'सचिन' की जगह 'आमिर' होता तो अच्‍छा लगता

मैं सचिन की जगह आमिर का नाम किसी फिल्‍म के लिए नहीं बल्‍कि राज्‍य सभा सांसद के लिए सुझा रहा हूं। दोनों ही भारत की महान हस्‍तियों में शुमार हैं। दोनों ही अपने क्षेत्र में दिग्‍गज हैं। दोनों का कद काठ भी एक सरीखा है। मगर सोच में अंतर है, जहां आमिर खान सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखता है, वहीं सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के मामलों में भी ज्‍यादा स्‍पष्‍ट राय नहीं दे पाते। सचिन को क्रिकेट के मैदान पर शांत स्‍वभाव से खेलना पसंद है, मगर आमिर खान को चुनौतियों से आमना सामना करना पसंद है, भले ही उसकी फिल्‍म को किसी स्‍टेट में बैन ही क्‍यूं न झेलना पड़े।

न मैं आमिर का प्रसंशक नहीं हूं, और न सचिन का आलोचक। मगर कल जब अचानक राज्‍य सभा सांसद के लिए सचिन का नाम सामने आया तो हैरानी हुई, यह हैरानी मुझे ही नहीं, बल्‍कि बहुत से लोगों को हुई, केवल सचिन के दीवानों को छोड़कर।

हैरानी तो इस बात से है कि उस सचिन ने इस प्रस्‍ताव को स्‍वीकार कैसे कर लिया, जो भारतीय क्रिकेट टीम की कप्‍तानी लेने से इसलिए इंकार करता रहा कि उसके खेल पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सचिन का नाम सामने आते ही हेमा मालिनी का बयान आया, जो शायद चुटकी से कम नहीं था, और उसको साधारण समझा भी नहीं जाना चाहिए, जिसमें हेमा मालिनी कहती हैं कि राज्‍यसभा रिटायर लोगों के लिए है। अगर हेमा मालिनी, जो राज्‍य सभा सांसद रह चुकी हैं, के बयान को गौर से देखते हैं तो पहला सवाल खड़ा होता है कि क्‍या सचिन रिटायर होने वाले हैं?

नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता, क्‍योंकि कुछ दिन पहले तो ख़बर आई थी कि सचिन ने कहा है, अभी उनमें दम खम बाकी है, और वह लम्‍बे समय तक क्रिकेट खेलेंगे। अगर सचिन अभी और क्रिकेट खेलना चाहते हैं। यकीनन वह रिटायर नहीं होने वाले, तो फिर राज्‍य सभा सांसद बनने का विचार उनके मन में कैसे आया?

मुझे लगता है कि क्रिकेट जगत से जुड़े कुछ राजनीतिक लोगों ने सचिन को फ्यूचर स्‍िक्‍यूर करने का आइडिया दे दिया होगा। यह आईडिया भी उन्‍होंने सचिन के अविवा वाले विज्ञापन से ही मारा होगा, क्‍यूंकि हक मारना तो नेताओं की आदत जो है। यह याद ही होगा न, इस विज्ञापन में सचिन सबको लाइफ स्‍क्‍ियूर करने की सलाह देते हैं।

सचिन की जगह आमिर को मैं इसलिए कहता हूं, क्‍यूंकि वह सामाजिक मुद्दों को लेकर बेहद संवेदनशील है, उसके अंदर एक आग है, जो समाज को बदलना चाहती है। अगर सचिन राजनीति में कदम रखते हैं तो मान लीजिएगा कि भारतीय राजनीति को एक और मनमोहन सिंह मिल गया। चुटकला मत समझिएगा, क्‍यूंकि मुझे चुटकले बनाने नहीं आते।

चलते चलते इतना ही कहूंगा, देश की राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी, जो देश की प्रथम नागरिक हैं, ऐसे लोगों का चुनाव करें, जो राजनीति में आने की दिली इच्‍छा रखते हों,और जिन्‍दगी में वह समाज सुधार के लिए अड़ भी सकते हों, वरना राज्‍य सभा में अगर कुछ कुर्सियां खाली भी पड़ी रहेंगी तो कोई दिक्‍कत नहीं होगी जनता को, क्‍यूंकि न बोलने वाले लोगों का होना भी न होने के बराबर है, जैसे कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी, पता नहीं कब बोलते हैं, बोलते भी हैं तो इंग्‍लिश में जो ज्‍यादातर भारतीयों को तो समझ भी नहीं आता, जबकि मैडम सोनिया हिन्‍दी में भाषण देती हैं, जो मूल इटली की हैं, इसको कहते है डिप्‍लोमेसी।

गब्बर ने बदल दी हमारी सोच


क्यों पसंद है निगेटिव चरित्र ?

(लेखक अनिरुद्ध जोशी ''शतायु''  सकारात्मक सोच का आईना   ब्‍लॉग पर कभी कभार लिखते हैं, और  आप उनको नियमित वेबदुनिया डॉट कॉम  पर पढ़ सकते हैं, क्‍योंकि वह इस संस्‍थान में कार्यरत  हैं  )


प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक 'जज' होता है। जिस व्यक्ति के भीतर जज जितनी ताकत से है वह उतनी ताकत से अच्छे और बुरे के बीच विश्लेषण करेगा। निश्चित ही ऐसा व्यक्ति स्वयं में सुधार कर भी लेता है जो खुद के भीतर के जज को सम्मान देता है। अच्छाइयाँ इस तरह के लोग ही स्थापित करते हैं।

लेकिन अफसोस की भारतीय फिल्मकारों के भीतर का जज मर चुका है। और उन्होंने भारतीय समाज के मन में बैठे जज को भी लगभग अधमरा कर दिया है। ऐसा क्यों हुआ? और, ऐसा क्यों है कि अब हम जज की अपेक्षा उन निगेटिव चरित्रों को पसंद करते हैं जिन्हें हम तो क्या 11 मुल्कों की पुलिस ढूँढ रही है या जिन पर सरकार ने पूरे 50 हजार का इनाम रखा है और जो अपने ही हमदर्द या सहयोगियों को जोर से चिल्लाकर बोलता है- सुअर के बच्चों!

दरअसल हर आदमी के भीतर बैठा दिया गया है एक गब्बर और एक डॉन। एक गॉडफादर और एक सरकार। अब धूम-वन और टू की पैदाइश बाइक पर धूम मचाकर शहर भर में कोहराम और कोलाहल करने लगी है। शराब के नशे में धुत्त ये सभी शहर की लड़की और यातायात नियमों के साथ खिलड़वाड़ करने लगे हैं।

वह दौर गया जबकि गाइड के देवानंदों और संगम के राजकुमारों में बलिदान की भावना हुआ करती थी। 60 और 70 के दशक में नायक प्रधान फिल्मों ने साहित्य और समाज को सभ्य और ज्यादा बौ‍द्धिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जबकि रूस से हमारे सम्बंध मधुर हुआ करते थे और साम्यवाद की सोच पकने लगी थी, लेकिन इसके परिणाम आना बाकी थे।

लेकिन जब आया गब्बर, तो उसने आकर बदल दी हमारी समूची सोच। शोले आज भी जिंदा है जय और विरू के कारण नहीं, ठाकुर के कारण भी नहीं गब्बर के कारण।

सुनने से ज्यादा हम बोलना चाहते हैं और 90 फीसदी मन निर्मित होता है देखने से ऐसा मनोवैज्ञानिक मानते हैं। जब हम सोते हैं तब भी स्वप्न रूप में देखना जारी रहता है। मन पर दृष्यों से बहुद गहरा असर पढ़ता है। दृश्यों के साथ यदि दमदार शब्दों का इस्तेमाल किया जाए तो सीधे अवचेतन में घुसती है बात। इसीलिए आज तक बच्चे-बच्चे को 'गब्बर सिंह' के डॉयलाग याद है। याद है 'डॉन' की अदा और डॉयलाग डिलेवरी।

भाषा और दृश्‍य से बाहर दुनिया नहीं होती। दुनिया के होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे फिल्मकारों को यह बात कब समझ में आएगी की वह जो बना रहे हैं वह देश के वर्तमान के साथ खिलवाड़ करते हुए एक बहुत ही भयावह भविष्य निर्मित कर रहे हैं, यह जानते हुए कि हमारा मुल्क भावनाओं में ज्यादा जीता और मरता है।

शोले से जंजीर, जंजीर से डॉन, खलनायक, कंपनी और फिर एसिड फैक्ट्री तक आते-आते हमारी सोच और पसंद को शिफ्ट किया गया। यह शिफ्टिंग जानबूझकर की गई ऐसा नहीं है और ना ही अनजाने में हुई ऐसा भी नहीं। छोटी सोच और बाजारवाद के चलते हुई है यह शिफ्टिंग। अब हमें पसंद नहीं वह सारे किरदार जो प्रेम में मर जाते थे अब पसंद है वह किरदार जो अपने प्रेम को छीन लेते हैं। प्रेमिका की हत्या कर देते हैं और फिर जेल में पागलों से जीवन बीताकर पछताते हैं।

फिल्मकार निश्चित ही यह कहकर बचते रहे हैं कि जो समाज में है वही हम दिखाते हैं। दरअसल वह एक जिम्मेदार शिक्षक नहीं एक गैर जिम्मेदार व्यापारी हैं। यह कहना गलत है कि फिल्में समाज का आइना होती है। साहित्य समाज का आईना होता हैं। क्या दुरदर्शन पर कभी आता था 'स्वाभीमान' हमारे समाज का आईना है? एकता कपूर की बकवास क्या हमारे समाज का आईना है? आप खुद सोचें क्या 'सच का सामना' हमारे समाज का सच है?.

बोफोर्स घोटाला, अमिताभ का बयान और मेरी प्रतिक्रिया

बोफोर्स घोटाला, कब सामने आया, यकीनन जब मैं तीसरा बसंत देख रहा था, यानि 1987, इस घोटाले का पर्दाफाश अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र द हिंदु की संवाददाता चित्रा सुब्रह्मण्‍यम ने किया, मगर सीबीआई ने इस मामले में चार्जशीट उस समय दाखिल की, जब मैं पांच साल पूरे कर छठे की तरफ बढ़ रहा था।

इसके बाद सरकारें बदली, स्‍थितियां परिस्‍थितियां बदली, मैं भी समय के साथ साथ बड़ा होता चला गया। लेकिन मुझे इस घोटाले की जानकारी उस समय मिली जब इस घोटाले के कथित दलाल ओत्तावियो क्‍वोत्रिकी की हिरासत के लिए सीबीआई जद्दोजहद कर रही थी, और मैं एक न्‍यूज वेबसाइट के लिए कीबोर्ड पर उंगलियां चला रहा था, तकरीबन तब मैं पच्‍चीस साल का हो चुका था, और यह घोटाला करीबन 22 साल का।

आप सोच रहे होंगे कि घोटाले और मेरी उम्र में क्‍या तालुक है, तालुक है पाठक साहिब, क्‍यूंकि जब यह घोटाला हुआ तो राजीव गांधी का नाम उछलकर सामने आया, चूंकि वह उस समय प्रधानमंत्री बने थे, और राजीव गांधी प्रधानमंत्री कब बने, जब इंदिरा गांधी का मौत हुई, और जब इंदिरा की मौत हुई, तब मैं पांच दिन का था, एक वो ही ऐसी घटना है, जिसने मेरे जन्‍मदिन की पुष्‍टि की।

स्‍वीडन के पुलिस प्रमुख स्‍टेन लिंडस्‍ट्रॉम ने कल जब 25 साल बाद अपने मरे हुए जमीर को जगाते हुए कहा कि अमिताभ बच्‍चन का नाम घोटाले में शामिल करने के लिए उन पर दबाव डाला गया था। और मुझे सबसे ज्‍यादा हैरानी तो तब हुई, जब अमिताभ बच्‍चन ने अपने ब्‍लॉग पर लिखा, चलो पच्‍चीस साल बाद तो मुझे राहत मिली, लेकिन उसकी भरपाई कौन करेगा, जो पच्‍चीस साल मैंने आरोप का दंश झेला, और मीडिया ने ख़बर बनाई।

अमिताभ बच्‍चन को शायद पता नहीं कि आरोप का दंश किसे कहते हैं। अगर वह सच में जानना चाहते हैं कि आरोप का दंश किसे कहते हैं तो उनको गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ देखना चाहिए, जो पिछले दस सालों से दंगों के आरोप का दंश झेलते आ रहे हैं। शायद ही उनकी कोई प्रेस कांफ्रेंस ऐसी गई होगी, जिसमें मीडिया ने उनसे दंगों से संबंधित प्रश्‍न नहीं पूछे। स्‍िथतियां तो कई बार ऐसी पैदा हुई कि उनको लाइव शो छोड़कर भी जाना पड़ा। मुझे तो एक भी ऐसा मौका याद नहीं आ रहा, जब मीडिया ने अमिताभ बच्‍चन से बोफोर्स घोटाले के बारे में भूलकर भी कोई प्रशन पूछा हो, या कभी मीडिया ने उनका नाम कहीं उछाला हो।

अमिताभ का नाम इस घोटाले से जुड़ा था, और उनको क्‍लीन चिट मिल गई, मुझे भी तब पता चला, जब अमिताभ ने इस पर खुशी जताई और मीडिया ने उसको हाईलाइट किया। मेरे ध्‍यान में शायद यह पहला मामला है, जब मीडिया ने आरोपी के साथ दोषी जैसा व्‍यवहार नहीं किया, और बेगुनाह होने पर उसको एक अच्‍छा डिस्‍पले दिया, मीडिया की अगर यह पहल है तो अच्‍छी बात है, अगर स्‍पेस की भरपाई के लिए स्‍पेस दिया गया है तो अफसोस की बात है।

अफसोस इसलिए कि हम जिस घोटाले की जांच के लिए पिछले ढ़ाई दशक में करोड़ों रुपए खर्च चुके हैं, उस मामले में हमको मिली तो मिली केवल क्‍लीन चिट, क्‍या सरकार को जनता का पैसा केवल क्‍लिन चिट हासिल करने के लिए मिला है। हैरानी तो इस बात से भी हो रही है कि स्‍टेन का बयान 25 साल बाद ही क्‍यूं आया? और तब आया जब कांग्रेस की छवि देश के अंदर बिगड़ती जा रही है, और दूसरी बात देश में राष्‍ट्रपति के पद को लेकर भी नामों का चयन किया जा रहा है, कहीं पिछली बार की तरह इस बार भी तो अमिताभ का नाम उभरकर सामने आने वाला तो नहीं। उक्‍त दोनों संयोगों को देखने के बाद मुझे लगता है, कहीं स्‍टेन का यह बयान भी तो किसी दबाव के चलते तो नहीं आया। शायद पुष्‍टि के लिए 25 साल और इंतजार करना होगा।

चलते चलते इतना ही कहूंगा, ए मेरी सरकार हर घोटाले में क्‍िलन चिट पहले ही दे देना, क्‍यूंकि मेरे देश का धन मेरी जनता के काम आ सके, नहीं तो हर बार एक ही कहावत दोहरानी पड़ेगी ''खाया पीया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना''।

याद रहे कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डालर का था। आरोप है कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी, मगर भारतीय सरकार ने जांच के लिए 256 करोड़ खर्च किए, और बदले में मिला ठेंगा।

महिलाओं को चाहिए तराशे हुए वक्ष, मर्दों को चुस्‍त की चाहत

हैरानी हो रही है कि ''युवा सोच युवा खयालात'' यह क्‍या लिख रहा है, लेकिन जनाब यह मैं नहीं हिन्‍दी की बेहद लोकप्रिय पत्रिका इंडिया टूडे अपने नए अंक की कवर स्‍टोरी 'उभार का सनक' के साथ उक्‍त पंक्‍ित को लिख रही है, जो अंक उसने मई महीने के लिए प्रकाशित किया है।

इसको लेकर बुद्धजीवियों व मीडिया खेमे में बहस छिड़ गई कि एक पत्रिका को क्‍या हो गया, वो ऐसा क्‍यूं कर रही है। मुझे लगता है कि इसका मूल कारण कंटेंट की कमी, और ऊपर से बढ़ता महंगाई का बोझ है। पत्रिका खरीदने से लोग कतराने लगे हैं, ऐसे में भला जॉब खोने का खतरा कोई कैसे मोल ले सकता है, जाहिर सी बात है कि अगर आमदनी नहीं होगी, तो जॉब सुरक्षित नहीं रहेगी, हो सकता है कि इस बार इंडिया टूडे ने अपनी गिरती बिक्री को बचाने के लिए इस तरह की भाषा व पोस्‍टर का प्रयोग किया हो।

मगर दूसरी ओर देखें तो शायद इंडिया टूडे कुछ गलत भी नहीं कह रहा, आज सुंदर बनना किसे पसंद नहीं, युवा रहना किसकी चाहत नहीं, खुद को सबसे खूबसूरत व युवा दिखाने की होड़ ने लाइफस्‍टाइल दवा बाजार को संभावनाओं से भर दिया, व्‍यक्‍ित आज बीमारी से छूटकारा पाने के लिए नहीं, बल्‍कि सुंदर व आकर्षित दिखने के लिए दवाएं खा रहा है। अगर यह बात सच नहीं तो आए दिन अखबारों में ग्रो ब्रेस्‍ट व मर्दाना ताकत बढ़ाओ जैसे विज्ञापनों का खर्च कहां से निकलता है, अगर वह बिकते नहीं। जवाब तो सब के पास है।

शायद ऐसे विषयों पर स्‍टोरी करना तब गलत नजर आता है, जब यह स्‍टोरी केवल बीस फीसद हिस्‍से पर लागू होती हो, इन चीजों के आदी या तो मायानगरी में बसने वाले सितारें हैं या फिर कॉलेजों में पढ़ने वाले कुछेक छात्र छात्राएं या फिर सुंदरता के दीवाने पुरुषों की कसौटी पर खरी उतरने ललक में जद्दोजहद कर रही महिलाएं। मगर मजबूरी का दूसरा नाम, तो आप सभी जानते हैं। शायद इंडिया टूडे की भी कोई मजबूरी रही होगी, इस स्‍टोरी को इस तरह कवर स्‍टोरी बनाने के पीछे।

वैसे इंडिया टूडे ने एक शब्‍द का इस्‍तेमाल किया है सनक, सनक अर्थ शायद क्रेज या चलन होता है। और जब भी किसी चीज का चलन बढ़ता है तो मीडिया उस पर अपनी प्रतिक्रिया देने से पीछे तो कभी हटता नहीं, फिर इस चलन को लेकर इंडिया टूडे ने पहले मोर्चा मार लिया कह सकते हैं। हर आदमी को क्रेज ने मारा है, किसी को अगले निकलने के, किसी को रातोंरात सफल अभिनेत्री बनने के, किसी को अपने सह कर्मचारियों को पछाड़ने के, किसी को अपने प्रतियोगी से आगे निकलने के। अब हिन्‍दी समाचार चैनलों को ही देख लो, एक दूसरे से पहले स्‍टोरी ब्रेक करने के क्रेज ने मार डाला, स्‍टोरी ब्रेक करने के चक्‍कर में भाषा का सलीका बदल जाता है, एक न्‍यूज रिपोर्ट या एंकर क्रोधित हो उठता है। पंजाब में प्रकाशित होने वाले पंजाब केसरी के फिल्‍मी दुनिया पेज की कॉपियां सबसे ज्‍यादा बिकती हैं, क्‍यूंकि वह वो छापता है, जो कोई दूसरा नहीं छापता, ऐसे में उसका मुकाबला करने के लिए दूसरे ग्रुपों को भी उसी दौड़ में शामिल होना पड़ेगा, क्‍यूंकि पैसा नचाता है, और अश्‍लीलता बिकती है।

अश्‍लीलता बिकती है व पैसा नचाता है से याद आया, पूजा भट्ट व महेश भट्ट को ही देख लो, आखिर कैसा सनक है कि बाप बेटी जिस्‍म 2 को लेकर बड़े उत्‍सुक हैं, सन्‍नी को लेने का फैसला महेश भट्ट ने किया, और फिल्‍म बनाने का पूजा भट्ट ने, वहां बाप बेटी के बीच सब कुछ नॉर्मल है, उनको कुछ भी अजीब नहीं लगता, ऐसा लगता है कि पैसे की चमक हर चीज को धुंधला कर देती है, तो शर्म हया क्‍या भला है।

चलते चलते  इतना ही कहूंगा कि पैसा नचाता है, दुनिया नाचती है। शायद इंडिया टूडे हिन्‍दी पत्रिका वालों की भी कुछ ऐसी ही कहानी होगी, वरना इतनी इज़्ज़तदारपत्रिका ऐसी स्‍टोरी को इस तरह एक्‍सपॉज नहीं करती, वैसे भी मीडिया में कुछ वर्जित नहीं रहा। जो मीडिया आज इंडिया टूडे पर उंगली उठा रहा है, वही मीडिया विदेशी महिला अदाकारों की उस बात को बड़ी प्रमुखता से छापता है, जिसमें वह कहती हैं उसने कब कौमार्य भंग किया, कितनी दवाएं व सर्जरियां करवाकर अपनी ब्रेस्‍ट का साइज बढ़ाया। इतना ही नहीं, कुछेक न्‍यूज वेबसाइटों पर तो एक कोने में अभिनेत्रियों की हॉट से हॉट तस्‍वीरें रखी मिलेगीं, और लिखा मिलेगा एडिटर की चॉव्‍इस, अगर एडिटर की चॉव्‍इस ऐसी होगी, तो अखबार कैसा होगा, मैगजीन कैसी होगी जरा कल्‍पना कीजिए, मैं फिर मिलूंगा, किसी दिन किसी नई चर्चा के साथ।

विद्या बालन की 'द डर्टी पिक्‍चर'

रविवार के समाचार पत्र में एक बड़ा सा विज्ञापन था, जिसमें द डर्टी पिक्‍चर का पोस्‍टर और टीवी पर फिल्‍म प्रसारित होने का समय छपा हुआ था, यकीनन लोगों ने समय पर टीवी शुरू किया होगा, मगर हुआ बिल्‍कुल उनकी उम्‍मीद से परे का, क्‍यूंकि टीवी पर उस समय कुछ और चल रहा था, ऐसा ही कुछ हुआ था, पेज थ्री के वक्‍त हमारे साथ।

हम पांच लोग टिकट विंडो से टिकट लेकर तेज रफ्तार भागते हुए सिनेमाहाल में पहुंचे, जितनी तेजी से अंदर घुसे थे, उतनी तेजी से बाहर भी निकले, क्‍यूंकि सिनेमा हॉल के बाहर पोस्‍टर पेज थ्री का था, और अंदर फिल्‍म बी ग्रेड की चल रही थी। शायद द डर्टी पिक्‍चर देखने की उम्‍मीद लगाकर रविवार को 12 बजे टीवी ऑन करने वालों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ होगा। यकीनन लोग घर से बाहर तो नहीं भागे होंगे, मगर निराशा होकर चैनल तो जरूर बदल दिया होगा।

द डर्टी पिक्‍चर, इस लिए अपने निर्धारित समय पर प्रसारित नहीं हुई, क्‍यूंकि कोर्ट ने इसके प्रसारण रोक लगाते हुए इसको रात्रि ग्‍यारह बजे के बाद प्रसारित करने का आदेश दिया है। मगर मसला तो यह उठता है कि अगर 'द डर्टी पिक्‍चर' इतनी ही गंदी है, जितनी कि कोर्ट मान रही है तो इस फिल्‍म को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से क्‍यूं नवाजा गया? बात तब समझ से परे हो जाती है, जब एक तरफ फिल्‍म को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जाता है, और वहीं दूसरी तरफ कोर्ट द्वारा इसके प्रसारण पर रोक लगा दी जाती है।

अगर कोर्ट एक फिल्‍म के प्रसारण पर रोक लगाती है तो बुरी बात मानी जानी चाहिए, हां अगर कोर्ट ए सर्टिफिकेट हासिल सभी फिल्‍मों पर रोक लगाने का फैसला सुनाती है, तो हमको स्‍वागत करना चाहिए। मगर अफसोस की बात है कि पिछले कुछ सालों में बहुत कम ऐसी फिल्‍में बनी हैं, जिनको प्रसारण का हक मिलना चाहिए, लेकिन मिल रहा है। अभी पिछले दिनों आई रासक्‍ल, दिल तो बच्‍चा है, मॉर्डर, दम मारो दम, कितनी साफ सुधरी हैं, जो बार बार प्रसारित की जा रही हैं।

कुर्बान फिल्‍म में करीना कपूर का बेलिबास दृश्‍य, अभी रिलीज हुई हेट स्‍टोरी में नायिका नग्‍न पोस्‍टर और जिस्‍म 2 में सन्‍नी लियोन का नग्‍न शरीर पर पारदर्शी चुनरी ओढ़कर लेटना क्‍या रोक लगाने वाले मामले नहीं हैं। जब जंगल पूरी तरह आग के आगोश में चला जाता है, तब हमारी सांस्‍कृति को बचाने वालों की आंख खुलती है, और रोक लगाने की बातें शुरू होती हैं, जो एक प्रचार से ज्‍यादा कुछ नहीं होती।

चलते चलते  इतना ही कहूंगा कि यह फिल्‍म भी प्रसारित हो जाती चुपके से, मगर इसका नाम 'द डर्टी पिक्‍चर' ही सबसे बड़ी प्रॉब्‍लम खड़ी कर गया, 'द डर्टी पिक्‍चर' बोले तो 'गंदी छवि', और 'गंदी छवि' को कैसे प्रसारित किया जा सकता है। वैसे भी कहावत है, बद से बदनाम बुरा। और 'द डर्टी पिक्‍चर' बदनाम हो चुकी है। भले ही इसके डॉयलॉग छोटे पर्दे पर पुरस्‍कार समारोह की शान बने हों, मगर कोर्ट हमारी दलीलों व साबूतों पर अपना फैसला सुनाती है।

रुपहले पर्दे का असली द एंग्री यंग मैन

'ढ़ाई किलो का हाथ, जब उठता है तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है' इस संवाद को सुनते ही एक चेहरा एकदम से उभरकर आंखों के सामने आ जाता है। वो चेहरा असल जिन्‍दगी में बेहद शर्मिला व मासूम है, लेकिन रुपहले पर्दे पर वो हमेशा ही जिद्दी व गुस्‍सैल नजर आया, कभी क्रप्‍ट सिस्‍टम को लेकर तो कभी प्‍यार की दुश्‍मन दुनिया को लेकर। जी हां, मेरी निगाह में रुपहले पर्दे का असली द एंग्री यंग मैन कोई और नहीं बल्‍कि ही मैन धर्मेंद्र का बेटा सन्‍नी दिओल है, जो बहुत जल्‍द एक बार फिर रुपहले पर्दे पर मोहल्‍ला अस्‍सी से अपने दीवाने के रूबरू होने वाला है।

प्रचार व मीडिया से दूर रहकर अपने काम को अंजाम देने वाले दिओल खानदान के इस चिराग ने दिओल परिवार का नाम ऊंचा ही किया है, कभी गिराया नहीं, अच्‍छे बुरे वक्‍त से गुजरते हुए सन्‍नी ने फिल्‍म जगत में करीबन तीन दशक पूरे कर लिए हैं। इतने लम्‍बे कैरियर में सन्‍नी को अब तक दो राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्‍मफेयर पुरस्कार मिल चुके हैं। मगर आज भी बॉलीवुड में उनका हमउम्र हीरो उतना कदवार नहीं है, जितना के सन्‍नी दिओल।

गत साल 19 अक्‍टूबर को 55 साल पूरे कर चुके सन्‍नी ने साल 1983 में फिल्‍म ‘बेताब’ से अपनी फिल्‍मी करियर शुरुआत की। कहते हैं कि सन्‍नी ने इग्‍लैंड जाकर बकायदा अभिनय की ट्रेनिंग ली और उसके बाद फिल्‍मों का रुख करने का फैसला किया। शायद यही कारण है कि सन्‍नी ने रुपहले पर्दे पर अपने किरदारों को जीवंत कर दिया।

सन्‍नी दिओल ने अपने इतने लम्‍बे कैरियर में बहुत सी बेहतरीन फिल्‍में दी हैं, मगर उनकी कुछ फिल्‍में तो ऐसी हैं, जिनको फिल्‍म जगत व सिने दर्शक कभी नहीं भूल पाएंगे, जैसे कि ‘बेताब’ ‘सोहनी महिवाल’ ‘डकैत’ ‘निगाहें’ ‘वर्दी’ ‘जोशीले’ ‘त्रिदेव’ ‘चालबाज’ ‘घायल’ ‘नरसिम्‍हा’ ‘दामिनी’, ‘विश्‍वात्‍मा’ ‘लुटेरे’ ‘क्षेत्रिय’ ‘वीरता’ ‘डर’ ‘इंसानियत’ ‘इम्‍तिहान’ ‘जीत’ ‘घातक’ ‘जिद्दी’ ‘बॉर्डर’ ‘सलाखें’ ‘इंडियन’ ‘गदर-एक प्रेम कथा’ ‘अर्जुन पंडित’ ‘अपने’, और ‘यमला पगला दीवाना’ जैसी कई यादगार फिल्‍में हैं।

सन्‍नी ने अपनी करियर में ज्‍यादातर एक्शन किरदार ही निभाए हैं लेकिन पिछले साल आई फिल्‍म ‘यमला पगला दीवाना’ में सन्‍नी का कॉमेडी अंदाज भी लोगों को बेहद पसंद आया। फिल्‍म का निर्माण देओल परिवार के बैनर तले ही हुआ। फिल्‍मी कैरियर में कई उतार चढ़ाव देख चुके सन्‍नी दिओल रुपहले पर्दे पर अपने चाहने वालों के समक्ष इस साल मोहल्‍ला अस्‍सी व घायल रिटर्न्‍स लेकर हाजिर होंगे। ऐसे में उम्‍मीद है कि घायल रिटर्न्‍स में सन्‍नी दिओल का पुराना रूप देखने को मिलेगा, जिसको देखकर लगता है रुपहले पर्दे का असली द एंग्री यंग मैन।

सिंघवी सीडी मामला निजता का नहीं, राष्‍ट्रीयता का

जब ''राष्‍ट्रीय सुरक्षा खतरे में'' को लेकर मीडिया ने कुछ चिट्ठियां लीक की तो कुछ मीडिया ग्रुप बोल रहे थे, देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में मीडिया को ऐसे समाचार प्रकाशित नहीं करने चाहिए। अब जब फिर कांग्रेस के प्रवक्‍ता व राज्‍य सभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की रिकोर्डिंग का मामला सामने आया तो मीडिया ने अपने मुंह पर ताले मार दिए और कुछ ब्‍लॉगर लिख रहे हैं कि यह निजता का मामला है, इस तरह उछाला नहीं जाना चाहिए, लेकिन किसी ने यह क्‍यूं नहीं कहा कि यह मामला निजता का नहीं, राष्‍ट्रीयता का है, क्‍यूंकि सिंघवी कोई आम आदमी नहीं, बल्‍कि देश का प्रतिनिधित्‍व करने वाले समूह का हिस्‍सा है।

हो सकता है कि सिंघवी के दीवाने उनको एक आम आदमी मानते हों, मगर मैं उनको एक बात याद दिलाना चाहूंगा कि सिंघवी जहां राज्‍य सभा सांसद हैं, वहीं दूसरी ओर वह कांग्रेस के प्रवक्‍ता भी हैं, जो देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है, जिनके कंधों पर देश को चलाने का भार है, जो कभी उसने समझा नहीं।

एक बात और जो वीडियो में सौदेबाजी हो रही है, वह देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था प्रणाली से जुड़ी हुई है, जिससे हम न्‍याय की उम्‍मीद करते हैं। अगर वो व्‍यवस्‍था ही इस तरह खोखली हो जाएगी तो इंसाफ की गुहार हम किस से लगाएंगे। 

सिंघवी मामले में हाईकोर्ट का फैसला, न्‍याय प्रणाली व्‍यवस्‍था को उजागर ही तो करता है। सीडी के प्रसारण पर रोक लगाने की बात कहकर अदालत ने न्‍याय प्रेमियों को पूर्ण रूप से निराश किया है। जबकि कोर्ट को इस मामले में सिंघवी के खिलाफ सख्‍त एक्‍शन लेने की जरूरत थी, जो न्‍याय पालिका को अपने बाप की जागीर समझता है।

मीडिया को नींद की गोलियां खिलाकर सुला देने वाले लोगों ने सोचा कि अब तो दुनिया उनकी मुट्ठी में है, लेकिन वह टीवी देखना भूल गए, जहां पर आईडिया कंपनी का एक शानदार विज्ञापन जोरदार आइडिया देता है। जब मीडिया ने मुंह बंद कर लिया, तब वह आइडिया ही अकेले सिंघवी की नहीं, पूरे सिस्‍टम की बाट लगा रहा है।

सिंघवी ने कहा कि यह किसी के भी साथ हो सकता है और यदि इस अराजकता को जारी रहने दिया गया तो यह जल्‍द ही हम सब को बर्बाद कर देगी। सिंघवी का यह बयान देशहित में तो लगता नहीं, क्‍यूंकि देश हित में सोचने वाले ऐसा कार्य नहीं करते, जो कार्य सिंघवी ने किया है। शायद वह इस बयान से उन लोगों को जगाने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनके खेमे में आते हैं।

देश को जगाने का प्रयास संघवी नहीं, यह चाय का विज्ञापन कर है, जिसमें 'देश उबल रहा है' संवाद शुमार है।

बेटियों की परवाह करते हैं या चुनने का अधिकार छीनते हैं ?

बेटियों की परवाह करते हैं या चुनने का अधिकार छीनते हैं? यह प्रश्‍न मुझे कई दिनों से तंग परेशान कर रहा है। सोचा आज अपनी बात रखते हुए क्‍यूं न दुनिया से पूछ लिया जाए।

कुछ दिन पहले मेरी शॉप पर एक महिला ग्राहक अपने परिवार समेत आई, वो भी मेरी तरह कई दिनों से तंग परेशान थी, एक सवाल को लेकर, मैं हिन्‍दी और मेरी पत्‍नी अच्‍छी गुजराती कैसे बोलती है?

आखिर उसने भी मेरी तरह हिम्‍मत करके सवाल पूछ ही लिया, उत्तर तो शायद वह पहले से ही जानती थी लव मैरिज। मगर पूछकर उस ने अपने संदेह को सत्‍य में तब्‍दील कर दिया। फिर वह झट से बोली, मैंने भी अपने बेटे को कह रखा है, जो लड़की पसंद हो मुझे बता देना, मैं शादी करवा दूंगी।

चलो अच्‍छी बात है कि दुनिया अब ऐसा सोचने लगी है, लव मैरिज को अहमियत देने लगी है। मगर कुछ देर बाद वो महिला बोली, अगर तुम्‍हारे ध्‍यान में हमारी बिरादरी का लड़का हो तो बताना, मेरी बेटी के लिए।

मुझे यह बात खटक गई, मैंने पूछा, बेटा जो भी लाए चलेगा, लेकिन लड़की के लिए आप ही ढूंढेंगे ? क्‍या बात है! उसने कहा, ऐसा नहीं, बच्‍ची की जिन्‍दगी का सवाल है, फिर मैंने पूछा क्‍या जो आपका लड़का लड़की लेकर आएगा, वह किसी की बच्‍ची नहीं होगी, तो बोली मेरा घर अच्‍छा बढ़िया है, और मेरा बेटा पढ़ा लिखा भी है।

बस यहीं पैदा होता है मेरा सवाल, जब खुद के लड़के की बात हो तो कोई भी होगी चलेगी, मगर जब लड़की की बात आए तो हम ढूंढेंगे, कहीं उसका जीवन खराब न हो जाए, आखिर बात समझ से परे है।

अंत में एक बार फिर से पूछना चाहता हूं कि क्‍या हम अपनी बेटियों बे इंतहा प्‍यार करते हैं या फिर उनसे चुनने का हक छीनते हैं?

याहू चैट से फेसबुक तक

एक समय था, जब इंटरनेट यूजर्स yahoo व Rediff मैसेजर द्वारा किसी chat room में घुसे रहते थे। इस दौर में साइबर कैफे खूब कमाई का धंधा था, लोग इंटरनेट पर चैट व गेम खेलने में व्‍यस्‍त रहने लगे थे। फिर लोगों ने साइबर कैफे को अलविदा कहते हुए कम्‍प्‍यूटर व इंटरनेट को घर के किसी कोने में रख लिया और की बोर्ड कूटना शुरू कर दिया। जैसे जैसे इंटरनेट यूजर्स की संख्‍या बढ़ने लगी, वैसे वैसे इंटरनेट पर कंटेंट की मात्रा में भी भारी इजाफा होने लगा। इंटरनेट यूजर्स की बढ़ती संख्‍या को देखते हुए Google ने orkut को जन्‍म दिया। orkut ने बहुत जल्‍द लोकप्रिय हासिल कर ली, क्‍योंकि बहुत आसान जो था, इसमें यूजर्स को खाता बनाना और उसको चलाना।

मगर mozilla आने के बाद जो दुर्गति Internet Explorer हुई, वह दुर्गति facebook आने के बाद orkut की हुई। जो पाइप लाइन गूगल ने orkut द्वारा बिछाई थी, उस पर कब्‍जा facebook ने कर लिया।

मुझे याद है, जब मैंने पहली बार कुछ साल पहले इस पर लॉगिन किया था, एक बड़े संवाददाता से बात करने की कोशिश की थी, मगर बुरी तरफ असफल भी रहा, इतना ही नहीं उसने तो मेरा खाता ब्‍लॉक भी कर दिया था। इसके बाद मैंने कई महीनों तक facebook नहीं खोला, मगर एक दिन फेसबुक पर फिर लौटा, और महसूस हुआ कि यह पॉश इलाका है, और ओर्कुट नॉर्मल रेजीडेंसी वाला इलाका।

मगर धीरे धीरे ऑर्कुट वाले लोग पॉश एरिए में अपनी पैठ बनाने लगे, हर कोई एक दूसरे को friend request भेजने लगा। फेसबुक पर चाहने वालों का एक बड़ा ग्रुप सर्कल बनने लगा। अब लोग फेसबुक को एक प्रचार का बेहतरीन माध्‍यम मानने लगे। यहां पर हर कोई अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने लगा। उसको पूर्ण आजादी थी, status updates करने की। अपने फोटो अपलोड करने की। उनको एक दूसरे से share करने की। अब हर किसी का friend request स्‍वीकार होने लगी, बशर्ते उसके खाते में अशलील सामग्री न हो। अब टीवी से पहले फेसबुक पर खबरें प्रकाशित होने लगी। जिन्‍दगी में कितने उतार चढ़ाव हैं का जिक्र होने लगा।

यहां पर page create होने लगे, बड़ी बड़ी हस्‍ितयां यहां पर विराजमान होने लगी। फैन्‍स क्‍लब बनने लगे। आज फेसबुक गीतों में, समाचारों में, ख्‍यालों में व शायरोशायरी में शुमार होने लग गया। कुछ लोगों ने अपनी दुकानों के नाम फेसबुक रख दिए। आज facebook सबसे बड़ा ब्रांड बन चुका है। इतना बड़ा ब्रांड के किसी की जान भी ले रहा है और किसी की जान बचा भी रहा है।

चलते चलते इतना ही कहूंगा कि टाइमपास, बिजनस व प्रचार का एक अच्‍छा माध्‍यम है, फेसबुक। इसके हिट होने का यह कारण है, हर कोई अपना बिजनस बढ़ाना चाहता है, टाइम पास करना चाहता है, और प्रचार करना चाहता है। हम सब यहां इनमें से कुछ न कुछ तो करते हैं।

प्रेम कहानी से सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक


एक लड़का व लड़की कहीं पैदल जा रहे थे। तभी लड़के की टांग पत्‍थर से टकराई और रक्‍त बहने लगा, लड़के ने मदद की आस लगाते हुए लड़की की तरफ देखा कि शायद वह अपना दुपट्टा फाड़ेगी और उसकी टांग पर बांधेगी। लड़की ने उसकी आंखों में देखते हुए तुरंत बोला, सोचना भी मत, डिजाइनर सूट है।

यह कहानी जो अपने आप में बहुत कुछ कहती है, मेरे एक दोस्‍त ने आज सुबह फेसबुक पर सांझी की। इस कहानी को पढ़ने व केमेंट्स करने के बाद, कुछ और सर्च करने निकल पड़ा, तभी मेरी निगाह एक बड़ी खबर पर पड़ी, जिसका शीर्षक था, आज से शिक्षा हर बच्चे का मूल अधिकार।

सच में कितना प्‍यारा शीर्षक है, वैसा ही जैसे उस लड़के का अपनी प्रेमिका से मदद की उम्‍मीद लगाना, जो उसके साथ हुआ वह तो हम कहानी में पढ़ चुके हैं, जो अब सुप्रीम अदालत के फैसले का साथ हमारे शैक्षणिक संस्‍थान चलाने वाले करेंगे वह भी कुछ ऐसा ही होगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहतरीन फैसला सुनाया है, मगर इस फैसले का कितना पालन पोषण किया जाएगा, इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 

लेकिन एक उम्‍मीद जरूर है, आज प्रिंट मीडिया के कुछ जागरूक लोग इस पर परिचर्चा जरूर करेंगे एवं अगले दिनों में आप इस फैसले की उड़ती धज्‍जियों पर एक बेहतरीन रिपोर्ट भी पढ़ेंगे। ज्ञात रहे कि पिछले साल 3 अगस्त को प्राइवेट स्कूलों के संचालकों ने अनुच्छेद 19 (1) जी के अंतर्गत दिए गए अधिकारों का हवाले देते हुए शिक्षा के अधिकार कानून को उल्लंघन बताया था। भले ही सुप्रीम कोर्ट ने उक्‍त याचिका को रद्द करते हुए फैसला सुना दिया, मगर उन लोगों को निगाह क्‍यों रखेगा, जिन्‍होंने पहले ही इस अधिकार की पुरजोर आलोचना की है।

मुझे याद है कि पिछले साल मैं अखबार में होने के चलते कुछ प्राइवेट स्‍कूलों में गया था, हर स्‍कूल से आर्थिक तंगी का रोना ही सुनने को मिला। हर स्‍कूल संचालक बोल रहा था, इतनी महंगाई में स्‍कूल चलाना कोई आसान बात नहीं, पसीने छूट जाते हैं, और उपर से सरकार के आए दिन नए नए कानून उनकी जान लेने पर तूले हुए हैं।

सवाल तो यह उठता है कि क्‍या सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को सही रूप से लागू करेंगे निजी स्‍कूल संचालक, जो कम पढ़ी लिखी लड़कियों को कम वेतन पर रखकर शिक्षा प्रणाली की पहले ही धज्‍जियां उड़ा रहे हैं।

अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के डर से कुछ स्‍कूल संचालकों ने बच्‍चों को दाखिला दे भी दिया, क्‍या वह उनके प्रति उतने जिम्‍मेदार होंगे, जितना वह फीस अदाकर पढ़ने वाले बच्‍चों के प्रति होते हैं। सवाल तो और भी बहुत हैं, लेकिन चलते चलते इतना ही कहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ उक्‍त प्रेमी के साथ हुए व्‍यवहार जैसा कुछ न हो, कुछ समाज सेवी संस्‍थाओं व संबंधित सरकारी संस्‍थानों को भी अपनी अपनी जिम्‍मेदारी समझनी होगी। क्‍यूंकि यह एक कदम है, यह एक पहल है देश को नई दिशा, नई सुबह से रूबरू करवाने की।

निर्मल बाबा, मीडिया और पब्‍लिक, आखिर दोषी कौन?



फेसबुक पर कुमार आलोक लिखते हैं, मेदनीनगर झारखंड में ईंट भट्ठा का रोजगार किया ...नही चला ..गढ़वा में कपडे़ की दूकान खोली ..वो भी फ्लाप ..बहरागोडा इलाके में माइंस का ठेका लिया औंधे मुंह गिरे ...पब्लिक को मूर्ख बनाने का आइडिया ढूंढा .. तो सुपरहिट ..ये है निर्मल बाबा का संघर्ष गाथा।

मगर सवाल यह उठता है कि पूरे मामले में आखिर दोषी कौन है वो निर्मल बाबा, जो लोगों को ठगने का प्‍लान बनाकर बाजार में उतरा, या मीडिया, जिसने पैसे फेंको तमाशा देखो की तर्ज पर उसको अपने चैनलों में जगह दी या फिर वो पब्‍िलक जो टीवी पर प्रसारित प्रोग्राम को देखने के बाद बाबा के झांसे में आई।

निर्मल बाबा पर उस समय उंगलियां उठ रही हैं, जब वह चैनलों व अपनी बातों की बदौलत करोड़पति बनता जा रहा है। अब निर्मल बाबा से उस मीडिया को प्रोब्‍लम होने लगी है, जो विज्ञापन के रूप में बाबा से लाखों रुपए बटोर रहा है। आज बाबा पर उंगलियां उठाने वाला मीडिया स्‍वयं के मालिकों से क्‍यूं नहीं पूछता, जिन्‍होंने बाबा को घर घर तक पहुंचाया, जिन्‍होंने निर्मल बाबा का अवतार पैदा किया, जो काम निर्मल बाबा को करने में सालों लग जाते या कहूं शायद उसका यह तरीका भी कहीं न कहीं दम तोड़ देता, मगर अफसोस की बात है कि पैसे को जीवन मानने वाले मीडिया ने वो कार्य कुछ महीनों में कर दिखा दिया। निर्मल बाबा के दर्शनों के लिए आज लोग ऐसे इंतजार कर रहे हैं, जैसे कि मांग बढ़ने के बाद किसी वस्‍तु की ग्राहक करते हैं।

यहां पब्‍लिक को दोष नहीं दिया जा सकता, क्‍यूंकि आज हर आदमी पूर्ण रूप से त्रसद है, और वह हर तरफ एक आशा की किरण ढूंढता है, भले ही वह छलावा ही क्‍यूं न हो। मगर मीडिया तो पढ़े लिखे लोगों का समूह माना जाता है, आखिर उस ने ऐसे मूर्खतापूर्ण कार्य को प्रोत्‍साहन क्‍यूं दिया। बाजारवाद और बढ़ती प्रतिस्‍पर्धा के कारण, मीडिया पागल के हाथ में तलवार जैसा प्रतीत होता है, जो विनाश के सिवाय कुछ नहीं कर सकता।

कुछ दिन पहले एक मित्र ने फेसबुक पर एक फोटो डाली थी, और लिखा था कि यह लड़की जूनिअर कलाकार है, और इसने बाबा के प्रोग्रामों में पैसे लेकर झूठ बोला था, और उस लड़की ने खुलासा किया कि बाबा ने शुरू शुरू में अपने लोगों को प्रोग्राम में खड़ा कर झूठ बुलवाया। समझ से परे है कि इस लड़की का जमीर अब जागा, जब निर्मल बाबा एक अवतार बन चुके हैं, जब लोग उन पर अंधविश्‍वास करने लेंगे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन पैसों की खातिर लड़की ने झूठ बोलने का फैसला किया था, आज वह पैसे उसको कम लग रहे हैं, जब निर्मल बाबा एक करोड़पति बनने की ओर कदम बढ़ा रहा है।

यह फैसला भी मीडिया को करना होगा कि इस पूरे घटनाक्रम में दोषी कौन है, खुद मीडिया, पब्‍लिक व निर्मल बाबा।

अंत में रोटी फिल्‍म के बहुचर्चित गाने के बोल लिखते हुए अलविदा लेना चाहूंगा कि ये पब्‍लिक है सब जानती है......

भारत सईद व पचास करोड़ पर ठोके दावा


सब जानते हैं कि अमेरिका शातर है, वो अपनी हर चाल सोच समझकर चलता है, अब साइद हाफिज को लेकर चली उनकी चाल को गौर से देखें, यह चाल अमेरिका ने कब चली, जब पाकिस्‍तानी राष्‍ट्रपति आसिफ अली जरदारी हिन्‍दुस्‍तान आने वाले थे। अमेरिका ने जैसे ही कहा,  सईद हाफिज मोहम्‍मद को पकड़वाने वाले को 50 करोड़ रुपए का नाम मिलेगा, तो सईद की दहाड़ते सुनते ही अमेरिका ने पल्‍टी मारते हुए कहा कि यह इनाम उसके खिलाफ साबूत पेश करने वाले को मिलेगा।
जैसे ही आसिफ ने भारत आने की बात स्‍वीकार की, वैसे ही हिन्‍दुस्‍तानी मीडिया को पंचायत बिठाने का मौका मिल गया। टीवी स्‍क्रीन पर मुददे खड़े किए जाने लगे, अमेरिका की नीयत पर शक किया जाने लगा, यहीं नहीं भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह हाफिज को लेकर मुंह खोलेंगे कि नहीं को लेकर भी अटकलें शुरू हो गई, और यह चर्चाएं तब भी खत्‍म नहीं हुई, जब आसिफ अपने घर पाकिस्‍तान लौट चुके थे।

अटकलों का बाजार गर्म था, पंचायत छोटी स्‍क्रीन पर निरंतर बिठाई जा रही थी, और बहस शुरू थी कि क्‍या पाकिस्‍तान भारत के साथ अपने रिश्‍ते मजबूत करना चाहता है, अगर हां तो क्‍या वह हाफिज को भारत के हवाले करेगा, लेकिन इस दौरान विशेषज्ञों ने उस चाल को कैसे नजरंदाज कर दिया, जो चाल अमेरिका ने चली थी, और हाफिज की दहाड़ते सुनते हड़बड़ाहट में उसने दूसरा कदम चला दिया, जिसमें वह खुद फंसता हुआ नजर आ रहा है, यह कहकर कि हाफिज के खिलाफ साबूत देने वाले को वह पचास करोड़ रुपए देगा। अमेरिका की इस घोषणा के बाद भारत के पास एक खूबसूरत चाल चलने का बेहतरीन मौका है, जो हमारे विशेषज्ञों ने नजरंदाज कर दिया।

विशेषज्ञों ने अपनी सरकार को सलाह क्‍यूं नहीं देनी सही समझी या फिर भारतीय सरकार की नीयत पर शक क्‍यूं नहीं किया जो बार बार पाकिस्‍तान सरकार पर यह कहते हुए दबाव बनाती है कि उसने हाफिज के खिलाफ पुख्‍ता साबूत पाकिस्‍तान को सौंपे हैं। अगर हकीकत में भारतीय सरकार के पास हाफिज के खिलाफ पुख्‍ता साबूत हैं तो देरी कैसी, वो साबूत सरकार अमेरिका के सामने क्‍यूं नहीं रखती, जिसके बदले में अमेरिका पचास करोड़ रुपए देने की बात कह रहा है। इस पचास करोड़ हमारी पुलिस की स्‍थिति सुधर सकती है, किसी नेता का पेट भर सकता है और अमेरिका की चली हुई चाल से अगर हमको हाफिज मिलता है तो क्‍या बुरा है।

अगर हम भारतीय सरकार से यह उम्‍मीद करें कि वह बयानों के अलावा पाकिस्‍तान पर कोई अन्‍य करवाई करेगी, तो यह अपने आपको धोखा देने से ज्‍यादा कुछ नहीं, क्‍योंकि हम पाकिस्‍तान को कोस रहे हैं कि वह आतंकवाद को अपनी जमीन इस्‍तेमाल करने के लिए दे रहा है तो हम क्‍यूं भूल जाते हैं कि भारत के कई हिस्‍सों में माओवाद भी पनप रहा है, भले ही वह अन्‍य देशों के लिए खतरा न हो लेकिन भारत के लिए तो खतरा है।

रही भारतीय प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की पाकिस्‍तान जाने की बात तो वह कभी भी जा सकते हैं, और शायद मेरे हिसाब से उनको जाना भी चाहिए क्‍यूंकि पाकिस्‍तान के अंदर सिक्‍खों के प्रथम गुरू श्री गुरूनानक देव जी का जन्‍मस्‍थल श्री ननकाना साहिब है, जो सिक्‍ख समाज में बहुत उच्‍च स्‍थान रखता है।

मंदिर हों तो अक्षरधाम जैसे


रविवार का दिन, सबसे मुश्‍िकल दिन मेरे लिए, पूरा दिन आखिर करूं तो क्‍या करूं, कोई दोस्‍त आस पास रहता नहीं, अगर रहता भी होगा तो उसके घर भी एक पत्‍नी होगी, जो उससे समय मांगेगी, ऐसे में मेरा उसके पास जाना भी कोई उचित नहीं था, मेरी पत्‍िन तो मायके गई हुई थी, बच्‍ची से मिलने, मैं रोज रोज सुसराल नहीं जा सकता। ऐसे में सुबह जल्‍दी जल्‍दी तैयार हुआ, और दुकान के लिए चल दिया, सोचा ब्‍लॉग जगत के लिए कुछ लिखूंगा, मगर दुकान पहुंचा तो पता चला इंटरनेट समयावधि पूरी होने के चक्‍कर में बंद पड़ा, दुकान का शटर नीचे किया, और खाने निकल गया, खाने के बाद सोचा घर जाऊं, सारा दिन टीवी देखूं, एंकर के चेहरों के बदलते हावभाव देखूं, या ऐसी टीवी चर्चा का हिस्‍सा बनूं, जिसमें मैं अपने विचार नहीं प्रकट कर सकता, ऐसे में सोचा क्‍यूं न अक्षरधाम घूम आउं, एक साल हो गया गांधीनगर में रहते हुए, लेकिन अक्षरधाम के मुख्‍य द्वार के सिवाय मैंने अक्षरधाम का कुछ नहीं देखा।

आज मन हुआ, निकल दिया, तो सोचा आज सही वक्‍त है, वरना फिर कभी जाना नहीं होगा, जैसे अक्षरधाम के मुख्‍य द्वार पर पहुंचा तो पता चला कि अंदरमोबाइल लेकर जाना सख्‍त मना है। ऐसे में मोबाइल तो जमा करवाना ही पड़ेगा, सो मैंने करवाया। मुख्‍य द्वार से जैसे ही अंदर की तरफ बढ़ा तो सबसे पहले मार्ग के इधर उधर बैठने के लिए बने शानदार गार्डन पर मेरी निगाहें गई, असल में ही बेहतरीन हैं यहां के गार्डन। जमीं पर हरी हरी घास, पेड़ पौधों की चारों तरफ बाड़ देखने लायक है।

अक्षरधाम के अंदर स्‍थित श्री स्‍वामीनारायण भगवान के मंदिर की पूरी परिक्रमा की, उनके कहे हर शब्‍द को पढ़ा, जो वहां पर लिखा हुआ था, उनसे जुड़ी हुई काफी चीजों को देखा, जो वहां पर रखी हुई थी। आज वह पहला दिन था जब में भारत के एक और महान युग पुरुष से रूबरू हो रहा था, जो ग्‍यारह साल की उम्र में ग्रहत्‍याग कर वन में विचरण करने चले गए थे। उन्‍होंने अपनी सात साल की लम्‍बी यात्रा जोकि 12000 किलोमीटर थी, को गुजरात के लोज गांव में पहुंच कर उस समय समाप्‍त किया, जब उनकी भेंट स्‍वामी रामानंदजी से हुई एवं उनको उन्‍होंने अपना गुरूधारण किया।

कहते हैं कि स्‍वामी नारायण का जन्‍म छपिया बिहार में हुआ, और उनका बचपन का नाम घनश्‍याम था, जो अगले चलकर स्‍वामी नारायण भगवान में बदल गया, आज स्‍वामी नारायण एक बहुत बड़ा समुदाय है, जी हां, दिल्‍ली स्‍िथत अक्षरधाम मंदिर विश्‍व में सबसे बड़ा हिन्‍दु मंदिर है और अटलांटा स्‍थित श्री स्‍वामीनारायण भगवान का मंदिर पश्‍चिम में सबसे बड़ा हिन्‍दु मंदिर है। अक्षरधाम देखने के बाद लगा कि भले मंदिरों की संख्‍या कम हो तो चलेगी, मगर मंदिर हों तो ऐसे, जहां घुसने के बाद निकलने को मन न करे।

मंदिर परिक्रमा खत्‍म करने के बाद पचास रुपए की टिकट खरीद प्रदर्शनी देखने को मन ललचा उठा, मंदिर की परिक्रमा ने आगे बढ़ने के लिए मजबूर जो कर दिया था। जैसे ही पहले कक्ष में पहुंचे तो वहां कुछ अनगढ़ पत्‍थर पड़े हुए थे और दूसरी तरफ एक अधगढ़ मूर्ति थी, जिसके हाथ में हथौड़ी और शैणी। यह अद्भुत दृश्‍य था, जो अपने आप में बहुत कुछ कह रहा था, सच में सब कुछ मानव के हाथ में है चाहे तो वह पत्‍थर से मूर्त बना ले, चाहे तो मूर्त को खंडित कर दे। इसके बाद एक लम्‍बी सी सुरंग पार करते हुए हम एक जंगल में पहुंचे, जहां शेर दहाड़ रहे थे, उल्‍लू शाख पर बैठा हुआ इधर उधर झांक रहा था, अजगर पेड़ की डालों से लिपटा हरकत कर रहा था, ठंडी ठंडी हवाएं शरीर को शीत कर रही थी। एक पल के लिए तो लगा शायद सचमुच के जंगल से गुजर रहे हैं। इसके बाद स्‍वामी नारायाण जी के जीवन आधारित एक फिल्‍म दिखाई गई, जिसको देखकर कहीं से नहीं लगता कि भारत गरीब देश है, एक तरफ समुद्र, एक तरफ हिमालय से शीत पर्वत, एक तरफ तपते हुए रेगिस्‍तान, जहां इस फिल्‍म ने स्‍वामी नारायण भगवान के जीवन पर प्रकाश डाला, वहीं भारत उनके हिस्‍सों की भी झलक दिखलाई, जो भारत को अमीर होने का अहसास दिलाते हैं। मार्क टिवन कहते हैं कि सौ राष्‍ट्रों के मिलन से एक राष्‍ट्र भारत बनता है, और उस भारत को देखने के लिए ही तो हर साल लाखों विदेशी आते हैं, फिर भी हम हिन्‍दुस्‍तानी बाहर जाकर नौकरी करने के लिए मरे जा रहे हैं।

इस यात्रा के दौरान भगवान राम व भगवान कृष्‍ण से जुडी़ हुई झांकियां भी देखने को मिली, और अंत में एक भजन से हमारी यात्रा संपन्‍न होगी। इसके बाद बस एक ही ख्‍याल आया, क्‍यूं भारत के मंदिरों को ऐसे ज्ञानपूर्ण अर्थपूर्ण बना दिया जाए, जैसे ही हमारी नसल वहां घुसे तो उसको भगवान के बारे में पूर्ण जानकारियों बड़े रोचक तरीके मिलें। अक्षरधाम में मैंने जो जो पढ़ा या देखा, असल में वह जीवन को उच्‍चस्‍तर की तरफ लेकर जाता है।

हैप्‍पी अभिनंदन में रविश कुमार



हैप्‍पी अभिनंदन
 
में इस बार आपको एनडीटीवी के रिपोर्टर से एंकर तक हर किरदार में ढल जाने वाले गम्‍भीर व मजाकिया मिजाज के रवीश कुमार से मिलवाने की कोशिश कर रहा हूं, इस बार हैप्‍पी अभिनंदन में सवाल जवाब नहीं होंगे, केवल विशलेषण आधारित है, क्‍योंकि एक साल से ऊपर का समय हो चला है, अभी तक रवीश कुमार, जो नई सड़क पर कस्‍बा बनाकर बैठें हैं, की ओर से मेरे सवालों का जवाब नहीं आया, शायद वहां व्‍यस्‍तता होगी। हो सकता है कि उनके कस्‍बे तक मेरे सवाल न पहुंच पाए हों, या फिर उनके द्वारा भेजा जवाबी पत्र मुझ तक न आ पाया हो।

फिर मन ने कहा, क्‍या हुआ अगर जवाबी पत्र नहीं मिला, क्‍यूं न रवीश कुमार से पाठकों व ब्‍लॉगर साथियों की मुलाकात एक विशलेषण द्वारा करवाई जाए। रविश कुमार, ब्‍लॉग सेलीब्रिटी नहीं बल्‍कि एक सेलीब्रिटी ब्‍लॉगर हैं, जिनके ब्‍लॉग पर लोग आते हैं, क्‍यूंकि सेलीब्रिटियों से संबंध बनाने का अपना ही मजा है। मगर रवीश कुमार ने साबित किया है कि वह केवल सेलीब्रिटी ब्‍लॉगर नहीं हैं, बल्‍कि एक सार्थक ब्‍लॉगिंग भी करते हैं।

मैं पहली बार उनके ब्‍लॉग पर एक साथी के कहने पर पहुंचा था, जो उम्र में मुझे काफी बड़े थे, उनको पता था कि मैं ब्‍लॉग लिखता हूं, उन्‍होंने मुझे पूछा कभी रवीश को पढ़ा है, तब मैं नहीं जानता था कि रवीश कुमार कौन हैं। मैं उनको खोजा और कस्‍बा नामक ब्‍लॉग पर पहुंचा, यह कस्‍बा नई सड़क स्‍थित है।

उनका ब्‍लॉग उनकी नौकरीपेशा जिन्‍दगी से बिल्‍कुल अहलदा हैं, सच में, क्‍यूंकि वहां पर वह वो सब नहीं कर सकते, जो ब्‍लॉग जगत में वह बेबाक लिख सकते हैं, हर आदमी को आजादी चाहिए, चाहे वह आम आदमी हो या एक सेलीब्रिटी। कस्‍बा के रहवासी रवीश नरेंद्र मोदी से कोसों मील की दूरी रखते हैं, अगर उनके अगेंस्‍ट कोई न्‍यूज या स्‍टोरी मिल जाए तो उनकी कलम लिखते हुए आग उगलती है, वह केवल रिपोर्टर या एंकर ही नहीं, एक कवि भी हैं, जी हां, उनके ब्‍लॉग पर उनके भीतर का दर्द उनकी कविताओं से ही उजागर होता है। उनकी कविताएं बताती हैं कि वह मीडिया की आज की स्‍थिति से थोड़ा सा खफा हैं।

वो राजनीतिक मुददों पर भले प्रसून जी के मुकाबले में न खड़े होते हों, लेकिन सामाजिक मुददों को उनसे बेहतर कोई नहीं हैंडल कर सकता, उनके भीतर एक आम आदमी बसता है, जो सामाजिक मुददों को बेहतरीन तरीकों से जाना है और उठता है। वैसे उनको मजा लेने की बड़ी आदत है, यह आदत आप उनके प्राइम टाइम शो के दौरान कभी भी देख सकते हैं। आजकल उनको ब्‍लॉग से ज्‍यादा माइक्रो पोस्‍ट में मजा आता है, जो फेसबुक पर देखी जा सकती है, यह व्‍यस्‍त समय में अपनी बात कहने का आसान व सुखद तरीका है। वह कभी कभी फोटो से भी काम चला लेते हैं। चलते चलते इतना ही कहूंगा उनके चाहने वालों की लम्‍बी कतार हैं।

चलते चलते। दिग्‍गी सिंह, सोनिया जी आप नाराज क्‍यूं हो रही हैं, हमने तो राहुल के कहने पर सब बयान दिए थे, सोनिया, दिग्‍गी जी आपकी उम्र हो चली है, राहुल तो अभी बच्‍चा है, आपको तो कुछ सोचना चाहिए था।

आपका
कुलवंत हैप्‍पी  

टिप बॉक्‍स का कमाल


खाना खाने के बाद टिप देना स्‍टेटस बन चुका है, अगर आप ने खाना खाने के बाद टिप न दी तो शायद आपको महसूस होगा कि आज मैंने बड़े होटल में खाना नहीं खाया, वैसे टिप देना बुरी बात नहीं, इससे सर्विस देने वाले का मनोबल बढ़ता है। मगर आज तक आपने टिप केवल उस व्‍यक्‍ित को दी, जो आपके पास अंत में बिल लेकर आता है, शायद बिल देने वाला वह व्‍यक्‍ित नहीं होता, जो आपको खाने के दौरान सर्विस दे रहा होता है।

पिछले दिनों मैं जेबीएम कंपनी के मुख्‍यालय अपने काम से गया हुआ था, वहां पर शाम को एमडी अशोक मंगुकिया जी बोले, आज आपको एक बेहतरीन जगह पर खाना खिलाने के लिए लेकर जाता हूं, वहां की सर्विस व खाना दोनों की बेहतरीन हैं। उनकी बात से मुझे इंदौर सरवटे बस स्‍टेंड स्‍िथत गुरुकृपा होटल की याद आ गई, जिसकी सर्विस और खाना असल में तारीफ लायक है। सूरत के आरटीओ कार्यालय के निकट स्‍िथत सासुमा गुजराती रेस्‍टोरेंट में पहुंचते ही एमडी ने वेटर को खाना लाने के लिए इशारा किया, वह खाना लेने चला गया, लेकिन मैं खाने का स्‍वाद नहीं ले सकता था, क्‍योंकि मेरा उस दिन उपवास था, ऐसे में मैं इधर उधर, नजर दौड़ा रहा था, इतने में मेरी निगाह रेस्‍टोरेंट में मुख्‍य काउंटर पर पड़े टिप बॉक्‍स पर गई, और मैंने तत्‍काल कहा, एमडी जी, यहां फर्स्‍ट सर्विस का मुख्‍य कारण वह टिप बॉक्‍स है, जो सबको बराबर पैसे बांटता है, जिसके कारण, कर्मचारियों का मनोबल बना रहता है, और उनकी काम के प्रति रुचि कम नहीं होती।

मेरे खयाल से ऐसे टिप बॉक्‍स बड़े बड़े होटलों में होने चाहिए, क्‍योंकि टिप देने वाले तो टिप देते ही हैं, फिर क्‍यूं न उनके द्वारा दी गई राशि वहां काम करने वाले प्रत्‍येक व्‍यक्‍ित को मिले, चाहे वह रसोई में खाना परोसने वाला हो, चाहे वह टेबल पर खाना लाने वाला हो। मुझे टिप बॉक्‍स वाला विचार अच्‍छा लगा, लेकिन आप इसके बारे में क्‍या कहते हैं, जरूर लिखिए।

आखिर छवि किसी की धूमिल हो रही है

आखिर छवि किसी की धूमिल हो रही है समझ से परे है, भारत सरकार की, इंडियन एक्‍सप्रेस की या सेनाध्‍यक्ष वीके सिंह की। कल रात प्राइम टाइम में इंडियन एक्‍सप्रेस के चीफ इन एडिटर शेखर गुप्‍ता ने एक बात जोरदार कही, जो शायद सभी मीडिया वालों के लिए गौर करने लायक है। श्री गुप्‍ता ने कहा कि इंडियन एक्‍सप्रेस ने जो प्रकाशित किया, अगर वह गलत है तो मीडिया को सामने लाकर रखना चाहिए, अगर इंडियन एक्‍सप्रेस में प्रकाशित बात सही है तो मीडिया वालों को उसका फलोअप करना चाहिए। इससे एक बात तो तय होती है कि इंडियन एक्‍सप्रेस को अपने पत्रकारों पर पूर्ण विश्‍वास है, जो होना भी चाहिए। फिर अभी अभी फेसबुक पर कुमार आलोक का स्‍टेटस अपडेट पढ़ा, जिसमें लिखा था, खबर है कि यूपीए में सरकार के एक बडे मंत्री के इशारे पर जनरल वीके सिंह की छवि धूमिल करने के लिए कल एक्सप्रेस में खबर छपरवाई गयी। मंत्री के रिश्तेदार बडे बडे आर्मस डीलर हैं। कुमार आलोक दूरदर्शन न्‍यूज में सीनियर पत्रकार हैं, ऐसे में उनकी बात को भी नकारा नहीं जा सकता। मगर सवाल यह उठता है कि इस पूरे घटनाक्रम में आखिर किसी की छवि धूमिल हो रही है, उस समाचार पत्र की जो अपनी विश्‍वसनीयत के लिए के जाना जाता है, या सेनाध्‍यक्ष की छवि, जिस पर देश की सरकार भी शक करने से इंकार कर रही है। इस घटनाक्रम में आखिर छवि खराब हुई है तो वह हिन्‍दुस्‍तान की, क्‍योंकि इंटरनेट ने पूरे विश्‍व को एक करके रख दिया, छोटी सी घटना भी एक पल में सरहदें पार कर जाती है। दूसरे देशों में भी विशेषज्ञ हिन्‍दुस्‍तान की स्‍थिति को लेकर कयास लगा रहे होंगे। जिस तरह देश के अंदर निरंतर उथल पुथल चल रही है, उसको लेकर उक्‍त खबर को झूठलाया नहीं जा सकता, और पूर्ण रूप से सच करार भी नहीं दिया जा सकता। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश के प्रधानमंत्री एक कठपुतली से ज्‍यादा कुछ नहीं, कहूं तो सरकारी नल जैसे हैं, पानी आया तो भी ठीक, नहीं आया तो भी ठीक। सरकार की गलत कारगुजारियों के चलते देश उबल रहा है, ऐसे में कुछ भी हो जाना संभव है। देश में तख्‍तपलट भी कोई बड़ी बात नहीं। लोग तंग आ चुके हैं, अगर सेना नहीं करेगी तो बहुत जल्‍द लोग कर देंगे।

अपराधग्रस्‍त जीवन या सम्‍मानजनक जीवन


जिन्‍दगी में ज्‍यादा लोग अपराधबोध के कारण आगे नहीं बढ़ पाते, जाने आने में उनसे कोई गलती हो जाती है, और ताउम्र उसका पल्‍लू न छोड़ते हुए खुद को कोसते रहते हैं, जो उनके अतीत को ही नहीं वर्तमान व भविष्‍य को भी बिगाड़कर रख देता है, क्‍योंकि जो वर्तमान है, वह अगले पल में अतीत में विलीन हो जाएगा, और भविष्‍य जो एक पल आगे था, वह वर्तमान में विलीन हो जाएगा। जिन्‍दगी को खूबसूरत बनाने के लिए चाणक्‍य कहते हैं, 'तुमसे कोई गलत कार्य हो गया, उसकी चिंता छोड़ो, सीख लेकर वर्तमान को सही तरीके से जिओ, और भविष्‍य संवारो।'

ऐसा करने से केवल वर्तमान ही नहीं, आपका भविष्‍य और अतीत दोनों संवरते चले जाएंगे। किसी ने कहा है कि गलतियों के बारे में सोच सोचकर खुद को खत्‍म कर लेना बहुत बड़ी भूल है, और गलतियों से सीखकर भविष्‍य को संवार लेना, बहुत बड़ी समझदारी। मगर हम जिस समाज में पले बढ़े हैं, वहां पर किताबी पढ़ाई हम को जीवन जीने के तरीके सिखाने में बेहद निकम्‍मी पड़ जाती है, हम किताबें सिर्फ इसलिए पढ़ते हैं, ताकि अच्‍छे अंकों से पास हो जाएं एवं एक अच्‍छी नौकरी कर सकें। मैं पूछता हूं क्‍या मानव जीवन केवल आपको नौकरी कर पैसे कमाने के लिए मिला है, नहीं बिल्‍कुल नहीं, जीवन आपको जीने के लिए मिला है, और सबसे अच्‍छा जीवन वह है जो किसी की सेवा में लग जाए। आप नौकरी करते हैं, बहुत जल्‍द उब जाते हैं, फिर कुछ नया करने की ओर दौड़ते हैं, कभी सोच क्‍यूं, क्‍यूंकि आपके पास नौकरी करने के पीछे कोई मकसद नहीं, पैसा आदमी तब तक कमाता है, जब तक उसको यह आभास नहीं हो जाता कि पैसे से भी ज्‍यादा कुछ और जरूरी है, पर वह इस बात को समझ नहीं पाता।

अगर आप डॉक्‍टर हैं, अगर आप इंजीनियर हैं, तो आपको एक मकसद ढूंढना होगा कि इस पेशे से हम समाज को क्‍या दे सकते हैं, हो सकता है कि आप ने कभी पैसा कमाने के चक्‍कर में कुछ गलत कर दिया हो, मगर जीवन लम्‍बा है, इसलिए उस अपराधबोध को भूलकर आज से एक नई शुरूआत करें, यकीन करें, जिन्‍दगी आज से ही खूबसूरत हो जाएगी। मैं कुछ ऐसे लोगों को भी जानता हूं, जो प्‍यार में चोट खाने के बाद खुद को कोसते हुए जिन्‍दगी से मूंह मोड़ लेते हैं, क्‍यूंकि उनको आभास होने लगता है कि उन्‍होंने जिन्‍दगी में बहुत बड़ा अपराध कर दिया, जबकि यह सिर्फ एक मानसिक स्‍थिति है, जिसको बदलने से जीवन बदल सकता है।

आप अपराधबोध के साथ मरना पसंद करेंगे या उस भूल को भूलकर एक मकसदपूर्ण जीवन जीते जीते अंतिम सांस छोड़ना पसंद करेंगे, फैसला आपके हाथ में है।

आज चौथी तारीख है, कुछ जल्‍द हो जाए


सर जी, आज चौथी तारीख है, कुछ जल्‍द हो जाए। क्‍यूं जी? क्‍या आज पत्‍नि को डिनर पर लेकर जाना है? नहीं तो, क्‍या बच्‍चों को इम्‍िहतानों की तैयारी करवानी है? नहीं तो, क्‍या आज मां या बाप को डॉक्‍टर के यहां चेकअप के लिए लेकर जाना है? नहीं जी, तो आखिर फिर आज ऐसा क्‍या करना है, जिसके लिए जल्‍दी छूटी चाहिए, जी आज आइपीएल शुरू होने वाला है, बहुत अच्‍छा, आइपीएल देखने के लिए जल्‍दी जाना है, खूब मियां, आज से देश व्‍यस्‍त हो जाएगा, और भूल जाएगा, काले धन के मुद़दे को, भूल जाएगा सेनाध्‍यक्ष की चिट़ठी से हुए खुलासे को, भूल जाएगा देश में बढ़ती कीमतों को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को। चलो ठीक है, जल्‍दी चले जाओ।

इस ट्रैफिक को भी आज ही रास्‍ता रोकना था, इतने में साथ खड़ा व्‍यक्‍ित कहता है, यार यह तो रोज की समस्‍या है, शायद आज तुम ही पहले आ गए, यहां तो ट्रैफिक की यही स्‍थिति है, वैसे घर जाने से पहले ही आइपीएल शुरू हो जाएगा, क्‍या तुम भी आइपीएल देखोगे, क्‍या मजाक करते हो, हिन्‍दुस्‍तान में रहते हो, और क्रिकेट नहीं देखते तो क्‍या जीना है, यही तो एक काम है, जो सब चीजों को भुला देता है पत्‍िन के पीठ दर्द को, उसकी डांट को, पड़ोसी के साथ हुई नोक झोंक को, बॉस की गालियों को, चलो आगे बढ़ो, हरी बत्‍ती हो गई।

घंटी बजी, दरवाजा खुला, क्‍या बात है, आज तो जल्‍दी आ गए, मैं फोन ही करने वाली थी कि तुम आते हुए बाजार से सब्‍जी ले आना, क्‍योंकि घर में मम्‍मी और छोटी बहन आने वाली है। क्‍या? तुम इतने शॉकर्ड क्‍यूं हो गए? मैंने ऐसा क्‍या कह दिया। ठीक है ठीक है, सब्‍जी गली में देने आता है, उससे ही ले लो न, वो महंगी देता है, एक दिन महंगी सब्‍जी ले लोगी तो कोई फर्क नहीं पड़ जाएगा, और मैं कुछ समय में लिए रोहन के घर जा रहा हूं, ठीक है।

रोहन तुम कहां चले? मैं तो तुम्‍हारे घर आ रहा था। क्‍यूं? आज मेरे घर रिश्‍तेदार आने वाले हैं, और पूरा आइपीएल का मजा खराब हो जाएगा। यार तेरी भी वही समस्‍या है, जो मेरी, मेरे घर भी रिश्‍तेदार आने वाले हैं। हे भगवान इन रिश्‍तेदारों को भी आज ही आना था।

यह आइपीएल का नशा ही कुछ ऐसा प्‍यारे।

अगर जंग जीतनी है तो.....बन जाओ सुनहरे मोतियों की माला।

छोटी छोटी चीजें जीवन की दिशा बदल सकती हैं, लेकिन उन छोटी छोटी चीजों पर अमल होना चाहिए, इस रविवार मैं अपने ससुराल में था, यहां घर के मुख्‍य द्वार पर कुछ इंग्‍लिश्‍ा की पंक्‍ितयां लिखी हुई हैं, जिनका मतलब शायद मेरे हिसाब से यह निकलता है, अगर हम एक साथ आ जाते हैं, तो यह शुरूआत है, अगर हम एक साथ बने रहते हैं तो यह उन्‍नति है, अगर हम एक साथ मिलकर कार्य करते हैं तो सफलता निश्‍िचत है।

इस पंक्‍ित को पढ़ने के बाद लगा, क्‍या यह पंक्‍ित हमारे आज के उन नेताओं ने नहीं पढ़ी, जो काले धन को लेकर, लोकपाल बिल को दिल्‍ली में अनशन कर रहे हैं, अगर पढ़ी होती तो शायद बाबा रामदेव, अन्‍ना हजारे अलग अलग टीम बनाकर एक ही मिशन के लिए न लड़ते, बात चाहे लोकपाल बिल की हो या कालेधन को बाहर से लाने की, बात तो सरकार से जुड़ी हुई है। बचपन में एक कहानी कई दफा लिखी, क्‍योंकि उसको लिखने पर मुझे अंक मिलते थे, वो कहानी इम्‍ितहानों में से पास करवाने में अहम रोल अदा करती थी। एकता से जुड़ी वह कहानी, जिसमें एक किसान के चार पुत्र होते हैं, और किसान उनको पहले एक लकड़ी तोड़ने के लिए देता है और वह तोड़ देते हैं, फिर वह उनको लकड़ियों का बंडल तोड़ने के लिए कहता है, वह नहीं तोड़ पाते, तो किसान कहता है, एकता में शक्‍ित है, अगर आप एक हो तो आपको कोई नहीं तोड़ सकता।

मुझे लगता है यह कहानी मैंने ही नहीं, बल्‍कि हिन्‍दुस्‍तान के ज्‍यादातर लोगों ने पढ़ी होगी, पेपरों में अंक लेने के लिए लिखी भी होगी, हो सकता है उनकी कहानी में किसान न हो, लकड़ी के बंडल न हो, मगर बात तो एकता की ही होगी। हम जब भी लड़े अलग अलग होकर आखिर क्‍यों, आजादी के समय की बात हो या आज हो रहे विरोध अभियानों की, हम सब एक मंच पर क्‍यूं नहीं आ सकते, क्‍या हम को पदों की होड़ है, क्‍या हम दुनिया में अलग पहचान बनाने के लिए यह सब करते हैं, जो सच्‍चे लीडर होते हैं, जो सच्‍चे लड़ाकू होते हैं, वह स्‍वयं के लिए नहीं बल्‍कि कौम के लिए, समाज के लिए आगे चलते हैं या कहूं लड़ते हैं।

अगर जंग जीतनी है तो मोतियों की तरह एक ही धागे में घुसते चले जाओ, और बन जाओ सुनहरे मोतियों की माला।