रचलित सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए जल्द ही आप अपने फेसबुक मित्रों से अपनी वास्तविक भौगोलिक स्थिति भी शेयर कर सकेंगे। फेसबुक एक नया फीचर शुरू करने जा रही है, जिसकी मदद से आप जान सकेंगे कि आपका कौन सा मित्र फेसबुक पर आपसे कौन सी जगह से जुड़ा हुआ है।

इसके लिए आपको 'नीयरबाई फ्रेंड्स' नाम से शुरू किए गए नए फीचर को ऑन करना होगा। लेकिन आपको यह भी जरूर जानना चाह रहे होंगे कि आखिर यह फीचर काम कैसे करेगा। वास्तव में यह फीचर आपके मित्र के मोबाइल फोन के जीपीएस प्रणाली का उपयोग कर आपको उसकी वास्तविक स्थिति की जानकारी देगा।

इस फीचर का उपयोग कर लेकिन आप एक घंटे तक ही अपनी उपस्थिति की जगह से अपने मित्रों को अवगत करा सकेंगे। एक घंटे बाद आप इस जगह में परिवर्तन कर सकेंगे।

फेसबुक हालांकि इस फीचर को शुरुआत में सिर्फ अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए ही शुरू करेगा। इस नए फीचर की घोषणा करते हुए कंपनी ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्ताओं को 'नीयरबाई फ्रेंड्स' फीचर का लाभ नहीं दिया जाएगा। इसके अलावा उपयोगकर्ता अपनी लोकेशन से अवगत कराने के लिए अपने मित्रों की सूची सीमित कर सकते हैं।

आमिर खान पर उंगली उठाने वाले कहां हैं ?

सत्यमेव जयते में आमिर खान महिलायों के साथ होने वाले अत्याचार की बात उठा रहा था तो एक विरोधी खेमा उनके निजी जीवन पर सवाल उठा रहा था, लेकिन आज वो खेमा कहां चला गया, कहां जाकर सो गया, जब नरेंद्र मोदी ने 12 साल बाद शादी की बात को स्वीकार किया।

आमिर खान ने तो कानूनी दायरे में रहकर दूसरी शादी की, पहली से तलाक लिया, लेकिन इस महाशय ने तो शादी भी नहीं निभाई और तलाक भी नहीं लिया। एक बात और कह देता हूं, दुहाई मत देना बाल विवाह था, शादी 19 साल की उम्र में हुई थी, मोदी व उनकी पत्नि तीन महीने साथ रहे थे, तीन साल के दौरान।

हल्फनामे में पत्नि की संपत्ति वाले कॉलम को खाली छोड़ा जानकारी नहीं लिखकर कितना उचित है। अगर सब यही करने लगे तो संपत्ति का ब्यौरा कौन देना चाहेगा। चुनाव आयोग चुप है हैरानी इस बात पर भी होगी। अगर वो कॉलम अनिवार्य नहीं तो उसको निकाल देना चाहिए।

आप कह सकते हैं यह नरेंद्र मोदी की निजी मामला है, लेकिन हल्फनामा किसी का निजी नहीं होता, वहां नियम देखे जाते हैं। अगर आप हल्फनामा गलत करते हैं तो देश आप पर यकीन कैसे करेगा कि आप कभी अपने फायदे के लिए गलत जानकारी नहीं देंगे।

वैसे लगता है कि आजकल मोदी एक रिकॉर्ड बनाने की होड़ में हैं। झूठ बोलने का रिकॉर्ड। मोदी का 56 इंच का सीना तो सब को याद है, लेकिन सत्य तो है कि मोदी का 44 इंच का सीना है, बाकी तो केवल उनकी लहर है। मोदी की लहर भी ऐसी है कि उनको अख़बार के फ्रंट पेज से लेकर अंदर तक के पेज अपने विज्ञापन के लिए खरीदने पड़ रहे हैं।

मेरी दुआ है।
अब की बार, मिले जशोदाबेन को प्यार
दिग्विजय सिंह हैं बधाई के हकदार


चलते चलते

नरेंद्र मोदी के शादी खुलासे के बाद भारतीय महिलाएं सतर्क हो चुकी हैं, सुनने में आया है कि उन्‍होंने फेसबुक के मालिक को पत्र लिख भेजा है कि वो भी भारतीय चुनाव आयोग की तरह थोड़े से सख्‍त नियम बनाएं। उधर, सूत्रों का कहना है कि फेसबुक के मालिक परेशान हैं, भारतीय राजनीति में तो एक आध हो सकता है, लेकिन हमारे यहां तो हर दूसरा भारतीय नरेंद्र मोदी है।

पहले ही खुलासा कर देते पांच सौ करोड़ तो बच जाते

व्हाट्सऐप पर मिलेगी वॉयस कॉलिंग सेवा

व्हाट्सऐप इस्तेमाल करने वालों के लिए खुशखबरी. अब उन्हें वहां वॉयस कॉलिंग की भी सुविधा मिलेगी. कंपनी ने फरवरी में इसकी घोषणा की थी. अब इस पर काम लगभग पूरा हो चुका है और कंपनी इसे जल्द शुरू कर देगी.

व्हाट्सऐप मोबाइल मैसेजिंग में अग्रणी है. इसे हर महीने 46 करोड़ से भी ज्यादा लोग इस्तेमाल करते हैं. फेसबुक ने हाल ही में इसका अधिग्रहण कर लिया है. कंपनी यह सुविधा शीघ्र शुरू करने जा रही है, यह बात इससे पता चली कि कंपनी ने हिंदी अनुवाद का काम शुरू कर दिया है. इस पर काम करने वाले लोगों से कंपनी ने फिर से अनुवाद का आग्रह किया है. ये वाक्य वॉयस कॉलिंग फीचर व्हाट्सऐप में इस्तेमाल होंगे.

पता चला है कि हैंगअप, इनकमिंग कॉल जैसे शब्दों के अनुवाद कराए गए हैं. यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि डेवलपर सबसे आखिर में अनुवाद का काम करवाते हैं. यानी जब सारा काम खत्म हो जाता है तो ही डेवलपर अनुवाद का काम करवाते हैं. इसका मतलब साफ है कि वॉयस कॉलिंग फीचर जल्द ही चालू होगा.

व्हाट्सऐप के सीईओ जैन कूम ने मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस मं घोषणा की थी कि वॉयस कॉलिंग सुविधा पहले एंड्रॉयड और आईओएस में मिलेगी और फिर विंडोज तथा ब्लैकबेरी में. इसके पहले एक इतालवी ब्लॉग में आईओएस के लिए व्हाट्सऐप के स्क्रीनशॉट्स लीक हो गए थे. इसमें हिंदी में लिखे शब्द साफ दिख रहे हैं. फेसबुक ने हाल ही में अपनी मैसेंजर सेवा में वॉयस कॉलिंग को भी शामिल किया है, लेकिन अभी यह एंड्रॉयड के लिए ही है.

ट्विटर ने बदला अपना फेसलुक, बनने लगा फेसबुक

माइक्रो ब्लॉगिंग सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर अब नए रंग-रूप में दिखने वाला है. जल्द ही इसका लुक फेसबुक की तरह होने जा रहा है.  साइट के ब्लॉग में लिखा गया है कि इस नए बदलाव के साथ ट्विटर के यूजर्स अब खूद को ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकेंगे.

क्या होगा नया
- अब ट्वीट वाला हिस्सा ज्यादा बड़ा दिखेगा जिससे आप ज्यादा बहेतर ढंग से लोगों के सामने रह पाएंगे.
- अब आप अपने किसी खास ट्वीट को पिन कर सकते हैं (जैसे फेसबुक में हाईलाइट करते हैं अपने पोस्ट को) ताकि अपनी खास बात अपने चाहने वालों तक पहुंचा सकें
-सबसे खास बात अब आपको अपने ट्विटर अकाउंट में फिल्टर का ऑपशन मिलेगा जिससे आप न चाहने वाले ट्वीट को आसानी से फिल्टर कर पाएंगे
- फेसबुक की तरह यूजर्स अब इसमें भी कवर फोटो लगा सकते हैं.

इसके साथ अब प्रोफाइल पिक्चर भी काफी बड़े साइज में आपको दिखेगी. हालांकि इसके लिखने में जो शब्दों की पाबंदी है उसमें फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है और न ही ये बदलाव अभी मोबाईल यूजर्स को मिल पाएगा.

कल ट्विटर के इस खास बदलाव को कुछ लोगों तक सीमित किया गया था लेकिन अब जल्द ही सबके लिए उपल्बध होगा. अमेरिका की पहली महिला साइट(फर्स्ट लेडी) पर इस बदलाव को देखा जा सकता है.

बैंड—बाजा, बारात और 'आप' की टोपी

वाराणसी में निकली आप की टोपी पहने बारात की ख़बर।
हिसार (हरियाणा) चुनाव की खुमारी अब सिर चढ़कर बोलने लगी है। राजनीतिक पार्टियों के समर्थक अपने-अपने दल के लिए प्रचार का कोई तरीका नहीं छोड़ रहे हैं। इसी कड़ी में हरियाणा में जिला सिरसा के गांव सलारपुर के एक युवक ने भी आम आदमी पार्टी के प्रचार-प्रसार के लिए अनोखा तरीका अपनाया।

आम आदमी पार्टी के इस पक्के समर्थक मुकेश धंजु ने अपनी शादी में सेहरा तो पहना, मगर उस पर टोपी पहनी 'आप' की। उसने बारात में शामिल होने वाले दोस्तों-रिश्तेदारों को भी 'आप' की टोपी पहनने का आग्रह किया। दूल्हे के आग्रह को कोई ठुकरा नहीं पाया। दूल्हे की बहनों और महिला बारातियों ने भी सिर पर टोपी पहनकर बारात में शिरकत की। गांव सलारपुर से 'आप' की टोपी पहने मुकेश धंजू की बारात ऐलनाबाद पहुंची।

दुल्हे मुकेश ने बताया कि मैं हमेशा से ही भ्रष्टाचार विरोधी विचारधारा का रहा हूं। मैं 'आप' के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की नीतियों से प्रभावित रहा हूं। इसी से प्रभावित होकर और प्रेरणा लेकर मैं शुरू से ही केजरीवाल के साथ जुड़ा हुआ हूं और उनके आंदोलनों में बढ़चढ़ कर भाग लेता रहा हूं। जहां भी मुझे मौका मिलता है, भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने से मैं नहीं चूकता।

अब चुनावी माहौल में सोमवार को जब मेरी शादी हुई, तो मैंने इसे भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने और सिरसा से 'आप' प्रत्याशी का चुनाव प्रचार करने का यह अनूठा तरीका सूझा और मेरे परिवारवालों और मित्रों ने भी इसमें उसका पूरा सहयोग किया।

दूल्हे के दोस्त प्रदीप सचदेवा ने बताया कि मुकेश आम आदमी पार्टी के आंदोलन को देश के नवनिर्माण का सच्चा आंदोलन मानते हैं, इसलिए इन पलों को यादगार बनाने के लिए ही उसने यह कदम उठाया। दूल्हे के दोस्त और पार्टी के डॉक्टर कुलदीप, पंकज कामरा, प्रदीप सचदेवा और मंगल सिंह ने अपनी ओर से मुकेश के उज्जवल वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए उसे शुभ कामनाएं दीं।

स्रोत : नवभारत टाइम्स डॉट कॉम

अरविंद केजरीवाल से नाराज श्री श्री! क्यूं ?

फेसबुक पर आजकल एक ख़बर को बड़े जोर शोर से शेयर किया जा रहा है, जिसमें अरविंद केजरीवाल की बुराई करते हुए नजर आते हैं पूजनीय श्री श्री रविशंकर जी।

अब नाराजगी का कारण बता देता हूं। मैं लम्बे समय से इस संस्थान के टच में हूं, अपरोक्ष रूप से। नरेंद्र मोदी व श्री श्री में बहुत निकटता है, जो 2012 के विधान सभा चुनावों से निरंतर जारी है।

पिछले महीने मोदी की किताब 'साक्षी भाव' को रिलीज भी श्री श्री ने किया। उसी शाम को अहमदाबाद में भोज भी रखा गया, जहां अपने भक्तों से कहा गया, लक्ष्मी कमल पर वास करती है, ध्यान रहे।

बात यहां कहां खत्म होती है, मथुरा से चुनाव मैदान में हेमा मालिनी हैं, जो गुरू की अनुयायी हैं, उनके घर अ​द्वितीय का उद्घाटन भी श्री श्री ने अपने कर कमलों से किया।

दिल्ली पूर्व चुनाव लड़ने वाले बीजेपी के उम्मीदवार महेश गिरि कौन हैं ? बता देता हूं, 16 साल की उम्र में घर छोड़कर हिमालय निकल गए। कुछ समय बाद गीर में आकर रहने लगे एवं गुरु दत्तात्रेय पीठ ​गीर के पीठ प्रमुख बने। यहां 2002 में वो श्री श्री के सन्निध्य में पहुंच गए। अध्यात्म से दिल भर गया तो राजनीति की तरफ चहल कदम शुरू कर दी।

अब चुनाव श्री श्री के शिष्य मैदान में हों, मोदी की तरफ से भोज उपलब्ध करवाया गया हो, तो लाजमी है कि नरेंद्र मोदी का राह रोकने वाला, उनको ​रास्ते से भटक गया लगेगा। हालांकि अरविंद केजरीवाल ने श्री श्री की प्रतिक्रिया को उस तरह लिया, जैसे श्री श्री अपनी सत्संग में कहते हैं। साक्षी भाव, स्वीकार करें।





लेकिन स्वयं श्री श्री साक्षी भाव का अ​र्थ क्यूं भूलते जा रहे हैं। वहां तो कोई तारंग नहीं होती, जो हो रहा होता है, वह होता है। वहां तो मौन की गूंज होती है। लेकिन राजनीति में अपने शिष्य उतारकर श्री श्री अब राजनीति में प्रवेश कर चुके हैं।

राम मंदिर के बहाने, यूं ही कुछ चलते चलते

राममंदिर, इसको अगर थोड़ा सा तोड़कर पढ़ा जाए तो शायद इसका अर्थ कुछ ऐसा होगा। राम+ मन+ अंदर। राम तो कण कण में बसता है, उसको कहां जरूरत है किस एक जगह बंधकर बैठने की।

राम मंदिर की बात करने वाले अगर अपने राम को खुश देखना चाहते हैं तो उसकी प्रजा को पेट भर भोजन दें। इंटरनेट नहीं, बिजली सुविधा दें। उनके गलों को तर करें, उनके खेतों तक पानी पहुंचाने पर माथा पच्‍ची करें। इंटरनेट तो आ ही जाएगा, जब पैसे आएंगे। वैसे भी फेसबुक वाला फ्री में नेट देने के लिए कोशिश कर रहा है, वो कामयाब हो जाएगा। आपको जरूरत नहीं। 

भावनगर जाते समय मैंने बहुत खूबसूरत मंदिर देखे, मुझे लगता है कि जितना पैसा गुजरात में मंदिर निर्माण पर खर्च होता है, उतना किसी अन्‍य जगह पर नहीं होता। वहां पर अभी तीन से चार मंदिरों का निर्माण जारी था, जो जल्‍द बनकर तैयार होंगे।

गुजरात में स्‍वामिनारायण भगवान के मंदिर, जैनों के मंदिर, अलग अलग कुल देवियों के मंदिर। शायद ही कोई ऐसा मार्ग हो जहां आपको मंदिर न मिले। मंदिर तो स्‍वयं लोग बना देंगे, जैसा आपने कल्‍पना भी नहीं की, लेकिन पहले उनकी पेट की भूख को तो खत्‍म कर दें। पहले उनको चांद तो चांद नजर आने दें। चांद में उनको महबूब, मामा तो दिखने दें।

हम ईसाईयों पर आरोप लगाते हैं उन्‍होंने हिन्‍दुओं को पैसे देकर धर्म परिवर्तन कर दिया। पैसे आज जरूरत हैं, जिसको नकारा नहीं जा सकता, मौत से बेहतर व्‍यक्‍ति किसी धर्म की छांव में बैठना चाहेगा, अगर कुछ दिन बदले में जीना मिलता हो।

मोदी के सबसे बड़े करीबी बनकर उभरे डॉक्‍टर सुब्रमण्‍य स्‍वामी कहते हैं कि हम को कोई एतराज नहीं, मुस्‍लिम इस देश में रहें, वो हिन्‍दु को स्‍वीकार लें, क्‍यूंकि उनके वंशज हिन्‍दु थे, लेकिन सवाल यह है कि धर्म स्‍वीकार लेने से क्‍या फर्क पड़ता है, अगर भीतर न बदला जा सका।

गजनबी के जब हमले होते थे, कुछ कमजोर दिल वाले अपनी जान बचाने के लिए धर्म कबूलते होंगे। बदले में उनकी जान बची होगी। धीरे धीरे उनका वो ही धर्म हो गया और उसको मानने लगे।

जैसे आज कल नरेंद्र मोदी की हवाओं को देखते हुए कुछ कांग्रेस बीजेपी में आ गए, तो वो बीजेपी के हो गए। अगर कल को कांग्रेस वाले कहें, उनको कांग्रेस का धर्म ही कबूलना चाहिए, क्‍यूंकि उनकी पैदाइश कांग्रेस से हुई है तो, नहीं नहीं अब दुहाई होगी धर्म व राजनीति दोनों में फर्क है।

आप अपने मंदिरों व धर्म को इतना उदार बना दीजिए कि लोगों के कदम खुद ब खुद आपके मंदिरों की तरफ चल पड़ें। मैंने बहुत सारे अंग्रेजों को हिन्‍दु चोले पहनते देखा है, वो खुशी से पहनते हैं। उनको आनंद आता है। उनके चेहरों पर अद्भुत आनंद होता है। उनको लगता है कि उनके जीवन मेंं कुछ महत्‍वपूर्ण घटा है।

लेकिन कुछ कट्टर हिन्‍दु घटाने की कोशिश करना चाहते हैं, घटना और घटाने में अंतर है। जबरदस्‍ती बलात्‍कार हो सकता है, प्‍यार नहीं। प्‍यार के लिए शरीर के भीतर की आत्‍मा को जीतना पड़ता है।

अगर भीतर उतर गए, तो बाहरी चोले से अधिक अंतर नहीं पड़ता। मगर देश का दुर्भाग्‍य है कि आज के अध्‍यात्‍म गुरू अपने राह से भटक चुके हैं। श्री गुरू नानक देव जी एक गांव में गए, उन्‍होंने गरीब लालो के घर का खाना खाया, लेकिन अमीर मालिक भागो का खाना वापिस कर दिया। गुरूजी ने कहा कि मालिक तुम्‍हारा खाना मेहनत के तैयार नहीं हुआ, बेईमानी, गरीबों के खून पसीने से लथपथ है।

मगर आज हमारे धर्म गुरू भारत में शराब बेचने वाले, नंगे कलेंडर बेचने वाले, देश का धन लुटाने वाले नेतायों के रहमोकर्म पर अधिक पलते हैं। उनके हवाई जहाजों में घूमते हैं। अध्‍यात्‍म का गिरता स्‍तर हिन्‍दुस्‍तान के लिए घातक है, न कि किसी ढांचे का गिरना।

राम मंदिर, राम तो मन के अंदर है। उसके द्वार खो दें, सब ठीक हो जाएगा। गजनबी क्‍या लेकर गया यहां से, क्‍या सिकंदर लेकर गया। सिकंदर को भारत में न घुसने देने वाले पोरस को कौन याद करता है, भारत में, क्‍यूंकि वो पाकिस्‍तान में छूट गया।

नरफत पाकिस्‍तान के खिलाफ कट्टर पंथियों के खिलाफ होनी चाहिए। आवाज में गद्दारों का नाम होना चाहिए, पूरे समुदाय का नहीं। आज मंदिर मजिस्‍द चर्चों के बीच की लड़ाई से ऊपर उठकर उन युवायों के हितों के बारे में सोचना होगा, जो नेतायों से बहुत कदम आगे हैं। जो विदेशी जीवन जीने की ललक रखते हैं, जिनको हम ने विदेशी सिनेमे के जरिए वहां के रहन सहन से तो रूबरू करवाया दिया, लेकिन वैसा कुछ भारत में बना न सके, बनाते हैं तो भारत के परंपरागत ढांचे को चोट पहुंचती है।

बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर Cobra Post का खुलासा

आम चुनाव के शुरू होने से ठीक पहले 'कोबरा पोस्ट' द्वारा बाबरी मस्जिद से जुड़ा एक नया स्टिंग ऑपरेशन सामने लाया गया है। कोबरा पोस्ट के स्टिंग के सामने आने के बाद से राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है। इस स्टिंग में दिखाया गया है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस योजना पहले से बनाई गई थी। इसकी जानकारी बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं थी। बीजेपी इस स्टिंग औऱ इसके जारी करने की टाइमिंग का खुलकर विरोध कर रही है। वहीं विरोधी पार्टियों का कहना है कि इस स्टिंग में कुछ नया नहीं है।


ऑपरेशन जन्मभूमि:- कोबरपोस्ट उस षड्यंत्र की तह मे जाता है और उन लोगों से मिलता है जो दिसंबर 1992 मे हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के पीछे थे और यह पाता है की यह एक पूर्वनियोजित साजिश थी ।
कोबरपोस्ट राम जन्मभूमि आंदोलन के उन नेताओं को बेनकाब करता है जिन्होंने षड्यंत्र रच कर 6 दिसंबर 1992 को सोलहवी शताब्दी के एक विवादित ढांचे को धूल मे मिलाने मे सफलता प्राप्त की ।एक ऐसी साजिश जिसे इतने साल बीत जाने के बाद भी सी बी आई जैसी खुफिया एजेंसी भी ना सुलझा पायी।

नयी दिल्ली: अपने एक बड़े इन्वैस्टिगेशन मे कोबरपोस्ट ने 6 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पीछे की साजिश और इस साजिश को अंजाम देने वाले लोगों को बेनकाब किया है। ऑपरेशन  जन्मभूमि मे की गयी इस तहकीकात की दौरान इस षड्यंत्र मे शामिल लोगों ने कोबरपोस्ट के सामने परत दर परत विध्वंस की योजना का खुलासा किया है। कोबरपोस्ट के खुलासे से यह बात साबित हो जाती है की बाबरी विध्वंस किसी उन्मादी भीड़ का काम नहीं था बल्कि यह एक सोची समझी रड़नीति के तहत की गयी कार्रवाई थी। इसकी योजना इतनी गुप्त रखी गयी थी की आज तक किसी भी सरकारी एजन्सि को इसकी कोई भनकी नहीं लग पायी है। बतौर मिसाल वर्षों की छानबीन के बावजूद सी बी आई को उन सभी चालीस लोगों के खिलाफ अकाट्य प्रमाण नहीं मिल पाये हैं जिन्हे उसने अपनी चार्ज शीट मे अभियुक्त करार दिया है।

कोबरपोस्ट के एसोशिएट एडिटर के॰ आशीष ने राम जन्म भूमि आंदोलन मे अगली पांत के नेता रहे 23 लोगों से मुलाक़ात की। ये सभी लोग बाबरी मस्जिद के विध्वंस मे शामिल रहे हैं। इनकी भूमिका या तो साजिशकर्ता के रूप मे थी या उस साजिश को अमली जामा पहनाने मे इनकी भूमिका थी। आशीष ने इन लोगों से एक लेखक के रूप मे मुलाक़ात की जो इनसे अयोध्या आंदोलन पर अपनी प्रस्तावित पुस्तक के बारे मे जानकारी चाहता था। आशीष ने बजरंग दल, वीएचपी और बीजेपी के चंपत राय बंसल, रामजी गुप्ता, प्रकाश शर्मा, रमेश प्रताप सिंह, विनय कटियार, जयभान सिंह पवेया, धर्मेंद्र सिंह गुर्जर, बी एल शर्मा प्रेम, ब्रिज भूषण शरण सिंह, साध्वी उमा भारती, कल्याण सिंह और लल्लू सिंह से बातचीत की। उसके बाद शिवसेना के जय भगवान गोयल, पवन पांडे, संतोष दुबे, सतीश प्रधान और मोरेश्वर सावे से बातचीत की और फिर हिंदु संत समाज के स्वामी सचिदानंद साक्षी महाराज, महंत राम विलास वेदांती, साध्वी रितमबरा, महंत अवैद्यनाथ, आचार्य धर्मेंद्र और स्वामी नृत्य गोपाल दास से बात की।
इनमे से 15 लोगों को लिब्रहान आयोग ने दोषी ठहराया है तो वहीं सी बी आई ने इनमे से 19 लोगों को अपनी चार्जशीट मे आरोपी बनाया है।  हैरानी की बात यह है की सीबीआई ने बी एल शर्मा, महंत अवैद्यानाथ, महंत नृत्य गोपाल दास और महंत राम विलास वेदांती जैसे महत्वपूर्ण किरदारों को अपनी जांच और चार्ज शीट का हिस्सा नहीं बनाया है। कुल मिला कर बाबरी विध्वंस के मामले मे 40 लोगों पर सीबीआई कोर्ट मे मुकदमा चल रहा है, जिनमे से 32 लोगों को एफ आई आर नंबर 92/197 मे साजिश को अंजाम देने वाले लोगों के रूप मे शुमार किया है। बचे 8 लोगों को एफ आई आर नंबर 92/198 साजिश कर्ता के रूप मे आरोपी बनाया गया है।

अपनी तहकीकात के दौरान आशीष ऑपरेशन जन्मभूमि के इन मुख्य किरदारों से मुलाक़ात करने के लिए उत्तर प्रदेश के  अयोध्या, फैजाबाद, टांडा, लखनऊ, गोरखपुर, मथुरा और मुरादाबाद, राजस्थान के जयपुर, महाराष्ट्र के औरंगाबाद और मुंबई, और मध्य प्रदेश के ग्वालियर जैसे शहरों मे गए। इत्तेफाक से इस गुप्त योजना को ऑपरेशन जन्मभूमि का नाम इन्ही षड्यंत्रकारियों से मिला था कोबरपोस्ट ने अपने इस खुलासे के लिए इस नाम को अपना लिया।

कोबरपोस्ट की तहकीकात मे जो बातें उभर कर सामने आई हैं उनमे से कुछ इस प्रकार हैं:-


•बाबरी विध्वंस का षड्यंत्र दो उग्र हिंदुवादी संगठनो विश्व हिन्दू परिषद और शिव सेना ने अलग अलग रचा था।
•इन दोनों संगठनो ने 6 दिसंबर से काफी समय पहले अपनी कार्ययोजना के तहत अपने कार्यकर्ताओं को इस मकसद के लिए प्रशिक्षण दिया था।
•आरएसएस के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का एक आत्मघाती दस्ता भी बनाया गया था जिसको बलिदानी जत्था भी कहा गया।
•विहिप की युवा इकाई बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने गुजरात के सरखेज मे इस मकसद के लिए एक महीने का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया था। दूसरी ओर शिवसेना ने भी अपने कार्यकर्ताओं के लिए ऐसा ही एक प्रशिक्षण कैंप भिंड मोरेना मे आयोजित किया था।
•इस प्रशिक्षण मे लोगों को पहाड़ियों पर चड्ने और खुदाई करने का प्रशिक्षण देने के साथ साथ शारीरिक व्यायाम भी कराया जाता था।
•6 दिसंबर को विवादित ढांचे को तोड़ने के मकसद से छैनी, घन, गैंती, फावडा, सब्बल और दूसरी तरह के औजारों को ख़ासी तादाद मे जुटा लिया गया था।
•6 दिसंबर को ही लाखो कारसेवकों को एक संकल्प भी कराया गया था। इस संकल्प मे विवादित ढांचे को गिरा कर उसकी जगह एक भव्य राम मंदिर बनाने की बात कही गयी थी। राम कथा मंच से संचालित इस संकल्प मे आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, गिरि राज किशोर और आचार्य धर्मेंद्र सहित कई जाने माने नेता और संत लोग थे। यह संकल्प महंत राम विलास वेदांती ने कराया था। कहा जाता है की संकल्प के होते ही बाबरी मस्जिद को तोड़ने का काम शुरू कर दिया गया था।
•विहिप के नेताओं ने बाबरी विध्वंस के मकसद से कुछ दिन पहले अलग अलग अंचलों के 1200 संघ कार्यकर्ताओं को मिला कर एक सेना का गठन किया था। इस गुप्त सेना का नाम लक्ष्मण सेना था। इस सेना को सभी सामान उपलब्ध कराने और दिशानिर्देश का जिम्मा राम जी गुप्ता को सौपा गया था। इस सेना का नारा जय शेशावतार था।
•दूसरी ओर शिवसेना ने भी इसी तर्ज पर अयोध्या मे अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं की एक सेना बना रखी थी। इसका नाम प्रताप सेना था। इसी सेना ने शिवसेना के बाबरी मस्जिद विध्वंस के अभियान को जरूरी सामान और सहायता उपलब्ध कराई थी।
•आरएसएस, विहिप और बजरंग दल के नेताओं ने विध्वंस से एक दिन पहले अयोध्या के हिन्दू धाम मैं एक गुप्त मीटिंग की थी। इस मीटिंग मे अशोक सिंघल, विनय कटियार, विष्णु हरी डालमिया, मोरो पंत पिंगले और महंत अवैध्यनाथ ने शिरकत की थी। इसी बैठक मे दूसरे दिन होने वाली कारसेवा के दौरान बाबरी मस्जिद को गिराने का फैसला किया गया था।
•आरएसएस और बीजेपी ने भी एक गुप्त बैठक हनुमान बाग मे की थी। इस मीटिंग मे आरएसएस के एच वी शेषाद्री समेत उस समय अयोध्या मे मौजूद विनय कटियार, उमा भारती और एल के आडवाणी जैसे नेताओं ने भाग लिया था।
•इधर शिवसेना ने बाबरी विध्वंस से एक महीने पहले दिल्ली के नॉर्थ एवेन्यू मे एक गुप्त बैठक की थी। इस बैठक मे जय भगवान गोयल, मोरेश्वर सावे, आनन्द दिघे समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सेदारी की थी। इस बैठक मे अयोध्या कूच से पहले पूरी रणनीति तय की गयी थी। बाला साहब ठाकरे और राज ठाकरे दोनों इन सारी गतिविधियों के दौरान इन नेताओं से संपर्क मे थे।
•अगर पारंपरिक तरीके कामयाब नहीं हो पाते तो शिवसेना ने बाबरी मस्जिद को डायनमाईट से उड़ाने का फैसला भी किया था।
•पारंपरिक औजारों के अलावा बजरंग दल की बिहार की टोली ने बाबरी को गिराने के लिए पेट्रोल बमो का भी इस्तेमाल किया था।
•स्थानीय प्रशासन ने अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी निभाने के बजाय उन्मादित कार सेवकों को बाबरी ढांचे को ध्वस्त करने के लिए उकसाया और इस काम मे उनकी मदद भी करी। जैसे पी ए सी के जवानो को ये कहते सुना गया की इस “सरदर्द” को हमेशा के लिए खत्म कर दो।
•बाबरी विध्वंस के बाद वहाँ से कई पुरातन महत्व की चीजों को चुपचाप निकाल लिया गया। जैसे शिवसेना के नेता पवन पांडे के पास 1528 के शिलालेख के दो टुकड़े मौजूद हैं, जिसमे मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद के निर्माण की घोषणा की थी। पवन पांडे अब इन दो टुकड़ों को बेचना चाहते हैं।

लक्ष्मण सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राम जी गुप्ता का कहना है कि उनकी सेना को एक स्पष्ट  निर्देश दिया गया था की जैसे ही वो तीन बार जय शेशावतार का नारा लगाएंगे उस सेना के सभी लोग कारसेवकों की भीड़ का फायदा उठा कर बाबरी पर हमला बोल देंगे। इसके बाद अगर कोई भी नेता उनसे रुकने के लिए कहता है तो वो नहीं रुकेंगे जब तक की बाबरी का काम तमाम ना हो जाए।
कोबरपोस्ट की पड़ताल मे दो महत्वपूर्ण किरदारों का नाम भी उभर कर आया है जिन्होने बाबरी विध्वंस मे अपने तरीके से भूमिका निभाई। इनमे से एक कल्याण सिंह हैं जो बाबरी विध्वंस के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। कोबरपोस्ट को कम से कम दो महत्वपूर्ण नेताओं ने ये खुलासा किया है कि कल्याण सिंह को अयोध्या मे चल रहे हर घटनाक्रम की जानकारी थी। वो अच्छी तरह से जानते थे की दिसंबर 6 को क्या होगा। महंत राम विलास वेदांती के अनुसार उन्हे दिसंबर 5 की रात को ही दो टूक शब्दों मे बता दिया गया था कि ढांचा तोड़ दिया जाएगा। वेदांती कहते हैं “पाँच दिसंबर की रात को ही कल्याण सिंह के पास समाचार भेज दिया गया था और उसमे ये कहा गया था की यदि आवश्यकता पड़ती है तो ढांचा भी तोड़ दिया जाएगा आपको क्या भूमिका निर्वाह करनी है विचार कर लीजिए।“ सिर्फ यही नहीं साक्षी महाराज का भी दावा है की वो कल्याण सिंह को अयोध्या मे चल रहे घटनाक्रम की मिनट दर मिनट जानकारी दे रहे थे। इसके बावजूद भी कल्याण सिंह ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।


ऐसा कहा जाता है कि कल्याण सिंह दिसंबर 6 की सुबह अपना त्यागपत्र देने पर आमादा हो गए थे लेकिन उन्हे अयोध्या से मुरली मनोहर जोशी और शेषाद्री ने तब तक इस्तीफा ना देने के लिए माना लिया जब तक कि कारसेवक बाबरी ढांचे को ज़मींदोज़ ना कर दे। इन नेताओं को ये डर था कि अगर मुख्यमंत्री ने समय से पहले इस्तीफा दे दिया तो उत्तर प्रदेश मे तत्काल राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाएगा और तत्काल सेना बुला ली जाएगी तो ऐसे मे भारी संख्या मे कारसेवक मारे जाते।

बाबरी विध्वंस मे तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव का हाथ होने की बार बार आशंका जताई जाती रही है। कोबरपोस्ट की पड़ताल मे यह आशंका सही साबित हुई है। विनय कटियार, बी एल शर्मा, संतोष दुबे, साक्षी महाराज और महंत राम विलास वेदांती जैसे राम जन्म भूमि आंदोलन के शीर्ष नेता बड़ी बेबाकी से नरसिंह राव की भूमिका को स्वीकारते हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए दो बार द्रढ़ प्रयास हुआ था। एक 1990 मे और दूसरा 1992 मे पहली कोशिश पुलिस की कार्रवाही के कारण कामयाब नहीं हो पायी। पुलिस की कार्रवाई मे कई कारसेवकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। मगर साक्षी महाराज उन कारसेवकों की मौत के लिए आंदोलन के कुछ नेताओं को दोषी ठहराते हैं जो आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कारसेवकों की बलि देना चाहते थे। साक्षी महाराज कारसेवकों की मौत के लिए अशोक सिंघल को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं “तो मेरे सामने अशोक सिंघल जी ने कहा महाराज कुछ लोग नहीं मरेंगे तो आंदोलन ऊपर नहीं उठेगा तो आप आज्ञा दो जाने की तो अशोक सिंघल जी ने कहा ... वामदेव जी ने कहा बच्चे मरेंगे तो बहुत काम खराब हो जाएगा ...बोले महाराज जब तक नहीं मरेंगे तब तक कुछ होगा नहीं आंदोलन तभी बढ़ेगा।”

साक्षी की तरह साध्वी उमा भारती विनय कटियार को कोठारी बंधुओं की मौत के लिए जिम्मेदार मानती है। 30 अक्टूबर 1990 के घटनाक्रम को याद करते हुए उमा भारती कहती हैं, “जो लोग मरे थे वो विनय की गलती से .... गलती भी नहीं वो भगदड़ मची वो गली छोटी थी ...गलती मतलब वो भाग गया छोड़कर भाग गया।”

इस तरह के आरोप अयोध्या षड्यंत्र को एक नया आयाम देते हैं और इस आंदोलन के शीर्ष नेताओं की नियत को लेकर सवाल खड़े करते हैं। क्या वाकई वे युवा कारसेवकों की अपने निहित राजनैतिक स्वार्थों की बेदी पर बलि चढ़ाना चाहते थे।

इसी तरह बजरंग दल के एक और अग्रणी नेता धर्मेंद्र सिंह गुर्जर आंदोलन के पूरे नेत्रत्व की नियत पर सवाल खड़े करते हैं, “ये सब बेवकूफ बनाने वाली बातें हैं इसीलिए तो हमारा देश बेवकूफ बनता आ रहा है ... पहले हम जवानी की जोश मे थे ... जुनून मे थे एक जुनून था गुजर गया ... लोगों ने उपयोग किया और छोड़ दिया यूज करके।”

हिन्दुत्व और उसके नेत्रत्व का यह निर्मम चेहरा कोबरपोस्ट रिपोर्टर की एक और मुलाक़ात मे उभर कर आता है। इस मुलाक़ात के दौरान रिपोर्टर ने महंत अवैध्यनाथ को विनोद वत्स जैसे उत्साही कारसेवक के बलिदान की याद दिलाई। विनोद वत्स के बूढ़े माता पिता बदहाली का जीवन जी रहें हैं। महंत अवैध्यनाथ का जो कहना था वो वाकई शर्मनाक है, “सब को मरना है तुमको भी है मुझे भी मरना है मृत्य को कौन रोक सकता है।“ उसके बूढ़े निराश्रय माँ बाप के लिए महंत अवैध्य नाथ का भी यही दर्शन है, “वो भी मरेंगे उनको भी मरना है।”

कोबरपोस्ट की पड़ताल एक और सच्चाई को फिर से स्थापित करती है कि इस झगड़े की बुनियाद मे 1949 की एक घटना है जब रामलला की मूर्ति को गुपचुप तरीके से बाबरी मस्जिद मे स्थापित कर दिया गया था। इस घटना के चश्मदीद गवाह कोई और नहीं बल्कि रामजन्म भूमि आंदोलन मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बी एल शर्मा प्रेम हैं। शर्मा का कहना है कहना है कि वो तब अयोध्या मे मिलिट्री पुलिस मे एक वारंट आफिसर के रूप मे तैनात थे। यह सब उनकी आँखों के सामने हुआ। तब अयोध्या के पुजारी रामचंद्र दास उनकी यूनिट मे बराबर आया जाया करते थे एक दिन राम चन्द्र दास ने उन्हे बताया कि रामलला अमुक दिन ऐसे प्रकट होंगे। तो वहाँ अपने साथियों को लेकर आना। शर्मा के अनुसार रामलला का प्रकट होना कोई दैवीय चमत्कार नहीं था। उनका कहना है, “अरे जी काहे के प्रकट होने वाले... प्रकट किया है ... वो तो महाराज का काम था न रामचंद्र परमहंस।“ राम जन्म भूमि आंदोलन इसी झूठ की बुनियाद पर खड़ा किया गया था। (प्रैस विज्ञप्ति)