मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

माता पिता के ख्‍वाबों का जिम्‍मा है
मेरे महबूब के गुलाबों का जिम्‍मा है

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

जॉब से छुट्टी नहीं मिलती विद पे
ऐसे उलझे भैया क्‍या नाइट क्‍या डे

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

भगत सिंह की है जरूरत बेहोशी को
मगर यह सपूत देना मेरे पड़ोसी को

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

क्रांति आएगी, लिखता हूं यह सोचकर
वो भी भूल जाते हैं एक दफा पढ़कर

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

अन्‍ना हो रामदेव हो लताड़े जाएंगे
मैडलों के लिए बेगुनाह मारे जाएंगे

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।

8 प्रतिक्रिया:

  1. सुधार सभी चाहते है ..बलिदान सभी चाहते है अपने अपने घर में कोई नहीं चाहता ..तीखी कविता

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  2. वाह मुझे भी छुट्टी मिलती नहीं
    वरना इस सरकार को बदल देता :)

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  3. बिलकुल सटीक चोट की है आपने ... बहुत खूब !

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  4. अन्‍ना हो रामदेव हो लताड़े जाएंगे
    मैडलों के लिए बेगुनाह मारे जाएंगे

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  5. mम्uझे पूरा विश्वास है कि तुम बदल सकते हो मगर जो बदलना चाहते हैम वो मजबूरियों की परवाह नही करते एक कदम उठाओ त सही कारवां बन जायेगा पर शर्त एक है कि अहं और अहंकार आढे नही आये अन्ना की टीम ने यही किया। आशीर्वाद।

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  6. भगत सिंह की है जरूरत बेहोशी को
    मगर यह सपूत देना मेरे पड़ोसी को

    मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।
    धारदार प्रस्तुति।

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  7. चाह तो जबरदस्त है देश को बदलने की ..... पर मजबूरी है , दूसरा क्यूँ नहीं उठता ? उसे भला क्या मजबूरी है ! बढ़िया बहुत बढ़िया

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हार्दिक निवेदन। अगर आपको लगता है कि इस पोस्‍ट को किसी और के साथ सांझा किया जा सकता है, तो आप यह कदम अवश्‍य उठाएं। मैं आपका सदैव ऋणि रहूंगा। बहुत बहुत आभार।