सोनाक्षी की दूसरी फिल्‍म और जन्‍मदिवस


सोनाक्षी सिन्‍हा, एक ऐसा नाम है। एक ऐसा चेहरा है। जो आज किसी पहचान का मोहताज नहीं। दबंग से पहले भले ही मायानगरी में होने वाली पार्टी में लोग उसको शॉटगन की बेटी के रूप में पहचानते हो, मिलते हो। मगर आज उसकी अपनी एक पहचान बन चुकी है। पहली ही फिल्‍म सुपर डुपर हिट और नवोदित अभिनेत्री पुरस्‍कार भी झोली में आन गिरा। ऐसा नहीं कि ऐसा केवल सोनाक्षी के साथ ही हुआ, पहले भी बहुत सी अभिनेत्रियों के साथ हुआ। मगर सोनाक्षी की आंखों में जो कशिश है, चेहरे पर जो नूर है, वो उसको बिल्‍कुल अलग करता है।

जहां दो जून को सोनाक्षी पच्‍चीस साल की हो जाएगीं, वहीं उनकी दूसरी फिल्‍म राउड़ी राठौड़ उनके जन्‍मदिवस से ठीक एक दिन पहले रिलीज हो रही है। इस फिल्‍म में उनके ऑपोजिट अक्षय कुमार हैं, जिसके सितारे बॉक्‍स ऑफिस पर ठीक बिजनस नहीं कर रहे। मगर दिलचस्‍प बात तो यह भी है कि इस फिल्‍म को प्रभु देवा निर्देशित कर रहे हैं, जिन्‍होंने वांटेड से सलमान खान की फ्लॉप सिरीज पर विराम लगाया था।

इस फिल्‍म के प्रोमो और गीत बताते हैं कि फिल्‍म पूरी तरह दक्षिण से प्रभावित है, आज कल छोटे पर्दे पर दक्षिण फिल्‍मों के हिन्‍दी रूपांतरणों का बोलबाला है। क्‍या प्रभु देवा छोटे पर्दे की तरह बड़े पर्दे पर भी दक्षिण की शैली से प्रभावित फिल्‍म को बॉक्‍स ऑफिस पर हिट करवा पाएंगे। अक्षय को तो फ्लॉप से ज्‍यादा फर्क नहीं पड़ेगा, मगर दबंग से सफलता की सिखर पर चढ़ बैठी सोनाक्षी को थोड़ा सा झटका जरूर लग सकता है, क्‍यूंकि अगले दिन जन्‍मदिवस जो है।

मिस सिन्‍हा अभिनेत्री से पहले फैशन डिजाइनर थी, उन्‍होंने बकायदा इसकी तालिम भी ली हुई है। उन्‍होंने 2005 में आई फिल्‍म मेरा दिल लेके देखो के लिए परिधान डिजाइन किए थे। उन्‍होंने कई फैशन शो भी किए। मगर किसी की नजर इस चेहरे पर नहीं गई। फिर अचानक एक दिन एक समारोह में उस पर सलमान की निगाह पड़ गई, और उन्‍होंने उसको दबंग फिल्‍म में रोल के लिए ऑफर किया। इस फिल्‍म के लिए सोनाक्षी को काफी वजन कम करना पड़ा। मेहनत रंग लाई और फिल्‍म बॉक्‍स ऑफिस पर हिट हो गई। आज सोनाक्षी के पास आधा दर्जन से ज्‍यादा फिल्‍में हैं, जिसमें एकआध फिल्‍म को छोड़कर बाकी सब फिल्‍में अधिक उम्र के स्‍टारों के साथ हैं, जिनमें अक्षय कुमार, अजय देवगन और सलमान खान शामिल हैं।

एक जून को रिलीज होने वाली राउडी राठौर सुपरहिट तेलुगु फिल्म विक्रमारकुडु का हिंदी रीमेक है। कहानी की बात करें तो शिव (अक्षय कुमार) की जो एक चोर है। इस चोर का महिलाओं पर खूब जादू चलता है और वे उसकी दीवानी हो जाती हैं। प्रिया (सोनाक्षी सिन्हा) से शिव की मुलाकात एक ऐसी शादी में होती है जहां उसे बुलाया ही नहीं गया है। प्रिया का वह दीवाना हो जाता है। शिव की जिन्‍दगी में तब समस्या पैदा होती है जब छ: वर्ष की नेहा बेवजह उसे पिता मानने लगती है। शिव इसका पता लगाने की कोशिश करता है कि नेहा उसे अपना पिता क्यों मानती है। नेहा के प्यार और उसके प्रति जिम्मेदारी शिव को इंसान के रूप में बदल देती है। राउडी राठौर कहानी है शिव (अक्षय कुमार) की जो एक चोर है। इस चोर का महिलाओं पर खूब जादू चलता है और वे उसकी दीवानी हो जाती हैं। प्रिया (सोनाक्षी सिन्हा) से शिव की मुलाकात एक ऐसी शादी में होती है जहां उसे बुलाया ही नहीं गया है। प्रिया का वह दीवाना हो जाता है। शिव न केवल नेहा के अतीत से परिचित होता है बल्कि वह बिहार स्थित छोटे शहर के लोगों के लिए वहां के एमएलए और गुंडों के खिलाफ मसीहा बनकर उभरता है।

अब देखना यह है कि सोनाक्षी अक्षय कुमार के साथ अपनी दूसरी हिट फिल्‍म देने में कामयाब होगी या नहीं। वैसे प्रभु देवा की भी यह दूसरी निर्देशित फिल्‍म है। इस फिल्‍म के निर्माताओं में संजय लीला भंसाली का भी नाम है, जो एक बेहतरीन निर्देशकों में गिने जाते हैं।

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

माता पिता के ख्‍वाबों का जिम्‍मा है
मेरे महबूब के गुलाबों का जिम्‍मा है

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

जॉब से छुट्टी नहीं मिलती विद पे
ऐसे उलझे भैया क्‍या नाइट क्‍या डे

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

भगत सिंह की है जरूरत बेहोशी को
मगर यह सपूत देना मेरे पड़ोसी को

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

क्रांति आएगी, लिखता हूं यह सोचकर
वो भी भूल जाते हैं एक दफा पढ़कर

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

अन्‍ना हो रामदेव हो लताड़े जाएंगे
मैडलों के लिए बेगुनाह मारे जाएंगे

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

हैप्‍पी अभिनंदन में सोनल रस्‍तोगी


जुलाई 2009 की कड़कती दोपहर में ''कुछ कहानियां कुछ नज्‍में'' नामक ब्‍लॉग बनाकर गुड़गांव की सोनल रास्‍तोगी ने छोटी सी कविता 'नम आसमान' से ब्‍लॉग जगत में कदम रखा। तब शायद सोनल ने सोचा भी न होगा कि ब्‍लॉग दुनिया में उसकी रचनाओं को इतना प्‍यार मिलेगा। आज हजारों कमेंट्स, सैंकड़े अनुसरणकर्ता, सोनल की रचनाओं को मिल रहे स्‍नेह की गवाही भर रहे हैं। सोनल की हर कविता दिल को छूकर गुजर जाती है, चाहे वो सवाल पूछ रही हो, चाहे प्‍यार मुहब्‍बत के रंग में भीग रही हो, चाहे मर्द जात की सोच पर कटाक्ष कर रही हो। सोनल की कलम से निकली लघु कथाएं और कहानियां भी पाठकों को खूब भाती हैं। आज हैप्‍पी अभिनंदन में हमारे साथ उपस्‍िथत हुई हैं ''कुछ कहानियां कुछ नज्‍में'' की सोनल रस्‍तोगी, जो मेरे सवालों के जवाब देते हुए आप से होंगी रूबरू। तो आओ मिले ब्‍लॉग दुनिया की इस बेहतरीन व संजीदा ब्‍लॉगर शख्‍सियत से।

कुलवंत हैप्‍पी- मैंने आपका ब्‍लॉग प्रोफाइल देखा। वहां मुझे कुछ नहीं मिला, तो फेसबुक पर पहुंच गया। वहां आपने कुछ लिखा है। मैं कौन हूँ ? इसका जवाब जब मिल जाएगा तब अगला सवाल पूछूंगी। क्‍या आपको इसका जवाब अभी तक नहीं मिला। अगर मिल जाए तो अगला सवाल क्‍या होगा?

सोनल रस्‍तोगी-मुझे खुद से सवाल करने का शौक है, हर घटना पर हर मौके पर मैं खुद से बात करती हूँ, हर पात्र के ज़हन में उतरती हूँ, कभी कभी इसी जद्दोजहद में खुद को भूल जाती हूँ, मेरे होने का उद्देश्य कुछ साफ़ तो हुआ है.. अगला सवाल मेरे अस्तित्व की सार्थकता से जुड़ा होगा।

कुलवंत हैप्‍पी - जुलाई 2009 की चीखती दोपहर में आपने 'कुछ कहानियां, कुछ नज्‍में' ब्‍लॉग बनाकर 'नम आसमान' से ब्‍लॉग जगत दस्‍तक दी। अब उस बात को चार साल होने जा रहे हैं। इस दरमियान ब्‍लॉग जगत में गुटबाजी एवं बहुत कुछ हुआ। कभी आप ब्‍लॉग विवादों से परेशान हूं या इसका शिकार?

सोनल रस्‍तोगी - चार साल के छोटे से समय में मुझे एक नई दुनिया दिखाई दी जिसे लोग आभासी दुनिया कहते हैं, पर ये आभासी नहीं है, मुझे यहाँ बहुत से वास्तविक हमखयाल दोस्त मिले, ढेर सारा पढ़ने को और सीखने को भी, रही बात विवादों की तो उनसे बस एक तकलीफ होती है...लोगों की ऊर्जा सृजन की बजाय ..विवादों को हवा देने में व्यर्थ चली जाती है और हम जैसे पाठक अच्छी पोस्टों की प्रतीक्षा करते हैं, अगर कुछ लंबा विवाद चल गया तो, ब्लॉगजगत से ब्रेक लेकर कोई किताब उठा लेते हैं और इंतज़ार करते है सब सामान्य होने का।

कुलवंत हैप्‍पी- मैं जब आपका ब्‍लॉग पढ़ रहा था। वहां हर रचना एक से बेहतर एक थी। मगर प्रतिक्रियाओं में बहुत बड़ा फर्क नजर आया। कुछ अच्‍छी पोस्‍टें भी कम कमेंट्स से गुजारा कर रही थी। क्‍या आप केमेंट्स के आधार पर पोस्‍ट का स्‍तर तय करती हैं या इसके बारे में आपका कोई अपना मापदंड है?

सोनल रस्‍तोगी - तारीफ का शुक्रिया, मेरी रचनाएं ब्लॉग बनने के बाद मेरी डायरी से निकल कर वेब पर आ गई, कमेंट्स प्रोत्साहित तो करते हैं पर उनकी संख्या ज्यादा मायने नहीं रखती, अगर एक भी कमेन्ट ऐसा मिल गया जिसने रचना की आत्मा को समझ लिया बस दिल को संतुष्टि मिल जाती है, मेरी पोस्ट मेरे दिल से मेरी कल्पनाओं से जन्मी होती है, वो तो बस मेरी अभिव्यक्ति है ...जो मुझे सुकून देती है ...स्तर आप लोग तय करें [:-)]

कुलवंत हैप्‍पी- ''हर दिल की तमन्ना होती है, की उसको कोई प्यार करे''। कुछ याद आया सोनल जी। यह आपकी ही एक रचना की एक पंक्‍ित है, जो आपको कटहरे में खड़ा कर पूछ रही है, प्‍यार के बारे में आपकी वैसी ही राय है जैसी आपकी कलम से निकलती है या फिर फर्क है।

सोनल रस्‍तोगी- जो अहमियत रसगुल्ले में रस की होती है, वही मेरी लेखनी और ज़िन्दगी में प्यार की है, प्यार के बिना कोई भावना जन्म ही नहीं लेती दर्द, दुःख, जलन, क्षोभ, मुस्कराहट, सब कहीं न कहीं प्यार से जुड़े हैं, और सच ही तो है अगर नहीं तो आप ही बताइए ऐसा कौन सा दिल है जो प्यार नहीं चाहता। आपने शायद मेरी रचना "मोहब्बत मोहब्बत दिन रात मैं लिखूंगी" नहीं पढ़ी, वैसे भी मेरी आधे से ज्यादा रचनाएं प्यार पर ही है, प्रेम की गायिका हूँ मैं।

कुलवंत हैप्‍पी - आपके प्रोफाइल पर चंद लाइनों के सिवाय कुछ नहीं मिला, इसलिए ब्‍लॉग जगत यह जानना चाहता है कि आप ब्‍लॉगिंग के अलावा असल जिन्‍दगी में और किन किन जिम्‍मेदारियों को अपने कंधों पर उठाकर चल रही हैं?

सोनल रस्‍तोगी - मैं फर्रुखाबाद में जन्मी, माँ से पढ़ने का शौक मिला, स्कूल में लेखन को प्रोत्साहन, विवाह के बाद गुडगाँव आई, बस दिन में जॉब और फुर्सत के पलों में लेखन। मैं चाहती हूँ के ब्लॉग जगत मुझे मेरे लेखन से जाने बस मैं भी अपनी कहानी की तरह "रहस्यमयी" रहना चाहती हूँ।

कुलवंत हैप्‍पी - ब्‍लॉग जगत पर जब भी कविताएं पढ़ने निकलता हूं तो कवित्रियों के ब्‍लॉग पर जाता हूं, मुझे लगता है कि कवियों से बेहतर होती है कवित्रियां, आपका इस बारे में क्‍या विचार है?

सोनल रस्‍तोगी - कवि या कवियत्री मुझे कभी फर्क नहीं दिखा, उत्कृष्ट रचनाएं बस उत्कृष्ट रचनाएं होती हैं जो अपने पाठक का मन मोह लेती हैं कविता हो या कहानी, हर व्यक्ति की कविता कहने की विशेष शैली होती है, भावनाओं की पकड़ होती है जो आपको बाँध लेती है।

कुलवंत हैप्‍पी - ब्‍लॉग जगत को आप अभिव्‍यक्‍ित का एक बेहतर माध्‍यम मानती हैं या नहीं ?

सोनल रस्‍तोगी- ब्लॉगजगत ने डायरी के पन्नो में छुपी रचनाओं को आकाश सा विस्तार दिया है ना केवल अभिव्यक्ति बल्कि रचनाओं की समीक्षा, सुधार और प्रशंसा के अवसर दिए हैं और इससे मिलने वाला आत्मविश्वास आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, ब्लॉगजगत ने हमें वो करने का मौक़ा दिया है जो हम हमेशा से करना चाहते थे पर अपनी व्यस्तताओं के चलते नहीं कर पा रहे थे।

कुलवंत हैप्‍पी - आपकी जिन्‍दगी का कोई ऐसा लम्‍हा हम से सांझा करें, जो कुछ सीख देता हो, जो थोड़े में बहुत कुछ कहता हो।

सोनल रस्‍तोगी - ज़िन्दगी के ऐसे कई अनमोल लम्हों की पोटली मेरी माँ ने मुझे सौंपी है एक बार मुझे कहीं से एक जासूसी उपन्यास मिल गया, मैंने उसे पढ़ना शुरू किया थोडा अश्लील था मेरी माँ ने वो मुझसे माँगा और समझाया "अच्छा पढ़ोगी तो अच्छा सोचोगी, अच्छा सोचोगी तो अच्छा बोलोगी और अच्छा ही लिखोगी, आपकी भाषा और आपका व्यवहार और आपकी सोच पारिवारिक माहौल के साथ आप क्या पढ़ते है इसपर निर्भर करता है।

कुलवंत हैप्‍पी - कुछ दिन पहले वंदना की एक कविता को लेकर ब्‍लॉग जगत में हो हल्‍ला हो गया था। कुछ वैसी ही आपकी कविता है ''देह से परे''। जब महिलाएं प्‍यार मोहब्‍बत की कविताएं लिखती हैं तो वाह वाह लेकिन जब वह मर्दों की सोच पर कटाक्ष करने लगती हैं तो हो हल्‍ला क्‍यूं होने लगता है, इस बारे में आप क्‍या कहती हैं?

सोनल रस्‍तोगी - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को है, किसी विषय पर हर व्यक्ति स्वतंत्र है अपने विचार रखने के लिए, अगर आपको नापसंद है या आपके विचारों से मेल नहीं खाते तो मत पढ़िए, टी वी, सिनेमा हर जगह यही बात लागू होती है चाहे "डर्टी पिक्चर" हो या "लज्जा " अगर कोई अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है तो आप उसे ना देखने या ना पढ़ने के लिए भी स्वतंत्र हैं।

कुलवंत हैप्‍पी - ब्‍लॉग जगत के नाम एक संदेश, जो आप देना चाहें।
सोनल रस्‍तोगी - हम सभी को एक सांझा मंच मिला है सार्थक लिखने और पढ़ने के लिए, छोटे बड़े शहरों और घटनाओ को वहीं के बाशिंदों की आँखों से देखने और जानने के लिए। हमारे उद्देश्य और सरोकार बहुत बड़े है, अभी तो शुरूआत है।

सोनल रस्‍तोगी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया, जो आप ने अपने कीमती समय से समय निकालकर हम से बातचीत की।

मेंढ़क से मच्‍छलियों तक वाया कुछेक बुद्धजीवि

अमेरिका और भारत के बीच एक डील होती है। अमेरिका को कुछ भारतीय मेंढ़क चाहिए। भारत देने के लिए तैयार है, क्‍यूंकि यहां हर बरसाती मौसम में बहुत सारे मेंढ़क पैदा हो जाते हैं। भारत एक टब को पानी से भरता है, और उसमें उतने ही मेंढ़क डालता है, जितने अमेरिका ने ऑर्डर किए होते हैं। भारतीय अधिकारी टब को उपर से कवर नहीं करते। जब वो टब अमेरिका पहुंचता है तो अमेरिका के अधिकारियों को फोन आता है, आपके द्वारा भेजा गया टब अनकवरेड था, ऐसे में अगर कुछ मेंढ़क कम पाएगे तो जिम्‍मेदारी आपकी होगी। इधर, भारतीय अधिकारी पूरे विश्‍वास के साथ कहता है, आप निश्‍िचंत होकर गिने, पूरे मिलेंगे, क्‍यूंकि यह भारतीय मेंढ़क हैं। एक दूसरे की टांग खींचने में बेहद माहिर हैं, ऐसे में किस की हिम्‍मत कि वो टब से बाहर निकले। आप बेफ्रिक रहें, यह पूरे होंगे। एक भी कम हुआ तो हम देनदार।

जनाब यहां के मेंढ़क ही नहीं, कुछ बुद्धिजीवी प्राणी भी ऐसे हैं, जो किसी को आगे बढ़ते देखते ही उनकी टांग खींचना शुरू कर देते हैं। आज सुबह एक लेख पढ़ा, जो सत्‍यमेव जयते को ध्‍यान में रखकर लिखा गया। फेसबुक पर भी आमिर खान के एंटी मिशन चल रहा है। कभी उसकी पूर्व पत्‍नी को लेकर और कभी गे हरीश को लेकर, लोग निरंतर आमिर को निशाना बना रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि आमिर कुछ नया नहीं कर रहे, वो पुराने घसीटे पिटे मुद्दे उठाकर हीरो बनने की कोशिश कर रहे हैं। पैसे के लिए कर रहे हैं। राजस्‍थान पत्रिका में दवेंद्र शर्मा लिखते हैं कि टैलीविजन वाले असली हीरोज को आगे लाएं, क्‍यूंकि लोग असली हीरोज को देखना चाहते हैं।

चलो एक बार मान भी लेते हैं कि आमिर खान पैसे कमाने के लिए यह सब कर रहा है। वो लोगों की निगाह में हीरो बनना चाहता है। फिर मैं बुद्धिजीवियों से सवाल करता हूं कि आखिर आमिर खान कौन है। तो लाजमी है, जवाब आएगा अभिनेता। मेरा अगला सवाल होगा, अभिनेता क्‍या करता है। तो उनका जवाब होगा अभिनय। लोग भी तो यह कह रहे हैं कि आमिर अभिनय कर रहे हैं, अगर आमिर अभिनय नहीं करेगा तो कौन करेगा।

अगर इस अभिनय से किसी को फायदा होता है तो बुराई क्‍या है। पिछले दिनों एनडीटीवी न्‍यूज एंकर रविश कुमार ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर लिखा कि उसको अंग्रेजी पत्रिका आऊटलुक नहीं मिली, क्‍यूंकि उस पर आमिर का फोटो छपा था। जाने अनजाने में ही सही, लेकिन आऊटलुक को फायदा तो हुआ। अब लोगों को आमिर में रुचि कुछ ज्‍यादा होने लगी है, मतलब लोग आमिर को सुनना चाहते हैं, उसके बारे में पढ़ना चाहते हैं। हम को खुशी होनी चाहिए कि जो मुहिम कुछ आम लोगों ने शुरू की। आज उन मुद्दों को आमिर खान जैसी हस्‍ती का समर्थन मिल रहा है, चाहे वह अभिनय के तौर पर ही सही।

न आना इस देस लाडो हो, अगले जन्‍म मोहे बिटिया कीजिये हो या चाहे बालिका बधु हो टेलीविजनों की एक अच्‍छी पहल थी बुराईयों के खिलाफ। बुराई के खिलाफ आवाज न सही, तो एक हूक ही काफी है, क्‍यूंकि डूबते को तिनके का सहारा होता है। बुराई के खिलाफ उठी आवाज को हम दबाने में जुट जाते हैं, और फिर कहते हैं कि बुराई तेजी से बढ़ रही है। बुराई के खिलाफ उठ रही आवाज को सुनो। आमिर है या अन्‍ना है, गली का कोई आम आदमी है। यह मत देखो। अगर कुछ कर नहीं सकते, तो करने वालों को मत रोको।

मैं एक छोटी सी कहानी कहते हुए अपनी बात को विराम देने जा रहा हूं। एक बच्‍चा दौड़ दौड़ कर समुद्र के किनारे गिरी हुई मछलियों को वापिस समुद्र में फेंक रहा था, तो उसके दादा ने कहा, बेटा किस किस को बचाओगे, तो बच्‍चे ने कहा, लो यह तो बच गई। लो यह भी बच गई। एक एक मच्‍छली को उठाकर वापिस समुद्र में फेंकते हुए बच्‍चा उक्‍त वाक्‍य बोलता हुआ आगे बढ़ रहा था। उम्‍मीद है कि बुराई के खिलाफ लड़ने वाले ऐसे ही आगे बढ़ते रहें। बोलने वाले बोलते रहेंगे।

आमसूत्र कहता है; मिलन उतना ही मीठा होता है

आमसूत्र कहता है कि लालच को जितना पकने दो, मिलन उतना ही मीठा होता है। सबर करो सबर करो, और बरसने दो अम्‍बर को। गहरे पर सुनहरे रंग तैरने दो, बहक यह महकने दो, क्‍यूंकि सबर का फल मीठा होता है, मीठे रसीले आमों से बना मैंगो स्‍लाइस, आपसे मिलने को बेसबर है। आम का मौसम है। बात आम की न होगी तो किसकी होगी। मगर अफसोस के आम की बात नहीं होती। संसद में भी बात होती है तो खास की। आम आदमी की बात कौन करता है। अब जब उंगलियां 22 साल पुरानी इमानदारी पर उठ रही हैं तो लाजमी है कि खास जज्‍बाती तो होगा ही, क्‍यूंकि आखिर वह भी तो आदमी है, भले ही आम नहीं। जी हां, पी चिदंबरम। जो कह रहे हैं शक मत करो, खंजर खोप दो। वो कहते हैं बार बार मत बहस करो। कसाब को गोली मार दो। आखिर इतने चिढ़चिढ़े कैसे हो गए चिदंबरम। चिदंबरम ऐसे बर्ताव कर रहे हैं, जैसे निरंतर काम पर जाने के बाद आम आदमी करने लगता है। वो ही घसीटी पिट राहें। वो ही गलियां। वो ही चेहरे। वो ही रूम। वो ही कानों में गूंजती आवाजें। लगता है चिदंबरम को हॉलीडे पैकेज देने का वक्‍त आ गया।

शायद मेरा सुझाव वैसा ही जैसा, दिलीप कुमार को देवदास रिलीज होने के बाद कुछ डॉक्‍टरों ने दिया था, अब आप थोड़ी कॉमेडी फिल्में करें अन्यथा आपको मानसिक विकार हो जाएंगे। मुझे भी लगता है कि अगर चिदंबरम को कांग्रेस ने थोड़ी सी राहत न दी तो उनको भी कुछ ऐसा ही हो सकता है, क्‍यूंकि अब वो जज्‍बाती होने लगे हैं। जब आदमी जज्‍बाती होता है तो छोटी छोटी बातें भी दिल को लगने लगती हैं। वो बात खास हो या आम हो। आम से याद आया, हमने बात आम से शुरू की थी। फिर क्‍यूं न आम पर ही लौटा जाए।

जो पंक्‍ितयां मैंने शुरूआत में लिखी, वह पंक्‍ितयां पाकिस्‍तानियों को स्‍लाइस बेचने के लिए शीतल पेय बनाने वाली कंपनी इस्‍तेमाल कर रही है। इस विज्ञापन को देखने के बाद एक बात दिमाग में खटकने लगी। हिन्‍दुस्‍तान और पाकिस्‍तान कभी एक हुआ करते थे। दोनों के बीच केवल एक लाइन का तो फासला है। मगर दोनों देशों में प्रसारित होने वाले एक ही कंपनी के विज्ञापन में इतना बड़ा फासला कैसे?

भारत में जब स्‍लाइस बिकता है तो बड़े ग्‍लेमर के साथ बेचा जाता है, मगर जब वो ही पाकिस्‍तान में बेचने की बारी आती है तो शब्‍दों का जाल बुना। ऐसा क्‍यूं। वहां पर कैटरीना कैफ की कत्‍ल अदाओं से ज्‍यादा आम पर फॉकस किया जाता है। आमसूत्र क्‍या कहता है, यह बताया जाता है। दर्शकों को बंधने के लिए शब्‍दों का मोह जाल बुना जाता है। मगर जब इंडियन स्‍क्रीन होती है तो कैटरीना कैफ कत्‍ल अदाओं से हमले करते हुए हाथ में स्‍लाइस लेकर जीन्‍स टी शर्ट पहने एंटरी मारती है। अपने होंठों से, स्‍टाइल से, चाल से, बैठने के ढंग से, कपड़ों से, इशारों से विज्ञापन में भी कामुकता पैदा करने की कोशिश की जाती है।

भारत और पाकिस्‍तान में कितना बड़ा अंतर है। इस बात की पुष्‍टि करता है यह मैंगो स्‍लाइस का विज्ञापन। भारत में आजादी के नाम पर किस तरह ग्‍लेमर परोसा जाता है। यह तो हम सब जानते हैं। मगर पाकिस्‍तान में डर के कारण कितना संजीदा रहना पड़ता है, इस विज्ञापन से ही समझा जा सकता है।


लेकिन मेरी भैंस तो गई पानी में

पत्रकार क्‍लीन दास सुबह सुबह अपना साइकिल लेकर ऑफिस की तरफ कूच करते हैं। जैसे ही वो ऑफिस के पास पहुंचते हैं, तो उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। दफ्तर के सामने लगी चाय की लारी वाला गन्‍ने का जूस बनाने की तैयारी कर रहा है। पत्रकार क्‍लीन दास टेंशन में। आखिर चाय वाले को ऐसी क्‍या सूझी कि उसने चाय की जगह, गन्‍ने का जूस बनाने की ठान ली। क्‍लीन दास घोर चिंता में, अब मेरा क्‍या होगा, मेरा तो चाय के बिना चलता ही नहीं। इतने में क्‍लीन दास के अंदर का जिज्ञासु पत्रकार जागा, और चाय वाले से जाकर पूछने लगा, जो अब जूस वाला बनने की तैयारी कर रहा है, तुम को क्‍या हो गया, एक दम से गन्‍ने का जूस बनाने लग गए। चाय वाला बोला, सर आज का न्‍यूज पेपर नहीं पढ़ा आपने। पत्रकार चौंका, आखिर ऐसा क्‍या छपा है अख़बार में, जो चाय वाला जूस वाला बनने की ठान बैठा। अंदर का डर भी जागा। कहीं कोई बड़ी ख़बर तो नहीं छूट गई। लगता है आज संपादक से डांट पड़ेगी। पत्रकार क्‍लीन दास डर को थोड़ा सा पीछे धकेलते हुए बोलता है, आखिर अख़बार में ऐसा क्‍या छपा है, जो तुम चाय का कारोबार छोड़कर गन्‍ने का जूस बनाने लग गए। क्‍या बात करते हैं क्‍लीन दास सर। आज के फ्रंट पेज पर एक समाचार लगा है कि पत्रकारिता को पीलिया हो गया। बस फिर क्‍या था, मुझे याद आया, जब मुझे पीलिया हुआ था और डॉक्‍टर ने गन्‍ने का जूस पीने की सलाह दी थी। मैंने सोचा, अब अपने ऑफिस वाले चाय तो पीएंगे नहीं, तो क्‍यूं न गन्‍ने की लारी लगा लूं, आपको भी सुविधा रहेगी, और मेरा भी घर चलता रहेगा। चुप चुप चुप क्षुब्‍ध होकर पत्रकार क्‍लीन दास बोला। दुकान वाला चौंक गया, आखिर क्‍लीन दास को गुस्‍सा क्‍यूं आ गया। उसने ऐसा क्‍या कह दिया, जो पत्रकार को गुस्‍सा आ गया। क्‍लीन दास को विनम्र भाव में चाय वाला पूछता है, सर जी क्‍या वो ख़बर किसी ने झूठी प्रकाशित कर दी। पत्रकार क्‍लीन दास शांत होते हुए बोला, वो पीलिया और बीमारी वाला पीलिया अलग अलग है भाई। पत्रकारिता की भाषा तुम्‍हारी समझ से परे है। अच्‍छा अच्‍छा सर। मुझ गरीब को क्‍या पता, मैं तो समझा अपने ऑफिस वालों को पीलिया हो गया। इस लिए तो गन्‍ने के जूस की लारी लगा रहा था। साहिब पत्रकारिता को पीलिया हुआ है या नमूनिया मुझे नहीं पता, लेकिन मेरी भैंस तो गई पानी में।                                       आत्‍म प्रेरक कथा

सिर्फ नाम बदला है

वो बारह साल की है। पढ़ने में अव्‍वल। पिता बेहद गरीब। मगर पिता को उम्‍मीद है कि उसकी बेटी पढ़ लिखकर कुछ बनेगी। अचानक एक दिन बारह साल की मासूम के पेट में दर्द उठता है। वो अपने मां बाप से सच नहीं बोल पाती, अंदर ही अंदर घुटन महसूस करने लगती है। आखिर अपने पेट की बात, अपनी सहेली को बताती है, और वो मासूम सहेली घर जाकर अपने माता पिता को।

अगली सवेर उसके माता पिता कुछ अन्‍य पड़ोसियों को लेकर स्‍कूल पहुंचते हैं और स्‍कूल में मीटिंग बुलाई जाती है। बिना कुछ सोच समझे एक तरफा फैसला सुनाते बारह साल की मानसी को स्‍कूल से बाहर कर दिया जाता है। टूट चुका पिता अपनी बच्‍ची को लेकर डॉक्‍टर के यहां पहुंचता है, तो पता चलता है कि बच्‍ची मां नहीं बनने वाली, उसके पेट में नॉर्मल दर्द है। मगर डॉक्‍टर एक और बात कहता है, जो चौंका देती है, कि मानसी का कौमार्य भंग हो चुका है।

गरीब पिता अपनी बच्‍ची को किसी दूसरे स्‍कूल में दाखिल करवाने के लिए लेकर जाता है, तो रास्‍ते में पता चलता है कि उसकी बेटी को पेट का दर्द देने वाला कोई और नहीं, उसी की जान पहचान का एक कार चालक है, जो खुद दो बच्‍चों का बाप है। अगली सुबह मानसी को दूसरे स्‍कूल से भी निकाल दिया जाता है। बुरे वक्‍त में एक टीचर मानसी की मदद के लिए आगे आती है।

टीचर के कहने पर पुलिस अधिकारी कारवाई के लिए तैयार होता है। मगर गरीब पिता इज्‍जत की दुहाई देते हुए पीछे हट जाता है। अंत में एक समाज सेवी संस्‍था मानसी को किसी दूसरे स्‍कूल में दाखिला दिलाने में सफल होती है, और गरीब मजबूर पिता दोषी के खिलाफ कारवाई करने की बजाय हाथ जोड़कर दोषी को कहता है अब मुंह बंद रखना। भले की कुछ समय बाद मानसी पेट से दर्द से उभर आए, मगर क्‍या वह मासूम जिन्‍दगी भर बचपन में मिले इस दर्द से कभी उभर पाएगी।                                                                   (क्राइम पैट्रोल दस्‍तक अनूप सोनी के साभार से)

अभी कुछ दिन पहले बाल यौन शोषण को लेकर एक बिल पास हुआ है। जो ऐसा करने वाले को दंडित करेगा। मगर हर गरीब पिता इस तरह दोषियों के आगे हाथ जोड़कर खड़ा होगा तो उक्‍त कानून दोषियों को दंडित कैसे कर पाएगा। ऐसे लोगों के खिलाफ चुपी नहीं, संग्राम होना चाहिए। यह क्राइम पैट्रोल दस्‍तक की मानसी थी, अनूप सोनी इससे भले ही महाराष्‍ट्र से कहे, लेकिन मैं तो इसे भारत से कहूंगा। यह भारत के किसी भी कोने में हो सकती है। जब कभी भी आपको ऐसी दस्‍तक सुनाई दे, तो आवाज उठाएं अन्‍याय के खिलाफ। एक जुर्म के खिलाफ। एक बेटी के हक में। वो अनामिका हो सकती, वो चुलबुल हो सकती, वो शांति हो सकती है, हमने तो सिर्फ नाम बदला है।

जब नेता फंसे 'बड़े आराम से'

बड़े आराम से। यह संवाद तो आप ने जरूर सुना होगा, अगर आप टीवी के दीवाने हैं। अगर, नहीं सुना तो मैं बता देता हूं, यह संवाद छोटे नवाब सैफ अली खान बोलते हैं, अमूल माचो के विज्ञापन में। अमूल माचो पहनकर सैफ मियां, एक हत्‍या की गुत्‍थी को ''बड़े आराम से'' सुलझा लेते हैं, क्‍यूंकि ''अमूल माचो'' इतनी पॉवरफुल बनियान है कि मरा हुआ आदमी खुद उठकर बोलता है कि उसका खून किसने किया। इस विज्ञापन को देखने के बाद सरकार को शक हुआ कि जो घोटाले बड़े आराम से सामने आए हैं, उसमें अमूल माचो का बड़ा हाथ है।

घोटालों के सामने आते ही सरकार ने गुप्‍त बैठक का आयोजन कर नेताओं को सतर्क करते हुए कहा कि वह ''अपना लक पहनकर चलें'' मतलब लक्‍स कॉजी पहनें, वरना पकड़े जाने पर सरकार व पार्टी जिम्‍मेदार नहीं होगी। गुप्‍त बैठक से निकलकर नेता जैसे ही कार में बैठकर लक्‍स कॉजी लेने के लिए निकले तो रास्‍ते में ट्रैफिक पुलिस वाले ने नेता की गाड़ी को रोक लिया। नेता गुस्‍से में आ गए, आते भी क्‍यूं न जनाब। आखिर परिवहन मंत्री हैं, और उनके वाहन को बीच रास्‍ते रोक दिया जाए, बुरा तो लगेगा ही। ट्रैफिक पुलिस वाला कहता है, सर जी जो रूपा फ्रंटलाइन पहनते हैं, वही फ्रंट में रहते हैं।

नते ही नेता का सिर चक्‍कर खा गया, साला अभी तो गुप्‍त बैठक में बोल रहे थे, अपना लक पहनकर चलें, अभी यह पुलिस वाला बोल रहा है जो रूपा फ्रंटलाइन पहनते हैं, वही फ्रंट में रहते हैं। नेता जी दुविधा में फंस गए, आखिर कौन सी पहनूं, फ्रंट वाली या लक वाली। नेता को दुविधा में देख बीरबल जैसा तेज दिमाग पीए बोलता है, सर जी दोनों की एक साथ क्‍यूं नहीं पहन लेते। बात नेता को जम गई।

नेता तुरंत गाड़ी में बैठकर मॉल की ओर चल दिए। आखिर भाई नेता हैं, छोटी मोटी दुकान में थोड़ा न जाएंगे। नेता जैसे ही मॉल में पहुंचे तो टीवी चल रहा था, नीचे समाचारों की पट्टी चल रही थी, वो समाचार पट्टी को पढ़ने लगे ही थे कि अचानक स्‍क्रीन पर आकर अक्षय कुमार बनियान पहने कुछ गुंडा की पिटाई करने लगा। पिटाई करने के बाद जाते जाते ''होम डिलीवरी भी देता हूं। मैडम आपका बटन खुला है। फिट है तो हिट है बॉस।'' जैसे संवाद बोलता है। अब नेता के मन में फिर लड्डू फूटा। उसको एक नेता मित्र की याद आई। जो आशिक मिजाज था, वैसे अब नेताओं की छवि भी कुछ ऐसी बन गई है।

अब सोचा, क्‍यूं न इसे भी खरीद लिया जाए। तीनों एक साथ पहनकर चलेंगे, बड़े आराम से। अगले दिन नेता तीनों पहनकर कार्यालय में पहुंच गए। इतने में उनका नाम भी एक घोटाले में आ गया। नेता ने अपनी पार्टी प्रमुख को फोन लगाकर बोला कि उन्‍होंने तो वैसा ही किया था, जैसा पार्टी ने कल मीटिंग में बताया, लेकिन मेरा नाम फिर भी घोटाले में कैसे आया गया। तो आगे से फोन में पार्टी प्रमुख गुस्‍सेल मूड में कहते हैं, क्‍या नेता लोग ही केवल नकली चीजें बेच सकते हैं, दुकानदार नकली ब्रांड नहीं बेच सकता, अरे गधे। फोन कट, नेता कैचअप।

वॉट्स विक्‍की डॉनर रिटर्न

मोबाइल के इनबॉक्‍स में नॉन वेज चुटकले। सिनेमा हॉल पर दो अर्थे शब्‍द हमको हंसाने लगे हैं। कॉलेज में पढ़ने वाले युवक युवतियों को विक्‍की डॉनर पसंद आ रहा है। उनको द डर्टी पिक्‍चर की स्‍लिक भी अच्‍छी लगती है। उनको दिल्‍ली बेली की गालियों में भी मजा आता है। वैसा ही मजा, जैसा धड़ा सट्टा लगाने वालों को बाबे की गालियों से, जिससे वह नम्‍बर बनाते हैं, और पैसा दांव पर लगाते हैं।

सिनेमा अपने सौ साल पूरे कर रहा है। पॉर्न स्‍टार अब अभिनेत्री बनकर सामने आ रही है। अब अभिनेत्री को अंगप्रदर्शन से प्रहेज नहीं, क्‍यूंकि अभिनय तो बचा ही नहीं। दर्शकों को सीट पर बांधे रखने के लिए दो अर्थे शब्‍द ढूंढने पड़ रहे हैं। भले ही हम एसीडिटी से ग्रस्‍त हैं, मगर मसालेदार सब्‍जी के बिना खाना अधूरा लगता है। बाप बेटा दो अर्थे संवादों पर एक ही हाल में एक साथ बैठकर ठहाके लग रहे हैं। बाप बेटी ''जिस्‍म टू'' मिलकर नई पीढ़ी के लिए सेक्‍स मसाला परोस रहे हैं। ठरकी शब्‍द गीतों में बजने लगा है और हम इसकी धुन पर झूमने लगे हैं।

बस हमारी प्रॉब्‍लम यह है कि हमको खुलकर कुछ भी नहीं करना। हमको ऊपर से विद्रोह करना है। एक तरफ हम ''द डर्टी पिक्‍चर'' को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से नवाजते हैं और वहीं दूसरी तरफ टीवी पर प्रसारित होने से रोकते हैं। हमें सिनेमा हॉल में बेपर्दा होती हीरोइनें अच्‍छी लगती हैं, मगर पत्‍नी के सिर से सरका पल्‍लू भी संस्‍कृति का उल्‍लंघन नजर आता है। जब सेक्‍स एजुकेशन की बात आती है तो पूरा देश संस्‍कृति का हवाला देते हुए इसका विरोध करता है। हम को आधी अधूरी, लूका छिपी पसंद है। पिछले कुछ सालों से रुपहले पर्दे पर सेक्‍स परोसा जा रहा है, कभी हवा के नाम पर, कभी हेट स्‍टोरी के नाम पर। कभी ''द डर्टी पिक्‍चर'' के नाम पर, कभी विक्‍की डॉनर के नाम पर। उस पर हम को एतराज नहीं।

जबकि इस पर एतराज होना चाहिए। हम मनोरंजन के नाम पर युवा पीढ़ी को गलत दिशा की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्‍साहन दे रहे हैं। मुझे याद है, जब दिल्‍ली बेली रिलीज हुई थी, तो आपकी अदालत में आमिर खान से रजत शर्मा ने सफाई मांगी थी। आमिर के शब्‍द थे, आज जो लोग देखते हैं, वो हमको परोसना पड़ता है। तो कुछ लड़कियों ने आमिर की स्‍पोट करते हुए कहा था, इससे लड़कियों को भी गालियां सीखने का मौका मिलेगा, ताकि हम भी लड़कों को उनकी भाषा में जवाब दे सकें। हम गांव की चौपाल से निकल कर शहर की तरफ आए थे। इस उम्‍मीद से कि हम अपनी बोली को बदलेंगे, एक नए समाज का सर्जन करेंगे, जहां गाली गालोच नहीं होगा। एक सभ्‍य भाषा होगी। मगर आज हम उनकी गालियों पसंद कर रहे हैं। दो अर्थे शब्‍दों को अहमियत दे रहे हैं।

डॉक्‍टर चढ्ढा की गालियां, सास बहू का शराब पीना, युवक स्‍पर्म दान करना, शादी का टूटना जुड़ना, स्‍पर्म डॉनर का बच्‍चे को गोद लेना। यह है विक्‍की डॉनर। जो बातें कहने की थी, वह तो मसाला डालने के चक्‍कर में कहीं दबकर मर गई। यह कोई पहली बार नहीं हुआ। फिल्‍म जगत में बहुत बार हुआ। मगर अफसोस। हमारी दोहरी सोच कब बदलेगी। हम कब देखें कि एक ही चश्‍मे से। विक्‍की डॉनर के किरदारों की तरह लापरवाह मत बनिए।

वॉट्स विक्‍की डॉनर

विक्‍की डॉनर  को लेकर तरह तरह की प्रक्रिया आई और आ भी रही हैं। फिल्‍म बॉक्‍स आफिस पर धमाल मचा रही है। फिल्‍म कमाल की है। फिल्‍म देखने लायक है। मैं फिल्‍म को लेकर उत्‍सुक था, लेकिन तब तक जब तक मुझे इसकी स्‍टोरी पता नहीं थी।

मुझे पहले पोस्‍टर से लगा कि विक्‍की डॉनर, किसी दान पुण्‍य आधारित है। शायद एक रिस्‍की मामला लगा। जैसे सलमान की चिल्‍लर पार्टी। मगर धीरे धीरे रहस्‍य से पर्दा उठने लगा। हर तरफ आवाज आने लगी, विक्‍की डॉनर, सुपर्ब। बकमाल की मूवी।

मैं पिछले दिनों सूरत गया। वहां मैंने पहली दफा इसका ट्रेलर देखा। ट्रेलर के अंदर गाली गालोच के अलावा कुछ नजर नहीं आया। दान पुण्‍य तो दूर की बात लगी।
इस ट्रेलर के अंदर डॉ.चढ्ढा एक संवाद बोलता है, ''जनानियों के जब बच्‍चे नहीं होते थे, तो ऋषि मुनियों को बुला लिया जाता था, बाबा कहता था तथास्‍तु।'' एवं इशारे में बहुत कुछ कहता है डॉक्‍टर चढ्ढा। इसको देखने बाद सोचा। मीडिया में किसी बात की सराहना हो रही है। गलियों की। गलत दिशा देने के प्रयास की।

दोस्‍ताना आई, जिसमें घर किराने पर लेने के लिए हम युवकों को 'गे' होने की ओर धकेलते हैं। फिल्‍म देसी ब्‍यॉज में जॉब न मिलने के अभाव में युवकों को लड़कियों का दिल बहलाने की तरफ मोटिवेट करते हैं। फिल्‍म रॉकस्‍टार में एक युवती के जरिए हम लड़कियों को शादी से पहले सब कर लेने की तरफ धकेलते हैं। मगर जब ''द डर्टी पिक्‍चर'' आती है तो हम कहते हैं, सिने दुनिया की ओर जा रही है, यह देखने की बजाय कि हम किस ओर जा रहे हैं?

जब ''द डर्टी पिक्‍चर'' की स्‍िलक दो अर्थे संवाद बोलती है तो हम को अटपटा लगता है, मगर डॉक्‍टर चढ्ढा बात बात पर गाली देता है। वो अच्‍छा लगता है। फिल्‍म के ज्‍यादातर संवाद पंजाबी हैं। शायद कुछ को तो समझ भी नहीं पड़े होंगे। सोचने वाली बात है कि फिल्‍म किस पर बनी। स्‍पर्म पर बनी है। यह स्‍पर्म क्‍या है? क्‍या स्‍पर्म आम बात है? क्‍या ''द डर्टी पिक्‍चर'' से इसको अलग किया जा सकता है?

मेरे दिमाग में एक और बात खनकी। सच में क्‍या फिल्‍म बेहतरीन श्रेणी में आती है? क्‍या असल में फिल्‍म सुपरहिट है? फिल्‍म के सुपरहिट होने के क्‍या मानक हैं?
क्‍या इसको सफलता का मानक मान लिया जाए, कि अगर फिल्‍म बॉक्‍स ऑफिस पर लागत से ज्‍यादा पैसा बटोरे तो फिल्‍म सफल कम बटोरे तो असफल। या फिर कोई सफलता का कोई और मानदंड होना चाहिए। एक फिल्‍म बारह करोड़ बटोरती है और एक फिल्‍म डेढ़ सौ करोड़। क्‍या दोनों सुपरहिट की श्रेणी में आनी चाहिए?

ऐसा नहीं कि इस विषय को पहली बार सिने जगत ने छूआ है। इससे पहले चोरी चोरी चुपके चुपके में एक सरोगेट मदर को हायर किया जाता है। जिसमें एक पत्‍नी अपने पति को दूसरी महिला से संबंध बनाने की आज्ञा देती है। अपने संतान मोह को पूरा करने के लिए। फिल्‍म एकलव्‍य में अमिताभ बच्‍चन अपनी मालिकन को संतान सुख प्रदान करता है। जब यह सब देखता हूं तो नाजायज शब्‍द मुझे बेईमानी नजर आता है। पुरानी फिल्‍मों में यह शब्‍द बहुत सुना। मगर नाजायज वास्‍तव में क्‍या है? क्‍या चोरी चोरी चुपके चुपके में प्रीति जिंदा की कोख से पैदा हुआ बच्‍चा नाजायज ? क्‍या फिल्‍म एकलव्‍य में पैदा हुआ बच्‍चा नाजायज नहीं?

विक्‍की डॉनर क्‍या है? क्‍या ऐसे डॉनरों की समाज को जरूरत है? क्‍या हमारे बच्‍चे सेक्‍स से पहले स्‍पर्म के बारे में जानें? या आज का अशिक्षित वर्ग अपने स्‍वर्थ के लिए मनोरंजन के लिए नाजायज को भी जायज बनाने की तरफ कदम बढ़ा रहा है। एक तरफ इसको ''द डर्टी पिक्‍चर'' में गंदगी नजर आती है, वहीं दूसरी तरफ विक्‍की डॉनर में उनको बकमाल नजर आता है। विक्‍की जैसे युवक को डॉनर में तब्‍दील करने के लिए डॉक्‍टर चढ्ढा अश्‍लील सीडीयां उपलब्‍ध करवाता है तो हम को एतराज नहीं, मगर द डर्टी पिक्‍चर में विद्या दो अर्थी बात करती है तो बुरा मान जाते हैं हम। रॉकस्‍टार में लड़की एक अनजान युवक के साथ जंगली जवानी का आनंद उठाती है, तो भी हम कहते हैं इतना तो चलता है?

चलते चलते  मैं इतना ही कहूंगा कि हमारे स्‍वार्थ पूरे हों तो नाजायज कुछ नहीं, अगर हमारे स्‍वार्थ पूरे नहीं होते तो सब नाजायज है।
बहुत जल्‍द लौट रहा हूं
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वॉट्स विक्‍की डॉनर रिटर्न

मुलाकात :- रिचर्ड ब्रॉनसन; जब खरगोश खा गए पेड़

 कल रात करीबन दो घंटों तक रिचर्ड ब्रानसन से बातचीत की। बेहद रोचक व्‍यक्‍ित हैं रिचर्ड ब्रानसन। दुनिया उनको एक बिजनसमैन के रूप में जानती है या फिर यूके के सबसे अमीर चौथे व्‍यक्‍ित के रूप में। वर्जिन ग्रुप के मालिक हैं रिचर्ड ब्रानसन।

कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कहां राजा भोज कहां गंगू तेली। मतलब कहां रिचर्ड ब्रानसन और कहां मैं। यह बात भी सच है, उसको हिन्‍दी नहीं आती और मुझे फराटेदार इंग्‍लिश। फिर भी हैरत की बात यह है कि मैंने उनको दो घंटों तक पूर्ण रूप से सुना और उनको समझा। वो मेरे सामने थे, उनकी आवाज मेरे कानों के पर्दो से गुजरती हुई मेरे मन और दिमाग पर अपना असर छोड़ रही थी। मैं सोच रहा था, इतना बड़ा बिजनसमैन। और हरकतें ऐसी करता है जैसे वो अभी अभी युवा हुआ हो। मैं फिर कहता हूं बेहद रोचक व्‍यक्‍ित। दिलचस्‍प व्‍यक्‍ितत्‍व का मालिक है रिचर्ड ब्रानसन। डिसलेक्‍िसया की बीमारी से ग्रस्‍त व पढ़ाई में बिल्‍कुल निकम्‍मा, लेकिन असल जिन्‍दगी में दुनिया के नम्‍बर वन बिजनसमैनों की श्रेणी में शुमार है, रिचर्ड ब्रॉनसन।

रिचर्ड ब्रानसन कहते हैं कि अख़बार वाले उससे और उसके वर्जिन कंपनी के साथियों को ''स्‍वर्ग में रहने वाले विद्रोही'' कहते हैं। जब रिचर्ड ब्रानसन खुद को विद्रोही कहता है तो उसको सुनने की रुचि और तीव्रता से बढ़ जाती है, क्‍योंकि विद्रोही सुनते ही एप्‍पल फेम स्‍टीव जॉब्‍स के शब्‍द दिमाग में दौड़ने लगते हैं, विद्रोहियों की सुनो, पागलों की सुनो, संकट पैदा करने वालों की सुनो।

स्‍टीव जॉब्‍स के शब्‍दों ने मुझे रिचर्ड ब्रानसन के और करीब कर दिया। अब मुझे उनकी बातों में और दिलचस्‍पी पैदा होने लगी। रिचर्ड ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, मीडिया वाले झूठ नहीं कहते हमारे बारे में क्‍यूंकि हम लोग डटकर मेहनत और अपने बीचों पर जमकर मौज मस्‍ती करते हैं। मैंने जिन्‍दगी में हर कदम नियमों का पालन नहीं किया, लेकिन जीवन की इस राह पर चलते चलते मैंने कई सबक सीखे हैं।

कुछ पल ठहरते हुए रिचर्ड कहता है, मेरी सफलता का राज एक ही है, बस कर डालें! मेरे इस राज के कारण वर्जिन का पूरा स्‍टाफ मुझे डॉ. यस के नाम से पुकारता है। ऐसा नहीं कि पूरे परिवार में केवल मैं ही ऐसा था जो बस कर डालें! के नियम का अनुसरण करता था। मेरे परिवार में मेरी मां और मेरे दादा के चचेरे भाई भी ऐसे ही थे। मेरी मां ईव, जो युद्ध के दौरान पायलट बनना चाहती थी, और उन्‍होंने हेस्‍टन एयरफील्‍ड जाकर पायलट बनने का प्रस्‍ताव रखा। आगे से दो टूक जवाब मिला, महिलाओं को पायलट बनने की आज्ञा नहीं। उसने चमड़े का फ्लाइंग जैकेट पहना और अपने सुनहरे बालों को चमड़े के हेलमेट में छुपा लिया। कुछ दिनों तक गहरी आवाज में बोलने का अभ्‍यास किया। अंत उनको पयालट की जॉब मिल गई। इतना ही नहीं, उनके सिखाए हुए पायलटों ने ही बैटल ऑफ ब्रिटेन में लड़ाकू विमान उड़ाए। फिर उन्‍होंने एयर होस्‍टेस बनने का मन बनाया, लेकिन उसके लिए नर्स प्रशिक्षण व स्‍पेनिश भाषा पर प्रभुत्‍व होना जरूरी था, जो दोनों उनके पास नहीं थे। फिर भी उन्‍होंने एयरलाइन के नाइट पोर्टर से बात करके अपने इस लक्ष्‍य को पाया। और कहती थी बस कर डालें!

दादा के चचेरे भाई महशूर खोजी कैप्‍टेन रॉबर्ट स्‍कॉट, जो दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाले दूसरे व्‍यक्‍ित थे, जिनको दुनिया ने बुला दिया, क्‍योंकि श्रेय हमेशा पहले को मिलता है। हालांकि अंटार्कटिका के ऊपर गुब्‍बारे में पहली उड़ान भरने की उपलब्‍िध भी उनके नाम है, मगर लोगों ने इसको भी याद नहीं रखा। उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई, उनको अफसोस था कि उनसे पहले ही कोई दक्षिणी ध्रुव पर पहुंच गया। मुझे कभी किसी बात का अफसोस नहीं हुआ, क्‍यूंकि मेरा एक नियम है ''मजे करें, जमकर मेहनत करें, पैसा अपने आप आएगा''।

पैसा कमाने का मेरे पास कोई मंत्र नहीं, मैं तो बस मेहनत करता हूं जमकर। बीमारी के कारण स्‍कूली गणित तो समझ नहीं आता था, मगर नौ साल की आयु से ही पैसे का गणित समझ में आने लगा। मैंने एक मित्र को लेकर नौ वर्ष की
आयु में ही अपने खेत के अंदर क्रिसमिस ट्री लगाने की योजना बनाई। उस समय बीजों का थैला 5 पौंड मिल रहा था। मैंने सोचा, मैं क्रिसमिस ट्री को दो पौंड के हिसाब से बेचूंगा, हमने ट्री के करीबन चार सौ बीज लगाए। डेढ़ साल के अंदर हम इनको बेचकर करीबन 795 पौंड कमा सकते थे, जो बहुत बड़ा लाभ था। मगर खरगोशों ने मेरे प्‍लान को ध्‍वस्‍त कर दिया। फिर क्‍या था, हमने अपना इनवेस्‍टमेंट निकालने के लिए खरगोशों की बलि चढ़ा डाली। हमने उनका शिकार कर उनको बेच डाला, जिससे पैसे वापिस निकाले।

मैंने हर मामले में रिस्‍क लिए हैं, चाहे वो कोई टापू खरीदने का मामला हो, चाहे सोलह साल की उम्र में स्‍टूडेंट नामक पत्रिका निकालने का, चाहे जमैका जाने के बाद मुफ्त में आइलेंड घूमने का, चाहे एक जहाज किराए पर लेने का। जब मैं जमैका गया, तो देखा वहां बेहतरीन म्‍यूजिक बज रहा था, जो मुझे अच्‍छा लगा, मैंने तुरंत उस बैंड को साइन करने का सोचा, जो मेरे पास नगदी थी, वो मैंने इस  बैंड को साइन करने में लूटा दी। अब मेरे पास कुछ नहीं था। अब मुझे छुट्टियों का आनंद भी लेना था। तो मेरे दिमाग में टापू खरीदने का विचार आया। मैंने तुरंत, एक एजेंट को फोन लगाया और कहा कि मुझे कुछ टापू खरीदने हैं। तब मैंने अपना परिचय एक म्‍यूजिक कंपनी के मालिक का दिया, जो मैं वास्‍तव में था।

उसने मुझे कई टापू अपने जहाज पर बिना किसी खर्च पानी के घूमाए, मैंने इस बेहद आनंद लिया। मैंने सारे टापू रिजेक्‍ट कर दिए। टापूओं की सैर करते हुए इन्‍हें खरीदने का विचार पक्‍का हो गया। मगर पैसे नहीं थे, ऐसे में मैंने एजेंट से पूछा कि कोई और भी टापू है, जो तुमने मुझे न दिखाया हो। उसने कहा, बिल्‍कुल। वो मुझे वहां ले गया। वो बेहद प्‍यारा था, मगर मेरे पास पैसे नहीं थे, और टापू पर पीने का साफ पानी नहीं था। उसने तीस लाख पौंड मांगे, मैंने केवल दो लाख पौंड देने का प्रस्‍ताव रखा, डील कहां जमने वाली थी। हम वापिस आ गए। पैसे थे नहीं, आगे की पूरी यात्रा करनी थी। ऐसे में मैंने जहाज को किराये पर लिया, जिसका किराया करीबन 2000 पौंड था। मैंने उसको पर यात्री पर बांट दिया और एक काले ब्‍लैक बोर्ड पर निर्धारित कीमत लिख दी, जो पूर्ण रूप में सफल रही। यह जोखिम था, बहुत बड़ा, मगर इस जोखिम की बजाय से हम वार्जिन एयरलाइन खड़ी कर पाए, जिसको रोकने के लिए ब्रिटिश एयरलाइन ने बहुत जोर लगाया था। मगर मैंने भी न हारने की कसम खा रखी थी, ऐसे मैंने अपने दोस्‍त निक से वार्जिन म्‍यूजिक कंपनी के शेयर खरीदे। आज हमारे पास वो टापू भी हैं, जिन्‍हें हम खरीदना चाहते थे। वो सौदे उतनी ही राशि में तय हुए, जितनी मैंने प्रस्‍ताव में रखी थी। खरगोश जब मेरे क्रिसमिस ट्री खा गए थे, तो मुझे समझ में आया कि पैसे पेड़ों पर नहीं उगते, इस लिए कहता हूं, बहुत सारे काम हैं, जो आप अपने घर से शुरू कर सकते हैं, और आप सफल हो सकते हैं। बस कर डाले! शुरूआत एक कदम से होती है, फिर यात्रा कितनी ही लम्‍बी क्‍यूं न हो। ऐसे कितने ही लोग हैं, जो अपनी जॉब से संतुष्‍ट नहीं, लेकिन फिर भी चिपके हुए हैं। अगर आप साहस नहीं कर सकते तो शिकायत भी मत करें। बस जॉब है, उस में मजा करें। फिर मिलेंगे, हैप्‍पी, बातें बहुत सारी हैं, लेकिन तुम्‍हारी बस आ गई, और आधी रात हो चली है। मेरे किताब बंद करते ही मेरे मन में अपनी अमिट छाप छोड़ते हुए रिचर्ड ब्रानसन गायब हो गए।

यह बातचीत पुस्‍तक ''जीवन के सबक''screw it just do it आधारित है, इस किताब के द्वारा उक्‍त सब बातें रिचर्ड ब्रॉनसन ने मुझे बताई। अगर आप भी रिचर्ड ब्रानसन को पूरी तरह से जानना चाहते हैं तो उक्‍त पुस्‍तक जरूर खरीदें, क्‍योंकि एक लेखक ने कहा है कि जब आप किसी की किताब पढ़ रहे होते हैं तो आप उससे बात कर रहे होते हैं।

"सत्यमेव जयते" को लेकर फेसबुक पर प्रतिक्रियाओं का दौर


Ajit Anjum
स्टार प्लस पर सत्यमेव जयते देख रहा हूं ....जिंदगी लाइव की ऋचा अनिरुद्ध की याद आ रही है ....कंसेप्ट के लेवल पर बहुत कुछ मिलता जुलता ...एंकर , गेस्ट से लेकर दर्शकों को रोते देख रहा हूं ...इमोशनल और शॉकिंग मोमेंट ....कोख में बेटियों के कत्ल की दास्तां ....

आमिर चाहते तो वो भी दस का दम वाला पॉपुलर फार्मेट चुन सकते थे ...चाहते तो गेम शो कर सकते थे ...लेकिन आमिर ने ऐसा शो करने का फैसला किया है ..इसलिए वो बधाई के पात्र हैं ...अब ये शो हिट हो या न हो ( तथाकथित रेटिंग के पैमाने पर ) मैं अपनी राय नहीं बदलूंगा ......सत्यमेव जयते बहुतों को अच्छा लगा होगा ...बहुतों तो चलताऊ ...बहुतों को ऐवैं ....कुछ साथियों ने मेरे स्टेटस के जवाब में ये भी लिखा है कि इसे रेटिंग नहीं मिलेगी ...... न मिले ..लेकिन क्या उसके आधार पर आप मान लेंगे कि ऐसे शो की जरुरत नहीं ...तो फिर क्या सिर्फ लोग दस का दम या नच बलिए या नाच गाने वाला ही शो देखना चाहते हैं ...अगर यही सच है कि तो फिर क्यों कहते हैं कि कोई चैनल गंभीर मुद्दों को उठाने वाला शो नहीं बनाता ....मैं तो स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर को भी इसके लिए बधाई देता हूं ..जिन्होंने हर हफ्ते चार करोड़ ( शायद ) खर्च करने ये जोखिम लिया है ...चाहते तो इससे आसान रास्ता पकड़ सकते थे ...दस का दम या नच के दिखा जा या फिर कोई गेम शो बना सकते थे ...लेकिन सत्यमेव जयते बनाया ...ये एंटरटेनमेंट चैनल का सरोकारी चेहरा है ...

सत्यमेव जयते जैसे शो के लिए आमिर को सलाम ....ऐसे शो की जरुरत थी ... कम से कम ऐसे लोग तो शर्मिंदा हों जो बेटियां को दुनिया में आने से पहले मार देते हैं ...कोख में कत्ल करते हैं क्योंकि उन्हें बेटा चाहिए ....और हां , ऐसे काम सासु माएं ज्यादा करती हैं और करवाती है ...जो खुद भी एक मां होती है ...औरतों की कंडिशनिंग ऐसी होती है कि जब वो बहु होती तो उसकी भूमिका अलग होती है ..बेटी होती है तो अलग होती है और सास होती है तो अलग होती है ...हमने बचपन से अपने आस पास ऐसे माहौल को देखा है , जहां बेटा चाहिए ..बेटा ही होना चाहिए ..बेटी से वंश कैसे चलेगा ..जैसे गूंजते सवालों के बीच गर्भ में बच्चा पलता है .....

पहले तो लोग कहते हैं कि चैनलों पर कोई गंभीर कार्यक्रम नहीं होते ...समाज को झकझोरने वाले मुद्दों पर शो नहीं बनते ..चैनलों पर सरोकार वाले शो नहीं दिखते ...जब बनते हैं तो कहते हैं बहुत घिसा -पिटा था ...नया क्या है ..बहुत गरिष्ठ है ...अपच है ..बहुत गंभीर है ...इतना बोझिल शो इंटरटेनमेंट पर कोई क्यों देखेगा ...अरे भाई साहब , भ्रूण हत्या से जुड़े शो में आप दस का दम या केबीसी का मजा क्यों तलाश रहे हैं ...ये तो वही बात हुई न कि पी साईनाथ के लेख में रागदरबारी या पेज थ्री का मजा खोज रहे हैं ...तो फिर हिन्दू नहीं , दिल्ली टाइम्स ही पढ़िए न ....



Shivam Misra 
‎"सत्यमेव जयते" मे आज अमीर खान ने एक बेहद जरूरी मुद्दे को अपनी आवाज़ दी है ... एक सार्थक प्रस्तुति जो हमारे समाज के एक बेहद दुखद और घिनोने रूप को सामने लाती है|

यह कैसी हवस है ... कैसी चाहत है 'कुल दीपक' पाने की जो हर साल लगभग दस लाख बेटियों की हत्या कर रही है ... उनके पैदा होने से पहले ही ????

मैं अमीर खान और उनकी पूरी टीम को इस सार्थक प्रयास के लिए साधुवाद देता हूँ !

समय आ गया है जब हमे मिल कर अपनी खुद की और समाज की यह घिनोनी सोच बदलनी होगी !

बेटियों की हत्या बंद करनी ही होगी !

Sachin khare
मित्रों,
मैं नहीं जानता आमिर खान को किन्तु मैं बस एक बात जानता हूं उन 100 डाक्टरों को जेल में होना चाहिये और उनकी दुकान बंद होनीं चाहिये जिन्हें #Satyamevjayate की उस डाक्यूंमेंट्री में दिखाया गया है..

यदी आपके पास उनके नाम और अन्य जानकारियां हैं तो साझा कीजिये.. उन्हें उनके अंजाम तक अब हम पहुंचायेंगे.. कानूंन को जो करना है करता रहे किन्तु तबतक उनकी दुकान बंद करनीं ही होगी..

इस विचार को फेसबुक पर अपनें तरीके से फैला दीजिये.. छोड़ना नहीं है इन कसाइयों को..

वन्दे मातरम..

अजय कुमार झा
आज भांड बन चुके टीवी चैनलों और जोकर बन चुके समाचार चैनलों की चौबीस घंटों की बकर से , अलग तो निश्चित रूप से लगा "सत्यमेव जयते " । मुद्दा - कन्या भ्रूण हत्या ..समस्या , पीडित , विशेषज्ञों , खबरनवीसों , आरोपियों से सीधे बात करने के साथ बहुत सारा दृश्य फ़िल्मांकन भी ..और आखिर में कम से कम एक प्रयास भी ..,,मुझे तो प्रभावित किया , इस कार्यक्रम ने, लेकिन बहुत से अन्य पहलू भी हैं अभी इस मुद्दे से जुडे हुए ..... जल्दी ही लिखूंगा

नई दुनिया के संपादक  Jaideep Karnik
आमिर खान ने बता दिया की आज देश को सपने दिखाने की बजाय सच दिखाकर जगाना जरूरी है!  

Srijan Shilpi
आमिर खान ने जो पहल की है, देश के मानस को जगाने की, अपने दौर की सबसे अहम समस्याओं को समझने और उनका हल तलाशने की वह न सिर्फ काबिलेतारीफ है, बल्कि उसमें हम सब का सहयोग अपेक्षित है। एक कलाकार वह करके दिखाने जा रहा है, जो वास्तव में लोकतंत्र के चारों स्तंभों को मिलकर बहुत पहले कर लेना चाहिए था, पर वे विफल रहे। आमिर की पहल सफल हो.....सार्थक हो!

@Ravish Kumar NDTV
जितना दर्शकत्व को समझा है उससे यही जाना है कि बड़ा ही निष्ठूर तत्व है । सत्यमेव जयते इसलिए नहीं देखेगा कि आमिर ने बनाया है या इरादा नेक है। ग़रीबी दूर करने का एक ही जादू , दूरदृष्टि पक्का इरादा जैसे स्लोगनों की हालत देख चुका है । हाँ अगर बात में दम है, कहने के तरीके में दम है तो वह सिर आँखों पर लेगा । आमिर ने एक बड़ी चुनौती उठाई है और हमें दी भी है । मैं देख नहीं सका हूं । प्रतिक्रियाओं में आए उतार चढ़ाव के आधार पर कह रहा हूं । एक ही नाकामी समझ आ रही है । लोग आमिर के बारे में ज़्यादा बातें कर रहे हैं, कन्या भ्रूण हत्या के बारे में कम । अगर यही हकीकत है तो सत्यमेव जयते फेल । दिल पे लगेगी तभी बात बनेगी । दिल पे आमिर को नहीं लगाना था, मुद्दे को लगना था । वर्ना ग्रामीण मंत्रालय के तहत आने वाले तमाम मुद्दों के ब्रांड एंबेसडर की तरह बनकर रह जायेंगे । उम्मीद तो यही है कि सत्यमेव जयते सफल हो । पैसे की दरिद्रता का रोना रोने वाले नूझ पैनलों के दौर में आमिर के नाम पर करोड़ों रुपये लगाने का इरादा एक नई उम्मीद है । बेहतर कंटेंट पर मार हो तो लड़ाई जमेगी वर्ना इसलिए लोग प्राइमटाइम नहीं देखेंगे कि रवीश कुमार सो काॅल्ड अच्छा बंदा है बल्कि तभी देखेंगे जब इसमें दम होगा । देखने की रोचकता होगी । सत्यमेव जयते देखने के लिए बेचैन हूं । इसे चलना चाहिए । टीवी का भला होगा और कमाई भी । फिर जल्दी ही आप चिरकुट भौकालेंकरों से मुक्त हो जायेंंगे । देखिये प्राइमटाइम अजय देवगन के साथ । आमिर को शुभकामनायें ।





ये भी कोई जिंदगी है

आज ब्‍लॉगस्‍पॉट का अगला ब्‍लॉग बटन दबाया तो हरमिंदर के  वृद्धग्राम   पहुंच गया। जहां हरमिंदर व काकी दोनों बतियाते हुए वृद्धों व बुढ़ापे के बारे में कई मार्मिक पहलूओं से अवगत करवा रहे थे। गांव की छानबीन करने से पता चला कि अतिथि तो यहां निरंतर पहुंच रहे हैं, मगर पिछले कई महीनों से हरमिंदर सिंह यहां नहीं आए, जबकि इस गांव के चर्चे अख़बारों व वेबसाइटों पर हो चुके हैं। आपके समक्ष वृद्धग्राम से लिया एक लेख रखते हुए अलविदा लेता हूं। कुलवंत हैप्‍पी, युवा सोच युवा खयालात।

हरमिंदर की कलम से 

जमीन पर सोने वालों की भी भला कोई जिंदगी होती है। हजारों दुख होते हैं उन्हें, मगर बयां किस से करें? हजारों तकलीफों से जूझते हैं और जिंदगी की पटरी पर उनकी गाड़ी कभी सरपट नहीं दौड़ती, हिचकौले खाती है, कभी टकराती है, कभी गिर जाती है। एक दिन ऐसा आता है जब जिंदगी हार जाती है।

ऐसे लोगों में बच्चे, जवान और बूढ़े सभी होते हैं जिन्हें पता नहीं कि वे किस लिये जी रहे हैं। बस जीते हैं। कई बूढ़े अपने सफेद बालों को यह सोचकर शायद न कभी बहाते हों कि अब जिंदगी में क्या रखा है, दिन तो पूरे हो ही गये।
उन्हें जिंदगी का तजुर्बा होता है। ऐसे वृद्धों को कोई अच्छी निगाह से नहीं देखता, सब उन्हें गलत समझते हैं। उनके हालातों की तरफ कोई ध्यान नहीं देता। सड़क उनका घर, उनका सब कुछ होती है। वे कहीं भी गुजार सकते हैं। आखिर एक रात की ही तो बात है। अगले दिन कहीं ओर, किसी ओर जगह उनका आशियाना होगा, लेकिन वे बेफिक्र भी हैं।

वृद्धों को मैंने कई बार प्लेटफार्म पर देखा है। वे बिना उद्देश्य के जिये जा रहे हैं। उनका जीवन किसी के लिये उपयोगी नहीं रहा। इनमें से बहुत से ऐसे हैं जो अपनों ने घर से बेघर किये हैं। वृद्धग्राम की शुरुआत में इसी साल के प्रारंभ में करने की सोच रहा था, लेकिन मैं काफी समय तक इन उम्रदराजों का अध्ययन करता रहा। मेरी ऐसे लोगों से लंबी मुलाकातें भी हुयीं।

कुछ ने बताया कि उन्हें पता नहीं कि वे कहां के रहने वाले हैं। जब से पैदा हुये, जमीन पर सोये हैं, रुखी-सूखी खायी है और मोहताजी में जिये हैं। कई ने बताया कि उनका भी एक परिवार था, वे भी कभी शान से रहते थे। औलाद धोखा दे गयी, क्या करें। उनके आंसुओं के कतरे मैंने अपने जेहन में संभाल के रखे हैं, धीरे-धीरे वृद्धग्राम पर बहा रहा हूं।

एक वृद्ध बृजघाट मिले थे।(हरिद्वार की तरह की यहां से भी गंगा गुजरती है और गंगा स्नान का प्रत्येक कार्तिक पूर्णिमा को यहां विशाल मेला लगता है। बृजघाट उत्तर प्रदेश में स्थित है।) उनका नाम दीनानाथ है. वे काफी दुखी थे। वे बृजघाट के तट पर रामभक्ति में लीन रहते हैं। अपनों ने उन्हें कई साल पहले पराया बना दिया। वे उदास मन से कहते हैं,‘‘बहुओं के आने के बाद घर का माहौल बदल गया। दोनों बेटे उनकी ओर की कहने लगे। बेटी है नहीं, पत्नि को स्वर्ग सिधारे कई वर्ष बीत गये। मैं ठहरा बूढ़ा क्या कर सकता हूं, उन्हें मेरी जरुरत नहीं लगी। सो निकाल दिया घर से।’’ इतना कहकर वे रोने लगते हैं।

दीनानाथ जी आगे कहते हैं,‘‘मैं यहां चला आया। यहां कुछ आश्रम हैं, श्रृद्धालु आते रहते हैं। कुछ न कुछ मिल ही जाता है। अब इस बुढ़ापे में और चाहिये ही क्या, आसरा और दो वक्त की रोटी।’’

वे अब अन्य तीर्थस्थलों को देखना चाहते हैं। कहते हैं कि आखिरी समय में जितना भगवान का नाम लिया जाये उतना कम है।

बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, ये जर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं।

नटराजन का ख्‍वाब; पिंजरे की बुलबुल

एक के बाद एक घोटाला उछलकर बाहर आ रहा है। कांग्रेस की छवि दिन ब दिन महात्‍मा गांधी की तरह धूमिल होती जा रही है। कांग्रेस के नेता पूरी तरह बुखला चुके हैं, वो अपने निकम्‍मे नेताओं को सुधारने की बजाय पूरी शक्‍ति मीडिया को ''पिंजरे की बुलबुल'' बनाने पर खर्च कर रहे हैं, जो लोकतंत्र के बिल्‍कुल उल्‍ट है।

शायद कांग्रेस के नेता पानी के बहा को नहीं जानते, वो सोचते हैं कि पानी के बहा को बड़े बड़े बांध बनाकर रोका जा सकता है, लेकिन वो नहीं जानते कि पानी अपना रास्‍ता खुद बनाता है, पानी जीवन है तो विनाश भी है। अगर आप मीडिया के मुंह पर ताला जड़ेंगे तो लोग अपनी बात कहने के लिए दूसरे साधनों को चुनेंगे।

अंग्रेजों के वक्‍त इतना बड़ा और इतना तेज तर्रार मीडिया भी तो नहीं था, मगर फिर भी जनमत तैयार करने में मीडिया ने अहम योगदान अदा किया था। कांग्रेसी नेता की पोल किसी अधिकारिक मीडिया ने तो नहीं खोली, जिस पर मीनाक्षी नटराजन बिल लाकर नकेल कसना चाहती हैं। शायद मीनाक्षी नटराजन राहुल बाबा की दोस्‍ती में इतना व्‍यस्‍त रहती हैं कि उनको वो लाइन भी याद नहीं होगी, जो लोग आम बोलते हैं, ''एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा दरवाजा आपके लिए खुलता है''।

जिस बिल को कांग्रेस ने मीनाक्षी की निजी राय बताकर पूरे मामले से पल्‍लू झाड़ लिया, क्‍या मीनाक्षी ने उस बिल को लाने की बात करने से राहुल गांधी से एक बार भी सलाह विमर्श नहीं किया? क्‍या अब कांग्रेस के नेता इतने बड़े हो चुके हैं, जो अपनी निजी राय के अनुसार बिल बनाने की बात करने लगे हैं? या फिर नेता ऐसा सोचने लगे हैं कि जिस पर राहुल बाबा ने मोहर लगा दी, वो निजी राय नहीं एक विधयेक बन जाता है?

मीडिया को ''पिंजरे की बुलबुल'' बनाने से कांग्रेस की छवि सुधरने वाली नहीं, क्‍यूंकि सफेद कुर्ते पर इतने दाग लग चुके हैं, जो महंगे से महंगे सरफ इस्‍तेमाल करने से भी जाने वाले नहीं। अब तो कांग्रेसी नेताओं को लिबास ही चेंज करना होगा। सच कहूं तो उनको 10 जनपद छोड़ना होगा, क्‍यूंकि वहां एक इटली की मेम रहती है, जो इटली से आई है, भारत को अच्‍छी तरह से नहीं जानती, और उसका एक पुत्र भी है, जो कुछ नेताओं की मक्‍खनबाजी से बेहद खुश है।

किसी समझदार ने कहा है कि अगर आप अपना रिमोट किसी और के हाथों में देते हैं तो आप भूल जाइए कि आप कुछ अपनी मर्जी का कर पाएंगे। आज कल कांग्रेसी नेताओं का रिमोट सोनिया के हाथ में है, और राहुल गांधी का रिमोट कुछ कांग्रेसी नेताओं के हाथ में। ऐसे में कांग्रेस का क्‍या हश्र होने वाला है, यह तो राम जाने।

लेकिन एक बात कांग्रेस को समझ लेनी चाहिए कि मीडिया को पिंजरे की बुलबुल बनाने से बेहतर होगा कि कांग्रेस के भीतर बैठे भ्रष्‍ट लोगों को कांग्रेस आउट करे, नहीं तो कांग्रेस को लोग आउट कर देंगे, चाहे बेटिंग के लिए कांग्रेस के पास सचिन नाम का बेस्‍टमैन ही क्‍यूं न हो।

चलते चलते- कांग्रेस डॉक्‍टर के पास गई, मगर डॉक्‍टर था नहीं, वो पास की शॉप पर पूछने गए, दुकानदार ने पूछा, आप कौन हैं, और डॉक्‍टर से क्‍यूं मिलना चाहते हैं तो कांग्रेस बोली मैं कांग्रेस हूं, देश की सबसे बड़ी पार्टी, अच्‍छा अच्‍छा दुकानदार बोला, आपको डॉक्‍टर की नहीं, मैन्टोफ्रेश, सेंटरफ्रेश व हैप्‍पीडंट की जरूरत है।

और आपको क्‍या लगता है? लिखिए बेबाक।