धन काला है या नहीं पहले इसकी जांच हो - बूटा सिंह

बठिंडा। पंजाब की बिहार से तुलना किसी भी स्तर पर हो ही नहीं सकती, वहां और यहां के हालातों में जमीं आसमान का फर्क है, यह शब्‍द बिहार के पूर्व राज्यपाल व एनसीएससी के चेयरमैन बूटा सिंह ने स्थानीय सर्किट हाउस में समाचार पत्र टरूथ वे के प्रतिनिधि कुलवंत हैप्‍पी से हुई विशेष बातचीत के दौरान कहे, जोकि बलराम जाखड़ के बेटे सुरेंद्र जाखड़ के भोग में शामिल होने के लिए आए थे। शिरोमणि अकाली दल के तेज तर्रार नेता व पंजाब उप मुख्‍यमंत्री सुखबीर सिंह बादल द्वारा पंजाब में बिहार की तर्ज पर दोहराव की बात कहे जाने के संबंध में जब बूटा सिंह से सवाल पूछा गया तो उन्होंने अपने पुराने दिनों की तरफ लौटते हुए कहा कि बिहार और पंजाब में तुलना करना गलत है। बिहार की तुलना तो अन्य राज्यों से भी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि बिहार पर सबसे लम्‍बे समय तक राज लालू व उसके रिश्तेदारों ने किया, वहां की सरकारी संपत्‍त‍ि पर उनका एकाधिकार था एवं वहां नीतिश कुमार के आने से पूर्व कानून नाम की कोई चीज नहीं थी, जबकि पंजाब व अन्य राज्यों में किसी भी पार्टी की सरकार के दौरान ऐसे हालात पैदा नहीं हुए, जो लालू व उसके रिश्तेदारों के शासनकाल दौरान बिहार में पैदा हो गए थे, नीतिश कुमार के आने के बाद बिहार में कानून व्यवस्था सुचारू हुई एवं उसी के कारण नीतिश कुमार ने वहां पर वापसी की। उन्होंने अपने पुराने दिन याद करते हुए कहा, 'उन्हें याद है कि जब वह राज्यपाल थे तो बिहार में सरकार के नुमाइंदों को शपथ दिलाने के लिए राज्यभवन के दरवाजे खोलकर कई दिनों तक बैठे रहे थे, लेकिन वहां शपथ ग्रहण करने के लिए कोई भी नुमाइंदा नहीं पहुंचा एवं बिना शपथ ग्रहण किए सरकार चलती रही, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजी। ऐसे हालातों देश भर के किसी भी राज्य में पैदा नहीं हुए। ऐसे में पंजाब से बिहार की तुलना दूर दूर तक सही नजर नहीं आती।' सुलग रहे काले धन के मुद्दे पर कांग्रेस का बचाव करते हुए श्री सिंह ने कहा, 'कौन कहता है कि केंद्र में कांग्रेस सरकार है, ध्यान से देखें, वहां कांग्रेस सरकार नहीं बल्कि यूपीए सरकार है, और ऐसे में अकेली कांग्रेस पर उंगली उठाना जायज नहीं।' उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, यह जरूरी नहीं कि विदेशों में पड़ा हुआ पैसा काला धन ही हो, इस की सीबीआई व अन्य जांच एजेंसियों से जांच करवानी चाहिए कि वह धन काला है या नहीं। उन्होंने कहा कि स्विस की बैंकों को विश्‍व बैंक से गोपनीयता कायम रखने के अधिकार प्राप्त हैं, ऐसे में वहां की बैंकें किसी भी व्यक्‍ति की जानकारी डिस्कलोज नहीं कर सकती, और जो जानकारी सरकार को मिली है, वह किसी व्यक्‍ति द्वारा लीक की हुई जानकारी है, जिसको किसी भी स्तर पर सही नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए इस मामले में सरकार थोड़ी सी सर्तकता बरत रही है। एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए बूटा सिंह ने कहा कि कांग्रेस का भविष्य उज्जवल है, क्‍योंकि कांग्रेस ही भारत में सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि अन्य राजनीतिक पार्टियों का दायरा सीमित है। कुछ खत्म हो चुकी हैं एवं कुछेक राज्यों तक सीमित है। उन्होंने कहा कि अगर हिन्दुस्तान में संविधान को जीवंत रखना है तो केंद्र में एकल सरकार का आना जरूरी है, एवं यह कांग्रेस पार्टी के बिना कोई और कर नहीं सकता। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी की अपनी विचारधारा है एवं कांग्रेस पार्टी आज भी उन्हीं सिद्धांतों पर अग्रसर है, जिनको स्वराज से पूर्व पार्टी संस्थापकों ने स्थापित किया था। इस मौके पर उनके साथ राजीव गांधी लोक भलाई मंच के चेयरमैन डॉक्‍टर सतपाल भटेजा, कांग्रेस प्रदेश कमेटी सचिव टहल सिंह संधू, सुखजीत सिंह नीना आदि उपस्थित थे।

संक्रांति है संस्कार-क्रांति

त्सव और त्योहार किसी भी देश और जाति के रहन-सहन, चरित्र, मूल्य, मान्यता, धर्म, दर्शन आदि का परिचय कराते हैं। कुछ त्योहार परमात्मा से, कुछ धर्मस्थापकों से, कुछ देवी-देवताओं से, कुछ विजय के अवसरों से और कुछ लोगों की मानवीय भावनाओं और कुछ प्रकृति के परोपकारों के प्रति कृतज्ञता भाव से जुड़े होते हैं। इन त्योहारों पर की जाने वाली सब प्रकार की पूजा, ध्यान, अनुष्ठान, पकवान, साज-सज्जा, सज-धज, राग-रंग के पीछे मूल उद्देश्य आत्मा का परमात्मा से मंगल मिलन कराना और आत्मा को ईश्‍वरीय विरासत से भरपूर करना ही होता है। त्योहार न हों तो जन-जीवन सूखा, बासी, रसहीन, सारहीन और उबाऊ हो जाए। लेकिन यह भी एक साथ तथ्य है कि विदेशी आक्रमणों, आपसी फूट, नैतिकता की उत्‍तरोत्‍तर गिरावट और धर्मग्रन्थों में क्षेपक और मिलावट हो जाने के कारण आज त्योहार विशुद्ध भौतिक आधार पर मनाए जाने लगे हैं। इसी कारण से समाज को वो लाभ नहीं दे पाते हैं जो कि ये दे सकते थे। अतः इनके विरुद्ध आध्यात्मिक अर्थ को समझकर उसमें टिकना हमारे लौकिक और पारलौकिक जीवन की उन्नति के लिए अति अनिवार्य, लाभकारी और मंगलकारी है। त्योहारों की कड़ी में, कड़ाके की सर्दी के बीच आता है मकर संक्रांन्ति का त्योहार जिसे सनातन धर्म के लोग बड़े उमंग के साथ मनाते हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में इस त्योहार को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है जैसे पंजाब में इसे 'लोहड़ी' कहा जाता है तथा गुजरात में इसे 'उत्‍तरायण' कहा जाता है। यह देसी मास के हिसाब से पौष महीने के अंतिम दिन तथा अंग्रेजी महीने की 12,13,14 जनवरी को आता है। इस समय सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में जाता है अर्थात् उत्‍तरायण होता है इसलिए इसे संक्रमण काल भी कहा जाता है। संक्रमण काल अर्थात्‌ एक दशा से दूसरी दशा में जाने का समय। वास्तव में, यह एक दिन मनाया जाने वाला संक्रमण काल उस महान संक्रमण काल की यादगार है जो कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ में घटता है। इस संक्रमण काल (संगमयुग) पर ज्ञान-सूर्य भगवान भी अपनी राशि बदलते हैं। वे परमधाम को छोडक़र साकार वतन में अवतरित होत हैं एक साधारण वृद्ध ब्राह्माण के तन में अर्थात्‌ प्रजापिता ब्रह्मा के तन में और कलियुगी मनुष्यों को पुराने संस्कार छोडक़र नए सतयुगी संस्कार धारण करने की श्रीमत देते हैं। उसी ईश्‍वरीय कर्त्‍ताव्‍य को एक दिवसीय यादगार बनाकर संक्रांति के रूप में याद किया जाता है, मनाया जाता है। संसार में आज तक अनेकों क्रांतियां हुई हैं। कभी सशस्त्र क्रांति, कभी हरित क्रांति, कभी श्‍वेत क्रांति आदि-आदि। हर क्रांति के पीछे उद्देश्य होता है, परिवर्तन। सशस्त्र क्रांति में हथियारों के बल पर परिवर्तन लाने की कोशिश की गई, आंशिक परिवर्तन हुआ, पूर्ण नहीं। हरित क्रांति द्वारा भूमि की हरियाली अर्थात् हरे-भरे खेतों ने मानव जीवन को खुशहाल बनाने की कोशिश की। श्‍वेत क्रांति द्वारा दूध तथा डेयरी उत्पादन ने लोगों को समृद्ध करने की कोशिश की। इन सबसे लाभा हुआ परंतु संपूर्ण लाभ और संपूर्ण परिवर्तन को आज भी मानव तरस रहा है। वह बाट जोह रहा है ऐसी क्रांत‍ि की जिसके द्वारा आमूल-चूल परिवर्तन हो जाए। कोई भी त्योहार परम्‍परागत नहीं है। भगवान कहते हैं सृष्टि के आदि काल अर्थात्‌ सतयुग तथा त्रेतायुग में दैवी मानव आज की तरह त्योहार नहीं मनाता था। वहां के देवी देवताओं के संस्कारों में, स्वभाव में हंसी, खुशी प्यार सम्‍मान, राग रंग इस प्रकार से रमे हुए थे कि वे 24 घंटे स्वाभाविक उमंग उल्लास और आनंद में रहते थे। ऐसा स्वभाव अथवा संस्कार उन्हें एक महान क्रञंति अर्थात्‌ संस्कार क्रञंति के फलस्वरूप मिला था। यह क्रांति आदि युग अर्थात् सतयुग से पहले के युग, संगमयुग में परमपिता परमात्मा शिव की अध्यक्षता में हुई थी। इस संस्कार क्रांति के फलस्वरूप, 100 फीसदी पवित्रता, दिव्यता, हर्षितमुखता, संतुष्टता, नम्रता, सत्यता के संस्कारों से विभूषित देवी देवताओं की हम आज भी मंदिरों में पूजा करते हैं और उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। इस क्रञंति के बाद सृष्टि पर 2500 वर्षों तक कोई क्रांत‍ि नहीं हुई। लेकिन 2500 वर्षों के बाद दैवी सृष्टि का परिवर्तन, मानवीय सृष्टि के रूप में हो गया। मानव स्वाभाव पर शनैः शनैः काम क्रोध की धूल जमने लगी। उसे उतारने के लिए समय समय पर त्योहार व उत्सव आयोजित किए जाने लगे। संक्रांति‍ का त्योहार भी संगमयुग पर हुई उस महान क्रांति की यादगार में मनाया जाता है, लेकिन यादगार मनाने मात्र से मानव काम क्रोध के जमावड़ों की हटा न सका। हर वर्ष यह त्योहार मनाए जाने पर भी मानव हृदय की कल्मश में कोई कभी नहीं आई। इसीलिए कहा गया, दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की। क्‍योंकि आज यह त्योहार विशुद्ध भौतिक रूप धारण कर गया है और इस दिन किए जाने वाले अनुष्ठानों के आध्यात्मिक अर्थ को भुला दिया गया है। इससें संबंधित हर क्रिया कलाप, आडम्‍बरों से, बाह्यमुखता से और सथूलता से भर गए हैं। इस दिन संसकार परिवर्तन, संस्कार परिशोधन, संस्कार दिव्यीकरण जैसा न तो कोई कार्यक्रम होता है, न लोगां को जागृति दी जाती है और न हीं संस्कारों की महानता की तरफ किसी को आकर्षित किया जाता है। अब परमात्मा पिता पुनः अवतरित होकर, कल्प पूर्व के ईश्‍वरीय कर्त्‍तव्यों की यादगार के रूप में मनाए जाने वाले इस त्योहार के विभिन्न क्रिया कलापों का आध्यात्मिक अर्थ समझा रहे हैं।

स्नान : इस दिन लोग ब्रह्मामुहूर्त में उठकर अपने घर में स्नान करते हैं। कई लोग तीर्थों पर जाकर भी डुबकी लगाते हैं। यह जल स्नान वास्तव में ज्ञान स्नान की यादगार है। संक्रमण काल में ज्ञान सागर भगवान के दिए ज्ञान से अलसुबह ही स्वयं को भरपूर करने वाली आत्मा पुण्य की भागी अर्थात्‌ सतयुगी सृष्टि में उच्च पद की अधिकारी बनती है।

तिल खाना : इस दिन तिल भी खाते हैं और खिलाते भी हैं। तिल का दान भी करते हैं। जब किसी बहुत छोटी चीज के बारे में बताना हो तो उसकी तुलना तिल से करते हैं। सुक्ष्म चीज को स्पष्ट करने के लिए उसे तिल समान कहा जाता है। आत्मा भी अति सूक्ष्म है अतः तिल समान कही जाती है और उसका आकार भी बिल्कुल गोल न होकर तिल की तरह ओवल अंडकार सा होता है। अतः तिल आत्मा का प्रतीक है और तिल खाना अर्थात्‌ तिल स्वरूप बनना अर्थात्‌ तिल सी सूक्ष्म आत्मा के स्वरूप में टिकना।

पतंग उड़ाना : जब आत्मा हल्की हो जाती है तो पतंग की तरह उडऩे लगती है। पतंग की तुलना आत्मा से की जाती है क्‍योंकि देहभान वाला उड़ नहीं सकता, वह जमीन पर रहता है, पर आत्मा के भान वाला पतंग की तरह, अपनी डोर भगवान को अर्पण कर तीनों लोकों की सैर कर सकता है। अत : आत्म उड़ान का प्रतीक है पतंग उड़ान।

तिल के लड्‌डू : तिल अकेले, खाओ तो थोड़ी कड़वाहट आती है, परंतु मिठास के साथ उन्हें संग्रहित कर लड्‌डू बना दिया जाए तो खाने में स्वादिष्ट लगते हैं। इसी प्रकार अकेली आत्मा, अध्यात्म के मार्ग पर चले तो उसे अकेलापन, भारीपन आता है, परंतु जब आपसी प्यार रूपी मिठास से भरपूर संगठन मिल जाता है तो आगे बढ़ना सरल और सहज जाता है। अतः लड्डू एकता, मिठास तथा संगठन का प्रतीक है। एकता में ही बल है और सफलता है। मधुरता के साथ जब एक दूसरे के संबंध में आते हैं तो हम श्रेष्ठ बन जाते हैं।

तिल का दान : जैसे दीपदान होता है ऐसे ही तिलों का दान भी किया जाता है। दान से भाग्य बनता है, ग्रहण छूटता है, परंतु कई बार मनुष्य को दान देना भारी लगता है। धन का दान बड़ी बात नहीं है, परंतु बुराइयों का दान, काम क्रञेध का दान करना मुश्किल लगता है। इस मुश्किल को आसान करने का तरीका है कि जो भी कमजोरी है, उसे तिल समान समझकर दे दो, बड़ी बात नहीं समझो, छोडऩा पड़ेगा, देना पड़ेगा, ऐसे नहीं समझो, तिल के समान छोटी सी बात ही तो दान में देनी है, ऐसे समझो। खुशी खुशी छोटी सी बात समझकर दे दो। बड़ी बात को छोटा समझकर समाप्त करना ही तिल का दान करना है।

आग जलाना- इस दिन सामूहिक आग जलाई जाती है। इतिहास की दृष्टि से आग का बहुत महव है। प्राचीन काल में माचिस नही होती थी। घरों में आग का प्रयोग करने के पश्चात्‌ इस प्रकार दबा दिया जाता था कि वह जीवित रहे। सर्दियों में तो आग की आवश्यकता अधिक हो जाती थी। इसलिए गांव में संयुक्त रूप से ईधन इकट्ठा कर बड़ी आग जलाई जाती थी। इससे भ्रातृत्व भाव बना रहता था और उसी आग के चारों ओर बैठकर इक्‍ट्ठे खाने से स्नेह, सौहार्द भी निखर उठता था। आध्यात्मिक दृष्टि से आग या अग्रि शब्‍द का महव और भी अधिक है। अग्नि में डलने से कोई भी वस्तु पूरी तरह बदल जाती है। पुराने रूप का अंश भी नहीं बचता। सामूहिक आग वास्तव में सामूहिक योग-ज्वाला का प्रतीक है। जब योगीजन संगठित होकर एक ही संकल्प से ईश्‍वर की स्मृति में टिकते हैं तो उससे जो शक्ति आत्मा को मिलती है उससे पुराने संस्कार दग्ध हो जाते हैं, आत्मा आदि-अनादि रूप को पुनः प्राप्त कर लेती है। अतः अग्रि, परिवर्तन का प्रतीक है। पंजाब में इस त्योहार को 'लोहड़ी' नाम से मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि एक देवी थी जिसका नाम लोहई था। इस देवी ने एक जालिम दैत्य को जलाकर भस्म कर दिया था और लोगों को जलाकर भस्म कर दिया था और लोगों को उस के प्रकोप से बचा लिया था, तभी से लोग इसे 'लोहड़ी' नाम से पुकारते हैं। लोहड़ी शब्‍द का संबंध 'लौ' अर्थात्‌ प्रकाश से अधिक लगता है। ज्ञान प्रकाश फैलने से अज्ञान अंधकार मिट जाता है। कलयुग रूपी रात में ज्ञान की लौ प्रज्वलित कर संसार में फैले अज्ञान अंधकार को समाप्त कर सद्भगुण और ज्ञान के प्रकाश से भरपूर कर देने का प्रतीक है लोहड़ी का त्योहार। आइये, हम सभी इसे खाने, खिलाने भर का त्योहार न मानें बल्कि इसमें समाए आध्यात्मिक रहस्यों को आत्मसात् कर जीवन को महान बनाने का दृढ़ संकल्प लें।

प्रस्तुति :- बीके शिखा

सुंदर मुंदरीए को मिले गए दुल्ला भट्टी

सुंदर मुंदरीए हो, तेरा कौन बेचारा, ओ दुल्ला भट्टी वाला। यह लोहड़ी का लोकप्रिय गीत तो लोहड़ी के त्योहार के आस पास आम सुनाई पड़ता है, लेकिन पिछले कई दशकों से यह गीत केवल एक औपचारिकता मात्र बना हुआ था, क्‍योंकि सुंदर मुंदरियां तो हर वर्ष पैदा होती रहीं, लेकिन उनकी कदर करने वाला दुल्ला भट्‌टी किसी मां की कोख से नहीं जन्मा। किसी ने सच ही कहा कि आखिर बारह वर्ष बाद तो रूढ़ी की भी सुन ली जाती है, यह तो फिर भी कन्याएं हैं, इनकी तो सुनी जानी जायज थी। दुल्ले भट्टी की मृत्यु के दशकों बाद ही सही, लेकिन इन सुंदर मुंदरियों को दुल्ले भट्टी जैसे महान लोग मिलने शुरू हो गए। लड़कों की लोहड़ी, नव विवाहित जोड़ों की लोहड़ी तो पंजाब में हर लोहड़ी के दिन मनाई जाती है, लेकिन दुल्ले भट्टी के बाद लड़कियों की लोहड़ी मनाने का रुझान मर गया, क्‍योंकि लड़कियों को लड़कों से कम आंका जाने लगा, जबकि गुरूओं पीरों ने इनकी कोख से जन्म लिया एवं उन गुरूओं पीरों ने भी औरत को पूजनीय तक बताया, मगर समाज ने समाज को चलाने वाली कन्या को ही भुला दिया। समय ने करवट बदली, आज से करीब चार पांच साल पहले बठिंडा की समाज सेवी संस्था सुरक्षा हेल्पर रजि. बठिंडा के चेयरमैन शाम कुमार शर्मा ने लोहड़ी को एक अलहदा ढंग से मनाने का फैसला लिया, उस फैसले ने लोहड़ी धीयां दी उत्सव को जन्म दिया, और इस संस्था की ओर से हर साल लोहड़ी धीयां दी उत्सव मनाना शुरू क्‍या किया गया कि शहर की आबोहवा बदलने लगी, आज आलम यह है कि लोग लड़कों की लोहड़ी कम व लड़कियों की लोहड़ी सामूहिक तौर पर द्गयादा मनाने लगे हैं। साल 2010, 9 जनवरी को स्थानीय बहमन दीवाना रोड़ स्थित गुडविल पलिक स्कूल के प्रांगण में सुरक्षा हेल्पर, बठिंडा विकास मंच व गुडविल सोसायटी की ओर से एक लोहड़ी धीयां दी पांचवां लोहड़ी उत्सव मनाया गया। इस समारोह में करीब 150 के करीब कन्याओं को उपहार देकर सम्मानित किया गया एवं उनकी सामूहिक लोहड़ी बड़ी हर्षेल्लास के साथ मनाई। यह समारोह तो केवल एक शुरूआत थी, इसके बाद महानगर में अन्य संस्थाओं ने भी लोहड़ी धीयां दी मनाने के लिए बीड़ा उठा लिया। बठिंडा महानगर में एक छोटी सी संस्था के द्वारा शुरू किए इस प्रयत्न ने बहुत जल्द अपना असर दिखाया और लोगों में लड़की के प्रति भी सम्मान पैदा किया। इतना ही नहीं, गत दिवस गांव नथाना में पहुंची सांसद बीबी हरसिमरत कौर बादल ने भी समाज से अपील की कि लड़कियों की लोहड़ी मनाने वाले लोगों को उत्साहित करें एवं वहीं लड़कियों की पहली लोहड़ी मनाने वाले दम्पतियों को सम्मानित किया जाए। श्रीमति बादल की इस अपील से कयास लगाया जा सकता है कि लोहड़ी धीयां दी किस तरह समाज का हिस्सा बनती जा रही है। लड़कियों की लोहड़ी मनाने की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मालवा हेरिटेज फाउंडेशन की ओर से स्थानीय खेल परिसर के समीप स्थित बनावटी गांव जयपालगढ़ में 105 कन्याओं की लोहड़ी बड़ी धूमधाम से मनाई गई। वहीं दूसरी तरह नवयुग स्पोर्ट्स कल्चर एंड वेलफेयर सोसायटी बठिंडा की ओर से 13 जनवरी को जीटी रोड़ स्थित समरहिल कान्वेंट स्कूल में 31 कन्याओं की लोहड़ी मनाई जा रही है। इस तरह के प्रयत्न यहां लड़कियों को समाज में बनता सम्मान दिलाने के लिए कारगार सिद्ध होंगे, वहीं दूसरी तरफ कन्या भ्रूण हत्या व दहेज जैसी सामाजिक बुराईयों को भी खत्म करेंगे। सुरक्षा हेल्पर की ओर से जो कदम कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए उठाया गया था, वह आज सार्थक सिद्ध हो रहा है। ऐसे में सुरक्षा हेल्पर के लिए यह पंक्‍ित कहना कोई गलत बात न होगी कि मैं तो अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग मिलते गए और कारवां बनता गया।

लोहड़ी उत्सव 'लोहड़ी धीयां दी' छोड़ गया अमिट छाप



कन्या भ्रूण हत्या को रोकने का प्रयास था 'लोहड़ी धीयां दी' : शर्मा
बठिंडा । सुरक्षा हैल्पर 'रजि.', बठिंडा विकास मंच, गुडविल सोसायटी बठिंडा ने शहर की अन्य समाज सेवी संस्थाओं के साथ मिलकर लोगों को कन्या भ्रूण के नुक्‍सान प्रति जागरूक करने के लिए गत रविवार को यहां गुडविल पलिक हाई स्कूल परस राम बठिंडा में लोहड़ी धीयां दी नामक लोहड़ी उत्सव का आयोजन किया। यह आयोजन रविवार सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक चला। कार्यक्रम में सुरक्षा हैल्पर के चेयरमैन व टरूथ वे टाइम्स के संपादक शाम कुमार शर्मा व बठिंडा विकास मंच के अध्यक्ष राकेश नरूला ने बताया कि कार्यक्रम में एक वर्ष से कम आयु की सौ के लगभग परिवारों की बच्चियों को तोहफे दिए गए। इस अवसर पर मुख्यातिथि नेशनल अवार्डी अनिल सर्राफ ने कहा कि हम लोग भ्रूण हत्या रोकने की बात तो करते हैं परन्तु उस पर खुद अमल करने से कतराते हैं। अगर सही तरीके से हमें भ्रूण हत्या रोकनी है तो महिलाओं को आगे आना होगा। इसके लिए त्याग की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अगर आज किसी बहन के भाई नहीं तो उसकी शादी में कई रूकावटें पैदा होती हैं ऐसा यों? रूकावटें खड़ी करने वाली भी हमारी माताएं व बहनें ही हैं। यह पाप भी भ्रूण हत्या से कम नहीं। दहेज लेना भी भ्रूण हत्या को बढ़ावा देना है। समाजसेवी पवन सिंगला ने कहा कि अगर हमने भ्रूण हत्या रोकनी है तो कन्यायों को समाज में लड़के से बढ़कर सम्मान देना होगा। उसे शिक्षित करना होगा ताकि शादी के बाद अगर जरूरत पड़े तो वह अपना परिवार चला सके या अपने परिवार को सहारा दे सकें। 

इस मौके पर एक सवाल का जवाब देते हुए टरूथ वे टाइम्स के संपादक व सुरक्षा हेल्पर के चेयरमैन शाम कुमार शर्मा ने बताया कि आज से करीबन पांच साल पूर्व कन्या भ्रूण हत्या होने के कारण पंजाब भर में लिंग अनुपात अंतर बढ़ता जा रहा था, आए दिन अखबारों की सुर्खियों में लिंग अनुपात के अंतर संबंधी खबरें पढ़ने के बाद कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में कदम उठाने का विचार मन में उपजा और इस विचार की उपज थी लोहड़ी धीयां दी। इस समारोह में सेवानिवृत अधीक्षक अभियंता आर सी लूथरा, योग शिक्षक राधे श्याम, बाबा हरी हर, गुडविल के पी के बांसल, इन्द्रजीत गुप्ता, भाविप के प्रो. गुप्ता, प्रिंसीपल एन के गोसांईं, आसरा वेल्फेयर सोसायटी के संस्थापक रमेश मेहता, जसपा के सुरव्श गोयल, भाजपा के नवीन सिंगला एडवोकेट , बठिंडा विकास मंच के नवनीत सिंगला , विनोद गुप्ता , रमेश सरडाना आईसी -स्पाईसी होटल वाले, अशोक कुमार धुन्‍नीके वाले , गुरमीत सिंह सिधू , पूर्व पार्षद विजय शर्मा , स्कूल की प्रिंसीपल शिमला सिंगला , सभ्याचारिक कार्यक्रम प्रभारी श्रीमति राजवीर कौर, स्कूल स्टाफ व अनरू लोग उपस्थित थे। स्कूल के प्रांगण में लोहड़ी डाली गई व आए अतिथियों व परिवारों के लिये जलपान का प्रबंध भी किया गया।