'थप्‍पड़ कांड' के बाद शिरिष कुंदर का 'जोकर'

दस करोड़ में बनी 'जानेमन' ने बॉक्‍स ऑफिस पर लगभग 50 करोड़ का क्‍लेक्‍शन किया। फिल्‍म का गीत 'हम को मालूम है' बेहद लोकप्रिय हुआ, मगर अफसोस की बात कि फिल्‍म निर्देशक को सिने प्रेमियों ने याद ही नहीं रखा। इतना ही नहीं, उन को अपनी दूसरी फिल्‍म निर्देशित करने के लिए भी करीबन छह साल लग गए, जो बेहद हैरत वाली बात है।

जानेमन के बाद जब शिरिष कुंदर ने अपनी जोकर के लिए शाहरुख खान से बातचीत की तो उन्‍होंने मना कर दिया, जो फरहा खान, जो शिरिष की पत्‍नी हैं, के अच्‍छे दोस्‍त हैं, कई फिल्‍में एक साथ भी की। फिल्‍म शिरिष कुंदर अक्षय कुमार के पास पहुंचे, तो उन्‍होंने भी मना कर दिया, क्‍यूंकि जानेमन में अंतरिक्ष विज्ञानी बनकर भी वो कुछ नहीं कमा पाए। फिर शिरिष कुंदर पहुंचे सैफ अली खान के दरवाजे पर, जिन्‍होंने रोल के लिए हां बोल दी, क्‍यूंकि करीना के प्‍यार ने उनको पहले से ही जोकर बना रखा था। फिर पता नहीं, कहानी में कब और कैसे टि्वस्‍ट आया कि सैफ ने मना कर दिया, और बाद में पता नहीं शिरिष कुंदर ने कौन सा पासा फेंक कर अक्षय कुमार को साइन कर लिया, जिन्‍होंने फरहा खान के साथ तीस मार खान की। जो सिने हाल में तो नहीं चली, लेकिन टेलीविजन प्रेमियों को बेहद अच्‍छी लग रही है।

अब जब बड़ी मुश्‍िकलों के बाद 'जोकर' बना कर रिलीज होने किनारे है, तो फिल्‍म का नायक व नायिका प्रमोशन नहीं कर रहे, वो नाराज चल रहे हैं, तो शिरिष कुंदर ने अपनी रडार सलमान खान की तरफ मोड़ दी, जो एक था टाइगर से सुर्खियां बटोर रहे हैं।

शिरिष कुंदर कह रहे हैं कि उनकी फिल्‍म जोकर में एलियन सलखान खान का बहुत बड़ा फैन है। इस फिल्‍म की पटकथा लेकर नायक की तलाश में शिरिष कुंदर पीछे चाल साल से घुम रहे हैं, लेकिन अब जब फिल्‍म बनकर रिलीज होने किनारे है तो अपने नायक को नाराज कर दिया, जिसने शिरिष कुंदर की फिल्‍म को उस समय साइन किया, जब शिरिष कुंदर के लिए सभी नायकों ने दरवाजे बंद कर दिए थे।

हो सकता है कि शिरिष कुंदर ने जो सीन अभी अभी पटकथा में मेंशन किया, उसी से फिल्‍म का नायक रूठ गया हो, क्‍यूंकि जब कोई किसी की काबलियत पर शक करता है तो सामने वाला बुरा मान ही जाता है, जब पूरी फिल्‍म में अक्षय कुमार नायक की भूमिका कर रहा है तो प्रमोशन के वक्‍त एक था टाइगर वाला नायक कैसे आ सकता है।


शिरिष कुंदर को निर्देशक के रूप में तो बहुत कम जानते हैं, लेकिन शाहरुख खान का थप्‍पड़ खाने वाले इस शख्‍स को सब पहचानते हैं। थप्‍पड़ कांड इतना फेमस हुआ था कि अमूल ने इसको अपना थीम बना लिया था। लोगों ने कहा था, कुंदर की अगली फिल्‍म का नाम होगा थप्‍पड़ की गूंज, मगर शिरिष की अगली फिल्‍म का नाम थप्‍पड़ की गूंज नहीं, किक्‍क है। काश! वो थप्‍पड़ कांड अब हुआ होता, जब शिरिष कुंदर की दूसरी फिल्‍म जोकर रिलीज हो रही है, प्रमोशन तो हो जाता।

देखते हैं 31 अगस्‍त को सिनेमा हॉल पर उतरने वाला शिरिष कुंदर का जोकर बाजी को जीतता है या हारता है।

किरदार ही नहीं एके हंगल का जीवन भी था आदर्श

जब पूरा परिवार अंग्रेजों के लिए नौकरी कर रहा था, तब एके हंगल साहेब ने अपने अंदर आजादी की ज्‍योति को प्रज्‍वलित किया। एके हंगल साहेब ने अंग्रेजों के रहमो कर्म पर पलने की बजाय, अपनी मेहनत की कमाई के चंद रुपयों पर जीवन बसर करना ज्‍यादा बेहतर समझा। उन्‍होंने कपड़ा सिलाई का काम सीखकर टेलरिंग का काम शुरू किया एवं साथ साथ रंगमंच से दिल लगा लिया। आजादी की लड़ाई में योगदान के लिए उनको पाकिस्‍तान की जेलों में करीबन दो साल तक रहना पड़ा।

वो रोजी रोटी के लिए मुम्‍बई आए। कहते हैं कि जब एके हंगल साहेब मुम्‍बई आए तो उनके पास केवल जीवन गुजारने के लिए बीस रुपए थे। यहां पर वो टेलरिंग के साथ साथ रंगमंच से जुड़े रहे। एक दिन उनके अभिनय ने स्व. बासु भट्टाचार्य का दिल मोह लिया, जिन्‍होंने उनको अपनी फिल्म तीसरी कसम में काम करने के लिए ऑफर दिया। इस फिल्‍म से ए के हंगल सफर ने रुपहले पर्दे की तरफ रुख किया, मगर वो फिल्‍मों में नहीं आना चाहते थे, लेकिन एक के बाद एक ऑफरों ने उनको वापिस लौटने नहीं दिया। उन्‍होंने अपने फिल्‍मी कैरियर में करीबन 255 फिल्‍मों में अभिनय किया। इसमें से करीबन 16 फिल्‍में उन्‍होंने बॉलीवुड के पहले सुपर स्‍टार स्‍वर्गीय राजेश खन्‍ना के साथ की।

एके हंगल साहेब ने जब फिल्‍म दुनिया में कदम रखा, तब उनकी उम्र करीबन चालीस के आस पास थी, इसलिए उनको पिता या बड़े भाई के रोल करने को मिलते थे, वो इस छवि को तोड़ना चाहते थे, मगर पूरी तरह असफल रहे। उन्‍होंने तीसरी कसम में राज कपूर के बड़े भाई का रोल किया तो दूसरी फिल्‍म गुड्डी में जय बच्‍चन के पिता बने। इसके बाद उन्‍होंने कई बेहतरीन फिल्‍मों में काम किया, जिनमें नमक हराम, बावर्ची, गुड्डी, अभिमान, शोले जैसी फिल्‍में शामिल हैं। उनके द्वारा फिल्‍म शोले में बोला गया संवाद, भाई इतना सन्‍नाटा क्‍यूं है, लोगों को आज भी याद है। उनके किरदारों में असलीपन होता था, क्‍यूंकि वो हर किरदार को चुनौती के रूप में लेते थे, वो किरदार की गहराई तक जाते थे, वो किरदार किस धर्म का है, किस क्षेत्र के व्‍यक्‍ित से जुड़ा हुआ है, हर पहलू पर निगाह रखते थे।

अंतिम समय एके हंगल साहेब मधुबाला नामक धारावाहिक में नजर आए, जो क्‍लर्स टीवी पर प्रसारित हो रहा है। 1 फरवरी 1917 को पैदा हुए एके हंगल की 13 अगस्त को बाथरूम में फिसल जाने से दाहिनी जांघ की हड्डी टूट गई थी, जिसके चलते उनको 16 अगस्त को सांताक्रूज स्थित अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां पर उन्‍होंने 26 अगस्‍त 2012 को अपनी अंतिम सांस ली। हिन्‍दी सिने जगत के इस आदर्श पुरुष को नमन।

अपनी आत्मकथा, 'द लाइफ एंड टाइम ऑफ एके हंगल' में हंगल साहेब ने अपनी जिन्‍दगी के कई अनछूहे पहलूओं पर प्रकाश डाला है।

प्‍यार की कोई उम्र नहीं होती 'शिरीं फरहाद'


बड़ी स्‍क्रीन पर अब तक हम युवा दिलों का मिलन देखते आए हैं, मगर पहली बार निर्देशिका बेला सहगल ने शिरीं फरहाद की तो निकली पड़ी के जरिए चालीस के प्‍यार की लव स्‍टोरी को बिग स्‍क्रीन पर उतारा है। इस फिल्‍म को लेकर फिल्‍म समीक्षकों में विरोधाभास नजर आता है, आप खुद नीचे देख सकते हैं, फिल्‍म एक मगर प्रतिक्रियाओं अनेक, और प्रतिक्रियाओं में जमीं आसमान का फर्क।

इस फिल्‍म के बारे में समीक्षा करते हुए मेरी ख़बर डॉट कॉम पर अमित सेन भोपाल से लिखते हैं कि एक अरसे बाद बॉलीवुड में चल रही द्विअर्थी संवाद के दौर में बेहतर कॉमेडी वाली फिल्म आई है, अगर आप अच्छी हल्की-फुल्की हेल्दी कॉमेडी फिल्म देखना चाह रहे हों तो यह फिल्म आपके लिए है।

वहीं दूसरी तरफ समय ताम्रकर इंदौर से हिन्‍दी वेबदुनिया डॉट कॉम फिल्‍म की समीक्षा करते हुए लिखते हैं कि निर्देशक के रूप में बेला सहगल का पहला प्रयास अच्छा है, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट के चलते वे चाहकर भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाईं। कई जगह हंसाने की असफल कोशिश साफ नजर आती है। बोमन ईरानी ने फरहाद के किरदार को विश्वसनीय तरीके से पेश किया है। फराह खान कुछ दृश्यों में असहज लगीं और उन्होंने खुल कर एक्टिंग नहीं की। डेजी ईरानी और शम्मी ने फरहाद की मां और दादी मां के रोल बखूबी निभाए। कुल मिलाकर ‘शिरीन फरहाद की लव स्टोरी’ में रोमांस और हास्य का अभाव है।

हिन्‍दी इन डॉट कॉम पर सौम्यदीप्त बैनर्जी लिखते हैं कि फराह खान अपनी एक्टिंग से निराश करती हैं। भावनात्मक दृश्यों में वे बहुत ही कमजोर रहीं। इतना ही नहीं, जब उन्हें खुश रहने का अभिनय करना था, तब भी उनकी आंखों में खुशी नजर नहीं आई। पांच मिनट से ज्यादा अगर वे स्क्रीन में रहती हैं, तो उन्हें झेलना मुश्किल हो जाता है। बोमन ईरानी अच्छे हैं, लेकिन रोमांटिक गाने में डांस करते समय वे अजीब लगे हैं। वो फिल्‍म को पांच से दो अंक देते हुए फिल्‍म देखने की सलाह भी देते हैं।

दैनिक भास्‍कर डॉट कॉम पर फिल्‍म को पांच में से एक सितारा देते हुए फिल्‍म समीक्षक लिखते हैं कि बीते कुछ सालों में पारसियों पर केंद्रित कुछ फिल्‍में आई हैं और सिनेप्रेमियों ने उन्‍हें खूब सराहा है, जैसे होमी अदजानिया की बीइंग साइरस (2005), सूनी तारापुरवाला की लिटिल जिजू (2009), राजेश मापुस्‍कर की फरारी की सवारी (2012)… लेकिन जब हम इस घालमेल फिल्‍म को देखकर थिएटर से बाहर निकलते हैं तो हमारे जेहन में एक ही बात घूमती रहती है : "डीकरा, व्‍हाट वाज दिस?"

अभिव्‍यक्‍ित की तालाबंदी

अब वक्‍त बदलने का है, बंदिशें व प्रतिबंध लगाने का नहीं। एक बात और अब कहां कहां प्रतिबंध लगाएंगे, क्‍यूंकि रूम डिसक्‍शन, अब ग्‍लोबल डिसक्‍शन में बदल चुकी है, इंटरनेट लगा डाला, तो लाइफ जिंगालाला। हर व्‍यक्‍ित सरकार के व्‍यवहार से तंग है, जैसे ईमानदार संवाददाता बेईमान संपादक से। मंगो मैन सरकार के खिलाफ कुछ न कुछ कह रहा है, जो उसका संवैधानिक अधिकार है।
 
ए सरकार, तुम को वोट देकर वो एक बार नहीं, पिछले कई सालों से अपने अधिकार के साथ खिलवाड़ कर रहा है, लेकिन अब वो अभिव्‍यक्‍ित के अधिकार से ही सही, लेकिन तेरे खिलाफ कुछ तो बोल रहा है, जो तुझको पसंद रही आ रहा है। इस मैंगोमैन को रुपहले पर्दे पर विजय दीननाथ चौहान से लेकर बाजीराव सिंघम तक सब किरदार अच्‍छे लगते हैं, मगर अफसोस इसको विजय दीनानाथ चौहान मिलता है तो मीडिया मार देता है, जो तेरी चौखट पर बंधी हुई कुत्तिया से ज्‍यादा नहीं भौंक सकता। काटने पर भी अब जहर नहीं फैलती, क्‍यूंकि इंजेक्‍शन जो पहले से दे रखा है। सरकार के खिलाफ अंदोलन हो तो इनका अंदोलन अंदोलन करने वाले के खिलाफ होता है। उसकी मंशा पर शक करते हैं, मुद्दे तो कैटरीना की मांग में भरे सिंदूर में या ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन के बढ़े हुए वजन में कहीं खो जाते हैं।

टि्वटर, फेसबुक और गूगल अब सरकार की निगाह में खटक रहे हैं। यह तब नहीं, खटकते जब चुनावों में प्रचार के लिए बराक ओबामा की तरह जम कर इनका इस्‍तेमाल किया जाता है। यह कमबख्‍त तब ही आंख में किरकिरी बनते हैं, जब यह सरकार के खिलाफ बोलते हैं। सरकार को बोलने का हक है, मगर जनता को सरकार के खिलाफ बोलने का हक नहीं। असम दंगों की बात निकली तो ठीकरा सोशल मीडिया के सिर फोड़ा गया, सोशल मीडिया के सुर ऊंचे हुए तो रडार का रुख पाकिस्‍तान की तरफ मोड़ दिया गया। पाकिस्‍तान ने साबूत मांगे तो टि्वटर, गूगल एवं फेसबुक को कुछ कंटेंट और खाते ब्‍लॉक करने के लिए बोल दिया गया। वाह सरकार वाह। इस दौरान इलैक्‍ट्रोनिक मीडिया ने भी सरकार के सुर में सुर मिलाया, और गाया मिले सुर मेरा तुम्‍हारा। इतना ही नहीं, मीडिया बेचारा तो पिछले दस बारह दिन से यशराज बैनर्स के लगे हुए पैसे को बचाने में जुटा हुआ था, अगर इस बार भी बॉक्‍स पर एक था टाइगर पिट जाती तो यशराज बैनर्स को बहुत बड़ा लॉस होता, और सलमान की लोकप्रियता में गिरावट आ जाती। खुद की लोकप्रियता कितनी भी गिर जाए कोई फर्क नहीं पड़ता, मगर टीवी की टीआरपी नहीं गिरनी चाहिए, सरकार की तरह।

बर्मा ने तो 48 साल पुरानी सेंसरशिप को खत्‍म कर दिया, मगर भारत सरकार ने  अभिव्‍यक्‍ित की तालाबंदी करने की कदम बढ़ाने शुरू कर दिए।

प्रकाश झा का 'चक्रव्‍यूह'

प्रकाश झा की अगली फिल्‍म 'चक्रव्‍यूह- ए वार यू कैननोट इस्‍केप' 24 अक्‍टूबर को रुपहले पर्दे पर नजर आएगी, जिसका प्रमोशन 16 अगस्‍त से शुरू हो गया। प्रकाश झा की फिल्‍में समस्‍याओं पर आधारित होती हैं या कहें लकीर से हटकर। प्रकाश झा की फिल्‍म चक्रव्‍यूह की स्‍टार कास्‍ट देखकर लगता है कि प्रकाश झा, इस बार सिनेमा की खिड़की पर जोरदार हल्‍ला बोलने वाले हैं। गैंगस ऑफ वासेपुर व पान सिंह तोमर को मिले रिस्‍पांस के बाद चक्रव्‍यूह जैसी फिल्‍म को बॉक्‍स ऑफिस पर सफलता मिलने की पूरी पूरी उम्‍मीद है।

16 अगस्‍त को जारी किए गए चक्रव्‍यूह के पोस्‍टर बयान करते हैं कि फिल्‍म बनाते हुए काफी ध्‍यान रखा गया है। सबसे पहले ऐसे संवेदनशील मुद्दों के लिए गम्‍भीर कलाकारों की जरूरत होती है, जो प्रकाश झा ने अभय दिओल, मनोज वाजपेयी, रामपाल, ओमपुरी को चुनकर पूरी की, क्‍यूंकि ऐसे मुद्दों पर सुपर स्‍टारों को जबरदस्‍ती नहीं धकेला जा सकता।


प्रकाश झा की पहली च्‍वॉइस मनोज वाजपेयी अपने आप में उम्‍दा कलाकार हैं, उनके अभिनय पर कभी शक नहीं किया जा सकता। अभय दिओल की बात की जाए तो उन्‍होंने हमेशा ऑफ बीट एवं कम बजट की फिल्‍मों में भी अपना बेहतरीन अभिनय दिया है। अभय दिओल बड़े सितारों की भीड़ में भी अपने काम से, अपने अभिनय से अपनी भूमिका को जीवंत कर देते हैं।

अर्जुन रामपाल ने भले ही शुरूआत मॉडलिंग के क्षेत्र से की हो, मगर वो समय के साथ साथ अभिनय की बारीकियां सीखते चले गए। तभी तो प्रकाश झा की राजनीति के बाद उनकी अगली फिल्‍म चक्रव्‍यूह में वो जगह बना पाए।

रंगमंच से रुपहले पर्दे तक का सफर तय करने वाले ओम पुरी एक बेहतरीन एक्‍टर हैं, जो किसी भी किरदार में ढल जाते हैं। उन्‍होंने अपने इतने लम्‍बे फिल्‍मी कैरियर में हर तरह की भूमिका को पूरी शिद्दत से निभाया है। उम्‍मीद है कि इस बार भी वो दर्शकों को निराशा नहीं करेंगे।

उम्‍मीद है कि प्रकाश झा का चक्रव्‍यूह अभय दिओल, मनोज वाजपेयी एवं अर्जुन रामपाल जैसे उम्‍दा अभिनेताओं के लिए मील का पत्‍थर सिद्ध होगी। इस फिल्‍म में अर्जुन रामपाल पुलिस अधिकारी, अभय दिओल पुलिस मुखबिर और मनोज वाजपेयी नक्‍सली नेता बने हैं।

शादी पर पापा का बेटे को पत्र

तुमने 'दु:खी शादीशुदा लोगों' और आलोचकों द्वारा बनाए गए सारे चुटकले सुने होंगे। अब, अगर किसी और ने तुम्‍हें यह न सुझाया हो, तो यह दूसरा नजरिया है। तुम मानव जिन्‍दगी के सबसे सार्थक रिश्‍ते में बंध रहे हो। इस रिश्‍ते को तुम जैसा बनाना चाहो वैसा बना सकते हो।

कुछ लोग सोचते हैं कि उनकी मर्दानगी तभी साबित होगी, जब वे लॉकर रूम में सुनी सारी कहानियों को जिन्‍दगी में उतारेंगे। वे निश्‍िचंत रहते हैं कि जो बात पत्‍नी को पता ही नहीं उससे वह दुखी नहीं होगी। सच्‍चाई ये है कि किसी तरह, कहीं अंदर से, उसके द्वारा कॉलर पर लिपस्‍टिक का निशान पाए जाने या तीन बजे तक कहां थे, के लचर बहानों के पकड़े जाने के बिना ही पत्‍नी को पता चल जाता है और इसी जानकारी के साथ, इस रिश्‍ते की गहराई में कुछ कमी आ जाती है। ऐसे पति जो अपनी शादी का रोना रोते हैं, जबकि उन्‍होंने खुद ही रिश्‍ता खराब किया है, कहीं ज्‍यादा हैं, उन पत्‍नियों से, जिन पर यह इल्‍जाम लगाया जाता है।

भौतिक विज्ञान का एक पुराना नियम है कि तुम एक चीज से उतना ही निकाल सकते हो, जितना तुम उसके अंदर डालते हो। जो व्‍यक्‍ित अपने हिस्‍से का आधा ही शादी पर न्‍यौछावर करता है, वह आधा ही वापस पायेगा। यह सच है कि ऐसे भी क्षण आएंगे, जब तुम किसी को देखोगे या पहले के समय के बारे में सोचोगे और तुम्‍हें ये चुनौती मिलेगी कि देखना चाहिए कि क्‍या अभी भी तुम उस स्‍तर तक पहुंच सकते हो कि नहीं। मगर मैं तुम्‍हें बताता हूं कि असलियत में यह कितनी बड़ी चुनौती है कि तुम अपने अपने आकर्षण और मर्दानगी को एक ही औरत के आगे जिन्‍दगी भर साबित करते रह सको। कोई भी आदमी इधर उधर ऐसी छिछोरी स्‍त्रियों को ढूंढ सकता है जो छल करने में लिए तैयार होंगी और इससे कोई मर्दानगी जाहिर नहीं होगी। लेकिन यह वाकई एक मर्द का काम है कि वह ऐसी औरत का प्‍यार पाता रहे और उसके आगे आकर्षक बना रहे, जिसने उसे खर्राटे लेते हुए सुना हो, दाढ़ी बढ़ाए हुए देखा हो, उसकी बीमारी में सेवा की हो और उसके गंदे अंडरवियर धोये हों। ऐसा करो और फिर उसको एक सुखद अहसास महसूस करते हुए देखो और तुम्‍हारी जिन्‍दगी भी एक खूबसूरत संगीत बन जाएगी।

अगर तुम वाकई किसी लड़की को चाहते हो तो तुम कभी नहीं चाहोगे कि वह अपने आपको अपमानित महसूस करते हुए देखे। तुम नहीं चाहोगे कि वह यह सोच सोचकर दुखी हो कि यही वह लड़की तो नहीं जिसके कारण तुम घर देर से आते हो। न ही तुम चाहोगे कि कोई भी औरत, तुम्‍हारी पत्‍नी, जिसे तुम चाहते हो, से मिले और तुम्‍हें पता लगे कि वो मन ही मन उस पर हंस रही थी, यह सोच सोचकर कि इस औरत को चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही, पर तुमने उसे पाने के लिए त्‍याग दिया था।

माइक, तुम औरों से ज्‍यादा अच्‍छी तरह जानते हो कि एक अशांत घर क्‍या होता है और दूसरों के जीवन में क्‍या क्‍या कर सकता है। अब तुम्‍हारे पास एक मौका है कि तुम इसे वैसा बना लो कि जैसा होना चाहिए। एक आदमी के लिए इससे बढ़कर और कोई खुशी नहीं होती कि जब वो सूरज डूबने पर घर पहुंच रहा हो तो उसे ये मालूम हो कि दरवाजे के दूसरी ओर कोई उसके कदमों की आहट का इंतजार कर रहा है।

नोट। यह ख़त अमेरिका के भूतपूर्व राष्‍ट्रपति रोनाल्‍ड रीगन ने अपने बेटे को उसकी शादी के वक्‍त लिखा था, जो शिव खेड़ा की किताब सम्‍मान से जीएं में दर्ज है।

सम्‍मान से जीएं के साभार से।

कैग की जीरो या मैडम का अंडा

कपूर खानदान की लाडली करीना कपूर ने जब अपनी फिगर के आगे जीरो लगाया, तो कई अभिनेत्रियों की नींद उड़ गई, जैसे फायर की आवाज सुनते ही पेड़ से पंछी एवं कई अभिनेत्रियों को पेक अप बोलना पड़ा।

जब 2012 में कैग ने अपनी रिपोर्ट में जीरो लगाई तो कांग्रेस के हाथ पैर पीले पड़ गए और कांग्रेस ने कैग की रिपोर्ट को जीरो बताते हुए कि कैग को जीरो लगाने की आदत है, कह डाला।

इतना कहने से कांग्रेस का पीछा कहां छूटने वाला था। शून्‍य ऑवर होने से पहले ही संसद 'जीरो लगाने के मुद्दे' को लेकर बुधवार तक स्‍थगित हो गई। कांग्रेस भले ही कहती रहे 'कैग को जीरो लगाने की आदत है', मगर विपक्ष एक बात पर अड़िंग है कि देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने पद से अस्‍तीफा दें, जो अपनी उदासीनता के चलते हीरो से जीरो हो चुके हैं।

यह जीरो कांग्रेस को जीरो करने में कितना रोल अदा करने वाली है, यह बात तो आगामी लोक सभा चुनावों में ही सामने आएगी। जिस तरह के माहौल कांग्रेस के खिलाफ बन रहा है, ऐसे में कांग्रेस को जीरो में जाने की जरूरत है, मतलब शून्‍य में जाने की जरूरत है, जिसको आध्‍यत्‍मिक गुरू ध्‍यान कहते हैं।

कांग्रेस को ध्‍यान में जाने की जरूरत है। उसको सोचना होगा। इस जीरो से कैसे उभरा जाए। यह जीरो अगर उपलब्‍धियों में लगे तो किसी को नहीं खटकती, मगर यह जीरो जब घाटों में लगती है तो बवाल होता है। जैसे अच्‍छे वक्‍त में होने वाली गलतियां मजाक कहलाती हैं, और बुरे वक्‍त में मजाक भी गलतियां कहलाता है।

जीरो को अंडा भी बोलते हैं, मगर वो शरारती बच्‍चे, जो गम में भी मस्‍ती का फंडा ढूंढ लेते हैं, जब उनसे कोई पूछता है, आज का टेस्‍ट कैसा रहा तो वो बड़े मजाक भरे मूड में कहते हैं, मैडम ने अंडा दिया है।

मगर अब कांग्रेस ने कैग को अंडा दे दिया, क्‍यूंकि कैग ने कांग्रेस की कारगुजारी देखते हुए उसको अंडा दे दिया। इस अंडे से पनप विवाद देखते हैं आने वाले दिनों में क्‍या रुख लेगा? क्‍या देश के अंडरअचीवर मनमोहन सिंह अपने पद से अस्‍तीफा देंगे? या अब भी वो जनपथ की तरफ देखते रहेंगे, जिसके पीछे भी जीरो लगती है। मतलब दस जनपथ। हो सकता है जीरो से क्षुब्‍ध कांग्रेस अब जनपथ दस को एक में बदलने का मन बना ले। और बाद में विज्ञापन आए, बस नाम बदला है, काम नहीं।

मैं हूं सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट

सरकार अपनी नाकामियों का ठीकरा मेरे सिर फोड़ रही है। मैं हूं सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट। मैं किस से कहूं अपने दिल की बात। सब कहते हैं मेरे द्वारा दुनिया भर से अपने दिल की बात। मैं दुखी हूं, जब कोई मेरे खिलाफ बयान देता है। भारतीय सरकार एवं भारतीय मीडिया तो मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं, जबकि देश की सरकार एवं कई मीडिया संस्‍थानों के बड़े धुरंधर मेरे पर आकर अपना उपदेश जनता को देते हैं। खुद को ब्रांड बनाने के लिए मेरा जमकर इस्‍तेमाल करते हैं। फिर भी आज वो ही मुझ पर उंगलियां उठा रहा है, मुझ पर आरोपों की झाड़ियां लगा रहा है, जो मीडिया कभी लिखता था मैंने कई साल पहले बिछड़े बेटे को मां से मिलवाया एवं मैंने असहाय लोगों को बोलने का आजाद मंच प्रदान किया, आज वो मीडिया भी मेरी बढ़ती लोकप्रियता से अत्‍यंत दुखी नजर आ रहा है। शायद उसकी ब्रेकिंग न्‍यूज मेरे तेज प्रसारण के कारण आज लोगों को बासी सी लगने लगी है और मेरा बढ़ता नेटवर्क उसकी आंख में खटकने लगा है।

मेरे पर मीडिया कर्मियों, नेताओं और आम लोगों के खाते ही नहीं, फिल्‍म स्‍टारों के भी खाते उपलब्‍ध हैं, कुछ मीडिया वालों ने तो मेरे पर लिखी जाने वाली बातों को प्रकाशित करने के लिए अख़बारों में स्‍पेशल कॉलम भी बना रखें हैं, जब भी देश में कोई बड़ी बात होती है तो मीडिया वाले पहले मेरे पर आने वाली प्रतिक्रियाओं का जायजा लेते हैं, मेरे पर आने वाली प्रतिक्रियाओं को स्‍क्रीन पर फलैश भी करते हैं।

मगर मैंने इस पर कभी आपत्ति नहीं जताई। कभी रोष प्रकट नहीं किया। मैंने कभी नहीं किया, मैं मीडिया से बड़ी हूं। मैंने कभी नहीं कहा, मैं मीडिया से तेज हूं। मैंने कभी नहीं कि मैं मीडिया से ज्‍यादा ताकतवर हूं। मैं तो कुछ नहीं कहा। मैं चुपचाप पानी की भांति चल रही हूं। मैं तो मीडिया आभारी हूं, जिसने शोर मचा मचाकर मुझे पब्‍लिक में लोकप्रिय बना। अगर मीडिया ने मुझे समाचारों में हाइलाइट न किया होता, तो मैं घर घर कैसे पहुंचती। मेरे जन्‍मदाता कुछ ही सालों में करोड़पति कैसे बनते?

अब मैं सोचती हूं कि मैंने ऐसा क्‍या कर दिया जो भारतीय सरकार एवं मीडिया मुझसे खफा होने लगा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मीडिया को लगने लगा है कि मैं पब्‍लिक आवाज बनती जा रही हूं। नेताओं को डर लगने लगा रहा है कहीं, मैं उनके खिलाफ जन मत या जनाक्रोश न पैदा कर दूं।

अगर सरकार एवं मीडिया वाले सोचते हैं कि मेरे बंद होने से जनाक्रोश थम जाएगा। सच्‍चाई सामने आने से रुक जाएगी। तो सरकार एवं मीडिया गलत सोचते हैं, मैं तो एक जरिया हूं, अगर यह जरिया या रास्‍ता बंद होगा तो जन सैलाब कोई और रास्‍ता खोज लेगा। क्‍यूंकि जनाक्रोश को तो बहना ही है किस न किस दिशा में, अगर सरकारें एवं मीडिया उसको नजरअंदाज करता रहेगा।

मैं तो सोशल नेटवर्किंग साइट हूं। जो पब्‍लिक बयान करती है, मैं उसको एक दूसरे तक पहुंचाती हूं। मेरे मालिकों को खरीद लो। मैं खुद ब खुद खत्‍म हो जाऊंगी। जैसे मीडिया को आप विज्ञापन देकर खरीदते हैं, उसकी आवाज को नरम करते हैं वैसे ही मेरे मालिकों की जेब को गर्म करना शुरू कर दो। वो खुद ब खुद को ऐसी युक्‍त निकालेंगे सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। मगर सोशल नेटवर्किंग अपनी लोकप्रियता खो देगी और मैं मर जाउंगी। फिर किसी नए रूप में अवतार लेकर फिर से आउंगी। जालिम अंग्रेजों सबक सिखाने के लिए मैं तेज धार कलम बनी थी। देश विरोधी सरकारों को निजात दिलाने के लिए मैं सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट बनी हूं। अगली क्रांति के लिए मैं कुछ और बनूंगी।

'जिस्‍म की नुमाइश' से शोहरत के दरवाजे तक

यह कहानी एक ऐसी युवती की, जो दौलत को मानती है सब से बड़ी ताकत और शोहरत पाने के लिए जिस्‍म को बनाया औजार। ट्विटर पर लगाकर नग्न तस्वीरें  युवाओं के दिलों में हलचल पैदा करने वाली युवती आखिर पहुंच गई लॉस एंजलिस में प्लेबॉय के आलीशान गलियारों तक।

यह युवती कोई और नहीं, बल्‍िक शेर्लिन चोपड़ा है। जो कुछ साल पहले बड़े स्‍वप्‍न लेकर मायानगरी में घुसी थी। निशाना अपने बल पर दौलत कमाना। दौलत के साथ लोकप्रियता। वो यह बताते हुए हिचकचाती नहीं कि शुरूआत के दिनों में जब वो संघर्ष के दौर से गुजर रही थी तो उसके कुछ संबंध बने, तो कहीं शोषण का भी शिकार होना पड़ा।

पैसा कमाने की दुस्साहसी महत्वाकांक्षा उसको ऐसे मोड़ पर ले आई। जहां उसने शर्म हया का वो पर्दा हटा दिया, जो शरीफ लोग अक्‍सर पर्दे के पीछे उतारते हैं। जब ट्विटर पर होने वाली भद्दी टिप्‍पणियों के बारे में हिंदुस्तान टाइम्स सवाल पूछता है तो शर्लिन कहती है ''अगर आपको वेश्या समझे जाने से ही पूरी तरह आजादी का अहसास होता है, तो यही सही''।

एक अन्‍य सवाल के जवाब में जब शर्लिन कहती हैं, ''मैं पहले हैदराबाद में अपने परिवार से डरती थी, सोचती थी कि लोग क्या कहेंगे. फिर 'बिग बॉस' (2009 में उन्होंने इस टीवी रियल्टी शो में हिस्सा लिया था) के बाद चीजें बदल गईं. मैंने लोगों की परवाह करनी छोड़ दी। मैं सोचने लगी कि मैं सिर्फ खुद के प्रति जवाबदेह हूँ। यहां एक सवाल पैदा होता है कि क्‍या बिग बॉस हमारी युवतियों की सोच इस कदर बदलेगा कि वो इस तरह शरीर की नुमाइश लगाकर शोहरत की बुलंदियों को छूएं। अभी कुछ दिन पहले आई फिल्‍म कोकटेल का गीत याद आ रहा है, मैं नहीं हूं इस दुनिया की। मगर गीत को गुनगुनाने वाली नायिका भी फिल्‍म में एक बार पूरी तरह टूटकर बिखर जाती है।

शर्लिन, उन लड़कियों की श्रेणी में नहीं आती, जो शोहरत व दौलत के लिए शॉर्टकट चुनती हैं, मगर एक मोड़ पर आकर लाचार एवं असहाय महसूस करती हुई और जिन्‍दगी से हाथ धो बैठती हैं। और शर्लिन चोपड़ा उन युवतियों के लिए प्रेरणास्‍रोत भी नहीं, जो अपने स्‍वप्‍नों को पूरा करने के लिए शर्म हया के गहने नहीं उतारना चाहती। शर्लिन चोपड़ा, भले ही जिस्‍म की नुमाइश से एक सेलिब्रिटी बन चुकी है, मगर जिन्‍दगी की रिंग में वो मैरीकॉम से कई गुना पीछे खड़ी नजर आती है, जिस ने परिवारिक जिम्‍मेदारियों को अपने कंधों पर लादकर अपने सपनों की शिखर को चूमा है।

नोट : यह लेख हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स के संपादक की बातचीत आधारित है, जो उन्‍होंने शर्लिन चोपड़ा से की एवं बीबीसी हिन्‍दी डॉट कॉम पर प्रकाशित हुई, पूरी बातचीत के लिए आप बीबीसी हिन्‍दी देख सकते हैं। यहां मैंने बातचीत को आधार बनाकर अपने विचार पेश किए हैं।

कौन छीनता है हमारी आजादी ?

हम आजाद हैं, हम आजाद थे और आजाद रहेंगे। 18 साल के बाद वोट करने का अधिकार आपके हाथ में है, जिससे आप सत्ता पलटने ताकत रखते हैं। भगवान आपकी तरफ तलवार फेंकता है, यह निर्भर आप पर करता है कि आप उसको धार से पकड़ना चाहेंगे या हत्‍थे से। वोट का अधिकार सरकार द्वारा फेंकी तलवार है, अब निर्भर आप पर करता है कि आप लहू लहान होते हैं या फिर उसका औजार की तरह इस्‍तेमाल करते हैं।

देश की सत्ता पर बैठे हुए लोग हमारे द्वारा चुने गए हैं। उनको देश पर शासन करने का अधिकार हमने दिया है। वो वोट खरीदते हैं। वो हेरफेर कर चुनावों में जीतते हैं। ऐसा हम कहते हैं और सिस्‍टम को कोसते हैं। मगर एक बार नजर डालो अपने आस पास फैले समाज पर और पूछो खुद से। वोट बेचने वाले कौन हैं? सिस्‍टम में गड़बड़ी करने वाले कौन हैं? अगर आप अपनी तलवार दुश्‍मन के हाथों में देकर सोचते हो कि भगवान ने आपके साथ अन्‍याय किया है तो यह आपकी गलती है, भगवान की नहीं।

जब भी 15 अगस्‍त की तारीख पास आने वाली होती है तो हर जगह लिखा मिलता है 'भ्रष्‍टाचार, रिश्वतखोरी, बेरोज़गारी, भुखमरी के ''गुलाम देश'' के नागरिकों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई' इस तरह के तल्‍खियों का इस्‍तेमाल कर हम महान होने का प्रमाण पत्र लेना चाहते हैं, इससे ज्‍यादा कुछ नहीं, क्‍यूंकि जो व्‍यक्‍ित यह वाक्‍य लिख रहा है या बोल रहा है उसके पास दुनिया की हर सुविधा उपलब्‍ध है और वो उससे भी बेहतर सुविधाएं हासिल करने की दौड़ में जुटा हुआ है। पहला अधिकार वो लिखने के लिए आजाद है। फिर वो बोलने के लिए आजाद है। इतना ही नहीं, उसके पास वोट देने का अधिकार भी है, क्‍यूंकि वो राष्‍ट्र का नागरिक है।

अगर हम आजाद नहीं तो अपनी आदतों से। अपने स्‍वार्थों से। हम अपने पड़ोसी का भला होता नहीं देख सकते। हम अपने भाईयों को आगे बढ़ते हुए नहीं देख सकते, तो हम देश को आगे बढ़ते हुए कैसे देखेंगे।

एक व्‍यक्‍ित का विकास, एक परिवार का विकास है। एक परिवार का विकास, एक समाज का विकास है। एक समाज का विकास, एक क्षेत्र का विकास है। एक क्षेत्र का विकास, एक राज्‍य का विकास है। एक राज्‍य का विकास, एक राष्‍ट्र का विकास है।

स्‍वयं का विकास करो। देश का विकास होना पक्‍का है। एक और सवाल एक भ्रष्‍ट अधिकारी या नेता कौन सी दुनिया से आता है? तो उत्तर होगा कहीं से नहीं हमारे समाज से। उस समाज से जहां हम रहते हैं। जहां देश प्रेम की बातें होती हैं। जहां देश भक्‍ित का जज्‍बा हिलोरे लेता है। फिर वह एक शक्‍ित मिलते ही क्‍यूं भ्रष्‍ट हो जाता है? क्‍यूं जन प्रेम से वो धन प्रेम की तरफ बढ़ने लगता है? इस सवाल में हर दर्द की दवा है। अगला प्रश्‍न कौन छीनता है हमारी आजादी ?

जनता भैंस, अन्‍ना के हाथ में सिंघ, तो बाबा के हाथ में पूंछ

अन्‍ना हजारे का अनशन एवं बाबा रामदेव का प्रदर्शन खत्‍म हो गया। अन्‍ना हजारे ने देश की बिगड़ी हालत सुधारने के लिए राजनीति में उतरने के विकल्‍प को चुन लिया, मगर अभी तक बाबा रामदेव ने किसी दूसरे विकल्‍प की तरफ कोई कदम नहीं बढ़ाया, हालांकि सूत्रों के अनुसार उनका भी अगला विकल्‍प राजनीति है।

अपना अनशन खत्‍म करते हुए अन्‍ना टीम ने राजनीति को अपना अगला विकल्‍प बताया था और अब अन्‍ना टीम ने घोषणा भी कर दी है कि वो गांधी जयंती पर अपनी राजनीतिक पार्टी का नाम भी घोषित कर देंगे। मुझे लगता है कि पार्टी का गठन करना बड़ी बात नहीं, बड़ी बात तो उस पार्टी का अस्‍ितत्‍व में रहना है।

क्‍यूंकि देश सुधारने के नाम पर हिन्‍दुस्‍तान के हर राज्‍य में कई पार्टियां बनी और विलय के साथ खत्‍म हो गई। इसलिए पार्टियों का गठन करना एवं उनको खत्‍म करना, भारत में कोई नई बात नहीं। कुछ माह पहले पंजाब में विधान सभा चुनाव हुए, इन चुनावों के दौरान कई छोटी पार्टियां बड़ी पार्टियों में मिल गई, जैसे नालियां नदियों में। मगर कुछ नई पार्टियों का गठन भी हुआ। पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने राज्‍य के हालतों को सुधारने का बीड़ा उठाते हुए नई पार्टी का गठन किया, जब पार्टी का गठन हुआ तो हर तरफ से इस तरह के कयास थे कि मनप्रीत सिंह बादल कुछ न कुछ सीटें लेकर जाएगा। मगर अफसोस जब चुनावों के नतीजे सामने आए तो पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई।

अब जब गुजरात में विधान सभा के चुनाव होने में कुछ महीने बाकी बचे हैं, तो गुजरात के पूर्व मुख्‍यमंत्री केशुभाई पटेल ने नई राजनीतिक पार्टी का गठन करते हुए चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। इस पार्टी में एक पुरानी पार्टी का विलय किया जाएगा। जब कोई नई पार्टी का गठन होता है तो राजनेता एक दूसरे पर आरो प्रति आरोप लगाने लगते हैं, मगर गुजरात में इसके उल्‍ट होने जा रहा है, क्‍यूंकि नरेंद्र मोदी ने केशुभाई पटेल के विरोध में एक भी शब्‍द कहने से अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं को मना कर दिया। केशुभाई पटेल की नई पार्टी इन चुनाव में कुछ नया करिश्‍मा कर पाती है, या फिर मनप्रीत सिंह बादल की पार्टी की तरह खाता खोले बिना, अगले चुनावों का इंतजार करेगी।

अब बाबा रामदेव और अन्‍ना हजारे पर लौटते हैं, जो कभी एक होने का दावा करते हैं, तो कभी अलग अलग खड़े नजर आते हैं। बाबा रामदेव कालेधन को वापिस लाने की लिए संघर्ष कर रहे हैं तो अन्‍ना हजारे भ्रष्‍टाचार के खिलाफ। मगर सवाल तो यह है कि काला धन कहां से आता है? भ्रष्‍ट तरीकों से। तो दोनों की लड़ाई अलग कैसे हो सकती है? जनता अलग अलग कैसे समर्थन दे सकती है। मेरे हिसाब से पकड़ दोनों भैंस को रहे हैं, मगर एक पूंछ से तो दूसरा सिंघों से। अन्‍ना हजारे कहते हैं कि जनता का समर्थन हमारे साथ है, वहीं बाबा रामदेव कहते हैं रामलीला मैदान में गूंज रही आवाज एक सौ तीस करोड़ भारतीयों की है। जबकि दोनों अलग अलग खड़े नजर आते हैं, तो भारत के नागरिक आखिर किस के साथ जाएं।

मुझे ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव पूंछ से पूरी भैंस को देख रहे हैं, और अन्‍ना हजारे सिंघों से पूरी भैंस को देख रहे हैं। अगर दोनों एक ही भैंस को देख रहे हैं तो स्‍वप्‍न दुनिया से निकलकर एक मंच पर आना होगा। एक साथ आना होगा। वरना भैंस बाबा रामदेव को टांग और अन्‍ना हजारे को सिंघ मार कर भाजपा या कांग्रेस के घर में फिर से घुस जाएगी।

हवा हवाई की वापसी 'इंग्‍लिश विंग्‍लिश' से

'कहते हैं मुझको हवा हवाई' कुछ याद आया। जी हां, श्री देवी। रुपहले पर्दे पर 14 साल बाद वापसी कर रही हैं। सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि पूरी फिल्‍म श्रीदेवी को ध्‍यान में रख कर लिखी गई है। श्रीदेवी इस फिल्‍म में अपने परिवार को खुश करने के लिए इंग्‍लिश सीखने की हरसंभव कोशिश करती हुई नजर आएंगी। इस दौरान कई घटनाएं घटित होंगी, जो दर्शकों को हंसाने का भी काम करेंगी।

फिल्‍म की कहानी आर बाल्‍की ने लिखी है, जो चीनी कम, पा जैसी फिल्‍में निर्देशित कर चुके हैं जबकि इंग्‍लिश विंग्‍िलश नामक इस फिल्‍म का निर्देशन आर बाल्‍की की पत्‍िन गौरी शिंदे कर रही हैं। इस फिल्‍म में अमिताभ बच्‍चन छोटी सी भूमिका में नजर आएंगे। इसके अलावा फिल्म में कुछ अंतर्राष्ट्रीय कलाकार भी हैं। यह फिल्‍म सिनेमाहालों में 5 अक्‍टूबर को आने की उम्‍मीद है, मगर उससे पहले इस फिल्‍म को टोरोंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी 14 सितंबर को दिखा जाएगा।
 
गौरतलब है कि 1997 में आई फिल्‍म जुदाई उनकी पहली पारी की अंतिम फिल्‍म थी हालांकि 2005 में उनकी एक पुरानी फिल्‍म मेरी बीवी का जवाब नहीं को भी रिलीज किया गया था, जिसमें उन्‍होंने अक्षय कुमार के साथ काम किया था। उन्‍हीं दिनों उन्होंने टीवी के लिए 'मालिनी अय्यर' नाम का एक धारवाहिक ज़रूर किया।

श्रीदेवी का जन्‍म 13 अगस्‍त 1963 को शिवाकशी तामिलनायडू में हुआ था। श्रीदेवी ने कई तामिल फिल्‍मों में काम किया एवं उनकी मातृभाषा तामिल है। श्रीदेवी ने बाल कलाकार के रूप में 1975 में जुली नामक हिन्‍दी फिल्‍म में काम किया और इसके करीबन चार साल बाद श्रीदेवी बतौर अभिनेत्री रुपहले पर्दे पर हिन्‍दी फिल्‍म सोलहवां साल से उतरी एवं उनकी पहली पारी की अंतिम फिल्‍म अनिल कपूर के साथ जुदाई थी। इतने लम्‍बे फिल्‍म कैरियर में श्रीदेवी ने काफी सारी यादगार फिल्‍में दी। इन यादगार फिल्‍मों में उनके को स्‍टार अनिल कपूर, ऋषि कपूर, सन्‍नी दिओल, कमल हसन, जितेंद्र जैसे सितारे रहे हैं। श्रीदेवी ने 1996 में फिल्‍म निर्माता बोनी कपूर से शादी कर ली थी और फिल्‍म कैरियर को विराम दे दिया था।

अब श्रीदेवी डेढ़ दशक पर रुपहले पर्दे पर वापसी कर रही हैं, मगर इस फिल्‍म में वो मुख्‍य भूमिका निभाने वाली हैं, कोई भी बड़ा सितारा उनके ओपिजिट नहीं। अब देखना यह है कि श्रीदेवी का कमबैक कितना दमदार है, जबकि फिल्‍म का प्रोमो तो बेहद उम्‍दा है।

क्‍यूं महान है टाइम पत्रिका एवं विदेशी मीडिया ?

प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम और सीएनएन के लिए काम करने वाले पत्रकार फरीद ज़कारिया को अपने एक कॉलम के लिए दूसरे अखबार की नकल करना महंगा पड़ गया है.

टाइम और सीएनएन ने फरीद ज़कारिया को निलंबित कर दिया है. रुपर्ट मर्डॉक की कंपनी फॉक्स न्यूज़ द्वारा फोन हैकिंग में शामिल होने का मामला सामने आने के बाद अमरीकी पत्रकारिया जगत का ये दूसरा सबसे बड़ा विवाद है.

भारतीय मूल के फरीद ज़कारिया विदेशी मामलों के विशेषज्ञ पत्रकार हैं और लंबे समय से टाइम और सीएनएन के लिए स्तंभ लिखते रहे हैं. ज़कारिया सीएनएनएन पर 'जीपीएस' नामक एक लोकप्रिय टेलिविज़न शो भी प्रस्तुत करते हैं.

फरीद ज़कारिया भारत में इस्लामी मामलों के जाने-माने चिंतक रहे रफ़ीक ज़कारिया के बेटे हैं. कम उम्र में ही वो पढ़ाई के लिए हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय चले गए थे. मात्र 26 साल की उम्र में वो विदेशी मामलों की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘फॉरेन अफेयर्स’ के संपादक हो गए.

विदेश मामलों और राजनीति से जुड़े ज़कारिया के लेख और उनकी किताबें आम लोगों और नीति निर्माताओं के बीच ही नहीं बल्कि अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसे नेताओं के बीच भी काफी लोकप्रिय रही हैं.

समाचार पत्र गार्डियन के मुताबिक ज़कारिया ने पिछले दिनों क्लिक करें टाइम पत्रिका के लिए अमरीका के कोलाराडो और विस्कॉनसिन में हुई शूटिंग की घटनाओं के चलते बंदूकों पर नियंत्रण संबंधी एक लेख लिखा था. इस लेख का एक छोटा हिस्सा सीएनएन की वेबसाइट पर ब्लॉग के रुप में भी छपा.

हालांकि यह लेख सामने आने के बाद मीडिया वॉचडॉग और नेशनल रिव्यू ऑनलाइन जैसे कई ब्लॉग्स ने यह खुलासा किया कि ज़कारिया के लेख और ब्लॉग का एक हिस्सा

अप्रैल महीने में इस मुद्दे पर छपे ' क्लिक करें द न्यू यॉर्कर' के एक लेख की नकल है.

लेख के जिस हिस्से की नकल की गई है वो अमरीका के ऐतिहासिक विवरण और बंदूकों पर नियंत्रण पर आधारित था.

ब्लॉग्स और मीडिया पर ये मामला उछलने के बाद जब टाइम पत्रिका से इस बारे में औपचारिक तौर पर सफाई मांगी गई तब फरीद ज़कारिया ने इसे अपनी गलती मानते हुए तुरंत माफ़ी मांगी.

अपने माफ़ीनामे में उन्होंने कहा, ''मीडिया में यह बात सामने आई है कि टाइम पत्रिका के मेरे कॉलम और 23 अप्रैल को न्यू-यॉर्कर में छपे जिल लैपोर के आलेख में कई समानताएं हैं. ये लोग सही हैं. ये एक बड़ी गलती है और इसके लिए पूरी तरह मैं ज़िम्मेदार हूं.''

इसके बाद टाइम पत्रिका ने उन्हें एक महीने के लिए निलंबित कर दिया. मुमकिन है कि ये अवधि बढ़ा दी जाए.

पत्रिका के प्रवक्ता अली ज़ेलेंको के एक बयान के मुताबिक, ''पत्रिका फरीद ज़कारिया के माफ़ीनामे को स्वीकार करती है लेकिन उन्होंने जो किया है वो पत्रकारिता से जुड़े हमारे सिद्धांतों का उल्लंघन है. हमारा मानना है कि लेख न केवल तथ्यात्मक बल्कि मूल भी होने चाहिएं.''

अमरीकी पत्रकारिता जगत में इससे पहले भी 'प्लेजियारिज़्म' यानि साहित्यिक चोरी के कई मामले सामने आ चुके हैं. यहां तक कि न्यू-यॉर्कर के प्रतिष्ठित साइंस पत्रकार जोनाह लेहरर द्वारा अपने ही कुछ पुराने लेखों के हिस्से चुराकर नए लेख तैयार करने का मामला सामने आया था.


बीबीसी हिन्‍दी के साभार से।

शिवानी भटनागर से गीतिका शर्मा तक

गीतिका शर्मा ने आत्‍महत्‍या कर ली और उसको इंसाफ दिलाने के लिए कुछ लोगों ने कमर कस ली, क्‍योंकि आरोपी हरियाणा कांग्रेस सरकार में मंत्री है। गीतिका शर्मा की तस्‍वीर देखने के बाद मुझे पहले तो फिजा की याद आई, फिर मुझे उस वक्‍त की याद आई, जब मैं मीडिया जगत में कदम रख रहा था, उन दिनों भी एक ऐसा की केस चर्चाओं में था, मगर उस केस में महिला की हत्‍या की गई थी, जो मीडिया जगत से संबंध रखती थी, उसका नाम था शिवानी भटनागर। शिवानी भटनागर के केस में कई किस्‍से सामने आए, जिनमें एक था पुलिस अधिकारी आरके शर्मा से अवैध संबंधों का। आज उस बात को कई साल बीत गए, मगर गीतिका की मौत ने एक बार फिर उस याद को ताजा कर दिया, जो कुछ दिन पहले जिन्‍दगी को अलविदा कह कर इस दुनिया से दूर चली गई, पीछे सुलगते कई सवाल छोड़कर, जिनका उत्तर मिलते मिलते सरकारी कोर्टों में पता नहीं कितना वक्‍त लग जाएगा।

आज गीतिका शर्मा के लिए इंसाफ की गुहार लगाई जा रही है, आरोपों के दायरे में है एक मंत्री। शायद इस लिए यह केस हाइप्रोफाइल हो गया। इन दिनों एक और घटना घटित हुई, जिसमें फिजा ने पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी। इसके तार भी एक नेता से जुड़े हुए हैं। तीनों केस हाईप्रोफाइल हैं, और महिलाओं की मौत से जुड़े हुए हैं। मैं आरोपियों की पैरवी नहीं कर रहा, मगर फिर भी पूछना चाहूंगा कि ऐसे मामलों में केवल पुरुषों को ही दोषी माना जाना चाहिए ?  क्‍या उन बालाओं को हम दोषी नहीं ठहराएंगे, जो पुरुषों का इस्‍तेमाल करते हुए शिखर की तरफ बढ़ना चाहती हैं? एवं एक वक्‍त पर आकर उनको कुछ समझ नहीं आता कि अब किसी ओर जाया जाए।

मैं मीडिया जगत से संबंध रखता हूं, ऐसे में काफी जगहों पर आना जाना होता है। इस आने जाने में एक चीज तो देखी है कि लड़कों से ज्‍यादा लड़कियां महत्‍वकांशी होती हैं, कुछ करने का जानून, उनको कब किसी ओर ले जाता है, कुछ भी समझ नहीं आता। मगर इस जानून के साथ वो लड़कियां अपनी जिन्‍दगी खो देती हैं, जो जानून के साथ साथ भावुक हो जाती हैं। मैं सब लड़कियों को दोषी नहीं ठहरा रहा, मगर उन लड़कियों को दोषी जरूर मानता हूं, जिनको शॉर्टकट पसंद है। इसके लिए कभी बॉस का सहारा लिया जाता है, कभी आरके शर्मा जैसे पुलिस अधिकारियों का, तो कभी चांद मोहम्‍मद जैसे लोगों का।

जब हम किसी का इस्‍तेमाल कर रहे होते हैं, तो हम यह भूल जाते हैं कि कहीं न कहीं वो भी हमारा इस्‍तेमाल कर रहा है। ऐसे में वो लड़कियां अपनी जान गंवा बैठती हैं, जो बाद में बात दिल पर लगा बैठती हैं। हद से ज्‍यादा कोई किसी पर यूं ही मेहरबान नहीं होता। एक रिपोर्ट में पढ़ा था कि शिवानी भटनागर एक वरिष्‍ठ पत्रकार बनने से पहले जब प्रशिक्षु थी, तो उन्‍होंने अपने सीनियर पत्रकार से शादी की जबकि दोनों की आदतों में बहुत ज्‍यादा अंतर था। उस पत्रकार एवं पति की बदौलत उसको मीडिया में वो रुतबा हासिल हुआ, जो बहुत कम समय में मिलना बेहद मुश्‍िकल था।

इस दौरान उसकी दोस्‍ती पुलिस अधिकारी आरके शर्मा से हुई। दोस्‍ती हदों से पार निकल गई। अंत शायद वो मौत का कारण भी बन गई। फिजा की बात करें तो फिजा कौन थी, एक अधिवक्‍ता अनुराधा बाली। मगर राजनीति के गलियारों में पैठ बनाने के लिए मिला एक शादीशुदा चंद्रमोहन मुख्‍यमंत्री का बेटा। दोनों ने शादी भी कर ली चांद फिजा बनकर। मगर जब फिजा दुनिया से रुखस्‍त हुई तो अफसोस के सिवाय उसके पास कुछ नहीं था।

गीतिका शर्मा ने आत्‍महत्‍या पत्र में गोपाल कांडा एवं कुछ अन्‍य व्‍यक्‍ितयों को दोषी ठहराया है। मगर गीतिका शर्मा की जिन्‍दगी पर ऐसा कौन सा बोझ आ पड़ा था, जो जिन्‍दगी को अलविदा कहकर मौत को गले लगाना पड़ा। गीतिका शर्मा का मामला कोर्ट में है, और पता नहीं कितने दिन चलेगा।

इंसाफ की गुहार लगाने वाला मीडिया गीतिका शर्मा की जन्‍म कुंडली टोटलना शुरू करेगा। कई आरोप, कई अफवाहें बाजार में आएगी। गीतिका शर्मा की आत्‍महत्‍या के पीछे अगर गोपाल कांडा एवं अन्‍य व्‍यक्‍ितयों का हाथ है तो कारण भी ढूंढे जाएंगे कि गीतिका पर ऐसा कौन सा दबाव बनाया जा रहा था, जिसके कारण वो मौत की आगोश्‍ा में सदा के लिए विश्राम करने चली गई।

बस चलते चलते इतना ही कहूंगा कि गीतिका को इंसाफ मिले। आरोपियों को सजा। और इस तरह की घटनाओं को कैरियर बनाने की होड़ में लगी लड़कियों को नसीहत। जिन्‍दगी से बड़ा कुछ नहीं।

एक है गुज्‍जु नरेंद्र मोदी

आंख देश के सिंहासन पर, मगर निगाह जनता की ओर, पूरे हिन्‍दुस्‍तान में ऐसा एक ही व्‍यक्‍ितत्‍व है नरेंद्र मोदी। भले ही भाजपा का अस्‍ितत्‍व खतरे में हो, भले ही भाजपा का कद्दवार नेता लालकृष्‍ण आडवानी किसी गैर सियासती को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बोल रहे हों, मगर जनता केवल एक ही नाम बोल रही है वो नरेंद्र मोदी, जबकि देश के संविधान अनुसार बहुमत हासिल करने वाली पार्टी अपना नेता चुनती है प्रधानमंत्री पद के लिए।

मगर फिर भी देश में आज एक ही नाम गूंज रहा है, वो है नरेंद्र मोदी, जो गुजरात का मुख्‍यमंत्री है, जिसके दामन पर गोधरा दंगों के कथित धब्‍बे भी हैं, मगर वो आलोचनाओं की फिक्र नहीं करता, वो कहता है अगर दोषी हूं तो लटका दो फांसी पर, अगर दोषी नहीं तो जीने दो। आज मोदी को लेकर फेसबुक पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, जिनमें एक है, अगर देश का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होता तो विदेशी संबंधों पर क्‍या असर पड़ता, तो आगे से उत्तर आता है, अगर देश का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होता तो पाकिस्‍तान कश्‍मीर के लिए नहीं हम से लाहौर के लिए लड़ रहा होता। कोई उसको एक है गुज्‍जु लिख रहा है। ताजा न्‍यूज तो यह है कि नरेन्द्र मोदी 24 अगस्त को यूट्यूब पर करेंगे लाइव चैटिंग।

सवाल यह नहीं कि नरेंद्र मोदी देश का प्रधानमंत्री बनेगा या नहीं, मजे की बात तो यह है कि देश का कोई पहला ऐसा मुख्‍यमंत्री है, जो आज देश के प्रधानमंत्री से भी ज्‍यादा लोकप्रिय है। इतना ही नहीं यह वो सेलीब्रिटी नेता है, जिसकी छवि को धूमिल करने के लिए मीडिया ने कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ी, और उसने उभरने के सिवाए किसी और विकल्‍प पर ध्‍यान नहीं दिया। अगर अमेरिका उसको वीजा नहीं देता तो वह टेंशन नहीं लेता, वो वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए अमेरिका में बैठे लोगों से बातचीत करता है, उनकी बातों को ध्‍यान प्रिय सुनता है। वो एक समझदार लीडर की तरह अपने होर्डिंग पर, मैं नहीं, हम व मैं भिक्षुक हूं जैसे शब्‍दों का इस्‍तेमाल करता है।

वो देश के राजनेताओं की तरह अपने एयरकंडिशनर रूमों, गाड़ियों में बैठकर राजपाठ का नजारा नहीं लेता, वो अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाता हुआ बहुत आगे निकल जाता है, वो आज के समय से कदम मिलाता है, वो फेसबुक, टि्वटर, ब्‍लॉग, वेबसाइट व वीडियो चैट के सहारे दुनिया के हर कोने तक पहुंचता है। वो स्‍वप्‍नदर्शी व कर्मठ व्‍यक्‍ित है, जो हर पल आगे की सोचता है, वो किसी के रोकने से रुकता नहीं।

शायद वो यही जिद्द थी, जो वडनगर के गरीब परिवार में पैदा हुए नरेंद्र मोदी को देश के सर्व लोकप्रिय लीडर तक खींच लाई। आज जितना ऊंचा कद नरेंद्र मोदी का है, उतना तो शायद ही किसी लीडर का रहा हो। आज गुजरात की पहचान बन चुका है नरेंद्र मोदी, गुजरात नरेंद्र मोदी की पहचान नहीं। शायद इसलिए कहते हैं कि एक है गुज्‍जु।

अंजलि गोपालन पर 'नाज़' है

इनसे मिलिए ये किसी बड़ी पार्टी की मुखिया नहीं है, कोई सेना की अध्यक्षा नहीं है, किसी बड़े आन्दोलन का हिस्सा नहीं है, ये महिला अधिकारों के लिए भी नहीं लड़ रही, ये कोई बड़ी क्रान्ति नहीं कर रही है पर फिर भी टाइम्स की 100 प्रभावशाली महिला में शामिल है कैसे ? सेवा से, वर्षो से अपनी लगन, अपने सेवा भाव से एड्स पीडितो की मदद कर रही अंजलि गोपालन ने त्यज्य एड्स रोगियों पर काम करना शुरू किया जब ये रोग दुनिया में महामारी बनता जा रहा था वे सही मायनों में भारत की फ्लोरेंस नाईटिनगेल है, उनका नाज़ फाउंडेशन आज भी उसी कार्य में जुटा है. वे टीवी पर नहीं दिखती, किताबो के लेबेल पर नहीं छपती, मार्क्स की बात नहीं करती सुकरात की बात नहीं करती. उन्हें सेवा से मतलब है, जिसमे वे कोई कोर कसार नहीं रखती. पत्रकार एवं न्‍यूज एंकर पूजा शुक्‍ला के फेसबुक से