मच्‍छर की मौत लाइव रिपोर्टिंग

होटल का दरवाजा पूरी तरह सुरक्षित हैं, क्‍यूंकि होटल प्रबंधन को पहले ही सीआईडी टीम के आने की सूचना मिल गई थी, और बताया जा रहा है कि पिछले 15 सालों में बेगिनत दरवाजे तोड़ चुके दया से होटल प्रबंधन पूरी तरह से अवगत है, क्‍यूंकि होटल में इस शो देखने वालों की संख्‍या बहुत है।

मच्‍छर की बॉडी को अभी अभी पोस्‍टमार्टम के लिए लैब में भेज दिया गया है। सी आई डी अपने काम में जुट चुकी हैं, उम्‍मीद है कि बहुत जल्‍द मच्‍छर की मौत के पीछे का रहस्‍य खुलकर हमारे सामने आएगा।

पुलिस अधिकारियों को एक वंछित मच्‍छर की तलाश थी, लेकिन वो यह मच्‍छर है या कोई दूसरा। इस मामले में भी तहकीकात चल रही है। ऐसे में कुछ भी कहना मुश्‍किल है। आसपास के क्षेत्र में काफी तनाव महसूस किया जा रहा है। यहां यह होटल है, ये एक पॉश इलाका है। इस जगह पर मच्‍छर की उपस्‍थिति सुरक्षा व्‍यवस्‍था पर काफी सारे सवाल खड़े रही है।

अभी अभी जुड़े हमारे दर्शकों को बता देना चाहते हैं कि आज सुबह एक होटल में मच्‍छर के मृत पाए जाने की ख़बर मिली थी। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि इस मच्‍छर को पाकिस्‍तान स्‍थित आतंकवादी संगठनों द्वारा प्रशिक्षित करके भेजा गया है। डरने की कोई बात नहीं, क्‍यूंकि अभी तक इस बाबत किसी अधिकारी या अन्‍य व्‍यक्‍ित ने पुष्‍टि नहीं की।

अभी अभी पाकिस्‍तान से सूचना मिली है कि इस घटना के बाद पाकिस्‍तान से संचालित होने वाले आतंकवादी संगठनों ने आपातकालीन बैठक बुलाई है। सूत्रों की माने तो इस मीटिंग में मच्‍छरों को भारत सीमा पार करवाने वाले को मोटी राशि इनाम के रूप में देने का प्रस्‍ताव रखा गया है। इधर, रक्षा मंत्री ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा है कि रक्षा के पूरे इंतेजाम कर लिए गए हैं, और सीमा पर सरकार की ओर से मच्‍छर मारने की दवा बनाने की सभी कंपनियों को अपने अपने उत्‍पाद उपलब्‍ध करवाने के आदेश्‍ा दे दिए गए हैं।

अभी अभी सूचना मिली है कि दवाओं का चक्रव्‍यूह तोड़ते हुए पाकिस्‍तान की सीमा से करीबन 150 से 200 मच्‍छरों का एक झुंड भारतीय सीमा में प्रवेश कर गया। दवाओं के असर न करने से केंद्र सरकार पूरी तरह बुखला चुकी है एवं विपक्ष ने सरकार को निशाना बना शुरू कर दिया है। इस हफरा दफरी के बीच अनन फनन नेताओं के बयान आ रहे हैं।

दिल्‍ली से हमारे साथ विवेक जुड़ रहे हैं, विवेक इस मामले को लेकर सरकार का क्‍या कहना है, अभी अभी रक्षा मंत्री से बातचीत हुई तो उन्‍होंने कहा है कि मच्‍छरों को मारने के लिए नगर निगमों को आदेश दे दिए गए हैं, जल्‍द ही इन मच्‍छरों को मार दिया जाएगा। मगर विनीता इस बात में कोई दम नहीं, क्‍यूंकि ज्‍यादा नगर निगमों के पास मच्‍छर मारने वाली मशीनें पहुंची नहीं, और कुछ नगर निगमों के पास दवाईयां कई सालों से खत्‍म हो चुकी हैं।

उधर, सरकार ने सीमा पर मच्‍छर मारने की वाली दवाओं के असफल होने पर सभी बड़ी कंपनियों से जवाब मांगा है कि वो टीवी पर प्रसारित विज्ञापनों में जो दावा करते हैं, वो पूर्ण रूप से सही नहीं है, इसका नतीजा हम बॉर्डर पर देख चुके हैं।

अब देखना यह होगा कि मच्‍छर की मौत के बाद उछला पूरा मामला आखिर कहां जाकर समापत होता है। सरकार अब मच्‍छर मार दवा बनाने वाली कंपनियों से जवाब तलब करेगी। देखते हैं मच्‍छर मार दवा बनाने की वाली कंपनियां क्‍या तर्क देती हैं।

अब एक बार फिर मुम्‍बई की तरफ रुख करते हुए उमेश से जानते हैं, मच्‍छर की मौत की गुत्‍थी सुलझी या उलझी। विनीता जैसे के आप जानती हैं कि आज सुबह एक मच्‍छर की मृत हुई, उसके बाद मुम्‍बई काफी सहम सी गई थी, खासकर पॉश इलाकों में रहने वाली पब्‍िलक।

मगर कुछ समय पहले लैब से आई रिपोर्टों ने चौंक देने वाला खुलासा किया है। विनीता आई रिपोर्टों के मुताबिक जिस कमरे में मच्‍छर मृत पाया गया, वहां पर कल रात कुछ नेताओं की मीटिंग आयोजित हुई थी। और मच्‍छर में मानव खून के कण पाए गए हैं, जो मच्‍छर के जहर से भी ज्‍यादा जहरीले हैं। रिपोर्ट से स्‍पष्‍ट हो चुका है कि यह मच्‍छर आम मच्‍छर था, इसका पाकिस्‍तान एवं अन्‍य देश से कोई लेन देन नहीं। सहमी हुई पॉश इलाके की पब्‍लिक अब सुखद का सांस ले सकती है, क्‍यूंकि इस मच्‍छर का आतंकवादी संगठनों से कोई मेल मिलाप नहीं। यह साधारण नाली का मच्‍छर था, जो गलती से हवा के साथ उड़कर पॉश इलाके में पहुंच गया, बताया जा रहा है कि मच्‍छर काफी दिनों से प्‍यासा था, उस में उड़ने की ताकत नहीं थी, हवा उसको होटल तक खींच लाई। यहां उसने एक नेता को काट लिया और सदैव के लिए मौत की गोद में सो गया।

मगर सीआईडी की टीम आई तक कशमकश में है कि नेताओं की रगों में रक्‍त की जगह में ज़हर कब से बहने लगा।

बस! मुझे ट्रैफिक चाहिए

आज की ब्रेकिंग न्‍यूज क्‍या है ? सर अभी तक तो कोई नहीं, लेकिन उम्‍मीद है कि कोई दिल्‍ली से धमाका होगा। अगर न हुआ तो। फिर तो मुश्‍िकल है सर। बस! मुझे ट्रैफिक चाहिए। कुछ ऐसे ही संवाद होते हैं आज के बाजारू मीडिया संपादक के।

मजबूरी का नाम महात्‍मा गांधी हो या मनमोहन सिंह, कोई फर्क नहीं पड़ता। मजबूरी तो मजबूरी है। उसके सामानर्थी शब्‍द ढूंढ़ने से कुछ नहीं होने वाला। पापी पेट के लिए कुछ तो पाप करने पड़ते हैं। आज मीडिया हाऊसों की वेबसाइटों को अश्‍लील वेबसाइटों में तब्‍दील किया जा रहा है। अगर कोई ब्रेकिंग न्‍यूज नहीं तो क्‍या हुआ, तुम कुछ बनाकर डालो, अश्‍लील फोटो डालो, लिप लॉक की फोटो डालो। मुझे तो बस! मुझे ट्रैफिक चाहिए। इतना ही नहीं, मासिक पत्रिकाएं भी कहती हैं अब कुछ करो, बुक स्‍टॉलों पर ट्रैफिक चाहिए, वरना घर जाइए।

हर किसी को ट्रैफिक चाहिए। हर कोई ट्रैफिक के पीछे दौड़ रहा है। सड़कें ट्रैफिक से निजात पाना चाहती हैं, मगर ऐसा हो नहीं पा रहा। पैट्रोल के रेट बढ़ रहे हैं तो कंपनियां वाहनों के रेट गिराकर डीजल मॉडल उतार रही हैं। ट्रैफिक कम होने का नाम नहीं ले रहा, वहीं दूसरी तरफ नेता अभिनेता भी ट्रैफिक बढ़ाने को लेकर लगे हुए हैं।

फिल्‍मी दुनिया में तो आजकल इतना जद्दोजहद चल रहा है, जो सितारा बॉक्‍स ऑफिस पर ट्रैफिक खींचने की कुव्‍वत रखता है, उसको पहल के आधार पर साइन किया जाता है एवं शर्त होती है कि फिल्‍मी नफे का कुछ प्रतिशत आपको मिलेगा। ऐसे में अभिनेताओं में युद्ध शुरू हो गया है। यही कारण था कि जब तक है जान के रिलीज होने के लिए सिनेहाल पहले से बुक कर लिए गए थे, और अजय देवगन की सन ऑफ सरदार को कम सिनेहालों में रिलीज करना पड़ा। अब आमिर ख़ान भी अपनी अगली फिल्‍म तलाश को लेकर कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। आमिर ख़ान बॉलीवुड में सबसे अधिक ट्रैफिक खींचने वाला सितारा है, लेकिन इस बार उसके पास भी समय कम है, क्‍यूंकि तलाश के अगले हफ्ते खिलाड़ी 786 रिलीज हो रही है। सोनम को छोड़कर निर्देशक सोनाक्षी को साइन कर रहे हैं, क्‍यूंकि ट्रैफिक खींचने वाली आइटम चाहिए।

नरेंद्र मोदी को हाईटेक प्रचार की जरूरत क्‍यूं पड़ रही है, क्‍यूंकि पिछले दस सालों के अंदर किसी पौधे को पनपने नहीं दिया, अब हैट्रिक का दबाव है, ऐसे में हर जगह पहुंच नहीं पा रहा, लेकिन हैट्रिक लगाने के लिए जरूरत कहती है कि ट्रैफिक चाहिए। मगर सड़कें कहती हैं ट्रैफिक नहीं चाहिए। नहीं चाहिए। नहीं चाहिए। इतने शोर शराबे में उनकी सुनता कौन है। क्‍यूंकि वाहन बनाने वाली कंपनियों ने प्रचार कंपनियों पर दबाव डाल दिया है कि शो रूम के अंदर ट्रैफिक चाहिए।

टुकड़ों की जिन्‍दगी ; रिटर्न टू इंडिया

कई बार हमने अपने बहनों भाईयों और दोस्‍तों को बड़े उत्‍साह के साथ जीमैट या जीआरई, टीओएफईएल की तैयारी करते, अमेरिकी दूतावास के सामने लम्‍बी कतारें लगाए और छात्रवृत्‍ति पाने के लिए तमाम कोशिशें करते देखा है, उनका मकसद सिर्फ इतना होता है कि वे अमेरिकी सपने को जीना चाहते हैं। वे कोला कोला, मिक्‍की माऊस, हैरिसन फोर्ड और अवसरों के देश को उड़ जाना चाहते हैं ताकि अपने जीवन के साथ प्रयोग कर सकें, परंपराओं और लालफीताशाही की घरेलू जंजीरों को तोड़ सकें।

जानी मानी लेखिका एवं स्‍तंभकार शोभा नारायण ने अपनी किताब ''रिटर्न टू इंडिया'' में बड़ी बेबाकी से अमेरिकी सपने और उसे जीने की चाहत को उकेरा है। साथ ही साथ दो परंपराओं के बीच झूल रहे लोगों के द्वंद्व के बारे में भी बड़े सलीके से बताया और जताया है। उन्‍होंने प्‍यार, परिवार, पहचान एवं घर कहने लायक एक ठिकाने की तलाश की कहानी बड़े ही मर्मस्‍पर्शी ढंग से पिरोई है।

इन कहानियों के बीच अपनी यादों को ताजा करते हुए शोभा जाहिद खान जैसे अपने दोस्‍तों की कहानी भी सुनाती हैं, जो अपने अमेरिकीकरण के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। कहानी के बहाव के दौरान यह भी पता चलता है कि मल्‍लिकार्जुन राघवेंद्र उर्फ मिडनाइट कैसे मल्‍लिक पटेल बन जाते हैं, ताकि अपनी पत्‍िन नीना पटेल के रिश्‍तेदारों को निवेश के लिए मना सकें। ऐसी कई कहानियां एक दूसरे में गुंथी हुई मिलती हैं।

एक तरह से देखा जाए तो यह एक अप्रवासी के द्वंद्व की कहानी है, जिसे एक अप्रवसी ने अप्रवासी के लिए लिखा है। इसमें शोभा का वह सपना भी संजोया गया है, जिसमें वह घर लौटना चाहती है। एक जगह वह कहती हैं, मेरा सफर अनगिनत सफरों का प्रतीक है। मेरे द्वंद्व में बहुत सारे अप्रवासियों के द्वंद्व का अक्‍स दिखाई पड़ता है।

शोभा के सिर पर अमेरिका की धुन बचपने में ही सवार हो गई थी, जब उन्‍होंने अमेरिकी कार्टून, संगीत, फिल्‍में देखीं और आर्ची, बेटी एवं वेरॉनिका की कहानियां पढ़ीं। जब वह अमेरिका जाने के सपने को लेकर काफी गम्‍भीर होने लगीं तो उनके पिता ने आर्ची कॉमिक्‍स और मैड मैगजीन मंगाने पर रोक लगा दी और अमर चित्र कथा की ढे़रों प्रतियां घर लाने लगे ताकि शोभा को भारतीय परंपराओं और हिन्‍दु देवी देवताओं के बारे में जानकारी मिल सके। शोभा की मां अपने भाई कोअमेरिका में हुई एक दुर्घटना में खो चुकी थीं, इसलिए जब शोभा पर अमेरिका की धुन सवार होती थी तो वे उन पर बाल्‍टी भर पानी उंडेल देती थीं, मानो कोई भूत वूत उतार रही हों।

शोभा ने इस बात का ध्‍यान रखा है कि पाठक का मन अंत तक लगा रहे। इसके लिए उन्‍होंने बड़े ही दिलचस्‍प कहानी किस्‍से बुने हैं। कई मौकों पर पाठक को मुस्‍कराने का मौका दिया है। मिसाल के तौर पर शोभा ने एक जगह बताया है कि कैसे अमेरिकी विश्‍वविद्यालय में उनके चयन की ख़बर चैन्‍नई के किन्‍नरों तक पहुंच गई। या फिर किस तरह इंटरनेशनल स्‍टूडेंट्स एसोसिएशन से उन्‍हें पता चला कि सॉरी और पार्डन समानार्थी शब्‍द नहीं हैं और पास आऊट का मतलब बेहोश हो जाना होता है, न कि कॉलेज से स्‍नातक की उपाधि हासिल करना।

शोभा भी अमेरिकी सपने को जीने के लिए बेताब थीं ग्रीन कार्ड का सपना। मगर जब ग्रीन कार्ड आया तब शोभा की नई नई शादी हुई थी और उन्‍होंने उस पत्र को बेकार की पत्र पाती समझकर मोहल्‍ले के कूड़ेदान में फेंक दिया। उनके पति रात 'जिन्‍हें वे खुद से ज्‍यादा तार्किक एवं यथार्थवादी बताती हैं' उन्‍हें एक शानदार इतालवी रेस्‍त्रां ले गए, जहां दोनों ने कैंडल लाइट डिनर, मंत्रमुग्‍ध कर देने वाले संगीत और बेहतरीन शैंपेन के साथ जश्‍न मनाया। घर लौटते समय राम ने शोभा से ग्रीन कार्ड के बारे में पूछा तब दोनों को पता चला कि ग्रीन कार्ड वाला लिफाफा तो गलती से उसने कूड़ेदान में फेंक दिया है। आखिर शोभा और राम को रात में ही निकलकर टॉर्च की रोशनी में कूड़ेदान से वो पीला लिफाफा ढूंढना पड़ा।

बाद में अमेरिका में जब शोभा को बेटी हुई तो उन्‍हें वहां पहली चुनौती का सामना करना पड़ा। चुनौती थी बेटी का नामकरण। शोभा को शीला नाम पसंद था, मगर उनके भाई श्‍याम 'जो नेवी में कैप्‍टन थे और बाद में वार्टन बिजनेस स्‍कूल से स्‍नातक हुए' को यह नाम बेकार लगा। श्‍याम ने शोभा से कहा कि अगर अमेरिकी लोग आर्नल्‍ड श्‍वाज़ेनेगर जैसे जटिल नाम का सही उच्‍चारण कर सकते हैं तो फिर वे रंजिनी भी कह सकते हैं।

मैसेच्‍युसेट्स स्‍थित माउंड हॉल्‍योक में दाखिला पाने से पहले शोभा भारत छोड़कर अमेरिका जाने के लिए उतावली थीं। वे लिखती हैं कि भारत एक ऐसा देश है, जिससे प्‍यार करना मुश्‍किलक काम है और 20 साल की उम्र में तो मेरे लिए इसका कोई मतलब ही नहीं था। ऐसा नहीं कि मैं भारत से नरफत करती थी, मेरी भावनाएं इतनी तीव्र नहीं थी, मैं तो बस सामाजिक बर्ताव को लेकर बनाए गए नियमों और रूढ़ियों से तंग आ गई थी। मगर अमेरिका में 17 साल बिताने और दूसरी बेटी मालिनी के जन्‍म के बाद शोभा भारत लौटने के लिए बेकरार रहने लगीं। मगर फिर उनके मन में द्वंद्व पैदा हो गया और अमेरिका छोड़ने के पक्ष और विपक्ष में न जाने कितने विचार उमड़ने लगे। अंतत जब उनके पति को सिंगापुर में तैनाती मिलती है तब वे कुछ और समय तक अमेरिका में ही रहने का फैसला करती हैं।

किताब की यह खूबी है कि शोभा के भीतर के पत्रकार ने संवाद को काफी महत्‍व दिया है। बयानों बातचीत एवं विचारों को पूरी जगह मिली है। पूरे 269 पन्‍ने की इस तरह संवाद एवं कहानियों को संजोते हुए पिरोए गए हैं। किताब का आवरण एयरोग्राम जैसा दिखता है जो एक अप्रवासी और उस जैसे लाखों मुसाफिरों को खोजपरक यात्राओं का प्रतिनिधित्‍व करने वाली पुस्‍तक के लिए एकदम उपयुक्‍त है।

प्रस्‍तुति - केएस नारायण,
साभार - द संडे इंडियन हिन्‍दी पत्रिका
पुस्‍तक का नाम - रिटर्न टू इंडिया
लेखिका - शोभा नारायण
प्रकाशक - रूपा
पृष्‍ठ संख्‍या - 269
कीमत - 395

'आम आदमी' की दस्‍तक, मीडिया को दस्‍त

अन्‍ना हजारे के साथ लोकपाल बिल पारित करवाने के लिए संघर्षरत रहे अरविंद केजरीवाल ने जैसे 'आम आदमी' से राजनीति में दस्‍तक दी, तो मीडिया को दस्‍त लग गए। कल तक अरविंद केजरीवाल को जननेता बताने वाला मीडिया नकारात्‍मक उल्‍टियां करने लगा। उसको अरविंद केजरीवाल से दुर्गंध आने लगी। अब उसके लिए अरविंद केजरीवाल नकारात्‍मक ख़बर बन चुका है।

कल जब अरविंद केजरीवाल ने औपचारिक रूप में आम आदमी को जनता में उतारा तो, मीडिया का रवैया, अरविंद केजरीवाल के प्रति पहले सा न था, जो आज से साल पूर्व था। राजनीति में आने की घोषणा करने के बाद अरविंद ने कांग्रेस एवं भाजपा पर खुलकर हमला बोला। मीडिया ने उनके खुलासों को एटम बम्‍ब की तरह फोड़ा। मगर बाद में अटम बम्‍बों का असर उतना नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था, और अरविंद केजरीवाल को मीडिया ने हिट एंड रन जैसी नीति के जन्मदाता बना दिया, जो धमाके करने के बाद भाग जाता है।

मुझे पिछले दिनों रिलीज हुई ओह माय गॉड तो शायद मीडिया के ज्‍यादातर लोगों ने देखी होगी, जिन्‍होंने नहीं देखी, वो फिर कभी जरूर देखें, उस में एक संवाद है, जो अक्षय कुमार बोलते हैं, जो इस फिल्‍म में भगवान कृष्‍ण का किरदार निभा रहे हैं, कि मैं तो केवल मार्ग दिखा सकता हूं, जाना तो तुम्‍हें खुद ही पड़ेगा। अरविंद केजरीवाल ने तो मीडिया के सामने साबूत रख दिए, अब वो साबूत कितने सच्‍चे हैं या झूठे हैं इसकी पैरवी तो मीडिया को करनी चाहिए।

अगर यह काम भी केजरीवाल को करना है तो उनको खुद का मीडिया हाऊस खोल लेना चाहिए, और हर ख़बर को खुद ढूंढ़े एवं प्रकाशित करें। उसके बाद उनका संपादकीय उठाकर मीडिया वाले ख़बर बना लेंगे, जैसे बाला साहेब के संपादकीय के साथ होता था या अमिताभ बच्‍चन के िट्वटर स्‍टेट्स के साथ होता है।

एक अख़बार नया इंडिया ने अपने संपादकीय में अरविंद केजरीवाल के पार्टी उतारने के घटनाक्रम को आम आदमी का पाखंड टाइटल देकर प्रकाशित किया है, वहीं दूसरी तरफ नवभारत टाइम्‍स ने 'आप' भी दूसरी राजनीतिक पार्टियों से अलग नहीं? के टाइटल से आप एवं अन्‍य पार्टियों में सामानता ढूंढ़ने की कोशिश की।

एक व्‍यक्‍ति ने तो केजरीवाल पार्टी को खुजलीवाल पार्टी की संज्ञा दी है। सोचने वाली बात है कि संजय दत्त राजनीति में उतरते हैं, बराक ओबामा राजनीति में उतरते हैं या इमरान ख़ान तो हम उनको 24 घंटे कवरेज देते हैं, उनकी छोटी छोटी बातों को बड़ा बड़ा कर लिखते हैं, उनके प्रति लिखते हुए हम आशावाद में पूरी तरह लिपटे हुए होते हैं, जब अरविंद केजरीवाल के रूप में कोई आम आदमी राजनीति में दस्‍तक देता है तो हम को दस्‍त क्‍यूं लगने लगते हैं, या कहें कुत्ते का कुत्ता वैरी, मतलब आम आदमी का आदमी दुश्‍मन।

कहीं मीडिया को इस बात का मलाल तो नहीं कि उनका स्‍टार बनाया हुआ अरविंद केजरीवाल उनसे पहले संसद तक न पहुंच जाए। मेरे हिसाब से सकारात्‍मक रवैया अपनाते हुए मीडिया को कदम दर कदम चलना चाहिए, अगर वो अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी को लेकर सकारात्‍मक सोच नहीं रख सकते तो नकारात्‍मकता का जनमत भी तैयार करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।

अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी ने एक साहस किया, उसका नतीजे भले ही कैसा क्‍यूं न हो। जनता पार्टी अकेले स्‍वामी डटे हुए हैं, यह वो पार्टी है, जिसने 1977 में कांग्रेस का भ्रम तोड़ा था, भले ही यह पार्टी लम्‍बा समय न टिकी, और दो ढांचों में ढल गई एक जनता पार्टी और दूसरी भारतीय जनता पार्टी। जनता पार्टी से मोहभंग होने के बाद देवानंद साहेब ने नेशनल पार्टी के गठन के लिए बहुत सी कोशिशें की, जो फिल्‍म सितारों को राजनीतिक मंच तक लाने का प्रयास था, मगर देवानंद के हाथ असफलता लगी। आज बॉलीवुड के सितारें राजनीति में हैं, लेकिन उस तरह से नहीं, जिस तरह से देव साहेब उनको लाना चाहते थे, आज ज्‍यादातर सितारे कांग्रेस या भाजपा के सहारे हैं, लेकिन देवानंद उनको उनकी पार्टी देना चाहते थे, उस समय देवानंद के पास करण जौहर के पिता जैसा धमाकेदार प्रवक्‍ता था।

हो सकता है कि जो काम देवानंद करना चाहते थे, वो अब अरविंद केजरीवाल की टीम करे। अरविंद केजरीवाल को अपना गढ़ मजबूत करते हुए कुछ क्षेत्रियों संगठनों से हाथ मिलाना चाहिए, जो जनहित के लिए बड़ी पार्टियों को छोड़कर अपनी पार्टियों को अस्‍तित्‍व में लाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

अगर बराक ओबामा को अमेरिका की जनता दूसरा मौका दे सकती है तो अरविंद केजरीवाल को भी एक मौका देना बनता है। बाकी आपकी मर्जी।

पहले मां बनो, फिर बनो पत्‍नी

टोटोपाडा के जंगल से बॉलीवुड तक | हम नया कुछ नहीं करते, हम पुराने को तरीकों फिर से दोहराते हैं, लेकिन ख़बरों में आने के बाद वो नया सा लगने लगता है चाहे वो योग या फिर लिव इन रिलेशन का कनेक्‍शन।

भारत भूटान सीमा पर एक टोटोपाडा नामक ऐसी जगह है, जहां आज भी शादी से पहले लड़की को गर्भवती होना पड़ता है। कहते हैं कि टोटो जनजाति समुदाय के लड़के को जो लड़की पसंद आती है, वो उसके साथ फरार होता है एवं लड़का लड़की एक साथ रहते हैं, कुछ महीनों बाद जब लड़की गर्भधारण कर लेती है तो लड़की को शादी के काबिल माना जाता है। भले ही हम हिन्‍दी फिल्‍मों में कुछ महिलाओं को त्रासदी झेलते देखते हैं, जब वो अपने प्रेमी से कहती हैं, जोकि फिल्‍म में विलेन है, लेकिन लड़की के लिए प्रेमी, मैं तुम्‍हारे बच्‍चे की मां बनने वाली हूं।
मगर बॉलीवुड की कहानी भी रुपहले पर्दे से बेहद अलग है, जहां बहुत सी अभिनेत्री हैं, जो टोटोपाडा की प्रथा को बॉलीवुड में स्‍थापित कर चुकी हैं। ख़बरों की मानें तो बॉलीवुड की सदाबाहर अभिनेत्री श्रीदेवी ने बोनी कपूर से उस समय शादी की थी, जब वह करीबन सात माह की गर्भवती थी।

परदेस से बॉलीवुड में प्रवेश करने वाली महिमा चौधरी ने अपने गर्भवती होने की रिपोर्ट देकर सब को चौंका ही दिया था, क्‍यूंकि रितु से महिमा बनी परदेस गर्ल ने कब शादी कर ली, मीडिया तक को ख़बर नहीं थी, ख़बर तब हुई, जब महिमा चौधरी ने कहा, मैं गर्भवती हूं। कहते हैं कि कईयों के साथ अफेयर को लेकर चर्चाओं में रही महिमा चौधरी ने चुपके से बॉबी मुखर्जी को अपना बना लिया।

श्रुति हसन, जिसके अभी तक रुपहले पर्दे पर कदम नहीं जम सके, के होने से पूर्व उनकी माता सारिका ठाकुर का कमन हसन के साथ लव चल रहा था, जिसको लेकर कमल हसन की पहली बीवी बेहद परेशान थी। इस दौरान सारिका ने श्रुति हसन को जन्‍म दिया, जिसके बाद कमल हसन ने सारिका से शादी की एवं कुछ सालों बाद दोनों अलग हो गए।

लीक से हटकर एवं गम्‍भीर अभिनय के लिए जानी जाने वाली अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा ने सितम्‍बर 2010 में अभिनेता रणवीर शौरी से शादी की एवं अगले साल मार्च में एक बच्‍चे को जन्‍म दिया। इससे यह बात तो स्‍पष्‍ट होती है कि कोंकणा सेन शादी से पूर्व गर्व धारण कर चुकी थी।

लगता है कि टोटोपाडा से निकलकर बॉलीवुड में घुस चुकी प्रथा, अब धीरे धीरे मैट्रो सिटी में भी प्रवेश करने से भी नहीं हिचकाएगी। कुछ शहरों में तो ऐसा हो भी रहा है, लेकिन इज्‍जत न चली जाए के कारण सामने नहीं आते, बॉलीवुड में तो ख़बर रुकती नहीं। वहां तो दुष्‍प्रचार भी पब्‍लसिटी के लिए हिट फार्मूला है।

थप्‍पड़ अच्‍छे हैं

जोर से थप्‍पड़ मारने के बाद धमकी देते हुए मां कहती है, आवाज नहीं, आवाज नहीं, तो एक और पड़ेगा। जी हां, मां कुछ इस तरह धमकाती है। फिर देर बाद बच्‍चा पुराने हादसे पर मिट्टी डालते हुए मां के पास जाता है तो मां कहती है कि तुम ऐसा क्‍यूं करते हो कि मुझे मारना पड़े।

अब मां को कौन समझाए कि मां मैं अभी तो बहुत छोटा हूं या छोटी हूं, तुम कई बसंत देख चुकी हो। तुम भी इन थप्‍पड़ों को महसूस कर चुकी हो। मेरे पर तो तुम इतिहास दोहरा रही हो या कहूं कि एक विरासत को आगे बढ़ा रही हो। यह थप्‍पड़ मुझे जो आपने दिए हैं, वो कल मैं भी अपनी संतान को रसीद करूंगा या करूंगी, और मुझे पता भी न होगा, कब मेरा हाथ आपकी नकल करते हुए उसकी गाल पर छप जाएगा।
जब मम्‍मी मारती है तो पड़ोस में खड़े पापा या कोई अन्‍य व्‍यक्‍ति कहता है, क्‍यूं मारती हो बच्‍चे को, बच्‍चे तो जिद्द करते ही हैं, तुम्‍हें समझने की जरूरत है, मगर मां को नसीहत देने वाला, कुछ समय बाद इस नसीहत की धज्‍जियां उड़ा रहा होता है।

मां बाप के थप्‍पड़ का दर्द नहीं होता, क्‍यूंकि उनके पास प्‍यार की महरम है। हम बच्‍चे भी तो कितनी जिद्द करते हैं, ऐसे में क्षुब्‍ध होकर मां बाप तो मरेंगे ही न, वो बेचारे अपना गुस्‍सा और कहां निकालें। हम बच्‍चे मां बाप को छोड़कर कहीं जा भी तो नहीं सकते, अगर पापा ने मम्‍मी पर या मम्‍मी ने पापा पर अपना गुस्‍सा निकाल दिया तो बच्‍चों को जिन्‍दगी भर ऐसे थप्‍पड़ सहने पड़ते हैं, जिनके निशां कभी नहीं जाते। इसलिए थप्‍पड़ अच्‍छे हैं।

आम आदमी का तोड़

यह तो बहुत ही न इंसाफी है। ब्रांड हम ने बनाया, और कब्‍जा केजरीवाल एंड पार्टी करके बैठ गई। आम आदमी की बात कर रहा हूं, जिस पर केजरीवाल एंड पार्टी अपना कब्‍जा करने जा रहे हैं। गुजरात में चुनाव सिर पर हैं, कांग्रेस अपने चुनाव प्रचार में चीख चीख कर कह रही थी, कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ।

मगर आम आदमी तो केजरीवाल एंड पार्टी निकली, जिसकी कांग्रेस के साथ कहां बनती है, सार्वजनिक रूप में, अंदर की बात नहीं कह रहा। अटकलें हैं कि कांग्रेस बहुत शीघ्र अपने प्रचार स्‍लोगन को बदलेगी। मगर आम आदमी का तोड़ क्‍या है?

वैसे क्रिएटिव लोगों के पास दिमाग बहुत होता है, और नेताओं के पास पैसा। यह दोनों मिलकर कोई तोड़ निकालेंगे, कि आखिर आम आदमी को दूसरे किस नाम से पुकार जाए। वैसे आज से कुछ साल पूर्व रिलीज हुई लव आजकल में एक नाम सुनने को मिला था, मैंगो पीप्‍पल।

अगर आम आदमी मैंगो पीप्‍पल बन भी जाता है तो क्‍या फर्क पड़ता है। पिछले दिनों एक टीवी चैनल का नाम बदल गया था। हुआ क्‍या, हर जगह एक ही बात लिखी मिली, सिर्फ नाम बदला है। वैसा ही सरकार का रवैया रहने वाला है आम आदमी के प्रति।
आम आदमी की बात सब करते हैं, लेकिन उसके लिए काम कोई नहीं करता। स्‍वयं आम आदमी ही नहीं करता। सरकारी दफ्तरों में बैठा कर्मचारी या अधिकारी आम आदमी नहीं, लेकिन फिर भी वो आम आदमी के काम नहीं आता, जब तक आम आदमी, आम फीस से ज्‍यादा नहीं देता। आम आदमी को कुर्सी पर बैठा आम आदमी इस तरह ऊपर से नीचे घूर के देखता है, जैसे काम के लिए आया व्‍यक्‍ित किसी बाहर दुनिया से आया हो।

एक आम आदमी को दूसरा आम आदमी लूट रहा है, चाहे वो आम वाला हो या सेब वाला क्‍या फर्क पड़ता है। अमीरों के हाथ में एप्‍पल "मोबाइल" है तो गरीब रेहड़ी वाले से जाकर मैंगो का भाव भी नहीं पूछता, कहीं वो गले ही न पड़ जाए।

सड़क पर खड़ा ट्रैफिक कर्मचारी किसी वीआईपी इलाके से नहीं आता, लेकिन वो भी शाम तक जेब भरने के तरीके ढूंढता है। उसकी नजर के सामने से सैंकड़ों व्‍हीकल गुजरते हैं, एक ही नियम तोड़ते हुए, लेकिन वो कुछेक को रोकता है। कुछ आम आदमी मोबाइल पर वीआईपी से बात करवाकर निकल जाते हैं तो कुछ गांधी छाप देकर।

आम आदमी सब्‍जी लेने निकलता है, वो सब्‍जी वाले आम आदमी से जिरहा करता है, लेकिन सरकार के खिलाफ झंडा उठाने के लिए समय नहीं। देश की जनसंख्‍या किसी ने बढ़ाई वीआईपी लोगों ने या आम आदमी ने। जॉब्‍स के लिए पैसे की सिफारिश कौन करता है वीआईपी या आम आदमी। गांधीछाप देकर जॉब्‍स पर लगा आम आदमी, आम आदमी से गांधीछाप की उम्‍मीद करता है।

आम आदमी का तोड़ आम आदमी के पास है, और किसी के पास नहीं।

मैं हूं खादी वाला गुंडा

मैं हूं खादी वाला गुंडा।  यह किसी फिल्‍म का नाम नहीं बल्‍कि भाजपा नेता का बयान है। जी हां, भाजपा नेता एवं मध्‍य प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा व जिले के प्रभारी मंत्री अनूप मिश्रा ने ऐसा बयान देकर मध्‍यप्रदेश की राजनीति में खलबली पैदा कर दी है। वो खुद को खादी वाला गुंडा कह रहे हैं। उनका मानना है कि भिंड जिले के कुछ गुंडों को सुधारने के लिए खादी वाला गुंडा बनना बेहद जरूरी है। शायद वैसे ही जैसे आज से कुछ साल पहले एक फिल्‍म में धर्मेंद्र बना था पुलिस वाला गुंडा।

सवाल यह उठता है कि रावण को मारने के लिए रावण बनना जरूरी है। आज के युग में श्रीराम बनकर श्री हनुमान के द्वारा रावण की लंका को राख नहीं किया जा सकता। जब अन्‍ना हजारे की भ्रष्‍टाचार के खिलाफ मुहिम जोरों पर थी तो तब ज्‍यादातर युवाओं ने एक टोपी पहनी थी मैं हूं अन्‍ना, भले ही बाद में कुछ युवाओं ने उससे उतारते हुए एक नई टोपी पहन ली, जिस पर लिखा था मैं हूं आम आदमी।

जिस तरह का तर्क देते हुए अनूप मिश्रा कहते हैं कि मैं हूं खादी वाला गुंडा। कहीं अब युवा बुराई को खत्‍म करने के लिए इस तरह के फिकरे वाली टोपी पहनाना न शुरू कर दें। भले ही हम गांधी को राष्‍ट्रपिता की उपाधि देते हों, भले ही हमारे धर्म अहिंसा के मार्ग पर चलने की बात हमें बार बार सिखाते हों, मगर हम भीतर से दबंग हैं, गांधीगीरी हम को किताबों में अच्‍छी लगती है। हिंसा का जवाब हम हिंसा में देना पसंद करते हैं।

हमारी फिकरे या मुहावरे तो कुछ यूं बयान करते हैं, देखो न ईंट का जवाब पत्‍थर। दूध मांगो खीर दूंगा, कश्‍मीर मांगा चीर दूंगा। सिने हाल की खिड़कियों पर कभी हमें मुन्‍ना भाई अच्‍छा लगता है, लेकिन सिंहम, राउडी राठौड़ एवं सिंहम को भी हम कम प्‍यार नहीं करते। नायक एवं इंडियन फिल्‍म देखते हुए कई लोगों का खून खौलते हुए देखा है, लेकिन वो शांत फिल्‍म के खत्‍म होते ही हो जाता है।

सवाल तो यह भी है कि अगर एक नेता अपने बिगड़ैल ऑफिसरों एवं कुछ बिजनस माफियाओं को सुधारने के लिए दबंग गिरी पर उतरने की बात कहता है तो एक आम आदमी शरारती तत्‍वों को सुधारने के लिए बापू गांधी बनना कहां पसंद करेगा। अनूप मिश्रा का यह रवैया कहीं, गांधी बापू की खादी को गुंडों की वर्दी न बना दें।

कसाब के बदले सरबजीत को फांसी, नहीं चाहती इमरान खान की पार्टी

पाकिस्‍तान तारीके इंसाफ पीटीआई के अधिकारिक प्रवक्‍ता शाफकत महमूद ने उस ख़बर का खंडन किया है, जिसमें कहा गया था कि कसाब को फांसी देने के बाद पाकिस्‍तान में पीटीआई ने भारतीय कैदी सरबजीत सिंह को फांसी पर लटकाने की मांग की है।

इस ख़बर पर कड़ा रुख अपनाते हुए शाफकत महमूद ने ट्विटर पर कहा कि नेता नसीमुल्लाह खान कौन हैं, वो नहीं जानते, उन्‍होंने कहा कि वो पार्टी के अधिकारिक प्रवक्‍ता हैं, समाचार पत्रों को उनसे पूछ पड़ताल करनी चाहिए थी।

उन्‍होंने कहा है कि कानूनी मामलों के हस्‍तक्षेप करना राजनीतिक पार्टियों का काम नहीं, कानूनी मामलों के लिए अदालतें हैं। उन्‍होंने यह भी कहा है कि नसीमुल्लाह खान का नाम दूसरी बार पार्टी की छवि को धूमिल करने के लिए इस्‍तेमाल किया गया है।

गौरतलब है कि पाकिस्‍तान तारीके इंसाफ क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान ख़ान की पार्टी है।

बाबा साहेब या बाला साहेब की स्‍मारक

बाला साहेब को अभी रुखस्‍त हुए कुछ दिन भी नहीं हुए कि उनकी स्‍मारक को लेकर विवाद शुरू हो गया। शिव सेना चाहती है कि बाला साहेब का स्‍मारक शिवाजी पार्क में बने, जबकि मनसे चाहती है कि शिवाजी पार्क को छोड़ कर बाला साहेब की स्‍मारक इंदू मिल की जगह पर बने। मगर दिलचस्‍प बात यह है कि मनसे ने जिस जगह बाला साहेब की स्‍मारक बनाने की बात कही है, उस जगह पर बाबा साहेब की स्‍मारक बनाने के लिए दलित संगठन संघर्ष कर रहे हैं।

इतना ही नहीं, आरपीआई अध्यक्ष रामदास आठवले ने राज्य सरकार को चेतावनी दी है कि यदि 5 दिसंबर तक इंदू मिल की 12.5 एकड़ जमीन बाबासाहब आंबेडकर के स्मारक के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई तो पार्टी 6 दिसंबर को मिल जमीन पर कब्जा कर लेगी।

सूत्रों की माने तो लगभग 3500 करोड़ की कीमत वाली इस जगह को लेकर राज्‍य सरकार पहले ही मुश्‍किल में है, ऐसे में अगर राज ठाकरे शिवाजी पार्क में बाला साहेब की स्‍मारक बनने के रास्‍ते में रोड़ा बने तो राज्‍य सरकार के लिए और मुश्‍किल हो सकती है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में दलित-आदिवासी कुल जनसंख्या का लगभग 20 प्रतिशत है। ऐसे में राज्‍य सरकार कोई भी कदम एक दम से नहीं उठा सकती।

अब देखना यह रोचक होगा कि बाला साहेब की शिव सेना अपने प्रमुख की स्‍मारक को शिव पार्क में स्‍थापित कर पाती है या फिर बाला साहेब की छात्र छाया में पलकर बड़ा हुआ राज ठाकरे बाला साहेब को इंदू मिल पहुंचाता है।

बनेगा ओह! माय गॉड का स्‍किवल

मराठी सिनेमा में प्रवेश करने के बाद होगा पंजाबी, बंगाली एवं दक्षिण की तरफ रुख 

 अभिनेता, निर्माता अक्षय कुमार एवं परेश रावल की अभिनीत फिल्‍म ओह! माय गॉड का स्‍िकवल बनेगा। 43वां अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सव होस्‍ट कर रहे अक्षय कुमार अपनी बिजनस पार्टनर अश्‍िवनी जर्डी के साथ एक मराठी फिल्‍म कोल्‍हापुर 72 माइल्‍स एक प्रवास का निर्माण भी कर रहे हैं। इस फिल्‍म के बाद हो सकता है अक्षय कुमार एवं अश्‍विनी यार्डी की संयुक्‍त फिल्‍म निर्माण कंपनी गेजिंग गोट ओह! माय गॉड का निर्माण करे। सूत्रों की माने तो अक्षय कुमार का मानना है कि और भी काफी मुद्दे हैं, जिस पर फिल्‍म निर्माण किया जा सकता है।

अब देखना यह है कि ओह! माय गॉड का स्‍किवल दर्शकों को कितना पसंद आता है, वैसे भी बॉलीवुड में स्‍िकवल बनाने की होड़ सी लगी हुई है। रेस टू, दबंग टू, रॉक ऑन टू, वन्‍स टाइम अपन एट मुम्‍बई टू, हाऊस फुल टू ब्‍लॉ ब्‍लॉ।

सुनने में तो यह भी आया है कि अक्षय कुमार बहुत जल्‍द पंजाबी, बंगाली एवं दक्षिण की तरफ रूख करने वाले हैं। ऐसा लगता है कि अक्षय कुमार एवं अश्‍िवनी यार्डी बॉलीवुड से बाहर निकलकर कुछ ऐसा करने चाहते हैं जो बड़े बैनर्स करने में नाकाम रहे हैं।

ऐसे में अक्षय कुमार एवं अश्‍िवनी यार्डी को युवारॉक्‍स बेस्‍ट ऑफ लक कहेगा।

चलो चला गया कसाब, अफजल की विदाई मुश्‍किल

बाल ठाकरे की न्‍यूज को साइड पर रख चुका होगा मीडिया, न्‍यूज एंकर ब्रेड बटर खाकर घर से निकल चुके होंगे, जो जल्‍द पहुंचेगा, उसको मिलेगा एंकरिंग का अवसर ! कुछ एंकरों को तो आज का दिन ब्रेड बटर से काम चलाना पड़ेगा । कुछ चर्चा कार तो सुबह से ही तैयारी कर रहे होंगे चलो आज फिर टीवी स्‍क्रीन पर जाने का मौका मिलेगा, भले की कसाब की फांसी से सरकार को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन पूर्ण रूप से नहीं, क्‍यूंकि अफजल गुरू आजतक जिन्‍दा है, जिसको फांसी देना, एक फसाद को जन्‍म देना भी कुछ लोग मान रहे हैं, क्‍यूंकि वो कश्‍मीर से तालुक रखते हैं, और हमारी सरकार नहीं चाहती कि कश्‍मीर में पहले से हालात बने, देश में अलगाववादी नेताओं की कमी नहीं।  माइक्रो  संपादकीय
 
न्‍यूज डेस्‍क । 26/11 मुंबई अटैक के गुनहगार पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को फांसी दे दी गई है। कसाब को मुंबई की ऑर्थर रोड जेल से पुणे की यरवडा जेल में शिफ्ट कर बुधवार सुबह 7.30 बजे फांसी पर लटकाया गया। फांसी के बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। महाराष्ट्र के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल ने इसकी पुष्टि कर दी है। वह थोड़ी ही देर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसकी जानकारी देंगे।

इससे पहले मंगलवार को प्रेजिडेंट प्रणव मुखर्जी ने अजमल कसाब की दया याचिका को खारिज कर दिया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय से सलाह के बाद यह फैसला लिया गया था। दया याचिका खारिज होने के तुरंत बाद मंगलवार को कसाब को मुंबई की ऑर्थर रोड जेल से पुणे की यरवडा जेल में गुपचुप तरीके से शिफ्ट कर दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि यरवडा जेल में फांसी देने का इंतजाम है। उसकी फांसी बुधवार सुबह साढ़े सात बजे तय की गई थी, जिसे तय समय पर अंजाम दे दिया गया। 25 वर्षीय कसाब को जनवरी 2008 से ऑर्थर रोड जेल में था।

कसाब उन 10 पाकिस्तानी आतंकियों में से एक था, जिन्होंने समंदर के रास्ते मुंबई में दाखिल होकर 26/11 हमले को अंजाम दिया था। इस हमले में 165 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई लोग घायल हो गए थे। हमला करने से पहले इन आतंकियों ने गुजरात कोस्ट से एक भारतीय बोट को हाइजैक करके उसके कैप्टन को भी मार दिया था।

कसाब ने सितंबर में राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजी थी। इससे पहले 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले को बेहद 'रेयर' बताकर कसाब की फांसी की सजा पर मुहर लगा दी थी। जस्टिस आफताब आलम और सी. के. प्रसाद ने मुंबई हमले में पकड़े गए एक मात्र जिंदा आतंकी कसाब के बारे में कहा था कि जेल में उसने पश्चाताप या सुधार के कोई संकेत नहीं दिखाए। वह खुद को हीरो और देशभक्त पाकिस्तानी बताता था। ऐसे में कोर्ट ने माना था कि कसाब के लिए फांसी ही एकमात्र सजा है।

करीना को शादी के बाद एक नए सवाल ने घेरा

किड नॉट नाऊ - करीना ने कहा                

 भले ही करीना ने अपने कैरियर की शुरूआती फिल्‍म रिफ्यूजी में प्रस्‍व पीड़ा को रुपहले पर्दे पर सहन करते हुए नजर आई, लेकिन रियल लाइफ में अभी उनका मां बनने का कोई इरादा नहीं। यह बात उन्‍होंने चंडीगढ़ में आयोजित एक प्रेस समारोह के दौरान कही। गौरतलब है कि कुछ दिन पूर्व करीना एवं सैफ अली खान ने अपने लिव इन रिलेशनशिप को निकाह में बदला है।

सवाल का जवाब देते हुए करीना ने कुछ यूं कहा, किड...नॉट नाऊ...आई एम टू यंग। आई एम ओनली 32 नाऊ...अभी तो बहुत उम्र पड़ी है। अभी तो मैं खुद बच्ची हूं। हमने और सैफ ने शादी बच्चे के लिए नहीं की थी। न तो अभी मैं और न ही सैफ बच्‍चा चाहते हैं। हम दोनों का पूरा फोकस अभी अपने करियर पर है।

लिम्का कांटेस्ट में विजेताओं से मिलने पहुंची करीना ने कहा कि वह अभी बहुत यंग है। महज 32 साल की उम्र हैं इसलिए बच्चे के लिए अभी बहुत वक्त पड़ा है। बच्‍चा उनकी प्राथमिकताओं में दूर-दूर तक नहीं है। जब हमें जरूरत होगी कि हमें एक बच्चे की जरूरत है तब हम उसके बारे में सोचेंगे। यह तब होगा जब मैं फिल्मों को कुछ नया देने की हालत में नहीं होंगी।

43वां भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव आज से शुरू

43वां भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव मंगलवार से गोवा में शुरू हो रहा है। यह महोत्सव 20 से 30 नवंबर तक चलेगा। उद्घाटन समारोह के लिए सिने सितारे अक्षय कुमार मुख्य अतिथि होंगे। इस अवसर पर सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी उपस्थित होंगे। उनके साथ पोलैंड के संस्कृति मंत्री और गोवा के मुख्य मंत्री मनोहर पर्रिकर भी मौजूद होंगे।

दस दिवसीय इस महोत्सव में दर्शकों के उत्कृष्ट सिनेमा का प्रदर्शन किया जाएगा। भारतीय परिदृश्य जैसे वर्गों के तहत फीचर और गैर फीचर सिनेमा को शामिल किया गया है। इसके अलावा भारतीय सिंहावलोकन, श्रद्धांजलि, उत्कृष्ट तथा विद्यार्थी फिल्मों और काफी कुछ शामिल किया गया है। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्क्रीनिंग वर्ग के तहत महोत्सव के विभिन्न पक्ष, विश्व सिनेमा, विदेशी सिंहावलोकन, श्रद्धांजलि, प्रमुख देश, पर्दे पर रेखाचित्र (एनिमेशन और थ्री डी सिनेमा), वृतचित्र जैसे विशेष पहलू दर्शाए जाएंगे।

दस दिवसीय इस अवधि में 200 से अधिक फिल्में दिखाई जाएंगी। इसमें ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त आंग ली की लाइफ ऑफ पाई का भी प्रदर्शन किया जाएगा और साथ ही महोत्सव में अंतिम फिल्म के तौर पर मीरा नायर की द रिलकटेंट फंडामेंटलिस्ट दिखाई जाएगी। भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष के समारोह के तहत महोत्सव में- ‘शताब्दी समारोह’ के लिए एक विशेष अंश शामिल किया गया है जिसमें भारतीय सिनेमा के गौरवशाली 1क्क् वर्षो के इतिहास की चुनिंदा फिल्मों को प्रदर्शित किया जाएगा। इसके अलावा शताब्दी वर्ष के मद्देनजर ‘शताब्दी फिल्म पुरस्कार’ प्रदान किया जाएगा जिसका चयन एक विशेष ज्यूरी पैनल द्वारा किया जाएगा।

क्राइम शो के होस्‍ट राघवेंद्र कुमार मुद्गल नहीं रहे

‘चैन से सोना है तो जाग जाओ’ कहने वाले राघवेंद्र नहीं रहे। टीवी चैनल पर चर्चित रहे क्राइम शो सनसनी के एंकर राघवेंद्र कुमार मुद्गल का रविवार को पटना में निधन हो गया। वे कई घंटों से वेंटिलेटर पर थे। उनका अंतिम संस्कार रविवार को ही पटना में किया गया। 
        
दिल का दौरा पडऩे के बाद वे कई दिनों से मगध अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थे। राघवेंद्र की स्कूली शिक्षा बिलासपुर में हुई थी। उनके पिता आरटीओ अधिकारी थे। वे अंबिकापुर से रिटायर हुए। फिर वहीं बस गए। राघवेंद्र ने आकाशवाणी अंबिकापुर के ड्रामा आर्टिस्ट के तौर पर करिअर की शुरुआत की थी। 

   इप्टा में उन्होंने अपना अभिनय कौशल संवारा। दिल्ली और चंडीगढ़ में एनएसडी के कलाकारों के साथ भी काम किया। वे बीबीसी की कई डाक्यूमेंट्रीज में भी नजऱ आए। मुदगल ने एक भोजपुरी फिल्म ‘भोले शंकर’ में विलेन का रोल किया था। इसके हीरो मिथुन चक्रवर्ती थे। उन्होंने न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल में भी काम किया।

सरदार के बाद खिलाड़ी मुश्‍िकल में

तलाश के बाद होगी रिलीज खिलाड़ी 786


सन ऑफ सरदार एवं जब तक है जान के बीच की टक्‍कर खत्‍म हो गई, दोनों फिल्‍में बॉक्‍स ऑफिस पर अच्‍छा धन जुटाने में सफल रही। अगर आंकड़ों को देखते तो सन ऑफ सरदार ने यशराज ग्रुप को कड़ी टक्‍कर देते हुए जीत हासिल की, क्‍यूंकि अजय देवगन की फिल्‍म केवल 2000 स्‍क्रीनों पर रिलीज हुई, जबकि जब तक है जान करीबन 2500 स्‍क्रीन पर। यशराज फिल्‍म का खर्च 85 से 90 करोड़ के बीच बताया जा रहा है, जबकि सन ऑफ सरदार का खर्च केवल 65 से 75 के बीच बताया जा रहा है।

वैसे अजय देवगन बॉक्‍स ऑफिस क्‍लेकशन को देखने के बाद काजोल एवं बच्‍चों के साथ गोवा रवाना हो चुके हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सन ऑफ सरदार पूरी तरह सफल रहा। जब तक है जान को वो रिस्‍पांस नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था, कहीं न कहीं यशराज बैनर्स को निराशा हाथ लगी है, भले ही फिल्‍म अपना खर्च निकालने में कामयाब हो जाए।

फिल्‍मों के बढ़ते बजट के कारण सितारों के बीच अब युद्ध तो चलता ही रहेगा। अब आगे रिलीज होने वाली दो फिल्‍मों के बीच टक्‍कर का माहौल बताया जा रहा है, क्‍यूंकि अमीर खान की फिल्‍म तलाश नवंबर अंत में रिलीज हो रही है और सिनेमा हालों को पहले से हर बुक कर दिया गया है। सुनने में आया है कि सिंगल स्‍क्रीन मालिकों को फिल्‍म को लगातार दो हफ्ते लगाए रखने को कहा गया है, जो अक्षय कुमार की खिलाड़ी 786 के लिए शुभ संकेत नहीं, क्‍यूंकि एक्‍श्‍ान फिल्‍मों को हमेशा कमाई सिंगल स्‍क्रीन से हुई है, जबकि रोमांस भरपूर फिल्‍मों को मल्‍टीप्‍लेक्‍स से, और अक्षय कुमार एक्‍शन फिल्‍म लेकर आ रहे हैं। गौर तलब है कि नवम्‍बर अंत में आमिर की तलाश रिलीज हो रही है, वहीं दूसरी तरफ उसके अगले हफ्ते अक्षय कुमार की खिलाड़ी 786 रिलीज हो रही है।

 अब देखना यह है कि आमिर खान ने सिंगल स्‍क्रीन वालों को जो आदेश दिया है, उसको टिका पाने में उनकी फिल्‍म तलाश कामयाब होती है या नहीं। फिल्‍म प्रोमो देखने से एक बात तो साफ होती नजर आ रही है कि फिल्‍म की कहानी एक सख्‍त पुलिस ऑफिसर के आस पास घुमती है, जिसके बेटे को किसी ने अगवा कर लिया है, और उसको बचाने के लिए पुलिस अधिकारी एक कॉलगर्ल का सहारा लेगा, मगर कहा जा रहा है कि फिल्‍म में रहस्‍यमयी है, ऐसे में अब देखना यह है कि फिल्‍म के गीतों में नजर आ रही कहानी के पीछे वो कौन सा रहस्‍य है, जिसके कारण फिल्‍म से जुड़े लोगों ने कहा, फिल्‍म को दो हफ्ते टिकाए रखना?

उधर, अक्षय कुमार पूरी ऊर्जा में नजर आ रहे हैं, क्‍यूंकि उनकी ओह माई गॉड ने बॉक्‍स ऑफिस पर खूब कमाई की है, भले ही शिरीष कुंदर का जोकर पिट गया हो। इसके बाद रिलीज हो गई सलमान खान की दबंग टू, और 2012 का अंत।

रिक्‍शे वाला बना ब्‍लॉगर

वैसे थोड़ा पागल तो मैं शुरू से ही रहा हूं. और यक़ीन मानिए, ये अपने-आप में एक पूरा जवाब है कि आखिर मैं एक रिक्शावाला क्यों बना. लेकिन अगर आप इससे ही संतुष्ट नहीं हैं तो आइए मिलकर कोशिश करते हैं जवाब ढूंढने की, क्योंकि शायद इससे पहले मैंने भी कभी इतनी गहराई से इस बारे में नहीं सोचा!

ज़्यादातर जन कल्याण योजनाओं के आलोचक अक्सर ये तर्क देते हैं कि "सरकार ज़मीन से जुड़ी नहीं है". वो कहते हैं कि कि लोगों की क्या ज़रूरते हैं, ये एसी कमरों में बैठने वाले मंत्रियों और नौकरशाहों को पता ही नहीं है. जिस तरह की विवादास्पद नीतियां सरकार और योजना आयोग द्वारा बीते कुछ सालों में लाई गई हैं, उनसे इस तर्क को और भी बल मिलता है.

तो मुझे कहीं-न-कहीं ये लगा कि अगर मुझे अपने लोगों को बेहतर तरीके से जानना है और ये समझना है कि ग़रीबी क्या होती है, तो एक दर्शक की तरह इसे समझ पाना थोड़ा मुश्किल होगा. इसके लिए मुझे वो ज़िंदगी जीनी होगी.

मगर ग़रीबी के तो कई रूप हैं और एक रिक्शे वाले से कहीं ज़्यादा भयावह. लेकिन शायद एक रिक्शा वाला बनना मुझे सबसे ज़्यादा सहज और व्यावहारिक लगा. वो इसलिए क्योंकि साइकिल चलाना मेरा शौक है. मैंने अपनी साइकिल पर पिछली दिवाली के दौरान महाराष्ट्र दर्शन भी किया....12 दिनों में 1000 किलोमीटर. भले ही मानसिक रूप से न सही लेकिन शारीरिक रूप से मैं ज़िंदगी के लिए सबसे ज़्यादा तैयार था.

मैंने फ़ैसला तो कर लिया था पर वो कितना सही था, उस पर संशय के काले बादल मंडरा रहे थे... उस समय भी जब मैं 10 सितंबर की सुबह आठ बजे घर से निकल रहा था ! किसी तरह मैं उस आवाज़ को अनसुना करते हुए राजा रिक्शा गैराज पहुंचा. मेरे बारे में कुछ सवाल-जवाबों के बाद 70 नंबर का रिक्शा मुझे दे दिया गया. अब मैं आधिकारिक रूप से रिक्शे वाला बन गया था.

बेईमान भी और ईमानदार भी
लेकिन मुश्किल ये थी कि मुझे दिल्ली यूनिवर्सिटी इलाके की कोई जानकारी नहीं थी. हिंदू कॉलेज से शक्ति नगर या फिर ऐसे ही कई और न तो रास्ते पता थे और न किराया! अनुभवी दोस्तों ने सलाह दी कि सब सवारी पर छोड़ दो.

मुझे बताया गया, "10 में से आठ सवारियां आपको जायज़ किराया ही देंगी. और जो नहीं देंगी वो आपको सिखा देंगी कि अगली बार कितना किराया लेना है."

तरकीब अच्छी थी. अपनी 'ट्रेनिंग' के दौरान मुझे ऐसे लोग भी मिले जो मीठी-मीठी बातें बना कर मुझे चांदनी चौक तक केवल 25 रूपये में ले गए और ऐसे भी जो बिना कुछ बोले 20 रूपये की जगह 100 रूपये दे कर चले गए.

कॉलेजों के सामने लगी लंबी लाइनों में सवारी के लिए घंटों इंतज़ार करना एक बड़ा ही "आंखें खोलना वाला" अनुभव था.

आखिर दिल्ली वालों को लाइन में लगना कहां पसंद है!

लेकिन रिक्शे वालों का अनुशासन मेट्रो स्टेशन पर देखने को नहीं मिलता. वहां तो जंगल राज है. एक दूसरे की सवारी काटना, स्टेशन में अंदर तक घुस जाना, सवारियों, ख़ासकर लड़कियों, को चारों तरफ़ से घेर लेना, मेट्रो स्टेशन पर सब जायज़ है. जिसने जितनी चतुराई और बेशर्मी दिखाई, उसने उतना ही कमा लिया और जो बेचारा सवारी के इंतज़ार में अपने रिक्शे पर बैठा रहा, वो बैठा ही रह गया.

इस सबके बीच जब कोई अपनी सवारी मुझे दे देता ताकि मैं बोहनी या पहली कमाई कर लूं, तो मैं हैरान रह जाता.

"मुझे नहीं पता कि मैं इस प्रयोग से क्या हासिल करने वाला हूं. मेरा मक़सद तो बस ये जानना था कि एक रिक्शा वाला होने का क्या मतलब होता है. उम्मीद है कि इस प्रयोग के बाद भले ही समाज में न सही, मैं अपने आप में कुछ बदलाव देख पाऊंगा."

मगर इससे भी ज़्यादा हैरानी और ख़ुशी मुझे अपने नए दोस्तों की कहानियां जान कर होती.


हौसला नहीं खोना चाहिए
बिहार के बांका ज़िले से आए संजय तूरी, जो अब मेरे सबसे अच्छे दोस्त है, का मानना है कि "आज के समय में शिक्षा ही संपत्ति है."

संजय ख़ुद भले ही न पढ़ पाए हों लेकिन अपने तीनो बच्चों को पढ़ा रहे है. अपनी दो बेटियों और एक बेटे की उम्र वो जन्मदिन के साथ बताते है.

वो कहते हैं, "मुझे आज तक नहीं पता कि मेरी उम्र कितनी है या मेरा जन्मदिन कब आता है. इसलिए मैंने फ़ैसला किया था कि अपने बच्चों के साथ मैं ऐसा नहीं होने दूंगा."

रमेश यादव जी के लिए रिक्शा चलाना बांए हाथ का खेल है क्योंकि उनका दांया हाथ है ही नहीं.

वो पिछले 10-12 सालों से वो रिक्शा चला रहे हैं. गांव में 3-4 बीघा खेत और रिक्शे की मिली-जुली आमदनी से ही उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया और दो बेटियों की शादी भी की.

जब उन्होंने कहा कि "इंसान को हौसला नहीं खोना चाहिए", उस वक्त मैं उनसे नज़रें नहीं मिला पाया क्योंकि मेरी आंखों में आंसू थे.

ऐसा नहीं है कि मैं दिन भर सिर्फ़ मेहनत मज़दूरी ही करता हूं. मौज-मस्ती भी पूरी होती है. सवारी का इंतज़ार करने के दौरान सभी अपनी-अपनी कहानियां, मिर्च-मसाला लगा कर सुनाते हैं जिसमें गालियों की कोई कमी नहीं होती.

हालांकि इस हंसी-ठिठोली में ये बात भी अक्सर मुंह से निकल जाती है कि "दिन भर में कुछ नहीं कमाया". बड़ी विडंबना है कि एक तरफ़ तो रसोई गैस, सब्ज़ी, दाल से लेकर सभी कुछ महंगा होता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर रिक्शे का किराया दिन-पर-दिन गिरता जा रहा है.

लोग जायज़ किराया भी नहीं देते क्योंकि उन्हें पता है कि एक नहीं तो दूसरा जाएगा. मजबूरी का नाम रिक्शा वाला!

लेकिन पैसा, घर, परिवार और आराम की कमी से भी ज़्यादा रिक्शे वालों को अगर कुछ खलता है तो वो है इज़्ज़त की कमी. और इस घाव को कुरेदने का काम सबसे बेहतर तरीके से अगर कोई करता है तो वो है पुलिस.

पुलिस की मनमानी
पुलिस वालों का जब मन करता है वो मेट्रो स्टेशन पर खड़े रिक्शे वालों को खदेड़ने लग जाते हैं....बातों से नहीं बल्कि गालियों, डंडों और लातों से. और जब इस सब से उनका पेट नहीं भरता तो अपना 'ब्रह्मास्त्र' निकाल लेते हैं. आम भाषा में इसे सूआ बोलते हैं--लकड़ी के हत्थे में लगी 4 इंच लंबी लोहे की पैनी सलाख.

अभी मुझे दो हफ़्ते भी नहीं हुए थे जब मैं इस हथियार का शिकार बना. पहले तो ट्रैफ़िक हवलदार (विनोद कुमार) ने मेरा रिक्शा पंक्चर किया और मेरे सवाल पूछने पर मुझे दो थप्पड़ भी रसीद कर दिए. उस पर मेरी एफ़आईआर लिखने से साफ़ इंकार करके एसएचओ साहिबा ने जले पर नमक छिड़क दिया.

फिर लगभग एक महीने बाद पुलिस हवलदार( राम नरेश) ने थप्पड़, मुक्के और लातों से मेरा स्वागत कर डाला. क्यों ? शायद इसलिए क्योंकि मैं मेट्रो स्टेशन पर चुपचाप खड़ा था. मेरी शिक़ायत पर मुझे 'मेडिकल' जांच के लिए हिंदू राव अस्पताल ले जाया गया जिसमें डॉक्टर ने मेरे सूजे हुए होंठ का ज़िक्र भी किया. लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात...कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई.

जब मुझे जैसे "पोस्टग्रैज्युएट रिक्शे वाले" को भी पुलिस गोल-गोल घुमाती रहती है तो फिर मेरे बाकी दोस्तों का क्या हश्र क्या करती होगी जो ज़्यादातर पढ़े-लिखे नहीं हैं. जब क़ानून के रक्षक ही इंसान ही इंसान को इंसान न समझे तो उम्मीद कहां रह जाती है? खैर छोड़िए...एक रिक्शे वाले को इतनी बड़ी-बड़ी बातें शोभा नहीं देती.


मुझे नहीं पता कि मैं इस प्रयोग से क्या हासिल करने वाला हूं. मेरा मक़सद तो बस ये जानना था कि एक रिक्शा वाला होने का क्या मतलब होता है. मैं अपने अनुभवों को अपने ब्लॉग पर लिखता हूं लेकिन क्या मैं इस पर किताब भी लिखूंगा या कोई डॉक्यूमेंट्री बनाऊंगा, मुझे अभी पता नहीं. लेकिन उम्मीद है कि इस प्रयोग के बाद भले ही समाज में न सही, मैं अपने आप में कुछ बदलाव देख पाऊंगा.

गौरव जैन के ब्लॉग पर जाने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते है http://cycletorickshaw.blogspot.in/

 बीबीसी हिन्‍दी के साभार से     

बिच्‍छू डॉट कॉम का संपादक वर्सेस मुख्‍यमंत्री

भोपाल, इंदौर और विदिशा में बिच्छू डॉट कॉम के होर्डिंग लगने के कुछ ही घंटों में हटा लिए गए। इंदौर में तो लगाने वाले को ही हिरासत में ले लिया। आखिर किसके कहने पर और किस वजह से इन्हें हटाया गया। इसका कारण कोई बताने की स्थिति में नहीं है।

भोपाल में रोशनपुरा चौराहे और सुभाष स्कूल के पास दोपहर दो बजे होर्डिंग लगाए। शाम पांच बजे तक उतार लिए गए। नगर निगम के अधिकारी कह रहे हैं कि उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। कलेक्टोरेट के अधिकारियों को भी होर्डिंग हटाने की कोई जानकारी नहीं है। पुलिस तक मामला पहुंचा ही नहीं। तो क्या मिस्टर इंडिया ने उतारे होर्डिंग?विदिशा में होर्डिंग लगे तो भाजपाइयों ने उसे लेकर प्रदर्शन किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी मुकेश टंडन ने मुख्यमंत्री निवास फोन लगाया। निर्देश मिला कि यथास्थिति बनी रहने दी जाए। लेकिन बाद में एसडीएम ने खुद जाकर होर्डिंग हटा लिए।  इंदौर में पांच जगह होर्डिंग लगाए गए थे। लेकिन उन्हें उतार लिया गया। रीगल तिराहे पर जब श्याम नामक व्यक्ति होर्डिंग लगा रहा था तो उसे हिरासत में ले लिया। तुकोगंज पुलिस थाने में उसे रात भर बिठाया गया। उसका लोडिंग ऑटो भी साथ ले गए। प्रदेशभर से इसी तरह की सूचनाएं हैं। 

शिवराजजी, क्या आपके राज में लोकतांत्रिक तरीके से विरोध-प्रदर्शन भी नहीं किया जा सकता। यदि तुम्हारा लोकतंत्र यही है तो मैं साधुवाद देता हूं। प्रेस की आजादी पर आपातकाल लगाया जा रहा है। प्रचार के इन माध्यमों पर इस तरह प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं तो क्यों न मैं मानव होर्डिंग और तांगा रैली निकालकर अपनी अभिव्यक्ति का प्रदर्शन करूं। आदरणीय शिवराजजी आप होर्डिंग से घबराते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति को दबाना सबसे घृणित कार्य माना जाता है। यह घृणित कार्य आपने क्यों किया, इसका जवाब मैं आपसे मांगूंगा। अभिव्यक्ति के कितने साधनों को आप जमींदोज करेंगे।

खुद क्‍यूं नहीं काटकर लाते जेठमलानी की जुबान

भाजपा नेता राम जेठमलानी के श्रीराम भगवान पर दिए बयान को लेकर हिन्‍दु समुदाय बेहद क्रोधित है, भले ही आम आदमी श्रीराम भगवान के घर वापसी उत्‍सव को समर्पित दीवाली त्‍योहार की तैयारियों में मस्‍त है। शायद आम आदमी ही नहीं, बल्‍कि श्री हिंदू न्यायपीठ विधान परिषद के सदस्‍य भी, तभी तो उन्‍होंने श्रीराम भगवान के चरित्र पर बुरे पति का ठप्‍पा लगाने वाले नेता की जुबान काटकर लाने वाले को 11 लाख रुपए देना का एलान किया है यह कार्य तो केवल वो व्‍यक्ति कर सकता है, जिसके मुंह में राम और बगल में छुरी

अब ऐसा व्‍यक्‍ति की तलाश करनी होगी। भारत में ऐसा वयक्‍ति ढूंढ़ना बेहद मुश्किल है। आप पूछोगे क्‍यूं, यहां तो हर दूसरा व्‍यक्ति ऐसा है, लेकिन यह बात मानने को कौन तैयार है, कि मैं मुंह में राम और बगल में छूरी रखता हूं, सब कहेंगे हमारे मुंह में राम है, बगल में खड़े व्‍यक्‍ति के पास जरूर छूरी होगी, जब आप दूसरे से पूछोगे तो वो भी यही कहेगा।

आप सोच रहे होंगे मुद्दा तो राम भगवान का चल रहा था, छूरी कहां से आ गई। छूरी का जिक्र इस लिए करना पड़ रहा है, क्‍यूंकि जुबान काटने के लिए कोई तो औजार चाहिए। तो वो छूरी क्‍यूं नहीं हो सकता, जब कि हमारे तो कवाहत में भी दोनों साथ आते हैं, मुंह में राम बगल में छूरी।

चलो छोड़ो हम छुरी से वापिस जेठमलानी पर लौटते हैं, मुझे तो नेता जेठमलानी भी अजीब प्राणी लगते हैं, पहले बुरे पति का ठप्‍पा लगाते हैं मर्यादा पुरुषोत्‍तम पर, फिर कहते हैं कि वो है भी थे या नहीं। अंतिम में जेठमलानी से पूछना चाहूंगा कि जेठमलानी के आगे लगा राम कहां से आया ? 

दूसरी तरफ परिषद को देखो, जो बुजुर्ग व्‍यक्‍ति की जुबान काटने के लिए 11 लाख रुपए की ईनाम राशि देकर एक जरूरतमंद को अपराध की दुनिया की तरफ धकेल रही है, अगर परिषद श्रीराम भगवान के प्रति इतना ही स्‍नेह रखती है तो इस पवित्र कार्य के लिए खुद की आगे क्‍यूं नहीं आती।

इनाम रखकर किसी गरीब एवं जरूरतमंद व्‍यक्‍ति की जिन्‍दगी का क्‍यूं राम राम सत्‍य करने पर तुली हुई है। श्री राम भगवान एवं सीता मैया की कथा में जब भी धोबी का किस्‍सा आएगा, तो सवाल हर दिल में उठेगा, चाहे वो उस सवाल को जमाने से पूछे, चाहे अपने मन से या परिवार से।

लेकिन इस सवाल का जवाब केवल केवल उस समय की परिस्‍थ्‍ितियों के सही सही आंकलन के बाद ही हो सकता है, इसके पीछे की क्‍यूं को समझना होगा, हो सकता है कि उस समय कुछ परिस्‍थ्‍तियां ऐसी हों कि उनको स्‍वीकार करने के अलावा श्रीराम के पास कोई विकल्‍प न हो। लेकिन कभी कभी तो भारतीय लोग श्रीराम के अस्‍तित्‍व पर ही सवालिया निशान लगा देते हैं। इस धर्म को इतना पेचीदा मत करो कि लोग इस धर्म को छोड़कर किसी और धर्म की तरफ निकल पड़े। बहुत सारे नए धर्म पुराने धर्मों के ज्‍यादा पेचीदा होने के कारण अस्‍तित्‍व में आए।

भारत को ब्रिटेन से मिला विकासशील देश का प्रमाण पत्र

अब भारत गरीब देश नहीं रहा। अब भारत एक अमीर देश बन चुका है। भारत दिन प्रति दिन विश्‍व के नक्‍शे पर अपनी उपस्‍थिति दर्ज करवा रहा है। ऐसा मैं नहीं कह रहा, बल्‍कि यह बात तो ब्रिटेन कह रहा है, और इस की आढ़ लेकर वो हम को अब आर्थिक सहायता देने से मना कर रहा है। यह सब भारत के कुछ नीच अमीर लोगों के कारण हुआ, जो घोटाले कर कर मीडिया के दुबारा दुनिया को बता रहे हैं कि हमारे यहां पैसे की कोई कमी नहीं, बल्‍कि कमी है तो मिल बांटकर खाने की, एक बेहतर प्रबंधन की।

हमें चीजों का सही इस्‍तेमाल नहीं करना आता। इसकी सबसे बड़ी उदाहरण है हमारे देश का प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह, जो विश्व के सबसे महान अर्थ शास्‍त्रियों में शामिल हैं, लेकिन देश को आर्थिक रूप से सशक्‍त कर पाने में असशक्‍त हैं, उनके पीछे उनका हाथ नहीं, बल्‍कि कुछ हमारे समाज के भ्रष्‍ट लोगों का दोष है। ब्रिटेन का उक्‍त बयान मनमोहन सिंह को सही साबित कर रहा है, लेकिन देश की जमीनी हालत तो पूरी दुनिया जानती है। इस देश की एक और बड़ी समस्‍या है, जो प्रबंधन से ही जुड़ी हुई है, कुछ नेता पैसा कमाते हैं, और सीधा स्‍विस बैंक में भेज देते हैं, ऐसे करीबन 700 लोगों का पैसा स्‍विस बैंक में पड़ा हुआ है, लेकिन देश के अंदर विकास के नाम पर विदेशी कंपनी को उतारा जा रहा है। उस पैसे देश के अंदर हजारों रोजगार ईकाइयों को जन्‍म दिया जा सकता है। मगर पैसा प्रबंधन का तरीका नहीं है। बचपन से सिखाया ही नहीं गया, हमारे जहां तो गोलक में पैसे एकत्र करने सिखाए जाते हैं, जब एक दम जरूरत पड़ती है तो बच्‍चे गोलक तोड़कर पैसा निकाल लेते हैं, वो पैसा कब और कहां से आए, उसका क्‍या करना चाहिए, इसका हमारे पास कोई ज्ञान नहीं होता।

एक आदमी की जरूरत क्‍या है, रोटी कपड़ा और मकान। जो बड़ी आसानी से मिल सकता है, लेकिन देश के अंदर बेहतर प्रबंधन न होने के कारण आदमी पहली जरूरत बमुश्‍किल पूरी कर पाता है। सुबह की चाय इतनी महंगी हो गई कि लोटा भर कर पीने वाला साधारण व्‍यक्ति अब केवल गला तर कर पाता है। गैस सिलेंडर, चीनी, चाय एवं दूध का रेट देखकर आंखें खुली की खुली रह जाती हैं, हिमायल एवं सागरों के बीच बसने वाले इस देश के कुछ इलाकों में तो लोग आज भी पानी को तरसते हैं। दिल्‍ली, मुम्‍बई एवं बैंगलूरू जैसे महानगरों से अभी तक झुग्‍गी झोपड़ियां खत्‍म नहीं हुई तो हम कैसे कहें कि देश विकास कर रहा है। यह बात ब्रिटेन कह सकता है, क्‍यूंकि उसको अपने देश के नागरिकों की चिंता है, वो फोकट में ऐसे देश में पैसा बर्बाद नहीं कर सकता, जहां पर आए दिन करोड़ों रुपए के घोटाले होना आम बात है। हिंदुस्‍तान में पैसे की कमी तो कभी नहीं थी, मुगलों का इतिहास उठाकर देख लो या फिर खुद ब्रिटेनियों का। कमी रही है तो अक्‍सर प्रबंधन की।

क्‍या कहा ब्रिटेन - ब्रिटेन की अंतरराष्ट्रीय सहायता मामलों की मंत्री ने घोषणा की है कि ब्रिटेन भारत को साल 2015 तक अपने यहाँ से मिलने वाली सहायता पर रोक लगा देगा.

यह कटौती वर्ष 2013 से 2015 के बीच चरणबद्ध तरीके से की जाएगी. इस दौरान सहायता में करीब 1700 करोड़ रुपयों की कटौती की जाएगी. ब्रितानी मंत्री जस्टिन ग्रीनिंग ने इस बाबत घोषणा करते हुए कहा कि यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि भारत आर्थिक रूप से तरक्की कर रहा है और दुनिया में एक ताकत के रूप में उभर रहा है.

आज तक टीवी एंकरिंग सर्टिफिकेट कोर्स, सिर्फ 3950 रुपए में

आजतक के एंकर व एक्सपर्ट्स से सीखिए कैसे आत्‍मविश्‍वास के साथ टीवी पर आते हैं.
इस ऑनलाइन कोर्स में आप आजतक के टॉप क्‍लास एंकर और एक्सपर्ट्स की मदद से वीडियो ट्यूटोरियल के माध्‍यम से कैमरे के सामने प्रभावशाली ढंग से प्रस्‍तुत होना सीखेंगे.
किस के लिए है यह ऑनलाइन कोर्स?
अपनी सुविधानुसार टीवी एंकरिंग में सर्टिफिकेट कोर्स नये और अनुभवी प्रोफेशनल दोनों कर सकते हैं. इस कोर्स में आप जानेंगे टीवी न्यूज चैनल की कार्यप्रणाली, टेलीप्रॉम्पटर का इस्तेमाल, स्टूडियो लाईट्स, अपनी आवाज को कैसे निखारें और कैसे बने स्टाईलिश एंकर.
इस ऑनलाइन कोर्स में आप क्या सीखेंगे?
- आत्‍मविश्‍वास के साथ टीवी स्‍क्रीन पर आना.
- टीवी न्‍यूज चैनल के विषय में.
- जब आप स्‍टूडियो में पहुंचें तो क्‍या उम्‍मीद रखें.
- आवाज को कैसे निखारें.
- टीवी ड्रेस कोड और कैसे आप अपना स्‍टाइल बनाएं.
पाठ्यक्रम
भाग 1- एंकरिंग की बुनियादी जानकारियां
मुख्‍य अंश- अपने को दृढ़ रखना, उर्जा को सहेजना, कैमरे के लेंस से बातें करना, टिप्‍स और तकनीक.
भाग 2-  टीवी न्यूज़ चैनलों की दुनिया
मुख्‍य अंश - टीवी न्‍यूज चैनलों की कार्यप्रणाली, न्यूज़ फॉर्मेट्स और स्टोरी के प्रकार.
भाग 3 - स्टूडियो की बुनियादी जानकारी
मुख्‍य अंश - टिप्‍स, टेलीप्रॉम्‍पटर, माइक्रोफोन, ईयरपीस, स्‍टूडियो सेट, स्‍टूडियो लाईट्स
भाग 4 - आवाज़ को निखारें
मुख्‍य अंश - अपनी आवाज़ को कैसे निखारें टिप्‍स और टेक्निक.
भाग 5 - कैसे बने स्टाईलिश एंकर
मुख्‍य अंश - टीवी ड्रेस कोड, क्‍या पहनें, स्‍टाइल, मेकअप.
भाग 6 - जॉब इंटरव्यू की कैसे करें तैयारी
मुख्‍य अंश - किन बातों का रखें ध्यान: इंटरव्यू , स्क्रीन टेस्ट , ऑडिशन में.

भाग 7 – एंकर टिप्स
मुख्‍य अंश – 'आज तक' के एंकर्स द्वारा प्रोफेशनल टिप्‍स
यह कैसे काम करता है:
- यह एक स्व-नियंत्रित पाठ्यक्रम है
- कोर्स के लिए दाखिला लेने के बाद दो माह तक आप इस कोर्स में लॉग इन कर सकते हैं.
- हर एक भाग को पूरा करने के बाद अगले भाग में जाने के लिए आपको एक ऑनलाइन टेस्ट को पास करना होगा.
- सभी भाग पूरे कर लेने के बाद आपको एक सर्टिफिकेशन परीक्षा देनी होगी, जिसमें कम से कम  'A' , 'B' व 'C' ग्रेड लाने पर आपको आपके नाम से ग्रेड स्कोर के साथ प्रमाणपत्र दिया जाएगा.
ज़रूरी बातें: इस कोर्स में सफल होने के लिए हमारी सलाह है कि छात्र 12वीं की परीक्षा किसी मान्य संस्थान से पास की हो. छात्र हिंदी भाषा में निपुण हो. यह बात कोई मायने नहीं रखती है कि आपका बैकग्राउंड क्‍या है या आपकी योग्‍यता क्‍या है, यह ऑनलाइन क्‍लास आपको टेलीविजन न्यूज़ एंकर की बुनियादी चीजों को क्रमवार ढंग से सिखाएगी.
कोर्स ओवरव्यूः  कोर्स मॉड्यूल टॉपिक से ऑर्गेनाइज है. जब तक इंडीकेट ना किया गया हो तब तक रेग्युलर ऑनलाइन क्लास के जरिए आप वीडियो ट्यूटोरियल पूरा कर सकते हैं. अगले मॉड्यूल तक पहुंचने के लिए हर मॉड्यूल टेस्ट पासिंग ग्रेड के साथ ही पूरा किया जाना चाहिए.
मॉड्यूल कोर्सवर्क में शामिल हैः
  • वीडियो ट्यूटोरियल
  • नोट्स
  • टेस्ट 
इस कोर्स में फाइनल सर्टीफिकेशन परीक्षा भी है. अगर आप सफलतापूर्वक कोर्स पूरा कर लेते हैं तो आप प्रिंटेड सर्टीफिकेट हासिल करेंगे, जिसके मुताबिक आप ने सफलता पूर्वक ये कोर्स किया है और ग्रेड में स्कोर किया है
वीडियो ट्यूटोरियल: हर मॉड्यूल में वीडियो का सक्सेशन, हैंडआउट और ऑनलाइन टेस्ट शामिल है. वीडियो देखकर उसके बाद वाले टेस्ट पूरा करने के लिए आपको प्रोत्साहित करते हैं. बिना एक मॉड्यूल पूरा किए आप दूसरे मॉड्यूल में नहीं पहुंच सकते हैं
टेस्टः हर मॉड्यूल में ऑनलाइन टेस्ट शामिल है. जबतक आप सारे टेस्ट पासिंग ग्रेड के साथ पूरे नहीं करेंगे सिस्टम आपको टेस्ट फिर से देने के लिए प्रॉम्प्ट करता रहेगा. याद रखिए दूसरे मॉड्यूल में पहुंचने के लिए आपको पहले या जारी मॉड्यूल के टेस्ट पासिंग ग्रेड के साथ पूरा करना ही होगा. एक बार छात्र पासिंग स्कोर के साथ टेस्ट पूरा कर ले तो उसे दोबारा टेस्ट के लिए नहीं कहा जाएगा.
सर्टीफिकेशन परीक्षाः इस कोर्स में सर्टीफिकेशन परीक्षा शामिल है. परीक्षा में ग्रेड 'A' , 'B' व 'C' मिलने पर ही सर्टिफिकेट प्राप्त होगा.

जी न्‍यूज का हो गया अमर उजाला !

भड़ास 4 मीडिया डॉट कॉम के साभार से


मीडिया इंडस्‍ट्री से बहुत बड़ी खबर है. अमर उजाला समूह बिक गया. सुभाष चंद्रा के जी समूह ने अमर उजाला को खरीद लिया है. जल्‍द ही इसकी आधिकारिक घोषणा दोनों समूह कर सकते हैं. बताया जा रहा है कि यह सौदा 1200 से 2500 करोड़ के बीच तय हुआ है. हाल के समय में यह सबसे बड़ा मीडिया टेकओवर है. इसके साथ ही यह भी तय हो गया है कि मीडिया मार्केट में जनसरोकारी पत्रकारिता का भविष्‍य बहुत ही मुश्किल है.
    
प‍हले भी अमर उजाला के बिकने की चर्चाएं होती थी. सूचना आई थी कि भास्‍कर समूह अमर उजाला को खरीदने का प्रयास कर रहा है. दोनों समूहों के बीच कई चक्र भी बातचीत भी हुई थी, परन्‍तु बात पैसे पर आकर अटक गई. अमर उजाला समूह 1500 करोड़ से ज्‍यादा की मांग पर अड़ा था जबकि भास्‍कर समूह 1000 करोड़ रुपये से आगे बढ़ने को तैयार नहीं था, लिहाजा यह डील फाइनल नहीं हो पाई.
        

पर अब जी समूह ने अमर उजाला का टेकओवर कर लिया है. अभी आधिकारिक रकम की जानकारी नहीं हो पाई है पर माना जा रहा है कि डील 1200 करोड़ से ज्‍यादा में फाइनल हुई है. सुनील मुतरेजा कंपनी के सीईओ बने रहेंगे. खबर यह भी है कि माहेश्‍वरी परिवार भी निदेशक मंडल में शामिल रह सकता है. दैनिक जागरण द्वारा नई दुनिया के खरीद के बाद यह बहुत बड़ा टेकओवर है. इस खबर के बाद अमर उजाला समूह के कर्मचारियों में भी खलबली है.

'जब तक है जान' से परेशान 'सन ऑफ सरदार'

हर दीवाली सिने प्रेमियों के लिए दो बड़ी फिल्‍में रिलीज होती हैं। इस बार भी ऐसा ही कुछ होने जा रहा है, लेकिन इस बार फिल्‍म रिलीज को लेकर विवाद सा खड़ा हो गया है, क्‍यूंकि यशराज बैनर्स ने महानगरों के बड़े सिनेमा घरों पर पहले से बुकिंग कर ली, जिसके चलते सन ऑफ सरदार के रास्‍ते में मुश्किलें खड़ी हो गई।

बीबीसी हिन्‍दी डॉट कॉम के अनुसार यशराज बैनर ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि दोनों फिल्मों के लिए पर्याप्त सिनेमाघर उपलब्ध हैं। इस पर अजय देवगन बड़े सख्त लहज़े में कहते हैं, ''क्या हम बेवकूफ़ हैं । हां हैं न सिनेमाघर हैं, पर दक्षिण भारत में हैं, दक्षिण भारत में लोग 'सन ऑफ़ सरदार' देखेंगे या फिर अपनी दक्षिण भारतीय फिल्में?।

डॉट कॉम के अनुसार अजय कहते हैं, ''मुंबई के दादर में सात सिनेमाघर हैं, जिनमें से छ: पर यशराज की फिल्म लगने वाली है। हमारे लिए बचा एक सिनेमाघर। अब आप ही बताएं कि क्या ये बात गलत नहीं है।

एक सवाल के जवाब में अजय कहते हैं, ''इतने बड़े बजट की फिल्म को अपनी लागत वसूल करने में कम से कम दो हफ्ते लगते हैं।
अगर हम अपनी फिल्म 23 नवंबर को रिलीज़ करते हैं तो उसके अगले हफ्ते आमिर खान की फिल्म 'तलाश' रिलीज़ हो रही है। फिर अक्षय कुमार की 'खिलाडी 786' है और फिर साल के अंत में सलमान खान की 'दबंग 2' रिलीज़ हो रही है। अब क्या आप इन सब से कहेंगे कि वो अपनी फिल्मों की रिलीज़ दो हफ्ते आगे बढ़ा दें।

अजय देवगन सवालिया लहजे में पूछते हैं कि यशराज फिल्म्स के लिए सिर्फ वो ही अपनी फिल्म का बलिदान क्यों दें ?

जनता की पसंद, एक बुद्धू तो दूसरा बांदर

देश में दो नाम पिछले लम्‍बे समय से चर्चाओं का केंद्र बने हुए हैं। दोनों को देश का भावी प्रधान मंत्री बनाने का सपना भारतीय जनता संजो रही है। मगर हैरानी की बात है कि जनता की पसंद एक बुद्धू तो दूसरा बांदर है। यकीन नहीं आता तो आप सुब्रमण्यम स्वामी का बयान सुनिए और दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा बरखा सिंह का बयान सुनिए।

गौर तलब है कि :-

जनता पार्टी प्रमुख सुब्रमण्यम स्वामी ने गुरूवार को एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी पर एक समाचार पत्र को 90 करोड़ का कर्ज देने की बात कहते हुए 1600 करोड़ की संपत्ति हड़पने का आरोप लगाया था। इस बयान के बाद राहुल गांधी ने कहा कि वो स्‍वामी पर मानहानि का दावा करेंगे। राहुल का बयान आते ही कानून की मदद से सोनिया गांधी के रास्‍ते में मुश्‍िकलें खड़ी करने वाले स्‍वामी ने राहुल गांधी को 'बुद्धू' कहा है। स्वामी ने ट्विटर पर राहुल को बुद्धू लिखते हुए कहा, 'इस (बुद्धू को) मानहानि के कानून पर जानकारी लेने की जरूरत है। पब्लिक सर्वेंट एवं सांसद होने के नाते उन्हें यह साबित करना होगा कि जो कुछ मैंने कहा है, वह झूठ है, न कि मुझे यह साबित करना होगा कि जो कुछ मैंने कहा है वह सच है।'

चुटकियां  लेकर बात करने में माहिर गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसे संवाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी। इस बयान के बाद नरेंद्र मोदी के वैवाहिक जीवन को लेकर भी सवाल उठने लगे। इस दौरान नरेंद्र मोदी की इस टिप्‍पणी पर कड़ा नोटिस लेते हुए गुरुवार को आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई एवं मांग की कि मोदी इसके लिए सुनंदा थरूर से माफी मांगें। बरखा सिंह ने आलोचना करते हुए मोदी पर बातों-बातों में एक शेर दाग दिया। उन्होंने कहा- 'नफरतें पालना दुर्भाग्‍य रहा हो जिसका, वो किसी रिश्‍ते की अज़मत कहां पहचानता है। प्‍यार को पैसे में तौलने वाले से कहो, कोई बंदर अदरक का मजा कहां जानता है...'

ताकि बुरा न लगे  
राहुल गांधी को स्‍वामी के कहे शब्‍दों का बुरा नहीं मानना चाहिए, क्‍यूंकि पंजाब में एक कहावत है, लल्‍लू करे कवल्‍लियां, रब्‍ब सिद्धियां पावै, और रही बात बांदर की तो नरेंद्र मोदी वैसे भी आज भाजपा के लिए संकट मोचन बने हुए हैं। संकट मोचन वो बांदर था, जिसने रावण की लंका को जलाकर राख कर दिया था, अब देखना है कि कलयुग का यह बांदर देश को किस ओर लेकर जाता है, और बुद्धू के कार्यों को भगवान क्‍या दिशा देते हैं।

अब बयान न दें

राहुल बाबा को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए, क्‍यूंकि स्‍वामी सोनिया गांधी के सबसे बड़े दुश्‍मन हैं, कहते हैं कि जब सोनिया गांधी प्रधान मंत्री की कुर्सी से दो कदम दूर थी तो बीच में मीलों की खाई खोदने वाले स्‍वामी ही थे, जो कानून की तलवार से सोनिया गांधी पर निरंतर वार कर रहे हैं।  स्‍वामी को रोकने के लिए हिन्‍दुस्‍तान से कानून नामक की चिड़िया को उड़ाना होगा। वरना राहुल बाबा आपका ध्‍यान स्‍वामी पर अटक जाएगा, और नरेंद्र मोदी, जिससे बरखा सिंह बांदर कह रही हैं, उस गद्दी पर आकर बैठ जाएगा, जिस पर नरेंद्र मोदी के मौन मोहन सिंह बैठे हुए हैं। वैसे भी हवाएं अब कांग्रेस के खिलाफ हैं। पहले तो केवल स्‍वामी था, अब तो अरविंद केजरीवाल भी आ गए। बीच बीच में रिटायर्ड सेनाध्‍यक्ष भी फायर कर जाते हैं।

आरटीआई का उपयोग और आपकी छवि

सूचना का अधिकार कानून का यदि आप उपयोग नहीं करते हैं तो समझ लीजिये कि आप इस संसार के सबसे अच्छे लोगों में हैं और इसका उपयोग करते हैं तो आप उन लोगों के बीच खलनायक के तौर पर माने जाएंगे जिनका आपके हस्तक्षेप से कुछ नुकसान होने की आशंका है। पहले तो आपको समझाया जाएगा कि आप भले आदमी हैं। आपकी ऐसी छवि नहीं है और जब आप इन बातों में नहीं आएंगे तो वे कहेंगे आखिर आप भी वैसे ही निकले। लब्बोलुआब यह है सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने वाले किसी भी उस व्यक्ति की जो आमतौर पर किसी विवादों में नहीं पड़ता है। मुझे पता नहीं कि आपने आरटीआई अर्थात सूचना के अधिकार के तहत कोई जानकारी मांगने का कभी कोई प्रयास किया या नहीं और यदि इस कानून का उपयोग आप कर रहे हैं तो आपके अनुभव की भी मुझे कोई जानकारी नहीं। इस मामले में मैं अपना अनुभव जरूर आज आपसे बांटना चाहूंगा।

आरटीआई है क्या, यह तो अब लोगों, खासतौर पर इलिट क्लास को बताने की जरूरत नहीं है। इसका उपयोग कहां और कैसे करना, यह भी उन्हें मालूम है और यह भी कि इसके उपयोग से उनके हितों पर क्या असर पड़ सकता है। कभी इस कानून का सच जानना है तो आप सीधे न सही, उस व्यक्ति के कान में फुसफुसा दीजिये कि आप फलां जानकारी के लिये सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने जा रहे हैं। यकिन मानिये, ऐसा करने से वे आपको रोकेंगे तो बिलकुल भी नहीं लेकिन आपको नेक सलाह दी जाएगी...कहां आप झंझट में पड़ रहे हैं। आपकी छवि ऐसी नहीं है। देख लेते हैं कि रास्ता कहां से निकल सकता है। मुझे एकाधि बार ऐसे अनुभव से गुजरना पड़ा है।

मैं नहीं जानता कि ऐसे सलाह देने वाले मेरे दोस्त हैं या दुश्मन लेकिन उन्होंने मेरे अधिकार का हनन जरूर किया है अथवा कर रहे हैं, यह मेरा मानना है। जब वे कहते हैं कि आपकी छवि ऐसी नहीं है तो मुझे लगता है कि सूचना के अधिकार के तहत मैं जानकारी मांगने गया तो इलिट वर्ग में कुख्यात हो जाऊंगा। जो लोग आरटीआई का उपयोग कर रहे हैं, लगभग हर आदमी को इसी नजर से देखा जाता है। सवाल यह है कि इस कानून के उपयोग से इतना डर क्यों? क्यों कानून के उपयोग से रोका जाता है? क्या इस कानून के तहत मांगी गई जानकारी से पोल खुल जाती है? इन सभी सवालों का जवाब हां में होगा क्योंकि डर इस बात का है कि आपके द्वारा मांगी गयी जानकारी उन तमाम गलत फैसलों और उन निहित स्वार्थों को सामने ले आएगी जो वे छिपाना चाहते हैं। यह भी सच है कि आरटीआई ने जानकारी छिपाने वालों की नींद उड़ा दी है। शायद यही कारण है कि आरटीआई का उपयोग करने वालों को लगभग असामाजिक तत्व मान लिया गया है। मध्यप्रदेश में नहीं किन्तु किसी अन्य राज्य में इस कानून का उपयोग करने वाले किसी एक्टिविस्ट को मौत के घाट उतार दिया गया है। मध्यप्रदेश इस मामले में अभी भीरू है लेकिन ये भीरू कब वीरता का परिचय दे बैंठेंगे, कहा नहीं जा सकता।

सूचना के अधिकार का डर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है क्योंकि इस अधिकार का उपयोग करने पर रोक तो नहीं है किन्तु जानकारी देने का अर्थ छिपी बातों को उजागर करना है। यह उनकी स्वेच्छारिता से नहीं, बल्कि कानून के डंडे के डर से हो रहा है। शायद यही वजह है कि पहले पहल तो हरसंभव कोशिश की जाती है कि किसी भी तरह से इस कानून का उपयोग नहीं किया जाए और किया गया तो उपयोगकर्ता को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहां तक कि उसके साथ बैठने में भी परहेज किया जा रहा है जबकि कल तक उसी के साथ बैठने में यही लोग गर्व का अनुभव करते थे। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने का नागरिक हक संविधान में है और इस बारे में हीला-हवाली करने वालों के खिलाफ दंड का प्रावधान भी है। व्यावहारिक रूप् में देखा जाए तो अधिकांश मामलों में टालने का रवैया अख्तियार किया जाता है। यह भी सच है कि कानून का उपयोग करने वालों को पूरी प्रक्रिया पता नहीं होती है और इसका फायदा संबंधित लोग उठाने से नहीं चूकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सूचना के अधिकार देने में लगभग सभी लोग खुद को बचाना चाह रहे हैं अथवा जानकारी देने से बचने की कोशिश में है। इसका एक पक्ष और भी है जिस पर गौर करना, सोचना और रास्ता निकालने की कोशिश करना चाहिए। नब्बे बल्कि पिचनाबे फीसदी जानकारी छिपायी जा रही है या नहीं दी जा रही है अथवा लेटलतीफ की जा रही है तो यह तंत्र की कमजोरी है किन्तु सूचना के अधिकार के तहत जानकारी चाहने वालों के समक्ष एक बड़ी बाधा उन लोगों से भी है जो निजी हित के लिये इसका उपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं। यह कहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा है कि कौन सी जानकारी सर्वजनहित के लिये है और कौन सी जानकारी व्यक्तिगत हित अथवा परेशानी खड़ी करने के लिये। ऐसी स्थिति में कई बार आवश्यक होने के बावजूद सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मिल पाना दुष्कर कार्य हो जाता है। सूचना के अधिकार कानून से जुड़े लोगों से बात करने पर यह जानकारी मिलती है उनकी परेशानी का कारण ज्यादतर वे लोग होते हैं जो रंजिशवश जानकारी हासिल करना चाहते हैं। जानकारी उपलब्ध कराना कानूनी दायित्व है किन्तु इस सबमें समय और अर्थ दोनों का बड़ा नुकसान होता है। ये लोग इस बात को मानते हैं कि सही और जनहित से संबंधित जानकारी मांगी जानी चाहिए किन्तु सिर्फ जानकारी के लिये जानकारी मांगने से कई तरह की उलझने पैदा हो रही हैं। पहले से सूचना के तहत जानकारी मांगने वालों की लम्बी लाइन है। जो वास्तव में जनहित में अथवा न्याय पाने की गरज से जानकारी चाहते हैं, उन्हें परेशानी हो रही है। किसी भी विभाग का प्रशासकीय अमला सीमित है और एक जानकारी देने में उस प्रशासकीय अमले का सत्तर फीसद अमला जुट जाता है। मांगी गयी जानकारियों का कहां और किस तरह उपयोग किया जाएगा अथवा किया जा रहा है, इस बारेे में कुछ बातें अस्पष्ट हैं, इस बात का भी खुलासा किया जाना चाहिए।

सूचना के अधिकार के तहत जानकारी नहीं देने के प्रयास में संबंधित लोग नहीं रहते हैं तो कुछ परेशानियां अकारण इस कानून का उपयोग करने वालों से भी हो रही है। हालांकि दूसरा पक्ष शायद बड़ा नहीं है। यदि होता तो बार बार और हर बार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने की बात से ही अड़चनें पैदा नहीं की जाती। ऊपर जिन पांच फीसदी लोगों का उल्लेख मैंने किया है, वह गैरवाजिब नहीं है किन्तु इन पांच फीसदी लोगों की आड़ लेकर पिचानबे फीसदी लोगों को जानकारी से वंचित किया जा रहा है, यह भी सच है। मुझे लगता है कि इस कानून का उपयोग करने से यदि कोई आपको खलनायक मान कर चलता है तो चले लेकिन आप अपने अधिकार का उपयोग करना नहीं भूलें। इसके लिये यह भी जरूरी है कि आप कानून का अध्ययन कर लें और उन बारीकियों को समझ लें जिससे आपको इस कानून के उपयोग में सुविधा होगी।


लेखक
मनोज कुमार
k.manojnews@gmail.com

‘पीपुल्स हीरो’ सुपर-30 के आनंद कुमार बने

आईआईटी संयुक्त प्रवेश परीक्षाओं के लिये कोचिंग मुहैया कराने वाले सुपर-30 के संस्थापक आनंद कुमार को ‘पीपुल’ पत्रिका ने ‘पीपुल्स हीरो’ चुना है.

एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि टाइम पत्रिका समूह की पीपुल पत्रिका ने अपने भारतीय संस्करण में आनंद पर एक विस्तृत फीचर प्रकाशित किया है और ‘पीपुल्स हीरो’ की सूची में शामिल किया है.

आमतौर पर यह पत्रिका फिल्म और अन्य क्षेत्रों के नामचीन सितारों की खबरें छापती हैं लेकिन इस बार उसने शिक्षा के पेशे से जुड़े व्यक्ति को चुना है.
पत्रिका ने कहा, ‘आनंद ने यह अपने बूते किया है जो उल्लेखनीय है.’

विज्ञप्ति में आनंद के हवाले से कहा गया है, ‘पीपुल में जगह पाकर बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं. मैं कोई नामचीन सितारा नहीं हूं. मैं बस एक आम इंसान हूं.’

जापान में 'ग्लोबल 30'  - भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराने वाले चर्चित संस्थान पटना के 'सुपर 30' की तर्ज पर जापान स्थित टोक्यो विश्वविद्यालय ने 'ग्लोबल 30' संचालित करने की योजना बनाई है। इसमें सुपर 30 से एक विद्यार्थी का चयन किया जाएगा, जिसका पूरा खर्च टोक्यो विश्वविद्यालय उठाएगा।

'सुपर 30' को नजदीक से देखने और समझने पटना आए टोक्यो विश्वविद्यालय के इंडिया ऑपरेशन प्रमुख हिरोसी योसीनो ने पत्रकारों को बताया कि 'सुपर 30' के संचालक और गणितज्ञ आनंद कुमार जापान में युवाओं के रोल मॉडल हैं।

ऐसे में वहां के गरीब छात्रों को पढ़ाई के लिए टोक्यो विश्वविद्यालय 'ग्लोबल 30' कार्यक्रम प्रारम्भ कर रहा है। उन्होंने बताया कि मैंने आनंद से मिलकर 'सुपर 30' की रूपरेखा और पढ़ाई के विषय में जानकारी प्राप्त की है। आनंद की जीवनी विश्वविद्यालय के पाठ्य पुस्तकों में भी सम्मिलित किया गया है।