मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

माता पिता के ख्‍वाबों का जिम्‍मा है
मेरे महबूब के गुलाबों का जिम्‍मा है

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

जॉब से छुट्टी नहीं मिलती विद पे
ऐसे उलझे भैया क्‍या नाइट क्‍या डे

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

भगत सिंह की है जरूरत बेहोशी को
मगर यह सपूत देना मेरे पड़ोसी को

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

क्रांति आएगी, लिखता हूं यह सोचकर
वो भी भूल जाते हैं एक दफा पढ़कर

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

अन्‍ना हो रामदेव हो लताड़े जाएंगे
मैडलों के लिए बेगुनाह मारे जाएंगे

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

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