सत्‍याग्रह की फिल्‍म समीक्षा

तमाम लटक- झटक दिखाने वाले ग्लैमरस सितारे, दाढी वाले अपने निर्देशक प्रकाश बाबू के साथ बुझे, घुटे और बोझिल से चेहरे लिए, कुल मिलाकर मन मारकर बुद्धु बक्से के कई कार्यक्रमों में "सत्याग्रह" का प्रमोशन करते दिखाई पड रहे थे, मुझे तो शक तभी हो गया था कि भैया इस फिल्मे में काम करके ये लोग फंस गए हैं, और अब इनसे हड्डी निगली नहीं जा रही.
..खैर सत्याग्रह नाम की इस फिल्म में बाद में तो यह समझ ही नहीं आता कि लोग आंदोलन क्यों कर रहे हैं , और आखिर क्यों अनशन पर बैठे हैं..?
बताते हैं अपनी घोषणा के बाद से अब तक इसे बनाने में बहुत समय ले लिया बाऊजी जी ने.. और जो बनाया है तो उसमें इतना हडबडी के साथ दिखा है कि पूछो मत..
इतनी घाई, मानों प्रोजेक्ट खत्मू करने का दबाव था.
फिल्म शुरू होते हुए हाथ में रहती है, लेकिन उसके बाद तो मानों सब कुछ निर्देशक के हाथों से, दर्शकों की आंखों से और महिला अभिनेत्रियों के चेहरे से मेकअप की तरह फिसलती हुई दिखती है... अब आगे आपकी मर्जी...!!!

सारंग उपाध्‍याय की फेसबुक से 

म्‍यांमार मामले पर केंद्रीय रक्षा मंत्री ने कहा, आंख दिखाना बुरी बात

भारतीय जमीन को निरंतर हथियाने के प्रयास हो रहे हैं। कभी चीन की ओर से, कभी पाकिस्‍तान की ओर से, अब फेहरिस्‍त में एक नया नाम जुड़ गया म्‍यांमार का, उधर श्रीलंका ने हमारे तीन सौ से अधिक मछुआरों को गिरफ्तार कर लिया। ऐसे में देश के रक्षा मंत्री से विशेष बातचीत करना बनता है।
एंकर - भारतीय सीमा पर म्‍यांमार ने चौंकी स्‍थपित करने का मन बना लिया है। कहें तो चीन और पाकिस्तान के बाद अब छोटा सा मुल्क म्यांमार भी भारत को आंखें दिखाने लगा है। इस बारे में सरकार की क्‍या प्रतिक्रिया है ?

केंद्रीय रक्षा मंत्री - हमारा देश राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी, जिनको अहिंसा के पुजारी कहा जाता है, की विचारधारा का अनुसरण करता है। महात्‍मा ने कहा है कि बुरा देखना मना है, और आंख दिखाना बुरी बात है, ऐसे में भारत इसको नहीं देख सकता। जब देख नहीं सकते तो कोई प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं लगती।

एंकर - ऐसे में तो म्‍यांमार के हौसले बढ़ जाएंगे ?
केंद्रीय रक्षा मंत्री - चीन के सैनिक किस दिन काम आएंगे, यह हिस्‍सा उनको सुपुर्द कर दिया जाएगा, वे खाली करवाकर हम को सौंप देंगे, क्‍यूंकि चीन गांधी के नियमों का अनुसरण नहीं करता। वे म्‍यांमार को खदेड़ देगा। चीनी और भारतीय तो भाई भाई हैं, भाई भाई में क्‍या अपना क्‍या पराया ? 

एंकर - कहीं ऐसा तो नहीं, देश में बढ़ती बेरोजगारी, रुपये की गिरती कीमत, और आर्थिक मंदी के कारण ख़राब हो रही देश की छवि के चलते म्‍यांमार ने ऐसा कदम उठाया है।

केंद्रीय रक्षा मंत्री - रक्षा मंत्रालय का मामला नहीं, हम सीमा सुरक्षा पर ध्‍यान देते हैं, आर्थिक सुरक्षा का मंत्रालय दूसरे मंत्री के पास है। हम अपना काम बराबर कर रहे हैं, देखिए पाकिस्‍तान ने जितने बार घुसपैठ की कोशिश की, हमारे सैनिक शहीद किए, हमने बराबर मुंह तोड़ जवाब दिया, मतलब शब्‍दी बाण चलाये।

एंकर - सिक्‍कम में चीन भारत सीमा पर चीनी और भारतीय सैनिकों ने एक साथ बैठकर रसगुल्‍ले, और बीयर पी, इस बारे में आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है ?

केंद्रीय रक्षा मंत्री - यह अच्‍छी बात है। जब देश की सरकारें एक स्‍तर पर बात करने में असफल हो रही हों, तब देश के जवान ही सरकार वाली जिम्‍मेदारी निभा रहे हों, तो इससे अच्‍छी बात क्‍या हो सकती है ? चीनी ने भारतीय मिठाई का लुत्‍फ उठाया तो चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों को बीयर दी, यह संस्‍कृति का आदान प्रदान है, दोनों देशों के सैनिक अपना अपना नजरिया सरकार के सामने रखेंगे, हो सकता है कि भारत अपने रसगुल्‍ले चीन में सप्‍लाई करने शुरू कर दे, और चीन अन्‍य उत्‍पादों के साथ बीयर भी भारत में दो नंबर के रास्‍ते से भेजे।

एंकर - अब हमारे पड़ोसी देश भारत के लिए दिक्‍कत बनते जा रहे हैं। श्रीलंका ने पिछले दिनों हमारे मछुआरों समुद्री सीमा से गिरफ्तार कर लिया। इस बारे में आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है ?

केंद्रीय रक्षा मंत्री - इस मामले को समझने की जरूरत है। मतलब कि शुरूआती जानकारियों के अनुसार मछुआरे मद्रास कैफे देख रहे थे, जो तमिल विरोधी फिल्‍म बताई जा रही है, हम यह नहीं कहते कि समुद्र में डुप्‍लीकेट वीसीडीओं के जरिये एंटरटेनमेंट करना बुरी बात है, लेकिन जब चेन्‍नई एक्‍सप्रेस अच्‍छी कमाई कर रही है, ऐसे में मद्रास कैफे देखने की क्‍या जरूरत थी। इस मामले को जल्‍द सुलझा लिया जाएगा, सरकार ने श्रीलंका सरकार को मद्रास कैफे की कॉपी भेज दी है, उम्‍मीद है कि मीडिया रिपोर्टों से ध्‍यान हटाते हुए श्रीलंका इस फिल्‍म की सही समीक्षा करेगी, और अगर श्रीलंका की ओर से फिल्‍म की समीक्षा अच्‍छी आई तो भारत इसको ऑस्‍कर के लिए भेजेगा।

आप हमारे स्‍टूडियो में आये, अपना कीमत समय हमारे साथ बताया। आपसे बातचीत कर अच्‍छा लगा। उम्‍मीद है कि फिर होगी बातचीत। दर्शकों आपको कैसी लगी हमारी बातचीत लिखना मत भूलिएगा। 

उठो बेटा, सूरज निकल आया, तुम अभी तक चारपाई तोड़ रहे हो। तुम्‍हारे बॉस का फोन आया था। ऑफिस जल्‍दी जाना है। क्‍या मां तुमने भी न मेरा स्‍वप्‍न तोड़ दिया, देश के रक्षा मंत्री का इंटरव्‍यू कर रहा था।

भारत सरकार और डॉलर में होगी सीधी वार्ता

डॉलर द्वारा भारतीय रुपये पर हो रहे निरंतर हमलों से सरकार पूरी तरह चिंतित है, लेकिन सरकार सोच रही है कि केवल चिंतन मंथन करने से काम नहीं चलेगा, अब पानी सिर से ऊपर निकल चुका है, ऐसे में डॉलर के साथ बैठकर आमने सामने बात करनी ही होगी। 

सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सरकार बहुत जल्‍द डॉलर के साथ बैठकर इस विषय पर बात करेगी। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सरकार इस मामले में तीन दौर की बैठक का आयोजन कर सकती है।

उम्‍मीद है कि डॉलर रुपये को इज्‍जत देने के लिए तैयार हो जाएगा, और इस समझौते से रुपये की गिरती हालत में सुधार होगा। डॉलर का रुपये के प्रति कड़ा रुख वैसे तो सरकार से बर्दाशत नहीं होता, लेकिन वार्ता के दौरान सरकार शांति व गांधीगिरी से काम लेगी।

उधर, जब इस बारे में वित्‍त मंत्री से संपर्क साधा गया, और रुपये की दिन प्रति दिन बिगड़ रही तबीयत के बारे में पूछा गया तो उन्‍होंने कहा, लोगों को डॉलर की खरीददारी पर अंकुश लगाने की अपील की जा रही है, लेकिन लोग डॉलर खरीदने में अधिक दिलचस्‍प ले रहे हैं, उनको लग रहा है कि डॉलर भी सोने की तरह अच्‍छा रिटर्न देगा। साले पागल लोग।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार वार्ता के लिए दोनों तरीकों पर विचार कर रही है, अगर डॉलर भारत में आना चाहता है तो स्‍वागत है, नहीं तो सरकार के प्रतिनिधि बातचीत के लिए अमेरिका की यात्रा कर सकते हैं।

वैसे तो सरकार को पूरी उम्‍मीद है कि मामला सुलझ जाएगा, अगर डॉलर ने पाकिस्‍तान की तरह नखरे दिखाने की कोशिश की तो सरकार नक्‍सलवाद की तरह डॉलर को भी सख्‍त चेतावनी देगी।

अगर डॉलर अपनी हकरतों से बाज नहीं आया तो हो सकता है कि सरकार डॉलर को भारत में प्रतिबंधित कर दे। ऐसे में डॉलर अपनी जिद्द की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अगर बात न बनी तो सरकार नेपाल करंसी से बात करेगी।

एक अन्‍य सवाल के जवाब में वित्‍त मंत्री ने कहा कि अमेरिका के लिए टिकटें हमेशा सरकार पहले से बुक करवाकर रखती है, क्‍यूंकि जो दशा सरकार की है, ऐसे में कभी भी देश छोड़कर भागना पड़ सकता है, क्‍यूंकि गांधीगिरी भाषण से अब बहुत दिन चलने वाला नहीं।

उधर, प्रकाश झा अपनी नई फिल्‍म सत्‍याग्रह से गांधी के मनपसंद शांति प्रिय भजन को अहिंसा भरपूर बना रहा है, और सीता राम से कह रहा है कि अब लोगों को धैर्य मत दे, अब और सहने की हिम्‍मत मत दे।

इनपुट फेकिंगन्‍यूज डॉट कॉम से भी

कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी, और एक शोध का दावा

हर साल की तरह इस बार भी, श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आज आधी रात करोड़ों हिन्दुओं के आराध्य, सोलह कलाओं तथा 64 विद्याओं के पारंगत, चक्र सुदर्शनधारी भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्मोत्सव परंपरागत और उल्लासपूर्वक मनाया जायेगा।

संयोग देखिए, जब विश्‍व का एक समुदाय भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्‍मोत्‍सव बनाने की तैयारियों में जुटा हुआ था, तब जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय का एक अध्‍ययन सामने आया, जिसमें कहा गया कि नवजात बच्चे को मां के गर्भ में रहते हुए अपनी जननी की और अन्य लोगों की आवाज़ें याद रहती हैं। शोधकर्ताओं ने शोध के दौरान 74 महिलाओं का परीक्षण किया जो 36 हफ्तों की गर्भवती थीं। उन्हें दो मिनट तक कहानियां सुनाने को कहा गया और इस दौरान गर्भ में पल रहे शिशु की धड़कनों और हरकतों का परीक्षण किया गया।

इस शोधकार्य के दौरान पता चला कि औसतन एक बच्चा एक ही शब्द 25 हज़ार बार सुन सकता है। जीवन के पहले महीने में बच्चा उस संगीत के प्रति प्रतिक्रिया दिखाता है जो उसने गर्भावस्था की अंतिम तिमाही में सुना था। आप सोच रहे होंगे, इस का कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी से क्‍या संबंध है ?

कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी का संबंध श्रीकृष्‍ण भगवान से है, और श्रीकृष्‍ण भगवान से जुड़ी एक कथा तो आपको याद होगी, जिसमें बताया जाता है कि श्रीकृष्‍ण भगवान बहन सुभद्रा को चक्रव्‍यूह भेदने का तरीका बता रहे थे, लेकिन बात के बीच में गर्भवती सुभद्रा की आंख लग गई, और वो सो गई, बात अधर में रह गई, और गर्भ में अभिमान्‍यु केवल चक्रव्‍यूह भेदने तक सुन पाया, आगे नहीं। जो शोध अब सामने आई है, यह उस बात की पुष्‍टि कर रही है, जो बहुत पहले से भारतीय धर्मों में बताई जा रही है।

इतना ही नहीं, कुछ महीने पहले एक अन्‍य संस्‍थान अमेरिकी शैक्षणिक संस्‍थान पैसिफिक लुथरीन यूनिवर्सिटी ने भी इस तरह की बात कही थी। वैसे ज्‍यादातर महिलाएं गर्भावस्‍था के दौरान गर्भ में पल रहे अंश की अठखेलियों को महसूस करती हैं। उनके उदास होने, उनके खुश होने, उनके अठखेलियां करने आदि को महसूस करती हैं। बच्‍चे की किक तो बहुत से पिताओं ने महसूस की हो गई, लेकिन अन्‍य हकरतें केवल मां महसूस कर सकती है।

यह हरकतें बच्‍चा बाहर हो रही गतिविधियों पर प्रतिक्रियाएं देते हुए करता है। कुछ महिलाएं तो यहां तक कहती हैं कि अगर गर्भ में पल रहा शिशु शांत है तो लड़का, अगर शरारती है, तो लड़की। कभी कभी ऐसे कयास स्‍टीक भी बैठते हैं।

दस साल की 'बच्‍ची' पर 'रेप' का केस

ब्राउन टी शर्ट में खड़ा मुस्‍कराते हुए जैक
बात दस साल की अशले से शुरू करते हैं, जो मेलबर्न में रहती है। उसका अब बच्‍चों के समूह के साथ खेलना प्रतिबंधित है। अप्रैल की एक घटना ने अशले को बच्‍चों के समूह से दूर कर दिया।

दरअसल, दस वर्षीय अशले एक डॉक्‍टर गेम के दौरान चार साल के लड़के को असंगत ढंग से छूते हुए पाई गई। शिकायत के बाद पुलिस ने अशले को गिरफ्तार कर लिया, उससे पूछताछ की, और चार दिन के लिए उसको हैरिस काउंटी बाल सुधार गृह में छोड़ा गया। 

इस मामले में जब बच्‍ची से पूछताछ की जा रही थी, तो उसकी मां को भी वहां पर उपस्‍थित होने की आज्ञा नहीं दी गई। अब दस वर्षीय बच्‍ची को अक्‍टूबर में बलात्‍कार के आरोप के तहत कोर्ट में पेश किया जाएगा। यह घटना अप्रैल महीने में घटित हुई थी। बच्‍ची को बच्‍चे के साथ असंगत तरीके से छेड़छाड़ करते पाया गया, और मामला चला। भारत में गैंगरेप होने के बाद भी विचार किया जाता है कि रेप करने वाला नाबालिग है या बालिग।

मानवता का परिचय देता एक मामला मियामी में सामने आया है। जहां एक माता पिता ने अपने बीमार बेटे के सारे अंगदान करने का फैसला किया है। दस साल का जैकची रेयन देखने में बेहद खूबसूरत, मासूम और लवली ब्‍यॉय है, लेकिन उसको एक बीमारी ने जकड़ लिया, जो दिमाग से संबंधी है। जैकची का ब्रेन खत्‍म हो चुका है। 

ऐसे में उसके माता पिता ने फैसला किया कि उसके अंग दान किए जाएं, ताकि चत्‍मकार का रास्‍ता देख रहे किसी व्‍यक्‍ति को जीने की आशा मिल जाए। इस अभियान के लिए जैकची के माता पिता ने एक फेसबुक पेज pray4number4-zachary reyna  भी तैयार किया। यहां पर रेयन की बेहद खूबसूरत दिल लुभावनी तस्‍वीरें हैं, जिनको देखकर ऐसा लगता है, जैसे कोई झूठ बोल रहा है, कोई मजाक कर रहा है, इतना खूबसूरत बच्‍चा, इतनी जल्‍दी कैसे जा सकता है, लेकिन यह हकीकत है कि वे अब इस दुनिया के और लोगों को जिन्‍दगी देकर रुखस्‍त हो रहा है।

फेसबुक के इस पन्‍ने पर लिखा है, कि आज मंगलवार रात से जैक अपने सारे अंग दान करने की घोषणा करते हुए जीवन बचाओ मुहिम का आगाज कर रहा है। जैक ने अपने सारे अंग दान कर दिए उनके लिए जो किसी महान चत्‍मकार का इंतजार कर रहे हैं। वे जिन्‍दा रहेगा, उसका दिल किसी के सीने में धड़केगा, उसके फेफड़े किसी को सांस लेने में मदद करेंगे, कुछ लोगों को उसके अन्‍य अंग जीने की नई आशा देंगे।

ऐसी स्‍थिति में ज्‍यादातर मां बाप सदमे से उभर नहीं पाते, वहीं जैक के माता पिता इतना बड़ा फैसला कर रहे हैं, यह भी ताजुब की बात है। मानवता का इससे बड़ा उदाहरण देना मुश्‍िकल है। इस मानवता की कहानी को शायद भारतीय मीडिया में कहीं जगह नहीं मिली, क्‍यूंकि भारतीय मीडिया एक नेगेटिव स्‍टोरी पर अपना पूरा दम खम लगा रहा था, वे दूनिया को बता रहा था, एक युवती ने किस तरह एक पब के टॉयलेट में घुसकर बच्‍चे को जन्‍म दिया, और फिर उसको पॉलीथीन में भर टॉयलेट में फेंक दिया। 

इस युवती ने जहां नवजात को, अपने खून के कतरे कतरे से सींचे पौधे को फलने फूलने से पहले मार दिया, वहीं जैक के माता पिता, उन जिन्‍दगियों को खुशियों से भर देना चाहते हैं, जो उनसे कोसों दूर किसी चत्‍मकार की राह देख रही हैं, शायद तभी जैक के माता पिता अपने बच्‍चे को मिरेकल कहकर पुकार रहे हैं। मियामी के जैक का दिल भले ही किसी एक सीने में धड़के, लेकिन उसके द्वारा किया कार्य उसको हर दिल में रहने का हक देता है, वे हर दिल में धड़केगा, जो मानवता से प्‍यार करता है।

सलाम जिन्‍दगी, सलाम जैक।

कपड़ों से फर्क पड़ता है

मुम्‍बई में महिला पत्रकार के साथ हुए गैंग रेप हादसे के बाद कुछ नेताओं ने कहा, महिलाओं को कपड़े पहनने के मामले में थोड़ा सा विचार करना चाहिए। यकीनन यह बयान महिलाओं की आजादी छीनने सा है। अगर दूसरे पहलू  से सोचें तो इसमें बुरा भी कुछ नहीं, अगर थोड़ी सी सावधानी, किसी बुरी आफत से बचा सकती है तो बुराई कुछ भी नहीं। हमारे पास आज दो सौ किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ने वाले वाहन हैं, लेकिन अगर हर कोई इस सपीड पर कार चलाएगा तो हादसे होने संभव है। ऐसे में अगर कोई गाड़ी संभलकर चलाने की बात कहे तो बुरा नहीं मानना चाहिए। देश का ट्रैफिक, सड़कें भी देखनी होगी, केवल स्‍पीड देखने भर से काम तो नहीं हो सकता। ऐसी सलाह देश के कुछ नागरिकों को बेहद नागवार गुजरती है, लेकिन आग के शहर में मोम के कपड़े पहनना भी बेवकूफी से कम न होगा। हमें कहीं न कहीं समाज को देखना होगा, उसके नजरिये को समझना होगा। जब हर कदम पर सलीब हो, और हर तरफ अंधेरा फैला हो, तो यकीनन हर कदम टिकाते समय बहुत सावधानी बरतनी पड़ेगी, पहले टोह लगानी पड़ेगी है, नीचे सलीब तो नहीं, एक दम दौड़कर निकलने वाले अक्‍सर लहू लहान होते हैं। देश की सरकार को कोसने भर से, देश की उन लड़कियों की आबरू वापसी नहीं आ सकती, जो हवश के तेज धार हथियार से घायल हो चुकी हैं। दिल्‍ली से मुम्‍बई तक। देश का शायद ही कोई कोना इससे बचा हो। ऐसा नहीं कि सेक्‍सी कपड़े पहनने वाली बालाओं को निशाना बनाया जाता है, लेकिन देश के ऐसे भी कई हिस्‍से हैं, जहां फैशन नाम की चिड़िया ने दस्‍तक नहीं दी। और वहां पर भी हादसे होते हैं। उसके भी कई कारण हैं, सबसे पहला कारण कमजोर कानून और सामाजिक प्रभाव, आम बोल चाल का हो, या सिनेमा हाल का।

देश को आजाद हुए साढ़े छह दशक से अधिक का समय हो गया। सिनेमा एक शताब्‍दी पूरी कर गया। लेकिन देश की आजादी के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर न सरकारों ने कुछ सोचा, और दूसरी तरफ सौ साल के सिनेमे ने भी औरत को आइटम बनाने में कोई कसर तो बाकी नहीं छोड़ी। छह करोड़ का ठुमका। सिनेमा हॉल में सीटियां तालियां बटोरता है। साड़ी पहनने या सीधी सादी लड़की का किरदार हमेशा हिट फिल्‍म का हिस्‍सा तो रहा, लेकिन उस किरदार को अदा करने वाला चेहरा रुपहले पर्दे से गायब हो गया। महिलाओं को परिवार से घूमने की आजादी को मिल गई। मनपंसद कपड़े पहनने की। आजादी के साथ मुसीबतें आती हैं। इसको नकारना बेहद पागलपन होगा। महिलाएं बराबरी का अधिकार जताती हैं, जो जताना चाहिए, लेकिन वे रेलवे टिकट कटवाते हुए खुद को महिला कहते हुए आगे निकल कर टिकट कटवाने का हक भी जताती हैं। बस में सफर करते वक्‍त भीड़ के बीच खड़े होना आज भी जिसके लिए सलीबों पर टंगे होने से कम नहीं, वे खुले बाजार में निकलते क्‍यूं भूल जाती है, घर परिवार बदला है, लेकिन जमाने की सोच नहीं।

देश मॉर्डन होता जा रहा है, लेकिन आज भी युवा पीढ़ी एक नारे को बड़े गर्व से कहती है। वैसे तो पक्‍के ब्रह्मचारी, लेकिन जहां मिल गई वहां ***, युवा पीढ़ी की इस सोच को कैसे नकार सकते हैं। देश के बाबा भी इस नियम को फलो करते हैं। हर तरफ जब आग का गोल चक्र बना हो तो मोम के कपड़े पहनकर निकलना बेहद घातक होता है। देश की सरकार कुछ करे न करे, लेकिन स्‍वयं की इज्‍जत तो स्‍वयं के हाथों में है। फैसला स्‍वयं को करना है। देश में बलात्‍कार जैसे हमलों को रोकने के लिए सख्‍त कानूनों की जरूरत है, लेकिन कानून बनने के बाद भी सुरक्षा की गारंटी तो नहीं। देश के सौ साल के सिनेमे ने औरत को भोग विलास की चीज के रूप में पेश किया है। इस तस्‍वीर को धुंधला होने में वक्‍त लगेगा। इस समाज में लड़का स्‍कूटरी के पीछे बैठा, और लड़की चला रही हो तो भी लोग बेगानी निगाहों से देखते हैं। अगर कानून बनने भर से देश की जनता को सुरक्षा की गारंटी मिल गई होती तो पुलिस थाने कब के दम तोड़ गए होते, जो आज पैसे बनाने की मशीन बनते जा रहे हैं। यहां अपराधी कम दलाल अधिक मिलते हैं। छोटे मोटे केस सुलझाने में कोर्ट भले ही मात खा जाए, लेकिन दलाल लोग कभी मात नहीं खाते। ऐसा नहीं कि मानवी दिमाग को आपके कपड़े ही केवल प्रभावित करेंगे, उसके दिमाग को रुपहले पर्दे के कपड़े भी प्रभावित करते हैं। फोटो कॉपी आज भी दिमाग में यॉरॉक्‍स है, टूथपेस्‍ट आज भी कोलगेट, और डिटर्जेंट पाउडर आज भी सर्फ। प्रभाव रहता है, प्रभाव पड़ता है। कपड़ों से फर्क पड़ता है। आपका गेटअप कपड़ों से आता है, फेसबुक पर सेक्‍सी, हॉट जैसी प्रतिक्रियाएं पाने के बाद खुश होना अच्‍छी बात है, लेकिन उसका संबंध कहीं न कहीं, असल जिन्‍दगी से है। यह भी समझना अति जरूरी है। आपका गेटअप आपको सेक्‍सी, हॉट और साधारण बनाता है। आजादी की दुहाई देकर हर बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता। 

चलते चलते इतना कहूंगा, रात के 10 बजे जब मैं, अपने कार्यालय से घर की तरफ लौटता हूं तो सुनसान हाइवे पर लड़के लड़कियां टहलते हुए देखता हूं। यह कोई अजीब बात नहीं, लेकिन अजीब बात तो यह है कि लड़का पूरे ट्रैक सूट में होता है, और लड़की खुली टी शर्ट, और 12 इंच की चड्ढी में होती है।

फ़ैरो आइलैंड्स की चुनौतियां

आइलैंड्स घूमने का बहुत शौक होता है पर्यटकों को। वहां की हरियाली, वहां के वातावरण में सांस लेने का अपना ही एक मजा होता है, लेकिन फ़ैरो आइलैंड्स की युवा पीढ़ी अपने आइलैंड्स से दूर भाग रही है। अटलांटिक महासागर के उत्तरी भाग फ़ैरो आइलैंड्स की सरकार के सामने आज दो चुनौतियां हैं, तो युवा पीढ़ी के पलायन को रोकना, दूसरा अपने भोजन और आय स्रोत को जिंदा रखना। चालीस हजार की आबादी वाला यह खूबसूरत आइलैंड्स युवा पीढ़ी के पलायन के कारण धीरे धीरे खाली होता जा रहा है। यहां के नागरिकों का मानना है कि यहां पर जीवन अधिक मुश्‍िकल है, अन्‍य जगहों के मुकाबले में महंगा भी। युवा पीढ़ी अपने सपनों को साकार करने के लिए आइलैंड्स से बाहर निकलकर संघर्ष करना चाहती है, नाम कमाना चाहती है। भारतीय समाज भी गांवों से निकलकर मंडियों और शहरों में तबदील हो रहा है। 

आइलैंड्स की सरकार जहां कम होती जनसंख्‍या से परेशान है। वहीं यूरोपियन संघ का मछली पकड़ने पर प्रतिबंध लगाना भी इस आइलैंड्स वासियों को नागवार गुजर रहा है। यहां के प्रधानमंत्री ने यूरोपियन संघ को चैंलेज करते हुए कहा, वे 150 वर्षों से इस आइलैंड्स पर रह रहे हैं। उनका मुख्‍य भोजन स्रोत मछलियां हैं। और वे अपने अधिकार क्षेत्र वाले पानी में कुछ भी करें, उससे यूरोपियन संघ को दिक्‍कत नहीं होनी चाहिए, वे क्रोध होकर कहते हैं कि उत्‍तरी अटलांटिक महासागर के लुटेरे नहीं हैं।

'गे' वेंटवर्थ मिलर ने की 'मर्दों' वाली बात

बहुत मुश्‍किल होता है कभी कभी उस बात को स्‍वीकार करना, जिसको समाज में असम्‍मानजनक नजर से देखा जा रहा हो, लेकिन अमेरिकी धारावाहिक प्रिज्‍यॅन ब्रेक के स्‍टार वेंटवर्थ मिलर ने रूस में आयोजित होने वाले इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्‍टीवल में बतौर मुख्‍यातिथि के लिए आए न्‍यौते को ठुकराते हुए स्‍वयं के गे होने की बात को सार्वजनिक कर दिया। रूस के प्रस्‍ताव को ठुकराने और स्‍वयं को गे घोषित करने के बाद टि्वटर पर उनके लोकप्रिय धारावाहिक प्रिज्‍यॅन ब्रेक के ट्रेंड ने जोर पकड़ लिया।

दरअसल, रूस ने एक नया प्रस्‍ताव पारित किया है, जो असल में है तो एंटी गे लॉ, लेकिन सरकार इस बिल का बचाव बच्‍चों की सुरक्षा का हवाला देते हुए करती है। सेंट पीटर्सबर्ग ऐसी जगह है, जहां पर गे बहुसंख्‍या में रहते हैं, लेकिन हिंसक गतिविधियों के कारण सामने आने का सांस नहीं करते। पिछले दिनों न्‍यू यॉर्क टाइम्‍स में एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसकी शुरूआत करते हुए लेखक ने लिखा था, अगर यह लेख रूस में प्रकाशित हुआ होता तो इसके लिए एक्‍स रेटिंग होती, और 18 साल से कम उम्र के बच्‍चों को पढ़ने की मनाही होती। इस लेख के अंदर कई ऐसी घटनाओं का जिक्र है, जहां पर गे युगलों को निशाना बनाया गया।

अगले वर्ष होने वाले 2014 विंटर ओलंपिक गेम्‍स पर एंटी गे लॉ की काली परछाई पड़ सकती है, क्‍यूंकि गे समुदाय के पक्ष में कुछ देश इन खेलों का विरोध करने का मन बना रहे हैं। पिछले दिनों तो एक ब्रिटिश कॉमेडियन स्‍टिफन फ्राय, जो गे हैं, ने कहा था कि सोची गेम्‍स का बायकॉट किया जाए। अप्रैल महीने में लवादा सेंटर की ओर से गे संबंधों को लेकर एक सर्वे किया गया, जिसमें 35 फीसदी रूसी लोगों ने समलैंगिक रिश्‍ते को एक बीमारी बताया, तो 43 फीसद लोगों ने इसको बुरी आदत कहा। उधर, इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी ने गे एथलीट और दर्शकों को सुरक्षा को लेकर चिंतित न होने की बात कही है, लेकिन इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी उन घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती, जिनमें गे समुदाय के लोगों को त्रासदी का सामना करना पड़ता है। सेंट पीटसबर्ग, जहां पर अमेरिकी टेलीविजन स्‍टार को बुलाया जा रहा था, वहां पर पिछले महीने गे प्राइड एवेंट का आयोजन किया गया, तो पुलिस ने गे प्राइड एवेंट में शामिल लोगों को पकड़कर खूब धोया।
सेंट पीटर्सबर्ग की गे प्राइड एवेंट से वापिस इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्‍टीवल की तरफ लौटते हैं, जिसका न्‍यौता अमेरिकी टेलीविजन एक्‍टर ने इसलिए ठुकरा दिया, क्‍यूंकि वे स्‍वयं एक गे है। रूस के इन्‍वीटेंशन के बाद आयोजकों के नाम लिखे ख़त में वेंटवर्थ मिलर ने लिखा, मुझे खुशी है कि आपने मुझे इतने बड़े प्रोग्राम में बतौर मुख्‍यातिथि आने का न्‍यौता दिया। पिछली बार रूस में बेहद मजा आया। मुझे अच्‍छा लगता अगर में इस बार में भी हां कहता, लेकिन एक गे होने के नाते मैं इस न्‍यौते को सिरे से खारिज करता हूं।
मैं उस देश के एक जश्‍न में शरीक नहीं हो सकता, जहां मेरे जैसे लोगों को खुले में प्‍यार करने और जीने की आजादी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा हो। जो रूस सरकार ने पिछले दिनों एक युवक और महिला के साथ व्‍यवहार किया, उसने मुझे अंदर तक तोड़ दिया है। ऐसे में मैं रूस का चक्‍कर नहीं लगा सकता। इस तरह उसने अपना विरोध प्रकट किया।

ऐसा नहीं कि ऐसा केवल विदेश है, भारत में भी बड़ी बड़ी हस्‍तियां गे हैं, लेकिन सार्वजनिक तौर पर किसी ने अभी तक स्‍वीकारा नहीं, और न ही गे समुदाय के लिए आवाज उठाई।

जो कल तक लोगों की निगाह में एक टेलीविजन स्‍टार था, अचानक उसने अपने गे होने की बात स्‍वीकार करते हुए अपने चाहने वालों को चौंकाया होगा। उसको पता भी होगा कि इससे उसको नुकसान हो सकता है, लेकिन जब बात किसी के अहं को लगती है तो वे दौलत सौहरत को छोड़कर निकल पड़ता है। एक गे ने कही, मर्दों वाली बात, इसलिए कह रहा हूं, अमेरिका और ब्रिटेन नरेंद्र मोदी को हर बार वीजा न देने की बात कहकर एक नये विवाद को जन्‍म दे देते हैं, एक भारतीय जन प्रतिनिधि का अपमान कर देते हैं, लेकिन भाजपा के अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह खुशी खुशी अमेरिका की यात्रा करते हैं। किसी भी जन प्रतिनिधि के साथ कोई देश इस तरह का बर्ताव करे तो देश के राजनेताओं को सोचना चाहिए, अगर कल को उनकी सत्‍ता न रही तो क्‍या अमेरिका ब्रिटेन उनके साथ भी इस तरह का व्‍यवहार करेंगे। एक गे अपने गे भाईयों पर हो रहे अत्‍याचारों के लिए सार्वजनिक तौर पर न्‍यौते को ठुकराता है। रूस की सरकार को दिखाता है कि गे के अहं को भी चोट लगती है, उसकी भावनाएं हैं, भले ही इसको आप बुरी आदत कहें या बीमारी। लेकिन जो लत लग गई, उसका इलाज नहीं है। अमेरिका ब्रिटेन एक भारतीय जन प्रतिनिधि को वीजा नहीं देता, और देश की सरकार विदेश नीति को लेकर सख्‍त कदम नहीं उठाती तो देश को शर्म आनी चाहिए।

पैट्रोल है, रुपया नहीं, ओनियन है, रुपया नहीं

डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये को लेकर भारत सरकार का पता नहीं क्‍या रवैया है या भविष्‍य में होगा, लेकिन चीन पब्‍लिक पेशाबघरों में गिरते पेशाब से पूरी तरह दुखी है। अब इसके हल के लिए चीन के एक शहरी प्रबंधन विभाग ने एक नया नियम बनाया है।  पेशाब करने के लिए लगाए स्‍टैंडिंग बाउल से अगर आपका पेशाब बाहर गिरा तो चीन के हांगकांग से सटे सेनजेन शहर में आपको 16 डॉलर तक का दंड किया जाएगा। भले ही इस आदेश के बाद चीनी लोगों ने अपने नेटवर्किंग साइट पर इस नियम को लेकर खूब मजाक उठाया, यहां तक लिख दिया गया, अब नये इंस्‍पेक्‍टर भर्ती किए जाएंगे, जो हर पेशाब करने वाले के पीछे खड़े होकर लाइनमेंट चेक करेंगे। मजाक और असल जिन्‍दगी में फर्क होता है, यकीनन पेशाबघरों की हालत सुधरेगी, भले भारतीय रुपये की हालत सुधरने में वक्‍त लगे। गिरने से याद आया, कल बापू आसाराम का नाम भी उस गोलक में गिर गया, जिसमें पहले से कई बाबाओं के नाम गिर चुके हैं। इस गोलक को रेप आरोप बॉक्‍स कहते हैं। बाबागिरी का जीवन स्‍तर ऐशो  आराम वाला हो रहा है तो अध्‍यात्‍मिक स्‍तर गिर रहा है। अब ए सी कमरे हैं, नीचे मखमल के गद्दे हैं, ऊपरी रेश्‍म की ओढ़नी है, ऐसे में अकेले मन कैसे लगे, और सुविधाओं की जरूरत महसूस होने लगी है। जय हो मेरे गांव वाले बाबा की, जो महिलाओं को अपने डेरे के आस पास आने तक नहीं देता था, और इस गोलक से बच गया। बाबाओं का स्‍तर गिर रहा है, देश के नेताओं का स्‍तर तो आजादी के बाद से निरंतर रसतल से भी नीचे जा रहा है। रुयपे डॉलर के मुकाबले ही नहीं, प्‍याज, पैट्रोल, चीनी, अन्‍य वस्‍तुओं के मुकाबले भी तो कमजोर पड़ रहा है। मेरे पिता बताते हैं, वैसे तो सबके बताते होंगे, हम मेले में जाते थे, केवल बारह आने में ढे़र सारे पकौड़े लेकर आते थे, आज मेले में नहीं जाते, क्‍यूंकि अब आने ही नहीं, रुपया भी फेल हो रहा है।

इन दिनों एक गोरा, एक पैट्रोल पर पंप गया, वहां खड़े कर्मचारी को डॉलर देते हुए कहा, डालो पैट्रोल, उसने मशीन चलाई, थोड़े से टाइम बाद  गड़ गड़ की आवाज आना बंद हो गई, एक लीटर पूरा नहीं हुआ था, तो गोरे ने कहा, यह क्‍या, यह डॉलर है, रुपया नहीं, तो सामने पैट्रोल पंप कर्मचारी ने कहा, साहेब यह पैट्रोल है, रुपया नहीं।

जब वक्‍त खराब हो, हर जगह से मात पड़ती है, अब गोरा थोड़ा सा आगे गया, प्‍याजों की रेहड़ी खड़ी थी, लाल लाल चमकते प्‍याज, उसको भा गए, सोचा खरीद लेता हूं, रेहड़ी वाले के पास गया, डॉलर दिया, और बोला प्‍याज दे दो, प्‍याज वाले ने प्‍याज तोलकर गोरे के हाथ में थमा दिए, गोरा खड़ा रहा है, तो प्‍याज वाले ने पूछा साहेब, कुछ और चाहिए, गोरा बोला नहीं, बाकी के पैसे चाहिए, तो रेहड़ी वाले ने कहा, हो गया पूरा हो गया साहेब, गोरे ने फिर कहा, यह रुपया नहीं डॉलर है, तो सामने रेहड़ी ने कहा, मुझे पता है, लेकिन आपको पता नहीं, यह ओनियन है, रुपया नहीं। अंग्रेज निराश होकर चल दिया। चलो कोई तो है जो डॉलर को नीचा दिखा रहा है, वरना रुपये तो रसतल की तरफ जा रहा है।

इसके लिए कौन जिम्‍मेदार है। यकीनन पहली नजर में तो सरकार। जिस पर विपक्ष निशाने लगाए जा रहा है। देश की सौ करोड़ से अधिक आबादी इसके लिए जिम्‍मेदार नहीं, क्‍यूंकि अगर सौ करोड़ की आबादी वाला देश एक अच्‍छा एजुकेशन सिस्‍टम पैदा नहीं कर सकता तो बच्‍चों को पढ़ने के लिए मजबूर विदेश जाना होगा, यहां का पैसा वहां के एजुकेशन सेक्‍टरों की ग्रोथ के लिए खर्च करना होगा। देश की खूबसूरत जगहाएं जब दंगों की आग में झुलसने, कुदरती मुसीबतों के कारण खराब होने लगेंगी तो फिल्‍म शूटिंग के लिए फिल्‍म इंडस्‍ट्री को विदेश का रुख करना होगा। अब भारतीय हिल स्‍टेशन, जंगल या शिमला, कश्‍मीर, फिल्‍मों में नजर नहीं आते। अगर आज की युवा विदेश ब्रांड को प्‍यार करने लगी, तो दोष सरकार का है, युवा पीढ़ी का नहीं, क्‍यूंकि वे तो विश्‍व स्‍तरीय लुक चाहती है, अगर देश की सरकार देश में गुणवत्‍ता बरकरार रखने में चूकती है तो कोई इस पीढ़ी को दोष कैसे दे सकता है। गोगल्‍स, टी शर्ट, जूते, कारें सब विदेशी ब्रांड पसंद हैं। ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ेगी, जब डॉलर की मांग बढ़ेगी तो अर्थशास्‍त्र कहता है कि बाजार में जिस की मांग बढ़ी, उसके रेट चढ़े। भले ही देश का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक अच्‍छा अर्थशास्‍त्री है, लेकिन इस मोर्चे पर वे सामाज शास्‍त्री के तौर भी नजर नहीं आते।

देश में हर साल लाखों वाहन सड़कों पर उतर रहे हैं। पैट्रोल की खपत बढ़ रही है। पैट्रोल की खपत बढ़ेगी तो यकीनन भारत को पैट्रोल अधिक मंगवा पड़ेगा। इरान भले ही भारत के साथ भारतीय करंसी में डील करने के लिए सहमति जता चुका है, जब तक यह फैसला पक्‍का नहीं होता, तब तक डॉलर में से होकर रुपये को गुजरना होगा, और यह गुजरना भारत की धज्‍जियां उड़ा रहा है। ऐसा नहीं कि पैट्रोल की बढ़ती खपत के लिए देश के नागरिक जिम्‍मेदार हैं, वे तो बेचारे अपने पैसे को वाहनों पर खर्च कर रहे हैं, ताकि देश को रैवेन्‍यु मिल सके, देश के अंदर वाहनों का कारोबार करने वाली कंपनियों को मजबूती मिल सके, अगर सरकार चाहे तो पब्‍िलक ट्रांसपोर्ट को मजबूत बना सकती है। टोकियो जैसा भारी जनसंख्‍या वाला शहर अगर ट्रैफिक समस्‍या से उलझता नहीं तो कारण है कि वहां पर पब्‍लिक ट्रांसपोर्ट बेहद बेहतरीन है। लोग पब्‍लिक ट्रांसपोर्ट में जाना पसंद करते हैं, पर्सनल गाड़ी लेकर जाने की बजाय। मगर भारत में पर्सनल गाड़ी पर ज्‍यादा विश्‍वास है, क्‍यूंकि पब्‍लिक ट्रांसपोर्ट, मतलब सरकारी, और सरकारी शब्‍द भारतीयों को एक ही जगह अच्‍छा लगता है, केवल नौकरियों में, दूसरी जगह कहीं नहीं, क्‍यूंकि सरकारी नौकरी, चिंताओं से मुक्‍त। बारिश आये, तूफान आये, मंदी का दौर आए, लेकिन कभी वेतन नहीं रुकेगा, रुका तो ब्‍याज समेत आयेगा।

रुपये के गिरते स्‍तर से परेशान देश। जिम्‍मेदार सरकार। जो रुपया देशी प्‍याज के सामने कमजोर हो सकता है, वे डॉलर के आगे सिर कैसे उठाएगा। जिस देश में बाबा रासलीला रचाते हों, वहां पर नेताओं पर रासलीला को लेकर उंगली उठाना, मूर्खता होगी, क्‍यूंकि राजाओं के समय से विलासता शासन करने वालों का जन्‍म सिद्ध अधिकार रही है। डॉलर की औकत, प्‍याज, और पैट्रोल के सामने कुछ नहीं। थोड़ा सा अभियान हम भी कर सकते हैं।

अंधविश्‍वास के खिलाफ लड़ने वाले योद्धा नरेंद्र दाभोलकर नहीं रहे

महाराष्ट्र में 'अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून' लाने की कोशिशों में जुटे नरेंद्र दाभोलकर को दक्षिणपंथी संगठनों की तरफ से जो आखिरी धमकी दी गई थी उसमें कहा गया था 'गांधी को याद करो: याद करो हमने उसके साथ क्या किया था'। दाभोलकर की अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति पिछले 14 सालों से इस बिल के लिए कैंपेनिंग कर रही है।

मंगलवार को अज्ञात हमलावरों ने सोशल ऐक्टिविस्ट नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या कर दी थी। समाचार एजेंसी पीटीआई ने पुलिस सूत्रों के हवाले से बताया कि दाभोलकर सुबह की सैर के लिए निकले थे कि तभी मोटरसाइकिल पर सवार दो हमलावरों ने उनके सिर पर करीब से गोलियां दाग दीं। उन्हें शहर के ओंकारेश्वर पुल पर घायल अवस्था में पाया गया। बाद में उन्होंने ससून अस्पताल में दम तोड़ दिया।

दाभोलकर पिछले 40 सालों से अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून बनवाने के लिए प्रयासरत थे। 2005 में उनका यह विधेयक महाराष्ट्र विधान परिषद में पेश भी हुआ लेकिन इसे पुनर्विचार समिति के पास भेज दिया गया। बीते 8 सालों से यह वहीं अटका हुआ है।

जुलाई में हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए दाभोलकर ने कहा था, 'मुझे 1983 से ऐसी धमकियां मिल रही हैं। मैं इनका आदी हूं। लेकिन मैं संविधान के दायरे में रहकर लड़ रहा हूं और जो लोग इस बिल के खिलाफ हैं वो जितनी बार चाहें इसपर चर्चा और बहस कर सकते हैं। इस बिल से डरने की जरूरत सिर्फ उन्हें है जो आम आदमी को बहकाते हैं। पिछले 6 सत्रों से यह बिल विधानसभा में पेंडिंग है। कुछ गुमराह ताकतें इसकी राह में रोड़ा अटका रही हैं और सरकार इस बिल को पास करने में हिचकिचा रही है।'

दाभोलकर के परिवारवालों और दोस्तों ने बताया कि उन्हें अक्सर धमकियां मिलती रहती थीं और उनपर कई बार हथियारों और लाठियों से हमला भी किया गया। लेकिन उन्होंने पुलिस प्रोटेक्शन लेने से मना कर दिया। अब, उनके अनुयायियों और दोस्तों को इस बात का अफसोस है कि उन्होंने उन धमकियों को कभी गंभीरता से नहीं लिया।

वेटरन कम्युनिस्ट नेता गोविंदराव पंसारे ने कहा कि अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने कहा, 'दाभोलकर की हत्या इस बात का संकेत है कि हमारे बीच कुछ ऐसे कट्टरपंथी और फासीवादी हैं जो हिंसा से सभी तर्कसंगत आवाजों को दबा देना चाहते हैं।' दाभोलकर को याद करते हुए उन्होंने कहा, 'वह एक बहादुर समाजसेवी थे जो उस खतरनाक रास्ते को बखूबी पहचानते थे जिसपर वह चल रहे थे। अंधविश्वास के जरिए सामाजिक-आर्थिक फायदे उठाने वाले लोगों के खिलाफ उनके द्वारा शुरू की गई यह लड़ाई जारी रहेगी और हम सब इस मुहिम को और मजबूत बनाएंगे।'

दाभोलकर पर इससे पहले हुए हमलों के बारे में बताते हुए अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के कार्यकर्ता प्रदीप पाटिल ने बताया, 'उनपर और जाने-माने अभिनेता श्रीराम लागू पर 1991 में सांगली के एक गुट ने लाठियां बरसाई थीं। 1994 पर सांगली में ही हथियार लेकर लोग उनपर टूट पड़े लेकिन दाभोलकर ने पुलिस कम्प्लेंट करने से मना कर दिया।'

नवभारत टाइम्‍स डॉट कॉम के सौजन्‍य से

रक्षा बंधन : वक्‍त मिले तो सोचिएगा

रक्षा बंधन। रक्षा का वचन। हिन्दू श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) के पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह त्योहार भाई का बहन के प्रति प्यार का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर एक धागा बांधती है। रक्षा का वचन लेते हुए बहन भाई की तरक्‍की की कामना भी करती है। यकीनन, उसके भावी पति के लिए भी कोई बहन इस दिन दुआ कर रही होगी। रक्षा बंधन से कई कहानी जुड़ी हैं, रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूं, सिकंदर की पत्‍िन व राजा पौरस की, श्रीकृष्‍ण भगवान और द्रोपदी की। दिलचस्‍प बात तो यह है कि इन सब में खून का रिश्‍ता नहीं, बल्‍कि एक धागे का रिश्‍ता, भरोसे, भावनाओं का रिश्‍ता था।

कहानियों के मुताबिक शिशुपाल के वध के समय भगवान कृष्ण की उंगली कट गई थी तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आंचल फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। इस दिन सावन पूर्णिमा की तिथि थी। भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया कि समय आने पर वह आंचल के एक-एक सूत का कर्ज उतारेंगे। द्रौपदी के चीरहरण के समय श्रीकृष्ण ने इसी वचन को निभाया। यहां तक ही नहीं, भगवान ने तो महाभारत में भी पांडवों का पूरा साथ दिया।

सिकंदर को अगर दुनिया में कोई टक्‍कर दे सकता था, और दी, वे केवल पौरस। मगर कहते हैं कि सिकंदर की पत्‍िन पौरस की ताकत को जानती थी, बहुत कुछ सुना था। सिंधु घाटी में मुंह बोली बहनों से राखी बंधवाने की प्रथा थी, जिसके बारे में सिकंदर की पत्‍िन ने सुन रखा था। कहते हैं कि पौरस से सिकंदर की पत्‍िन मिली, और उनसे अपने सुहाग की रक्षा करने के लिए कहा। पौरस ने अपना वादा निभाया, दुनिया आज भी पौरस को उसकी महानता के लिए याद करती है। ऐसा ही किस्‍सा रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूं का।

आज रक्षा बंधन सगे बहन भाईयों का त्‍यौहार  बनकर रह गया। उसमें भी गिफ्ट या पैसे का लेन देन मायने रखने लगा है। गरीब बहन पहले अपने अमीर भाई के पास जाएगी, गरीब के घर बाद में, हो सकता है न भी जाए, उसके बेटियां हुई तो ज्‍यादा देने पड़ सकते हैं। रक्षा बंधन। रक्षा करने का वचन देने का त्‍यौहार, कुछ कहते हैं कि इस दिन बहन अपने भाईयों की तरक्‍की के लिए दुआ करती है।

बहन की रक्षा। भाई कब करते हैं बहन की रक्षा। आज बहन को बाहर निकलने की थोड़ी सी आजादी मिली है। सदियों तक वे घर की चार दीवारी के भीतर थी, और भाई तो आज की तरह आजाद पंछी थे। ऐसे में रक्षा किस से करनी थी। शायद जो आज देश के कुछ हिस्‍सों में घटित हो रहा है, भाई बहन की इज्‍जत आसानी से लूट रहा है, इसे रोकने की कोशिश थी, ताकि घर की चार दीवारी में यह धागा दोनों को रिश्‍ते का अहसास करा सके। उनको पता हो उनकी रगों में दौड़ने वाला खून एक ही है, क्‍यूंकि जो कथाएं हैं, वे तो दो अलग अलग खून वाले शख्‍सों की हैं, जिन्‍होंने मदद का हाथ बढ़ाया। एक दूसरे की रक्षा की। रक्षा कब करता है भाई। पहले तो भाई घर में रूकता नहीं, फिर दूसरा सौ में से पांच भाई बहन के साथ बाजार के लिए निकलते होंगे, गर्ल फ्रेंड के साथ 95 फीसद। एक समय के बाद वे पति की हो जाती है। वे उसके घर चली जाती है। वहां उसकी रक्षा का जिम्‍मा उसके पति के सिर होता है। आज के युग में पांच रिश्‍ते ऐसे मिलेंगे जो निष्‍ठा और ईमानदारी से निभाये जा रहे हैं, वरना अधिकतर रिश्‍ते बहन भाई नहीं, पैसे के लिहाजे से निभाये जाते हैं। फैंसी राखियों की तरह रिश्‍ते फैंसी होते जा रहे हैं। सुनने में आया है कि चाइना की राखियां भी भारत में खूब बिक रही हैं।

जब एक बहन के अधिकारों की रक्षा की बात आती है तो भाई ही सबसे बड़ा दुश्‍मन बन उसके सामने खड़ा होता है। लड़का अपनी पसंद से दुल्‍हन चुनना है, लेकिन लड़की को केवल चुना जाता है। तब रक्षा बंधन पर दिया वचन याद नहीं आता। मुझे लगता है कि रक्षा बंधन। रक्षा के वचन से ही जुड़ा हुआ है। एक बहन प्रण लेती है कि मैं अपने भाई के अहं की रक्षा करूंगी, कभी उसके अहं को चोटिल नहीं होने दूंगी, जब तक मुझे नया और अपना सरनेम नहीं मिलता, जब तक पापा के मिले सरनेम की रक्षा करूंगी, जो मेरे नाम के पीछे लगा है। घर की चारदीवारी के बाहर भी निकली तो नजरें झुकाए निकलूंगी, वहां खड़े लड़कों से, जो मेरे तो नहीं लेकिन किसी के भाई जरूर हैं, जो रक्षा बंधन का धागा कलाई पर एक दिन बांधने के बाद भूल जाते हैं। अगर फिर भी को अप्रिय घटना घट गई तो स्‍थिति के अनुसार फैसला कर लूंगी, क्‍यूंकि कोई कृष्‍ण द्रोपदी को बचाने नहीं आएगा, भले ही कथाओं में ऐसा हो।

दिल्‍ली की निर्भया, जब हादसे का शिकार हुई तो उसके साथ उसका दोस्‍त था। भाई घर में चैन से सो रहा था, लेकिन दोनों उसकी रक्षा करने में असफल हुए, अंत निर्भया जिन्‍दगी गंवाकर चल दी। अगर रक्षा बंधन के दिन उसको खुद की रक्षा करने का जिम्‍मा सौंपा होता तो शायद वे रक्षा के लिए किसी अन्‍य का रस्‍ता तो न तांकती। आज महिलाओं को सशक्‍त बनाने की जरूरत है। उनको हम रक्षा का वादा कर कहीं न कहीं असहाय और कमजोर बनाते हैं। झांसी की रानी, दुर्गा मां को कब किसी भाई की जरूरत पड़ी थी। उनको रक्षा बंधन के दिन सशक्‍त बनाओ, कमजोर नहीं। उनको उनकी ताकतों से अवगत करवाओ। जब जब देवताओं पर आन पड़ी, तब तब वे रक्षा के लिए आन खड़ी। वे मर्दानी है। रक्षा बंधन के वक्‍त अगर देना है तो उसके अधिकारों की रक्षा का वादा करो। अपने सी स्‍वतंत्रता दो। प्रेमिका जीन्‍स टी शर्ट में अच्‍छी दिखती है, बहन बुरी।

पुरानी कथाओं में दो अजनबी एक भाई बहन के रिश्‍ते में बंधते हुए नजर आते हैं, लेकिन आज के युग में फ्रेंडशिप डे वाले दिन लड़के सड़कों पर निकलने वाले और रक्षा बंधन के दिन घरों में छुपकर बैठने वाले मोबाइल संदेश एक दूसरे से एक्‍सचेंज करते हैं। त्‍यौहारों को लेकर ऐसी मानसिकता है। उधर से बहन कोरियर में राखी भेजती है, इधर इंटरनेट बैकिंग के जरिये भाई गिफ्ट खरीदने के लिए पैसे, ताकि रिश्‍ता और प्‍यार बना रहे। इस जमाने में कुछ लोग हैं, जिनको आप महान कह सकते हैं, जो ताउम्र बहनों को बच्‍चों की तरह पत्‍िन की तकरार के बाद भी संभाले रखते हैं। हम समाज में रहते हैं तो कुछ परंपराओं को निभाना पड़ेगा, यह सोचकर परंपराएं मत निभाईए, देश में स्‍वतंत्रता का मजाक जैसे सरकार उड़ाती है, मत उड़ाइए। हैप्‍पी रक्षा बंधन। सलीके, तरीके, भावनाओं से मनाइए।

आधे पौने घंटे की फिल्‍म वन्‍स अपॉन ए टाइम इन मुम्‍बई दोबारा

वन्‍स अपॉन ए टाइम इन मुम्‍बई दोबारा। यह 2010 में आई सुपरहिट फिल्‍म वन्‍स अपॉन ए टाइम इन मुम्‍बई का स्‍किवल है। इसका नाम पहले वन्‍स अपॉन ए टाइम इन मुम्‍बई अगेन था, लेकिन कहीं हिन्‍दी बुरा न मान जाए, इसलिए एक हिन्‍दी शब्‍द दोबारा का इस्‍तेमाल किया गया। एकता कपूर टूने टोटकों में विश्‍वास करती है, कहीं न कहीं यह बात उनके फिल्‍म टाइटल में नजर आई है, हर बार एक अलग अक्षर, जैसे इसमें ए के साथ छोटी सी वाय का इस्‍तेमाल किया गया है।

रजत अरोड़ा की पटकथा और मिलन लथुरिया का निर्देशन, एकता कपूर का पैसा वन्‍स अपॉन ए टाइम इन मुम्‍बई दोबारा। फिल्‍म की कहानी दाऊद इब्राहिम पर आधारित है, लेकिन बॉलीवुड स्‍वीकार करने से डरता रहता है। फिल्‍म में फेरबदल हुए थे, शायद उस दौरान क्रिकेट वाला सीन रिशूट कर डाला गया होगा, जो फिल्‍म की शुरूआत को कमजोर बनाता है। दाऊद इब्राहिम मुम्‍बई का बेताज बादशाह बने रहना चाहता है, जो शोएब  नाम से रुपहले पर्दे पर उतारा गया है। शोएब दाऊद की तरह एक पुलिस कर्मचारी का पुत्र, हाजी मस्‍तान के बाद मुम्‍बई का अगला डॉन, डोंगरी से संबंध रखता है। शोएब मुम्‍बई में सिर उठा रहे अपने एक दुश्‍मन रावल को मारने के लिए लौटता है, जो बेहद कमजोर खलनायक है। ऐसे में शोएब जैसे दमदार डॉन का मुम्‍बई आना बेहद बहुदा लगता है, इससे ज्‍यादा रौब तो हिन्‍दी फिल्‍मों के साधारण गुंडों का होता है।

शोएब यहां पहुंचते रावल को मारने का जिम्‍मा अपने गुर्गे असलम को सौंपता है। जिस किरदार को निभाया है इमरान खान ने। असलम, स्‍लम एरिये से आता है। जुर्म की दुनिया में उतरना उसके लिए मुश्‍िकल नहीं। वे डॉन का काम करने के लिए निकलता है। फिल्‍म की एक और कमजोर कड़ी, डॉन जिस दुश्‍मन को मारने आया है, उसको मारने की बजाय एक लड़की के चक्‍कर में पड़ जाता है, जो कश्‍मीर से मुम्‍बई अभिनेत्री बनने आई है। हालांकि असल जिन्‍दगी में भी दाऊद को एक पंजाबी लड़की से प्‍यार हुआ था, वे भी शोएब की तरह दाऊद को अंत में आकर ठुकरा देती है, जिसे बर्दाशत करना शोएब के लिए मुश्‍िकल।

फिल्‍म अंतिम आधे पौने घंटे में अपनी शिखर की तरफ बढ़ती है। इस आधा पौने घंटे में हर किरदार जीवंत नजर आता है। फिल्‍म अब दर्शकों को बांधने में कामयाब होती है, लेकिन पहले का सवा घंटा बेहद बकवास पकाऊ, उसकी जरूरत कहीं नजर नहीं आती, जुर्म की दुनिया आधारित फिल्‍म में प्‍यार का मसाला ठूंसने की कोशिश में निर्देशक और लेखक दोनों चूकते हुए नजर आए। सोनाक्षी सिन्‍हा, सोनाली बेंद्रे, इमरान खान, अक्षय कुमार ने अंतिम आधे घंटे में साबित किया कि निर्देशन और पटकथा लेखन में कमी है, उनमें तो क्षमता है खुद को साबित करने की।

रेप मुआवजे से नरेंद्र मोदी पर चुटकियां लेती शिव सेना तक

जम्‍मू कश्‍मीर की कमान एक युवा नेता उमर अब्‍दुला के हाथ में है, लेकिन शनिवार को उनकी सरकार की ओर से लिए एक फैसले ने उनको सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया। जम्‍मू कश्‍मीर सरकार ने रेप पीड़ित को मुआवजे वाली लिस्‍ट में शामिल किया है। अगर युवा नेता उमर अब्‍दुला इस मुआवजे वाली सूची को जारी करने की बजाय बलात्‍कारी को सजा देने वाली सूची जारी करते तो शायद भारतीय युवा पीढ़ी को ही नहीं, बल्‍कि देश की अन्‍य राज्‍यों की सरकारों को भी सीख मिलती। उमर अब्‍दुला, इज्‍जत औरत का सबसे महंगा गहना होती है, उसकी कीमत आप ने ज्‍वैलरी से भी कम आंक दी। उसको मुआवजे की नहीं, उसको सुरक्षा गारंटी देने की जरूरत है। उसको जरूरत है आत्‍मराक्षण के तरीके सिखाने की, उसको जरूरत है आत्‍मविश्‍वास पैदा करने वाली आवाज की। अगर इज्‍जत गंवाकर पैसे लेने हैं तो वे कहीं भी कमा सकती है। आपके मुआवजे से कई गुना ज्‍यादा, जीबी रोड दिल्‍ली में अपना सब कुछ दांव पर लगाकर पैसा कमाती बेबस लाचार लड़कियां महिलाएं इसकी  साक्षात उदाहरण हैं। जख्‍मों पर नमक छिड़ने का काम अगर आज के युवा नेता करने लग गए तो शायद देश की सत्‍ता युवा हाथों में सौंपते हुए देश की जनता डरेगी। वैसे भी आज देश की जनता युवाओं की तरह फुर्तीफे दिखने वाले 60 पार कर चुके गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपने के लिए पैरों की उंगलियों पर खड़ी है, भले एनडीए की सहयोगी पार्टियां इस बात को स्‍वीकार करने में थोड़ा सा कतराती हों।

एनडीए की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बाला साहेब ठाकरे की शिव सेना है, जिसका नेतृत्‍व उद्धव ठाकरे जैसे युवा नेता के हाथ में है। इस पार्टी के मुख्‍य समाचार पत्र सामना हिन्‍दी में नरेंद्र मोदी को केंद्र बिंदु बनाकर संपादकीय लिखा गया है, जो पहले शिव सेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के विचारों का कॉलम माना जाता था, और अब वे उद्धव ठाकरे के विचारों का। भुज के लालन कॉलेज से गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्‍ली के लाल किले पर स्‍वतंत्रता दिवस के मौके राष्‍ट्रीय ध्‍वज लहराने वाले देश के प्रधानमंत्री पर जुबानी हमला बोला। 
यह साढ़े छह दशक पुराने लोकतंत्र में पहला मौका था, जब एक प्रधानमंत्री के राष्‍ट्र नाम दिए भाषण को किसी मुख्‍यमंत्री ने आड़े हाथों लिया हो। इस भाषण के बाद पार्टी के शीर्ष नेता लाल कृष्‍ण आडवाणी भी पार्टी के इस तेज तरार नेता से असहमत नजर आए, जिसका जिक्र संपादकीय में किया गया है। संपादकीय में लिखा कि नरेंद्र मोदी किसी और दिन भी यह कसर पूरी कर सकते थे। संपादकीय में शिवसेना मोदी की तारीफ करती है, लेकिन चुटकियां लेते हुए, जैसे कि मोदी के नेतृत्‍व में गुजरात में अच्‍छा काम काज हुआ, और उसके लिए उनकी प्रशंसा करने में किसी को आपत्‍ति नहीं होनी चाहिए। स्‍पर्धा का घोड़ा कितना भी क्‍यूं न दौड़े, लेकिन दिल्‍ली की राजनीति में आखिरी क्षण में खरारा 'एक प्रकार की कंघी' करने वाले ही जीतते हैं, ऐसा आज तक का अनुभव है।
आगे कहते हैं, मनमोहन सिंह से युद्ध की भाषा झेली नहीं जाती, और आक्रामकता उनसे बर्दाशत नहीं होती। मोदी मात्रा आक्रामक बोलकर जनभावना की तोप दाग रहे हैं। फिर भी स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर देश के प्रधानमंत्री को इस तरह बेइज्‍जत करना ठीक है क्‍या? आगे संपादकीय में उद्धव एलके आडवाणी की तारीफ करते हुए लिखते हैं, आडवाणी की देशभक्‍ति भी गरम और उनका अनुभव भी मजबूत है। भारतीय जनता पार्टी जिस तरह के मीठे फल चख रही है, उसका श्रेय आडवाणी को ही जाता है। 

मोदी पर चुटकी लेते हुए, आज मोदी ने कांग्रेस के खिलाफ रणभेरी बजाकर आग लगा दी है यह सच है। उस आग की ज्‍वाला कई बार आग लगाने वाले को ही झुलसा देती है। शिव सेना आगे कहती है कि जो लालन कॉलेज से नरेंद्र मोदी ने बोला, कल वे उसके सामने आने वाला है। यकीनन अगर कांग्रेस वहां से आउट होती है तो नरेंद्र मोदी के सामने वे सब चुनौतियां आएंगी, जिसको लेकर वे मनमोहन सिंह पर हल्‍ला बोल रहे हैं।
प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी को बनाने की बात पर शिव सेना के उद्धव ठाकरे हमेशा बच निकलते हैं, लेकिन संपादकीय के पहले अध में कहते हैं कि प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार चुनना भाजपा का अंदरूनी मामला है, वहीं अंत तक आते आते वे सरदार पटेल से मोदी की तुलना करते हुए कहते हैं कि हमे विश्‍वास है कि मोदी के हाथ में सरदार पटेल की तरह दिल्‍ली की सत्‍ता आएगी, उस समय देश लूटने वाले सारे डकैतों को वे जेल का रास्‍ता दिखाएंगे।

उद्धव ठाकरे उक्‍त लाइन में एक बात स्‍पष्‍ट कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के हाथ में जो सत्‍ता है वे सरदार पटेल की तरह आएगी, मतलब उप प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री नहीं। सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते, लेकिन कहते हैं कि महात्‍मा गांधी के कारण जवाहर लाल नेहरु प्रधानमंत्री बने, और पटेल उप प्रधानमंत्री। उद्धव ठाकरे भले ही कुछ स्‍पष्‍ट न कर रहे हों, लेकिन कहीं न कहीं इस बात का संदेश जरूर दे रहे हैं कि प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के लिए नरेंद्र मोदी के आगे कोई तो है, वे राजनाथ सिंह है, वे अरुण जेटली है,  वे सुषमा स्‍वराज है या कोई अन्‍य, पता नहीं, लेकिन एलके आडवाणी यहां गांधी की भूमिका अदा करना चाहेंगे।
 संपादकीय का अंतिम पड़ाव भी किसी चुटकी से कम नजर नहीं आता। जिसमें कहा गया है, वे दाऊद इब्राहिम, सईद हाफिज, मेमन टाइगर जैसों को पाकिस्‍तान से घसीटते हुए लाएंगे, लाकर फांसी पर लटकाएंगे। जो धन स्‍विस बैंक में पड़ा है उसको कार्गो हवाई जहाज में लादकर भारतीय सीमा में लाएंगे। ऐसा करने में मोदी पूरी तरह सक्षम हैं, हमको तिल जितनी भी शंका नहीं। यह बात उस समय किसी व्‍यंग से कम नहीं लगती, जब किसी भी देश में घुसने के लिए किसी विशेष कानूनी प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता हो।

अंत में शिव सेना कहती है कि मोदी ने गुजरात के रेगिस्‍तान से जो तोप दागी, उससे पाकिस्‍तान को फर्क पड़ा या नहीं, इसका तो पता नहीं, लेकिन मोदी की तोप से निकले गोले के कारण दिल्‍ली के कांग्रेसी नेताओं ने नींद की गोलियों का ऑर्डर दे दिया है।

मिस्र को किस तोड़ पर ले आई 'क्रांति'

फरवरी 2011, जब देश की जनता ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति मुबारक हुस्‍नी को पद से उतारते हुए तहरीर चौंक पर आजादी का जश्‍न मनाया था, तब शायद उसको इस बात का अहसास तक न हुआ होगा कि आने वाले साल उसके लिए किस तरह का भविष्‍य लेकर आएंगे। आज मिस्र गृह युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। वहां पर सेना और मुर्सी समर्थक आमने सामने हैं, क्‍यूंकि गणतांत्रिक तरीक़े से चुने हुए मिस्र के पहले राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी को सेना ने निरंतर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण तीन जुलाई को सत्ता से बेदख़ल कर दिया था। काहिरा की एक मस्‍जिद के चारों तरफ सेना का पहरा है तो अंदर एक रात से कैद हैं मुर्सी समर्थक। सरकारी आंकड़ों की माने तो वहां पर अब तक केवल 700 के आस पास लोग मरे हैं, हालांकि मुस्‍लिम ब्रदर्सहुड पार्टी का दावा है कि वहां पर मरने वालों की संख्‍या 2000 से अधिक हो चुकी है, और घायलों की संख्‍या 5000 के आंकड़े को पार कर चुकी है।

मिस्र में फैली अशांति से न केवल लोगों की जान के लिए बल्कि सांस्कृतिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए भी ख़तरा पैदा हो गया है। देश भर में फैली अशांति का अनुचित्त लाभ उठाते हुए कुछ दंगाइयों ने ईसाई गिरजों को जलाना शुरू कर दिया है। उन्होंने सिकन्दरिया में स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय को लूटने का प्रयास भी किया है। लेकिन इस बार पुलिस उन्हें पीछे धकेलने में सफल रही। इस नेक काम में कुछ आम नागरिकों ने भी पुलिस का हाथ बंटाया था।

वहीं, दूसरी तरफ ब्रिटेन ने मिस्र में फंसे अपने 40 हजार से अधिक सैलानियों को अपने अपने होटलों से बाहर निकलने से मना कर दिया है। ब्रिटेन के सबसे ज्‍यादा नागरिक बीच वाले शहरों में फंसे हुए हैं। वहीं जर्मन ने भी अपने सैलानियों को चेताया है। कुछ यूरोपीय देशों और रूस ने अपने नागरिकों को सलाह दी है कि वे मिस्र की यात्रा करने से परहेज़ करें। उधर, मिस्र जानेवाले पर्यटकों की संख्या में हुई भारी कमी के कारण इस देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है।

रूसी रेडियो के मुताबिक  मिस्र की अर्थव्यवस्था के विकास लिए तीन बातें अति महत्वपूर्ण हैं। ये तीन बातें हैं- पर्यटन , स्वेज़ नहर से मिलनेवाला राजस्व और विदेशों में, विशेष रूप से खाड़ी देशों में, काम करनेवाले मिस्रवासियों द्वारा अपने देश में भेजा जाता पैसा। मिस्र में पर्यटन का संबंध सिर्फ़ होटलों आदि में काम करनेवाले लोगों के जीवन से ही नहीं है। मिस्र में पर्यटन लाखों लोगों को रोज़गार देता है। इसलिए, मिस्र के निवासियों के लिए पर्यटन अति महत्वपूर्ण पहलू है और यही मिस्र की अर्थव्यवस्था का प्रमुख घटक है।

जहां एक तरफ मुस्‍लिम ब्रदरहुड पार्टी ने देशव्‍यापी मार्च मिलियन्‍स मार्च ऑफ एंगर का आयोजन करने का ऐलान किया, वहीं दूसरी तरफ सैन्‍य ने चेताया है कि अगर किसी भी सरकारी इमारत को नुकसान पहुंचाया गया तो रबर बुलेट और आंसु गैसी गोलों की जगह असली बुलेट का इस्‍तेमाल किया जाएगा। मुर्सी को हटाए जाने के बाद शुरू हुए गृह युद्ध के कारण मिस्र की स्‍थिति दिन प्रति दिन बिगड़ती जा रही है।

उधर, अपदस्थ राष्ट्रपति मोर्सी के विरोधी संगठन 'नेश्नल सैलवेशन फ़्रंट' और 'तमरूद' ने भी मुस्लिम ब्रदरहुड के विरोध में प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। पूरे मिस्र में अपने पड़ोसियों और गिरजाघरों की सुरक्षा के लिए भी अपील की गई है। कॉप्टिक ईसाइयों ने मोर्सी के बेदख़ल किए जाने का समर्थन किया है। इसलिए आशंका जताई जा रही है कि ईसाई लोग भी हिंसा के शिकार बनाए जा सकते हैं। सऊदी अरब के राजा अबदुल्लाह ने मिस्र की मौजूदा सरकार का समर्थन करते हुए कहा कि सऊदी अरब की जनता और सरकार 'आतंकवाद' के विरोध में अपने मिस्री भाइयों के साथ खड़ी है।

वाह रे ममता बेनर्जी वाह

तृणमूल कांग्रेस के पश्‍िचमी बंगाल में लाल के लिए कोई जगह नहीं। लाल को सत्‍ता से बर्खास्‍त कर चुकी ममता बेनर्जी की अगुवाई वाली सरकार ने गत 5 अगस्‍त को आये सर्वोच्‍च अदालत के फैसले लाल बत्‍ती का दुरुप्रयोग रोकना चाहिए के बाद फैसला लिया कि लाल रंग की बत्‍ती को हरे में बदल दिया जाएगा। ममता बेनर्जी सरकार के इस फैसले से हैरान सीपीएम कहती है कि सरकार करने क्‍या जा रही है यह समझ से परे है। 

मदन मित्रा, खेल और परिवहन मंत्री ने कहा कि एक राज्‍यपाल की कार को छोड़कर बाकी सब पर वीआईपी लोगों की कारों पर लाल की जगह अब हरी बत्‍ती लगेगी। उनका कहना है कि पश्‍चिमी बंगाल में लाल के लिए कोई जगह नहीं है। इस संदर्भ में उनको ममता बेनर्जी से मंजूरी मिल चुकी है। इससे पहले सरकार सरकारी दीवारों और अन्‍य कार्यालयों को हरे रंग में रंग चुकी है।
 
अगर अदालती आदेश की बात करें तो अदालत ने कहा था कि लाल बत्‍ती सायरन के कारण लोग प्रभावित होते हैं, मगर पश्‍िचमी बंगाल सरकार ने लाल को हरा कर अदालती आदेश के आधे हिस्‍से पर रंग चढ़ा दिया है, पूरे पर नहीं, क्‍यूंकि लाल बत्‍ती हो या हरी। इससे फर्क नहीं पड़ता, फर्क पड़ता है अलग पहचान से। जो पहचान कल तक लाल बत्‍ती की थी, अब वे ग्रीन की हो जाएगी। रंग बदलने से फर्क तो कुछ नहीं पड़ेगा। केवल मन समझने के लिए, आंखों में धूल झोंकने के लिए काफी है। लाल तो ममता की आंखों में पहले से ही चुभता था, अदालत के आदेश ने इसको हटाने में ममता की ओर मदद कर दी। वाह रे ममता वाह।

एबीपी न्‍यूज ने शुरू किया आपका ब्‍लॉग

लिखने वाले को चाहिए प्‍लेटफॉर्म, थोड़ी सी प्रसिद्धि, और कंपनी को माल। इंटरनेट की दुनिया में अब ब्‍लॉगरों का दम बोलने लगा है। कल तक पानी पी पी कर कोसने वाले आज ब्‍लॉग जगत के धुरंधरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जुट चुके हैं।

ब्‍लॉगर डॉट कॉम का शुक्रिया जिसने अपना मंच आजाद लिखने वालों को दिया। किसी ने यहां कविताएं लिखी, किसी ने अपनी हर रोज की दिनचर्या। ब्‍लॉगिंग धीरे धीरे अपने चर्म की तरफ बढ़ने लगी। हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की भीड़ इंटरनेट पर एकत्र होने लगी। ब्‍लॉगवाणी ने ब्‍लॉगरों को दम भरने का मौका दिया। छोटी छोटी नुक्‍कड़ बैठकों की तरह ब्‍लॉगरों मीटों का आयोजन होने लगा। भारत में ब्‍लॉगर, यानि स्‍वतंत्र कलम का मालिक उभरकर सामने आने लगा। अख़बारों में लेखन को जगह मिलने लगी। अब संपादक के नाम पत्र लिखने की जरूरत न महसूस होने लगी।

ब्‍लॉगर और वर्डप्रेस का साथ मिलने से ब्‍लॉगर खुश हुआ। उसकी कलम दिन प्रति दिन नये नये शब्‍दों को जन्‍म देती चली गई। आज ब्‍लॉगर के लिए देश के बड़े बड़े मीडिया दिग्‍गजों ने अपनी वेबसाइटों पर ब्‍लॉग व्‍यवस्‍था कर दी, जोकि केवल शुरूआती दौर में उनके अपने कर्मचारियों के लिए थी, लेकिन कार्य का अधिक बोझ, इस जिम्‍मेदारी को उठा न सका। ब्‍लॉग व्‍यवस्‍था मीडिया वेबसाइटों पर दम तोड़ने लगी।

सबसे पहले हिन्‍दी वेबसाइट वेबदुनिया ने मायदुनिया डॉट कॉम से ब्‍लॉगरों जोड़ने का प्रयास किया। इस चेन को आगे बढ़ाया दैनिक जागरण ने अपने कदम जागरण जंक्‍शन से। धीरे धीरे इस खेल में नवभारत टाइम्‍स डॉट कॉम उतर आई। यहां पर ब्‍लॉगर ज्‍यादा दिखाई देने लगे, यहां पाठक वर्ग बड़ा था। मायवेबदुनिया डॉट कॉम एक समय के बाद दम तोड़ गई, लेकिन दैनिक जागरण निरंतर चलता जा रहा है। नवभारतटाइम्‍स डॉटकॉम का तो क्‍या कहना। इस बेड़े में अगला कदम रखने वाला मीडिया ग्रुप बना अमर उजाला। अमर उजाला ने ब्‍लॉग डॉट अमर उजाला डॉट कॉम के नाम से इसकी शुरूआत की।

दिलचस्‍प बात तो यह है कि अब इस पहल का हिस्‍सा स्‍टार न्‍यूज, जोकि अब एबीपी न्‍यूज हो चुका है, बन गया है। एबीपी न्‍यूज ने पाठक वर्ग दायरा बढ़ाने के लिए अपनी वेबसाइट पर 15 अगस्‍त के दिन एक शुरूआत की। लिखने की आजादी। आपका ब्‍लॉग।  अब ब्‍लॉग यहां पर भी अपना पंजीकरण कर सकते हैं।

लिखने का शौक है, तो लिखिए रहिये, कुछ और भी आएंगे, आने वाले वक्‍त में। ब्‍लॉगरों के लिए सुनहरे दिनों की शुरूआत तो बहुत पहले हो चुकी है। जय ब्‍लॉगर।

82 साल पहले मनाया गया था 'स्‍वतंत्रता दिवस'

आज पूरे देश में स्‍वतंत्रता दिवस मनाया गया। एक तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले से राष्‍ट्र को संबोधित किया, तो दूसरी तरफ मीडिया के जरिये संभावित पीएम पद के उम्‍मीदवार गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालन कॉलेज से संबोधन किया। मनमोहन सिंह का भाषण खत्‍म हुआ तो नरेंद्र मोदी का भाषण नौ बजे शुरू हुआ, पूर्व अनुमान मुताबिक नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के भाषण पर हल्‍ला बोला। नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्‍होंने देश की आजादी में अहम रोल अदा करने वाले सरदार पटेल और महात्‍मा गांधी का जिक्र करने की बजाय एक परिवार की महिमा गाई। लेकिन मुझे दोनों नेताओं ने पूरी तरह निराश किया। माना मनमोहन सिंह गांधी परिवार से आगे नहीं बढ़े, लेकिन कल की उम्‍मीद बन चुके नरेंद्र मोदी भी तो गुजरात से आगे नहीं बढ़ सके। वे भी केवल महात्‍मा गांधी और सरदार पटेल तक सीमित रह गए। उनको भी याद नहीं आई शहीद ए आजम भगत सिंह की, सुभाष चंद्र बोस की।

सुभाष चंद्र बोस, जो एक कुलीन परिवार में पैदा हुए, लेकिन अंत तक भारत की आजादी के लिए लड़ते रहे। देश को आजाद करवाने के लिए बाहरी देशों का सहयोग मांगते रहे। अंत नतीजे एक अनसुझली पहेली पीछे छोड़ गए, जो आज तक नहीं सुलझी। जापान की मीडिया एजेंसियों ने ख़बर दी कि 18 अगस्‍त 1945 को सुभाष चंद्र बोस का एक हवाई हादसे में देहांत हो गया, हालांकि ताइवान की ओर से उस समय ऐसा कोई हादसा होने से इंकार किया जाता रहा है, रिपोर्टों के मुताबिक ताइवान में ही उनका हवाई जहाज हादसाग्रस्‍त हुआ था।

पिछले दिनों उनकी पत्‍िन और बेटी संबंधी सरकार से एक आरटीआई कार्यकर्ता ने एक रहस्‍यप्रद फाइल को सार्वजनिक करने की मांग की थी, लेकिन इसको सार्वजनिक करने से भारत के अन्‍य देशों से रिश्‍ते बिगड़ सकते हैं, कह कर सरकार ने जानकारी देने से इंकार कर दिया।

आज हम बड़े गर्व से कहते हैं जय हिंद, स्‍वतंत्रता दिवस के मौके तो खास कर, लेकिन अफसोस, जिस व्‍यक्‍ति ने इस नारे को पहचान दी, उसको देश के नेता भूल गए, क्‍यूंकि यह देश के अंदर वोट बैंक को प्रभावित नहीं करता। अगर देश में किसी ने पहली बार स्‍वतंत्रता दिवस मनाया था, तो वे थे हमारे नेता सुभाष चंद्र बॉस, जो न नरेंद्र मोदी को याद आए, और न मनमोहन सिंह को।

1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए। कोलकाता में सुभाषबाबू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए, कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा। पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष और सुभाषबाबू उसके एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की। 1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ। इस अधिवेशन में सुभाषबाबू ने खाकी गणवेश धारण करके पंडित मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। गाँधीजी उन दिनों पूर्ण स्वराज्य की मांग से सहमत नहीं थे। इस अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेज़ सरकार से डोमिनियन स्टेटस माँगने की ठान ली थी। लेकिन सुभाषबाबू और पंडित जवाहरलाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। अंत में यह तय किया गया कि अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए, एक साल का वक्त दिया जाए। अगर एक साल में अंग्रेज़ सरकार ने यह मॉंग पूरी नहीं की, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। अंग्रेज़ सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की। इसलिए 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ, तब ऐसा तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिन के रूप में मनाया जाएगा।

26 जनवरी, 1931 के दिन कोलकाता में राष्ट्रध्वज फैलाकर सुभाषबाबू एक विशाल मोर्चा का नेतृत्व कर रहे थे। तब पुलिस ने उनपर लाठी चलायी और उन्हे घायल कर दिया।
 

धूम 3 पोस्‍टर से शाहिद अफरीदी की अपील तक

यशराज फिल्‍म्‍स ने अपनी आगामी फिल्‍म का पोस्‍टर बाजार में उतार दिया। यशराज फिल्‍म्‍स की धूम 3 का पोस्‍टर उस समय बाजार में उतारा गया, जब अक्षय कुमार बड़े पर्दे पर अपनी वन्‍स अपॉन ए टाइम इन मुम्‍बई दुबारा के साथ उतरने वाले थे, शाहरुख खान की दीपिका पादुकोण के साथ दूसरी फिल्‍म चेनई एक्‍सप्रेस सौ करोड़ के स्‍टेशन को तीन दिन में पार कर चुकी थी, और मेगा बजट फिल्‍म क्रिश 3 का ट्रेलर बड़े स्‍तर पर लॉन्‍च कर दिया गया था। यशराज बैनर इस साल का अंत अपनी मेगा बजट मूवी के साथ करने का ऐलान कर चुका है। 
 
वहीं, इस साल विंबलडन महिला मुकाबलों में गजब का प्रदर्शन करने वाली मारियन बारतोली ने महज खिताब जीतने के 40 दिन बाद खेल को अलविदा कहने की घोषणा कर दी। दुनिया की सातवें नंबर की इस फ्रेंच खिलाड़ी सिनसिनाटी ओपन में सिमोना हैलेप के हाथों मिली हार के बाद प्रेस के सामने बेहद भावुक होकर कहा, ''यही वक्त है जब मुझे संन्यास लेना होगा और इसे अपना करियर मानना होगा। मुझे लगता है मेरी विदाई का समय आ चुका है।'' 
 
टेनिस दूर कोलकाता की सड़कों पर निकल चलते हैं। जहां दशकों से पीले रंग की एंबेसडर का टैक्‍सी नाम पर कब्‍जा रहा है, मगर कोलकाता सरकार के नये कदम के बाद अब आपको टैक्‍सी के रूप में कुछ नई कारें दिखाई पड़ेगीं। सरकार ने कदम उठाते हुए कहा कि नई टैक्‍सी लेने वालों को 25 हजार रुपये बतौर प्रोत्‍साहन मिलेंगे, जो अब तक केवल एंबेसडर खरीदने पर मिलते थे। सरकार के इस कदम से एंबेडसर बनाने वाली हिन्‍दुस्‍तान मोटर्स का तो पता नहीं, लेकिन अन्‍य कार कंपनियों के चेहरे खिल उठे हैं। 
 
बिजनस जगत में एक और उठपटक होने वाली है। सुनने में आया कि ब्‍लैकबेरी नामक मोबाइल कंपनी बिकने वाली है। स्मार्टफ़ोन बनाने वाली कंपनी ब्लैकबेरी ने बिज़नेस के नए विकल्प तलाशने के लिए एक नई समिति का गठन किया है जो कंपनी को बेचने के विकल्प पर भी विचार करेगी। ताजा अपडेट तो यह है कि इसके लिए भारतीय मूल प्रेम वत्‍स लगा सकते हैं, जो इस कंपनी की सबसे बड़ी शेयरधारक कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल के चेयरमैन हैं। 
 
वहीं मिस्र ने गाजा पट्टी से लगती अपनी सीमा को बंद करने की घोषणा कर दी, क्‍यूंकि सैनिक ठिकानों पर मुस्लिम लड़ाकों के हमलों में वृद्धि हो रही है। अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि लड़ाकों को गज़ा पट्टी से सहायता मिल सकती है। उधर, ईरान के इस्लामी रिवोल्यूशनरी गार्ड द्वारा फारस की खाड़ी में इराक से जानेवाला एक भारतीय टैंकर जहाज़ रोका गया। टाइम्स ऑफ इंडिया के सूचनानुसार भारतीय जहाजरानी निगम का यह टैंकर ईरानी बंदरगाह बंदर अब्बास जानेवाला था। उसको अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र में इस बहाने पर रोका गया कि वह पर्यावरण के लिये खतरा पैदा कर रहा है।

शाहिद अफरीदी ने स्‍वयं से प्रेरित फिल्‍म मैं हूं शाहिद अफरीदी के निर्माताओं से अपील की है कि वे फिल्‍म से अश्‍लील सीन को हटाए, क्‍यूंकि यह उनकी छवि को बिगाड़ेंगे, और इससे समाज पर बुरा असर पड़ेगा। यह फिल्‍म ईद के मौके पर पाकिस्‍तान में रिलीज हुई थी। वहीं उन्‍होंने पाकिस्‍तानी जनता से अपील की कि इस फिल्‍म का उनकी जिन्‍दगी से कोई वास्‍ता नहीं।

भाजपा ने यूपीए के खिलाफ अपनी चार्जशीट को ऑनलाइन कर दिया है। इस चार्जशीट का नाम इंडिया 272 डॉट कॉम रखा गया है। कहने को यह भाजपा की वेबसाइट है, लेकिन पूरी की पूरी नरेंद्र मोदी डॉट कॉम लग रही है। वहीं, नरेंद्र मोदी के खिलाफ मैदान में उतरी फेकुएक्‍सप्रेस डॉट कॉम एक लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है। यहां पर मोदी के खिलाफ चार्जशीट तैयार की गई है। एक और बात, कहने को तो पप्‍पू राहुल गांधी को पेट नाम दिया गया है, लेकिन अगर आप इंटरनेट पर पप्‍पूएक्‍सप्रेस डॉट कॉम पर जाएंगे तो आपको वहां पर नरेंद्र मोदी का कब्‍जा पाएंगे।


 
इस खूबसूरत तस्‍वीर के साथ आपको अलविदा कह रहा हूं, जल्‍द मिलूंगा, फिर किसी नये दिमागी कीड़े के साथ, आज इतना ही। 

स्‍वतंत्रता दिवस पर लालन कॉलेज वर्सेस लाल किला

आजाद भारत का शायद पहला स्‍वतंत्रता दिवस होगा। जब राष्‍ट्र के लोग इस दिन मौके होने वाले आयोजित समारोह में अधिक दिलचस्‍प लेंगे। इसका मुख्‍य कारण मौजूदा प्रधानमंत्री और संभावित प्रधानमंत्री पद के दावेदार के बीच सीधी टक्‍कर। एक हर बार की तरह लाल किले तो तिरंगा फरहाएंगे तो दूसरे भुज के लालन कॉलेज से।
ऐसे में इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के कैमरे दोनों तरफ तोपों की तरह तने रहेंगे। देश के प्रधानमंत्री होने के नाते मीडिया मनमोहन सिंह की उपस्‍थिति वाले समारोह को नजरअंदाज नहीं कर सकता, वहीं दूसरी तरफ संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार के रूप में उभरकर सामने आ रहे नरेंद्र मोदी को भी जनता सुनना चाहेगी, जो वैसे भी आजकल टेलीविजन टीआरपी के लिए एनर्जी टॉनिक हैं।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्‍वयं गुजरात के भुज में आयोजित युवाओं की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘जब हम तिरंगा फहराएंगे तो संदेश लाल किला तक भी पहुंचेगा। राष्ट्र जानना चाहेगा कि वहां क्या कहा गया और भुज में क्या कहा गया।’

इस नरेंद्र मोदी की बात में कोई दो राय नहीं। देश की जनता बिल्‍कुल जानना चाहेगी, लेकिन उससे भी ज्‍यादा उतावला होगा भारतीय इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। बस डर है कहीं, नरेंद्र मोदी लाइव न हो जाए, और देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण अगले दिन आने वाले समाचार पत्रों में पढ़ने को मिले।

उधर, सीधे तौर पर प्रधानमंत्री का जिक्र न करते हुए मोदी ने कहा, ‘एक तरफ वादों की झड़ी होगी तो दूसरी ओर किए गए काम का लेखा-जोखा होगा। एक तरफ निराशा होगी तो दूसरी तरफ आशा होगी।’ आपको बता दें कि गुजरात में स्वतंत्रता दिवस का आधिकारिक समारोह भुज में मनाया जाएगा जहां मोदी राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे।

आप इसे संयोगवश कहें या जान बुझकर चुना गया स्‍थान, लेकिन 15 अगस्‍त को आयोजित होने वाले इन दोनों समारोह को अगर कुछ जोड़ता है तो लाल। एक तरफ लाल किला, दूसरी तरफ भुज का लालन कॉलेज। दोनों में लाल शब्‍द है। इन दिनों जगहों पर तिरंगा लहराने वाले शख्‍सियतों के आगे प्रधानमंत्री शब्‍द भी जुड़ता है, एक संभावित प्रधानमंत्री पद प्रत्‍याशी हैं तो दूसरे मौजूदा प्रधानमंत्री।

अब देखना यह रहेगा कि स्‍वतंत्रता दिवस पर तिरंगा लहराने वाली दोनों शख्‍सियतों में से अगले साल लाल किले पर तिरंगा कौन फहराता है ? क्‍या लालन कॉलेज से नरेंद्र मोदी लाल किले तक पहुंच सकेंगे ?  जिन्‍होंने पार्टी की उन बाधाओं को तो पार कर लिया, जो उनके प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार बनने के रास्‍ते में थीं, क्‍यूंकि पिछले दिनों एक टेलीविजन को दिए विशेष साक्षात्‍कार में भाजपा के महासचिव राजीव प्रताप रूढ़ी ने साफ साफ कहा कि जनता की आवाज सुनी जाएगी और अगस्‍त के अंत तक नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्‍मीदवार घोषित किया जाएगा। यह तो पहला साबूत है।

नरेंद्र मोदी पर मौसम साफ होने का दूसरा संकेत यूपीए के खिलाफ चार्जशीट के रूप में लॉन्‍च की अपनी वेबसाइट इंडिया 272 को करते हुए दिया। इस वेबसाइट पर गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कोई चेहरा नजर नहीं आ रहा है। इस वेबसाइट को लॉन्‍च तो भाजपा पार्टी ने किया, लेकिन वहां चेहरा केवल नरेंद्र मोदी का, भाजपा का यह कदम उस बात को चरितार्थ कर रहा है, जिसमें कहा गया था भाजपा एकमत है।

अब एक और सवाल के साथ आपसे अलविदा लेते हैं कि क्‍या अगले साल होने वाले लोक सभा चुनावों के बाद आजाद भारत को आजाद भारत में जन्‍मे किसी नागरिक को प्रधानमंत्री बनते देखने का मौका मिलेगा या पांच साल और इंतजार करना होगा ?

उड़ीसा का एक राजा, जो आज जीता फकीर सी जिन्‍दगी

न उसके घर में जंग खाती तलवार है और न सिंहासन। न राजा महाराजाओं की तरह दीवारों पर लटकी ट्रॉफियां, जो याद दिलाएं बीते दिनों में किए शिकारों की। न पीली पड़ चुकी तस्‍वीरें, जो याद दिलाएं युवा अवस्‍था के सुंदर सुनहरे दिनों की। जिस महल में वे अपनी पत्‍िन और बच्‍चों के साथ 1960 तक रहा, आज वहां लड़कियों का हाई स्‍कूल है।

टिगिरिया का पूर्व राजा ब्राजराज क्षत्रीय बीरबर चामुपति सिंह महापात्रा एक कच्‍चे मकान में कुछ प्‍लास्‍टिक की कुर्सियों के साथ अपना जीवन बसर करता है, टिगिरिया जो कि कटक 'उड़ीसा' जिले में पड़ता एक क्षेत्र है। एस्बेस्टस छत में से बारिश का पानी लीक हो रहा है, और भूतपूर्व राजा की लकड़ से बनी खाट को एक फटेहाल तरपाल से ढ़का गया है, ताकि वे छत से लीक हो रहे पानी से भीगकर ख़राब न हो। इस कच्‍चे घर में कुछ किताबें, प्‍लास्‍टिक की बोतलें, एक बैटरी और कुछ कच्‍चे टमाटर पड़े हुए हैं।

अपने परिवार से अलग हुआ भूतपूर्व राजा अब अपनी साधनहीन और असहाय जिन्‍दगी की अगुवाई कर रहा है। जबकि दोनों आंखों को मोतियाबिंद ने अपनी चपेट में ले लिया है, और सुनने की शक्‍ति भी समय के साथ पहले से कम हो गई। 1987 से अकेला पुराना टिगरिया गांव में इस तरह का जीवन बसर कर रहा है। जानकार कहते हैं कि उड़ीसा की 26 देशी रियासतों में से केवल वे अकेला राजा है, जो इस तरह का जीवन बसर कर रहा है, जिनका 15 दिसम्‍बर 1947 को भारत में विलय हो गया था। टिगिरिया देशी रियासत उड़ीसा की 26 रियासतों में से सबसे छोटी थी, जिसका क्षेत्रफल 119 वर्ग किलोमीटर था।

स्‍थानीय वकील ललित कृष्‍णा दास बताते हैं कि महापात्रा ने अपना महल सरकार को 1960 में केवल 75000 रुपये में बेच दिया था, और धीरे धीरे एक राजा फकीर में बदल गया, आज गांव वालों की मदद पर जीवन बसर करता है। गांव वाले हर रोज अपने पूर्व राजा को खाना खिलाते हैं। यह एकांत जीवन सिर्फ उसके लिए है।

धर्नीधार राना, जो गांववासी है, बताता है कि महापात्रा बहुत किफायती खाऊ हैं। राणा की बेटी कहती हैं कि वे ब्रेक फास्‍ट के लिए एक कप चाय और दो बिस्‍कुट लेते हैं, वहीं कुछ चावल और दाल दोपहर के भोजन में, और रोटी दाल रात को। वे कभी कभार चिकन खाते हैं। लुंगी कुर्ता पहनते हैं, और चलने के लिए छड़ी का सहारा लेते हैं। इस हालत को देखकर बतौर राजा महापात्रा की कल्‍पना करना मुश्‍िकल है। 

जयंत मारदराज, पूर्व शासक निलगिरी ने बताया कि आज वे एक आम आदमी से भी बदतर जिन्‍दगी जी रहे हैं, जो 1947 के अंत तक एक रियासत का शासक थे। राजकुमार कॉलेज रायपुर से डिप्‍लोमा करने के बाद 1940 में महापात्रा की शादी रासमंजरी देवी से हुई, जो सोनेपुर की राजकुमारी थीं। इनकी पांच संतान हुई, जिनमें तीन बेटे और दो बेटियां शामिल हैं। 

अपने बीते दिनों को याद करते हुए महापात्रा कहते हैं, 'मैं अक्‍सर अपने दोस्‍त के साथ कोतकाला की यात्रा करता, जो कि पुरी का शासक था। हम मैजिस्‍टिक और ग्रेट ईस्‍टर्न होटल में रूकते। मैं शराब लेना चाहता, यह अच्‍छा समय था। मैं पीने के लिए ब्‍लैक लेबल, व्‍हाइट लेबल, और धूम्रपान के लिए 999 और स्‍टेट एक्‍सप्रेस 555 सिगरेट ब्रांड पसंद करता। अगर बाजार में कोई कार का नया मॉडल आता तो हम खरीदते, मेरे पास 25 कारें और जीपें थी, जिनमें रोड़मास्‍टर,सेवरोलेट, पैकार्ड शामिल है। हमारे पास तीस नौकर होते थे। वो शिकारी था, उसने 13 टाइगरों,28 तेंदुओं और हाथी का शिकार किया। मैं हाथी के शिकार के लिए नहीं जाता था। मुझे गांव वाले शिकार के लिए करने के लिए मजबूत करते यह कहते हुए कि वे फसल को बर्बाद कर देंगे। इतने में बीच से जयंत बोलते हैं, यह शॉर्ट स्‍टोरी राइटर और एक अच्‍छे पेंटर भी हैं।

रियासत का भारत में विलय होने के बाद भी इंदिरा गांधी के समय तक महापात्रा को हर साल 11200 रुपये सरकार की ओर से मिलते रहे, लेकिन 1975 में इस सिस्‍टम को खत्‍म कर दिया गया। तब तक महापात्रा अपना टिगिरिया वाला महल बेच चुके थे, अपनी पत्‍िन से अलग हो चुके थे। इसके बाद वे अपने पुरी वाले दोस्‍त के यहां अगले बारह साल तक रहा, और कुछ समय उसने अपने बड़े भाई के यहां गुजारा, जो कि मंडासा रियासत के शासक थे। 1987 में महापात्रा टिगरिया लौट आए, यहां पर एक कच्‍चे घर का निर्माण किया, और रहना शुरू कर दिया। यहां से दो किलोमीटर दूर उनकी पत्‍िन रहती हैं, जो कि टिगरिया की पूर्व विधायिका हैं, लेकिन पिछले कई दशकों से दोनों मिले नहीं।

महापात्रा उस दिन को याद करते हैं, जब वे विलय का इकरारनामा साइन करने के लिए कटक गए, तो वहां के टाउन हाल में मेरे दीवान उदयनाथ साहु मेरा इंतजार कर रहे थे। सरदार पटेल हमको पहले ही अल्‍टीमेटम दे चुके थे। जब रानपुर के राजा ने साइन करने से मना किया तो सरदार पटेल ने सेना भेजने की धमकी दी। उन्‍होंने बताया कि पूर्व मुख्‍यमंत्री बिजू पटनायक ने उनको राजनीति में आने के लिए आग्रह किया था, लेकिन उन्‍होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि उनको लोगों को किस तरह संभालना है, यह नहीं आता।

जब महापात्रा से पूछा गया, आपको शाही महल, अपनी अमीरी और आजादी खोने का दुख है, तो वे कहते हैं, तब में राजा था, अब मैं कंगाल हूं। मुझे किसी भी बात के लिए मलाल नहीं है। क्‍या आप सोचते हैं कि मैं इतना लम्‍बा जिया पाता, अगर मैं दुखी होता।
 
देबाबरता मोहंती की रिपोर्ट है, जो इंडियन एक्‍सप्रेस में 12 अगस्‍त 2013 को प्रकाशित हुई, जिसका हिन्‍दी अनुवाद कुलवंत हैप्‍पी, युवारॉक्‍स डॉट कॉम के संपादक कम संचालक द्वारा किया गया।

रैली समीक्षा - नरेंद्र मोदी एट हैदराबाद विद यस वी कैन

भाजपा के संभावित नहीं, बल्‍कि पक्‍के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी ने आज हैदराबाद में एक रैली को संबोधन किया, कहा जा रहा था कि यह रैली आगामी लोक सभा चुनावों के लिए शुरू होने वाले अभियान का शंखनाद है।

 राजनेता के लिए रैलियां करना कोई बड़ी बात नहीं। रैलियां तो पहले से होती आ रही हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी की रैली को मीडिया काफी तरजीह दे रहा है, कारण कोई भी हो। संभावित अगले प्रधानमंत्री या पैसा। नरेंद्र मोदी की रैली का शुभारम्‍भ स्‍थानीय भाषा से हुआ, जो बड़ी बात नहीं, क्‍यूंकि इटली की मैडम हर बात हिन्‍दी में बोलती हैं, भले शब्‍द उनके अपने लिखे हुए न हों।

नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का नारा इस्‍तेमाल किया, यैस वी कैन। इस बात से ज्‍यादा हैरान होने वाली बात नहीं, क्‍यूंकि नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग का जिम्‍मा उसी कंपनी के हाथों में है, जो बराक ओबामा को विश्‍वस्‍तरीय ब्रांड बना चुकी है, और जो आज भी अपनी गुणवत्‍ता साबित करने के लिए संघर्षरत है। ज्‍यादातर अमेरिकन का उस पर से भरोसा उठा चुका है। अफगानिस्‍तान से सेना वापसी, वॉल स्‍ट्रीट की दशा सुधारने, आतंकवाद के खिलाफ लड़ने जैसे मोर्चों पर ओबामा पूरी तरह असफल हैं।

विज्ञापन कंपनियों का काम होता है, उत्‍पाद को बाजार में पहचान दिलाना, उस पहचान को बनाए रखना शायद उत्‍पाद निर्माता के हाथ में होता है। विज्ञापन हमेशा दिल को लुभावने वाले बनाए जाते हैं, अगर वे आकर्षक न होंगे, तो ग्राहक नहीं जाएगा उसको खरीदने के लिए।

यस वी कैन पर एक बार फिर लौटता हूं, यह शब्‍द सुनने भर से अगर आपको लगता है कि बहुत बड़ा करिश्‍मा हो गया है तो हर रविवार आपके शहर में किसी न किसी एमएलएम, नेटवर्किंग कंपनी की बैठक आयोजित होती होगी, उसमें जाइए, इससे भी ज्‍यादा आपको मोटिवेशन का नशा पिला दिया जाएगा, लेकिन जब उतरेगा तो आप पहले से भी ज्‍यादा खुद को कमजोर पाएंगे।

नरेंद्र मोदी ने कहा, किसी भी सरकार का पहला मजहब होता है राष्‍ट्र, जबकि नरेंद्र मोदी ने तो इंडिया कहा, और सरकार का ग्रंथ होता है संविधान। मोदी की तैयारी बहुत सही थी, लेकिन अगर गुजरात के अंदर लोकायुक्‍त के लिए युद्ध न चल रहा होता तो। सुप्रीम कोर्ट तक जाने की क्‍या जरूरत थी, संविधान को मानते, और राज्‍य में लोकायुक्‍त को नियुक्‍त करते।

बीजिंग की तारीफ पर नरेंद्र मोदी ने एक नेता को निशाने पर लिया। किसी शहर या देश की तारीफ करना बुरी बात नहीं, लेकिन नरेंद्र मोदी खुद को भूल गए, जब वे पुणे में विद्यार्थियों को शिक्षा पर भाषण दे रहे थे तो उन्‍होंने भी चीन की तारीफ की थी, वहां के आंकड़े पेश किए थे, जो वहां की सरकारों के पास भी नहीं। हो सकता है अधिक काम और जिम्‍मेदारियों के चलते खुद की गलतियां याद न रहीं हो, जैसे आज विपक्ष में बैठी एनडीए को अपने कार्यकाल के दौरान हुए आतंकवादी हमले, पाकिस्‍तान से दोस्‍ताना संबंध याद नहीं रहे। और आरोपों से बचने के लिए कहते हैं, देश की जनता ने तब हम को नकार दिया था, मतलब गंगा नहा लेने से किए पाप धुल गए, तो चालीस साल के गुनाह तो कांग्रेस के भी धुल चुके हैं, जो आपके आने सत्‍ता से उतर गई थी। अगर आपकी भाषा में सत्‍ता से उतरना पाप धूलना होता है तो।

यह एक युवा रैली थी। उम्‍मीद थी संभावनाओं का माया जाल बुनने वाले नरेंद्र मोदी युवा पीढ़ी के लिए कुछ खास बात लेकर आने वाले हैं, लेकिन अफसोस के रैली में नरेंद्र मोदी ने सरकार विरोधी अख़बार का संपादकीय पन्‍ना ही पढ़ डाला। सरकार की बुराईयां तो अख़बारों में हर रोज सुर्खियां बनती हैं, उनको गिनाकर देश की जनता को लुभावना, ठगने जैसा लगा। मुझे लगता है कि आंध्र प्रदेश में अख़बार निकलते होंगे, हर रोज नेताओं के सरकार विरोधी बयानों को जगह मिलती होगी।

नरेंद्र मोदी को इस रैली में समस्‍याएं और कांग्रेस को नीचा दिखाने की बजाय अपने भीतर के लीडर की उन योजनाओं से अवगत करवाना चाहिए था, जिसको लेकर युवा पीढ़ी सोच सके कि नरेंद्र मोदी को वोट किया जाए। मंच पर ऊंचे सुर में बोलने से कुछ सच्‍चाईयां नहीं बदलती। शराब का नशा सुबह तक रहता है। नशा मत पिलाइए, कोई देश बदलने का सुझाव बतलाइए। वो कौन सी बातें हैं, जो देश को नये आयाम तक लेकर जा सकती हैं। नरेंद्र मोदी राष्‍ट्रवाद की बात कर रहे हैं, लेकिन उनकी सरकार की टशन हमेशा पड़ोसी राज्‍यों से चलती रहती है। वहां पर नरेंद्र मोदी राष्‍ट्रहित क्‍यूं नहीं देख पाते ? वहां पर एक क्षेत्रीय प्रतिनिधि का फर्ज ही अदा क्‍यूं करते हैं ?

सवाल बहुत हैं, लेकिन चलते चलते इतना कहूंगा कि नरेंद्र मोदी के पास 11 साल का अनुभव है, एक राज्‍य को चलाने का, वे संभावनाओं का खुला आसमान दिखाते हैं। उधर, राहुल गांधी के पास विरासत में मिली कांग्रेस की रियासत है, लेकिन वे सकारात्‍मकता की किताब को बीच में से पढ़ने की कोशिश करते हैं। दोनों राजनीति तो सकारात्‍मक सोच से कर रहे हैं, लेकिन कहीं कहीं उलझ जाते हैं।

आज की रैली एक राजनेता की रैली थी, नरेंद्र मोदी बतौर एक मार्गदर्शक, देश के प्रधानमंत्री पूरी तरह पिछड़ते नजर आए। 

आप अपनी राय जरूर रखें, ताकि रैली समीक्षा को समझने में मुझे और आसानी हो।

मोना लीसा की तस्‍वीर का सच आएगा सामने या नहीं

लिओनार्दो दा विंची के द्वारा कृत एक विश्व प्रसिद्ध चित्र है। यह एक विचारमग्न स्त्री का चित्रण है जो अत्यन्त हल्की मुस्कान लिये हुए है। यह संसार की सम्भवत: सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग है जो पेंटिंग और दृष्य कला की पर्याय मानी जाती है। सदियों से मोनालीसा की रहस्यमय मुस्कुराहट जहाँ रहस्य बनी हुई है।

एक तस्‍वीर हजारों बातें, लेकिन अब अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम इटली के फ्लोरेंस में पहुंच चुकी है। इस टीम के लिए उस कब्रगाह को खोल दिया गया है, जिसमें व्यापारी 'फ़्रांसेस्को देल जियोकॉन्डो' की पत्नी 'लिसा गेरार्दिनि' के अन्‍य परिजनों को दफनाया गया था। अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि डीएनए से मोनालीसा की पहचान हो सकती है।

लेखक और अनुसंधानकर्ता सिल्‍वानो विन्‍सेटी ने योजना बनाई है कि हड्डियों के जरिये डीएनए टेस्‍ट लेकर पिछले साल सेंट ओर्सोला कान्‍वेंट से मिली तीन खोपड़ियों के साथ टेस्‍ट करके देखा जाएगा, क्‍यूंकि उनके हिसाब से इतिहासिकारों का मानना है कि लीसा गेरार्दिनी अपने अंतिम कुछ साल सेंट ओर्सोला कन्‍वेट में थी, और इस खंडहर इमारत में पिछले साल हड्डियों को ढूंढने का काम शुरू हुआ था। उनको यकीनन है कि तीन में से एक तो लीसा हो सकती है।

अगर एक बार डीएनए मैच कर जाता है तो सेंट ओर्सोला से मिले खोपड़ी से लीसा गेर्रिदिनी का चेहरा बनाया जा सकता है, और उसकी तुलना उस तस्‍वीर में मुस्‍कराती हुई, महिला से की जाएगी, और पता लगाया जा सकेगा कि लीसा गेर्रिदिनी है या कोई और। अनुसंधानकर्ता के अनुसार अगर वे मां और बच्‍चे के बीच का संपर्क ढूंढ़ने में कामयाब हुए तो यकीनन वे लीसा को खोज लेंगे।

ऐसा माना जाता है कि इतालवी चित्रकार लियोनार्दो दा विंची ने मोनालिसा की तस्वीर 1503 से 1506 के बीच बनाई थी। समझा जाता है कि ये तस्वीर फ़्लोरेंस के एक गुमनाम से व्यापारी 'फ़्रांसेस्को देल जियोकॉन्डो' की पत्नी 'लिसा गेरार्दिनि' को देखकर आंकी गई है।

वहीं जर्मन के कला इतिहासकार सुश्री माईक बोग्ट-लयरेसन ने दावा किया है कि तस्वीर में दिख रही महिला इटली के अरांगो प्रान्त के डियूक की पत्नी ईशाबेला है। सुश्री माईक के अनुसार ईशाबेला की मुस्कान में दुख है क्योंकि लीयनार्दो के पेंटिंग बनाने से कुछ समय पहले ही उसकी माँ का देहान्त हो गया था। माईक की माने तो ईशाबेला का शराबी पति नशे में धुत् होकर उसे अक्सर मारता-पीटता था। अपनी प्रकाशित पुस्तक ‘हू इज मोनालिसा ’ इंसर्च में अनेकों समानतांएं गिनवायी हैं। पुस्तक में आगे लिखा है कि लियनार्दो जो कि डियूक के दरबार में शाही कलाकार थे, ईसाबेला के काफी निकट थे।

कुछ साल पूर्व जापान में दाँतों के एक डॉक्टर ने यह कह कर सबको हैरत में डाल दिया था कि मोनालिसा की रहस्यमयी मुस्कान का राज उसके ऊपरी जबड़े में आगे के दो दाँतों का टूटा होना है और इसी कारण उसके ऊपरी होठ एक तरफ कुछ दबा हुआ-सा दिखाई दे रहा है, इसी कारण उसका एक ऊपरी होठ एक तरफ से कुछ दबा हुआ सा दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि अंजाने में मोनालिसा व रहस्यमय मुस्कान दिखाई देती है जब कि वास्तव में यह मुस्कराहट नहीं बल्कि अपने टूट चुके दाँतों से खाली हुए स्थान को जीभ से होठों को ठेलने का प्रयास कर रही है जिससे होठ दबा हुआ न दिखे। यह डाक्टर पिछले कई वर्षों से मोनालिसा पर शोध कर रहे थे।

दिसम्बर 1986 में अमेरिका के बेल लेबोट्री में कम्प्यूटर वैज्ञानिक सुश्री लिलीयन स्वाडज ने अपने अनुसंधान के आधार पर यह कह कर पूरी दुनिया में तहल्‍का मचा दिया कि लीयनार्दो विंची की सुप्रसिद्ध कलाकृति मोनालिसा किसी रहस्यमय युवती का नहीं बल्कि स्वयं चित्रकार का अपना ही आत्म चित्र है। आर्ट एण्ड एनटिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित लेख में सुश्री लिलीयन ने दावा किया कि 1518 में लाल चाक से बनें लिनार्डोविंची का आत्मचित्र व मोनालिसा के चित्र को जब उसने पास-पास रखा तो यह देखकर दंग रह गई कि लीयनार्दो तथा मोनालिसा के चेहरे, ऑंखें, गाल, नाक व बालों में अद्भत समानता है। कम्प्यूटर के मदद से जब मोनालिसा के चेहरे के ऊपर लीयनार्दो के बाल, दाढ़ी व भवहे लगाकर देखा गया तो वह पूरी तरह लीयनार्दो में परिवर्तित हो गई। इसके विपरीत लीयनार्दो के चेहरे से यदि दाढ़ी, बाल, मूँछ, भवे आदि हटा दी जाये तो लीयनार्दो मोनालिसा में बदल जाते है।

स्वार्ड जी का कथन है कि लीयनार्दो ने मोनालिसा के रूप में स्वयं का नारी चित्रण किया है। उन्होंने इसके पीछे एक कलाकार का समलैंगिक होना प्रमुख कारण बताया है। इस बात की प्रबल संभावना है कि विंची समलैंगिक हो और उभय लिंगी विषयों को कलाकृति में ढालने में रूची रखते हो तथा अपनी इसी प्रवित्ती के चलते स्वयं को नारी रूप में चित्रित कर उसे मोनालिसा नाम दिया।

सम्प्रति यह छबि फ्रांस के लूव्र संग्रहालय में रखी हुई है। म्यूज़ियम के इस क्षेत्र में 16वीं शताब्दी की इतालवी चित्रकला की कृतियाँ रखी गई हैं। यह तस्‍वीर यहां से 1911 में यहां के पूर्व कर्मचारी द्वारा चुरा ली गई थी, लेकिन दो साल बाद पुलिस ने उस कर्मचारी को पकड़कर इस तस्‍वीर को फिर से हासिल किया।
मोनालिसा की असल पेंटिंग केवल 21 इंच लंबी और 30 इंच चौड़ी है। तस्वीर को बचाए रखने के लिए एक ख़ास किस्म के शीशे के पीछे रखी गई है जो ना तो चमकता है और ना टूटता है। मोनालिसा: एक अनसुलझा रहस्य। जिसको देखने के लिए लूव्र संग्रहालय में हर साल मिलियन्‍स पर्यटक आते हैं, और उसकी मुस्‍कराहट को देखकर चले जाते हैं।

कुछ इनपुट विकीपीडिया से

वॉट्सएप, फेसबुक और समाज

12 साल का रोहन फेसबुक पर खाता बनाता है। अपनी उंगलियों को मोबाइल पर तेज रफतार दौड़ाता है। एंड्रॉयड, विन्‍डोज, स्‍मार्ट फोन और ब्‍लैकबेरी के बिना जिन्‍दगी चलती नहीं। भारतीय रेलवे विभाग भले साधारण फोन से रेलवे टिकट कटवाने की व्‍यवस्‍था की तरफ बढ़ रहा हो, लेकिन भारतीय एक पीढ़ी हाईटेक फोनों की तरफ बढ़ रही है।

गेम्‍स, चैट और नेटसर्फिंग आज की युवा पीढ़ी की दिनचर्या का हिस्‍सा बन चुकी है। यह दिनचर्या उनको अजनबियों से जोड़ रही है और अपनों से तोड़ रही है। अंधेर कमरे में भी हल्‍की लाइटिंग रहती है, यह लाइटिंग किसी कम रोशनी वाले बल्‍ब की नहीं, बल्‍िक मोबाइल फोन की स्‍क्रीन से निकली रोशनी है।

आज युवा पीढ़ी कहीं पर भी हो, लेकिन उसकी नजर मोबाइल फोन की स्‍क्रीन पर रहती है। रतन टाटा, बिरला और अम्‍बानी से ज्‍यादा व्‍यस्‍त है, हमारी युवा पीढ़ी। सेक्‍सी, होट कैमेंट आज आम बात हो चली है। फेसबुक, वॉट्सएप्‍स के मालिक दिन प्रति दिन धनी हो रहे हैं। सीबीआई और आईबी के दस्‍तावेजों से भी ज्‍यादा आज की युवा पीढ़ी के मोबाइल कॅन्‍फीडेंशियल होते हैं। एक शादी समारोह में एक लड़की मेरा ध्‍यान अपनी ओर खींच रही थी, इसलिए नहीं कि वे दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की थी, बल्‍कि इसलिए उसका ध्‍यान शादी समारोह में कम मोबाइल पर ज्‍यादा था। उंगलियां मोबाइल की स्‍क्रीन पर इस तरह चल रही थीं, जैसे कचहरी में बैठे टाइपिस्‍ट बाबू की। हर सेकेंड पर रीप्‍लई करना आज आम बात हो गई लगता है।

सस्‍ते इंटरनेट पैकेजों ने हर किसी की आदत बिगाड़ दी है। मिलने के लिए घर पर आया दोस्‍त, अगर मोबाइल फोन पर उंगलियां चलाता रहे, और बातों में सिर्फ औपरचारिक तौर पर सिर हिलाए तो गुस्‍सा किसी को भी आ जाएगा, पर ऐसे वक्‍त पर गुस्‍से को काबू रखने वाले को महात्‍मा गांधी कह सकते हैं।

अगर हमारा कोई मित्र दोस्‍त फेसबुक पर नहीं तो हम उसको सलाह देते हैं फेसबुक पर आ जा, लेकिन हम एक बार भी नहीं सोचते कि वहां पर हजार का आंकड़ा पार कर चुके लोगों से हमने कितनों के साथ बात की। हम फोटो शेयर कर देते हैं, वहां से कुछ लाइक आ जाते हैं। हम खुश होते हैं।

जब हमारी जिन्‍दगी में फेसबुक, स्‍मार्टफोन आदि इतना घुस चुके हैं, वहां पर अदालती आदेश क्‍या मायने रखता है, जिसमें कहा गया हो कि 13 से कम उम्र के बच्‍चों को सोशल मीडिया पर रोक होनी चाहिए। वे तो बहुत पहले से है, लेकिन वहां पर उम्र का प्रमाण पत्र मांगता कौन है, यहां तो भारत के सरकारी कार्यालय नहीं, जहां के कर्मचारी अपनी जेब गर्म करने या कायदे कानून का हवाला देते हुए आपके पैदा होने के साबूत मांग मांगकर आपको मरने जैसा कर देंगे।

यकीनन, इसका बढ़ता क्रेज घातक है, लेकिन इसको रोकने वाले अभिभावक, खुद इसका शिकार हैं। सिने दुनिया ने आम दुनिया की युवा पीढ़ी को अति बिंदास बना दिया है। एक घटनाक्रम की बात करें तो एक लड़की अपने फेसबुक खाते से एक अन्‍य दोस्‍त के साथ फोटो शेयर करती है, और कहती हैं भैया कैसी लगी, जो पूरी तरह बेलिबास पिक्‍चर है, और हैरानी की बात यह है कि लड़की की उम्र 14 साल भी नहीं है।

फेसबुक पर खाता बनाने के चक्‍कर में बच्‍चे सबसे पहला झूठ बोलते हैं उम्र के संबंध में। वे अन्‍य फेस के सहारे फेसबुक पर आते हैं। अपनों के अधिक बेगानों से दोस्‍ती करना पसंद करते हैं। जब अधिकतर बच्‍चे घरों में सुरक्षित नहीं, तो साइबर की दुनिया में उनके सुरक्षित होने की गारंटी कौन देगा।

बिहार को किस की नजर लग गई

आधुनिकता के इस युग में नजर कोई मायने नहीं रखती। नजर से तात्पर्य, दृष्टि नहीं, अंधविश्‍वास है। कहते सुना होगा कि नजर लग गई। नजर लगना, बुरी बला का साया पड़ना। अच्‍छा होते होते एकदम बुरा होने लगना। जब सब रास्‍ते बंद हो जाते हैं तो भारतीय लोग अपने पुराने रीति रिवाजों के ढर्रे पर आ जाते हैं, और सोचने लगते हैं कि इसके पीछे कुछ न कुछ है, जो अंधविश्‍वास से जुड़ा हुआ है।

सड़कों पर चलने वाले ट्रकों के पीछे बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला, यह पंक्‍ति आम मिल जाएगी, हालांकि बुरी नजर वाले का मुंह कभी काला नहीं होता, जो लोग पैदाइशी काले होते हैं, उनके दिल और उनकी नजर भी अन्‍य लोगों की तरह पाक साफ होती है। काला रंग, तो ग्रंथों की शान है। काले रंग की  फकीर कंबली ओढ़ते हैं। कोर्ट में वकील काले रंग का कोर्ट पहनता है। आंखों में डालने वाला काजल काला होता है। कुछ लोग तो बुरी नजर से बचाने के लिए घर की छत या मुख्‍यद्वार पर काला घड़ा रखते हैं।

शायद बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार अपने सुशासन को बचाए रखने के लिए बिहार के मुख्‍यद्वार पर काले घड़े को रखने भूल गए। मुझे लगता है कि बिहार को किसी की नजर लग गई है। बिहार में सुशासन लौट रहा था, भाजपा जनता दल यूनाइटेड गठबंधन सरकार निरंतर सत्‍ता में बनी हुई थी। अचानक इस साल बिहार में दोनों का गठबंधन टूट गया, और सत्‍ता केवल नीतीश्‍ा कुमार की अगुवाई वाली पार्टी के हाथ में रह गई। इस ब्रेकअप से जिगरी दोस्‍त, दुश्‍मन बन गए। जो कल तक हाथ मिलाते थे, ब्रेकअप के बाद एक दूसरे से हाथापाई करते नजर आए। यह मामला ठंडा पड़ता कि महाबोधि मंदिर को उग्र लोगों ने निशाना बना लिया। भली हो राम की, कोई बड़ा हादसा होने से टल गया। वरना, जितने बम महाबोधि मंदिर में फटे, उतने बम तो लाशों के ढेर लगा सकते थे।

महाबोधि मंदिर के हमले से तो बच निकले, लेकिन छपरा में मिड डे मील के कारण जिन्‍दगियां बचाने से मात खा गए। यहां एक स्‍कूल में भोजन खाने से लगभग दो दर्जन के करीब बच्‍चे अपनी जिन्‍दगी से हाथ धो बैठे, और पीछे छोड़ गए मातम, कुछ सवाल और चर्चाएं ।

छपरा के दर्द से बिहार उभरता कि इस सोमवार को भारतीय सीमा पर आतंकवादियों ने घातक लगाकर भारत के पांच जवानों को शहीद कर दिया, लेकिन इसमें भी चार जवान बिहार के थे, जो शहीद हुए। बिहार को एक बार फिर पीड़ा से गुजरना पड़ा।

एक हादसे के बाद एक बिहार को कष्‍ट, दर्द दे रहे हैं। ऐसे में यकीनन एक सवाल तो आता है कि आखिर बिहार को किस की नजर लग गई। कोई तो जाओ, मिर्च बिहार के ऊपर से घूमाकर चुल्‍हे में जला डालो, कुछ अगरबत्‍तियां बिहार के सिर से घूमाकर मुख्‍य द्वार पर लगा दीजिए, शायद बुरी भलाओं का साया बिहार से टल जाए, कहते हैं कि बुरी नजर तो पत्‍थरों को भी चीर देती है। हलका सा काला काजल का टिक्‍का लगा लें, शायद किसी ने चांद पर भी दाग इसलिए छोड़ दिया था कि इसको किसी की नजर न लगे, वरना चमकते हुए चांद में काला सा धब्‍बा क्‍यूं नजर आता।




Aseem Trivedi का पत्र संतोष कोली की मृत्‍यु के बाद

साथियों, बहुत दुखद खबर है कि आज संतोष कोली जी हमेशा के लिए हम सब से दूर चली गयीं. अब उनकी वो निर्भीक और निश्चिंत मुस्कराहट हमें कभी देखने को नहीं मिलेगी. अन्ना आंदोलन के सभी मित्रों में संतोष जी मेरी फेवरिट थीं. उनसे मिलकर आपके भीतर भी साहस और सकारात्मकता बढ़ जाती थी. मैं दावे से कह सकता हूँ कि समाज के लिए उनके जैसे निस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोग आपको बहुत मुश्किल से देखने को मिलेंगे.

दामिनी आन्दोलन के दौरान एक दिन वो बता रही थीं कि अब वो एक गैंग बनाएंगी और ऐसी हरकतें करने वालों से अच्छी तरह निपटेंगी. बाद में उनके फेसबुक पेज पर नाम के साथ दामिनी गैंग लिखा देखा. खास बात ये है कि उनके साहस और आक्रोश में बहुत सहजता थी. ये वीर रस कवियों की तरह आपको परेशान करने वाला नहीं बल्कि आपको बुरे से बुरे क्षणों में भी उम्मीद और सुकून भरी शान्ति देने वाला था. समय समय पर उनके परिवार के सदस्यों से भी मिलने को मिला जो संतोष जी के साथ उनके संघर्ष में कंधे से कंधे मिलाकर साथ दे रहे थे. आज के फाइव स्टार एक्टिविज्म के दौर में एक बेहद साधारण परिवार से आयी संतोष जी का जीवन अपने आप में एक उदाहरण पेश करने वाला था. अपने साधारण और सहज अंदाज़ में वो जन साधारण के साथ कनेक्ट और कम्युनिकेट करने की अद्भुत क्षमता रखती थीं. सुन्दरनगरी में लोगों का उन पर विश्वास देखने योग्य था.

लेकिन दुर्भाग्य ही है कि उनके साथ बहुत थोड़ा सा समय ही बिताने को मिला और बहुत गिनती की मुलाकातें ही मेरे हिस्से आयीं. मुझे आज भी याद है जब वो करीब साल भर पहले जंतर मंतर पर अन्ना, अरविन्द के अनशन के दौरान जनता को संबोधित कर रही थीं, उनका बेहद सहज और उन्मुक्त अंदाज़ अपने आप में एक सन्देश देता लग रहा था. करीब दस दिन चले उन अनशन के दौरान ही उनके साथ काफी समय बीता और उनको अच्छी तरह समझने का मौक़ा मिला. सेव योर वॉयस अभियान के दौरान इंटनरेट सेंसरशिप के खिलाफ राजघाट पर हमारा पहला प्रोटेस्ट हो या 66A के खिलाफ जंतर मंतर पर हमारा अनशन, संतोष जी ने अपने मित्रों के साथ पहुचकर हमारा पूरा साथ दिया.

लेकिन अफ़सोस है कि ज़िंदगी की लड़ाई में हम चाहकर भी उनका साथ नहीं दे पाए और उनकी इस असमय विदाई को स्वीकार करने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं बचा. लेकिन हमें विश्वास है कि संतोष जी हमेशा हमारे लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेंगी और सहज और निर्भीक रूप से अपने कर्त्तव्य पथ पर चलने के लिए हमें प्रेरित करती रहेंगी. काश वो एक बार ठीक हो पातीं और लोगों का उनके प्रति प्रेम और सम्मान देख पातीं कि कितनी शिद्दत से लोगों ने उनके लिए प्रार्थनाएं कीं उनके स्वस्थ्य होने की दुआएं कीं और काश कि हम सब उनके साथ कुछ और समय बिता पाते.

लेकिन इतना दूर जाकर भी आप हमारे साथ रहेंगी सतोष जी, आपकी यादें जनसंघर्ष की प्रेरणा बनकर हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगी और स्वार्थपरता के इस अमानवीय दौर में निस्वार्थ सेवा भाव के बीज अंकुरित करती रहेंगी.