दिल्‍ली अभी दूर है 'नरेंद्र भाई'

भले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आज देशभर में ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर लोकप्रियता की सभी हदें पार कर चुका है, लेकिन इसको आगामी लोक सभा चुनावों के लिए सफलता की गारंटी कदापि नहीं माना जा सकता। आंकड़ों की धरातल को सही से देखे बिना भले ही भाजपा या उसके समर्थक सत्ता पर बैठने का ख्वाब संजो रहे हों, क्योंकि आंकड़े वैसे नहीं, जैसे भाजपा सोच रही है, आंकड़े विपरित हैं, खासकर भाजपा की सोच से। हां, अगर कोई करिश्मा हुआ तो जरूर भाजपा को २०१४ में सत्ता का स्वाद चखने का मौका मिल सकता है। वैसे ज्यादातर उम्मीद करना बेईमानी होगी, क्यूंकि आज स्थितियां १९९८ या १९९९ वाली नहीं हैं, जब भाजपा अन्य सहयोगी पार्टियों की सहायता से सिंहासन पर बैठी थी। अटलबिहारी वाजपेई जैसा एक सशक्त और दूरदर्शी सोच का व्यक्ति भाजपा का अगुवाई कर रहा था।

अब भाजपा नरेंद्र मोदी के जरिए उस इतिहास को दुहराना चाहती है। मगर नरेंद्र मोदी को पार्टी के शीर्ष नेता व अन्य भाजपा के मुख्यमंत्री तक नहीं सहज से ले पा रहे तो जनता से कैसी उम्मीद की जा सकती है, खासकर उस समुदाय से, जो नरेंद्र मोदी को आज भी मन ही मन में मुस्लिम समुदाय के लिए खतरे के रूप में देखता है। सच कहें तो आज नरेंद्र मोदी के आगे २००९ से कहीं अधिक चुनौतियां हैं, क्यूंकि  समय के साथ साथ भाजपा के कई संगी साथी एनडीए छोड़कर चले गए, खासकर जद यू के जाने बाद भाजपा को अगला चुनाव कुछ सहयोगियों के सहारे लडऩा होगा। जनता दल यूनाइटेड, जिसके अध्यक्ष शरद यादव हैं, ऐसी १३वीं पार्टी थी, जिसने भाजपा का साथ छोड़ा। अब एनडीए में केवल शिवसेना, शिरोमणि अकाली बादल और छोटी छोटी आठ पार्टियां हैं, जिनके पास या तो एक एक सांसद है या बिल्कुल नहीं। शिवसेना के पास मौजूदा समय में ११ तो शिअद के पास केवल ४ सांसद हैं जबकि भाजपा के पास 117 सांसद हैं। हालांकि सरकार बनाने के लिए २७३ के आंकड़े को छूना होता है।

जब १९९८ और १९९९ में भाजपा अटल बिहारी वापपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी। संजीदा, समझदार और अनुभवी राजनेता की छवि रखने वाले वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उसे दोनों बार सत्ता हासिल हुई थी, भले ही पहली सरकार १३ दिन चली, लेकिन अगली सरकार १ सीट का इजाफा करते हुए १८३ का आंकड़ा छूने में सफल हुई, और अन्य पाॢटयों के सहयोग से सरकार बनाने में सफल रही और एक सफल कार्याकाल पूरा किया। अब स्थितियां पहले जैसी नहीं, पहली बात अब एनडीए पूरी तरह टूटकर बिखर चुका है, दूसरी बात अटलबिहारी वाजपेयी जितनी अहमियत नरेंद्र मोदी को उनकी पार्टी में नहीं मिल रही, यहां पर उनका मुकाबला कांग्रेस से कम अपने साथियों से ज्यादा है, वरना नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार समिति अध्यक्ष बनने पर इतना होहल्ला न होता। भाजपा के हाथ में केवल कुछ राज्य हैं, जिनसे उम्मीद की जा सकती है, जिसमें मध्यप्रदेश, ३६गढ़, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा आदि। जद यू से अलग होने के बाद बिहार भाजपा के खाते से निकल चुका है। ४२ लोक सभा सीटों वाले पश्चिमी बंगाल में भाजपा केवल एक सीट के साथ बनी हुई है, लेकिन वह सीट पर जसवंत सिंह की है, जो नरेंद्र मोदी के कट्टर विरोधी बताए जाते हैं, हालांकि १९९९ में इस राज्य से भाजपा को 2 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। जब भाजपा को यह सीटें नसीब हुई थी, तब उसका और तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन था। मगर अब रिश्ते वैसे नहीं, जैसे पुराने दिनों में हुआ करते थे। पश्चिमी बंगाल में एक चौथाई मतदान मुस्लिम है। ऐसे में अपनी कुर्सी बनाए रखने के लिए तृणमूल कांग्रेस कहीं न कहीं, आगे चलकर कांग्रेस के साथ समझौता तो कर सकती है, लेकिन नरेंद्र मोदी की अगुवाई को शायद ही मंजूर करे। वैसे नरेंद्र मोदी पश्चिमी बंगाल से टाटा को गुजरात खींच रहे, कहीं न कहीं, यह बात भी पश्चिमी बंगाल के लोगों को खलती है।

कर्नाटक का हाल तो पिछले दिनों देखने को मिला। भाजपा को इस बार कर्नाटका से भी कुछ ज्यादा की उम्मीद करना बेईमानी होगा। येदियुरप्पा अगर भाजपा में फिर से लौटते हैं तो भी भाजपा कर्नाटका में फिलहाल तो करिश्मा नहीं कर सकती, क्यूंकि जनता का मन भाजपा से उठ चुका है। २८ लोक सभा सीटों वाले इस क्षेत्र से भाजपा को २००९ में १८ सीटें नसीब हुई थी, लेकिन इस बार इनकी संख्या नीचे गिरने की पूरी संभावना है, क्यूंकि यहां कांग्रेस ने सत्ता वापसी कर ली है। उड़ीसा जहां २१ लोक सभा सीटें हैं,  वहां पर भाजपा के पास मौजूदा समय में एक भी सांसद नहीं, उड़ीसा का मुख्यमंत्री नवीन पटनायक नरेंद्र मोदी को अच्छा प्रशासक नहीं मानता, और २००९ में संघ की गतिविधियों से तंग आकर नवीन पटनायक ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था, ऐसे में उसका भाजपा के साथ खड़े होना मुश्किल है, क्यूंकि यहां के नतीजे ईसाई समुदाय प्रभावित करता है, जो संघ को पसंद नहीं करता, और संघ के बिना बीजेपी चल नहीं सकती।

देश में सर्वाधिक लोक सभा सीटें रखने वाले उत्तरप्रदेश में भाजपा को करिश्मा करना होगा। केवल यह राज्य किसी भी पार्टी का नसीब बदल सकता है, क्यूंकि यहां पर देश की ८० लोक सभा की सीटें हैं, लेकिन यहां मुश्किल यह है कि इस क्षेत्र में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा है, जो किसी भी सहारा को सहारा देती है, लेकिन कई शर्तों के साथ। बीएसपी और सपा, दोनों का यहां बहुत बोलबाला है, और दोनों पाॢटयों के शीर्ष नेता खुद प्रधानमंत्री की सीट पर बैठने के ख्वाब देखते हैं। यह समझौतावादी लोग कांग्रेस के साथ इसलिए चले जाते हैं, यहां सौदेबाजी का काफी संभावनाएं रहती हैं, लेकिन भाजपा के साथ इस तरह की सौदेबाजी करना पा मुश्किल होगा। इस क्षेत्र में भाजपा ने सबसे बेहतरीन प्रदर्शन १९९८ में किया था, जब उसको ५९ सीटें मिली थी, उसके बाद इस आंकड़े को भाजपा कभी छू नहीं पाई, मौजूदा समय में भाजपा के पास केवल नौ सीट हैं।

महाराष्ट्र, जहां पर लोक सभा की ४८ सीटें हैं। मगर भाजपा के खाते में केवल ९ सीटें हैं। इस बार स्थिति यों की त्यों बनी रह सकती है। इस राज्य में एनडीए सहयोगी शिवसेना है, जिसके पास मौजूदा समय में ११ सांसद हैं, लेकिन बाल ठाकरे को खो देेने के बाद राज ठाकरे का उभरना, कहीं न कहीं शिव सेना को पीछे धकेलेगा। जिस तरह का रु$ख शिव सेना के मौजूदा अध्यक्ष उद्धव ठाकरे नरेंद्र मोदी के बारे में अपनाए हुए हैं। ऐसे में इस दल के भी एनडीए से बाहर होने के चांस हैं, क्यूंकि भाजपा के संभवत: पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों में से किसी एक को चुन सकते हैं, जिसका प्रदर्शन बेहतर हुआ, लेकिन उससे पूूर्व भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होना लाजमी है। अन्ना हजारे इस राज्य से संबंध रखते हैं, वे नरेंद्र मोदी की आलोचना सार्वजनिक मंचों से कर रहे हैं, और ऐसे में अपनु मानस, महाराष्ट्रीयन लोग नरेंद्र मोदी के चेहरे से दूरी बना सकते हैं।

आंंध प्रदेश में भाजपा के पास एक भी सांसद नहीं, हालांकि भाजपा ने ४२ लोक सभा सीटों वाले इस क्षेक में अपनी शाख जमाने के लिए २००९ में ३७ उम्मीदवार उतारे थे। अटल बिहारी वापपेयी की सरकार के वक्त यहां की पार्टी टीडीपी का बहुत बड़ा हाथ था। मगर २००४ में टीडीपी और भाजपा का  रिश्ता टूट गया था, अगर अब भी यह रिश्ता बनता है तो कोई ज्यादा फायदा नहीं मिलने वाला, क्यूंकि टीडीपी भी अपनी चमक को खोती जा रही है। वहां पर संभावना यह की जा सकती है कि भाजपा जगमोहन रेड्डी की नई पार्टी के साथ चुनाव लड़ सकती है, जो पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वाईएसआर रेड्डी की मौत के बाद उनके पुत्र ने बनाई है। तेलुगु देशम पार्टी तीसरे फ्रंट की तरफ रुख कर सकती है। वैसे यह क्षेत्र कांग्रेस के प्रभाव वाला है। तमिलनाडु में लोक सभा की ३९ सीटें हैं। यहां पर दो पाॢटयां सक्रिय हैं, एक डीएमके  और एआईएडीएमके। एम करुणानिधि और जयललिता दोनों यहां के रूसख वाले नेता हैं। जयललिता का रूझान नरेंद्र मोदी की तरफ है। दोनों में रिश्ते अच्छे हैं। मगर यहां पर डीएमके किस तरह का प्रदर्शन करती है, उस पर चुनाव समीकरण बनेंगे। दोनों पर्टियां मौकाप्रस्त हैं। अपनी शर्तों पर समर्थन देती और खींच लेती हैं।

नरेंद्र मोदी को अगर सत्ता हासिल करनी है तो उसको एक जादू आंकड़ा हासिल करना होगा। अकेली भाजपा को २०० से अधिक सीटें बटोरनी होंगी। भाजपा को गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़,   दिल्ली, यूपी, बिहार एक बेहतरीन प्रदर्शन करना होगा। यहां से आने वाले आंकड़े भाजपा की किस्मत बदल सकते हैं। मौजूदा समय में भाजपा के नहीं, बल्कि एडीए के पास केवल 138 सीटें हैं। अगर भाजपा एक जागड़ू सरकार के साथ सत्ता में कदम रखती है तो देश की हालत में कोई सुधार होने की उम्मीद नहीं दिखती, और यह सरकार हमेशा एक बनावटी सांस प्रणाली यंत्र पर चलेगी, जो किसी भी समय अगले चुनावों की नौबत पैदा कर सकती है। क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। सबसे अहम बात अगर नरेंद्र मोदी को सत्ता हासिल करनी है तो उसको एक राज्य के साथ खुद को जोड़े रखने से परहेज करना होगा। नरेंद्र मोदी का चेहरा, जो ब्रांड बन चुका है, लेकिन मध्यप्रदेश के चुनाव प्रचार में इस चेहरे को गायब कर दिया गया, क्यूंकि गुजरात सरकार और मध्यप्रदेश सरकार पर कई मोर्चों पर युद्ध शुरू है। इन दिनों शेरों के स्थानांतरित को लेकर अदालती युद्ध चल रहा है। ऐसे में मध्यप्रदेश के लोग नरेंद्र मोदी को स्वीकार नहीं कर सकते, क्यूंकि वे उसकी सरकार का नेतृत्व करते हैं, जो शेरों के स्थानांतरित को लेकर अदालत के कटघरे में खड़ी है। ऐसे में शिवराज चौहान अपनी सरका बचाने के लिए नरेंद्र मोदी से दूर बनाए रखना ज्यादा बेहतर समझते हैं। यकीनन यह चुनाव कहीं न कहीं आगामी लोक सभा चुनावों पर व्यापक असर डालेंगे।

”लेखक कुलवंत हैप्‍पी, युवारॉक्‍स डॉट कॉम व हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र प्रभात आभा के संपादक व जानो दुनिया डॉट टीवी में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं।”

यह लेख 27 जुलाई 2013 के प्रभात आभा एडिशन में प्रकाशित हुआ है।

जांच कमेटी हमारी, रिपोर्ट हमारी तो 'फैसला' किसी का

अरे भैया। राजनेताओं से भी आगे निकल गई बीसीसीआई। संगत की रंगत है। खुद कमेटी बिठाते हैं। खुद जांच रिपोर्ट तैयार करते हैं, और खुद को देते हैं क्‍लीन चिट। हां, हां, अपने एन श्रीनिवासन के दामाद और भारतीय दामाद की भारत कर रहा हूं। भारतीय दामाद! चौंकिए मत। बताता हूं भाई। बताता हूं भाई। राज कुंदरा साहिब, जो अपनी पहली वाली छोड़कर 'इंडियन गर्ल' शिल्‍पा शेट्टी से शादी बनाए हैं। 

शिल्‍पा शेट्टी, जो भारतीय मंच पर एक गोरे को सरेआम पप्‍पी देती हैं, तो विदेशी मंच पर मगरमच्‍छ के आंसू बहाकर विश्‍व से हमदर्दी बटोर चुकी हैं। प्‍यार के चक्‍कर में पहली वाली छोड़ी। विदेश छोड़ा, देश आ गए। हां, हां, राज कुंदरा पर लौट रहा हूं, और भारतीय पत्‍नि के कहने पर भारतीय खेल में पैसे का निवेश किया, निवेश तो बिजनस में होता है, लेकिन भारत में क्रिकेट ऐसा खेल है, जो सिर्फ और सिर्फ अपने लिए खेला जाता है, लेकिन हम समझ नहीं पाते, हमको लगता है कि क्रिकेट मैदान पर चल रहा खेल हमारे लिए है। 

खेल मैदान के पीछे भी खेल चलता है। इसमें भी ताऊ चोखी कमानीहै। सट्टा लगाओ, खूब कमाओ, लेकिन लिंक किसी बीसीसीआई के पदाधिकारी से होने चाहिए। यहां पर आपको कुछ दिनों में क्‍लीन चिट मिल जाएगी, भले ही दिल्‍ली पुलिस, मुम्‍बई पुलिस विलम्‍ब करे। बीसीसीआई, वैसे तो क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड है, लेकिन यहां पक्ष और विपक्ष के नेताओं की खिचड़ी खूब पकती है। राजनीतिक मंच पर भले पक्ष और विपक्ष विरोधी नजर आएं, लेकिन शराबखाने की तरह, बीसीसीआई में धर्म जात मायने नहीं रखती, सब एक ही गिलास में उतरते हैं।

कुछ लोग मानते हैं कि अगर बीसीसीआई का ऐसा ही हाल रहा तो आने वाले दिनों में भारतीय ओलंपिक संघ जैसा हाल होगा। लेकिन वे लोग भूल रहे हैं कि आज के जमाने में पैसा बोलता है, और पैसे के मामले में बीसीसीआई की तूती बोलती है, विश्‍व के क्रिकेट संघों में। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, भले ही आउट ऑफ कंट्रोल हो, और रहना चाहता हो, मगर पैसे के मामले में इसका कोई सानी नहीं। यही एक कारण है कि आरटीआई के दायरे में आकर नंगा नहीं होना चाहता। अगर लोकतंत्र में सरकार गिरानी हो तो जनादेश का रुख बदलना जरूरी है। क्रिकेट के मामले में भारतीय युवा पीढ़ी की रुख बदलना शुरू हुआ है। अब वे क्रिकेट के अलावा अन्‍य गेमों में दिलचस्‍पी दिखाने लगा है। नतीजन, भारत को अच्‍छी प्रतिभाओं से रूबरू करवा रहा है।

उम्‍मीद है कि जो मोटर साइकिल, जो जेल, जो टायर, जो पॉलिसी आज टेलीविजन के जरिए क्रिकेट स्‍टार बेच रहे हैं, कल को उन उत्‍पादों की बिक्री के लिए टेनिस स्‍टार, हॉकी स्‍टार, बैडमिंटन स्‍टार स्‍क्रीन पर उतारे जाएंगे, बच्‍चों के पीने वाले पाउडर  के लिए सचिन नहीं, कोई दिमाग वाला सतरंज खिलाड़ी उतारा जाएगा। खिलाड़ी से हम उस खिलाड़ी की तरफ लौटते हैं, जो फिर से बीसीसीआई में खेलने के लिए लौटने वाला है। पहले तो रुखस्‍त हुआ, अपनी शर्तों से। अब पद पर आसीन होगा, अपनी मर्जी से तैयार करवाई रिपोर्टों से। इससे बड़ा खिलाड़ी कौन होगा।

बीसीसीआई ने रविवार को कोलकाता में हुई वर्किंग कमेटी की बैठक में चेन्नई सुपर किंग्स के टीम प्रिंसिपल गुरुनाथ मयप्पन और राजस्थान रॉयल्स के सहमालिक राज कुंद्रा को क्लीन चिट दे दी, क्योंकि दो सदस्यीय जांच समिति को उनके खिलाफ गड़बड़ी का कोई साक्ष्य नहीं मिला। हालांकि जांच कमेटी घर की थी। जिसकी जांच से खुद खेल मंत्रालय, इस बोर्ड से जुड़े रहे अन्‍य अधिकारी सहमत नहीं, लेकिन क्‍लीन चिट तो क्‍लीन चिट होती है। राज्‍य सभा सांसद बीरेंद्र सिंह ने तो कल राज्‍य सभा सीट संबंधित कीमत को उजागर कर दिया था, जिसकी कीमत 100 करोड़ रुपये हैं, एक भारतीय फिल्‍म का बजट, लेकिन अब देखना यह है कि बीसीसीआई की इस कुर्सी की कीमत कौन और कितनी आंकता है।

देना ‘बब्‍बर थाली’, वो ’12′ वाली

मुम्‍बई के बाहरी रेलवे स्‍टेशनों पर ट्रेनों को आगे बढ़ने से रोक दिया गया है, और साथ में कुछ उड़ानों को उतरने पर रोक लगा दी गई है। इसके अलावा मुम्‍बई के बॉर्डर को पूरी तरह सील कर दिया गया, ताकि अन्‍य क्षेत्र के लोग मुम्‍बईया सीमा के भीतर घुस न सकें, खासकर तब तक जब तक स्‍थिति सामान्‍य न हो जाए। स्‍थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई, जब देश के एक राजनेता के एक बयान के बाद हर कोई ‘बब्‍बर थाली’ की  तलाश में मुम्‍बई की तरफ निकल पड़ा।

मुम्‍बई के होटलों के बाहर हाउसफुल के बोर्ड लटकते हुए देखे गए। कहीं कहीं तो बब्‍बर थाली के लिए लोगों में हिंसक झड़प के समाचार भी मिले हैं। मुम्‍बई के हर होटल पर बब्‍बर थाली की मांग बढ़ रही है, हर किसी जुबान पर है ‘देना बब्‍बर थाली, वो ’12′ वाली। हालांकि ऐसी कोई थाली मुम्‍बई के जीरो स्‍टार ढाबे से लेकर फाइव स्‍टार होटल में कहीं भी नहीं उपलब्‍ध, ऐसा नहीं कि ग्राहकों की बढ़ी तादाद के कारण ऐसा हुआ, बल्‍कि ऐसी कोई थाली है ही नहीं।

दरअसल इस थाली की मांग ‘राजनेता’ राज बब्‍बर के बयान के बाद बढ़ी, जिसमें उन्होंने 12 रुपये में भर पेट खाना मिलने की बात कही थी। हालांकि बाद में राज बब्‍बर के करीबियों ने बताया कि एक दिन राज बब्‍बर दोपहर का खाना खाने के लिए मुम्‍बई के एक होटल में गए थे, वहां उन्‍होंने जम कर खाना खाया। जब बिल देने की बारी आई तो होटल के मालिक ने राज बब्‍बर से केवल 12 रुपये लिए, यह 12 रुपये खाने के नहीं, बल्‍कि शागुन के थे। वैसे तो शागुन में 11 रुपये दिए जाते हैं, लेकिन उस दिन राज साहिब के पास एक रुपया छूटा नहीं था, ऐसे में उन्‍होंने दो का सिक्‍का दिया और कहा, चलो एक रुपया टिप समझ कर रख लेना।

कुछ करीबियों का तो यह भी कहना है कि जब वे लंदन से मुम्‍बई शिवाजी टर्नीमल पर उतरे तो उनको काफी भूख लगी हुई थी। ऐसे में वे पास के किसी होटल में खाने के लिए गए। खाना खाने के बाद जब बिल देने की बारी आई तो जेब में राज बब्‍बर ने हाथ डाला, डॉलर निकले, होटल मालिक ने डॉलर देखकर कहा, जनाब केवल 12 दे दीजिए।

राज बब्‍बर खुश हो उठे वाह केवल 12 में इतना अच्‍छा खाना, दरअसल उनको याद ही नहीं रहा कि उन्‍होंने जो 12 का भुगतान किया, वे रुपये नहीं, बल्‍कि डॉलर थे। इस बातों को अभी कुछ दिन ही बीते थे कि अचानक राज बब्‍बर की नई कंपनी, यानि कि कांग्रेस ने घोषणा की कि गरीबों को सस्‍ता खाना उपलब्‍ध करवाने के लिए फूड सिक्‍यूरिटी बिल लाना अति जरूरी है। फूड सिक्‍यूरिटी बिल की बात राज बब्‍बर तक पहुंची तो उनको फूड से याद आया अपना पुराना अनुभव, वैसे भी लोग कहते हैं या तो आप बीती कहिए या जग बीती। ऐसे में राज बब्‍बर ने आप बीती कह डाली, लेकिन वे क्‍लीयर करना भूल गए कि मुम्‍बई में उन्‍होंने 12 रुपये का खाना कैसे और कब खाया था। दरअसल उपरोक्‍त कहानी, राज बब्‍बर के बयान सी है, जिसका जमीनी स्‍तर बिल्‍कुल नहीं, केवल ख्‍याली पुलाव टाइप है।

मगर राज बब्‍बर के इस बयान से हैरानी होती है कि जब टमाटर का रेट 60 से ऊपर चल रहा हो, जब एक किलो गोभी खरीदते वक्‍त सौ का नोट खप जाए, ऐसे में आप 12 रुपये में पेट भर खाने की बात स्‍थितियों का मजाक उड़ाने भर से अधिक नहीं हो सकता। वैसे ही इन दिनों कांग्रेस नेताओं को राहुल गांधी की बात समझ में नहीं आ रही, जिसको वे प्रधानमंत्री बनाने की बात कह रहे हैं। राहुल गांधी से याद आया, उनके एक प्रिय चाचा श्री हैं, जिनको लोग दिग्‍गी राजा के नाम से जानते हैं, वे मंदसौर में एक जनसभा को संबोधन कर रहे थे तो उन्‍होंने राहुल गांधी की अति करीबी को सौ टंच का माल कहकर बाजार में आग लगा दी। सबसे दिलचस्‍प बात तो यह थी कि यह शब्‍द खासकर तब एक फब्‍ती सा लगता है जब आप बात को चबकर कह रहे हों, जैसे कि दिग्‍गविजय सिंह ने अपने भाषण में कहा, वे तो राहुल गांधी और सोनिया गांधी का दिल जीत चुकी हैं। वे तो सबसे आगे हैं। वे हैं सौ टंच का माल, मैं तो पुराना जौहरी हूं।

यह बात किसी से नहीं छुपी कि राहुल गांधी के करीबियों में मीनाक्षी नटराजन का नाम आता है। लेकिन यह करीबियां कहां तक है, ये बात तो वे दोनों ही बता सकते हैं, लेकिन दिग्‍गी का बयान कुछ और संकेत कर रहा है। अगर मीडिया नरेंद्र मोदी के पिल्‍ले के पीछे के अर्थ ढूंढ़ सकता है तो दिग्‍गविजय सिंह तो बहुत गहरी बात कह गए। चलो जाने भी दो, हम तो निकले थे 12 रुपये वाली, बब्‍बर थाली लेने, लेकिन यह थाली मिलती कहां है, हमारे तो यहां दबेली, बड़ा पाव भी 15 रुपये में मिलता है, जो दो खाये बिन पेट नहीं भरता।

राहुल गांधी : तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला

राहुल गांधी, युवा चेहरा। समय 2009 लोक सभा चुनाव। समय चार साल बाद । युवा कांग्रेस उपाध्‍यक्ष बना पप्‍पू। हफ्ते के पहले दिन कांग्रेस की मीडिया कनक्‍लेव। राहुल गांधी ने शुभारम्‍भ किया, नेताओं को चेताया वे पार्टी लाइन से इतर न जाएं। वे शालीनता से पेश आएं और सकारात्‍मक राजनीति करें। राहुल गांधी का इशारा साफ था। कांग्रेसी नेता अपने कारतूस हवाई फायरिंग में खत्‍म न करें। राहुल गांधी, जिनको ज्‍यादातर लोग प्रवक्‍ता नहीं मानते, लेकिन वे आज प्रवक्‍तागिरी सिखा रहे थे।

दिलचस्‍प बात तो यह है कि राहुल गांधी ख़बर बनते, उससे पहले ही नरेंद्र मोदी की उस ख़बर ने स्‍पेस रोक ली, जो मध्‍यप्रदेश से आई, जिसमें दिखाया गया कि पोस्‍टर में नहीं भाजपा का वो चेहरा, जो लोकसभा चुनावों में भाजपा का नैया को पार लगाएगा। सवाल जायजा है, आखिर क्‍यूं प्रचार समिति अध्‍यक्ष को चुनावी प्रचार से दूर कर दिया, भले यह प्रचार लोकसभा चुनावों के लिए न हो। कहीं न कहीं सवाल उठता है कि क्‍या शिवराज सिंह चौहान आज भी नरेंद्र मोदी को केवल एक समकक्ष मानते हैं, इससे अधिक नहीं। सवाल और विचार दिमाग में चल रहे थे कि दूर से कहीं चल रहे गीत की धुनें सुनाई पड़ी, ‘तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला, जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला’ चांद से याद आता है राहुल गांधी का चेहरा, जो कुछ महीने पहले जयपुर में नजर आया था, और आज सोमवार को नजर आ रहा है। शायद दूर कहीं ये गीत सही वक्‍त पर बजा रहा है। काश यह गीत राहुल गांधी के समारोह के आस पास बजता तो राहुल आज की होट स्टोरी होते।

राहुल गांधी ने जमीनी राजनीति पर उतर कर बेटिंग करने को कहा। यकीनन कांग्रेस के लिए यह बहुत बेहतरीन सुझाव है, वैसे भी कहते हैं कि सुबह का भूला शाम को घर आए तो उसको भूला नहीं कहते, अगर कांग्रेस आज भी अपने ग्रामीण क्षेत्र के वोटरों को संभाल ले तो हैट्रिक लगा सकती है। कांग्रेस ने जयपुर में मंथन किया था, शायद वे जमीनी नहीं था। अगर होता तो कांग्रेस अपने कारतूसों को हवाई फायरिंग में खराब करने से बेहतर सही दिशा में खर्चती। कांग्रेस के दामन में दाग बहुत हैं, लेकिन कांग्रेस अपनी योजनाओं के सर्फ एक्‍सल से धो सकती है।

कांग्रेस केंद्र में है। उसके द्वारा शुरू की गई, योजनाएं एक अच्‍छी पहल हैं। केंद्र सरकार ने इन योजनाओं को लागू करने के लिए करोड़ों रुपए राज्‍य सरकारों को दिए, लेकिन राज्‍य सरकारों की गड़बड़ियों के कारण योजनाएं पिट गई, और दोष पूरा कांग्रेस के सिर मढ़ दिया गया। मिड डे मिल, जो आज चर्चा का कारण है, क्‍या उसमें केंद्र का दोष है ? नहीं, दोष है राज्‍य सरकारों का जो उसको अच्‍छी तरह से लागू नहीं कर पा रही। मनरेगा, रोजगार की गारंटी भी निश्‍चत एक अच्‍छी पहल है, लेकिन राज्‍य सरकारों की अनदेखी के कारण धूल फांक रही है, बदनामी की कल्‍ख कांग्रेस के माथे, हालांकि कुछ घोटालों के आरोपी नेता या मंत्री जेल की हवा तक खा चुके हैं।

कांग्रेस की समस्‍या है कि वे सोशल मीडिया को समझ नहीं पा रही। दरअसल कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चल रही है, और भाजपा इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए पूरी तरह सोशल मीडिया को कैप्‍चर कर रही है। कहते हैं कि सोशल मीडिया 160 लोकसभा सीटों को प्रभावित करता है। उसकी पहुंच 12 करोड़ भारतीयों तक है। मगर सोशल मीडिया पर एक बाज की नजर है, जो देश के 80 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाए हुए है। जी हां, इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। आज देश का इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, मोदी की ब्रांडिंग कर रहा है। कांग्रेस किसी सहमे हुए बच्‍चे की तरह, डरी हुई किसी कोने में खड़ी पूरा तमशा देख रही है।

उसके कई कारण हैं। सबसे पहले कांग्रेस के पास एक दमदार प्रवक्‍ता नहीं। राहुल गांधी युवा पीढ़ी को प्रेरित करता था, लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी चुप्‍पी ने युवा पीढ़ी को निराश किया, और युवा पीढ़ी का बहाव नरेंद्र मोदी की तरफ ऑटोमेटिक मुड़ गया। नरेंद्र मोदी के पास राजनीति में लम्‍बा संघर्ष, एक आदर्श राज्‍य की पृष्‍ठभूमि, 11 साल का नेतृत्‍व अनुभव है। राहुल के पास एक मां है, जो उसकी दादी की तरह दमदार प्रवक्‍ता नहीं। संप्रग के पास प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, जिसको लोग कथित तौर पर सोनिया गांधी संचालित टेलीविजन कहते हैं। जब भी उनसे राहुल गांधी के पीएम बनने के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब एक था आज कहो, आज पीछे हट जाता हूं, मतलब साफ है, वे केवल मास्‍क हैं।

राहुल गांधी की कलावती पटकथा हिट हुई तो युवा आइकन बन गए। कलावती के बाद राहुल गांधी की कोई पटकथा हिट नहीं हुई। उसका प्रभाव खत्‍म होने लगा। सोशल मीडिया ने उसको पप्‍पू करार दे दिया। राहुल गांधी ने जो कदम आज उठाया है, उस बच्‍चे की तरह, जो पेपरों से कुछ दिन पहले तैयारी करने बैठता है, नतीजा जो भी आए, अगर राहुल का मंत्र सफल हुआ तो शायद 2014 में अख़बारों की सुर्खियां यह शीर्षक बन सकता है ‘पप्‍पू पास हो गया”।

ईद के चांद की तरह नजर आने वाला राहुल गांधी शायद आम चांद की तरह नजर आए, और जो सोच वे कभी कभी जनता के सामने रखते हैं, वे प्रत्‍येक दिन रखे, हफ्ते, महीने में रखे तो स्‍थितियां बदल सकती हैं।

और वे गीत भी शायद कभी इतना रिलेवेंट न लगे, जो आज कहीं दूर से कानों में पड़ रहा है, जख्‍म फिल्‍म का पूजा भट्ट पर फिल्‍माया गया गीत ”तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला”

राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और भाजपा की स्‍थिति

''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''  विजय पथ फिल्‍म का यह गीत आज भाजपा नेताओं को रहकर का याद आ रहा होगा, खासकर उनको जो नरेंद्र मोदी का नाम सुनते ही मत्‍थे पर शिकन ले आते हैं।

देश से कोसों दूर जब न्‍यूयॉर्क में राजनाथ सिंह ने अपना मुंह खोला, तो उसकी आवाज भारतीय राजनीति के गलियारों तक अपनी गूंज का असर छोड़ गई। राजनाथ सिंह, भले ही देश से दूर बैठे हैं, लेकिन भारतीय मीडिया की निगाह उन पर बाज की तरह थी। बस इंतजार था, राजनाथ सिंह के कुछ कहने का, और जो राजनाथ सिंह ने कहा, वे यकीनन विजय पथ के गीत की लाइनों को पुन:जीवित कर देने वाला था।

दरअसल, जब राजनाथ सिंह से पीएम पद की उम्‍मीदवारी के संबंधी सवाल पूछा गया तो उनका उत्तर था, मैं पीएम पद की उम्‍मीदवारी वाली रेस से बाहर हूं। मैं पार्टी अध्‍यक्ष हूं, मेरी जिम्‍मेदारी केवल भाजपा को सत्ता में बिठाने की है, जो मैं पूरी निष्‍ठा के साथ निभाउंगा। यकीनन, नरेंद्र मोदी आज सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं, अगर भाजपा सत्ता हासिल करती है तो वे पीएम पद के उम्‍मीदवार होंगे।

दूर देश में बैठे राजनाथ सिंह को इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा, ऐसे कैसे हो सकता है कि उनके मुंह से निकले यह शब्‍द भारत में बैठे उनके कुछ मित्रों को अग्‍निबाण से भी ज्‍यादा नागवार गुजरेंगे। क्‍यूंकि भूल गए वे गोवा बैठक के बाद की उस हलचल को, जो एलके आडवाणी के इस्‍तीफे से पैदा हुई थी।

भारतीय मीडिया के बीच अक्‍सर इस बात संबंधी पूछे सवाल पर पार्टी बैठकर फैसला करेगी कह निकले वाले राजनाथ सिंह क्‍यूं भूल गए कि आज का मीडिया सालों पुराना नहीं, जो ख़बर को प्रकाशित करने के लिए किसी बस या डाक खाने से आने वाले तार का इंतजार करता रहेगा, आज तो आपने बयान दिया नहीं कि इधर छापकर पुराना, और चलकर घिस जाता है।

राजनाथ सिंह, ने पहले पत्ते दिल्‍ली की बजाय गोवा में खोले, शायद राजनाथ सिंह ने उनके लिए विकल्‍प खुला रखा था, जो इस फैसले से ज्‍यादा हताश होने वाले थे, क्‍यूंकि तनाव के वक्‍त खुली हवा में सांस लेना, टहलना, बीच के किनारे जाकर मौज मस्‍ती करना बेहतर रह सके।

अब वे न्‍यूयॉर्क पहुंचकर अपने पत्‍ते खोलते हैं, ताकि उनके भारत लौटने तक पूरा मामला किसी ठंडे बस्‍ते में पड़ जाए, और वे नरेंद्र मोदी को दिए हुए अपने वायदे पर कायम रह सकें। शायद अब तो सहयोगी पार्टियों को अहसास तो हो गया होगा कि नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा के पास 2014 के लिए कोई और विकल्‍प नहीं है।

अगर अब भी किसी को शक है तो वे अपना भ्रम बनाए रखे, क्‍यूंकि भ्रम का कोई इलाज नहीं होता, और अंत आप ठंडी सांस लेते हुए पानी की चंद घूंटों के साथ, कुर्सी पर पीठ लगाकर गहरी ध्‍यान अवस्‍था में जाकर, विजय पथ के उस गीत को आत्‍मसात करें, ''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''।

भाजपा का खेल, टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन सा

क्रिकेट के मैदान पर अक्‍सर जब दो टीमें होती हैं, खेलती हैं तो यकीनन दोनों टीमें अपना बेहतर प्रदर्शन देने के लिए अपने स्‍तर पर हरसंभव कोशिश करती हैं, ताकि नतीजे उनकी तरफ पलट जाएं, लेकिन भारतीय राजनीति की पिच पर वैसा नजारा नहीं है। यहां तो केवल भारतीय जनता पार्टी, जो एनडीए की सबसे बड़ी और अगुवाईकर्ता पार्टी है, खेल रही है, पूरा ड्रामा रच रही है। अहम मुद्दों पर चर्चा कर पक्ष को हराने की बजाय उसका पूरा ध्‍यान मैच के अंदर खलन पैदा कर सुर्खियां बटोरना है, वे एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाते हुए नजर नहीं आ रही, वे केवल एक राज्‍य के विकास के दम पर राजनीति ब्रांड बना चुके चेहरे के इस्‍तेमाल पर सत्ता हथियाना चाहती है। भाजपा का रवैया केवल उस टेस्‍ट टीम सा है, जो टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन समय बर्बाद करने के लिए हर प्रकार का हथकंड़ा अपनाती है।

भाजपा ने पहला ड्रामा रचा। जब राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक गोवा में होनी थी। कुछ नेताओं ने वहां जाने से इंकार कर दिया, तो कुछ ने अनचाहे मन से वहां जाना बेहतर समझा। ख़बरों में थी भाजपा, और विरोधी टीम के इक्‍का दुक्‍का बयानबाज नेता। इस बैठक के साथ भाजपा को मीडिया सामान्‍य भाव से लेता कि एलके आडवाणी ने इस्‍तीफे का पैंतरा चल दिया। मीडिया के अगले कुछ दिन और उसकी भेंट चढ़ गए। अंत होते होते एलके आडवाणी अपने फैसले से पलटे, किसी टीवी सीरियल के किरदार की तरह।

नरेंद्र मोदी की एलके आडवाणी से दूरियां, करीबियां चर्चा में बनीं रही। इस दौरान किसी बेहतर प्रदर्शन कर रहे गेंदबाज की तरह नरेंद्र मोदी मीडिया में स्‍पेस बनाते चले गए। कहते हैं कि जब वक्‍त अच्‍छा हो तो दूसरों की गलतियां भी आपके उभार के लिए कारगार सिद्ध होती हैं, खास नरेंद्र मोदी के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है। वे एक अच्‍छे मुख्‍यमंत्री हैं, कोई शक नहीं, लेकिन क्‍या कांग्रेस के पास ऐसे मुख्‍यमंत्री नहीं, बिल्कुल हैं, लेकिन उसके पास मीडिया में हौवा पैदा करने वाले नेता नहीं।

उसके नेता मीडिया में आने से डरते हैं, जो आते हैं, उनकी बोल चाल इतनी खराब है कि उनके मुंह से निकले बोल भाजपा को कम कांग्रेस को ज्‍यादा नुकसान पहुंचाते हैं। लादेन जी, आपदा पर्यटन या मौत का सौदागर जैसे शब्‍द भाजपा की नहीं, बल्‍कि कांग्रेसी नेताओं की देन हैं, जो सोशल मीडिया में कांग्रेस की खिल्‍ली उड़ाने के लिए काफी हैं।

वहीं, मीडिया नरेंद्र मोदी के बयानों पर ध्‍यान देने की बजाय उनके मुंह से निकले शब्‍दों के पीछे की सोच को पकड़ने की कोशिश करता है, जो ख़बर की शकल ले लेते हैं। बुर्के की जगह नरेंद्र मोदी शायद घुंघट भी कह सकते थे, लेकिन नहीं, उन्‍होंने बुर्का कहा, बुर्का उस समुदाय से जुड़ा है, जिसका नरेंद्र मोदी को सबसे कट्टर माना जाता है, भले ही नहीं, मोदी कहते हों कि वे देश को एक साथ आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं।

पिछले कई महीनों से चल रहे ड्रामे के आज वाले एपिसोड में नरेंद्र मोदी को 19 टीमें और मिल गई, हालांकि भाजपा इस की घोषणा बीते हुए कल में कर सकती थी, लेकिन उसने धारावाहिक की तरह, अपने फैसले पर रहस्‍य बनाए रखा, ताकि कांग्रेस के खाते से एक दिन हो छीन लिया जाए। कुल मिलाकर भाजपा टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन वाली गेम खेल रही है, कैसे भी रहता वक्‍त गुजर जाए, और मैच उनके खाते में पहुंच जाए।

'कल के नेता' आज के नेताओं के कारण मुश्‍िकल में

नीतीश कुमार बाबू के राज्‍य में बसते छपरा के एक सरकारी स्कूल में विषाक्त दोपहर के भोजन से हुई 22 बच्चों की मौत अत्यंत पीड़ादायक है, इसने इस महत्वपूर्ण योजना के प्रति बरती जा रही आपराधिक लापरवाही को ही जगजाहिर किया है। कल के नेता कहे जाने वाले बच्‍चे स्कूल में पढ़ने गए थे, लेकिन हमारे सड़ी-गली व्यवस्था वाले सिस्‍टम मासूम बच्‍चों के सपनों को साकार होने से पहले ही ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया।

बेहद बुरा लगता है जब, भोजन में मरी छिपकली होने या उसके किसी और तरह से विषाक्त होने की शिकायतें मिलती हैं और पहले भी कुछ जगहों पर कुछ बच्चों की विषाक्त भोजन से मौत तक हुई है, इसके बावजूद शिक्षा के बुनियादी अधिकार को आधार देने वाली इस योजना को लेकर चौतरफा कोताही बरती जा रही है। 

यह तो जांच से पता चलेगा कि उन बच्चों को दिए गए भोजन में कीटनाशक मिला हुआ था या कोई और जहरीला पदार्थ, मगर जिस तरह से स्कूलों में दोपहर का  भोजन, ''जिसको हम मिड डे मील कहते हैं'' तैयार किया जाता है और बच्चों को परोसा जाता है, उस पूरी व्यवस्था में ही बहुत सारी खामियां हैं। इसमें सबसे बड़ी गड़बड़ी यही है कि इस महंगाई के दौर में आज भी भोजन देने के लिए प्रति बच्चे साढ़े तीन से पांच रुपये ही तय किए गए हैं! इसी पैसे में उनके लिए चावल-दाल और सब्जी के साथ ही ईंधन का भी इंतजाम करना होता है। इसके अलावा यह पूरी योजना भ्रष्टाचार का एक बड़ा जरिया भी बनी हुई है, जिसमें खरीद की आड़ में भारी गड़बड़झाला होता है। वैसे समग्र रूप में देखें, तो यह योजना सरकारी और सरकारी मद से चलने वाले स्कूलों में पढ़ने वाले तकरीबन 12 करोड़ बच्चों को पौष्टिक भोजन देने के उद्देश्य से चलाई जा रही है। 

दरअसल 1960 के दशक में जब के कामराज ने तमिलनाडु में यह योजना शुरू की थी, तो उनका मकसद यही था कि कोई भी बच्चा भूख की वजह से पढ़ाई से वंचित न रह जाए। कुछ साल पहले अदालती आदेशों के बाद बच्‍चों को बना बनाया खाना परोसा जाने लगा। निश्चित रूप से इस योजना से वंचित तबके के बच्चों को स्कूलों से जोड़ने में मदद मिली है, लेकिन सरकारी स्कूलों का आज जो हाल हो गया है, उससे निराशा ही होती है। अच्छा तो यह होता कि इसे सबक की तरह लिया जाता और इस योजना की खामियों को दूर करने पर अविलंब विचार किया जाता, मगर विडंबना देखिए कि इस हृदयविदारक घटना के बाद बिहार में राजनीति शुरू हो गई है।

राजनीति दिन प्रति दिन गंदी होती जा रही है। संवेदनशील मुद्दों पर गहन विचार करने, अपनी जिम्‍मेदारी लेने की बजाय नेता ऐसे बयानों की बौछार करते हैं, या विपक्ष पर साजिश का आरोप लगाते हैं, कि मुद्दा कहीं छुप जाता है, बस बचता है तो बयानों का ख़बरों में उड़ता हुआ धूंआं।

13 साल से कम उम्र के लिए फेसबुक बैन!

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को दुनिया की अग्रणी सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक से अपनी साइट के मुख्य पेज पर यह चेतावनी जारी करने के लिए कहा कि 13 वर्ष से कम आयु के बच्चे यहां अपना खाता नहीं खोल सकते।

न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश बी. डी. अहमद एवं न्यायाधीश विभु बाखरू की पीठ ने फेसबुक से 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खाता खोलने की इजाजत न देने के लिए कहा।

फेसबुक की तरफ से न्यायालय के समक्ष उपस्थित वरिष्ठ वकील पराग त्रिपाठी ने न्यायालय को आश्वासन दिया कि साइट अपने मुख्य पेज पर 13 वर्ष से कम आयु के बच्चो के खाता न खोलने से संबंधित चेतावनी जारी करेगा।

न्यायालय ने केंद्र सरकार से भी यह बताने के लिए कहा कि बच्चों को ऑनलाइन सोशल नेटवर्किग साइटों पर होने वाली अभद्रता से बचाने के लिए उसके पास क्या कानून है।

पाकिस्तान में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव 6 अगस्त को

इस्लामाबाद: पाकिस्तान में अगले राष्ट्रपति का चुनाव 6 अगस्त को मौजूदा राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का कार्यकाल समाप्त होने से दो दिन पहले किया जाएगा।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त फकरूद्दीन जी इब्राहिम ने चुनाव के लिए प्रस्तावित तारीखों का अनुमोदन कर दिया है। अधिकारियों के हवाले से मीडिया में आज यह जानकारी दी गई है।

इस समय दुबई और लंदन की निजी यात्रा पर गए जरदारी अगला राष्ट्रपति पद का चुनाव नहीं लड़ेंगे। उनके प्रवक्ता फरहतुल्ला बाबर ने सोमवार को यह जानकारी दी थी। बाबर ने इन अफवाहों का भी खंडन किया था कि जरदारी अपने कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व पाकिस्तान नहीं लौटेंगे ।

नेशनल और प्रांतीय असेम्बलियों में राजनीतिक दलों के संख्या बल के अनुसार, प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सत्तारूढ़ पीएमएल (एन) पार्टी का उम्मीदवार आराम से चुनाव जीत जाएगा।

चार प्रांतीय असेम्बलियां और संसद के दोनों सदन राष्ट्रपति चुनाव के लिए निर्वाचक मंडल का गठन करते हैं और मतदान असेम्बलियों में कराया जाता है।

सरकारी कार्यक्रम के अनुसार, राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 24 जुलाई होगी। नामांकन पत्रों की जांच का काम 26 जुलाई को होगा तथा सत्यापित उम्मीदवारों के नामों की घोषणा 29 जुलाई को की जाएगी।

जरदारी ने वर्ष 2008 में पूर्व सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ का स्थान लिया था और उनके पांच साल का कार्यकाल 8 सितंबर को पूरा हो जाएगा। अभी तक किसी राजनीतिक दल ने इस पद के लिए अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है।