कांग्रेस को लेकर मीडिया की नीयत में खोट, निष्‍पक्ष पत्रकारिता नहीं

मीडिया की अपनी सोच कर चुकी है। वो अब सोशल मीडिया को केंद्र में रखकर ख़बरें बनाने लगा है। हालांकि इसका असर प्रिंट मीडिया पर नहीं, बल्‍कि वेब मीडिया एवं इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया पर अधिक दिखता है। कांग्रेस का विज्ञापन शुरू हुआ तो नमो के चेलों ने लड़की हसीबा अमीन को लेकर दुष्‍प्रचार करना शुरू कर दिया। 

वेब मीडिया भी उसी धुन में निकल पड़ा। हालांकि विज्ञापन में स्‍पष्‍ट शब्‍दों में लिखा है, युवा कांग्रेस कार्यकर्ता। जो लोगों को गला फाड़कर बताने की जरूरत कहां रह जाती है, हां अगर कोई अभिनेत्री होती, स्‍वयं को कांग्रेस कार्यकर्ता कहती तो समझ में आता गला फाड़ना। अगर अमेरिकन होती तो समझ में आता गला फाड़ना। 

नंबर दो बात, राहुल गांधी की इंटरव्‍यू के बाद जो मीडिया ने समझ बनाई, वो भी हैरानीजनक है। उसका इंटरव्‍यू इतना बुरा नहीं था, सच तो यह है कि अर्नब गोस्‍वामी राहुल गांधी को सुनना नहीं चाहता था, वे तो केवल उसके गले में उंगली डालकर उलटी करवाना चाहता था, ताकि नरेंद्र मोदी के गले से भी आवाज निकल आए। राहुल गांधी की इंटरव्‍यूह पर सवाल उठाने वाले नरेंद्र मोदी का इंटरव्‍यू क्‍यूं याद नहीं कर रहे , जब वह लाइव इंटरव्‍यू क्रोधित होते हुए छोडकर भाग गया था।

पत्‍नि गई थरूर की।

पत्‍नि गई थरूर की।
चर्चा छिड़ी फजूल की।
शशि थरूर तो अंतिम ठौहर थे,
सुन्‍नदा के पहले भी दो शौहर थे,
शशि का भी तीसरा करार था
हमें क्‍या पता सौदा था कि प्‍यार था
जाने वाले को जाना होगा
दो दिन रोना धोना,
फिर नया तराना होगा
हर जीवन एक नसीहत
एक कहानी है
रूह सदा अमर,
शरीर तो फानी है
कब तक रखेगा अहं अपना

हैप्‍पी जीवन बुलबुला पानी है
मरघट बस्‍ती, जगत मुसाफिरखाना,
यहां तो आनी जानी है

भगवान ने हमें क्‍यूं बनाया ?

एक मां अपने बेटे से कह रही थी, बेटा हमेशा दूसरों की सेवा करनी चाहिए। उसने पूछा क्‍यूं ? मां कहती है कि भगवान ने हमें बनाया इसलिए है कि दूसरों की सेवा करें। और बेटे ने कहा, तो भगवान ने दूसरों को किस लिए बनाया है ? इतना बड़ा जाल क्‍यूं ? इससे अच्‍छा है सब अपनी अपनी सेवा कर लें। स्‍वभाव को पहचानो। जीओ आनंद से। अगर स्‍वभाव में सेवा करना है तो हो जाएगा। नहीं तो नहीं। मजबूरी,फर्ज या झूठ की चादर ओढ़कर मत कीजिए। 

क्‍या बिच्‍छु अपना स्‍वभाव छोड़ सकता है ? स्‍वभाव से बड़ा धर्म कुछ नहीं है। बाकी धर्म तो केवल रास्‍ते हैं। एक साधु सरोवर की सीढ़ियां उतर रहा था। उसने देखा एक बिच्‍छु सीढ़ियों पर बैठा था। लोगों के पैरों के तले आकर मर सकता है। साधु उसको उठाकर सरोवर की तरफ बढ़ता है। तो बिच्‍छु साधु के हाथ पर डंक मारता है। साधु का चेला तपाक से बोलता है, बिच्‍छु आपको डंक मार रहा है, और आप उसको सरोवर में छोड़ने जा रहे हो, तो साधु कहता है, अगर वह अपना धर्म निभाना नहीं छोड़ सकता तो मुझे भी अपना धर्म निभाना चाहिए। 

स्‍वभाव से बड़ा धर्म कोई नहीं, लोगों ने अहं की। झूठ की चादरें ओढ़ रखी हैं। उनको वह धर्म नजर आता है। अपनी सुविधा के रास्‍ते खोज रखे हैं। 

आपको कहानी व ऊपरी चंद लाइनों में विरोधाभास नजर आएगा। मगर गौर से देखें। कहानी व ऊपर लाइनों के बीच कुछ है, जो विरोधाभास नहीं। सेवा करनी चाहिए दूसरों की, लेेकिन किन की। क्‍या जो हमारे जैसे हैं, जिनसे हमें मान सम्‍मान की उपेक्षा है। जो हमारी बड़ी बड़ी मूर्तियां लगाएंगे। जो गली गली हमारे गुनगान गाएंगे।

वहां हम सेवा नहीं, अपने अहं को शक्‍तिशाली बना रहे हैं। लोगों को दिखाना चाहते हैं। सेवा करने के बाद अगर अपेक्षा का भाव नहीं। कोई लालसा नहीं, तो आप अपने स्‍वभाव में हैं। अपने धर्म में हैं। अगर मान सम्‍मान की अभिलाषा भीतर है तो बाहर सेवा का लिबास ओढ़ा हुआ है, मान सम्‍मान न मिला तो लिबास उतर जाएगा। फिर नंगे हो जाओगे। जो था वो भी न बचेगा। 
 



भारतीय राजनीति 99 के फेर में

पिछले एक साल में भाजपा के प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने हर स्तर पर विज्ञापनों से बहुत खूबसूरत जाल बुना। असर ऐसा हुआ कि देश में एक संप्रदाय का जन्म होता नजर आया। मोदी के अनुयायी उग्र रूप में नजर आए। मानो विज्ञापनों से जंग जीत ली। सत्ता उनके हाथ में है। जो शांत समुद्र थे, एकदम तूफानी रूख धारण करने लगे। अब उनको दूसरे समाज सेवी भी अपराधी नजर आने लगे, खासकर दिल्ली में, क्यूंकि ​दिल्ली फतेह होते होते चुंगल से छूट गई।

ख़बर है कि कांग्रेस प्रधान मंत्री पद की दौड़ में राहुल गांधी को उतारने का मन बना चुकी है। कांग्रेस राहुल गांधी को ऐसे तो उतार नहीं सकती, क्यूंकि सवाल साख़ का है, मौका ऐसा है कि बचा भी नहीं जा सका। अब राहुल को उतारने के लिए कांग्रेस पीआर एजें​सियों पर खूब पैसा लुटाने जा रही है। यकीनन अगला चुनाव मूंछ का सवाल है। इस बार चुनाव को युद्ध से कम आंकना मूर्खता होगी। युद्ध का जन्म अहं से होता है। यहां पर अहं टकरा रहा है। वरना देश में चुनाव साधारण तरीके से हो सकता था। भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता चाहती है। अगर उसकी चाहत सत्ता न होती तो शायद वह अपने पुराने बरगद के पेड़ को न काटती। अटलजी की तबीयत ठीक नहीं, वो राजनीति को समझ भी नहीं पा रहे, लेकिन फिर भी नेता उनके साथ फोटो खिंचवाने जाते हैं, उनकी एक झलक पाने जाते हैं, लेकिन एक बरगद का पेड़ खड़ा है, जो राजनीति की चरमसीमा को देख रहा है, उसको साइडलाइन कर दिया। युद्ध के लिए युवा सेनापति की जरूरत थी, जो नरेंद्र मोदी के रूप में मिला।

नरेंद्र मोदी ने पूरा देश में अपना प्रभाव छोड़ने के लिए विज्ञापनों पर दिल खोलकर पैसा खर्च किया। कांग्रेस ने एक भी पत्ता बाजार में नहीं फेंका। वो सिर्फ मूक दर्शक की भांति देखती रही। मगर जब बात राहुल गांधी वर्सेस नरेंद्र मोदी की आई तो कांग्रेस ने बख्तर कस लिए। अब युद्ध में युवराज है तो बिना तैयारी के युद्ध लड़ा नहीं जा सकता, अगर मोदी को बाजार से चेहरा संवारने वाले मिल सकते हैं तो कांग्रेस को भी मिल सकते हैं। देश अगर प्रभावित होता है तो विज्ञापनों से। उसकी खुद की सोच कभी काम करती, तो शायद छह दशक बाद आजादी का रोना न रो रहा होता।

इस युद्ध में पीआर एजें​सियों की चांदी होने वाली है। जन साधारण का तो पता नहीं। उसको तो उम्मीदों व झूठे वादों का अंबार जरूर मिल सकता है। शाहरुख खान की चैन्ने एक्सप्रेस ने जब बॉक्स आ​फिस पर दो करोड़ बटोरे तो आमिर खान पर तीन सौ करोड़ कमाने का दबाव था। एक समय सफलता व प्रतिष्ठा आपको गुलाम नजर आती है, लेकिन वास्तव में अगर देखें तो यह आपको अपना गुलाम बना लेती है। शीर्ष पाने में दिक्कत कम है, शीर्ष पर बने रहने के लिए दिक्कत ज्यादा।

शीर्ष को बचाने में जीवन खत्म हो जाता है। कहते हैं कि सम्राट की मालिश करने एक नाई आता था, जिसको मालिश के बदले सम्राट एक सिक्का देता था। नाई बहुत खुश रहता था। उसकी खुशी से सम्राट को जलन होने लगी। सम्राट ने अपने वजीर को कहा, उसकी खुशी का कारण बताओ, मुझे उसकी खुशी से जलन होने लगी है। वजीर तेज दिमाग था। रात को नाई के घर पर 99 सिक्कों से भरा थैला फेंक आया। अगली सुबह नाई उठा, उसने सिक्कों से भरा थैला उठाया। गिने तो 99 सिक्के थे। अब नाई ने सोचा, अगर आज एक सिक्का मैं बचाने में सफल हुआ तो मेरे पास 100 सिक्के हो जाएंगे। धीरे धीरे धन का संग्रह हो जाएगा। नाई अब सिक्के जुटाने के लिए सोचने लगा, जो परेशानी का सबब बना। सम्राट उसको परेशान देखकर पूछता है, तुम्हारी परेशानी का कारण तो बताओ। उसने कहा, कुछ नहीं, मैं ठीक हूं। सम्राट ने कहा, पहले जैसी खुशी नहीं है। कहीं वजीर ने तो कुछ नहीं कहा। अब नाई को समझ आया कि उसको जो एक थैला मिला था, वह वजीर द्वारा फेंका गया होगा। इस फेर से बाहर निकला मुश्किल है, जो निकल गया वह खुश हो गया। 

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परिवर्तन किसे चाहिए.... सत्ता की भूख

देश को बदलने की बात करने वाले। देश को सोने की चि​ड़िया बनाने का दावा करने वाले बड़ी हैरत में डाल देते हैं, जब वह सामा​जिक मुद्दों को लेकर सत्ता में आई पार्टी पर सवाल​ उठाते हैं। उसका स्वागत करने की बजाय, उसको गिराने की साजिश रचते हैं, गिराने की हथकंडे अपनाते हैं।

देश को बदलने की बात करने वाली भाजपा के नेता अरविंद केजरीवाल की टोपी को लेकर सवाल उठा रहे हैं। अगर भाजपा देश का भला चाहती है तो उसको हर समाज सुधारक में मोदी नजर आना चाहिए न कोई दूसरा। मगर सत्ता पाने की चेष्ठा। आगे आने की अभिलाषा ऐसा होने नहीं देती। यह हालत वैसी है जैसे मरुथल में कोई भटक जाए। उसको प्यास लगे व मृग मरीचिका को झील समझने लगे। ​जिसके पास पानी की बोतल होगी, जिसको प्यास न होगी, उसको मृग मरीचिका लुभा न सकेगी।

मगर राजनेतायों को पद प्रतिष्ठा से प्रेम है। देश की जनता पहाड़ में जाए। नेता को ढोंग रचता है। जनता का मिजाज देखकर बाहर के कपड़े बदल लेता है। उसको समाज सुधार से थोड़ी न कुछ लेना है। एक दिन गधे पर सवार होकर मुल्ला नसीरुद्दीन बाजार से निकल रहा था, किसी ने पूछा किस तरफ जा रहे हो, मुल्ला ने कहा, गधे से पूछ लो। जिस तरफ ले जाएगा, चले जाएंगे। हमारी कहां मानता है।

देश का भला मोदी करे या अरविंद करे। क्या फर्क पड़ता है। देश का भला होना चाहिए। मगर नेता सोचते हैं, भला होना चा​हिए, लेकिन हमारे चुने नेता द्वारा होना चाहिए। शायद दुनिया इसी बहाने याद कर ले। इसमें सुख है, कोई याद कर ले। इस लालसा की आग में आदमी जलता जा रहा है। सिकंदर को याद कर लेता है, हिटलर को याद कर लेते हैं, लेकिन इससे उनको क्या फायदा होता है।

अरविंद की टोपी नजर आती है। उसके भीतर कुछ करने की आग नजर नहीं आती, क्योंकि लालसा ने आंख पर पट्टी बांध दी है। डर है कहीं, हमारे खेले दांव को अरविंद ​बिगड़ न दे। कहीं इस बार भाजपा सत्ता पाते पाते रह न जाए। लालसा बड़ी है, देश बड़ा नहीं है।

मोदी का कुर्ता नजर नहीं आता, नजर आती है तो अरविंद की टोपी। बड़ी दिक्कत है। टोपी तो अन्ना भी पहनते हैं। अन्ना से भी मोहभंग हो जाता, अगर वह नेतायों की रोजीरोटी छीन लेते। नेता ने अरविंद का साहस न देखा, देखा तो केवल टोपी को। टोपी ने कुर्सी छीन ली। कुर्सी पर बैठने का स्वप्न अधूरा रह गया। सालों से बुना था।

देश का भला करने वाले न टोपी देखते हैं, न पार्टी देखते हैं, न अरविंद देखते हैं, न नरेंद्र देखते हैं । वह तो केवल देश का विकास देखते हैं।