पति से त्रसद महिलाएं न जाएं सात खून माफ

सात खून माफ फ‍िल्‍म से पूर्व मैंने फ‍िल्‍म निर्देशक विशाल भारद्वाज की शायद अब तक कोई फ‍िल्‍म नहीं देखी, लेकिन फ‍िल्‍म समीक्षकों की समीक्षाएं अक्‍सर पढ़ी हैं, जो विशाल भारद्वाज की पीठ थपथपाती हुई ही मिली हैं। इस वजह से सात खून माफ देखने की उत्‍सुकता बनी, लेकिन मुझे इसमें कुछ खास बात नजर नहीं आई, कोई शक नहीं कि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक फ‍िल्‍म ने बॉक्‍स आफि‍स पर अच्‍छी कमाई की, फि‍ल्‍म कमाई करती भी क्‍यों न, आख‍िर सेक्‍स भरपूर फ‍िल्‍म जो ठहरी, ऐसी फ‍िल्‍म कोई घर लाकर कॉमन रूम में बैठकर देखने की बजाय सिनेमा घर जाकर देखना पसंद करेगा। मेरी दृष्टि से तो फ‍िल्‍म पूरी तरह निराश करती है, मैंने समाचार पत्रों में रस्‍किन बांड को पढ़ा है, और उनका फैन भी बन गया, मुझे नहीं लगता उनकी कहानी इतनी बोर करती होगी। कुछ फ‍िल्‍म समीक्षक लिख रहे हैं कि फ‍िल्‍म बेहतरीन है, लेकिन कौन से पक्ष से बेहतरीन है, अभिनय के पक्ष से, अगर वो हां कहते हैं तो मैं कहता हूं एक कलाकार का नाम बताए, जिसको अभिनय करने का मौका मिला।  अगर निर्देशन पक्ष की बात की जाए, जिसके कारण फ‍िल्‍म की सफलता का श्रेय विशाल भारद्वाज को जाता है, लेकिन निर्देशन में बिल्‍कुल भी कसावट नजर नहीं आती, फ‍िल्‍म इतनी तेजी से भागती है कि बिना सेक्‍स के कोई और बात समझ में नहीं आती। यह फ‍िल्‍म अच्‍छी बन सकती थी, अगर विशाल भारद्वाज सात खून करवाने की बजाय, कम खून करवाते, और हर हत्‍या के पीछे के ठोस कारणों को विस्‍तार से बताते। तेज रफतार दौड़ती फ‍िल्‍म में निर्देशक प्रियंका की दयनीय जिन्‍दगी को उजागर करने से कोसों दूर रह गया। अंतिम में इतना कहूंगा, पति से त्रसद महिलाएं इस फ‍िल्‍म से बचें, खासकर वो जो तलाक लेने के लिए भीतर ही भीतर पूरी तरह तैयार हो चुकी हैं। चलते चलते एक और बात, ऐसे फ‍िल्‍म निर्देशकों को समाज को सही दिशा देने वाली फ‍िल्‍में बनानी चाहिए, जिनकी काबिलयत पर फ‍िल्‍म समीक्षक आंख मूंदकर विशाल करते हों।

जनाक्रोश से भी बेहतर हैं विकल्प, देश बदलने के

कुलवंत हैप्पी / गुड ईवनिंग/ समाचार पत्र कॉलम
हिन्दुस्तान में बदलाव के समर्थकों की निगाहें इन दिनों अरब जगत में चल रहे विद्रोह प्रदर्शनों पर टिकी हुई हैं एवं कुछ लोग सोच रहे हैं कि हिन्दुस्तान में भी इस तरह के हालात बन सकते हैं और बदलाव हो सकता, लेकिन इस दौरान सोचने वाली बात तो यह है कि हिन्दुस्तान में तो पिछले छह दशकों से लोकतंत्र की बहाली हो चुकी है, यहां कोई तानाशाह गद्दी पर सालों से बिराजमान नहीं। वो बात जुदा है कि यहां लोकतांत्रिक सरकार होने के बावजूद भी देश में भूखमरी, बेरोजगारी व भ्रष्टाचार अपनी सीमाएं लांघता चला जा रहा है। इसके लिए जितनी हिन्दुस्तान की सरकार जिम्मेदार है, उससे कई गुणा ज्‍यादा तो आम जनता जिम्मेदार है, जो चुनावों में अपने मत अधिकार का इस्तेमाल करते वक्‍त पिछले दशकों की समीक्षा करना भूल जाती है। कुछ पैसों व अपने हित के कार्य सिद्ध करने के बदले वोट देती है। देश में जब जब चुनावों का वत नजदीक आता है नेता घर घर में पहुंचते हैं, लेकिन इन नेताओं की अगुवाई कौन करता है, हमीं तो करते हैं, या कहें हमीं में से कुछ लोग करते हैं, या जो समस्याएं हमें दरपेश आ रही हैं, उनको नहीं आती, जो नेताओं के लिए वोट मांगने के लिए हमारे दर आते हैं। पार्षद किसी नेता को अपनी दहलीज नहीं लाया कि हम भूल जाते हैं, यह वो शख्स है, जिसके खिलाफ जनाक्रोश के ख्वाब संजो रहे थे कुछ समय पूर्व, यह उसकी सरकार के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने डिग्री हाथों में लेकर नौकरी मांगने गए कुछ बेरोजगारों पर लाठियां बरसाई। यह भूलने की आदत ही तो आफत बन चुकी है। एक शहर में बहुत बड़ा बम्ब धमाका होता है, एवं कुछ घंटों बाद सुन टूटती है एवं शहर पहले सी चहल पहल का अहसास करता है। इसको साहस कहो, चाहे कमजोर याददाशत का नतीजा। पुलिस प्रशासन सांप निकालने के बाद लकीर पीटने की कहावत को सच करते हुए कुछ समय सुरक्षा कड़ी करता है, फिर वह भी अपनी जिम्मेदारी भूल जाता है। आज टीवी व समाचार पत्रों में अरब जगत में हो रहा जनाक्रोश छाया हुआ है, और कुछेक हिन्दुस्तानी शेखचिल्ली की तरह ख्यालों में हिन्दुस्तान में भी इस तरह के विद्रोह को होते हुए महसूस कर एक नए हिन्दुस्तान की कल्पना कर रहे हैं, लेकिन जैसे ही वहां सब शांत हो जाएगा, समाचार पत्र व खबरिया चैनल अपनी पेज थ्री की खबरों में व्यस्त हो जाएंगे, वैसे ही लोग भूल जाएंगे अरब देशों के जनाक्रोश को, और हिन्दुस्तान का लोकतंत्र दिन ब दिन बूढ़ा एवं बोझिल होता चला जाएगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दुस्तान में भी जनाक्रोश फूटेगा, लेकिन सत्‍ता नहीं बदलेगी बल्कि आपराधिक गतिविधियां बढ़ेगी, रिश्ते टूटेंगे, बच्चे बिकेंगे, वेश्यवृत्ति बढ़ेगी, दंगे फसाद होंगे। अगर इन सबको होने से रोकना है तो सरकार पर उम्मीदें रखने से बजाय खुद करने की हिम्मत करो। देश को बदलने के लिए जनाक्रोश के अलावा भी कई रास्ते हैं, लेकिन उन रास्तों पर चलने के लिए स्वयं में शति की जरूरत है। फैट्री मालिक प्रशासन से सहयोग लेकर युवावस्था भिखारियों को कार्य पर रखें, भीख मांगने वाले बच्चों को बड़े बड़े स्कूल अपने हॉस्टलों में रखकर शिक्षा दें, खासकर जो मोटी दान राशि लेते हैं। आम जन अपने पुराने कपड़ों को बेचने की बजाय, गरीबों को बांट दें, होटलों में बर्बाद होते खाने को गरीबों तक पहुंचा दो, सरकार के हर कार्य पर निगाहें रखो एवं पैसे देकर काम करवाने की आदत को नकार दो, नोट के बदले वोट की बजाय विकास के बदले दो वोट देने की आदत डालो।

मनप्रीत की जनसभाएं व आमजन

कुलवंत हैप्पी /  गुड ईवनिंग/ समाचार पत्र कॉलम
'ए खाकनशीनों उठ बैठो, वो वत करीब आ पहुंचा है, जब तख्त उछाले जाएंगे, तब ताज गिराए जाएंगे' विश्व प्रसिद्ध शायर फैज अहमद फैज की कलम से निकली यह पंतियां, गत दिनों स्थानीय टीचर्ज होम के हाल में तब सुनाई दी, जब जागो पंजाब यात्रा के दौरान राद्गय में इंकलाब लाने की बात कर रहे राज्‍य के पूर्व वित्‍त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल एक जन रैली को संबोधन कर रहे थे। फैज की कलम से निकली इस पंति को कहते वत मनप्रीत को जद्दोजहद करना पड़ रहा था अपने थक व पक चुके गले से, जो पिछले कई महीनों से राद्गय की जनता को इंकलाब लाने के लिए लामबंद करने हेतु आवाज बुलंद कर रहा है। गले के दर्द को भूल मनप्रीत इस रचना की एक अन्य पंति 'अब टूट गिरेंगी जंजीरें, अब जैदांनों की खैर नहीं, जो दरिया झूम के उठे हैं, तिनकों से न टाले जाएंगे' को पढ़ते हुए पूरे इंकलाबी रंग में विलीन होने नजर आए। उनके संबोधन में उसकी अंर्तात्मा से निकलने वाली आवाज का अहसास मौजूद था, यही अहसास लोगों को इंकलाब लाने के लिए लामबंद करने में अहम रोल अदा करता है। इसमें भी कोई दो राय नहीं होनी चाहिए, जब जब किसी देश में जन अंदोलन हुआ, उसमें साहित्य ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। साहित्य के सहारे से ही लोगों की सोई हुई आत्मा को जगाया जा सकता है। पिछले दिनों मिस्त्र में जो हम सब ने देखा, वह भी सिर्फ एक विडियो लिप जरिए जारी किए एक भावनात्मक स्पीच के कारण ही हुआ। उस वीडियो में आसमा महफूज नामक लड़की ने भावनाओं से ओतपोत व अपनी अंर्तात्मा से एकजुटता बनाते हुए देश वासियों से एक अपील की, और उसी एक अपील ने पूरे मिस्त्र में जनाक्रोश पैदा कर दिया एवं उस जनाक्रोश के बाद, जो हुआ वह हम सब जानते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि विदेशियों के खिलाफ लड़ने वाले इस देश के नागरिक या अपने देश के हुकमरानों खिलाफ लड़ने के लिए लामबंद होंगे? योंकि इस देश में रूम डिस्कशन की बहुत गंदी बीमारी है। यहां के लोग कमरों में बैठकर सरकारें बदल देते हैं। एक दूसरे से जूतम जूती हो जाते हैं, लेकिन जब एकजुट होकर सरकार के खिलाफ अंदोलन चलाने की बात आती है तो सड़कों पर गिने चुने लोग नजर आते हैं, जिनको सरकार हलके से पुलिस लाठीचार्ज से दबा देती है। पिछले चार पांच महीनों से मनप्रीत सिंह बादल गली गली कूचे कूचे जाकर जन रैलियों को संबोधन कर रहे हैं एवं लोग उनके इंकलाब से लबालब भाष्णों को बड़ी गम्भीरता से सुन रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन वह लोग जब अपना प्रतिनिधि चुनने वोटिंग बूथ पर पहुंचेंगे, या तब मोहर मनप्रीत सिंह बादल के समर्थकों पर लगाएंगे। इस बात को लेकर मन में शंका है, योंकि भारत में रूम डिसशन में लोग चर्चा करते करते बहस पर उतर आते हैं, लेकिन जब रूम से बाहर आते हैं तो सब खत्म हो चुका है। विरोध की आग राख बन चुकी होती है।

एक विडियो सांग की बदौलत मिली 'द लॉयन ऑफ पंजाब' : दलजीत

देश विदेश में 25 फरवरी को होगी रिलीज द लॉयन ऑफ पंजाब
कुलवंत हैप्पी, बठिंडा। जल्द रिलीज होने वाली मेरी पहली पंजाबी फिल्म द लॉयन ऑफ पंजाब 'पहलां बोली द नी' गीत के विडियो की बदौलत मिली। यह खुलासा स्थानीय हरचंद सिनेमा में अपनी फिल्म के प्रोमशन के लिए पहुंचे पंजाबी संगीत प्रेमियों के दिलों की धडक़न गायक दलजीत ने किया। मुक्‍तसर मार्किञ्ट कमेटी के चेयरमैन हनी बराड़ फत्‍तणवाला के विशेष निमंत्रण पर बठिंडा पहुंचे पंजाबी गायक व अभिनेता दलजीत ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि अगर परमात्मा की दुआ से उनकी पहली फिल्म चल गई तो वह पंजाबी फिल्म प्रेमियों की झोली में और भी बेहतरीन फिल्में डालने की कोशिश को जारी रखेंगे। फिल्म में उनके किरदार के बारे में पूछे जाने पर दलजीत कहते हैं कि फिल्म में उनका किरदार अवतार सिंह नामक युवा का है, जिसका संबंध रामपुरा फूल के समीप स्थित एक गांव से है। फिल्म के विषय पर उन्होंने रहस्य कायम रखते हुए कहा कि फिल्म का विषय पंजाब की एक अहम समस्या है, जो आए दिन अखबारों में सुर्खियां बटोरती है। एक अन्य सवाल के जवाब में दलजीत कहते हैं कि वह इस फिल्म से पूर्व फिल्म निर्देशक गुड्डू धनोया से कभी नहीं मिले थे, लेकिन एक दिन उनको कॉल आया कि गुड्‌डू धनोया उनके साथ फिल्म करना चाहते हैं। दलजीत बताते हैं कि गुड्‌डू धनोया ने वो फोन पहलां बोली दा नी गीत की वीडियो देखने के बाद किया एवं कहा कि वह उसको लेकर एक फिल्म बनाना चाहते हैं, जिसकी पटकथा पंजाब की भूमि से संबंध रखती है। अन्य सवाल के जवाब में गायक दलजीत कहते हैं कि जब फिल्म की शूटिंग चल रही थी, तो उनको मजा आ रहा था एवं उसके बाद थोड़ा सुकून मिला कि कुञ्छ नया किया, लेकिन अब जब फिल्म रिलीज किनारे आ पहुंची है तो नर्वस हो रहा हूं। गौरतलब है कि इस फिल्म का निर्देशन हिन्दी फिल्म निर्देशक गुड्‌डू धनोया ने किया, जबकि फिल्म की कहानी उनकी धर्मपत्नि संतोश धनोया ने लिखी है। इसके अलावा फिल्म में एक्‍शन राम कुमार का है जबकि संगीत आनंद राज का। इस फिल्म में दलजीत के साथ बतौर नायिका जीविदा फेम मिनी पंजाब व जीविदा टंडन ने काम किया है।

उंगली उठाने से पहले जरा सोचे

बुधवार को स्थानीय फायर बिग्रेड चौंक पर समाज सेवी संस्थाओं की ओर से हिन्दुस्तानी भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता रैली का आयोजन किया गया, जिसमें मैं भी शामिल हुआ। हाथों में जागरूकता फैलाने वाले बैनर पकड़े हम सब सडक़ के एक किनारे खड़े थे, और उन बैनरों पर जो लिखा था, वह आते जाते राहगीर तिरछी नजरों से पढ़कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे। इतने में मेरे पास खड़े एक व्यक्‍ति की निगाह सामने दीवार पर लटक रहे धार्मिक संस्था के एक फलेक्‍स पर पड़ी, जिस पर लिखा हुआ था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, उन्होंने मेरा ध्यान उस तरफ खींचते हुए कहा कि वह शब्‍द बहुत कम हैं, लेकिन बहुत कुछ कहते हैं। अपने लेखन से सागर में गागर तो कई लेखकों ने भर दिया, लेकिन हमारा जेहन उनको याद कितनी देर रखता है, अहम बात तो यह है। हमारे हाथों में पकड़े हुए बैनरों पर लिखे नारों की अंतिम पंक्‍ति भी कुछ यूं ही बयान करती है, न रिश्वत लें, न रिश्वत दें की कसम उठाएं, जो बैनर तैयार करते समय मेरे दिमाग से अचानक निकली थी। किसी पर उंगली उठानी, सडक़ों पर निकल कर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करनी हमारी आदत में शुमार सा हो गया था, लेकिन हम क्‍यों नहीं सोचते के जब हम किसी पर उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारी तरफ होती हैं, जो हमको याद करवाती हैं कि कुछ दोष तो हमारा भी है, सारा दोष सरकारी सिस्टम का नहीं। हम सिस्टम का बहुत बड़ा हिस्सा हैं, अगर हम सिस्टम को बरकरार रखते हैं, तो ही सिस्टम ठीक रह सकता है, क्‍योंकि सिस्टम बनाने वाले मुट्‌ठी भर लोग हैं, लेकिन उसको संभालकर रखने वाले व बिगाडऩे वाले करोड़ों में हैं। अगर हम रिश्वत देते हैं, तो सामने वाला रिश्वत लेता है। हम अगर नशा पैदा करते हैं, तो हमीं से कुञ्छ लोग बेचते हैं, कुछ लोग खाते हैं। गलियों में सीवरेज का पानी फैल जाता है, तो लोग सडक़ों पर उतर आते हैं, नगर पालिकाओं, नगर निगमों व सरकारों के खिलाफ नारेबाजी करते हैं। लेकिन नारेबाजी करने से पूर्व वह एक दफा भी नहीं सोचते हैं कि आखिर नालियां व सीवरेज बंद क्‍यों होते हैं। प्लास्टिक के लिफाफे इस्तेमाल करने के बाद हम कहां फेंकते हैं? कभी सोचा है! वह लिफाफे ही सीवरेज व्यवस्था को प्रभावित कर देते हैं। जरा सोचो, सीवरेज व्यवस्था प्रभावित होने से हम इतने क्रोधित हो जाते हैं तो जिस तरह भूमि में प्लास्टिक दिन प्रति दिन फेंके जा रहे हैं, एक दिन धरती की सोखने की क्षमता खत्म हो जाएगी, तब क्‍या होगा, किसके खिलाफ नारेबाजी करेंगे। सिस्टम केञ् खिलाफ, कौन से सिस्टम के खिलाफ, जो हम से बनता है, जिसका हम हिस्सा हैं। बेहतर होगा, धार्मिक बोर्ड पर लिखी पंक्‍तियों का अनुसरण करें, जिसमें लिखा था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा।

'मिस्त्र में जनाक्रोश जिम्मेदार कौन' विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित


जिम्मेदार : अमेरिकी रणनीति व अन्य अरब देशों में फैला जनाक्रोश
बठिंडा। बठिंडा विकास मंच द्वारा 'मिस्त्र में जनाक्रोश जिम्मेदार कौन' विषय पर विचार गोष्ठी शिव मंदिर स्ट्रीट में लेखक व समाज शास्त्री राजिंदर चावला की अध्यक्षता में आयोजित की गई, जिसमें प्रोफेसर एन के गोसाई मुख्य प्रवक्‍ता के तौर पर उपस्थित हुए। विचार चर्चा शुरू करते हुए बठिंडा विकास मंच के अध्यक्ष राकेश नरूला ने कहा कि वर्तमान राष्ट्रपति के दिन अब गिने चुने रह गए लगते हैं, पिछले तीन दशकों से उन्होंने फौलादी मुट्ठी व फौजी बूट का इस्तेमाल कर विपक्ष को दबाया है, वहां आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि आम आदमी जी जान पर खेलकर सड़कों पर उतर आया है। प्रिंसिपल एनके गोसाई ने कहा कि एक जमाने में मिस्त्र की साख अंतर्राष्ट्रीय मंच पर थी, मिस्त्र के राष्ट्रपति नासिर ने न सिर्फ स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किया बल्कि उसके बाद हुए हमलों में साम्राज्‍यवादियों के दांत खट्टे किए, जबकि मिस्त्र ने आसवान बांध का निर्माण किया तो अरबों का सिर गर्व से उंच्चा हो गया। हजारों साल पहले बने पिरामिड इस बात के गवाह हैं कि मिस्त्र की संस्कृति प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है, उपनिवेशिक काल में मिस्त्र पर फ्रांसीसी व ब्रिटिश प्रभाव पड़ा, इसलिए वह पश्चिमी तौर तरीकों वाला बना, इस कारण उसे अमरीकी दलाल कहा जाने लगा, अब वहां आपातकाल जैसी स्थिति बन गई है एवं उद्योग पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गया, जिसका बुरा प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ा है। सबसे बड़े कपास उत्पादक देश में अब यह आलम है कि जनता राष्ट्रपति हुस्‍नी मुबारक के खून की प्यासी हो गई है, इसके पीछे कट्टर पंथी इस्लामिक बिरादरी का हाथ भी हो सकता है, क्‍योंकि लेबनान में हिजबुला की सक्रियता मिस्त्र को आशंकित करती रही है, मिस्त्र में ही नहीं अन्य अरब देशों में जैसे अलजीरिया, मौरक्को, जार्डन आदि में भी जनता जागरूक होकर तानाशाही विरूद्ध आजादी का बिगुल बजा चुकी है, इस सभी का प्रभाव मिस्त्र पर पड़ा, जिसके कारण मिस्त्र में जनाक्रोश हुआ। राजिंदर चावला ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि मौजूदा हालात के लिए कुटिल अमेरिकी रणनीति भी जिम्मेदार है, अमरीका अब समझ चुका है कि भ्रष्ट व कुनबाप्रस्त हुस्नी मुबारक अब अधिक दिन सत्‍ता में रहने वाले नहीं, इसलिए अब उन्हें अमेरिकी सहयोग नहीं मिल रहा है, यह तो तय है कि अमेरिकी हकूमत हुस्नी मुबारक के जाने के पक्ष में है, वह यह भी प्रयास करेंगे कि नया राष्ट्रपति आए वह उनके कहने में हो व उनके इशारों पर चले। अमेरिका के करीबी माने जाने वाले मिस्त्र के वैज्ञानिक नॉबेल पुरस्कार विजेता अल वरदोई मिस्त्र में सक्रिय हो गए हैं, वे कह रहे हैं कि यदि मिस्त्र की जनता उन्हें राष्ट्रपति की जिम्मेदारी सौंपेगी तो वे इसे स्वीकार करेंगे। सेवा राम सिंगला ने कहा कि मिस्त्र की बरबादी के लिए अमेरिकी नीतियां भी जिम्मेदार हैं। मध्यपूर्व के तेल भंडार पर कब्‍जा बनाए रखने की अमेरिकी रणनीति से मिस्त्र में इस तरह के हालात पैदा हुए हैं। इस समय बहुत सारे अरब देशों में जनाक्रोश फैला हुआ है, जिसका फायदा सीधे तौर पर अमेरिका को होगा।

बहुत कुछ कहते हैं दिल तो बच्चा है के महिला किरदार

पिछले दिनों हालिया रिलीज अजीम बाज्मी की नो प्रोब्‍लम, क्रित खुराना की टुनपुर का सुपरस्टार, फरहा खान की तीस मार खां व मधुर भंडारकर की दिल तो बच्चा है देखी। नो प्रोब्‍लम को छोडक़र बाकी सब फिल्में फिल्मी दुनिया से जुड़ी हुई थी, इनमें से मधुर भंडारकर की फिल्म हिन्दी फिल्मी फार्मुले से कुछ हटकर नजर आई, जो हर हिन्दी फिल्म की तरह सुखद अंत के साथ समाप्त नहीं होती। इस फिल्म के जरिए मधुर भंडारकर बहुत कुछ कह गए, लेकिन फिल्म समीक्षक फिर भी कहते रहे कि फिल्म में कुछ कसर बाकी है। मधुर भंडारकर ने तीन किरदारों को आपस में जोडक़र एक आधुनिक समय की तस्वीर पेश की। इस फिल्म में निक्की नारंग का किरदार अदा करने वाली श्रुति हसन, जब अभय (इमरान हश्मी) का दिल तोड़ते हुए कहती है कि यह तेरे लिए या मेरे के लिए कोई नई बात नहीं, एक लडक़ी का इस तरह उत्‍तर देना, अपने आप में चौंकने वाला था, यह वैसा ही था, जैसे फिल्म मर्डर में मल्लिका शेरावत का मेडिकल दुकान पर जाकर निरोध मांगना। इसमें कोई दो राय नहीं कि समय बदल रहा है, और बदलते समय की तस्वीर को पेश किया है मधुर भंडारकर ने। वहीं नरैन अहुजा (अजय देवगन) व उनकी पत्नि का रिश्ता टूटना भी समाज की एक नई तस्वीर पेश करता है। आज पत्नि पति इतने व्यस्त हो गए, उनको रिश्तों से ज्यादा अपने कैरियर की चिंता है, अगर र‍िश्‍ता कैरियर में रोड़ बनता है तो वह उसको भी बीच से हटाने में झिझकते नहीं। गुनगुन का मिलिंद केलकर की मासूमियत का फायदा उठाना, उन लड़कियों की तस्वीर पेश कर रहा है, जो अपना कैरियर बनाने के लिए किसी का भी जीवन बिगाड़ सकती हैं। अनुषका नारंग का किरदार, उस वर्ग का नेतृत्व करता है, जो एशोआराम की जिन्दगी जीने के लिए कोई भी समझौता कर पैसे के बल पर शरीर की भूख मिटाता है। पुरुष का चित्र तो हम सब रुपहले पर्दे पर देखते ही आ रहे हैं सदियों से, लेकिन मधुर भंडारकर ने महिला किरदारों को इस फिल्म में दयनीय स्थिति में नहीं दिखाया बल्कि उनको एक नए रूञ्प में दिखाया। मधुर भंडारकर की इस फिल्म में महिला नहीं, पुरुष लूटते हुए नजर आए। अनुषका का अभय को मुंह तोड़ जवाब देना, उसके भीतर की ऊर्जा को उजागर करता है, जबकि आज तक फिल्मकार यह ही दिखाते आए हैं कि औरत ने किसी पुरुष के साथ संभोग कर लिया तो उसके सामने आत्महत्या करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं, उसने औरत का हमेशा ही हीन दिखाया है। औरत की इस हीनता का पुरुषों ने खूब फायदा उठाया। लेकिन औरत चाहे तो वह पुरुषों को हीन भावना का शिकार बना सकती है। मधुर भंडारकर की इस फिल्म के महिला किरदार बहुत कुछ कहते थे, जिनको समझने की जरूरत है। हमारे समाज ने बॉस व अधीनस्थ महिला की निकटता को हमेशा ही गलत नजर से देखा है, लेकिन जरूरी नहीं कि उनके बीच हमेशा शारीरिक संबंध हों, इस बात को बयान करती है जून पिंटो की नरायन के साथ की निकटता। फ‍िल्‍म में बार बार बजने वाला गीत कोई होता व अभय का किरदार एक बात तो तय करता है कि जिन्‍दगी जितनी भी क्‍यों न व्‍यस्‍त व ऐशोराम भरी हो, लेकिन दिल को हमेशा प्‍यार व साथ की जरूरत रहती है।