Publicly Letter : गृहमंत्री ​सुशील कुमार शिंदे के नाम

नमस्कार, सुशील कुमार शिंदे। खुश होने की जरूरत नहीं। इसमें कोई भावना नहीं है, यह तो खाली संवाद शुरू करने का तरीका है, खासकर आप जैसे अनेतायों के लिए। नेता की परिभाषा भी आपको बतानी पड़ेगी, क्यूंकि जिसको सोशल एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया के शब्दिक ​अ​र्थ न पता हों, उसको अनेता शब्द भी समझ में आना थोड़ा सा क​ठिन लगता है। नेता का इंग्लिश अर्थ लीडर होता है, जो लीड करता है। हम उसको अगुआ भी कहते हैं, मतलब जो सबसे आगे हो, उसके पीछे पूरी भीड़ चलती है।
 
अब आप के बयान पर आते हैं, जिसमें आप ने कहा कुचल देंगे। इसके आगे सोशल मीडिया आए या इलेक्ट्रोनिक मीडिया। कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्यूंकि कुचल देंगे तानाशाही का प्रतीक है या किसी को डराने का। आपके समकालीन अनेता सलमान खुर्शीद ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नंपुसक कहा, क्यूंकि वो दंगों के दौरान शायद कथित तौर पर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाए, लेकिन जब मुम्बई पर हमला हुआ था, तब आपके कुचल देंगे वाले शब्द किस शब्दकोश में पड़े धूल चाट रहे थे, तब कहां थे सलमान खुर्शीद जो आज नरेंद्र मोदी को नपुंसक कह रहे हैं।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया को तो शायद आप पैसे खरीद लें, क्यूंकि उसको पूंजीपति चलाते हैं, जो विज्ञापन के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया को कुचलना आपके हाथ में नहीं, क्यूंकि इसको खरीदना आपके बस की बात नहीं। सोशल मीडिया का शब्दिक अर्थ भी समझा देता हूं, लोगों का मंच। जो लोग सरकार बनाने की हिम्मत रखते हैं, उनको कुचलना आपके लिए उतना ही मुश्किल है, जितना घोड़े का घास के साथ दोस्ताना बनाए रखना।

आपके बयान बदलने से एक बात तो पता चलती है कि आप थोथी धमकियां देते हैं। वरना, अपने बयान पर अटल रहते, और मीडिया को कुचल देते, आज तक आप गूगल व फेसबुक से जानकारियां हासिल नहीं कर पाए, कुचलने की बात करते हैं। क्या किसी की अ​भिव्यक्ति को दबाना असैवंधानिक नहीं ? आपको इलेक्ट्रोनिक मीडिया व सोशल मीडिया का अंतर पता नहीं, तो संवैधानिक व गैर संवैधानिक का अंत क्या खाक पता चलेगा।

आजकल मोदी जी ने खूब अपना पुराना धंधा पकड़ा हुआ है। अपने पुराने दिनों को याद कर रहे हैं, इससे शायद उनको चुनावी फायदा मिल जाए, लेकिन अगर आप ने गृहमंत्री होकर कांस्टेबल वाली हरकतें न छोड़ी तो कांग्रेस को भाजपा वाले कुचल देंगे। और सलमान खुर्शीद को अच्छे से उनके बयान का अर्थ भी समझा देंगे।

जय रामजी की। इसका अर्थ बात शुरू करना भी होता है और संवाद बंद करना भी। जहां लिखा है, वहां इसका अर्थ संवाद बंद करना है। फिर से जय रामजी की। 

एक वोटर के सवाल एक पीएम प्रत्याशी से

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश की सत्ता संभालने के लिए आतुर हैं, राजनेता हैं आतुर होना स्वभाविक है, जीवन में प्रगति किसे पसंद नहीं, खासकर तब जब बात देश के सर्वोच्च पदों में से किसी एक पर बैठने की। एक राजनेता के रूप में मेरी शुभइच्छाएं आपके साथ हैं, लेकिन अगर आप स्वयं को स्वच्छ घोषित करते हैं, देश को एक सूत्र में पिरोने की बात करते हैं, स्वयं को दूसरी राजनीतिक पार्टियों के नेतायों से अलग खड़ा करने की कोशिश करते हैं तो एक वोटर के रूप में आप से कुछ सवाल पूछ सकता हूं, सार्वजनिक इसलिए पूछ रहा हूं क्यूंकि वोटर सार्वजनिक है, हालांकि वो वोट आज भी गुप्त रूप में करता है।

पहली बात, आप अपना पूरा दांव युवा पीढ़ी पर खेल रहे हैं। जिनको अभी अभी वोट करने का अधिकार मिला है, या कुछेक को कुछ साल पहले। जहां तक मुझे याद है यह अधिकार दिलाने में कांग्रेस के युवा व स्वर्गीय प्रधान मंत्री राजीव गांधी का बड़ा रोल रहा है, युवा इसलिए, उनकी सोच एक युवा की थी, जो कुछ करना चाहता था, देश के युवायों के लिए। दूसरी बात, मैं जो सवाल आप से सार्वजनिक रूप में पूछने जा रहा हूं, यह भी उस महान व्यक्तित्व की सोच से मुहैया हुए यंत्रों के कारण।

पहला सवाल। मैं आपको वोट किस लिए करूं। व्यक्तिगत ईमानदार होने के चलते तो वो मौजूदा प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह भी हैं। लेकिन आपके निशाने पर निरंतर मनमोहन सिंह रहें हैं, यकीनन मैं आपको व्यक्तिगत ईमानदार होने के लिए तो वोट नहीं कर सकता है, क्यूंकि आपके समूह में भी येदिरप्पा जैसे महान लोग हैं, जो कभी पार्टी से बाहर होते हैं तो कभी पार्टी के अंदर। क्या आप व्यक्तिगत रूप में जिम्मेदारियों का निर्बाह करेंगे, अगर आपकी पार्टी का कोई भी नेता भ्रष्टाचार में सम्मिलित हुआ तो आप अपने पद से उसी वक्त त्याग पत्र देंगे?

दूसरा सवाल, आपके चेहरे का नकाब ओढ़कर भाजपा जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। हर कोई चढ़ते सूर्य को सलाम करता है, इसमें बुरी बात नहीं, लेकिन भाजपा जब कहती है कि गुजरात में गोधरा दंगों के बाद पिछले एक दशक में कोई दंगा नहीं हुआ, यह नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धि है, लेकिन पिछले तीस सालों में देश के अंदर सिख दंगे भी नहीं हुए, जिसमें कांग्रेस की भागीदारी रही हो। मेरा सवाल तो यह है कि क्या आप सत्ता में आने के बाद दंगा पीड़ितों के साथ न्याय कर पाएंगे चाहे वो गोधरा के हों या चाहे दिल्ली के?

तीसरा साल। कांग्रेस आरटीआई, आरटीई, खाद्य सुरक्षा, या यूनिक कार्ड जैसी कुछ पारदर्शिता लाने वाली भी लेकर लाई, चलो आपके कहने अनुसार कांग्रेस ने यह कदम उठाकर भी कुछ अच्छा नहीं किया होगा, लेकिन अब सवाल आपके दस सालों का है, मैं इसलिए तो आपको मुबारकबाद दूंगा कि गुजरात में आपके आने के बाद कभी राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हुआ, लेकिन क्या आप चुनावों के दौरान कांग्रेस की कमियां गिनाने की बात छोड़कर अपने दस सालों का तैयार विकास मॉडल पेश करेंगे, अपने मंच से? आपके आंकड़े तो पता नहीं कौन प्रदान करता है, लेकिन मैंने कुछ आंकड़े जुटाएं हैं, जिनको आप चुनौती दे सकते हैं, जब आपकी सरकार 2002 में आई तो आपके पास 127 सीटें थी, लेकिन 2007 में आपके पास 117 सीटें रहीं, अबकी बार आपके पास 116 सीटें। अगर विकास का ग्राफ बढ़ा है, तो सीटों में गिरावट क्यूं ?

चौथा सवाल। मैंने आपकी रैलियों को निरंतर सुना। सुनना भी चाहिए था, आ​ख़िर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार जो हैं, लेकिन आप हर राज्य में रैली करते हुए, उनकी भाषा में उतर जाते हैं, ताकि उनके दिलों में जगह बनाई जाए, कभी कभी भूल जाते हैं कि शायद कुछ बातों का आपकी राजनीति पार्टी से कोई लेन देन नहीं। मुझे याद है कि आप ने हिमाचल में कहा, जब यहां का बेटा जागता है तो पूरा भारत सोता है, शायद सीमा पर खड़े भारत के कोने कोने से नौजवान आपके इस बयान से आहत हुए होंगे, नहीं हुए तो मैं जानना चाहूंगा कि चुनावी लाभ के लिए कुछ भी कह देना जरूरी है?

तेलंगाना बिल पास बंद कमरे में, कुछ ​िट़्वटर पर चर्चा​






देश में बदलाव के लिए कुछ तरीके

देश के पढ़ लिख रहे युवायों को सरकारी कार्यालय में पार्ट टाइम जॉब्स देनी चाहिए। अच्छे काम वालों को पढ़ाई खत्म होने पर पक्का किया जाए, अगर उनकी इच्छा हो तो।

देश में युवायों को एक ही क्षेत्र में एक साथ दाखिले लेने पर प्रतिबंध हो। उनको अलग अलग कार्य क्षेत्र चुनने के लिए करियर गाइंड्स प्रदान की जाए।

गांवों के आस पास ग्रामीण उद्योगों की स्थापना की जाए। कृषि के साथ साथ किसान या उनके युवा बच्चे इनमें अपनी इच्छा अनुसार अंशकालिक रूप में काम करें। देश में स्वदेशी चीजों के चलन पर जोर देने के लिए, सरकार को स्वयं प्रचार का जिम्मा उठाना चाहिए।

देश के अंदर सरकारी कामों के लिए कोल सेंटर बनाने चाहिए, ताकि हर सरकारी काम की जानकारी तुरंत मिल सके, हर सरकारी काम ओनलाइन होना चाहिए, अगर मोबाइल फोन, बैंकिंग जैसी पेचीदा चीजों की जानकारी पल में मिलती है तो सरकारी​ विभागों के कामों की क्यूं नहीं हो सकती।

सरकारी कामों के लिए विंडो सिस्टम जरूरी है। विंडो सिस्टम पर फाइलों की पूरी जांच पड़ताल हो, अधिकारी केवल खानापूर्ति के लिए साइन करें। एजेंटों को यहां से दूर रखा जाए, जिस अधिकारी का संपर्क एजेंट से पाया जाए, उसको अच्छे रूप में जुर्माना किया जाए, ताकि दूसरे संपर्क साधने से पूर्व सोचें। देश में बेरोजगार बहुत हैं, उनको चेकिंग के लिए रखा जा सकता है। चेकिंग मामले में बदलाव जरूरी है, हर दिन, वो ही व्यक्ति​ नहीं जाएगा।

राजनीतिक पार्टियां यूं क्यूं नहीं करती

हर राजनीति देश के विकास का नारा ठोक रही है। सब कहते हैं, हमारे बिना देश का विकास नहीं हो सकता, सच में मैं भी यही मानता हूं, आपके बिना देश का विकास नहीं हो सकता, लेकिन एकल चलने से भी तो देश का विकास नहीं हो सकता, जो देश के विकास के लिए एक पथ पर नहीं, चल सकते, वो देश को विकास की बातें तो न कहें। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश को एकता का नारा देते हैं, लेकिन खड़े एकल हैं, जहां जाते हैं, वहां की सरकार की खाटिया खड़ी करते हैं। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि दो इंच कील की जगह चार इंच हथोड़े की चोट से ठोक देते हैं। कांग्रेस समेत देश की अन्य पार्टियां भी कुछ यूं ही करती हैं, वो देश के विकास का मोडल रखने को तैयार नहीं। टीवी चैनलों ने तो केजरीवाल सरकार को गिराने के लिए निविदा भर रखी है, जो गिराने में सशक्त होगा, उसको निवि​दा दी जाएगी। लेकिन क्यूं नहीं देश की राजनीतिक पार्टियां एक सार्वजनिक मंच पर आ जाएं। अपने अपने विकास मोडल रखें, जैसे स्कूल के दिनों में किसी प्रतियोगिता में बच्चे रखते थे, जिसका अच्छा होगा, जनता फैसला कर लेगी। इससे दो फायदे होंगे, एक तो टेलीविजन पर रोज शाम को बकबक बंद हो जाएगी। दूसरा भारतीय क्रिकेट को फिर से टेलीविजन में स्पेस मिल जाएगी। एंटरटेनमेंट में बहुत सी महिलायों को होंठ ख़राब हो चुके हैं, उ​सकी ख़बरें! अमिताभ बच्चन की पोती पढ़ने लग गई, हालांकि अभी तक बॉलीवुड में किसी के बच्चे पढ़ने नहीं ​गए, मुझे ऐसा लगता है, क्यूंकि कभी ख़बर नहीं आई! वो भी आने लग जाएंगी। पांच पांच सौ करोड़ जो विज्ञापन पर खर्च करना है, वो बच जाएगा, पता है वो भी जनता से वसूल किया जाएगा! थूक से पकौड़े बनाए जा रहे हैं, मूत से मछलियां पकड़ाई जा रही हैं! मुझे नहीं दिखा, कहीं गुजरात के मुख्यमंत्री ने गुजरात मोडल रखा हो, केवल बस इतना कहते हैं, मैंने इतनी भीड़ कभी नहीं देखी, सच में घर बैठ आडवाणी को बुरा लग जाता है! राहुल गांधी कुली कुली चिला रहे हैं, मोदी चाय चाय! इन दोंनो के प्रेमी आम आदमी पार्टी हाय हाय चिला रहे हैं! अनुयायी बड़ी गंदी चीज है, आंख पर पट्टी बांध लेती हैं, अपने नेता का भाषण सुनने के बाद कान में रूई डाल लेती है! दूसरी पार्टियां करें तो रासलीला, हमारे वाले करें तो रामलीला! घोर अत्याचार है!

एक बच्ची की मौत, अख़बारों की ​सुर्खियां

बठिंडा शहर के समाचार पत्रों में एक बच्ची की मौत की ख़बर प्रकाशित हुयी, जिसका इलजाम पुलिस पर लगाया जा रहा है, क्यूंकि नवजात बच्ची की बेरोजगार महिला शिक्षकों के संघर्ष के दौरान मौत हुई है। पुलिस ने धरने पर बैठी महिलायों से रात को रजाईयां छीन ली थी, ठंड का मौसम है। बच्ची को ठंड लगी, अस्पताल में दम तोड़ दिया। मौत दुनिया का एक अमिट सत्य है, मौत का कारण कुछ भी हो सकता है ठंड लगना, पुलिस की मार या खाना समय पर न मिलना आदि। अगर अरबों लोग हैं तो मौत के अरबों रूप हैं। किसी भी रूप में आकर लेकर जा सकती है। लेकिन सवाल तो यह है कि हमारी मानवता इतनी नीचे गिर चुकी है कि अब हम नवजातों को लेकर सड़कों पर अपने हक मांगने निकलेंगे। पुलिस सरकार का हुकम बजाती है, यह वो सरकार है, जिसको हम अपनी वोटों से चुनते हैं। चुनावों के वक्त सरकार पैसे देकर वोटें खरीदती है और हम अपने पांच साल उनको बदले में देते हैं। गिला करने का हक नहीं, अगर सड़कों पर उतारकर हम अपने हकों की लड़ाई लड़ सकते हैं तो कुछ नौजवान आप में से देश की सत्ता संभाल सकते हैं। अपने भीतर के इंसान को जगाओ। मासूम शायद आपके भीतर का इंसान जगाने के लिए सोई हो, अगर आपको नींद में सरकार के खिलाफ नारेबाजी करनी है तो आपकी मर्जी। बच्ची की नींद आपका जागरण होना चाहिए। बच्चों को सड़क पर लेकर हक मांगने मत निकलें, हो सके तो उनका भविष्य सुरक्षित करने के लिए स्वयं निकलें।

जाति आधारित सुविधाएं बंद होनी चाहिए

अगर आने वाले समय में भारत को एक महान शक्ति के रूप में देखना चाहते हैं। अगर चाहते हैं कि देश एक डोर में पिरोया जा सके तो आपको सालों से चली आ रही कुछ चीजों में बदलाव करने होंगे। हम हर स्तर पर बांटे हुए हैं। जब मैं एक राज्य से दूसरे राज्य में जाता हूं तो मेरी बोली से लोग कहते हैं, तू पंजाबी है, तू मराठी है या गुजराती है। मगर जब कोई व्यक्ति अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर पहुंचता है तो कोई पूछता है तो आप अचानक कहते हैं इंडियन। जगह बदलने से आपका अस्तित्व बदल गया।

राज्य स्तरीय सोच को छोड़ो। आगे बढ़ो। धर्म व जाति की राजनीति से उपर आओ। स्वयं आवाज उठाओ। मेरे माता पिता ने शिक्षक की फीस रियायत देने वाली पेशकश को ठुकरा दिया था, यह कहते हुए कि इसकी जगह किसी दूसरे बच्चे की कर दो। हम अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं। उन दिनों सरकारी स्कूलों की फीस कुछ नहीं हुआ करती थी, लेकिन रियायत लेना मेरे पिता को पसंद न था। गांव में पीले कार्ड बनते थे। हमारे पास भी मौका था बनवाने का। पिता ने इंकार कर दिया। वो अनपढ़ थे, लेकिन समझदार थे।

रियायत केवल उनको दी जाएं, तो सच में उनके हकदार हैं, न केवल जान पहचाने वालों, सिफारिश वालों को। धर्म के नाम पर तो बिल्कुल नहीं। न अल्पसंख्यक के नाम पर न बहु संख्यक के नाम पर। असली पैमानों पर आदमी को रियायत दी जाए, जब उनका स्तर सुधरे, तो उनको आउट किया जाए, दूसरों को चुना जाए, जो इनके पहले वाले स्तर पर हैं। जब आप धर्म, जाति के नाम पर खैरात बंटती है तो बुरे प्रभाव पड़ते हैं, जनरल सोचता है आने वाले समय में निम्न वर्ग हावी हो जाएगा, दोनों में तकरार चलती है, घृणा की दृष्टि से देखता है, अच्छे नंबर लेकर आने वाले को भी, कुछ को तो अपनी जात छुपानी पड़ती है, कहीं उसकी काबलयित पर शक न कर लिया जाए।

यह कार्य राजनीतिक पार्टियां तब तक नहीं करेंगी, जब तक आम लहर नहीं बहेगी, क्यूंकि राजनीतिक पार्टियां हवा या लहर के गधे पर सवार होती हैं, क्यूंकि उनको कुर्सी चाहिए।

Gujarat Govt.- गरीबी यूपी बिहार के कारण, तो अमीरी के दावेदार आप कैसे ?

गुजरात के वित्त मंत्री नितिन पटेल ने कहा है कि प्रदेश में यूपी, बिहार से आए लोगों के कारण गरीबी बढ़ी है क्यूंकि गुजरात सरकार बाहरी लोगों को भी बीपीएल कार्ड मुहैया करवाती है। अपनी इज्जत बचाने के लिए हर बहाना जरूरी है।

अगर गरीबी के लिए यूपी बिहार के लोग जिम्मेदार हैं, तो अमीरी एवं विकास के लिए गुजरात सरकार को स्वयं का ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए। गुजरात के अंदर निवेश बाहरी राज्यों से, विदेशों से हो रहा है। उनमें यूपी, बिहार, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र न जाने कितने राज्यों के अमीर आदमी शामिल हैं, जो गुजरात के विकास के लिए जिम्मेदार हैं।

नैनो को लेकर तो गुजरात कुछ नहीं कहता। मारूति का कारखाना लगने वाला है, उसको लेकर गुजरात सरकार कुछ नहीं कहती, लेकिन इज्जत बचाने के लिए यूपी बिहार के लोग आंख में खटक रहे हैं, जो केवल आपको सूरत में मिलेंगे, जो कम वेतन में स्थानीय लोगों से अधिक कार्य करते हैं। अगर वे कम पैसों में ​अधिक श्रम करते हैं तो गुजरात के व्यापारियों को अधिक उत्पादन एवं पैसा मिल रहा है।

गुजरात सरकार बिहारियों को बिठाकर नहीं खिला रही, वे मेहनत करते हैं, खाते हैं। जिनको गुजराती, बिहारी में फर्क नजर आता है, वे देश को एक तार में पिरोने का दावा कैसे कर सकते हैं। गुजरात के सूरत में केवल आपको बिहार यूपी वाले मिलेंगे, लेकिन पंजाब की तो रग रग में हैं, वहां तो कहावत है कि अगर अब बिहारियों को पंजाब से अलग कर दिया तो कृषि मर जाएगी। अगर सूरत में ऐसा कर दिया तो जाए तो बुरे दिनों से गुजर रहा हीरा कारोबार, साड़ी कारोबार मर जाएगा।

अमूल का संस्थापक वर्गीज कुरियन मद्रास में पैदा हुआ था, लेकिन अमूल से विश्व में गुजरात को प्रसिद्ध कर गया। ऐसे कई नाम और भी होंगे। यूपी बिहार पर निशाना साधने वाले नितिन पटेल को शायद आंकड़ा विभाग ने गलत जानकारी उपलब्ध करवा दी, ​यूपी बिहार से अधि​क राजस्थानी हैं, लेकिन वहां स्वयं भाजपा की सरकार है, वे करीबी पड़ोसी है, उंगली उठानी उचित नहीं।

नरेंद्र मोदी देश को जोड़ने का झंडा उठा रहा है। सरकार इस तरह लोगों को तोड़ने वाले बयान दे रही है।

समुदाय राजनीति बंद होनी चाहिए

समाचार : रामेश्वरम के निकट पंबम में मछुआरों के विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करते सुषमा ने कहा, 'नरेंद्र मोदी ने एक मछुआरों को राज्यसभा का सदस्य बनाया हैं।'

वह यहां मछुआरा समुदाय के चुन्नीभाई गोहिल का जिक्र कर रही थी, जिन्हें बीजेपी ने पिछले सप्ताह गुजरात से राज्यसभा का सदस्य नामांकित किया है।

इसके साथ ही बीजेपी की इस वरिष्ठ नेता ने वादा किया कि अगर उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में जीतती है, तो वह एक अलग मत्स्य पालन मंत्रालय का गठन करेगी और मछुआरों की रिहाइश की आस-पास अच्छे स्कूल और अस्पताल स्थापित किए जाएंगे।

युवारॉक्स व्यू : आखिर यह क्या बात है ? लोक सभा चुनाव नजदीक हैं, और भाजपा ने गुजरात से चुन्नीभाई गोहिल को राज्य सभा सदस्य नियुक्त किया। और भाजपा की मैडम उसको हथियार बना रही हैं। हद नहीं तो क्या है ? यूं वादे करना भ्रष्टाचार प्रलोभन नहीं तो क्या है ? तो बीजेपी को अब चाय वालों के पास जाना चाहिए, कहना चाहिए देखो नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया। पार्टी में कुछ वकील होंगे, कुछ छोटे कारोबारी होंगे। उधर, जदयू को भी न्यूज पेपर समुदाय से मदद मांग लेनी चा​हिए, प्रभात ख़बर के संपादक को राज्य सभा सदस्य नामांकित किया है। यह समुदाय आधारित राजनीति बंद होनी चाहिए। अगर कोई वादा करना है तो देश के लिए करो।

चुनावों के लिए राम मंदिर का मुद्दा काम नहीं आया तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एकता का नारा लेकर सरदार पटेल को लेकर आए। एकता का अर्थ केवल भाजपा के समर्थन करना है। देश बनाने की बात न करते हुए सरदार पटेल के पुतले पर जोर दिया जा रहा है। सरदार पटेल जो अपना कद बना गए, क्या यह पुतला उससे अधिक उंचा कद बनाएगा सरदार पटेल का नहीं, ये तो केवल नरेंद्र मोदी का नाम इतिहास में दर्ज करवाएगा, लोग सरदार पटेल के पुतले को देखेंगे, नरेंद्र मोदी को याद करेंगे। यादों में पुतले बनाने से बेहतर है, सरदार पटेल के, भगत सिंह के, सुभाष चंद्र बोस समेत अन्य शहीदों के स्वप्नों का मुल्क बनाएं। एकता का नारा देने से देश, एक जुट नहीं होगा। अहिंसक राष्ट्रपति का देश आज सबसे उग्र है। टटोलकर देख लो। बस हिम्मत नहीं, जुटा पाता, भीतर को तूफान उठ रहे हैं, बस कंधे एवं भीड़ ढूंढ़ रहे हैं, ताकि इल्जाम उन पर न आए।