विनीत कुमार की मंडी में मीडिया

यह पुस्तक उन पाठकों को निराश कर सकती है जो मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानते आये हैं/ देश की सबसे बड़ी कंपनी के सबसे बड़े मीडिया शंहशाह बनने के दौर में यह बताने की जरूरत नहीं कि मीडिया की रगों में अब किसका खून दौड़ता है ?

पुस्तक के संदर्भ में...
लोकतंत्र के इस नए बसंत में अन्ना, आमजन, अंबानी और अर्णब की आवाजें एक-दूसरे से गड्डमड्ड हो गई लगती हैं/ 'मीडिया बिकाऊ है' के चौतरफा शोर के बीच और जस्टिस काटजू की खुलेआम आलोचना के बाद आत्म-नियंत्रण और नैतिकता की चादर छोटी पड़ने लगी है/ ये नज़ारा कितना नया है, ये समझने के लिए दूरदर्शन व आकाशवाणी के सरकारी गिरेबान में झाँक लेना भी जरुरी लगता है/ चित्रहार के गाने और फीचर फ़िल्में बैकडोर की लेन-देन से तय होती रहीं/ स्क्रीन की पहचान भले ही 'रूकावट के लिए खेद है' से रही हो पर ऑफिस की मशहूर लाइन तो यही थी- आपका काम हो जायेगा बशर्ते..../ सड़क पर रैलियों की भीड़ घटाने के लिए फ़िल्म 'बाबी' का ऐन वक्त पर चलाया जाना दूरदर्शन का खुला सच रहा है/ इन सबके बाबजूद पब्लिक ब्राडकास्टिंग आलोचना के दायरे में नहीं है तो इसके पीछे क्या करण हैं, यह किताब इस पर विस्तार से चर्चा करती है/ इतिहास के छोटे-से सफर के बाद बाकी किताब वर्तमान की गहमा-गहमी और उठा-पटक पर केन्द्रित है/ निजी मीडिया ने इस पब्लिक ब्राडकास्टिंग की बुनियाद को कैसे एक लान्च-पैड की तरह इस्तेमाल किया और खुद एक ब्रांड बन जाने के बाद इसकी जड़ें काटनी शुरू कर दीं, यह सब जानना अपने आप में दिलचस्प है/ "हमें सरकार से कोई लेना-देना नहीं" जैसे दावे के साथ अपनी यात्रा शुरू करनेवाला निजी मीडिया आगे चलकर कॉर्पोरेट घरानों की गोद में यूँ गिरा कि नीरा राडिया जैसी लॉबीइस्ट की लताड़ ही उसका बिज़नेस पैटर्न बन गया/ सवाल है कि किसी ज़माने में पत्रकारिता को मिशन मानने वाला पत्रकार आज कहाँ खड़ा है - मूल्यों के साथ या बैलेंस-शीट के पीछे ? जब मीडिया के बड़े-बड़े जुर्म एथिक्स के पर्दे से ढँक दिए जाते हों तब यह सवाल उठना लाजिमी भी है कि राडिया-मीडिया प्रकरण और उसकी परिणति के बाद लौटे 'सामान्य दिन' क्या वाकई सामान्य हैं, या हम मीडिया, सत्ता, और कॉर्पोरेट पूँजी की गाढ़ी जुगलबंदी के दौर में अनिवार्य तौर पर प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ केबल ऑपरेटर उतना ही बड़ा खलनायक है, जितना हम प्रायोजकों को मानते आये हैं/

लेखक के संदर्भ में ...
हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय से एफ एम चैनलों की भाषा पर एम. फिल.(2005) / मीडिया और हिन्दी पब्लिक स्फीयर के बदलते मिजाज़ पर पिछले पाँच वर्षों से लगातार टिप्पणी / वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय से मनोरंजन प्रधान चैनलों की भाषा एवं सांस्कृतिक निर्मितियां पर रिसर्च /

मंडी में मीडिया
लेखक विनीत कुमार
पब्‍लिशर वाणी प्रकाशन
कीमत 595 (HB) ISBN : 978-93-5072-216-9
कीमत 275 (PB) ISBN : 978-93-5072-234-3
कुल पृष्‍ठ 386

जी हां, सठिया गए केजरीवाल

@अरविंद केजरीवाल ने संसद को लिखे जवाबी पत्र में कहा, मैं संसद की इज्‍जत करता हूं, लेकिन दागी सांसदों की नहीं, उनका यह जवाब सुनने के बाद बिहार को कई साल पिछले धकेल देने वाले लालू प्रसाद यादव कहते हैं, केजरीवाल सठिया गए हैं। मुझे नहीं लगता कि लालू मियां कुछ गलत कह रहे हैं, क्‍योंकि जब तक कोई हिन्‍दुस्‍तानी सठिएगा नहीं तो परिवर्तन आएगा नहीं, जब सिंहम में बाजीरॉव सिंहम सठियाता है तो जयकंद शिकरे के पसीने छूटते हैं। वहीं फिल्‍म ए वेडनेसडे में जब आदमी की सटकती है तो पुलिस कमिश्‍नर से लेकर पुलिस मंत्रालय तक पसीने से तर ब तर होता है। पता नहीं, पिछले दिनों किसकी सटकी कि पूरे देश के मंत्रियों को बौखलाहट के दौरे पड़ने शुरू हो गए, अभी तक पसीने छूट रहे हैं, अंदर खाते एक दूसरे को बचाने के लिए सुरक्षा कवच तैयार किए जा रहे हैं। कितनी हैरानी की बात है कि उंगली सरकार पर उठी, लेकिन सेनाध्‍यक्ष के खिलाफ आवाजें बाहर से बुलंद हुई, क्‍यों कि नेताओं को पता है कि अगर आग पड़ोस में लगती है तो आंच उनके घर तक भी आएगी।

@लालू प्रसाद यादव, अभी तक तो कुठ पढ़े लिखे व्‍यक्‍ितयों की सटकी है, और नेताओं के पसीने छूटने शुरू हो गए, लेकिन जब हर हिन्‍दुस्‍तानी की सटकेगी तो नेताओं का हश्र क्‍या होगा अंदाजा लगाना जरा मुश्‍किल सा लग रहा है। वो दूर नहीं, जब हर हिन्‍दुस्‍तानी की सटकेगी, क्‍योंकि घरों में बैठकर टीवी देखने वाले दिल से निकली आवाजों को सुनते हैं, जुबां से नहीं, क्‍योंकि जुबां को पलटते हुए देर नहीं लगती। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं, मिस्र की क्रांति की, जो गत साल वहां घटित हुई। वहां पर भी 26 वर्षीय 'आसमा महफूज़' की सटकी थी, और उसने फेसबुक पर आकर इतना कहा था, मेरा मरना तय है, तो क्‍यूं न अपने देश के लिए मर जाउं, उसके बाद जो मिस्र के लोगों की सटकी, उसका पता तो पूरे विश्‍व को है, यहां तो अन्‍ना हजारे से लेकर केजरीवाल तक कई सिरफिरे घूम रहे हैं, सच कहूं तो इस गुलशन में फूल कम कांटें ज्‍यादा हैं, लालू प्रसाद यादव जी थोड़ा पल्‍लू संभालकर चलें।

चलते चलते एक और बात कहना चाहता हूं, जैसे कि आपने सेनाध्‍यक्ष वीके सिंह के बारे में आपने कहा था कि वह फर्स्‍टेड है, और उसके बाद प्राइम टाइम एडटीवी इंडिया में पहुंचे एक व्‍यक्‍ित ने कहा था कि वीके सिंह, चटटान पर तब तक सिर पटकेंगे, जब तलक वह चकना चूर न हो जाए, इस बात पर गौर फरमाने लायक है। जिसने यह शब्‍द कहें, वह वीके सिंह नहीं था, लेकिन उसके शब्‍द बताते थे कि वह वीके सिंह से बेहद प्रभावित है, तो हो सकता है कि कल को आपको हर चौराहे पर केजरीवाल, वीके सिंह या उनके हमशकल मिले, जरा बचकर मोड़ से।

क्‍या मैं अपने प्रति ईमानदार हूं?


'जॉन सी मैक्‍सवेल' की किताब 'डेवल्‍पिंग द लीडर विदिन यू' के हिन्‍दी संस्‍करण 'अपने भीतर छुपे लीडर को कैसे जगाएं' में प्रकाशित एडगर गेस्‍ट की कविता 'क्‍या मैं अपने प्रति ईमानदार हूं?' बहुत कुछ कहती है, मेरे हिसाब से अगर इस कविता का अनुसरण किया जाए तो जीवन स्‍वर्ग से कम तो नहीं होगा, और अंतिम समय जीवन छोड़ते वक्‍त किसी बात का अफसोस भी नहीं होगा, जबकि ज्‍यादातर लोग अंतिम सांस अफसोस के साथ लेते हुए दुनिया को अलविदा कहते हैं।

क्‍या मैं अपने प्रति ईमानदार हूं ?

मुझे अपने साथ रहना है, और इसलिए
मैं इस लायक बनना चाहता हूं कि खुद को जानूं
गुजरते वक्‍त के साथ मैं चाहता हूं
हमेशा अपनी आंखों में आंखें डालकर देखना
मैं नहीं चाहता डूबते सूरज के साथ खड़े रहना
और अपने किए कामों के लिए खुद से नफरत करना
मैं अपनी अलमारी में रखना नहीं चाहता
अपने बारे में बहुत से रहस्‍य
और आते जाते यह सोचने की मूर्खता नहीं करना चाहता
कि मैं सचमुच किस तरह का आदमी हूं
मैं छल की पोशाक नहीं पहनना चाहता
मैं सिर उठाकर बाहर जाना चाहता हूं
परंतु दौलत और शोहरत के इस संघर्ष में
मैं चाहता हूं कि खुद को पसंद करूं
मैं खुद की तरफ देखकर यह नहीं सोचना चाहता
कि मैं शोखीबाज हूं, झूठा हूं और खोखला नाटक कर रहा हूं
मैं खुद की निगाह से कभी नहीं छुप सकता
मैं वह देखता हूं जो दूसरे कभी नहीं देख सकते
मैं वह जानता हूं जो दूसरे कभी नहीं जान सकते
मैं कभी अपने आपको मूर्ख नहीं बना सकता, और इसलिए
चाहे जो हो, मैं बनना चाहता हूं
आत्‍मसम्‍मान से पूर्ण और मुक्‍त अंतरात्‍मा वाला।

और चलते चलते इतना ही कहूंगा कि
जब धन नष्‍ट होता है तो कुछ नष्‍ट नहीं होता, जब स्‍वास्‍थ्‍य नष्‍ट होता है तो थोड़ा सा नष्‍ट होता है, जब चरित्र नष्‍ट होता है तो सब कुछ नष्‍ट हो जाता है।

वो बोझ नहीं ढोते, जेब का बोझ हलका करते हैं

जी हां, वो बोझ नहीं ढोते, जेब का बोझ हलका करते हैं। आप सोच रहे होंगे मैं किन की बात कर रहा है, तो सुनिए भारतीय रेलवे स्‍टेशन पर लाल कोट में कुछ लोग घूमते हैं, जो यात्रियों के सामान को इधर से उधर पहुंचाने का काम करते हैं, जिनको हम कुली कहकर पुकारते हैं, मगर सुरत के रेलवे स्‍टेशन पर लाल कोट पहनकर घूमने वाले कुली लोगों का बोझ ढोने की बजाय उनकी जेबों को हलका करने में ज्‍यादा दिलचस्‍पी लेते हैं।

हम को सूरत से इटारसी तक जाने के लिए तपती गंगा पकड़नी थी, जिसके लिए हम रेलगाड़ी आने से कुछ समय पहले रेलवे स्‍टेशन पहुंचे, जैसे ही हम प्‍लेटफार्म तक जाने सीढ़ियों के रास्‍ते ऊपर पहुंचे, वैसे ही लाल कोट वाले भाई साहेब हमारे पास आए और बोले चलत टिकट है, पहले तो समझ नहीं आया, लेकिन उसने जब दूसरी बार बात दोहराई तो हम बोले नहीं भाई रिजर्वेशन है, लेकिन वेटिंग, क्‍या बात है साहेब बनारस तक कंफर्म करवा देते हैं, इतने में मेरे साथ खड़े ईश्‍वर सिंह ने कहा, नहीं भई जब जाना तो इटारसी तक है, बनारस का टिकट क्‍या करेंगे, हम उसको वहीं छोड़ आगे बढ़ गए, इतने में हमारी निगाह वहां लगी लम्‍बी लाइन पर पड़ी, जहां पर कुछ यात्री लाइन में लगे हुए थे, जो जनरल डिब्‍बे बैठने के लिए कतार में खड़े थे, हैरानी की हद तो तब हुई जब जनरल डिब्‍बे में बैठने के लिए भी आपको दो से पांच सौ रुपए उन लाल कमीज वाले लुटेरों को देने पड़ रहे थे।

इतने में हमारी निगाह पैसे ले रहे व्‍यक्‍ित पर पड़ी तो हम ने उसको पास बुलाने की कोशिश की तो वह गुन गुन करते हुए वहां से भाग निकला, इतने में वहां कुछ और कुली आ गए, जैसे प्‍लेटफार्म उनके बाप का हो, हम से कहने लगे आपकी टिकट किसी कोच की है, हमने उनसे पूछा आपको लोगों की जेब काटने का अधिकार किस ने दिया, जब उनको पता चला कि यह व्‍यक्‍ित मीडिया से जुडे़ हुए हैं तो चाय पानी का ऑफर करने लगे।

इतने मैं मेरे मुंह से निकल गया, अगर चाय पानी के भूखे होते तो दोस्‍त आज भी किसी छोटे बड़े अखबार में काम कर चाय पानी बना रहे होते, लेकिन वो बनाना नहीं आता इस लिए मीडिया को हम रास नहीं आते।

उनका यह कार्य एक दिन का नहीं, बल्‍कि प्रति दिन का है, लेकिन सूरत का मीडिया आखिर कहां सो रहा है समझ से परे है, कहीं चाय पानी पर तो नहीं टिक गया।

सावधान! देश उबल रहा है

मेरे घर गुजराती समाचार पत्र आता है, जिसके पहले पन्‍ने पर समाचार था कि देश की सुरक्षा को खतरा, इस समाचार को पढ़ने के बाद पहले पहल तो लगा कि देश का मीडिया देश हित की सोचता है या चीन जैसे दुश्‍मन की, जो ऐसी जानकारियां खुफिया तरीकों से जुटाने के लिए लाखों रुपए खर्च करता है। फिर एकांक विज्ञापन की एक पंक्‍ित 'देश उबल रहा है' याद आ गई, जो कई दिनों से मेरे दिमाग में बार बार बज रही है। जो कई दशकों से नहीं हुआ, और अब हो रहा है यह उबलते हुए देश की निशानी नहीं तो क्‍या है?

इस समाचार को पढ़ने के बाद मैं काम को निकल गया, हुआ वही जो मेरे दिमाग में समाचार पढ़ने के बाद आया, कि अब राजनेता सेनाध्‍यक्ष की कुर्सी को निशाना बनाएंगे, सभी नेताओं ने प्रतिक्रिया देना शुरू कर दी, जो मुंह में आया बोल दिया, जानकारियां लीक करने वाले मीडिया के लिए जश्‍न का दिन बन गया, क्‍योंकि पूरा दिन पंचायत बिठाने का अवसर जो मिल गया था।

मीडिया ने एक की सवाल पूछा क्‍या सेनाध्‍यक्ष को बर्खास्‍त किया जाना चाहिए, किसी ने यह नहीं कहा कि जो सेनाध्‍यक्ष ने पत्र में लिखा, उस पर जांच बिठाई जानी चाहिए, आखिर कहां कमियां रह गई के देश का सुरक्षा तंत्र इतना खोखला हो गया। कितनी हैरानी की बात है कि सवा सौ करोड़ की आबादी खतरे में है, और जानकारी लीक करने पर अटकी हुई है, एक पूर्व सेना अधिकारी टीवी पर आकर कहते हैं कि यह आज की बात नहीं, पिछले चालीस सालों से यही स्‍िथति है, लेकिन किसी ने एक बार भी गम्‍भीरता से नहीं लिया, आखिर क्‍यों?

सवाल यह नहीं कि चिटठी को किसी ने लीक किया, सवाल यह है कि करोड़ों रुपए के बजट को आखिर सरकार कहां लगा रही है, जो जनता हर साल सरकार को टेक्‍स के रूप में अदा करती है। जो मुम्‍बई में हुआ, उसके लिए कसाब नहीं, हमारा घटिया सुरक्षा मंत्रालय और सरकार जिम्‍मेदार है। सरकार को मिस्र से नसीहत लेनी चाहिए क्‍यों कि देश उबल रहा है, अब वो दिन दूर नहीं, जब ताज उछाले जाएंगे।

इतना ही नहीं, घटिया वाहन खरीदने के लिए सेना प्रमुख को घूस देने का प्रयास किया जाता है और बात रक्षा मंत्री तक पहुंचती है, मगर कारवाई के नाम पर चुप्‍पी साध ली जाती है, देश के सुरक्षा मंत्री की रक्षा को लेकर इस तरह की उदासीनता अच्‍छी नहीं, इस बात पर तो देश के किसी मंत्री व नेता एंटनी से अस्‍तीफे की मांग नहीं की, क्‍यूं चोर चोर मसेरे भाई जो ठहरे।

चलते चलते इतना ही कहूंगा कि नेताओं सावधान हो जाओ, क्‍योंकि देश उबल रहा है।

बिहार से लौटकर; बदल रहा है बिहार

जब बिहार अपने 100 वर्ष पूरे कर रहा था, उन्‍हीं दिनों हमारा कंपनी के काम को लेकर बिहार जाना हुआ है, बिहार को लेकर कई प्रकार की धारणाएं समाज फैली हुई हैं, जैसे कि यह लोग मजदूरी के लायक हैं, यह लोग बेहद गरीब हैं, बिहार में गुंडागर्दी एवं लूटमार बहुत होती हैं, यह लोग विनम्र नहीं, पता नहीं क्‍या क्‍या, मगर जैसे ही असनसोल एक्‍सप्रेस ने बिहार में एंट्री मारी, वैसे ही मेरी निगाह हरे भरे खेतों की तरफ गई, जहां किसान काम कर रहे थे, कुछ लोग भैंसों खाली स्‍थानों पर चरा रहे थे, कुछ कुछ किलोमीटर पर पानी के चश्‍मे थे, जो किसी भी राज्‍य के लिए गर्व की बात होती है, मैं यह सब देखते हुए रेलगाड़ी के साथ आगे बढ़ रहा था, खुशी थी कि कंपनी के काम के कारण ही बिहार की एक झलक देखने को तो मिली, बिहार के उपरोक्‍त दृश्‍य मुझे अनिल पुस्‍दकर के ब्‍लॉग अमीर देश गरीब लोग की याद दिला रहे थे कि इनका राज्‍य कितना अमीर है, यह कोई नहीं जानता, बस अगर कोई जानता है तो इतना के बिहारी दूसरे राज्‍यों में जाकर कार्य करते हैं।

जैसे ही पटना पहुंचा तो सबसे पहले वहां की स्‍िथति को जानने के लिए मैंने वहां बिक रहा अखबार खरीदा, जिसको इंटरनेट पर कई दफा देखा, मगर हकीकत में पहली बार देखा, इसका लेटआउट बेहद प्‍यारा था, और यह अंक वाक्‍य में बेहतरीन था, इसी अंक ने मुझे यह बतलाया कि आज बिहार सौ साल का हो गया एवं इस अंक के अंदर बुजुर्ग एवं युवा के विचारों का सुमेल अंकित किया गया था, जिससे यह पता चल सके कि बिहार ने असल में तरक्‍की की या नहीं, युवा पीढ़ी के विचार देखकर लगा कि बिहार तरक्‍की के राह पर अग्रसर है, और यहां की स्‍िथति दिन प्रति दिन बदल रही है, लोगों में जागरूकता आ रही है।

इतने में मेरे सामने बैठे एक नौजवान ने हम से बात करने में रुचि दिखाई, इसने बिहार के अंदर हो रहे परिवर्तनों से अवगत करवाया, सबसे बेहतरीन बात तो यह थी कि वह युवक अपनी मीडिया की अच्‍छी खासी जॉब छोड़कर अपने राज्‍य लौट चुका था, क्‍योंकि वह नहीं चाहता था कि बिहारियों को भी अब पहले की तरह आंका जाए, यह बात वह अकेला ही नहीं, बल्‍कि बिहार का हर पढ़ा लिखा युवक सोच रहा है, पिछले कुछ सालों से बिहार के निवासियों ने अन्‍य राज्‍यों की तरफ जाने का रुझान कम कर दिया, जो बिहार के अंदर हो रहे विकास की पहली निशानी कही जा सकती है, इतना ही नहीं युवक ने बताया कि बिहारी मजदूर कितने माह बाहर रहते हैं, ज्‍यादा से ज्‍यादा तीन माह, उसके बाद वह अपने राज्‍य को लौटते हैं, खाली हाथ नहीं बल्‍िक एक अच्‍छे धन के साथ, जिसका वह अपनी कृषि में निवेश करते हैं, जो कि एक बेहतरीन निवेश है।

वो युवक तो बगुसराय उतर गया, लेकिन उसकी जगह कुछ और युवक आकर बैठ गए, जो सुखवल जा रहे थे, सुखवल नेपाल के समीप स्‍थित है एवं कहते हैं कि यहां के हर घर में हथियार हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह लोग हिंसक प्रवृति के ही हैं, बल्‍कि यह हथियार, तब निकलते हैं, जब बात इज्‍जत पर आ जाए, वो तो देश के हर कोने में होता है, उस युवक ने बताया कि मुंगेर के अंदर हर प्रकार के हथियार बनते हैं, नई नई तकनीकों के हथियार, जो शायद नक्‍सलियों को भी सप्‍लाई होते होंगे, मगर सहरसा आने से पहले पहले उस युवक के मुंह से यह तो निकल गया कि अब बिहार में बीस फीसदी गुंडे बचे हैं, बाकी सब अंडरग्राउंड या जेलों में बंद हैं। वह युवक आईसीआई बैंक में जॉब के लिए इंटरव्‍यू देकर सुखवल लौट रहा था, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि वहां के लोग भी सुखद एवं भय रहित जीवन जीने के इच्‍छुक हैं।

सहरसा पहुंचने के बाद जब हम उन लोगों से मिले, जिनसे मिलना था, तो मिलकर बिल्‍कुल नहीं लगा कि बिहार के अंतिम स्‍टेशन पर हम पहुंच चुके हैं। उनका मिलनसार व्‍यवहार ही कुछ ऐसा था, अगले दिन सुबह कचहरी में कंपनी के काम से जाना हुआ, जब हम कचहरी पहुंचे तो वहां एक परिंदा तक नहीं था, लेकिन जब बाद दोपहर लौट रहे थे तो पैर रखने की जगह तक नहीं थी।

जब बिहार से सूरत पहुंच तो यह घटनाक्रम हमने जेबीएम परिवार के एमडी अशोक मंगुकिया के साथ शेयर किया, तो उन्‍होंने कहा कि जैसा नेता वैसी प्रजा, आज बिहार की सत्‍ता एक पढ़े लिखे एवं सुलझे हुए इंसान के हाथों में है, तो स्‍वभाविक है कि वहां की जनता में परिवर्तन आएगा।

हैप्‍पी अभिनंदन में स्‍पंदन वाली शिखा जी

नमस्‍कार दोस्‍तो, मैं कुलवंत हैप्‍पी, एक लम्‍बे समय बाद आपके समक्ष हमारे बीच में से ही एक शख्‍िसयत को हैप्‍पी अभिनंदन के जरिए आपसे मिलवाने लाया हूं, वैसे तो यकीनन आप उनकी रचनाओं एवं उनके ब्‍लॉगों के मार्फत उनसे कई बार मिल चुके होंगे, लेकिन हैप्‍पी अभिनंदन में आज उनसे मिलकर देखिए, और बताइए कि इस बार मिलने में और पहले मिलने में क्‍या अंतर लगा, जो शख्‍िसयत आज हैप्‍पी अभिनंदन में मेरे सवालों के जवाब में अपने विचार रखने जा रही है, वह कोई और नहीं बल्‍कि ब्‍लॉग स्पंदन/अंतर मन में उठती हुई भावनाओं की तरंगें पर लिखने वाली शिखा वार्ष्‍णेय जी हैं, जो रहती लंडन में हैं, लेकिन लिखती हिन्‍दी में हैं, और उनकी स्‍मृतियों में बसता है रूस, जहां से उन्‍होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की एवं चैनल में न्‍यूज प्रड़यूसर रह चुकी हैं शिखा जी अब स्‍पंदन पर लिखकर अपने अंदर की पत्रकार आत्मा तृप्त कर रही हैं।

हैप्‍पी के सवाल, शिखा के जवाब

शिखाजी, आपने पत्रकारिता की पढ़ाई की, लेकिन परिवारिक जिम्‍मेदारियों को पहल देते हुए आपने उससे नाता तोड़ लिया, लेकिन फिर अचानक आपको ब्‍लॉग जगत मिल गया, यहां पर आकर आप कैसे अनुभव करती हैं?

देखिये जगह कोई भी हो, हर तरह के अनुभव होते हैं कड़वे भी और अच्छे भी। हर तरह के लोग हर जगह होते हैं। अत: मेरे अनुभव भी मिले जुले ही हैं किंतु मेरा मानना है कि यदि ईमानदारी से अपना काम किया जाए कोई समस्या नहीं होती। मुझे ब्लॉग के रूप में अभिव्यक्ति का एक माध्यम मिला जिसका मैंने ईमानदारी से उपयोग किया है और मुझे अच्छा लगता है।

शिखा जी, व्‍यक्‍ित किसी न किसी से प्रेरित होता हैं, और आपके ब्‍लॉग पर आपके पिताजी के बारे लिखा संस्मरण पढ़ने के बाद लगा कि आप उनसे बेहद प्रभावित हैं, क्‍या कभी जिन्‍दगी में ऐसा हुआ कि आप मुश्‍िकल घड़ी में हैं, और पिता जी की किसी बात ने आपको हौंसला देते हुए मुश्‍िकल से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया हो, अगर हां, हमारे साथ सांझा करें उस पल को।

जी बिलकुल सही समझा आपने। मैं अपने पिता से प्रभावित हूँ या नहीं ये तो पता नहीं।मेरे यह मानना है कि मैं किसी से भी प्रभावित मुश्किल से ही होती हूँ। पर हाँ उनसे गहरा जुड़ाव अवश्य है. और ऐसे कई मौके आए जब मैंने अपने आपको बेहद मजबूर पाया, और उस वक्‍त पिताजी के स्मरण ही मेरी ढाल बने और स्वत: ही मुझमें हालातों से लड़ने की सामर्थ्य आ जाती है. ऐसे कई पलों का मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट में उल्लेख किया है।

शिखा जी, आपने पत्रकारिता में मास्‍टर डिग्री हासिल की एवं कुछ समय तक मीडिया में कार्य भी किया, और यकीनन इस बाबत आपके पास एक अच्‍छा अनुभव भी होगा, तो मैं जानना चाहता हूं कि भारतीय एवं ब्रिटिश मीडिया में आपको सबसे बड़ा अंतर क्‍या लगता है?

सामान्यत: जो अंतर बाकी क्षेत्रों में है वही मीडिया में भी है.यहाँ ब्रिटेन में कानून सबके लिए एक है फिर चाहे वह प्रधान मंत्री हो या एक आम नागरिक. हमारे यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  के नाम पर कुछ भी कहा – लिखा जाता है.या कुछ प्रभुत्व वाले लोग कुछ भी करें उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता. वहीँ ब्रिटेन में आप डेली मिर्रेर के मर्डोक का केस लीजिए इतने प्रभुत्व वाले पत्रकार को माफी मांगनी पड़ी, संसद में उस पर चर्चा हुई और प्रधानमंत्री तक को उसपर जबाब देना पड़ा.


शिखा जी, मैंने आपके प्रोफाइल में देखा है कि आपको हिन्‍दी के अलावा अंग्रेजी एवं रूस भाषा का भी ज्ञान है, अगर आपको रूसी भाषा का ज्ञान है तो यकीनन आप ने रूसी साहित्‍य को पढ़ा भी होगा, मगर मैं आप से यह जानना चाहता हूं कि आपको रूस का कौन लेखक बेहद पसंद है, और वहां साहित्‍य की कुछ खासियत जो उसको अन्‍य साहित्‍यों से अलग करती है ?


किसी भी देश का साहित्य उस भूमि से जुड़ा होता है उससे उस देश की संस्कृति की झलक हमें मिलती है. इसलिए सभी का अपना अलग स्थान है. रूसी लेखकों में मुझे चेखव बहुत पसंद हैं .उनकी छोटी छोटी कहानियों में रूसी शहरों और गांवों के जन जीवन की जीवंत तस्वीरें देखने को मिलती है और उनका विवरण बेहद रोचक होता है .वहीँ तोल्स्तोय का साहित्य उनकी सहज भाषा शैली की वजह से मुझे आकर्षित करता है.

शिखा जी, आपकी किताब स्‍मृतियों में रूस प्रकाशित हुई है, मैं जानना चाहता हूं कि क्‍या आप रूस में रह चुकी हैं, या फिर रूसी साहित्‍य पढ़ने के कारण रूस आपके जेहन में ऐसे बस गए, जैसे कि आप वहीं रहती है, मैं चाहूंगा कि आप रूस की कोई अभूल स्‍मृति हमारे साथ सांझी करें।

जी नहीं मेरी पुस्तक कल्पना पर आधारित नहीं बल्कि मेरे अपने अनुभवों पर है.जो मैंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई के छ: वर्षों के दौरान वहाँ पाए.मैंने मोस्को स्टेट यूनिवर्सिटी से टीवी पत्रकारिता में परास्नातक किया है. स्मृतियाँ बहुत हैं उसके लिए मेरे ब्लॉग या यह पुस्तक पढ़ें।

शिखा जी, आप लंडन में रहती हैं, ऐसे में पाठक एवं ब्‍लॉगर दोस्‍त जानना चाहेंगे कि आपकी किताब स्‍मृतियों में रूस भारत में भी उपलब्‍ध है या नहीं, अगर नहीं तो कब तक होगी, अगर है तो कोई कैसे प्राप्‍त करें?

जी हाँ स्मृतियों में रूस भारत में ही डायमंड पब्लिशर से प्रकाशित हुई है. अत: डायमंड बुक्स की साईट से या उनसे संपर्क करके वी पी पी से आप पुस्तक माँगा सकते हैं. वैसे शायद कुछ दुकानों में भी उपलब्ध हो परन्तु मुझे उसका अभी पता नहीं है।

टाइम में मोदी, मीडिया में खलबली क्‍यूं

टाइम पत्रिका के पहले पन्‍ने पर गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र सिंह मोदी की फोटो एक लाइन बिजनस मीन मोदी, बट केन ही लीड इंडिया के साथ प्रकाशित हुई, जो यह इशारा करती है कि इस बार टाइम ने गुजरात के मुख्‍यमंत्री को लेकर स्‍टोरी प्रकाशित की है, जो किसी भी पत्रिका का कार्य होता है, लेकिन जैसे ही इस पत्रिका ने अपना एशियाई अंक प्रकाशित किया, वैसे ही भारतीय मीडिया इसको लेकर एक स्‍टोरी बनाने बैठ गया, जैसे किसी पत्रिका ने पहली बार किसी व्‍यक्‍ित पर स्‍टोरी की हो, इंडिया टूडे उठाकर देख लो, क्‍या उस के फ्रंट पेज पर किसी व्‍यक्‍ित विशेष की फोटो नहीं होती, या फिर हिन्‍दुस्तान में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाएं पत्रिकाएं नहीं हैं, सच कहूं तो दूर के ढोल सुहाने लगते हैं।

इस पत्रिका के जो जो अंश समाचार बनाकर सामने आए हैं, उनमें कुछ भी नया नहीं था, क्‍योंकि जो लाइन टाइम ने फ्रंट पेज पर लिखी है, वह पूछ रही है कि क्‍या मोदी भारत की अगुवाई कर सकते हैं, यह बात को पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान हर मीडिया बोल रहा था, शायद मसालेदार खबरों को दिखाने वाले मीडिया की याददाश्‍त कमजोर है। अगर नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई लिखे तो बहुत अच्‍छी बात है, लेकिन पक्ष में लिखे तो खबर बनती है, समझ से परे है, मीडिया के पास मोदी पर उंगली उठाने के लिए एक ही इश्‍यू है, वो गोधरा कांड, वो ही मीडिया अमृतसर में हुए हमले को कैसे भूल जाती है, वह मीडिया दिल्‍ली में सिखों के साथ हुए जुल्‍म को कैसे भुला देती है,

अगर मोदी गुजरात के अंदर विकास नहीं कर रहा तो हर बार चुनाव जीत कर सत्‍ता में कैसे पहुंच जाता है, क्‍या गुजरात की जनता गूंगी बहरी है, क्‍या उसको अच्‍छे बुरे की समझ नहीं, अगर मीडिया मोदी के खिलाफ कुछ लिखना चाहता है तो उसके पास इसकी आजादी है, लेकिन अगर कोई अच्‍छा लिखता है, उसको खबर बनाकर मोदी पर उंगली उठाना वह उचित नहीं|

वैसे भी किसी ने कहा है कि बुरे व्‍यक्‍ित के भीतर एक अच्‍छा गुण होता है, तो यह भी स्‍वभाविक है कि एक अच्‍छे आदमी के भीतर एक बुरा गुण भी होगा, ये बात तो आंकलन वाले को देखनी होती है कि कौन सी चीज को उभारकर लोगों के सामने रखना है, जैसे कि आधा पानी का भरा हुआ गिलास, किसी को आधा खाली नजर आता है।

पांच सितारा फिल्‍म, विधा की रहस्‍यमयी कहानी

फिल्‍में तीन चीजों से चलती है, वो तीन चीजें हैं इंटरटेन्‍मेंट इंटरटेन्‍मेंट इंटरटेन्‍मेंट, भले विधा बालन ने इस संवाद को एकता कपूर की छत्र छाया में बनी फिल्‍म द डर्टी पिक्‍चर में कहा हो, लेकिन असल में विधा भी जानती है कि फिल्‍म में तीन चीजों से चलती हैं, बोले तो शॉलिड कहानी, मजबूत निर्देशन एवं जर्बदस्‍त अभिनय, और विधा की कहानी में तीनों चीजें एक से बढ़कर एक हैं। नीरज पांडे की ए वेडनेसडे फिल्‍म की तरह, कहानी का अंतिम पड़ाव दर्शकों को यह बात भुला देता है कि वह कुछ पलों बाद सिनेमा हाल छोड़ने वाले हैं।

निर्देशक संजोय घोष फिल्‍म बनाते समय किसी कदर अपने काम में डूबे होंगे, फिल्‍म की कसावट देखने के बाद कोई भी व्‍यक्‍ित बड़ी आसानी से समझ सकता है। उन्‍होंने निर्देशन में, और विधा एवं अन्‍य अभिनेताओं ने अभिनय ने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।

श्री घोष कहीं भी जल्‍दबाजी करते हुए नजर नहीं आते, बल्‍कि वह धीरे धीरे कदम दर कदम फिल्‍म को आगे बढ़ाते हुए अंत को इतना यादगार बनाते हैं कि दर्शक सिनेमा हाल से बाहर निकालते हुए तारीफ करने से चूक नहीं सकते, उन्‍होंने फिल्‍म को एक रहस्‍यमयी नॉबेल की तरफ ही बनाया, इस फिल्‍म की कहानी जितनी जोरदार है, उतनी जोरदार फिल्‍म की संवाद शैली है, जो दर्शकों को अपने से अलग नहीं होने देती।

अगर आप कहानी फिल्‍म का आनंद लेना चाहते हैं, तो फिल्‍म देखने से पहले फिल्‍म की कहानी मत सुनिए।

अब उंगली का ट्रेंड

कोई गाली बोलता था तो सेंसर बोर्ड बीप मारकर उसको दबा देता था, लेकिन अब जो पश्‍िचम से नया ट्रेंड आया है, उसका तोड़ कहां से लाएगा सेंसर। मूक रहकर हाव भाव व इशारों से गाली देने का ट्रेंड, जहां रॉक स्‍टार में रणवीर कपूर पश्‍िचम की भांति उंगली उठाकर गाली देते हुए नजर आए, वहीं प्‍लेयर्स में रणबीर कपूर के साथ अभिनय पारी शुरू करने वाली सोहम कपूर उसी इशारे का इस्‍तेमाल करते हुए नजर आई।

जो उंगलियां कल तक किसी ओर इशारा करने के, माथे पर तिलक करने के, किसी को दोषी ठहरने के, शू शू करने की अनुमति मांगने के काम आती थी, अब उन्‍हीं में से एक  उंगली  गाली देने के काम भी आने लगी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सिनेमा समय के साथ साथ अपना प्रभाव छोड़ता है, और उंगली दिखाकर गाली देने का प्रचार बहुत जल्‍द हिन्‍दुस्‍तानी युवाओं के सिर चढ़कर बोलने लग सकता है। इतना ही नहीं, बहुत चीजें भाषा में शामिल होने लगी है, जैसे कि डरे हुए को देखकर लड़की हो या लड़का बेबाक ही कह देते हैं, तेरी तो बहुत फटती है, क्‍या यह शब्‍द हमारी भाषा का हिस्‍सा थे, आखिर यह शब्‍द कहां से आ टपके, हमारी बोल चाल में। यह शब्‍द सिनेमा से, सिनेमा कुछ लोग मिलकर रचते हैं, लेकिन वह सिनेमा लाखों लोगों को प्रभावित करता है।

पिछले दिनों रिलीज हुई दिल्‍ली बेली में बेशुमार गालियां थी, उसका एक गीत भी डबल मीनिंग था, इसको लेकर आपकी अदालत में जब आमिर खान से पूछा जा रहा था तो वह मुस्‍कराते हुए कह रहे थे, आज की पीढ़ी इसको पसंद करती है, और लड़कियां फिल्‍म का समर्थन कर रही थी, वह कह रही थी अगर लड़कों को गालियां आती है तो लड़कियों को भी गाली देनी आनी चाहिए।


अंत में सवाल यह खड़ा होता है कि क्‍या फिल्‍म इंडस्‍ट्री युवाओं को सही दिशा देने के लिए काम न कर सिर्फ अपने गोलक भरना चाहती है।