अमेरिका ने क्‍यूं कहा, ''आओ नरेंद्र मोदी''

नरेंद्र मोदी के लिए बेहद गर्व की बात है कि अमेरिका ने उनको वीजा आवेदन पत्र दाखिल करने की अनुमति दे दी है, जो कि 2002 गुजरात दंगों के बाद से प्रतिबंधित थी। अमेरिका का नरेंद्र मोदी के प्रति नरम होना, नरेंद्र मोदी एवं भाजपा के लिए सुखद है, वहीं कांग्रेस के लिए बेहद दुखद। इसको भाजपा सत्‍य की जीत कहेगी। अमेरिका ने ऐसे ही नरेंद्र मोदी के लिए अमेरिका के प्रवेश द्वार नहीं खोले, अमेरिका में चुनावी माहौल है, वहां पर बहुत सारे हिन्‍दुस्‍तानी बसते हैं, जो सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी की वाह वाही से प्रभावित हैं, और उसके दीवाने हैं।

क्‍यूं का दूसरा अहम कारण, नरेंद्र मोदी का निरंतर बढ़ता राजनैतिक कद। अमेरिका को आज से दस साल पूर्व यह आभास न था कि नरेंद्र मोदी एक दिन इतना बड़ा ब्रांड बन जाएगा, जो उसके फैसलों को बदलने की क्षमता रखता हो। आज नरेंद्र मोदी भारत में सबसे ज्‍यादा चर्चा का विषय। देश में इस बात की चर्चा नहीं कि भाजपा केंद्र में आए, चर्चा तो इस बात की चल रही है कि नरेंद्र मोदी होंगे अगले प्रधान मंत्री। एक नेता जब पार्टी से ऊपर अपनी पहचान बना ले, तो किसी को भी रुक का सोचना पड़ सकता है, अमेरिका तो फिर भी अवसरवादी कौम है।

पिछले दस सालों में मोदी ने गुजरात को नक्‍शे पर लाने के लिए प्रयत्‍न किए, लेकिन गुजरात के विकास ने नरेंद्र मोदी को ब्रांड बना दिया। गुजरात में भाजपा वर्सेस कांग्रेस नहीं, बल्‍कि कांग्रेस वर्सेस नरेंद्र मोदी है। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में अपना प्रभुत्‍व बनाए रखा है। अपने व्‍यक्‍ितत्‍व का विकास किया, इससे गुजरात का वास्‍तविकता में विकास हुआ या नहीं, यह लम्‍बी चर्चा का विषय है। अगर लोग कहते हैं कि गुजरात में उतना विकास नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था, तो एक सवाल यह भी पैदा होता है कि देश को आजाद हुए सात दशक हो चले, भारत में कितना विकास हुआ है।

गुजरात के विकास में कुछ तो असलियत होगी, जो नरेंद्र मोदी पर ब्रिटेन का रुख बदला। दस साल का बॉयकाट खत्‍म कर ब्रिटेन मोदी से हाथ मिलाने लगा। भाजपा की मीटिंगों में चर्चा होती है तो बात सामने निकल कर आती है कि अगर मोदी को पीएम उम्‍मीदवार के लिए प्रोजेक्‍ट करते हैं तो दूसरे सारे मुद्दे गौण हो जाएंगे। न चाहते हुए भी भाजपा को नरेंद्र मोदी को प्रोमोट करना पड़ सकता है, क्‍यूंकि अब भाजपा के नेता विपक्ष में बैठ बैठ उब गए हैं। नरेंद्र मोदी तो फिर भी सत्ता सम्‍हाले हुए है, चाहे एक राज्‍य की ही क्‍यूं न हो।

अगर भाजपा के आशावादी नेता चाहते हैं कि भाजपा सत्ता में आए तो नरेंद्र मोदी को पीएम उम्‍मीदवार प्रोजेक्‍ट करना पड़ेगा, क्‍यूंकि वक्‍त मोदी का साथ दे रहा है, और वक्‍त से बलवान कोई नहीं। वैसे भी दुनिया अवसरवादियों से भरी पड़ी है। अमेरिका भी तो अवसरवादी है, वरना दस साल पहले लगाए नरेंद्र मोदी के प्रतिबंध को पीछे नहीं हटाता।

जसपाल भट्टी वन मैन आर्मी अगेंस्ट करप्शन

जसपाल भट्टी को कॉमेडी किंग भी कहा जाता रहा है और वे भारतीय टेलीविजन और सिने जगत का एक जाना-पहचाना नाम रहे हैं। भट्टी को आम-आदमी को दिन-प्रतिदिन होने वाली परेशानियों को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करने के लिए जाना जाता रहेगा। उनका जन्म 3 मार्च 1955 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। उनकी पत्नी, सविता भट्टी हमेशा उनके कार्यों में उनका सहयोग करती थी। दूरदर्शन पर प्रसारित उनके सबसे लोकप्रिय शो – फ्लॉप शो में उनकी पत्नी सविता भट्टी ने अभिनय करने के साथ ही उसका प्रोडक्शन भी किया।

भट्टी ने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री ली लेकिन उनका मन इंजीनियिंग में नहीं रमा और वे धीरे-धीरे हास्य-व्यंग्य और कार्टून की दुनिया में रमने लगे। कॉलेज के दिनों में ही वे अपने नुक्कड़ नाटकों से लोगों में काफी लोकप्रिय हो गए थे। फिल्मों एवं टेलीविजन की दुनिया में आने से पहले वे ट्रिब्यून में कार्टून बनाते थे। कार्टूनों के माध्यम से वे व्यवस्था में मौजूद खामियों को बखूबी उजागर करते थे, जनता उनके कार्टूनों को बहुत पसंद करती थी और चटकारे लेकर पढ़ती थी।

भट्टी की मौजूदगी से फिल्मों एवं टेलीविजन सीरियलों में जान सी आ जाती थी। उन्होंने विभिन्न धारावाहिकों में जज की भी भूमिका निभाई और अपनी जीवंत भूमिका से लोगों को हंसा-हंसा कर लोट-पोट कर दिया। वे हमेशा अपने कार्टून और फिल्मों में समकालीन मुद्दों को उठाते थे और भ्रष्ट व्यवस्था तथा नेताओं को अपना निशाना बनाते थे।

दूरदर्शन पर 1980 और 90 में जसपाल भट्टी के कार्यक्रम फ्लॉप शो और उल्टा पुल्टा काफी लोकप्रिय हुए।

1999 में उन्होंने ‘माहौल ठीक है’ नाम से पंजाबी फिल्म बनाई जो पंजाब के भ्रष्ट पुलिस-व्यवस्था पर प्रहार करती थी। इस फिल्म पर, उस समय प्रतिबंध लगाने की भी मांग उठी थी क्योंकि फिल्म में पुलिस को शराबी और भ्रष्ट बताया गया था, फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वालों की दलील यह थी कि फिल्म से पुलिस के बारे में लोगों को गलत संदेश जाएगा।

दिल्ली में अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भट्टी ने अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई थी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए लोगों का उत्साहवर्द्धन किया था। इसके पहले भी वे पंजाब एवं देश के विभिन्न प्रांतों में समय-समय पर सरकार के खिलाफ आम-आदमी को हो रही समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतरे और सभी का ध्यान खींचने में कामयाबी पाई थी। उन्होंने मुद्रास्पीति की ओर ध्यान खींचने के लिए चंड़ीगढ़ में एक स्टॉल खोला था जहां खाने-पीने की चीजों को जार में रखा गया था और लोगों से अपील की गई थी कि वे जार पर रिंग फेंके और ईनाम में खाने-पीने की चीजें जीतकर अपनी पत्नी को खुश करें। तो व्यवस्था पर चोट करने का ऐसा उनका तरीका था।

अभी शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012 को उनकी फिल्म ‘पावर कट’ रीलिज होने वाली है जो पंजाब में बिजली संकट को लेकर है। ‘कॉमेडी किंग’ के नाम से मशहूर भट्टी की मौत बुधवार को एक सड़क हादसे में हो गई। पावर कट’ का निर्माण भट्टी ने अपने प्रोडक्शन हाउस, मैड आर्ट स्टूडियो के बैनर तले किया है। आज 25 अक्टूबर 2012 को शाम 5 बजे उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा। देश-विदेश के महत्वपूर्ण लोग नम आंखों से कॉमेडी किंग को अंतिम विदाई दे रहे हैं।

भट्टी को ऐसे कलाकार के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा जो लोगों को गम में भी हंसाते थे और हंसी-हंसी में ही भ्रष्ट व्यवस्था पर चोट कर जाते थे।

जसपाल भट्टी ने ‘जिलाजी’, ‘माहौल ठीक है’, ‘चक दे फट्टे’, ‘जानम समाझा करो’, ‘फना’, ‘धरती’ के अलावा कई फिल्में बनाई और उनमें काम किया है।

एक्सचेंज4मीडिया की साप्ताहिक पत्रिका इंपैक्ट के सलाहकार संपादक और इसी समूह की पत्रिका रियल्टी प्लस के संपादक, विनोद बहल ने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में अपने सहपाठी जसपाल भट्टी के साथ अपनी पुरानी यादों को समाचार4मीडिया.कॉम के साथ साझा करते हुए कहा कि वे एक अच्छे इंसान थे और आम-आदमी को हेने वाली कठिनाईयों को बड़े ही निराले अंदाज में पेश करते थे। कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने नॉनसेंस क्लब नाम से एक समूह बनाया था और इसके माध्यम से वे नाटकों का मंचन करते थे। अपने नाटकों में वे भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और नौकशाहों को निशाना बनाते थे। वे शुरुआत से ही सामाजिक मुद्दों को लेकर दिल से समर्पित थे। और दूरदर्शन पर छोटे-छोटे शो किया करते थे, जिसकी कारण लोगों में उनकी प्रसिद्धि हो चुकी थी औऱ यही कारण है कि वे इसके साथ आगे भी काम करते रहे। क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर हमें अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचानी है तो दूरदर्शन अच्छा माध्यम है। बहल ने बताया कि फ्लॉप शो के निर्माण के दौरान उनके प्रोडक्शन हाउस से भी जुड़े हुए थे। भट्टी अपनी फिल्मों के निर्माण से लेकर निर्देशन और प्रचार का एक-एक काम खुद करते थे। यहां तक कि वे पोस्ट प्रोडक्शन का काम भी देखते थे। वे पूरी तरह से अपने कार्य के प्रति ईमानदार और समर्पित थे। जसपाल भट्टी वे आम-आदमी से जुड़े मुद्दों को बड़ी ही शिद्दत के साथ उठाते थे।

उनकी ईमानदार छवि के कारण ही पंजाब में चुनाव आयोग ने उन्हें अपना आइकॉन चुना था। भट्टी के अनुसार, दूरदर्शन पर उनके शो को ज्यादा एक्सटेंशन नहीं मिला और इसका कारण उनकी ईमानदार छवि रहा है। आखिर उनसे पैसे मांगने की जुर्रत कौन करता और नतीजा यह हुआ कि उनके शो को ज्यादा एक्सटेंशन नहीं मिला।

फिल्मों में भट्टी ज्यादा नहीं चल सके?

फिल्मों में भट्टी के नहीं चलने के कारणों के बारे में बहल ने कहा कि एक-दो फिल्मों को छोड़कर उन्हें छोटी-छोटी भूमिकायें ही मिली। जहां तक मुझे याद है आ अब लौट चलें में उन्हें अच्छी भूमिका दी गई थी और उन्होंने इसके साथ पूरा न्याय किया।

रीयल लाइफ और रील लाइफ में एक जैसे

बहल ने आगे कहा कि मेरा उनके घर चंडीगढ़ में बराबर आना-जाना होता था। एक बार की बात है जब मैं उनके घर गया था तो किसी ने कहा कि बुखार जैसा हो गया है तो उन्होंने पलक झपकते ही कहा कि दवाई जैसी कोई चीज ले लो। कहने का मतलब कि वो बहुत हाजिर जवाब थे। वे हर बात अलग हटकर करना चाहते थे।

इसी तरह की एक घटना याद करते हुए उन्होंने कहा कि ‘माहौल ठीक है’ का प्रीमियम भट्टी ने तिहाड़ जेल में किय़ा था, जिसे वहां के कैदियों और प्रशासन ने काफी सराहा था। वे सभी लोगों में लोकप्रिय थे। भट्टी ने कलाकारों को प्रमोट करने में सराहनीय भूमिका निभाई। वे अपनी फिल्मों और सीरियलों में छोटे-छोटे कलाकारों से काम करवाते और उन्हें प्रमोट करते थे। अपनी पत्नी को भी उन्होंने एक्टिंग सिखाई, वो इस क्षेत्र से बिल्कुल अंजान थी।

भट्टी किसी को भी नहीं बख्शते थे। यहां तक कि मीडिया को भी नहीं। एक शो में उन्होंने मीडिया पर कटाक्ष करते हुए दिखाया था कि किस तरह से मीडिया के लोग रात की पार्टी में जाते हैं। शो में उन्होंने दिखाया कि एक मीडिया कर्मी के हाथ में प्रेस रीलिज है और वह पार्टी में खाने के लिए बैरा से चिकेन मांग रहा है, जब वो लौट कर आया और कहा कि चिकन खत्म हो गया है तो मीडिया कर्मी ने प्रेस रीलिज को कूड़ेदान में फेंक दिया। इस तरह से मीडिया में किस तरह पार्टीबाजी होती है इसका विशेष उल्लेख उन्होंने अपने शो में किया। भट्टी दो साल पहले अपने साथी विवेक शॉ जो कि फिल्मों में काम करने लगे थे कि अचानक मृत्यु से काफी दु:खी रहा करते थे। किसको पता था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वन मैन आर्मी (भट्टी अगेंस्ट करप्शन) कहा जाने वाला भट्टी अचानक हम सबको छोड़कर इतनी चला जाएगा। विश्वास नहीं होता है।

हरेश कुमार, वरिष्ठ संवाददाता, 
समाचार4मीडिया.कॉम की कलम से    









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नक्सलवाद की जड़ों को गंभीरता से टटोलता है `चक्रव्यूह`

देश के आज जो हालात हैं, उनके अनुसार प्रकाश झा की चक्रव्‍यूह बिल्‍कुल सत्‍य साबित होती है। प्रकाश झा ने सही समय पर एक सही फिल्‍म का निर्माण किया है। देश के प्रधान मंत्री भी नक्‍सलवाद को बहुत जटिल समस्‍या मानते हैं, लेकिन सरकार इस को लेकर कितना गम्‍भीर है, इसको दिखाने की कोशिश प्रकाश झा करते हुए नजर आए। इस फिल्‍म का अंत दुखद है, लेकिन सोचनीय है।

ठोस कहानी, शानदार अभिनय और सुलगता मुद्दा प्रकाश झा के सिनेमा की खासियत है और यही बातें ‘चक्रव्यूह’ में भी देखने को मिलती है। दामुल से लेकर मृत्युदण्ड तक के सिनेमा में बतौर निर्देशक प्रकाश झा का अलग अंदाज देखने को मिलता है। इन फिल्मों में आम आदमी के लिए कुछ नहीं था।

गंगाजल से प्रकाश झा ने कहानी कहने का अपना अंदाज बदला। बड़े स्टार लिए, फिल्म में मनोरंजन को अहमियत दी ताकि उनकी बात ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंच सके। इससे प्रकाश झा की फिल्‍म को लेकर आम सिने प्रेमी के दिल में उत्‍सुकता बढ़ी, जो बेहद जरूरी है।

चक्रव्यूह में पुलिस, राजनेता, पूंजीवादी और माओवादी सभी के पक्ष को रखने की कोशिश प्रकाश झा ने की है। फिल्म किसी निर्णय तक नहीं पहुंचती है, लेकिन दर्शकों तक वे ये बात पहुंचाने में सफल रहे हैं कि किस तरह ये लोग अपने हित साधने में लगे हुए हैं एवं इस जदोजहद में एक आम व्‍यक्‍ति पिस रहा है।

गंभीर मसले होने के बावजूद भी प्रकाश झा ने ‘चक्रव्यूह’ को डॉक्यूमेंट्री नहीं बनने दिया है। भले ही तकनीकी रूप से फिल्म स्तरीय नहीं हो, लेकिन ड्रामा बेहद मजबूत है। उन्‍होंने अपने कलाकारों से उम्‍दा अभिनय करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कबीर के रूप में अभय देओल का अभिनय प्रशंसनीय है। जूही के रूप में अं‍जलि पाटिल ने आक्रोश को बेहतरीन तरीके से अभिव्यक्त किया है। मनोज बाजपेयी, ओम पुरी, कबीर बेदी, चेतन पंडित, मुरली शर्मा, किरण करमरकर ने अपने-अपने रोल में प्रभाव छोड़ा है।

चक्रव्यूह हमें सोचने पर मजबूर करती है, बताती है कि हमारे देश में एक गृहयुद्ध चल रहा है। हमारे ही लोग आमने-सामने हैं। यदि समय रहते इसका समाधान नहीं हुआ तो स्थिति विकराल हो जाएगी।

अगर अर्जुन रामपाल की जगह प्रकाश झा ने जिम्‍मी शेरगिल या किसी और अभिनेता को लिया होता तो शायद यह रोल और दमदार हो सकता था। फिल्‍म में किरदारों की संख्‍या कम रखनी चाहिए थी।

नक्सलवाद की जड़ों को गंभीरता से टटोलता है `चक्रव्यूह`

यश चोपड़ा का देहांत, ''जब तक है जान'' आखिरी फिल्‍म

प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा का 80 साल की उम्र में मुंबई में देहांत हो गया है। उन्हें डेंगू से पीड़ित होने के बाद लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा नहीं रहे। लीलावती अस्पताल में रविवार को उनका निधन हो गया है। वो पिछले 9 दिनों से लीलावती अस्पताल में भर्ती थे। यश चोपड़ा डेंगू से पीड़ित थे। उम्मीद की जा रही थी कि वो जिल्दी जल्दी ठीक होकर घर लौट जाएंगे लेकिन अब यश चोपड़ा नहीं रहे।

यश चोपड़ा ने बॉलीवुड का प्रतिष्ठित बैनर यशराज फ़िल्म की नींव रखी थी। यश चोपड़ा ने कई मल्टी स्टारर फ़िल्में बनाईं। यश चोपड़ा के परिवार में पत्नी पामेला चोपड़ा एवं दो लड़के आदित्य एवं उदय हैं। यश चोपड़ा 'जब तक है जान' की शूटिंग में व्यस्त थे। स्वास्थ्य खराब होने के कारण फिल्म की शूटिंग के कुछ हिस्सों की शूटिंग को रोक दिया गया था।

उन्होंने इस फिल्म के साथ ही फिल्म निर्माण से संन्यास की घोषणा कर दी थी। को उनकी फिल्म 'दाग', 'दीवार', 'चांदनी', 'वक्त', 'सिलसिला' और 'दिल तो पागल है' जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है।

खुर्शीद और कांग्रेसी ता ता थैय्या

वाकई, अब तो यकीन हो गया है कि कांग्रेस महासचिव दि‍ग्विजय सिंह की दिमागी हालत ठीक नहीं है. उन्हें स्पेशल ट्रीटमेंट दिए जाने की दरकार है. वे कहते हैं कि सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी ने शालीनता से  सारे सवालों का जवाब दे दिया है ऐसे में खुर्शीद के खिलाफ कुछ करने को बचता ही नहीं है. गलत केजरीवाल हैं खुर्शीद नहीं. (लाल रंग के शब्दों पर ख़ास ध्यान दें.)

इसी को कहते हैं, पहले चोरी फिर सीना ज़ोरी. चोरों को यह ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि अब माना बदल गया है. अब 'सीसीटीवी कैमरा' है, जो चोर को पकड़वाने में बड़ा मददगार है. पर... चोर हैं कि पुराने ढर्रे पर चोरी किए चले जा रहे हैं. सिनेमा भी नहीं देखते. धूम और धूम 2 देखी होती तो चोरी का कोई नया तरीका इज़ाद करते. खैर..

हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है. इसमें कहा गया है कि डॉ. ज़ाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट ने ऐसे गांवों में भी कैंप लगा दिए जो वास्तव में हैं ही नहीं. वाह क्या बात है.

यहां दो संभावनाएं नज़र आती हैं -

एक संभावना यह है कि वे गांव हैं और भारत सरकार अभी तक उन तक पहुंच नहीं पाई है, उन्हें पहचान नहीं पाई है. हो सकता है कि सलमान जी का ट्रस्ट वहां पहुंच गया हो. अगर ऐसा है तो फिर वह सूची भी सच्ची है, जिसमें ऐसे नाम हैं, जिनका कोई वजूद नहीं होने की बात कही जा रही है. फिर तो सलमान खुर्शीद साहब ने बड़ा ही नेक काम किया है. ख़ुदा ने उनके लिए ज़न्नत में एक सीट अभी से तय कर दी होगी. पर इस संभावना में कोई संभावना नज़र नहीं आती.

दूसरी और ज़्यादा विश्वसनीय संभावना यह है कि गांव है ही नहीं. अगर गांव हैं ही नहीं और वे लोग भी नहीं हैं, जिन्हें लाभ दिए जाने की बात कही जा रही है तो फिर कांग्रेसी महासचिव और पार्टी के बाकी नेता अरविंद केजरीवाल को झूठा कैसे कह रहे हैं. आरोपों को नकार देने से ही अपराध मुक्त नहीं हुआ जा सकता. कांग्रेस के सभी बड़े नेता खुर्शीद का पक्ष ले चुके हैं. अब दिग्गी भला क्यों पीछे रहें. चलो, इनके बयान का इंतज़ार था, सो आ गया. कांग्रेसी लोग सिर्फ केजरीवाल को ही झूठा नहीं बता रहे, बल्कि मीडिया, अफसरों और तमाम उन विकलांगों को भी झूठा बता रहे हैं, जो सलमान खुर्शीद और उनके ट्रस्ट के खिलाफ़ खड़े हैं. या मैं कहूं कि कांग्रेसी सच को झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं. और यदि सलमान खुर्शीद सच झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं तो अल्लाह तआला ने जहन्नम में खुर्शीद साहब की सीट का अरेंजमेंट करवा दिया होगा. उनके लिए अलग ख़ास किस्म के अज़ाब (ट्रीटमेंट) तैयार करवा रहे होंगे. अलग ख़ास किस्म का इसलिए क्योंकि विकलांगों का हक़ खा जाना भी एक तरह का अलग अपराध है.

तो दोस्तो आपकी कौन सी संभावना प्रबल नज़र आती है?
एक छोटी सी बात और. इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा तो 70 लाख को बहुत कम रकम मानते हैं. पर मैं एक छोटा सा कैलकुलेशन बताना चाहता हूं. मान लो एक आम आदमी एक महीने में 20 हज़ार रुपए कमाता है. साल भर में कमाएगा 20 हज़ार गुणा 12. मतलब 2 लाख 40 हजार. अब सत्तर लाख कमाने में उसे कितने साल लगेंगे? कम से कम 29 साल. मतलब एक आदमी अगर 20 साल की उम्र में कमाना शुरू कर दे तो 50 साल का होकर 70 लाख रु कमा चुका होगा. इस महंगाई में अगर वह 10 हज़ार रुपए महीना भी बचा ले तो वह 50 साल की उम्र तक 30 लाख रुपए बचा पाएगा. 30 लाख में एक घर खरीदना भी संभव नहीं है. तो बेनी साहब को यह गणित क्यों समझ में नहीं आता?? अरे हां, समझ में कैसे आएगा, कभी आम आदमी की तरह संघर्ष किया हो तो समझ में आए. माइंड इट.

यह लेख मलखान सिंह, जो कि उम्‍दा ब्‍लॉगर हैं, और रफ्तार डॉट कॉम में कार्यरत हैं, द्वारा लिखा गया है, इस को युवा सोच युवा खयालात  प्रबंधन ने  उनके दुनाली ब्‍लॉग से लिया है, जोकि नवभारत टाइम्‍स पर संचालित है। 


नवरात्री : मां दुर्गा के साथ बरसेगी हनुमानजी की कृपा!

34 वर्ष बाद नवरात्रि पर अद्भुत संयोग बन रहा है। इसके बाद ये अद्भुत संयोग 27 वर्ष बाद ही बनेगा। इसलिए इस शारदीय नवरात्री में खुशियां ही खुशियां होंगी।

इस बार नवरात्री मंगलवार से शुरू होकर मंगलवार को ही पूरे होंगे। यह संयोग 34 वर्ष पूर्व 1978 में बना था। भविष्य में 27 वर्ष बाद 2039 में यह संयोग बनेगा। हालांकि इस बार 9 दिन की बजाए 8 दिन ही मां भगवती की आराधना होगी।

मंगलवार को नवरात्र के मंगल कलश की स्थापना होगी और 23 अक्टूबर मंगलवार के दिन ही नवरात्र पूर्ण हो जाएंगे।

इस बार भी मंगल अपनी ही राशि वृश्चिक राशि में रहेगा इसलिए मंगल को बल मिलेगा। मंगल प्रबल होने से मंगल ही मंगल होगा।

इस योग में मातारानी की विशेष कृपा तो होगी ही साथ ही हनुमानजी की भी कृपादृष्टि होगी।

हिन्‍दी डॉट इन डॉट कॉम के साभार से

“Engलिश ग्रंथि से ग्रसित हिन्‍दी फिल्‍म”

फिल्‍म “इंग्‍लिश-विंग्‍लिश” का नाम सुनते ही ऐसा लगता है, मानों फिल्‍म की कहानी समाज में छाए अंग्रेजी के जादुई छद्म प्रभाव को कुछ हद तक कम करने वाली और इंग्‍लिश नहीं जानने वालों की हीनग्रंथि में आत्‍मविश्‍वास का रस घोलने वाली होगी, लेकिन इस फिल्‍म को देखने के बाद पता चलता है कि यह फिल्‍म इंग्‍लिश नहीं जानने वालों को बडी ही कुशल संवेदना के साथ उनकी औकात दिखा देती है, वहीं चालाकी के साथ अंग्रेजी सीखने के लिए मन में हवा भी भर देती है.

व“इंग्‍लिश-विंग्‍लिश” देखने में बडी ही बढिया, शानदार और मनोरंजन प्रधान पारवारिक फिल्‍म है. इसका स्‍वस्‍थ परिवेश किसी भी दर्शक को बडी कुशलता के साथ अंग्रेजी सीखने के लिए ललचा सकता है, इस बात को ध्‍यान में रखते हुए कि अंग्रेजी नहीं सीखने पर इस बाजारवादी समाज में उसकी हालत, घबराई, डरी, सहमी और सबसे छिपती-फिरती “शशि” की तरह ही हो सकती है. दरअसल, यह फिल्म पूंजीवादी मानसिकता से ग्रसित एक ऐसी फिल्‍म है, जिसमें अंग्रेजी को हमारे परिवेश में रिश्‍तों की अहमियत, आपसी स्‍नेह, सम्‍मान और आत्‍मीयता का नया मानक बनाकर उभारा गया है.

फिल्‍म में “शशि” उर्फ श्रीदेवी जब अपनी बेटी के स्‍कूल में फादर से हिन्‍दी में बात करने की अपील करती है तो उसकी दस साल की बेटी बेहद शर्मिंदा महूसस करती है. मां के इंग्‍लिश नहीं जानने से ग्‍लानी से भरी, झेंपती हुई बेटी स्‍कूल से घर आते-आते तक अपनी मां को इतना नीचा दिखा देती है कि मां अपने ही घर में घबराई, तिरस्‍कृत और अपमानित महसूस करने लगती है. फिल्‍म के कई छोटे-छोटे दृश्‍यों के बीच यह पहला पूर्ण दृश्‍य है जहां दर्शक यह समझ जाता है कि शशि की हालत अंग्रेजी न जानने के चलते उसके ही घर में वैसी है, जो इस समय शहरों-महानगरों में कस्‍बे, गांवों से आकर बसे हिन्‍दी भाषी समाज की हो रही है.

कमाल की बात है कि फिल्‍म में “हिन्‍दी” बोलने वाले दर्शकों की जेब से पैसा निकालकर अपनी आर्थिक गाडी चलाने वाले अंग्रेजी समाज ने “हिन्‍दी-भाषा” को ही “शशि” के प्रतीक रूप में दया का ऐसा पात्र बनाकर छोड दिया है जिसके पास अंग्रेजी सीखने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं है. फिल्‍म में कहीं भी मां को उसके बच्‍चों, पति और रिश्‍तेदारों द्वारा यह समझाने की कोशिश नहीं की जाती कि अंग्रेजी भाषा जानना इस बाजारवादी समाज में जीने का आखिरी रास्‍ता नहीं है. हवाई-जहाज के एक दृश्‍य में सदी के महानायक शशि को मिलते भी हैं तो बेफिक्र, बेशर्म होकर अपने पहले अनुभव का मजा लेने की राय देते हैं.

फिर निर्देशक के इशारों पर नाचती फिल्‍म में शुरू होता है शशि के अंग्रेजी सीखने का अभियान, जो यह बताता है कि अब केवल अंग्रेजी जानना ही उसके पास आखिरी विकल्‍प रह गया है, वरना हिन्‍दी के रहते तो घर में उसे उसके बच्‍चों, पति से बार-बार तिरस्‍कार, अपमान, उपेक्षा के घूंट पीने पडेंगे, बिना अंग्रेजी के उसका मानों कोई वजूद ही नहीं है.

मराठी संस्‍कारों में पलने वाली, हिन्‍दी में बात करने वाली शशि अपने बच्‍चों की हिकारत, उपेक्षा से बचने व सम्‍मान पाने के लिए इंग्‍लिश से जूझती है, मन में इंग्‍लिश को विंग्‍लिश कहते हुए कोसती भी है, और एक कॉफी की शॉप में बुरी तरह बेइज्‍जत होने के बाद आखिरकार अंग्रेजी सीखने के लिए क्‍लास जाती है, भाषा से प्रेम के लिए नहीं, बल्‍कि उस डर, अपमान से बचने के लिए जो उसे घर से मिल रहा है. अंग्रेजी का जादू भी फिर इस कदर चढता है कि लड्डु बनाने वाली शशि जब अंग्रेजी क्‍लास में “इंटरप्रोनोयर” शब्‍द सीखती है तो मानों उसके अंदर आत्‍मविश्‍वास की नदियां बहने लगती है, और उसे उसका वही लड्डु बनाने का काम एक कारखाना चलाने जैसा दिखाई देने लगता है. यह सब कुछ ऐसा ही है मानों पता नहीं “हिन्‍दी” समाज उसे लड्डु बनाने के रूप में कौन सा काम करवा रहा था. जाहिर है यह सब अप्रत्‍यक्ष रूप से अंग्रेजी का वही भाषाई मोनापॉली मैसेज है जिसका सामना देश का हिन्‍दी समाज शुरू से करता आ रहा है और अब इस देश का बेरोजगार युवा कर रहा है क्‍योंकि नौकरी देने वाली भाषा और वर्ग दोनों अंग्रेजी का हो चुका है.

पूरी फिल्‍म में इंग्‍लिश से खौफजदा और इस भाषा के तिलस्‍म से रचे गए समाज के तथाकथित विकास से कांपती आवाज में दो-दो हाथ करती “शशि” को उसकी बहन के यहां पति व बच्‍चों द्वारा न्‍यूयॉर्क भेज दिया जाता है, उसके बाद कि फिल्‍म यह सिखाती है कि अकेले विदेश जाने, वहां घूमने, वहां के रेस्‍तरां में कॉफी पीने और वहां के समाज में विचरण करने के लिए आपको अंग्रेजी आनी कितनी जरूरी है. दरअसल यहां “शशि” हिन्‍दी की वह मानसिकता है, जिसके आगे अंग्रेजी इतनी महान समस्‍या की तरह पैदा हो गई है कि गोया उसका आत्‍मसम्‍मान, संवेदनाएं, दुख, परिवार में उसकी पहचान, प्रतिष्‍ठा, बच्‍चों द्वारा मां को मां मानने का परमिट, पति का प्रेम व आकर्षण, यह सब कुछ उसे अब केवल अंग्रेजी से ही मिल सकता है, और जाहिर है पति और बच्‍चे भी तभी ही देंगे जब वह अंग्रेजी सीख जाएगी. बाकी, हिन्‍दी में तो यह सब असभ्‍य, असंस्‍कृत और अशिक्षित समाज का विलाप भर ही है. यही वजह है निर्देशक ने बडी कुशलता से यह सारा खेल ऐसे रच दिया की शशि अंग्रेजी सीखकर, बोलकर ही बदल पाई, और उसके बच्‍चों व पति का उसके प्रति नजरिया भी, बाकी तो हमारे हिन्‍दी समाज में कुछ बचा ही नहीं था, भले ही फिल्‍म हिन्‍दी थी, दर्शक हिन्‍दी थे.
 
बहरहाल, इस फिल्‍म को देखने वालों में कुछ इसे एक फिल्‍म की तरह देखेंगे, दूसरे इंग्‍लिश जानने वाले इसे देखकर खुदको बेहतर महसूस करेंगे, वे अंग्रेजी को इस समय की सबसे महान जरूरत बताएंगे, क्‍योंकि उनके लिए तो फ्रेंच, चीनी, पाकिस्‍तानी, स्‍पैनिश, पारंपरिक दक्षिण-भारतीय सारे लोग शशि के साथ अंग्रेजी सीख रहे हैं. दूसरे बेचारे एक वृहद हिन्‍दी समाज से आएंगे, जिनमें में से एक मैं भी हूं, जो मन में सालों से इंग्‍लिश सीखने वाली ग्रंथि पाले, इसे सीखकर इस समाज में इज्‍जत से जीने का परमिट ढूंढ रहे थे, अब हैं कि नौकरी ढूंढ रहे हैं जो अंग्रेजी समाज ही दे सकता है. ठीक वैसे ही जैसे फिल्‍म की सफलता हिन्‍दी की विशालता में नहीं, बल्‍कि अंग्रेजी सीखने की महान जरूरत में छिपी हुई थी, जिसे इंग्‍लिश-विंग्‍लिश के साथ एसोसिएट हुआ “टाटा-स्‍काई” घर-घर पहुंचाने वाला था.