प्‍यार की कोई उम्र नहीं होती 'शिरीं फरहाद'


बड़ी स्‍क्रीन पर अब तक हम युवा दिलों का मिलन देखते आए हैं, मगर पहली बार निर्देशिका बेला सहगल ने शिरीं फरहाद की तो निकली पड़ी के जरिए चालीस के प्‍यार की लव स्‍टोरी को बिग स्‍क्रीन पर उतारा है। इस फिल्‍म को लेकर फिल्‍म समीक्षकों में विरोधाभास नजर आता है, आप खुद नीचे देख सकते हैं, फिल्‍म एक मगर प्रतिक्रियाओं अनेक, और प्रतिक्रियाओं में जमीं आसमान का फर्क।

इस फिल्‍म के बारे में समीक्षा करते हुए मेरी ख़बर डॉट कॉम पर अमित सेन भोपाल से लिखते हैं कि एक अरसे बाद बॉलीवुड में चल रही द्विअर्थी संवाद के दौर में बेहतर कॉमेडी वाली फिल्म आई है, अगर आप अच्छी हल्की-फुल्की हेल्दी कॉमेडी फिल्म देखना चाह रहे हों तो यह फिल्म आपके लिए है।

वहीं दूसरी तरफ समय ताम्रकर इंदौर से हिन्‍दी वेबदुनिया डॉट कॉम फिल्‍म की समीक्षा करते हुए लिखते हैं कि निर्देशक के रूप में बेला सहगल का पहला प्रयास अच्छा है, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट के चलते वे चाहकर भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाईं। कई जगह हंसाने की असफल कोशिश साफ नजर आती है। बोमन ईरानी ने फरहाद के किरदार को विश्वसनीय तरीके से पेश किया है। फराह खान कुछ दृश्यों में असहज लगीं और उन्होंने खुल कर एक्टिंग नहीं की। डेजी ईरानी और शम्मी ने फरहाद की मां और दादी मां के रोल बखूबी निभाए। कुल मिलाकर ‘शिरीन फरहाद की लव स्टोरी’ में रोमांस और हास्य का अभाव है।

हिन्‍दी इन डॉट कॉम पर सौम्यदीप्त बैनर्जी लिखते हैं कि फराह खान अपनी एक्टिंग से निराश करती हैं। भावनात्मक दृश्यों में वे बहुत ही कमजोर रहीं। इतना ही नहीं, जब उन्हें खुश रहने का अभिनय करना था, तब भी उनकी आंखों में खुशी नजर नहीं आई। पांच मिनट से ज्यादा अगर वे स्क्रीन में रहती हैं, तो उन्हें झेलना मुश्किल हो जाता है। बोमन ईरानी अच्छे हैं, लेकिन रोमांटिक गाने में डांस करते समय वे अजीब लगे हैं। वो फिल्‍म को पांच से दो अंक देते हुए फिल्‍म देखने की सलाह भी देते हैं।

दैनिक भास्‍कर डॉट कॉम पर फिल्‍म को पांच में से एक सितारा देते हुए फिल्‍म समीक्षक लिखते हैं कि बीते कुछ सालों में पारसियों पर केंद्रित कुछ फिल्‍में आई हैं और सिनेप्रेमियों ने उन्‍हें खूब सराहा है, जैसे होमी अदजानिया की बीइंग साइरस (2005), सूनी तारापुरवाला की लिटिल जिजू (2009), राजेश मापुस्‍कर की फरारी की सवारी (2012)… लेकिन जब हम इस घालमेल फिल्‍म को देखकर थिएटर से बाहर निकलते हैं तो हमारे जेहन में एक ही बात घूमती रहती है : "डीकरा, व्‍हाट वाज दिस?"

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