कितने और हैं पैसे और शहीदी ताज?

कुलवंत हैप्पी
कितने शहीदी ताज और मुआवजा देने के लिए पैसे हैं, शायद सरकार के लेखाकार और नीतिकार सोच रहे होंगे? साथ में यह भी सोच रहे होंगे कि बड़ी मुश्किल से हवाई हादसे की ख़बर के कारण जनता का ध्यान बस्तर से हटा था, नक्सलवाद से हटा था। चलो अफजल गुरू को फाँसी भले ही अब तक नहीं दे सके, लेकिन कसाब को फाँसी की सजा सुनाकर जनता की आँख में धूल तो झोंक ही दी, जो आँखें बंद कर जीवन जीने में व्यस्त है। आजकल तो हमारे पास कोई नेता भी नहीं बचा, जो मीडिया में गलत सलत बयानबाजी कर निरंतर हो रहे नक्सली हमलों से मीडिया का और जनता का ध्यान दूर खींच सके। देखो न कितना कुछ है सोचने के लिए सरकार के सलाहकारों के पास। आप सोच रहे होंगे क्या सलाहकार सलाहकार लगा रखी है, बार बार क्यों लिख रहा हूँ सलाहकार। लेकिन क्या करूं, देश के उच्च पदों पर बैठे हुए नेतागण भी फैसला लेने से पहले अपने सलाहकारों
से बात करते हैं, सलाहकार भी नेताओं से चालू हैं, वो भी वहाँ बैठे बैठे ही टेबल स्टोरी जर्नलिस्ट की तरह बैठे बैठे लम्बी चौड़ी स्टोरियों सी सलाहें नेताओं के दे डालते हैं, जो वास्तविकता से कोसों दूर होती हैं।

जनता की आँख में धूल झोंकने के लिए मुआवजा एवं शहीद जैसे सबसे बढ़िया हथियार सरकार के हाथ में हैं। शहीदों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। कहीं सरकार गिनीज बुक में रिकार्ड तो दर्ज नहीं करवाना चाहती कि भारत में सबसे ज्यादा शहीद हैं, अपनी मिट्टी को प्यार करने वाले, देश पर मिटने वाले। आख़र कब तक नेताओं की लापरवाहियों के कारण नवविवाहितें जिन्दा लाश बनती रहेंगी? कब तक माँओं की कोखें उजड़ती रहेंगी? कब तक बूढ़े बाप के सहारे गँवाते रहेंगे? हम सुरक्षा की उम्मीद आख़र किस से कर रहे हैं, जो हमारे बीच आते हुए भी अपने साथ बंदूकधारी लेकर आते हैं। जो आलीशान घरों में उच्चस्तीय सुरक्षा घेरे के बीच सुख की नींद सोते हैं। किसी ने कहा है, सरकारें तब तक ताकतवर हैं, जब तक जनता सोई हुई है।

कारगिल फतेह करने वाला भारत आज अपनी माटी पर क्यों बार बार मुँह की खा रहा है? क्यों नैतिकता के नाम पर अस्तीफे देकर नेता लोग सिस्टम में रहकर सिस्टम को सुधारने जैसे जिम्मेवार काम से भागते हैं? आख़र अब कोई मोमबत्तियाँ जलाकर संसद तक क्यों नहीं आ रहा? मुम्बई हमले की गूँज अगर विदेशों तक पहुंच सकती है, तो क्या नक्सली हमले की गूंज बहरे हो चुके हिन्दुस्तानी आवाम के कानों तक नहीं पहुंच सकती?

कब बोलेंगे सरकार के खिलाफ हल्ला? कब जागेगी भारतीय जनता? कब गली गली से आवाज आएगी हमें इंसाफ चाहिए? आख़र कब समझेगी सरकार जनता की ताकत को? कब करेगी अपनी जिम्मेदारियों का अहसास? तमाम सवालात दिमाग में आ खड़े हो जाते हैं, जब देश में मौत का तांड़व देखता हूँ।

बुजुर्ग की खुशी का रहस्य

मैं कभी नहीं भूल सकता, एक बड़ा सा घर, और वो बुजुर्ग, जो सुबह सुबह मुझे गैलरी में खड़ा मिलता है। मैं उसको देखता हूँ, वो मुझे देखता है। हल्की सी मुस्कान का आदान प्रदान होता है दोनों में, और फिर मैं आगे बढ़ जाता हूँ, बिना कुछ बोले। इस तरह की वार्तालाप कई दिनों तक चलती है हम दोनों में, लेकिन एक दिन होठों की मुस्कान छोटे से बोलते संवाद में बदलती है, और मैं पूछ बैठता हूँ, आपकी खुशी का राज क्या है? मैं जानना चाहता हूँ, दुनिया में मुझे हर शख्स दुखी मिलता है, लेकिन आपका चेहरा देखते ही दुनिया भर के दुखी लोग मेरी आँख से ओझल हो जाते हैं, क्यों?। जवाब में वो बुजुर्ग उंगली का इशारा सामने की ओर करता है, यहाँ पर सरकारी जमीं पर एक झुग्गी बनी हुई है, जिसमें कम से कम पाँच लोग रहते हैं मुर्गे मुर्गियों (कॉक एंड हैनकॉक) के साथ।

हैप्पी अभिनंदन में दीपक "मशाल"


हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, वो शख्सियत अपनी माटी से शारीरिक तौर पर तो दूर है, लेकिन रूह से जुड़ी हुई है। यही जुड़ाव तो है, जो कोंच छोड़ने और बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैंड पहुंचने के बाद भी हिन्दी ब्लॉग जगत के दीपक "दीपक मशाल' को अपने देश एवं अपनी बोली से जोड़े हुए है। इस दीपक के प्रकाश से हम सब हर रोज मसि कागद पर रूबरू होते हैं। आओ जानते हैं कि दीपक से मशाल का रूप ले रहे युवा कवि एवं ब्लॉगर दीपक मशाल से वो क्या कहते हैं, खुद के एवं ब्लॉग जगत के बारे में।

एक खत कुमार जलजला व ब्लॉगरों को

कुमार जलजला को वापिस आना चाहिए, जो विवादों में घिरने के बाद लापता हो गए, सुना है वो दिल्ली भी गए थे, ब्लॉग सम्मेलन में शिरकत करने, लेकिन किसी ढाबे पर दाल रोटी खाकर अपनी काली कार में लेपटॉप समेत वापिस चले गए, वो ब्लॉगर सम्मेलन में भले ही वापिस न जाए, लेकिन ब्लॉगवुड में वापसी करें।

हैप्पी अभिनंदन में इंदुपुरी गोस्वामी

हैप्पी अभिनंदन में आज, आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से रूबरू होने जा रहे हैं, वो पेशे से टीचर, लेकिन शौक से समाज सेविका एवं ब्लॉगर हैं। वो चितौड़गढ़ की रहने वाली हैं, ब्लॉगिंग जगत में आए उनको भले ही थोड़े दिन हुए हैं, लेकिन सार्थक ब्लॉगिंग के चलते बहुत जल्द एक अच्छा नाम बन गई हैं। जी हाँ, आज आप हैप्पी अभिनंदन में कान्हा की दीवानी यानी आज की मीरा एवं मेरी निगाह में दूसरी मदर टरेसा इंदुपुरी गोस्वामी से मिलने जा रहे हैं। आओ जाने, वो क्या कहती हैं ब्लॉग जगत एवं अपने बारे में :-

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग के अलावा आप असल जिन्दगी में क्या करती हैं, और कुछ अपने बारे में बताएं?
इंदुपुरी गोस्वामी :
सरकारी स्कूल में टीचर हूँ। हिंदी और इंग्लिश लिटरेचर में एम.ए. हूँ। बचपन से लिखने का शौक था और पढ़ने का तो इतना कि बहुत जल्दी उसमें डूबना सीख गई थी। दसवी ग्यारहवी कक्षा तक आते आते मैंने साहित्य की प्रसिद्ध रचनाओं के अलावा रूसी, अंग्रेजी, उर्दू, और संस्कृत साहित्य के अलावा खलील जिब्रान को खूब पढ़ चुकी थी।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आपने कदम कब और कैसे रखा?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ब्लॉग की दुनिया में आए बहुत कम समय हुआ है। कब आई ये तो देख कर बताना पड़ेगा। इक्कतीस अगस्त दो हजार नौ तक मुझे कम्यूटर का माऊस भी चलाना नहीं आता था तो ये तो पक्की बात है कि उसके बाद ही आई हूँ। ब्लॉग की दुनिया में आने के लिए कीर्ति जी ने ही मुझे कहा कि आप अपना ब्लॉग बनाइये आप कई लोगों को नेक कामों से जोड़ सकती हैं, उन्हें मोटिवेट कर सकती हैं और लिख भी सकती हैं। और मैं आ गई ब्लॉग की दुनिया में।

कुलवंत हैप्पी : समाज सेवा के क्षेत्र में कैसे आई एवं सेवा करते हुए कैसा महसूस करती हैं?
इंदु गोस्वामी :
लोगों की छोटी मोटी मदद करा करती थी, उसी के चक्कर में दैनिक भास्कर के सम्पादक श्री कीर्ति राणा जी से परिचय हुआ, उन्हीं ने मेरा परिचय उदयपुर, जयपुर, दिल्ली, मुंबई के कई एडिटर्स और दयालु लोगों से मिलाया, जो जरुरतमंदों को मदद करने में मेरा हाथ बंटाते थे। वैसे मैं आज तक मिली उनमें से किसी से भी नहीं। मेरा सारा काम फोन से होता है और लोग मुझ पर यकीन करते हैं, डोनर्स भी। वे न पूछे पर मैं उन्हें एक एक पैसे का हिसाब बताती हूँ. उनकी भी मेहनत का पैसा है भाई। समाज सेवी और मैं? बिलकुल नहीं भैया। सच कहूँ, असली समाज सेवी तो वो होते हैं, जो एक 'एप्पल' किसी गरीब को देते हैं और दस व्यक्ति मिल कर फोटो खिंचवाते हैं, पेपर्स में देते हैं। मैंने तो कहीं कुछ किया तो अगले रोज किसी और नेता, समाजसेवी का फ़ोटो अखबार में उस काम का क्रेडिट लेते हुए देखा एवं पढ़ा।

लगभग बीस साल पहले मेरे पति श्री कमल पुरी गोस्वामी जी यहाँ से जॉब छोड़ कर विदेश चले गये थे। जॉब भी अच्छा था पैसे भी। बच्चे बड़ी क्लासेस में आ गए थे मेरा इंडिया छोड़ना पॉसिबल नहीं था। गवर्नमेंट जॉब था मेरा कैसे जाती? इनके बिना कभी रही नहीं। लोगों की मदद करने की आदत...तो बस अपने आपको इसी में व्यस्त कर लिया। अब घर, बच्चे, मेरी नौकरी और मेरा ये काम.....सुकून मिलने लगा। जीने का एक मकसद सा मिल गया। धीरे धीरे पति, बच्चे और कई ऐसे लोग जुड़ गए जो मेरे लिए फील्ड में काम करने लगे।

जहाँ भी रही, आस पास के बेरोजगार इधर उधर भटकते रहने वाले नौजवान को भी जोड़ लिया, जो मोहल्ले, शहर, आस पास के गांवों के विकास के लिए काम करने लगे। विकलांगों, विधवाओं की पेंशन से लेकर, इंटेलिजेंट बच्चे जो 'डिजर्विंग' थे और आगे पढ़ नहीं पा रहे थे। उनके लिए फीस, ड्रेस, बुक्स सबके खर्च के लिए दानदाताओं से रूपये इक्कठे करना, सामान कलेक्ट करना, पहुँचाना सब काम मेरे ऐसे ही नौजवान करते हैं। हा हा हा.. बहुत सुकून है बाबू इसमें।

लगभग ढाई सौ तीन सौ स्टुडेंट्स को मदद दी जाती है। जानते हो उसमें से कुछ ऑफिसर्स बन चुके हैं। एक विशाल बारेगामा एयर क्राफ्ट मेंटिनेंस का कोर्स करके बेंगलोर में जॉब कर रहा है, रत्न वैष्णव जिंक में ऑफिसर है, जिंक, सीमेंट इंडस्ट्रीज़, टीचिंग में कई बच्चे पहुँच गये। आ कर मिलते है, बताते हैं कि मैं मिलती भी नहीं इन 'डिजर्विंग' बच्चों से। सीधे किसी डोनर को सौंप देती हूँ। 'ये' बच्चा है आप जब तक उनकी पढाई का खर्च उठा सकें. पार्ट टाइम जॉब भी दिलवा देते हैं जिस से खुद कमा कर पढाई कर सके। मदद का मतलब लोगों को निक्कमा बनाना भी नहीं। केंसर पीड़ित कुछ बच्चों के लिए कई लोग आगे आए, इसमें दैनिक भास्कर के सर्कल इंचार्ज राजेश पटेल, यही नाम है शायद। उन्होंने बहुत मदद की।

इसके अलावा मुंबई के नेलेक्तेद चिल्ड्रन को निःसन्तान दम्पत्तियों को गोद दिलवाना भी मेरे जीवन का मकसद है। कई बच्चे बहुत ही अच्छे परिवारों में गए हैं। कई है बाबू मददगार भी और काम भी क्या क्या बताऊँ छोडो, बस लोगों को कहूँगी अपने बच्चों के लिए करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी या मजबूरी पर किसी एक बच्चे को काबिल बनाने में मदद कर दीजिये, बहुत बहुत सुकून मिलेगा। नेत्र-दान, देह-दान करने और मृत्यु भोज न करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करती हूँ, इनकी शुरुआत पहले खुद से फिर अपने परिवार से करने के बाद लोगों को कहती हूँ। नहीं कहती नहीं एक्सामपल रख दिया, लोग फोलो कर रहे हैं। मैं अपने जीवन से बहुत खुश हूँ अपने पापा की लाडली थी और ईश्वर की भी मैं अपने दोनों 'बापों' को शर्मिंदा नहीं होने दूँगी। ऊपर जाते ही गले लगायेंगे मुझे. हम सब 'ऐसा' जी सकते हैं ,हैप्पी।

कुलवंत हैप्पी : श्री कृष्ण भगवान की प्रतिमाएं एवं उनको समर्पित कविताएं बताती हैं आप कृष्ण भगत हैं, क्या कभी उन्होंने कोई करिश्मा दिखाया?
इंदुपुरी गोस्वामी :
मैं क्या बताऊँ? हाँ जीवन मैं ऐसा थोडा बहुत जरूर किया है कि तुम जैसा नन्हा सा दोस्त और वे लोग जो मुझे प्यार करते है वे गर्व कर सकते हैं। मैं नास्तिक नहीं हूँ, पर पूजा पाठ नहीं होता मुझसे। कृष्ण.. नाम न लो उस दुष्ट का। इतना प्यारा दोस्त और प्रियतम है मेरा कि आवाज भी नहीं देती कि ऐसे आ खड़ा होता है, जैसे मुझ पर ही नजर गडाए बैठा रहता है। जासूसी करता है रात दिन मेरी दुष्ट कहीं का। एक बार नहीं बाबू कई बार अलौकिक अनुभव दिए इस अब कहोगे कितनी गालियाँ देती है अपने दोस्त को और जाने कितने सन्गठन खड़े हो जायेंगे 'ऐसा' बोला, पर...जब भी परेशान होती हूँ बुला कर कह देती हूँ 'लल्ला। इस परेशानी को पकड़ तो, सुबह दे देना, अभी सोने दे, और 'वो' शायद मेरे लिए रात भर जागता भी होगा। मेरे आंसू उसकी आँखों से बहते हैं, ये भी मैं जानती हूँ कि विकट से विकट परिस्थिति में जब लगा ये इंसानों के बस की बात नहीं उसमें से उसने यूँ निकाल लिया कि हम आश्चर्यचकित रह गए। हर बार किसी न किस रूप में वो मेरे साथ था कभी, कहीं मिलता है तो उसके गले लग कर खूब रोती हूँ और झगडती हूँ' दुष्ट। तू मेरे आस पास ही मंडराता रहता है क्या? मेरी आँखों में से वो झांकता है, मुझ में सांस लेता है।

बस अगरबत्ती भी नहीं जलाती. नाराज तो होता होगा। पर....उसे बहुत बहुत प्यार करती हूँ दोस्त की तरह, माँ की तरह, प्रेमिका की तरह तो कभी छोटी सी 'छुटकी' बन कर। मत पूछो, वो मेरा क्या है? सशरीर होता तो जाने कितनी अंगुलियां उठ चुकी होती अब तक मुझ पर। हा हा हा.. इश्वर ने एक पत्ता भी व्यर्थ नहीं बनाया। उसकी सर्वश्रष्ठ कृति 'मनुष्य' है। उसे वो यूँ ही थोड़े भेजेगा दुनिया में? नाम, प्रसिद्धि सब समय के साथ मिट जाते हैं, मगर कुछ ऐसा जरूर है करने को सबके लिए जिससे सुकून मिलता है। बस उसी के लिए करें पर ...करें जरूर और दिल की आवाज सुने वो कभी 'मिस गाईड' नहीं करती।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत को आप क्या मानती हैं सोशल नेटवर्किंग या अभिव्यक्ति का प्लेटफार्म?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ब्लॉग की दुनिया सोशल नेटवर्किंग और अभिवक्ति का सबसे प्यारा, खूबसूरत और सशक्त माद्यम है। यहाँ अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं और अच्छे साहित्य की भी। मैंने कई ऐसा लोगों को पढा, जिन्हें कोई नहीं जानता, जिनके ब्लॉग पर दो तीन कमेंट्स भी नहीं पर कमाल लिखा था। जिन्हें पढ़ते हुए कब मेरी आँखों से आंसू बह निकलते थे पता ही नहीं चलता था। अरे बाबा! इसी ब्लॉग ने मुझे पद्म सिंह श्रीनेत जैसा प्यारा बेटा दिया, समीरजी जैसा दादा, ललितजी पाबला भैया जैसे भी, अनामिका जैसी बेटी महेश सिन्हा, मुकेश जी, हेप्पी जैसे छोटे छोटे प्यारे दोस्त दिए और....अपना ई-गुरु जैसा भतीजा दिया।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में होने वाली गुटबाजी पर आप क्या कहना चाहेंगी?
इंदुपुरी गोस्वामी :
बस फालतू की गुटबाजी, विवाद अपने बस की बात नहीं। सब मेरे मैं सबकी। कोई मेरा नही मैं किसी की नहीं। हा हा हा।

कुलवंत हैप्पी : कोई विशेष संदेश देना चाहेंगी?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ईश्वर की शुक्रगुजार हूँ। उसने मुझे जीवन में बहुत अच्छे अच्छे लोगों से मिलाया। जिंदगी से या' उससे' कोई शिकायत नहीं।
 
चक्क दे फट्टे : सुनो शयाम (नेता का प्रेस सचिव), कल एक प्रेस नोट तैयार किया था "आतंकवादियों पर सरकार कारवाई करे'। हाँ जी। फ्यूड से आतंकवादी हटाकर वहाँ नक्सली लिखकर मेरी ओर से रिलीज कर देना।

नो एंट्री, वेलकम और थैंक यू

कुलवंत हैप्पी
आप ने अक्सर देखा होगा कि आप "थैंक्स" कहते हैं तो सामने से जवाब में "वेलकम" सुनाई पड़ता है, मेंशन नॉट तो गायब ही हो गया। ये ऐसे ही हुआ, जैसे अमिताभ के स्टार बनते ही शत्रूघन सिन्हा एवं राजेश खन्ना की स्टार वेल्यू। कभी कभी थैंक्स एवं वेलकम का क्रम बदल भी जाता है, वेलकम पहले और थैंक्स बाद में आता है। शायद फिल्म निर्देशक अनीस बज्मी दूसरे क्रम पर चल रहे हैं, तभी तो उन्होंने पहले कहा, "नो एंट्री", फिर कहा, "वेलकम" और अब कह रहे हैं "थैंक यू"। अनीस के नो एंट्री कहने पर भी हाऊसफुल हो गए थे, और वेलकम कहने पर भी, लेकिन सवाल उठता है कि क्या दर्शक उनके थैंक यू कहने पर वेलकम कहेंगे?

सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि इस बार अक्षय कुमार के साथ उनकी लक्की गर्ल कैटरीना नहीं, और उनका वक्त वैसे भी ख़राब चल रहा है, फिल्म आती है और बिन हाऊसफुल किए चली जाती है, वो बात जुदा है कि अक्षय कुमार ने इससे भी ज्यादा बुरा वक्त देखा है, और वो इस स्थिति को संभाल लेंगे, मगर लगातार दो फिल्म फ्लॉप देने वाली अनिल कपूर की बेटी का कैरियर धर्मेंद्र की बेटी ईशा देओल की तरह लटक सकता है, क्योंकि फिल्मी दुनिया में चढ़ते सूरज को सलाम होता है।

अगर अनीस जी अपने निर्देशन के बल पर फिल्म को हिट करवा गए तो अक्षय की असफल फिल्म यात्रा थम जाएगी, जो चाँदनी चौंक टू चाईना से शुरू हुई है और अभी तक अविराम जारी है। इतना ही नहीं, साँवरिया गर्ल एवं दिल्ली छ: की मसककली का नसीबा खुल जाएगा। नो एंट्री के बाद अनीस बज्मी पर हास्यस्पद फिल्म निर्देशक का ठप्पा लग गया, और सिंह इज किंग ने जहाँ अक्षय कुमार को शिखर पर खड़ा किया, वहीं अनीस बज्मी का हौसला बढ़ाया, जबकि अनीस जी ने अपने कैरियर के शुरूआती दिनों में प्रेम रोग, हलचल, प्यार तो होना ही था जैसी एक्शन, गम्भीर और रोमांटिक फिल्म निर्देशित की। अक्षय कुमार की तरह अनीस को हास्यस्पद फिल्में भी रास आई, और उनको सफल निर्देशकों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया।

जैसे जैसे आप शिखर की तरफ जाते हैं, लोगों की उम्मीद आपसे ज्यादा होने लगती हैं। वो आप से और बेहतर की उम्मीद करते हैं, और वैसे ही जैसे रियालटी शो के जज प्रतिभागियों से करते हैं। रामगोपाल वर्मा एवं संजय लीला भंसाली ने एक से एक बेहतर दी, लेकिन जैसे ही उनकी क्रमश: आग और साँवरिया फ्लॉप हुई, तो उनको आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा, उनकी फिल्में फ्लॉप श्रेणी से निकल सुपर फ्लॉप श्रेणी में पहुंच गई। जब आप शिखर की तरफ जाते हैं, तो आपकी छोटी सी चूक भी बहुत बड़ी हो जाती है, ऐसे में शिखर की तरफ जाते हुए बहुत सावधान रहना पड़ता है। पहाड़ पर चढ़ते हुए, आप जितने नीचे होते हैं, उतना जोखिम कम, और जितना ऊपर पहुंचते हैं उतना जोखिम ज्यादा।

ऐसे में अनीस को चौकसी बरतनी होगी? खासकर तब तो विशेष जब फ्लॉप सितारों के साथ आप फिल्म बना रहें हो, अनीस की थैंक यू में अक्षय कुमार, सोनम कपूर के अलावा बॉबी दिओल भी हैं। सोनम, बॉबी दिओल कॉमेडी सितारे नहीं, स्टार कास्ट देखकर लग रहा है कि वो हास्यरहित फिल्म बनाने का जोख़म उठाने जा रहे हैं, ऐसे में तो और भी ज्यादा गम्भीर रहना होगा। वैसे अब तक के लिए अनीस जी को थैंक यू कहा जा सकता है।

दिलों में नहीं आई दरारें

लेखक : कुलवंत हैप्पी
पिछले कई दिनों से मेरी निगाह में पाकिस्तान से जुड़ी कुछ खबरें आ रही हैं, वैसे भी मुझे अपने पड़ोसी मुल्कों की खबरों से विशेष लगाव है, केवल बम्ब धमाके वाली ख़बरों को छोड़कर। सच कहूँ तो मुझे पड़ोसी देशों से आने वाली खुशखबरें बेहद प्रभावित करती हैं। जब पड़ोसी देशों से जुड़ी किसी खुशख़बर को पढ़ता हूँ तो ऐसा लगता है कि अलग हुए भाई के बच्चों की पाती किसी ने अखबार के मार्फत मुझ तक पहुंचा दी। इन खुशख़बरों ने ऐसा प्रभावित किया कि शुक्रवार की सुबह अचानक लबों पर कुछ पंक्तियाँ आ गई।

दिल्ली से इस्लामाबाद के बीच जो है फासला मिटा दे, मेरे मौला,
नफरत की वादियों में फिर से, मोहब्बत गुल खिला दे, मेरे मौला,

सच कहूँ, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच अगर कोई फासला है तो वो है दिल्ली से इस्लामाबाद के बीच, मतलब राजनीतिक स्तर का फासला, दिलों में तो दूरियाँ आई ही नहीं। रिश्ते वो ही कमजोर पड़ते हैं, यहाँ दिलों में दूरियाँ आ जाएं, लेकिन यहाँ दूरियाँ राजनीतिज्ञों ने बनाई है। साहित्यकारों ने तो दोनों मुल्कों को एक करने के लिए अपनी पूरी जान लगा दी है। अगर दिलों में भी मोहब्बत मर गई होती तो शायद श्री ननकाणा साहिब जाने वाले सिखों का वहाँ गर्मजोशी से स्वागत न होता, गुजरात की सीमा से सटे पाकिस्तान में खण्डहर बन चुके जैन मंदिरों को मुस्लिम अब तक संभाले न होते, शोएब के मन में सानिया का घर न होता, जाहिदा हीना जैसे लेखिका कभी पाकिस्तान की डायरी न लिख पाती और नुसरत फतेह अली खाँ साहिब, साजिया मंजूर, हस्न साहिब दोनों मुल्कों की आवाम के लिए कभी न गाते।

दिल चाहता है कि दोनों मुल्कों की सरकारों में साहित्यकार घूस जाएं, और मिटा दें राजनीतिज्ञों द्वारा जमीं पर खींची लकीर को। एक बार फिर हवा की तरह एवं अमन पसंद परिंदों की तरह सरहद लाँघकर बेरोक टोक कोई लाहौर देखने जाए, और कोई वहाँ से दिल्ली घूमने आए। पंजाब में एक कहावत आम है कि जिसने लाहौर नहीं देखा, वो पैदा ही नहीं हुआ, ऐसा होने से शायद कई लोगों का पैदा होना होना हो जाए। जैन समाज खण्डहर हो रहे अपने बहुत कीमती मंदिरों को फिर से संजीवित कर लें, हिन्दु मुस्लिम का भेद खत्म हो जाए और बाबरी मस्जिद का मलबा पाकिस्तान में बसते हिन्दुओं पर न गिरे। हवाएं कुछ ऐसी चलें कि दोनों तरह अमन की बात हो, वैसे भी पाकिस्तानी आवाम भारत को अपने बड़े भाईयों के रूप में देखती है।

जी हाँ, जब हिन्दुस्तान में महिला आरक्षण बिल पास हुआ था, तो पाकिस्तानी महिलाओं ने अपने हकों के लिए वहाँ आवाज़ बुलंद की, और दुआ की कि भारत की तरह वहाँ भी महिला शक्ति को अस्तित्व में ला जाए। भारत में जब अदालत का फैसला 'गे समुदाय' के हक में आया तो पाकिस्तान में 'गे समुदाय' भी आवाज बुलंद कर उठा, जो कई वर्षों से चोरी चोरी पनप रहा था, किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि भारतीय अदालत का फैसला पाकिस्तान में दुबक कर जीवन जी रहे गे समुदाय में भी जान फूँक जाएगा।

पाकिस्तानी आवाम व हिन्दुस्तानी जनता के दिलों में आज भी एक दूसरे के प्रति मोहब्बत बरकरार है, शायद यही कारण है कि पाकिस्तान में संदेश नामक सप्ताहिक अखबार की शुरूआत हुई, जो सिंध में बसते हिन्दु समाज की समस्याओं को पाकिस्तानी भाषा में उजागर करता है। पाकिस्तानी मीडिया हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों को ज्यादा अहमियत नहीं देता, लेकिन संदेश ने हिन्दु समाज के लिए वो काम किया, जिसकी कल्पना कर पाना मुश्किल है। इतना ही नहीं, पंजाबी बोली को बचाकर रखने के लिए पाकिस्तानी पंजाब में भी कई संस्थाएं सक्रिय हैं।

पाकिस्तान की सीमा से सटे पंजाब में कबूतर पालने का चलन आज भी है। लेकिन कबूतर पालकों की खुशी तब दोगुनी हो जाती है, जब कोई पाकिस्तानी अमन पसंद परिंदा उनकी छत्री पर एकाएक आ बैठता है। उनको वैसा ही महसूस होता है जैसा कि सरहद पार से आए किसी अमन पसंद व्यक्ति को मिलकर। काश! इन परिंदों की तरह मानव के लिए भी सरहदें कोई अहमियत न रखें। लेखक की दिली तमन्ना है कि एक बार फिर से Diwali में अली और Ramjan में राम नजर आएं।

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वरना, रहने दे लिखने को

रचनाकार : कुलवंत हैप्पी

तुम्हें बिकना है,
यहाँ टिकना है,
तो दर्द से दिल लगा ले
दर्द की ज्योत जगा ले
लिख डाल दुनिया का दर्द, बढ़ा चढ़ाकर
रख दे हर हँसती आँख रुलाकर
हर तमाशबीन, दर्द देखने को उतावला है
बात खुशी की करता तू, तू तो बावला है
मुकेश, शिव, राजकपूर हैं देन दर्द की
दर्द है दवा असफलता जैसे मर्ज की
साहित्य भरा दर्द से, यहाँ मकबूल है
बाकी सब तो बस धूल ही धूल है,
संवेदना के समुद्र में डूबना होगा,
गम का माथा तुम्हें चूमना होगा,
बिकेगा तू भी गली बाजार
दर्द है सफलता का हथियार
सच कह रहा हूँ हैप्पी यार
माँ की आँख से आँसू टपका,
शब्दों में बेबस का दर्द दिखा
रक्तरंजित कोई मंजर दिखा
खून से सना खंजर दिखा
दफन है तो उखाड़,
आज कोई पंजर दिखा
प्रेयसी का बिरह दिखा,
होती घरों में पति पत्नि की जिरह दिखा
हँसी का मोल सिर्फ दो आने,
दर्द के लिए मिलेंगे बारह आने
फिर क्यूं करे बहाने,
लिखना है तो लिख दर्द जमाने का
वरना, रहने दे लिखने को

20 साल का संताप, सजा सिर्फ दो साल!

देश का कानून तो कानून, सजा की माँग करने वाले भी अद्भुत हैं। बीस साल का संताप भोगने पर सजा माँगी तो बस सिर्फ दो साल। जी हाँ, हरियाणा के बहु चर्चित रूचिका गिरहोत्रा छेड़छाड़ मामले जिरह खत्म हो चुकी है, और फैसला 20 मई को आना मुकर्रर किया गया है, लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि सीबीआई एवं गिरहोत्रा परिवार ने मामले के मुख्य आरोपी को दोषी पाए जाने पर सजा अधिकतम दो साल माँगी। बीस साल का संताप भोगने के बाद जब इंसाफ मिलने की आशा दिखाई दी तो दोषी के लिए सजा दो साल माँगना, ऊंट के मुँह में जीरे जैसा लगता है।

- कुलवंत हैप्पी
उल्लेखनीय है कि रूचिका के साथ 12 अगस्त, 1990 को तत्कालीन आईजी व लोन टेनिस एसोसिएशन के अध्यक्ष एसपीएस राठौर ने छेड़छाड़ की थी। आज उस बात को दो दशक होने जा रहे हैं। इन दो दशकों में गिरहोत्रा परिवार ने अपनी लॉन टेनिस खिलाड़ी बेटी खोई, अपना सुख चैन गँवाया, गिरहोत्रा परिवार के बेटे ने चोरी के कथित मामलों में अवैध कैद काटी, पुलिस का जुल्म ओ सितम झेला, लेकिन जिसके कारण गिरहोत्रा परिवार को इतना कुछ झेलना पड़ा वो आजाद घूमता रहा बीस साल, अब जब उसके सलाखों के पीछे जाने का वक्त आया तो सजा माँगी गई दो साल।

हो सकता है कि जो धाराएं पूर्व हरियाणा पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौर के खिलाफ लगाई गई हैं, वो इससे ज्यादा सजा दिलाने के योग्य न हो, लेकिन हैरत की बात यह है कि दो साल तक की सजा दिलाने के लिए बीस साल तक संघर्ष करना पड़ा। अगर कोर्ट आरोपी को दोषी मानते हुए उक्त सजा सुना भी देती है तो गिरहोत्रा परिवार के साथ इंसाफ न होगा, क्योंकि गिरहोत्रा परिवार ने बीस साल संताप की सजा सलाखों के बाहर बिना किसी जुर्म के काटी है। हाँ, अगर गिरहोत्रा परिवार ने जुर्म किया तो वो यह है कि उसने एक रसूखदार व्यक्ति के विरुद्ध आवाज उठाई। सवाल तो यह उठता है कि इस केस को कोर्ट तक लाने वाली रुचिका की सहेली, जो विदेश में रहती है, और अपने पति के साथ आरोपी को सजा दिलाने के लिए अपनी जान जोखम में डाल भारत आती रही को क्या राठौर को मिलने वाली कुछ सालों की सजा सुकून मिलेगा?

राठौर को मिलने वाली इतनी कम सजा, किसी के लिए सबक नहीं बन सकती, बल्कि दुस्साहसियों के दुस्साहस को बढ़ाएगी। रसूखदारों ने कानून को कैसे रौंद दिया, इसकी उदाहरण बनेगी। क्या अब फिर उठेगी भारत की जनता राठौर के खिलाफ या फिर चुपचाप होते तमाशे का आनंद उठाएगी?

ब्लॉगी पत्रकारिता पीत पत्रकारिता?

नेट पर पीत पत्रकारिता
ब्लॉग जगत को आए दिन प्रिंट मीडिया के धुरंधर निशाना बनाते हैं। कागजों को काला करते हैं। क्या सच में ब्लॉग जगत के भीतर पीत पत्रकारिता होती है? जहाँ लिखने की आजादी हो, यहाँ लिखने वाला खुद संपादक हो? वहाँ ऐसी बात लागू होती है क्या? हो सकता है कि कुछ व्यक्ति विशेष ऐसा कर रहे हैं, लेकिन क्या पूरे ब्लॉग जगत पर पीत पत्रकारिता का ठप्पा लगाना सही है? आखिर क्यों बार बार ब्लॉग जगत को निशाना बनाया जा रहा है? ब्लॉग जगत को बार बार निशाना बनाया जाना, प्रिंट मीडिया के धुरंधरों की हड़बड़ाहट को झलकता है। ब्लॉगर साथियों में इस विषय पर कुछ भी लिखना नहीं चाहता था, लेकिन रहा न गया। आखिर आप ही बताएं क्या? ब्लॉग जगत में केवल पेज थ्री का मेटर आता है? क्या यहाँ अच्छी कहानियाँ, कविताएं, अद्भुत लेख प्रकाशित नहीं होते? क्या यहाँ छापने वाले व्यंग अखबारों में जगह नहीं बनाते? अगर हाँ तो फिर ब्लॉग को क्यों बार बार ऐसे मजाक बनाकर पेश किया जा रहा है। या तो फोकी शोहरत के लिए चाँद पर थूका जा रहा है। आपका सोचते हैं, अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज करवाएं।

हैप्पी अभिनंदन में शिवम मिश्रा

ब्लॉग ने पूरे हिन्दुस्तान को एक मंच पर ला खड़ा किया है, ब्लॉगिंग के बहाने हमको देश के कोने कोने का हाल जानने को मिल जाता है। देश का कितना बड़ा भी न्यूज पेपर हो, लेकिन आज वो ब्लॉग जगत के मुकाबले बहुत छोटा है। अखबार गली कूचों में बांट कर रह गया है, कारोबार ने उसकी सीमाएं बहुत छोटी कर दी। अखबार का दायरा जितना छोटा हुआ है, ब्लॉग जगत का दायरा उतना ही बड़ा हुआ है। जम्मू कश्मीर से मदरास तक और असम से गुजरात तक ही नहीं बल्कि हिन्दी ब्लॉगिंग का नेटवर्क तो सरहद पार विदेशों तक फैला हुआ है। इस नेटवर्क को एक एक ब्लॉगर ने बनाया है, ब्लॉग नेटवर्क एक माला की तरह है, जो एक एक मोती से बनती है। इस ब्लॉग रूपी माला में बहुत से मोती हैं, उन्हीं मोतियों में से एक मोती शिवम मिश्रा के साथ आज हैप्पी अभिनंदन में आप सबको रूबरू करवाने जा रहा हूँ, जो उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले से बुरा भला एवं जागो सोने वालों ब्लॉग को संचालित करते हैं। आओ आगे पढ़ें, कुलवंत हैप्पी  के सवाल और शिवम मिश्रा के जवाब।

कुलवंत हैप्पी : सबसे पहले जानना चाहेंगे कि आपकी जन्मस्थली कौन सी है और आपका जन्म कब हुआ?
शिवम मिश्रा : मेरा जन्म 15 मई, 1977 कों कोलकत्ता में हुआ। मैं 1997 तक कोलकत्ता में ही रहा और अपनी 12वीं तक की पढाई वहाँ की। इसे साल हम लोग मैनपुरी आ बसे यहाँ हमारी पुश्तैनी जमीन और मकान है।

कुलवंत हैप्पी : मिश्रा जी आपने ब्लॉग जगत में कब और कैसे आए?
शिवम मिश्रा : ब्लॉग जगत में मेरे खास दोस्त हिर्देश सिंह के प्रोत्साहन से आया। हिर्देश मैनपुरी एक जाने माने युवा पत्रकार है और अपना एक न्यूज़ चैनल चलाते हैं- सत्यम न्यूज़ के नाम से। मैंने अपनी पहली पोस्ट 31/03/2009 को लिखी थी। ब्लॉग जगत में आने का प्रमुख्य कारण यही था कि अपने मन की भावनायों को सब तक पहुंचाऊं अपने शब्दों में।

कुलवंत हैप्पी : आप ने बीच में ब्लॉगिंग से दूरी बना ली थी, कोई विशेष कारण?
शिवम मिश्रा : जी हाँ बीच में ब्लॉग जगत से दूर था, इस का केवल यही कारण था कि मेरे internet service provider द्वारा ब्लॉगर.कॉम तक मेरी पहुच बंद कर दी गई थी किसी तकनीकी कारण की वजह से वैसे अब जब लौटा हूँ तो आप जैसे मित्रों से पता चला है कि उन दिनों ब्लॉग जगत में काफी घमासान हुआ तो सोचता हूँ अच्छा ही हुआ कि दूर था।
 
कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आपका अब तक का सफर कैसा रहा?
शिवम मिश्रा : अब तक का ब्लॉग जगत का सफ़र तो काफी बढ़िया रहा आगे खुदा मालिक।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग के अलावा असल जिन्दगी में आजीविका के लिए क्या करते हैं आप?
शिवम मिश्रा : असल जीवन में ब्लॉगिंग के आलावा मैं एक investment consultant के रूप में कार्य कर रहा हूँ ख़ासकर बीमा क्षेत्र में।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा लम्हा जिसने कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया हो, और हमारे साथ बाँटना चाहते हों?
शिवम मिश्रा : देखिए अलग तो हम सब ही करना चाहते हैं पर सब से बहेतर यह होता है कि हम जो कर सकते है उसको ही और बहेतर तरीके से करे। मेरा तो मानना यही है।

चक्क दे फट्टे : शिवम : गधा मिठाई को देखकर क्या सोचता होगा? यार, हैप्पी : काश! यह मिठाई घास होती।

आज भी हीर कहाँ खड़ी है?

कुलवंत हैप्पी
समय कितना आगे निकल आया, जहाँ साइंस मंगल ग्रह पर पानी मिलने का दावा कर रही, जहाँ फिल्म का बज़ट करोड़ों की सीमाओं का पार कर रहा है, जहाँ लोहा (विमान) आसमाँ को छूकर गुजर रहा है, लेकिन फिर भी हीर कहाँ खड़ी है? रांझे की हीर। समाज आज भी हीर की मुहब्बत को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। भले ही हीर के पैदा होने पर मातम अब जश्नों में तब्दील होने लगा है, लेकिन उसके ख़ाब देखने पर आज भी समाज को एतराज है। जी हाँ, बात कर रहा हूँ निरुपमा पाठक। जिसको अपनी जान से केवल इसलिए हाथ धोना पड़ा, क्योंकि उसने आज के आधुनिक जमाने में भी हीर वाली गलती कर डाली थी, एक लड़के से प्यार करने की, खुद के लिए खुद जीवन साथी चुनने की, शायद उसको लगा था कि डीडीएल की सिमरन की तरह उसके माँ बाप भी अंत में कह ही डालेंगे जाओ जाओ खुश रहो..लेकिन ऐसा न हुआ निरुपमा के साथ।

वारिस शाह की हीर ने अपने घर में भैंसों गायों को संभालने वाले रांझे से मुहब्बत कर ली थी, जो तख्त हजारा छोड़कर उसके गाँव सयाल आ गया था। दोनों की मुहब्बत चौदह साल तक जमाने की निगाह से दूर रही, लेकिन जैसे ही मुहब्बत बेपर्दा हुई कि हीर के माँ बाप ने उसकी शादी रंगपुर खेड़े कर दी। कहते हैं कि एक दिन रांझा खैर माँगते माँगते उसके द्वार पहुंच गया था, रांझे ने हीर के विवाह के बाद जोग ले लिया था। फिर से हुए मिलन के बाद हीर रांझा भाग गए थे और आखिर में हीर रांझे ने जहर खाकर जिन्दगी को अलविदा कह मौत को गले लगा लिया था। समाज भले ही कितना भी खुद में बदलाव का दावा करे, लेकिन सच तो यह है कि हीर आज भी इश्क के लिए जिन्दगी खो रही है। सुर्खियाँ तैयार करने वाली निरुपमा तो सुर्खियों में आ गई, लेकिन कितनी ही हीरें हैं जो सुर्खियों से दूर अतीत की परतों में दफन होकर रह जाती हैं।

मुझे याद है, वो कृष्णा गली, जिससे मैं रोज़ गुजरता था, ऑफिस जाते हुए और घर आते हुए। वहाँ एक लड़की रहा करती थी, जिसकी उम्र उस समय बड़ी मुश्किल से सोलह साल के आसपास होगी। काफी सुंदर थी, उसके चाँद से चेहरे पर कोई दाग नहीं था, शायद तब तो उसके किरदार पर भी कोई धबा न होगा। फिर मैंने वो गली छोड़ दी, गली ही नहीं शहर भी छोड़ दिया। लेकिन जब कुछ समय बाद मैं अपने शहर लौटा और उस गली से गुजरा वो चेहरा वहाँ न था। उसकी गली से दो तीन दफा गुजरा, लेकिन वो चेहरा नजर नहीं आया, बाकी सब चेहरे नजर आए।

किसी ने कहा है कि जिसकी हमें तलाश होती है, हवाएं भी उसकी ख़बर हम तक ले आती हैं। ऐसे हुआ इस बार भी। मैं घर में बैठा था, और पास में महिलाएं बैठी बातें कर रही थी, महिलाएं चुप बैठ जाएं होना मुश्किल है। बातों से बात निकल आई कि उस गली में से एक लड़की ने कुछ पहले आत्महत्या कर ली, एक लड़के के साथ मिलकर। उनके मुँह से निकली इस बात ने मुझे जोर का झटका बहुत धीरे से दिया।

मैंने सोचा उसकी गली में बहुत सी लड़की हैं, वो तो अभी बहुत छोटी है, और उसका परिवार भी तो रूढ़िवादी सोच का नहीं हो सकता, लेकिन उनकी बातों से जो संकेत मिल रहे थे, बार बार उसकी तरफ इशारा किए जा रहे थे, जिसकी तस्वीर मेरे जेहन में थी। उसके साथ कोई रिश्ता भी नहीं, और बनाने की तमन्ना भी न थी, बस आसमान के चाँद की तरह उसको देखकर खुश हो लेना ही मेरे लिए काफी था। मैंने आस पास से जानकारी हासिल की तो पता चला कि उसने मेरे ही पड़ोस में रहने वाले लड़के के साथ नहर में कूदकर जान दे दी, उनकी मुहब्बत ट्यूशन में साथ पढ़ते-पढ़ते शुरू हुई, और नहर में डूबकर जान देने पर मुकम्मल।

एक और किस्सा याद आ रहा है, एक मित्र का, वो भी प्रियभांशु की तरह पत्रकार था, उसको भी किसी से प्यार था। कई सालों तक मुहब्बत पलती रही, एक दिन चोरी छिपे शादी भी हो गई, लेकिन लड़की के घरवालों को भनक लग गई, उन्होंने प्यार से लड़की को घर बुलाया और उसके बाद उसको ऐसा हिप्नोटाईज किया कि पत्रकार पर बलात्कार, बहकाकर शादी करने जैसे मुकद्दमे दायरे होने की नौबत आ गई, लेकिन पत्रकारिता के कारण बने रसूख ने उसको बचा लिया, और हीर दूसरे घर का श्रृंगार बनकर चली गई।

आखिर कब तक हीर ऐसे रांझे का दामन छोड़ दूसरे घर का श्रृंगार बनती रहेगी? आखिर कब तक हीर को मौत यूँ ही गले लगाती रहेगी? हीर को कब दुनिया खुद का जीवनसाथी चुनने के लिए आजादी देगी? कब सुनी जाएगी खुदा की दरगाह में इनकी अपील? कब मिलेगी इनको आजादी से हँसने और रोने की आजादी?

माँ दिवस पर "युवा सोच युवा खयालात" का विशेषांक

अगर आसमाँ कागद बन जाए, और समुद्र का पानी स्याही, तो भी माँ की ममता का वर्णन पूरा न लिख होगा, लेकिन फिर शायरों एवं कवियों ने समय समय पर माँ की शान में जितना हो सका, उतना लिखा। शायरों और कवियों ने ही नहीं महात्माओं, ऋषियों व अवतारों ने भी माँ को भगवान से ऊंचा दर्जा दिया है। आज माँ दिवस है, ऐसे शुभ अवसर पर विश्व की हर माँ को तहेदिल से इस दिवस की शुभकामनाएं देते एवं उनके चरण स्पर्श करते हुए उनकी शान में कवियों शायरों द्वारा लिखी रचनाओं से भरा एक पन्ना उनको समर्पित करता हूँ, एक छोटे से तोहफे के तौर पर।


खट्टी चटनी जैसी माँ।-निदा फाज़ली
बेसन की सौंधी रोटी पर,
खट्टी चटनी जैसी माँ।
याद आती है चौका बासन,
चिमटा फूँकनी जैसी माँ।
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर,
हर आहट पर कान धरे। आगे पढ़ें

चार दीवार-इक देहरी माँ - सुधीर आज़ाद
चार दीवार-इक देहरी माँ
इक उलझी हुई पहेली माँ।
सारे रिश्ते उस पर रक्खे,
क्या क्या ढोए अकेली माँ।
सर्द रातों का ठंडा पानी,
जून की दोपहरी माँ। आगे पढ़ें 

आलोक श्रीवास्तव की रचना-अम्मा
धूप हुई तो आंचल बन कर कोने-कोने छाई अम्मा,
सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन तनहाई अम्मा।
सारे रिश्ते- जेठ दोपहरी, गर्म-हवा, आतिश, अंगारे,
झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा।

सोनू उपाध्याय की रचना - माँ
तुम्‍हारी पहनी हुई इच्‍छाओं को माँ अक्‍सर तकता हूं
कांच में और नापता रहता हूं समय,
कि कितना शेष है मुझमें तेरे साथ।
वैसे समय के जिस्‍म में काफी बदलाव आएं हैं माँ
अक्‍सर छोटा और तंग पड़ जाता है माँ
अभी परसों ही तो दोपहर बनकर रिस गया था आंखों से.आगे पढ़ें


माँ याद आई व बरसात : समीर लाल "समीर"
आज फिर रोज की तरह
माँ याद आई!!
माँ
सिर्फ मेरी माँ नहीं थी
माँ
मेरे भाई की भी
मॉ थी
और भाई की बिटिया की
बूढ़ी दादी..
और

कैसे कहूँ कि माँ तेरी याद नहीं आती
चोट मुझे लगती, रक्त तेरी की आँख से बहता था
मेरे घर आने तक, साँस गले में अटका रहता था
कैसे कहूँ कि माँ तेरी याद नहीं आती
कैसे कहूँ कि माँ तेरी याद नहीं रुलाती

माँ, एक पवित्र नाम है : विनोद कुमार पाण्डेय
माँ, ममता का असीम स्रोत है
माँ, नश्वर जीवन की, अखंड ज्योत है
माँ, एक पवित्र नाम है,
माँ, के बिना जिन्दगी गुमनाम है।

हे माँ तेरी शान में
स्कूल से आते जब देरी हो जाती थी।
चिंता में आंखें नम तेरी हो जाती थी।
मेरी देरी पर घर में सबसे अधिक
माँ तू ही तो कुरलाती थी।
गलती पर जब भी डाँटते पिताश्री
तुम ही तो माँ बचाती थी।


पिता जी की ''अंतिम नसीहत ''
आपस में तुम अपने प्यार ,एकता ,हार हाल रखना '
बस तुम सब मिलकर 'अपनी माँ का ख्याल रखना '

तब, माँ, तेरी याद आती है : इंद्रानील भट्टाचार्यजी
जब संकट सामने होता है
जब झंझाबात घिर आता है
जब चारों ओर अंधेरा हो
तब, माँ, तेरी याद आती है

माँ : दीपक मशाल
आज भी तेरी बेबसी
मेरी आँखों में घूमती है
तेरे अपने अरमानों की ख़ुदकुशी
मेरी आँखों में घूमती है..
तूने भेदे सारे चक्रव्यूह
कौन्तेयपुत्र से अधिक
जबकि नहीं जानती थी
निकलना बाहर
या शायद जानती थी
पर नहीं निकली हमारी खातिर
अपनी नहीं अपनों की खातिर

लिखने कुछ और बैठा था...लिख बैठा माँ के बारे में।
गाँव के कच्चे रास्तों से निकलकर शहर की चमचमाती सड़कों पर आ पहुंचा हूँ। इस दौरान काफी कुछ छूटा है, लेकिन एक लत नहीं छूटी, फकीरों की तरह अपनी ही मस्ती में गाने की, हाँ स्टेज से मुझे डर लगता है। गाँवों की गलियाँ, खेतों की मिट्टी, खेतों को गाँवों से जोड़ते कच्चे रास्ते आज भी मुझे मेरी इस आदत से पहचान लेंगे, भले ही यहाँ तक आते आते मेरे रूप रंग, नैन नक्श में काफी बदलाव आ गए हैं। आगे पढ़ें

हैप्पी अभिनंदन में यशवंत महेता "फकीरा"

क्षमा चाहता हूँ, पिछले मंगलवार को मैं आपके सामने किसी भी ब्लॉगर हस्ती को पेश नहीं कर पाया। समय नहीं था कहना तो केवल बहाना होगा, इसलिए खेद ही प्रकट करता हूँ।


हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, उनको अनुभवी जनों और बुद्धिजीवियो का साथ, चाय पीना, खेतों की हरियाली, बच्चन की मधुशाला को बार-बार पढना, बच्चों से बातें करना और बच्चों के संग बच्चा बन जाना बेहद अच्छा लगता है। इंदौर से दिल्ली तक का सफर तय करने वाली इस ब्लॉगर हस्ती को हम सब युग क्रांति ब्लॉग पर यशवंत महेता 'फकीरा' के नाम से पढ़ते हैं। जी हाँ, इस बार हमारे साथ यशवंत महेता फकीरा हैं, जिनके विचारों के धागों से बुनी हुई कविताएं रूपी चादरें फकीरा का कोना ब्लॉग पर भी सजी हुई हैं। आओ जानते हैं ब्लॉग जगत और खुद के बारे में यशवंत महेता "फकीरा" क्या कहते हैं?

कुलवंत हैप्पी : आप यशवंत महेता से फकीरा कैसे बने?
फकीरा : यह तो बहुत ही खतरनाक सवाल है। बस एक दिन किसी से प्यार हो गया था। उसके दर पर गए जब तो उसने फकीरा बोल दिया और उस दिन से यशवंत महेता फकीरा बन गया।

कुलवंत हैप्पी : आपकी जन्मस्थली कौन सी है और कर्मस्थली कौन सी है?
फकीरा : मेरी जन्मस्थली मध्यप्रदेश की आर्थिक राज्यधानी इंदौर और कर्मस्थली देश की राज्यधानी दिल्ली है।

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉग जगत में कब और कैसे आए ?
फकीरा : मैं ब्लॉग जगत में 17 जुलाई 2009 को आया, मेरे पहले ब्लॉग का नाम था 'फकीरा का कोना', जिसको बहुत कम लोग जानते हैं, क्योंकि मैंने उसको किसी भी ब्लॉग एग्रीगेटर के साथ नहीं जोड़ा।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आकर कैसा लग रहा है?
फकीरा : अच्छा लगता है। जब लोग पढ़ते हैं और टिप्पणी करते हैं तो और भी अच्छा लगता है। मैं भी सबको पढ़ता हूँ, लेकिन टिप्पणियाँ थोड़ी कम करता हूँ। फिर भी सारे अच्छे ब्लॉगों पर आना जाना लगा रहता है।

कुलवंत हैप्पी : आपकी नजर में ब्लॉग सोशल नेटवर्किंग है या अभिव्यक्ति का उच्चस्तीय प्लेटफार्म?
फकीरा : देखिए, मैं ब्लॉगिंग को दोनों के बीच में रखूँगा, यह अभिव्यक्ति का प्लेटफॉर्म है, जो अभी उभर रहा है, जिसकी असली ताकत का अंदाजा अभी होना बाकी है। इसको सोशल नेटवर्किंग इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यहाँ नए नए मित्र मिलते हैं, सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों की तरह।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा किस्सा जो कुछ हटकर कुछ करने के लिए प्रेरित करता हो?
फकीरा : संघर्ष करने वाले लोग मुझे बेहद प्रिय हैं, जो निराशा की गर्त से भी हीरा निकालकर ले आते हैं। एक किस्सा याद आ रहा है। एक कौए का। हमारे यहाँ दिल्ली में कौए बहुत हैं। अक्सर वो रोटी के टुकड़े उठाकर ले जाते हैं। एक दिन एक कौआ एक बहुत बड़ा रोटी का टुकड़ा उठाकर ले आया। रोटी का टुकड़ा बहुत बड़ा था। यूँ तो अक्सर कौए काँ काँ कर रोटी के टुकड़े गिरा देते हैं, पर उस कौए ने जिस समझदारी से उस टुकड़े को दो भागों में बाँटकर अपने दोनों पंजों के नीचे रखा और रोटी का आनंद लिया, असल में देखने लायक था। वैसे तो किस्से काफी हैं, लेकिन उक्त किस्सा पिछले दिनों घटित हुआ।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगर साथियों और युवा सोच युवा खयालात के पाठकों के लिए कोई विशेष सुझाव?
फकीरा : खूब पढ़िए, कम लीखिए और लाजवाब लिखिए, इसके अलावा अच्छे ब्लॉगों का अनुसरण करें। युवा सोच युवा खयालात से समाज और देश का भला कीजिए, चाहे उम्र जो भी हो सोच को हमेशा युवा रखिए। बस इतना ही कहना चाहूँगा।

चक्क दे फट्टे :  एक प्रोग्राम में फकीरा साहिब आटोग्राफ देते देते थक गए, ऐसे में उन्होंने एक बच्चे को आटोग्राफ देते हुए किसी जानवर का रेखाचित्र बना डाला। फकीरा का ऐसा आटोग्राफ देखकर बच्चा तुरंत बोला, सर आपका आटोग्राफ चाहिए, फोटोग्राफ नहीं।

लफ्जों की धूल-6

लेखक कुलवंत हैप्पी
(1)
जिन्दगी सफर है दोस्तो, रेस नहीं,
रिश्ता मुश्किल टिके, अगर बेस नहीं,
वो दिल ही क्या हैप्पी जहाँ ग्रेस नहीं,

(2)
कभी नहीं किया नाराज जमाने को,
फिर भी मुझसे एतराज जमाने को,
जब भी भटकेगा रास्ते से हैप्पी,
मैं ही दूँगा आवाज जमाने को

(3)
क्या रिश्ता है उस और मुझ में
जो दूर से रूठकर दिखाता है
मेरे चेहरे पर हँसी लाने के लिए
वो बेवजह भी मुस्कराता है
चेहरे तो और भी हैं हैप्पी,
मगर ध्यान उसी पर क्यों जाता है

(4)
कभी कभी श्रृंगार, कभी कभी सादगी भी अच्छी है
कभी मान देना, तो कभी नजरंदाजगी भी अच्छी है
जैसे हर रिश्ते में थोड़ी थोड़ी नाराजगी भी अच्छी है

(5)
जरूरी नहीं कि मेरे हर ख़त का जवाब आए
वो किताब ले जाए, और उसमें गुलाब आए
बस तमन्ना इतनी सी है हैप्पी
रुखस्त हूँ जब मैं, उस आँख में आब आए
*आब-पानी

(6)
हाथ मिलाते हैं हैप्पी रुतबा देखकर,
दिल मिलाने की रिवायत नहीं तेरे शहर में
इसलिए खुदा की इनायत नहीं तेरे शहर में
*रिवायत-रिवाज