अरविंद केजरीवाल कुछ तो लोग कहेंगे

बड़ी हैरानी होती है। कोई कुछ लेता नहीं तो भी देश के कुछ बुद्धिजीवी सवाल उठा देते हैं, अगर कोई लेता है तो भी। अब आम आदमी मुख्यमंत्री बन गया। वो आम आदमी सुरक्षा लेना नहीं चाहता, लेकिन मीडिया अब उसको दूसरे तरीके से पेश कर रहा है।

सुनने में आया है, अरविंद केजरीवाल ने सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। सुरक्षा के रूप में उसको दस बारह पुलिस कर्मचारी मिलते, लेकिन अब उसकी सुरक्षा के​ लिए सौ पुलिस कर्मचारी लगाने पड़ रहे हैं। अब भी सवालिया निशान में केजरीवाल हैं ?

शायद बुद्धिजीवी लोग घर से बाहर नहीं निकलते या घर नहीं आते। शायद रास्तों से इनका राब्ता नहीं, संबंध नहीं, कोई सारोकार नहीं। वरना,उनको अर​विंद केजरीवाल के शपथग्रहण कार्यक्रम की याद न आती, जहां पर सौ पुलिस कर्मचारियों को तैनात किया गया था। कहते हैं आठ दस से काम चल जाता है, अगर अरविंद सुरक्षा के लिए हां कह देते तो। सच में कुछ ऐसा हो सकता है, अगर हो सकता है तो नरेंद्र मोदी की राजधानी, मेरे घर के पास आकर देख लें।

मोदी गोवा से, दिल्ली, यूपी, बिहार से निकलता है, लेकिन मेरे शहर की सड़कों पर सैंकड़े से अधिक पुलिस कर्मचारी ठिठुरते हैं। मोदी की सुरक्षा के कारण हमको दिक्कत भी है, लेकिन फोकट की अधिक सुरक्षा भी। सड़क के दोनों तरफ पुलिस कर्मचारी होते हैं, मोदी का कोई नामोनिशां नहीं होता। जब मोदी निकलता है तो स्कोर्पियो का काफिला निकलता है, जो बख्तर बंद होता है। क्या इसका खर्च अ​रविंद केजरीवाल की सुरक्षा के लिए तैनात किए पुलिस कर्मचारियों से कम है।

पुलिस कर्मचारी, जनता के सेवक हैं। किसी मुख्यमंत्री या किसी नेता के नहीं। बंदूक रक्षा करती तो राजीव गांधी, इंदिरा गांधी सुरक्षित होती। भय किस बात का। मौत का। मौत ने तो काल को वश में करने वाले रावण को नहीं छोड़ा तो आम आदमी क्या है ? सुरक्षा का जिम्मा किसके हाथों में है, जो आम आदमी है, जिसके परिवार की सुरक्षा ऐसी पुलिस चौं​कियों के छाये में है, जहां चौंकियां तो हैं, पुलिस कर्मी नहीं।

बड़े अजीब हैं बुद्धिजीवी। कथा सुनाते हैं बैल, शिव व पार्वती की। और खुद की भूल जाते हैं। कहते हैं शिव पार्वती बैल पर बैठकर जा रहे थे। तभी रास्ते में दो लोग मिले, कहने लगे दोनों जानवर पर अत्याचार करते हैं। पार्वती ने पत्नी धर्म निभाया और नीचे उतर गई, शिव को बैठे रहने दिया। कुछ आगे गए तो कोई और मिला, उसने कहा, कैसा निर्दयी है, पत्नि चल रही है, आप आराम से बैठकर जा रहा है। शिव भी उतर गए। कुछ दूर गए तो दूसरे लोग मिल गए कहने लगे। यह लोग भी कैसे हैं, पास में सवारी है, लेकिन पैदल चलकर अपने एवं बैल के पैर थका रहे हैं। इससे अच्छा होता तो घर छोड़ आते।

सच में जितने मुंह उतनी बातें। अरविंद केजरीवाल जमाना है कुछ तो कहेगा। मैं भी तो कुछ कह रहा हूं।

लोकपाल बिल तो वॉट्सएप पर पास हो गया था

अन्ना हजारे। आज के गांधी हो गए। ठोको ताली। कांग्रेस व भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने लोक पाल बिल पास कर दिया। कहीं, आज फिर एक बार अंग्रेजों की नीति को तो नहीं दोहरा दिया गया। गांधी को महान बनाकर सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह जैसे किरदारों को दबा दिया गया।

सत्ता पाने की चाह में पागल पार्टियां ​दिल्ली में बहुमत न मिलने की कहानी गढ़ते हुए सरकार बनाने से टल रही हैं। आज भी राजनीतिक पार्टियां भीतर से एकजुट नजर आ रही हैं। शायद वह आम आदमी के हौंसले को रौंदा चाहती हैं, जो आप बनकर सामने आया है।

वह चाहती हैं कि आप गिरे। डगमगाए ताकि आने वाले कई सालों में कोई दूसरा आम आदमी राजनेता को नीचा​ दिखाने की जरूरत न करे। आठ साल से लटक रहा बिल एकदम से पास हो जाता है। अन्ना राहुल गांधी को सलाम भेजता है। उस पार्टी का भी लोक पाल को समर्थन मिलता है, जिसका प्रधानमंत्री उम्मीदवार, बतौर मुख्यमंत्री अब तक अपने राज्य में लोकायुक्त को लाने में असफल रहा है।

मुझे लगता है कि शायद अन्ना ने राहुल गांधी को भेजे पत्र के साथ एक पर्ची भी अलग से भेजी होगी। जिस पर लिखा होगा। क्या एक और अरविंद केजरीवाल चाहिए? राहुल के कान खड़े हुए होंगे। यकीनन उसने वॉट्सएप के जरिए ​पर्ची का डिजीटल संस्करण राजनेतायों के ग्रुप को भेजा होगा।

वहां भी कुछ वैसा ही हुआ होगा। नेताओं ने सोचा होगा। देश में हर चीज के लिए कानून है। लेकिन अपराध कहां रूकते हैं। यहां आज भी ट्रै​फिक सिग्नल टूटते हैं। कानून बनाने से अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। जल्द से जल्द पास करवा दो। पास तो वॉट्सएप पर ही हो गया होगा, लेकिन खानापूर्ति के लिए संसदीय कार्यवाही जरूरी है। कानून तो टूट भी सकता है, लेकिन अगर एक और केजरीवाल पैदा होगा तो हमारा बना बनाया चक्रव्यूह टूट जाएगा। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस से बेहतर तो महात्मा गांधी को बनाए रखना आसान है। क्यूं महात्मा गांधी, सरदार पटेल को गद्दी देने की बजाय नेहरू को सौंपेगा। गांधी अहिंसावादी है। वह सिस्टम के खिलाफ शांति से लड़ता है। तब तक कई साल गुजर जाते हैं। हमारी कई पीढ़ियों का इंतजाम हो जाता है।

लोक पाल बिल पास हो गया। ठोको ताली। आज के बाद ​देश में रिश्वत, घोटाले खत्म हो जाएंगे। हम भ्रष्ट नेताओं से मुक्त हो चुके हैं। कल का इंतजार करें।

वो मासूम सी लड़की

वो मासूम सी लड़की मुझसे जुदा हो जाए।
बस ख्वाबों में आए, और खुदा हो जाए।

मैं ही जानता हूं पागल दिल को संभाला है कैसे।
उनकी चाहत को बच्चों की तरह पाला है कैसे।

कभी सूखा पड़ा तो कभी बाढ़ आई
हौंसले ​गिराने आफत हर बार आई

हा​लत देखकर आशिकों की अब मैं, हैप्पी यूं ही परेशान नहीं होता
पता है मुझे, किसी की याद में डूबकर उभरना आसान नहीं होता

आओ हंसते हुए मिलने की, दुश्मनों पर मेहरबानी करते हैं।
चलो आज हैप्पी, हम भी कुछ तूफानी करते हैं।

बंद कमरों में रोना बंद कर ​दिया, क्यूंकि नीर ए अश्क फर्श सोखता नहीं,
हैप्पी अगर जमीं पीती अश्क मेरे, तो आंखों से बहता दरिया मैं रोकता नहीं

सलमान खान के हाथ जल्‍द होंगे पीले

सच में। सलमान खान की बहुत जल्‍द शादी होने वाली है। अब सलीम खान एंड फैमिली चाहती है कि छोरे के हाथ पीले कर देने चाहिए, हालांकि लड़कियों के हाथ पीले होते हैं। हाथ पीले करने का मतलब शादी होता है, तो क्‍या फर्क पड़ता है, लड़के की हो या लड़के की। अब तो दोनों बराबर हैं। लो..... मैंने क्‍या कुछ झूठ कहा।

अभी तक लड़की तो मिली नहीं, लेकिन मिलने की जल्‍द संभावना है। सलमान खान ने परिवार को संकेत देने शुरू कर दिए हैं। हम सब जानते हैं कि बॉलीवुड में सबसे अधिक लड़कियों के साथ प्रेम प्रसंग रचाने वाला अभिनेता सलमान खान हैं। मगर उसने पिछले दिनों अपने बयान से सभी उन लड़कियों को चरित्र प्रमाण पत्र दे दिया, जो उसकी जिन्‍दगी में आकर गई हैं। 

फर्जी मीडिया कंपनी फेकटॉक फेंकु संवाददाता ने बताया कि सलमान खान के बयान के बाद अभिषेक बच्‍चन पार्टी देने के मूड में थे, लेकिन ऐश ने कहा, क्‍या हर बार सीता प्रमाण देगी, कभी राम को नहीं देना चाहिए, अभी तक करिश्‍मा कपूर या किसी अन्‍य लड़की ने सार्वजनिक तौर पर बयान नहीं दिया। तुम को भी सलमान खान की तरह बयान देकर प्रमाण देना होगा। अभी तक मामला ठंडे बस्‍ते में है, हो सकता है धूम 3 की सफलता के बाद कुछ हो पाए। वरना नरेगा योजना के तहत मिलने वाला कार्य भी बंद हो जाएगा। बहल व सिप्‍पी साहेब अब और कितनी फिल्‍में बनाएंगे, दोस्‍ती का कर्ज चुकाने के लिए। 

सलमान खान के बयान के बाद कंगना राणावत ने भी पासा फेंक दिया। कंगना राणावत ने कहा, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता अगर उसका जीवन साथी किसी अन्‍य महिला के साथ हमबिस्‍तर होता है। कंगना राणावत के बयान के बाद सलमान खान के कान खडे हो चुके हैं। सुना है कि बिग बॉस में बिजी होने के कारण सोहेल खान को जिम्‍मेदारी सौंपी है कि पता करो कि कंगना का बयान सही है या केवल मशहूरी स्‍टंट है।

अगर बयान सही है तो कंडीशन एप्‍ली वाले स्‍टार के बारे में पूछ लेना, कहीं ऐसा न हो। सन्‍नी लियोन के पति जैसा पति भी चाहती हो, जिसको उसके काम से परेशानी नहीं है। अब देखना है कि सलमान खान के संकेत कब हकीकत में बदलते हैं। यह तो पक्‍का है कि अब सलमान खान घर बसाने के करीब हैं।

सलमान खान तो शादी के बारे में विचार भी न करते, लेकिन लोग दुखी करना बंद नहीं करते। अभी कुछ दिन पहले करीना कपूर ने कटरीना कैफ को भाभी कह दिया। यहां तक कि उसके साथ समलैंगिक रिश्‍ते बनाने तक की ख्‍वाहिश प्रकट कर दी। सुनने में आया है कि सलमान खान को भी बुरा लग रहा है। उधर, आजकल पड़ोसी बब्‍बू मान का गीत बजाते रहते हैं कि मित्रां दी छत्‍तरी तो उड़ गई बेचारा सलमान खान बड़ी मुश्‍किल में है। कब तक लड़कियों को चरित्र प्रमाण पत्र बांटते रहेंगे। इस बीच नवोदित अभिनेत्री एल्ली एवराम का कहना है कि वह बॉलीवुड के स्टार सलमान खान के शादी के प्रस्ताव को गंभीरता से नहीं लेगी। सलमान रियलिटी टीवी शो 'बिग बॉस' की मेजबानी के दौरान मजाक में कई बार एल्ली से फ्लर्ट करते हुए नजर आए।

एक ख़त आम आदमी पार्टी के नाम

नमस्कार। सबसे पहले आप को बधाई शानदार शुरूआत के लिए। कल जब रविवार को न्यूज चैनलों की स्क्रीनें, क्रिकेट मैच के लाइव स्कोर बोर्ड जैसी थी, तो मजा आ रहा था, खासकर दिल्ली को लेकर, दिल्ली में कांग्रेस का पत्ता साफ हो रहा था, तो भाजपा के साथ आप आगे बढ़ रहे थे, लेकिन दिलचस्प बात तो यह थी कि चुनावों से कुछ दिन पहले राजनीति में सक्रिय हुई पार्टी बाजी मारने में सफल रही,हालांकि आंकड़ों की बात करें तो भाजपा शीर्ष है, मगर बात आप के बिना बनने वाली नहीं है। यह बात तो आपको भी पता थी कि कुछ समीकरण तो बिगड़ने वाला है, मगर आप ने इतने बड़े फेरबदल की उम्मीद नहीं की थी। अगर आपको थोड़ी सी भी भनक होती तो यकीनन सूरत ए हाल कुछ और होता। आप प्रेस के सामने आए, बहुत भावुक थे, होना भी चाहिए, ऐसा क्षण तो बहुत कम बार नसीब होता है। अब आप को अपने कार्यालय के बाहर एक शेयर लिखकर रखना चाहिए,

मशहूर हो गया हूं तो जाहिर है दोस्तो, अब कुछ इलजाम मेरे स​र भी आएंगे
जो गुरबत में अक्सर नजर चुराते थे, अब देने बधाई मेरे घर भी आएंगे

मगर अब आप विपक्ष में बैठने की बात कर रही है, जो सही नहीं। नतीजे आप ने बदले हैं, मुख्यमंत्री को आप पार्टी ने हराया है, तो यकीनन सत्ता आप के हाथों में होनी चाहिए। गेंद को बीजेपी के पाले में धकेलने का मतलब दिल्ली की जनता के साथ किए वचनों से किनारा करना है। अगर कांग्रेस व भाजपा को उखाड़ना चाहते थे, लेकिन अब सत्ता से छीनकर दूसरे को देना चाहते हैं। न इंसाफी है। क्यूंकि आटे में नमक जितना तो गुनाह माफ है। पूरी सत्ता पुरानी पार्टी के हाथ में देने से अच्छा है, कुछ कांग्रेसियों को साथ ले लो, क्यूंकि राजनी​ति में अच्छे लोग भी होते हैं। मैं फिर कहता हूं, आप को सत्ता संभालनी चाहिए, राजनीति व जंग में सब जायज है। अगर आप अब पीछे हटते हैं तो शायद दिल्ली की जनता के साथ न इंसाफी होगी, क्यूंकि आप का विपक्ष में बैठना, स्वयं को सुरक्षित करना होगा। क्यूंकि आप के ज्यादातर राजनीतिक प्रतिनिधि राजनीति से दूर रहे हैं, उनको प्रजातंत्र में शासन करना अभी से नहीं आएगा, शायद इसलिए आप सत्ता के लोभी नजर नहीं आ रहे, या फिर वह एक माहौल बना रहे हैं, ताकि जनता का समर्थन मिल जाए, व बड़ी सुखद के साथ कांग्रेस के साथ चले जाएं।

केजरीवाल अब आप सत्ता से केवल एक फैसला दूर हैं, लेकिन मैं भी जानता हूं, और आप भी कि फैसले लेने से अधिक चुनौतीपूर्ण कार्यकाल होगा, क्यूंकि आप को उन वायदों पर पूरा उतरना होगा, जो सीना ठोक कर किए हैं, अगर भाजपा आती है तो उनको पांच साल सुरक्षित रहने का मौका मिल जाएगा, और राजनीति में स्वयं को परिपक्व कर पाएंगे। मगर मैं दूसरे नजरिये से सोचता हूं, अनाड़ी आदमी संभालकर वाहन चाहता है, तो धीमा चलता है, मगर अच्छा चलता है, अगले साल देश में क्रांति का बिगुल बज सकता है, अगर आप विपक्ष की बजाय सत्ता संभालें। आपको सकारात्मक रहना है तो विपक्ष के साथ रहें, अपनी रखें, व उनकी सुनें।   

मगर मेरा निजी ख्याल है कि आप केजरीवाल को राजनीति में उतरने के बाद, इतना स्नेह व समर्थन पाने के बाद अब कदम पीछे नहीं हटाना चाहिए, उनको कांग्रेस के साथ दिल्ली में सरकार बनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए, इससे दो फायदे होंगे, उनके नेताओं को भी कुछ सीखने को मिलेगा, और आपको भी कांग्रेस के अनुभवियों से सीखने को मिलेगा।

आप के साहस को सलाम। मगर अब आप को वह फैसला लेना है, जो दिल्ली के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। विपक्ष में बैठकर शायद मांगों को पूरा करवाना वैसा ही जैसे मनमोहन सिंह के निजी तरीकों को सोनिया गांधी की मंजूरी के बाद लागू करना, सत्ता आप को अपने हाथ में लेनी चाहिए। रोटी तो दिल्ली वासियों ने परोस दी है, लेकिन निवाला तोड़कर मुंह में स्वयं को डालना होगा, दिल्लीवासियों के विश्वास का कर्ज अदा करना होगा।

बाकी जीत आपकी, फैसला आपका। देश इंतजार में है। मैं भी। चलते चलते एक और शेयर आपके नाम।

हक़ीकत की तह तक पहुँच तो गए लेकिन सच में ख़ुद को उतारेंगे कैसे।
न जीने की चाहत, न मरने की हसरत यूँ दिन ज़िन्दगी के गुज़ारेंगे कैसे।

fact n fiction : जय हो का पोस्टर यूं बना

जय हो का पोस्टर रिलीज हो गया। पहले तो इसका नाम मेंटल था। लेकिन कुछ घटनाक्रम ऐसे हुए कि इसका नाम बदलकर जय हो रखना पड़ा। हमारे फिक्शन जर्नालिस्ट की रिपोर्ट ने उठाया पूरे मामले से पर्दा।

जानिए कैसे ?

हुआ कुछ यूं। सलमान खान बहुत खुश थे। दस बजे में कुछ मिनट बाकी थे। पोस्टर रिलीज होने वाला था। पोस्टर को लेकर सलमान अपने प्रशंसकों में उत्सुकता जगा रहे थे। शुक्रवार को जैसे ही दस बजे। वैसे ही पोस्टर रिलीज हुआ। सर्वर क्रैश होने की बात सामने आई।

लेकिन बात कुछ और थी। सलमान खान पोस्टर को लेकर नाराज हुए। पोस्टर देखा तो सलमान खान चौक उठे, यह कालिख क्यूं ? मेरे चेहरे पर पोती है। मैं इस ​​फिल्म में कोयला मजदूर थोड़ी हूं। राइट ब्रदर। तुम सही कह रहे हो, सोहेल खान ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा।

जब लोग इस पोस्टर को देखेंगे तो उनको कोयले की याद आएगी। कोयले घोटाले की याद आएगी। वैसे भी अगले साल चुनाव हैं। जनता कांग्रेस के चेहरे पर कालिख पोतेगी।

तुम्हारी फिल्म नहीं चलेगी सोहेल, सलमान बोले। कोई बात नहीं भैया, मैंने सौ करोड़ का इंतजाम कर लिया। सोहेल बड़े आत्मविश्वास के साथ बोले।  सलमान खान चौकते हुए बोला, कैसे ? । सोहेल बोले, मैं कांग्रेस के पास गया। मैंने उनको कहा, मैं आपका जय हो नारा अपनी फिल्म के ​टाइटल के लिए चुन रहा हूं, जिसके आपको अगले चुनावों में फायदा होगा, मुझे सौ करोड़ रुपए दो। लेकिन उसने कंगाली का रोना रोते हुए केवल पचास करोड़ दिए।

अरे छोटे, तो बाकी कि पचास करोड़ कहां से आएंगे, सलमान खान बोले। वो भी इंतजाम हो गया बड़े। मैं उसके बाद भाजपा के पास गया, उनके सामने कालिख पोते वाला कंसेप्ट रखा। मोदी तेज दिमाग के हैं, उनको आइडिया पसंद आया, पचास करोड़ का इंतजाम वहां से हो गया।

वैसे इस महीने बड़े आमिर खान की धूम 3 आ रही है। उम्मीद है कि वह शाहरुख खान का रिकॉर्ड तोड़े, हमको उसका रिकॉर्ड तोड़ना है। डर मत छोटे, नरेगा योजना है। समझा नहीं, बड़े, मतलब सरकार बेरोजगार लोगों को इस योजना के तहत काम देती है, जैसे यशराज बैनर अभिषेक बच्चन व उदय चोपड़ा को, और मैं अरबाज को, तुम आदि।

भैया तुम इस तरह हमारा मजाक उड़ायोगे, मुझे नहीं पता था। छोटे सीरियस मत हो, मैं तो मजाक कर रहा था, वैसे तुम ने भी कालिख पोत कर कम नहीं किया। आदमी तो मैं किसी औरत का नहीं बना सका, तुम ने लोगों को आदमी लिखकर नया ही जुमला बना दिया।     

भाव कृति : उलझन, उम्मीद व खयालात


उम्मीद
शाम ढले परिंदों की वापसी से
तेरे आने की उम्मीद जगाती हूं
सोच कर मैं फिर एकदम से
डर सी, सहम सी जाती हूं
कहीं बरसों की तरह,
उम्मीद इक उम्मीद बनकर न रह जाए
तुम्हारी, बस तुम्हारी

उलझन
उनकी तो ख़बर नहीं,
मैं हर रोज नया महबूब चुनता हूं
अजब इश्क की गुफ्तगू
वो आंखें कहते हैं, मैं दिल से सुनता हूं
हैप्पी मैं भी बड़ा अजीब हूं,
पुरानी सुलझती नहीं,
और हर रोज एक नई उलझन बुनता हूं

ख्यालात
लोग मेरे खयाल पूछते हैं,
लेकिन क्या कहूं, पल पल तो ख्यालात बदलते हैं
सच में मौसम की तरह,
न जाने दिन में कितनी बार मेरे हालात बदलते हैं
लोग सोचते हैं रिहा हुए
मुझे लगता है, हैप्पी लोग सिर्फ हवालात बदलते हैं

ख़त तरुण तेजपाल, मीडिया व समाज के नाम

तरुण तेजपाल, दोष तुम्‍हारा है या तुम्‍हारी बड़ी शोहरत या फिर समाज की उस सोच का, जो हमेशा ऐसे मामलों में पुरुषों को दोष करार दे देती है, बिना उसकी सफाई सुने, मौके व हालातों के समझे। इस बारे में, मैं तो कुछ नहीं कह सकता है, लेकिन तुम्‍हारे में बारे में मच रही तहलका ने मुझे अपने विचार रखने के लिए मजबूर कर दिया, शायद मैं तमाशे को मूक दर्शक की तरह नहीं देख सकता था। मीडिया कार्यालयों, वैसे तो बड़ी बड़ी कंपनियों में भी शारीरिक शोषण होता, नहीं, नहीं, करवाया भी जाता है, रातों रात चर्चित हस्‍ती बनने के लिए।

लूज कपड़े, बोस को लुभावने वाला का मैकअप, कातिलाना मुस्‍कान के साथ बॉस के कमरे में दस्‍तक देना आदि बातें ऑफिस में बैठे अन्‍य कर्मचारियों की आंखों में खटकती भी हैं। मगर इस शारीरिक शोषण या महत्‍वाकांक्षायों की पूर्ति में अगर किसी का शोषण होता है तो उस महिला या पुरुष कर्मचारी का, जो कंपनी को ऊपर ले जाने के लिए मन से काम करता है।

जब तक डील नो ऑब्‍जेक्‍शन है, तब तक मजे होते हैं, जिस दिन डील में एरर आने शुरू होते हैं, उस दिन विवाद होना तय होता है, जैसे आपके साथ हुआ। विवाद दब भी जाता, लेकिन तेरी शोहरत तुम्‍हें ले बैठी। मीडिया हाउस, तुम्‍हारे तहलकिया अंदाज से डरने लगे थे, तुम्‍हारी हिन्‍दी पत्रिका पांच साल पूरे कर चुकी है व पाठक निरंतर बढ़ रहे हैं। वैसे तुमने सही लिखा, परिस्‍थितियां सही नहीं थी, मेल से हुए खुलासे के अनुसार। मुझे भी कुछ ऐसा लगता है, क्‍यूंकि जहां हादसा हुआ, वह जगह भाजपा की है, तुम तो भाजपा के पहले शिकार हो, वो चूक कैसे कर सकती थी।

एक वेबसाइट पर प्रकाशित मेल पढ़ी, जिसमें आप दोनों के बीच की बात है, जिसको एक वेबसाइट ने प्रकाशित किया। उसमें लड़की कहती है कि तुम अक्‍सर उससे शारीरिक संबंधों से जुड़े मामलों पर बात करते थे, वो उन विषयों से भागना चाहती थी। इसमें शक नहीं होगा, आप में ऐसा होता होगा, लेकिन हैरानी तो इस बात से है कि वह फिर भी तुम्‍हारे ऑफिस में बने रहना चाहती थी, क्‍यूं, जब तुम्‍हारी सोच से वह अच्‍छी तरह परिचित हो चुकी थी। यह बात तो आम महिला भी समझ जाती है कि जहां शराब, शबाब एवं दिमाग खराब एकत्र होंगे, वहां हादसा तो होना ही है, लेकिन एक दूरदृष्‍टि रखने वाली महिला संवाददाता हालातों को भांप नहीं पाई, हद है।

मीडिया, मीडिया वाले के पीछे पड़ गया। इसलिए नहीं कि वहां पर महिला कर्मचारी के साथ शारीरिक शोषण हुआ, बल्‍कि इसलिए कि सामने वाले को इतना शर्मिंदा कर दिया जाए कि वह उठने लायक न बचे। भले ही, अदालती फैसले आने में देर है। पुलिसिया काईवाई शुरू हुई है। महिला ने आरोप लगाए हैं, सत्‍य साबित होने में वक्‍त है, मगर मीडिया स्‍वयं जज बनकर बैठा है, सिर्फ टीआरपी के चक्‍कर में। नहीं, नहीं, अपने एक प्रतिद्वंद्वी को खत्‍म करने के चक्‍कर में भी।

समाज। बड़ा अजीब है समाज। इतने सारे राम। हर आदमी के अंदर राम है, लेकिन ऐसे मामले में स्‍वयं को एक झटके में राम से अलग कर देता है। वह इतनी जल्‍दी भूल जाता है कि कभी कभी महिला का भी दोष हो सकता है। समाज हूं, भावनायों में बहता हूं। नहीं, नहीं, आजकल तो फेसबुक के प्रवाह में बहता हूं। मुझे कुछ पता नहीं होता, मैं तो उस घटना के समीप भी नहीं होता, जो घटना बंद कमरे में घटती है, दो लोगों के बीच घटती है।

मैं तो बस महिला की सुनता हूं। मेरी आदत है। आम ही देखा होगा, सड़क पर जाते हुए दंपति अचानक मोटर साइकिल से गिरता है। मैं दौड़े दौड़े जाता हूं, महिला को पकड़ कर उठाने की कोशिश्‍ा करता हूं, पुरुष तो खड़ा हो जाएगा। मैं महिला को कमजोर समझता हूं, या मेरा उसके प्रति आकर्षण है, यह बात मैं नहीं जानता, लेकिन मैं समाज हूं। मुझे पता है, वह महिला हमेशा स्‍वयं को दुर्बल कमजोर बताएगी, भले ही ऐसे मौकों पर मैं उसके पक्ष में खड़ता हूं। मैं समाज हूं।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र । पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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