इससे बड़ी दुर्घटना क्या होगी?


लेखक कुलवंत हैप्पी
जिन्दगी सफर थी, लेकिन लालसाओं ने इसको रेस बनाकर रख दिया। जब सफर रेस बनता है तो रास्ते में आने वाली सुंदर वस्तुओं का हम कभी लुत्फ नहीं उठा पाते, और जब हम दौड़ते दौड़ते थक जाते हैं अथवा एक मुकाम पर पहुंचकर पीछे मुड़कर देखते हैं तो बहुत कुछ छूटा हुआ नजर आता है। उसको देखकर हम फिर पछताने लगते हैं, और हमें हमारी जीत भी अधूरी सी लगती है। अगर जिन्दगी को सफर की तरह लेते और रफतार धीमे रखते तो शायद मंजिल तक पहुंचने में देर होती, लेकिन दुर्घटना न होती। उससे बड़ी दुर्घटना क्या होगी, रूह का दमन हो जाए, और हड्डियों का साँचा बचा रह जाए। जिन्दगी जैसे खूबसूरत सफर को हम दौड़ बनाकर रूह का दमन ही तो करते हैं, जिसका अहसास हमको बहुत देर बाद होता है। जो इस अहसास को देर होने से पहले महसूस कर लेते हैं, वो इस सफर के पूर्ण होने पर खुशी से भरे हुए होते हैं, उनके मन में अतीत के लिए कोई पछतावा नहीं होता।

पिछले दिनों बीबीसी की हिन्दी वेबसाईट पर रेणु अगाल का भूटान डायरी सिरलेख से लिखा एक लेख पढ़कर इसलिए अच्छा लगा क्योंकि उन्होंने अपने लेख के मार्फत दुनिया के विकासशील देशों को आईना दिखाने की कोशिश की, जो आर्थिक मजबूती की होड़ में अपने असली धन (प्रकृति) को बर्बाद किए जा रहे हैं।

बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल लिखती हैं कि दक्षिण एशिया के ज़्यादातर देशों में अभी तापमान ने कीर्तिमान खड़ा कर रखा है, ऐसे में पहाड़ों से घिरे खुशनुमा मौसम का लुत्फ़ ही अलग है, और भूटान के माहौल का मज़ा सभी अतिथि उठाते दिख रहे है। यहाँ अपने पारंपरिक कपड़ों, पुराने डिजाइन की लकड़ी पर साज सज्जा कर बनाए मकान सभी सहेज के रखे गए हैं। यहाँ तक की सरकार अपनी देश की पहचान बनाए रखने और अपने संस्कृति को बचाने के लिए ज्यादा पर्यटकों को भी नहीं आने देती। हर सैलानी को दो सौ डॉलर रोज़ देने पड़ते है यानि दुनिया का सबसे महंगा पर्यटक स्थल आप भूटान को कह सकते है। यहाँ तक की पड़ोसी नेपाल से आने वाले लोगों को भी यहाँ ज्यादा पसंद नहीं किया जाता, पर भारतीयों को न तो यहाँ डॉलर देने पड़ते है और न ही उन्हें वैमनस्य से लोग देखते है।

थोड़े की ज़रूरत है...

यहाँ की सरकार का फ़लसफा थोड़ा अलग है. थोड़ा है, थोडे की ज़रूरत है और थोड़ा ही काफ़ी है। भूटान सरकार सीमित संख्या में पर्यटकों को आने देती है। सोच के देखिए कि अगर आपका नज़रिया ऐसा हो जाए तो न आप पैसे के पीछे भागेंगे, न आप जीवन की दौड़ में किसी को मात देने में व्यस्त होंगे। आप कमाएँगे और मौज करेंगे। न ब्लड प्रेशर, न दिल का दौरा, बस होठों पर मुस्कान और गुलाबी गाल। ऐसे जीवन का मजा लेने के लिए ही सही आप भूटान आ सकते हैं और अगर नहीं तो अगली बार जिन्दगी की मार धाड़ में जुटने के पहले सोचिएगा क्या वाकई यह सब जरूरी है।

चर्चा विराम का नुस्खा : अधजल गगरी छलकत जाय

लेखक कुलवंत हैप्पी 


यह कहावत तब बहुत काम लगती है, जब खुद को ज्ञानी और दूसरे को मूर्ख साबित करना चाहते हों। अगर आप चर्चा करते हुए थक जाएं तो इस कहावत को बोलकर चर्चा समाप्त भी कर सकते हैं मेरी मकान मालकिन की तरह। जी हाँ, मेरी जब जब भी मेरी मकान मालकिन के साथ किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो वे अक्सर इस कहावत को बोलकर चर्चा को विराम दे देती है। इसलिए अक्सर मैं भी चर्चा से बचता हूँ, खासकर उसके साथ तो चर्चा करने से, क्योंकि वो चर्चा को बहस बना देती है, और आखिर में उक्त कहावत का इस्तेमाल कर चर्चा को समाप्त करने पर मजबूर कर देती है। मुझे लगता है कि चर्चा और बहस में उतना ही फर्क है, जितना जल और पानी में या फिर आईस और स्नो में।

कभी किसी ने सोचा है कि सामने वाला अधजल गगरी है, हम कैसे फैसला कर सकते हैं? क्या पता हम ही अधजल गगरी हों? मुझे तो अधजल गगरी में भी कोई बुराई नजर नहीं आती। कुछ लोगों की फिदरत होती है, हमेशा सिक्के के एक पहलू को देखने की। कभी किसी ने विचार किया है कि अधजल गगरी छलकती है तो सारा दोष उसका नहीं होता, कुछ दोष तो हमारे चलने में भी होगा। मुझे याद है, जब खेतों में पानी वाला घड़ा उठाते थे, तो वहाँ भरा हुआ भी छलकता था, और अध भरा  भी छलकता था, क्योंकि खेतों में जमीं समतल नहीं होती, जब जमीं समतल नहीं होगी, तो हमारे पाँव भी सही से जमीं पर नहीं टिक पाएंगे।

अधजल गगरी से याद आया, हमारे गाँव में लाजो-ताजो नामक दो बहनें रहती थी, वो पानी भरने के लिए गाँव से बाहर कुएं पर जाती थी, दूसरी महिलाओं की तरह। तब तो गाँव के रास्ते भी कच्चे थे, स्वाभिक था ऐसे में पाँव पर मिट्टी का पाऊडर लगना। ताजो का घड़ा बिल्कुल नया था, जबकि लाजो के घड़े के ऊपर वाले हिस्से में छोटा सा सुराख था, इसलिए वो हमेशा अपने घड़े को अधभरा रखती। जब वो घड़ा लेकर चलती तो पानी घड़े के भीतर छलकता, ऐसे में कुछ पानी जमीं पर गिर जाता और कुछ उसके जिस्म पर, जो उसके जिस्म को ठंड पहुंचाता। ताजो का घड़ा, लाजो के सुराख वाले घड़े को देखकर अक्सर सोचता, एक तो मुझसे आधा पानी लाता है, ऊपर से लाजो को भिगोता है, फिर भी मुझसे ज्यादा लाजो इसकी तरफ ज्यादा ध्यान देती है। कुछ समय बाद सुराख वाला घड़ा टूट गया, उसके टूटने पर लाजो को वैसा ही सदमा पहुंचा, जैसा किसी अपने के चले जाने पर पहुंचता है। रोती हुई लाजो को दूसरे घड़े ने सवाल किया कि तुम इसके लिए क्यों रो रही हो, ये घड़ा तो अक्सर तुम्हें भिगोता था, और पानी भी मुझसे आधा लाता था। तो लाजो ने कहा, "तुम्हें याद है, जब तुम हमारे घर नए नए आए थे"। घड़ा बोला," हाँ, मुझे याद है"। लाजो ने कहा, "तुमने देखा था तब उस रास्ते को जहाँ से हम रोज गुजरते हैं'। घड़ा ने कहा, 'हाँ', तब वो बिल्कुल घास रहित था"। घास रहित शब्द सुनते ही लाजो ने कहा, "अगर उस रास्ते पर घास उग आई है, तो सिर्फ और सिर्फ इस सुराख वाले घड़े के कारण, अगर ये घड़ा छलकता न, तो कभी भी उस रास्ते पर आज सी हरियाली न आती"। इतना सुनते ही दूसरा घड़ा चुप हो गया।

जरूरी नहीं कि श्री गुरू ग्रंथ साहिब, बाईबल, गीता और कुरान का तोता रटन करने वाला ज्ञानी हो, ऐसा भी तो हो सकता है कि कोई व्यक्ति इन सब धार्मिक ग्रंथों की अच्छी अच्छी बातें ग्रहण कर, अच्छी तरह से अपने जीवन में उतार ले। इस मतलब यह तो न होगा कि सामने वाले के पास अल्प ज्ञान है, सिर्फ इस आधार पर कि उसको पूरे ग्रंथ याद नहीं। मुझे लगता है, जितना उसके पास है, वो उसके लिए काफी है, क्योंकि वो तोता रटन करने की बजाय, उसको समझकर जीवन में उतरा रहा है, जो लोग तोता रटन पर जोर देते हैं, वो धार्मिक होकर भी ताजो के भरे हुए घड़े की तरह किसी दूसरे का फायदा नहीं कर सकते, और ताजो की घड़े की तरह अधजल वाले लाजो के घड़े से ईष्या करते रहते हैं। ग्रंथों में ईष्या को त्यागने के बारे में सिखाया गया है, लेकिन तोता रटन करने वाला क्या जाने इस ज्ञान को।

नित्यानंद सेक्स स्केंडल के बहाने कुछ और बातें


लेखक कुलवंत हैप्पी
नई दिल्ली से इंदौर तक आने वाली मालवा सुपरफास्ट रेलगाड़ी की यात्रा को मैं कभी नहीं भूल सकता, अगर भूल गया तो दूसरी बार उसमें यात्रा करने की भूल कर बैठूँगा। इस यात्रा को न भूलने का एक और दूसरा भी कारण है। वो है, हमारे वाले कोच में एक देसी साधू और उसकी विदेशी चेली का होना। साधू चिलम सूटे का खाया हुआ 32 साल का लग रहा था, जबकि उसके साथ साधुओं का चोला पहने बैठी वो लड़की करीबन 25-26 की होगी। उन दोनों की जोड़ी पूरे कोच मुसाफिरों का ध्यान खींच रही थी, हर कोई देखकर मेरी तरह शायद हैरत में पड़ा सोच रहा था कि आखिर ऐसी कौन सी नौबत आई होगी कि भरी जवानी में साधुओं का साथ पसंद आ गया, और वो भी चिलमबाज साधु का। मैं एक और बात भी सोच रहा था कि अगर एक महिला साथी ही चाहिए तो गृहस्थ जीवन में क्या बुराई है? जिसको त्यागकर लोग साधु सन्यासी बन जाते हैं। शायद जिम्मेदारियों से भाग खड़े होने का सबसे अच्छा तरीका है साधु बन जाना। स्वर्ग सा गृहस्थ जीवन छोड़कर पहले साधु बनते हैं, फिर समाधि छोड़कर संभोग की तरफ आते हैं, और जन्म देते हैं सेक्स स्केंडल को।

स्वामी नित्यानंद जी आजकल सेक्स स्केंडल के कारण ही तो चर्चाओं में हैं। आज तक तो उनके बारे में कभी सुना नहीं था, लेकिन वो सेक्स स्केंडल के कारण चर्चा में आए, और हमारे ज्ञान में बढ़ोतरी कर दी कि कोई नित्यानंद नामक स्वामी दक्षिण में भी हुए हैं। शायद आपको याद होगा कि सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के संत गुरमति राम रहीम सिंह भी इस कारण चर्चा में आए थे। उन पर भी छेड़छाड़, बलात्कार जैसे आरोप लगे हैं। जब भी सेक्स स्केंडल में किसी संत महात्मा को लिप्त देखता हूँ तो सोचता हूँ कि हमारी सोच पर पड़ा हुआ पर्दा कब हटेगा? हम बाहरी पहनावे पर कब तक यकीन करते रहेंगे? गिद्दड़ शेर की खाल पहनने से शहर तो नहीं हो जाता, और कोई भगवा पहन लेने से साधु तो नहीं हो जाता? कोई दो तीन अच्छे प्रवचन देने से भगवान तो नहीं हो जाता? लेकिन क्या करें, हम सब आसानी से चाहते हैं। जब नित्यानंद जैसे मामले सामने आते हैं तो हम आहत होते हैं। मुझे लगता है हम कभी आहत नहीं होंगे, अगर हम गुरू को भी मिट्टी के बने घड़े की तरह ठोक बजाकर देखें, लेकिन हम व्यक्ति को भगवान मानते वक्त कभी भी उसका निरीक्षण करना पसंद नहीं करते? अगर निरीक्षण करने का समय होता तो आत्मनिरीक्षण न कर लेते।

मुझे याद आ रही है लुधियाना के पास स्थित एक श्री गुरूद्वारा साहिब की घटना। वहाँ हर रोज सुबह चार बजे गुरुबाणी का उच्चारण होता है, सभी श्री गुरूद्वारा साहिबों की तरह। एक सुबह एक गाँव वाले की निगाह श्री गुरू ग्रंथ साहिब के बीचोबीच पड़े मोबाइल पर पड़ गई, और उस मोबाइल में अश्लील वीडियो चल रहा था। यह सिलसिला कब से चल रहा था, इसका तो पता नहीं, लेकिन जब पकड़ा गया तो गाँवों ने ग्रंथी की खूब धुनाई की। ऐसी घटनाएं मजिस्दों, मंदिरों, गुरूद्वारों, चर्चाओं एवं डेरों में आम मिल जाएंगी। फिर भी कोई नहीं सोचता आखिर ऐसा क्यों होता? ऐसा इसलिए होता है कि हम बाहरी तौर से कुछ भी अपना लेते हैं, लेकिन भीतर तक जा ही नहीं पाते। कपड़ों की तरह हम भगवान बदलते रहते हैं। जिस संत की हवा हुई, हम उसकी के द्वार पर खड़े होने लगते हैं, नफा मिले तो ठीक, नहीं तो नेक्सट।

एक और घटना याद आ रही है, जो ओशो की किताब में पढ़ी थी, एक जगह ओशो ध्यान पर भाषण दे रहे थे, उनके पास एक व्यक्ति आया और बोला मैं सेक्स को त्यागना चाहता हूँ, तो ओशो ने कहा, जब आज से कुछ साल पहले मैं सेक्स पर बोल रहा था, तो तुम भाग खड़े हुए थे, और आज मैं ध्यान पर बोल रहा हूँ तो सेक्स से निजात पाने की विधि पूछने आए हो। इस वार्तालाप से मुझे तो एक बात ही समझ में आती है कि आप जितना जिस चीज से भागोगे, वो उतना ही तुम्हारे करीब आएगी। उतना ही ज्यादा तुम्हें बेचैन करेगी।

असल में सृष्टि सेक्स की देन है, लेकिन केवल मनुष्य ने सेक्स को भूख बना लिया। वो इस भूख से निजात पाने के लिए सन्यास जैसे रास्ते तैयार करता है और एक दिन उस व्यक्ति की तरह उस भूख को मिटाने के लिए कुछ भी खा जाता है, जो घर छोड़कर रेगिस्तान में इसलिए चला गया कि वो भूख से निजात पा सके। जब उसे घर से गए हुए काफी दिन हो गए तो पत्नि ने कहा, हाल चाल तो पूछ लूँ कहाँ हैं? कैसे हैं? उसने एक चिट्ठी और कुछ फूल भेजे। कुछ दिनों बाद पति का जवाब आया, "मैं बढ़िया हूँ, और तुम्हारे भेजे हुए फूल बेहद स्वादिष्ट थे"। ज्यादातर साधु सन्यासी ऐसे ही हैं, जो सेक्स की भूख से निजात पाने के लिए औरत से दूर भागते हैं, लेकिन वो भूल जाते हैं कि वो भूख को भयानक रूप दे रहे हैं।

जब भयानक भूख सेक्स स्केंडल के रूप में सामने आती है तो केस दर्ज होते हैं। उम्र भर की कमाई हुई इज्जत मिट्टी में मिल जाती हैं। दूध का दूध पानी का पानी हो जाता है। कितनी हैरानी की बात है कि जन्म मृत्यु के चक्कर मुक्त करने वाले खुद मौत से कितना डरते हैं। उनका कोर्ट में पेश न होना बताता है। अगर वो जन्म मृत्यु के चक्कर से मुक्त हैं तो कोर्ट में खड़े क्यों नहीं हो जाते, सच को हँसकर गले क्यों नहीं लगाते। इसलिए मैं कहता हूँ कि मखमली लिबास ओढ़कर भाषण देना बहुत आसान है। मंसूर की तरह अल्लाह का सच्चा आशिक होना बेहद मुश्किल है।

लफ्जों की धूल-5



(1)
कुलवंत हैप्पी
अगर हिन्दु हो तो कृष्ण राम की कसम
मुस्लिम हो तो मोहम्मद कुरान की कसम
घरों को लौट आओ, हर सवाल का जवाब आएगा
हैप्पी हथियारों से नहीं, विचारों से इंकलाब आएगा

(2)
नजरें चुराते हैं यहाँ से, वहीं क्यों टकराव होता है
चोट अक्सर वहीं लगती है हैप्पी यहाँ घाव होता है।

(3)
तू तू मैं मैं की लड़ाई कब तक
दो दिलों में ये जुदाई कब तक
खुशी को गले लगा हैप्पी
पल्लू में रखेगा तन्हाई कब तक

(4)
जैसे साहिर के बाद हर अमृता,
एक इमरोज ढूँढती है
वैसे ही मौत हैप्पी का पता
हर रोज ढूँढती है

हैप्पी अभिनंदन में सुनील कटारिया

सुनील कटारिया
हैप्पी अभिनंदन में इस बार आप जिस ब्लॉग हस्ती से रूबरू होने जा रहे हैं, उसने 'कौन कहता है आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' को सच कर दिखाया है असल जिन्दगी में, लेकिन ब्लॉग जगत में तो आए हुए इन्हें बड़ी मुश्किल से ढाई माह हुए हैं। ब्लॉग ख्यालात की कलम से पर लिखने वाले युवा ब्लॉगर सुनील कटारिया यहाँ एक तरफ पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समाचार पत्रों के लिए गैर-वेतन लेखन कार्य करने के साथ - साथ  दूरदर्शन के पंजाब से चलने वाले रीजनल टीवी चैनल जालंधर दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले इवनिंग लाइव शो "पंज बजे लाईव" को होस्ट कर रहे हैं |  उन्होंने अब तक जो हासिल किया, वो खुद के बल पर हासिल किया है, तो ऐसे में लाज़मी है कि सफर रोमांचक रहा होगा, आईये जानते हैं वो क्या कहते हैं अपने निजी जीवन और ब्लॉग जगत के बारे में।

कुलवंत हैप्पी : आपको ब्लॉग जगत में आए कितना समय हो गया और इस प्लेटफार्म पर आकर कैसा लगा?
सुनील कटारिया : मुझे करीब ढाई महीने ही हुए हैं इस नए मंच पर आए हुए और इस प्लेटफोर्म पर आकर बहुत अच्छा लग रहा है।

कुलवंत हैप्पी : लिखने के अलावा यहाँ पढ़ते भी होंगे दूसरे ब्लॉगों को, क्या कुछ बदलाव की जरूरत लगती है?
सुनील कटारिया : जी बिल्कुल पढ़ता  हूँ लेकिन लिखने का मौका कभी कबार ही हाथ आता है। बदलाव के नज़रिए से लगता है कि इसके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जागृत किया जाना चाहिए ताकि वो भी अपनी आवाज़ को बुलंद करते हुए इसका एक हिस्सा बनें क्यूंकि आज के दौर में इन्टरनेट या फिर कहें ब्लॉग एक सम्पूर्ण माध्यम है आजादी से अपनी बात कहने का। मीडिया के बाकी माध्यम चाहे वो अखबार हो या टीवी चैनल किसी ना किसी रूप में लोगों की बात को पूरी तरह से पेश नहीं करते हैं।

कुलवंत हैप्पी : आपने बहुत कम समय में बहुत नाम कमा लिया, पिछले दिनों आपकी प्रतिभा से रूबरू करवाता एक लेख पढ़ा था, यहाँ तक कैसे  पहुंचे?
सुनील कटारिया : दसवीं कक्षा में पढ़ते समय ही मुझे न्यूज़ चैनलों ने प्रभावित करना शुरू कर दिया और वहीँ से मेरे भीतर इस ओर आने की लौ जल उठी और फिर धीरे धीरे मेहनत के साथ साथ रास्ते खुद ब खुद बनते गए। मैं यहाँ कहना चाहूँगा कि "कोशिश करोगे तो कशिश पैदा होगी, रास्ते तो खुद ब खुद निकल आयेंगे"।

कुलवंत हैप्पी : इंटरनेट पर पढ़ने वालों की संख्या कम है, क्या ऐसे में आपका मन विचलित नहीं होता सोचकर कि मैं इतनी मेहनत से लिखता हूँ, और बहुत कम लोग पढ़ते हैं?
सुनील कटारिया : जी नहीं, मैं ये मानता हूँ कि आपकी बात में या फिर आपके ब्लॉग में अगर कुछ दम है तो लोग अपने आप आपके उस ब्लॉग तक किसी न किसी ज़रिए से ज़रूर पहुँच जाएंगे और ये आप पर निर्भर करता है कि आप किस तरह से अपने पाठकों को अपनी ओर खींच पाते हैं।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा लम्हा या शख्सियत जिसने कुछ हटकर करने के लिए प्रेरित किया हो?
सुनील कटारिया : जी, मैं हर पल हर शख्सियत से कहीं न कहीं ज़रूर मुतासिर होता हूँ। कोई ख़ास लम्हा या कोई ख़ास शख्सियत तो नहीं है जिसका मैं नाम ले सकूँ लेकिन मेरी ज़िन्दगी में आने वाले हर एक शख्स से ज़रूर किसी न किसी रूप में प्रेरणा लेता रहता हूँ और खास तौर पर मैं अपने जीवन में आने वाले लोगों की अच्छी बातों को ग्रहन करता हूँ।

कुलवंत हैप्पी : सुना है, आपने  CNN - IBN के  "द सिटीजन जर्नलिस्ट शो ' के लिए फिरोजपुर से ब्रिज को लेकर चल रहे विवाद का वीडियो भेजा था, जिसको सराहना मिली थी, वो विचार कैसे आया?
सुनील कटारिया : जी दरअसल, ये बात जुलाई 2007 की है जब मैं बी. ए. फाइनल में था। शहर के बीचो बीच स्थित रेलवे पुल को बने 150 साल से भी ज़्यादा का समय बीत जाने के कारण इसकी खस्ता हो चुकी हालत को देख केंद्र सरकार ने पुल को असुरक्षित तक घोषित कर दिया था और हर बार 23 मार्च शहीदी दिवस के दिन फिरोजपुर से करीब 11 किलोमीटर पर हुसैनीवाला भारत-पाक सीमा पर पंजाब के बड़े बड़े नेता पुल के नवनिर्माण का वायदा कर जाया करते थे। एक दिन CNN -IBN  के द सिटिजन जर्नलिस्ट शो सम्बंधी जानकारी देखी तो मैंने पुल का मोबाइल से वीडियो बना भेज डाला और फिर 27 नवम्बर 2007 को CNN - IBN की टीम फिरोजपुर पहुंची तो मुझसे पुल सम्बंधी रिपोर्टिंग करने को कहा गया और अंत में चैनल पर प्रसारित होने वाली इस वीडियो को "बेस्ट वीडियो अवार्ड" दिया गया।

युवा सोच युवा खयालात पाठकों और ब्लॉगर दोस्तों के लिए कोई संदेश?
सुनील कटारिया : किसी को संदेश देने के लायक तो नहीं हूँ, लेकिन हाँ गुजारिश ज़रूर करना चाहूँगा कि आज ज़्यादा से ज़्यादा नौजवान इन्टरनेट जैसे प्रभावशाली माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं और अगर वो चाहें तो अपने विचारों से इस समाज में क्रान्ति ला सकते हैं, क्यूंकि हम उस देश में रह रहे हैं जिसे सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है लेकिन इसी देश के हुकमरानों ने अपनी हुकूमत से लोकतंत्र के चौथे खम्बे अर्थात मीडिया पर भी अपना कब्ज़ा जमा लिया है, तो ऐसे में सभी दोस्तों से गुजारिश यही है कि वो इस सम्पूर्ण माध्यम का अपने आज़ादी भरे विचारों को दूसरों तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करें।
                                                            चक्क दे फट्टे
रोहित : सुनील यार धोखा हो गया। सुनील : क्या हुआ, किसने धोखा दे दिया? रोहित : घरवालों ने। सुनील : वो कैसे? रोहित : घरवालों से मैंने किताबों के लिए पैसे मंगवाए थे, लेकिन उन्होंने किताबें ही भेज दी।

वत्स, तुम रो क्यों रहे हो : पीएम टू शशि थरूर


लेखक  कुलवंत हैप्पी
एक बार की बात है, एक व्यक्ति रोता हुआ घर जा रहा था, रास्ते में रोककर एक साधु ने उससे पूछा, "वत्स, तुम रो क्यों रहे हो"। तो उसने कहा कि उसका साईकिल चोरी हो गया। साधु ने उसकी बात सुनते ही कहा, "भगवान ने तुमसे साईकिल छीना है, क्योंकि वो साईकिल लेने के बाद ही तो तुमको मोटर साईकिल देगा"। वो व्यक्ति साधु की बात सुनकर खुश हो गया, और इस स्वप्न के साथ घर की तरफ आँखें पौंछता हुआ चल दिया। बहुत से लोगों के साथ यह किस्सा सच साबित हो चुका है, लेकिन शशि थरूर के साथ सच साबित होगा कि नहीं, कुछ भी कह पाना मुश्किल है।

लेकिन हाँ यकीनन ट्विटर मास्टर शशि थरूर ने इस कहानी को पहले कहीं सुना जरूर होगा या फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुना डाला होगा, क्योंकि पंजाब में तो यह किस्सा बेहद लोकप्रिय है, वरना इतनी आसानी से पीएम को अस्तीफा सौंपने का खयाल तो शशि के दिमाग में न आता। शायद पीएम की ओर से ऐसा भरोसा मिल होगा कि इस बार राज्य विदेश मंत्री थे, तो अगली बार तुमको सीधा केंद्रीय विदेश मंत्री बनाया जाएगा, अगर श्री आडवानी की तरह मोदी का जादू भी नेकस्ट इलेक्शन में न चला तो, वरना हारी हुई पार्टियाँ विपक्ष में बैठकर बस मुद्दों का इंतजार करती हैं।
पूर्व मंत्री अब ट्विटरी खूब कर सकते हैं क्योंकि कोई काम तो नहीं रह गया करने के लिए, मसलन आईपीएल भी गई और जॉब भी, जॉब इसलिए नेताओं के पास दायित्व नाम की तो कोई चीज नहीं पाई जाती।
अब तीसरी शादी कर राजनीति संस्कृति के साथ साथ हिन्दु सामाजिक संस्कृति में भी फेरबदल बड़े आराम से कर सकते हैं। मीडिया में तो वो अब बने ही रहेंगे, क्योंकि वो टीआरपी ब्रांड जो बन चुके हैं, वैसे भी मीडिया फील्ड में उन्होंने मित्र तो कमा ही लिए हैं।

पिछले दिनों दैनिक भास्कर में सीनियर संवाददाता राजदीप सरदेसाई का एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें श्री सरदेसाई ने अपनी मित्रता का दायित्व खूब निभाया है। उनका लेख पढ़ने के बाद शोले फिल्म का गाना "ये दोस्ती हम न तोड़ेंगे" तो अचानक आपके लबों पर आ  जाएगा, भले ही आज ललित मोदी से खफा शशि थरूर गाते फिर रहें हो साथी फिल्म का गीत "ऐसा वक्त भी आता है, जब अच्छा खासा दोस्त भी दुश्मन बन जाता है"।

जीत है डर के आगे

लेखक कुलवंत हैप्पी

ड्यू
के टीवी विज्ञापन की टैग-लाईन 'डर के आगे जीत है' मुझे बेहद प्रभावित करती है, नि:संदेह औरों को भी करती होगी। सच कहूँ तो डर के आगे ही जीत है, जीत को हासिल करने के लिए डर को मारना ही पड़ेगा, वरना डर तुम को खा जाएगा।

पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म "माई नेम इज खान" में एक संवाद है 'डर को इतना मत बढ़ने दो कि डर तुम्हें खा जाए'।

असलियत तो यही है कि डर ने मनुष्य को खा ही लिया है, वरना मनुष्य जैसी अद्भुत वस्तु दुनिया में और कोई नहीं।


मौत का डर, पड़ोसी की सफलता का डर, असफल होने का डर, भगवान द्वारा शापित कर देने का डर, जॉब चली जाने का डर, गरीब होने का डर, बीमार होने का डर। सारा ध्यान डर पर केंद्रित कर दिया, जो नहीं करना चाहिए था। एक बार मौत के डर को छोड़कर जिन्दगी को गले लगाने की सोचो। एक बार मंदिर ना जाकर किसी भूखे को खाना खिलाकर देखो। एक बार असफलता का डर निकालकर प्रयास करके देखो। असफलता नामक की कोई चीज ही नहीं दुनिया में, लोग जिसे असफलता कहते हैं वो तो केवल अनुभव।

अगर थॉमस अलवा एडीसन असफलता को देखता, तो वो हजारों बार कोशिश ना करता और कभी बल्ब ईजाद न कर पाता।

दुनिया के सबसे बड़े तानाशाहों में हिटलर का नाम शुमार है। क्या आपको पता है? वो भीतर से डर का भरा हुआ था। ओशो की एक किताब में दर्ज है कि हिलटर की एक प्रेमिका थी, लेकिन उसने अपनी प्रेमिका को पास नहीं आने दिया, क्योंकि उसको डर था अगर कोई धोखे से उसको मार गया तो उसका सारा किया कराया खत्म हो जाएगा। वो किसी को अपने कंधे पर हाथ तक रखने नहीं देता था। आप जानकर हैरान होंगे, मरने के कुछ समय पहले, जब मौत पक्की हो गई थी, जब बर्लिन पर बम गिरने लगे, एवं हिटलर जिस तलघर में छिपा हुआ था, उसके सामने दुश्मन की गोलियाँ गिरने लगी, और दुश्मनों के पैरों की आवाज बाहर सुनाई देने लगी, द्वार पर युद्ध होने लगा और जब हिटलर को पक्का हो गया कि मौत निश्चित है, अब मरने से बचने का कोई उपाय नहीं है, तो उसने पहला काम यह किया कि एक मित्र को भेजा और कहा कि जाओ आधी रात को उस औरत को ले आओ। शादी कर लूँ।

मित्र ने कहा, यह कोई समय नहीं शादी करने का? हिटलर ने कहा, अब कोई भय नहीं है, अब कोई भी मेरे निकट हो सकता है, अब मौत बहुत निकट है। अब मौत ही करीब आ गई है, तब किसी को भी निकट लिया जा सकता है।

इसलिए कहता हूँ, डर को मारकर आगे बढ़े, मुझे तो डर अंधेरे का समानार्थी शब्द ही नजर आता है, अगर आप अंधेरे को देखकर रूक जाएंगे तो रोशनी से आप रूबरू न हो पाएंगे। रोशनी ही तो सफलता है। चमक ही तो सफलता है। डर रखना है तो ऐसा रखो कि हमारे कार्य हमारी छवि को धूमिल न कर दें। ऐसा डर भी आपको सफलता की ओर लेकर जाएगा। लेकिन अच्छे काम को करने से डरना, आपको असफलता और निराशा की तरफ लेकर जाएगा।

ओशो सेक्स का पक्षधर नहीं

लेखक कुलवंत हैप्पी
खेतों को पानी दे रहा था, और खेतों के बीचोबीच एक डेरा है, वैसे पंजाब के हर गाँव में एकाध डेरा तो आम ही मिल जाएगा। मेरे गाँव में तो फिर भी चार चार डेरे हैं, रोडू पीर, बाबा टिल्ले वाला, डेरा बाबा गंगाराम, जिनको मैंने पौष के महीने में बर्फ जैसे पानी से जलधारा करवाया था, रोज कई घड़े डाले जाते थे उनके सिर पर, और जो डेरा मेरे खेतों के बीचोबीच था, उसका नाम था डेरा बाबा भगवान दास। गाँव वाले बताते हैं कि काफी समय पहले की बात है, गाँव में बारिश नहीं हो रही थी, लोग इंद्र देव को खुश करने के लिए हर तरह से प्रयास कर रहे थे, लेकिन इंद्रदेव बरसने को तैयार ही नहीं था। दुखी हुए लोग गाँव में आए एक रमते साधु भगवान दास के पास चले गए। उन्होंने उनसे बेनती बगैरह किया।

लफ्जों की धूल-4

(1)
जिन्दगी का जब, कर हिसाब किताब देखा
लड़ाई झगड़े के बिन, ना कुछ जनाब देखा

लफ्जों की धूल-3

(1)
दिमाग बनिया, बाजार ढूँढता है
दिल आशिक, प्यार ढूँढता है

शशि थरूर से सीखे, सुर्खियाँ बटोरने के ट्रिक

अखबारों की सुर्खियों में कैसे रहा जाता है आमिर खान या किसी हॉलीवुड हस्ती से बेहतर विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर जानते हैं। यकीन न आता हो, तो पिछले कई महीनों का हिसाब किताब खोलकर देखें, तो पता चलेगा कि शशि थरूर भी राखी सावंत की तरह बिना किसी बात के सुर्खियाँ बटोरने में माहिर हैं।

हैप्पी अभिनंदन में संगीता पुरी

श्रीमति संगीता पुरी जी
हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से रूबरू होने जा रहे हैं, वो जहाँ एक तरफ हमें गत्यात्मक ज्योतिष ब्लॉग के जरिए भविष्य व वर्तमान की स्थिति से अवगत करवाती हैं, वहीं दूसरी ओर 'हमारा खत्री समाज' ब्लॉग के जरिए हमें इतिहास के साथ भी जोड़े रखती हैं।

लफ्जों की धूल - 2

लफ्जों की धूल - 1
 (1)
उसके तो करार भी दमदार निकले,
हम ही कमजोर दिले यार निकले

अलविदा ब्लॉगिंग...हैप्पी ब्लॉगिंग

कई महीने पहले बुरा भला के शिवम मिश्रा जी  चुपके से कहीं छुपकर बैठ गए, फिर हरकीरत हीर ने अचानक जाने की बात कही, किंतु वो लौट आई। किसी कारणवश मिथिलेश दुबे भी ब्लॉग जगत से भाग खड़े हुए थे, लौटे तो ऐसे लौटे कि न लौटे के बराबर हुए पड़े हैं।

क्या गोलियों व बमों से खत्म जो जाएगा नक्सलवाद?

पिछले दिनों हुए नक्सली हमले के बाद भाजपा की सीनियर महिला नेता सुषमा स्वराज का बयान आया कि सेना की मदद से नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाए। उनके कहने का भाव था कि नक्सलवादियों की लाशों के ढेर बिछा दिए जाएं। उस बयान को पढ़ने के बाद दिमाग में एकाएक एक सवाल आ टपका।

लफ्जों की धूल

(1)
भले ही,
तुम लहरों सी करो दीवानगी,
लेकिन मैं अक्सर तेरा,
किनारों की तरह इंतजार करूँगा।

हैप्पी अभिनंदन में विनोद कुमार पाण्डेय

विनोद कुमार पाण्डेय जी
इस बार हैप्पी अभिनंदन में बनारस की गलियाँ छोड़, नोयडा के 62 सेक्टर में जिन्दगी के हसीं पलों का आनंद लेने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर विनोद कुमार पाण्डेय जी पधारे हैं, जो अक्सर मिलते हैं 'मुस्कराते पल-कुछ सच कुछ सपने' ब्लॉग विला पर। वो किसी पहचान के मोहताज तो नहीं, लेकिन कलम के इस धुरंधर के बारे में कुछ शब्द लिखे बिन कलम मेरी रुकने को तैयार नहीं। जैसे भूमि कितनी उपजाऊ है, इस बात का अंदाजा तो उसकी फसल से ही लगाया जा सकता है। वैसे ही इतनी की सोच कितनी युवा है, वे तो उनकी लेखनी से हम सबको पता ही चल चुकी है। अब कुछ और बातें, जो ब्लॉग जगत से जुड़ी हैं, जो उनके जीवन से जुड़ी हैं, उन पर वो क्या सोचते हैं? चलो जानते हैं उनकी जुबानी।

कुलवंत हैप्पी : आपकी रचनाएं समाज की बुराईयों पर कटाक्ष करती हैं, जो आपके भीतर छुपे हुए एक क्रांतिकारी से रूबरू करवाती हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्रांतिकारी आखिर किससे प्रेरित है?
विनोद पांडेय:
कुलवंत जी, मैं ना तो कोई बहुत पॉपुलर ब्लॉगर ठहरा और ना ही बहुत बड़ा समाज सुधारक। फिर भी आपने हैप्पी अभिनंदन के लिए मेरा चयन किया, आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

अब रही बात मेरी रचनाओं कि तो यह बात सच है कि मैंने अपनी ज़्यादातर रचनाओं में समाज के ऊपर कटाक्ष किया या यह कहूँ कि अभी तक जो कुछ देखा, परखा और समझा वहीं सब लिखता हूँ, कुलवंत जी यह भावनाएँ किससे प्रेरित है, इस प्रश्न का उत्तर तो मैं भी ढूँढ रहा हूँ।

मैं एक हास्य व्यंग का कवि हूँ, एक आम आदमी का दर्द बाँटना चाहता हूँ, पर शायद कभी कभी दर्द बाँटने की इस प्रवृति में इतना मशगूल हो जाता हूँ कि उन्हें महसूस भी करने लगता हूँ, यूँ लगता है इक्कीसवीं सदी के इस विकासशील भारत, आधुनिक आदमी की सोच और समाज में फैली तमाम विषमताएँ को देख कर अनायास ही शब्द फूट पड़ते हैं और शायद मैं उन्हें रोक नही पाता।

कुलवंत हैप्पी : आपकी रचनाएं बेहद बढ़िया हैं, लेकिन टिप्पणियाँ उम्मीद से कम आती हैं (मुझे ऐसा लगता है), क्या इसके पीछे गम्भीर विषयों को स्पर्श करना है या तुम मुझे टिप्पणी दो, मैं तुझे टिप्पणी दूंगा वाली धारणा है?
विनोद पांडेय:
हम तो बस लिख देते हैं, जो कुछ अपने आस-पास दिखाई देता है।..आप सब लोगों का प्यार और आशीर्वाद मिलता है बस अच्छी हो जाती हैं।

कुलवंत जी, हो सकता है और ब्लॉगर्स की तुलना में टिप्पणियाँ थोड़ी कम मिलती हो पर अपने विचारों को व्यक्त करते समय मैं बिल्कुल नही सोचता कि ब्लॉगिंग की दुनिया में इसकी रेटिंग क्या होगी, मुझे पढ़ने और समझने वालों का एक खास वर्ग है, जिनका प्यार और आशीर्वाद निरंतर मेरा हौसला बढ़ाता रहता है,बस इससे अधिक मुझे कुछ नही चाहिए।

कुलवंत हैप्पी : आप हर रंग की कविताएं लिखते हैं, आपको कविताएं लिखने का शौक कैसे पड़ा एवं क्या ब्लॉग से पहले आपकी कविताएं कई और प्रकाशित हुई?

विनोद पांडेय :
जी हाँ, मैं हर रंग की कविताएँ लिखता हूँ क्योंकि मुझे किसी एक विधा में बँध कर रह जाना अच्छा नही लगता परन्तु हास्य मेरी सबसे प्रिय विधा हैं। कुलवंत जी बचपन से मुझे किताबें पढ़ने और कविताएँ सुनने का बड़ा शौक हैं और शायद यह एक खास वजह हैं, जिसने मेरे अंदर एक रचनाकार को जन्म दिया। ब्लॉग से पहले मेरी रचनाएँ अपने कॉलेज के कुछ खास दोस्तों तक ही सीमित थी। मेरे कवि बनने में मेरे कुछ उन दोस्तों का भी बहुत योगदान रहा जो निरंतर मेरा आत्मविश्वास बढ़ाते रहे।

कुलवंत हैप्पी : भगवान की दुआ से आपने पिछले महीने की दो तारीख को एक साल पूरा कर लिया ब्लॉग जगत में, इस एक साल दौरान ब्लॉग जगत में कैसे कैसे अनुभव हुए?
विनोद पांडेय:
मैं ब्लॉग जगत में कुछ सीखने और अपनी बात कहने के उद्देश्य से आया हूँ, कुछ बड़े लोगों का आशीर्वाद मिल रहा है, आप जैसे दोस्तों का प्यार मिल रहा है, और लोग मेरे मकसद को समझ भी रहें हैं, बस यही पर मेरी ब्लॉगिंग सफल हो जाती हैं, इतना अनुभव मेरे लिए बहुत है। बिना काम की चीज़ों को मैं हमेशा नज़रअंदाज कर देता हूँ।

कुलवंत हैप्पी: कितने प्रतिशत भारतीय हिन्दी ब्लॉगर एक सार्थक ब्लॉगिंग कर रहे हैं, 65 फीसदी, 75 फीसदी, 85, फीसदी या 95 फीसदी?
विनोद पांडेय:
कुलवंत जी, ब्लॉगिंग करने के सबके अलग अलग उद्देश्य होते हैं, हो सकता है कुछ मेरी समझ से बाहर हो इसलिए इस बात का जवाब देना मेरे लिए कठिन है कि कितने प्रतिशत सार्थक ब्लॉगिंग कर रहे है, हाँ एक बात ज़रूर कहना चाहूँगा की पढ़ने वालों की संख्या ज़रूर कम है..शायद लिखने वालों से भी कम।

कुलवंत हैप्पी: आपकी प्रोफाइल में बनारस और नोयडा है इनका आपके जीवन से क्या संपर्क है जरूर बताएं, और अगर मैं गलत न हूँ, आपका रिश्ता कुछ मुम्बई से भी है?
विनोद पांडेय:
कुलवंत जी, दोनों जगह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, बनारस मेरी जन्मभूमि और नोयडा मेरी कर्मभूमि है। रही बात मुंबई की तो बस यहाँ बने फिल्मों का एक दर्शक हूँ, भाई, इसके अतिरिक्त मुंबई से मेरा कोई संबंध नही।

कुलवंत हैप्पी: स्टार ब्लॉगर का नाम शीर्षक में डाल दें तो टिप्पणियाँ धड़ाधड़ आती हैं वो भी स्टार ब्लॉगरों की, क्या ब्लॉगिंग टिप्पणियाँ प्राप्त करने के लिए की जाए?
विनोद पांडेय :
मुझे लगता है ऐसा सही नहीं, स्टार ब्लॉगर के सहारे कोई तक कब ब्लॉगिंग कर सकता है, अगर ब्लॉगिंग में कुछ करना है तो अपने नाम को इतना सार्थक बना दो कि वो खुद में एक स्टार ब्लॉगर बन जाए।

कुलवंत हैप्पी:  जिन्दगी की कोई ऐसी घटना, जो कुछ सिखाती हो, जरूर शेयर करें?
विनोद पांडेय :
वैसे तो जिंदगी रोज कुछ ना कुछ सिखाती रहती है, पर एक घटना मैं आप से ज़रूर शेयर करना चाहूँगा, बात कुछ दिनों पहले की है, मेरे घर से थोड़े दूर ग़ाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन है। सुबह सुबह एक दिन मैं अपने एक रिश्तेदार को स्टेशन से लेने के लिया गया था तो एक बड़ा ही अजीब नज़ारा देखा कि एक बच्चा ने वहीं प्लेटफॉर्म पर बैठे एक बूढ़े भिखारी (जो दोनों पैरों से अपाहिज था) के कटोरे में 2 रुपए डाले और निकल लिया। उसके कुछ दिन बाद मुझे वही लड़का दूसरे प्लेटफॉर्म पर भीख माँगता दिखाई दिया, तो मैं दंग रह गया। एक भिखारी को दूसरे की मदद करते हुए देख।

अब आप भी समझ गए होंगे उस लड़के की सोच कितनी नेक थी जो खुद भीख माँग कर भी दूसरे की ज़रूरत को समझ रहा था और उससे अलग हम इंसान जो बस अपनी ज़रूरतों की भरपाई में लगे रहते है।


कुलवंत हैप्पी : चलते चलते कोई संदेश युवा सोच युवा खयालात के पाठकों एवं ब्लॉगर साथियों को?
विनोद पांडेय :
एक युवा होने के नाते मैं यही कहना चाहूँगा कि इस उम्र में साहस, शक्ति और जोश अन्य सभी अवस्थाओं से थोड़ा अधिक ही होता है, इसे व्यर्थ ना होने दे बल्कि इसका सार्थक उपयोग करें, अपने लिए तो हम सब जीते ही हैं,कभी चंद घड़ी दूसरों के लिए जिये, किसी ज़रूरतमंद की ज़रूरत को पूरा करने की कोशिश करें और किसी के आँसुओं को मुस्कान में बदलने की कोशिश करें, तरीका कुछ भी हो प्रयास ज़रूर करें मन को बहुत ही अच्छा लगेगा। आने वाला कल हमारा है। इसे खूबसूरत बनाना भी हमारा ही काम है, साथ ही साथ तन,मन और मस्तिष्क को स्वस्थ रखें। हो सकता है थोड़ा मुश्किल काम हो पर जितना ज़्यादा हो सकें खुश रहने की कोशिश करें।

चंद लम्हें हैं मिले, भींगी सुनहरी धूप में,
हमने सोचा हँस के जी लें, जिंदगानी फिर कहाँ

और अंत में..मैं अपने सभी ब्लॉगर्स साथियों को धन्यवाद देना चाहूँगा, जिनका प्यार और आशीर्वाद निरंतर मेरा हौसला बढ़ाता रहा, और एक बार फिर से आपको बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने हैप्पी अभिनंदन में मुझे बुलाया।

वैसे भी ब्लॉगर्स के विचारों के प्रस्तुतिकरण के मामले में यह प्रोग्राम बेस्ट है। भगवान आपको और उन्नति दे...शुभकामनाएँ।

एक पत्रकार ने बंता जी से पूछा कि क्या कभी आपको प्यार हुआ है। तो बंता सिंह ने कहा कि रोज कहता हूँ उसको पर वो मानती नहीं, वो आगे से कहती है "आई लव यू टू", अब यह दूसरा कौन है मुझे पता नहीं।
आभार
कुलवंत हैप्पी

मुस्कराते क्यों नहीं

Photo by Google Search & Editing by me
श्रीगणेश से करते हैं शुरू जब हर काम
तो माँ-बाप को दुनिया बनाते क्यों नहीं।

बुरी बातों को लेकर बहस करने वालों
फिर अच्छी बातें को फैलाते क्यों नहीं।

मन में बातों का अंबार, हाथ में मोबाइल
तो मित्र का नम्बर मिलाते क्यों नहीं।

कॉलेज के दिनों में देखी कई फिल्में
फिर अब दम्पति घूमने जाते क्यों नहीं।

माँ बाप, बहन भाई, दोस्त मित्र सब हैं,
तो खुदा का शुक्र मनाते क्यों नहीं।

अच्छी है, काबिलेतारीफ है कहने वालों
फिर खुलकर ताली बजाते क्यों नहीं।

फेसबुक, ऑर्कुट को देखता हूँ तो सोचता हूँ
लोग मकान बनाने के बाद आते क्यों नहीं

कोई रोज आता है आपके इनबॉक्स में
तो आप उसके यहाँ जाते क्यों नहीं।

हैप्पी लिखता है शेयर, बनता है लतीफा,
इस बात पर मुस्कराते क्यों नहीं।

1. दम्पति-मियाँ बीवी 2.उसके यहाँ-इनबॉक्स
आभार
कुलवंत हैप्पी

सेक्स एजुकेशन से आगे की बात

देश में सेक्स एजुकेशन को लेकर अनूठी बहस चल रही है, कुछ रूढ़िवादी का विरोध कर रहे हैं और कुछ इसके पक्ष में बोल रहे हैं। लेकिन कितनी हैरानी की बात है कि किसी शिक्षा की बात कर रहे हैं हम सब, जो इस देश में आम है। सचमुच सेक्स शिक्षा इस देश में आम है, वो बात अलहदा है कि वो चोरी छिपे ग्रहण की जा रही है। इस देश में सेक्स शिक्षा आम है, इसका सबूत तो नवविवाहित जोड़ों से लगाया जा सकता है। खुद से सवाल करें, जब उनकी शादी होती है कौन सिखाता है उनको सेक्स करना। हाँ, अगर जरूरत है तो सेक्स से ऊपर उठाने वाली शिक्षा की।

इस देश का दुर्भाग्य है कि सेक्स को पाप, पति को परमेश्वर और नारी को नरक का द्वार कहा जाता है। अब सोचो, जब तीनों बातें एक साथ एकत्र होंगी, तो क्या होगा? युद्ध ही होगा और कुछ नहीं। कितनी हैरानी की बात है कि हम उसको युद्ध नहीं बल्कि सात जन्मों का पवित्र बंधन भी कहते हैं। अगर सेक्स पाप है, तो जन्म लेने वाली हर संतान पाप की देन है, अगर वो पाप की देन है तो वो पापमुक्त कैसे हो सकती है? हमने सेक्स को पहले पाप कहा, फिर शादी का बंधन बनाकर उसका परमिट भी बना दिया। हमारी सोच में कितना विरोधाभास है।

हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि विवाह के बाद रिश्तों में खटास क्यों आ जाती है? विवाह के बाद रिश्ते कच्चे धागों की तरह टूटने को लगते हैं? हम ने सेक्स को पाप बना दिया, स्त्री को नरक का द्वार बता दिया और पति को परमेश्वर। बस इसमें उलझकर रह गया मनुष्य। पति को परमेश्वर बताकर हमने ईगो को जन्म दे दिया, मैं को जन्म दे दिया, तानाशाह को जन्म दे दिया। और मनुष्य इससे आगे नहीं निकल पाया। मनुष्य ने पुरुषवादी सोच रखते हुए औरत को सेक्स पूर्ति की मशीन समझा, और औरत ने सेक्स को दमन। सपनों का दमन, रीझों का दमन, उमंगों का दमन। उसको इस रिश्ते से घुटन होने लगी। जब पानी में कड़वाहट आने लगती है तो उसका मीठा स्वाद जाने लगता है। ऐसा ही होने लगता है विवाह के बाद। बस धीरे धीरे रिश्ते पतन की ओर जाने लगते हैं। सेक्स वो अवस्था है यहाँ पर मैं और तू का अर्थ खत्म हो जाता है, लेकिन हमने एक को बड़ा कहकर मैं को जन्म दे दिया। तू नारी है, मैं पुरुष हूँ, जब मैं तू का भेद खत्म हो जाए और जब सब शून्य हो जाए। वो ही सेक्स संपूर्ण है, वरना तो दोनों ही एक दूसरे के लिए सेक्स पूर्ति की मशीनें हैं। इस देश में सेक्स एजुकेशन की नहीं, बल्कि सेक्स के सही अर्थ समझाने की जरूरत है। सेक्स को पाप कहकर खुद को पाप की संतान घोषित करने से उभरना होगा। सेक्स को सही ढंग से परिभाषित करना होगा। सेक्स दो रूहों का वो मिलन है, जो समाधि पर जाकर खत्म होता है। समाधि ईश्वर की ओर लेकर जाती है।

सेक्स को पर्दे में डाल दिया, हर कोई उसको देखने के लिए उतावला हो उठा। आपको याद होगा आज से कई साल पहले की फिल्मों में हीरोईनों का ड्रेस सेंस। उनकी नंगी टांगें और बाँहें देखकर कुछ दर्शक तालियाँ बजा उठते थे, और कहते थे थोड़ा सा और दिखाओ, लेकिन आज करीना कपूर जैसे अभिनेत्रियाँ जिस्म की नुमाइश तक लगा देती हैं, कोई देखता नहीं बल्कि कहते हैं कि कुछ कहानी लाओ। कुछ ऐसा ही सेक्स के बारे में। जब सेक्स को हम अच्छी तरह से परिभाषित कर देंगे, तब सेक्स हम को एक शांति और सुकुन की तरफ लेकर जाएगा। जब हमारे जेहन से सेक्स का भूत निकल जाएगा, तब महिलाएं आराम से घूम पाएंगी, उनको कोई भय न होगा। हमने दिमागों में तो सेक्स भर रखा है, लेकिन विरोधी बने घूम रहें हैं सेक्स के। महिला को देखते ही सबसे पहले पुरुष की निगाह उसकी उभरी हुई छाती पर जाती है क्यों? हम तो सेक्स के विरोधी हैं न। मुझे याद है, पंजाब में पंजाब केसरी को सबसे ज्यादा सेक्सी फोटो प्रकाशित करने वाला अखबार कहा जाता है, लेकिन सच मानो जो उसको बुरा कहते थे, वो ही सबसे ज्यादा उस दिन अख़बार खरीदते हुए मिलते थे, जिस दिन सेक्सी फोटो से भरपूर गलैमरस का पेज आना होता था। हमारी वास्तविकता यही है, हमने सेक्स को बाहर से तो पाप कह दिया, लेकिन भीतर ही भीतर को ज्वालामुखी बना लिया। बलात्कार उसकी की देन हैं। एक महिला ब्लॉगर ने लिखा था कि रेप असभ्य समाज (आदि वासी) में सभ्य समाज की तुलना में कम होते हैं। मैं कहना चाहूंगा, वहाँ ऐसा इस लिए होता, क्योंकि वहाँ सेक्स पाप नहीं। वहाँ सेक्स सृष्टि को आगे बढ़ाने का जरिया है, रास्ता है। हम गंगोत्री खत्म कर गंगा की उम्मीद करते हैं, कोले की खानें बंद कर हीरे की उम्मीद करते हैं। आखिर कैसे संभव होगा।

आभार
कुलवंत हैप्पी

ह्यूमन एंटी वायरस

हर बात को लेकर विरोधाभास तो रहता ही है, जैसे आपने किसी को कहते हुए सुना होगा "मुफ्त में कोई दे, तो ज़हर भी खा लें", वहीं किसी को कहते हुए सुना होगा "मुफ्त में कोई दवा भी न लें, सलाह तो दूर की बात"। हम मुफ्त में मिला ज़हर खा सकते हैं, लेकिन मुफ्त में मिली एक सही सलाह कभी निगलना नहीं चाहेंगे। फिर भी मुझ जैसे पागलों की देश में कमी नहीं, जो मुफ्त की सलाह देने में यकीन रखते हैं, जबकि वो जानते हैं कि मुफ्त की सलाह मानने वाले बहुत कम लोग हैं। इसकी स्थिति वैसी ही है जैसे किसी के प्रति सकारात्मक नजरिया, कोई आपसे कहे वो व्यक्ति बुरा है, आप नि:संदेह मान लेंगे, लेकिन अगर कोई कहे बहुत अच्छा है तो संदेह प्रकट हो जाएगा, स्वर्ग को लेकर संदेह हमेशा ही रहा है, लेकिन नरक को लेकर कोई संदेह नहीं।

मानो लो आप अपनी मस्त कार में जा रहे हैं, कार में बैठे हुए आप केवल कार के भीतर ही निगाहें रखें लाजमी तो नहीं, आप बाहर की ओर की देख रहें होते हैं, कार की जगह बस भी मान सकते हैं कोई फर्क नहीं पड़ता। आपको बाहर रोड़ पर एक महिला के पास खड़ा एक रोता हुआ बच्चा दिखाई पड़ता है, और वो रो रहा है, वो बहुत गंदा दिखाई पड़ रहा है कई दिनों से मानो नहाया न हो, और उसकी माँ उसके रोने की ओर ध्यान न देकर सिर्फ पत्थर तोड़ने में लगी हुई है। आप उसकी स्थिति को देखकर उसके प्रति विचारक हमदर्दी प्रकट करने लगते हैं अपने ही भीतर, वो बच्चा वहीं रो रहा है, लेकिन आपकी कार या बस उससे आधा किलोमीटर दूर निकल आई, लेकिन मानसिक तौर पर वो बच्चा आपके साथ ही चल रहा है। आप भीतर ही भीतर क्रोध से भरे जा रहे हैं, आपके विचार आपको गुस्सैल बना रहे हैं, देश के सिस्टम के प्रति आप भीतर ही भीतर चिल्लाने लगते हैं, अचानक आपसे कोई पूछता है कहाँ जाना है ड्राईवर या कंडक्टर। आप क्रोधित हैं, लाजमी है कि आपकी बोली भी वैसी ही होगी, आपका जवाब सुनकर सामने वाला भी क्रोधित हो उठेगा। उसकी आवाज में आया रुखपन आपको चुभने लगेगा काँटे की तरह।

आपको पता है ऐसा क्यों हुआ? जब आपने उस बच्चे को देखा तो आपके भीतर नकारात्मकता घुस गई, वायरस घुस गया, अब जो भी वस्तु उससे लगेगी वो वायरस युक्त हो जाएगी। ऐसे में आपका व्यवहार बिगड़ेगा, आपका व्यवहार बिगड़ेगा, तो आप का आस पड़ोस ख़राब होवेगा, जब वो प्रभावित होवेगा तो आप कैसे नहीं प्रभावित होंगे। आपको माहौल से नफरत होने लगेगी, आपका दम घुटने लगेगा। ऐसे में आपको जीवन नरक लगेगा, जो उस घटना से पहले स्वर्ग लग रहा था। अगर कम्प्यूटर के लिए एंटी वायरस बना है तो मानव के लिए भी एंटी वायरस है। आपके पास दो विकल्प हैं, एक तो उसी समय विचार को त्याग दें या फिर आप बस या कार से उतरकर, जो कुछ आपके पास है, उसका कुछ हिस्सा उस मासूम को दें आएं। फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आएगी, जिसको देखकर आपकी मुस्कान डबल हो जाएगी, अब आपके साथ लगने वाली हर वस्तु वायरस मुक्त हो जाएगी। आपका व्यवहार अच्छा होगा, तो आपका आस पास अच्छा होगा, और जीवन फिर से स्वर्ग की ओर बढ़ेगा। मेरे कहने का सिर्फ इतना अर्थ है विचारों को त्याग कर सिर्फ और सिर्फ करनी में यकीन रखो, कभी दुखी न होगे। भारत से अच्छा दुनिया में कोई स्वर्ग नहीं, लेकिन भारत को नरक बनाया है नकारात्मक विचारों ने, फालतू की चर्चाओं ने। जो अपने पास है उसकी कदर नहीं, लेकिन पड़ोसी की पत्नि अच्छी लगती है। दुखी होने के कारण तो हम खुद ईजाद करते हैं, फिर दोषी दूसरे को कहते हैं, जब दिमाग में तो हर समय पड़ोसन रहेगी, तो पत्नि से अच्छे से पेश कैसे आओगे, और तुम अच्छे न होगे तो सामने से अच्छा वो मिले कैसे संभव है।

प्रिय नोट : किताबी ज्ञान कहकर नकारे वालों को मेरा सलाम। बस उनसे इतना कहूँगा, कंठस्थ और आत्मसात में अंतर समझना सीख जाएं, उनका भी भला होगा, और आस पास वालों का भी भला होगा।

आभार
कुलवंत हैप्पी

तेरे इंतजार में

नागदा के रेलवे स्टेशन का  एक दृश्य /फोटो: कुलवंत हैप्पी
आँखें बूढ़ी हो गई, तेरे इंतजार में
और पैर भी जवाब दे चुके हैं
फिर भी दौड़ पड़ती हूँ
डाकिए की आवाज सुनकर
शायद कोई चिट्ठी हो मेरे नाम की
जिसे लिखा तुमने हो
हर दफा निराश होकर लौटती हूँ
दरवाजे से
रेल गाड़ी की कूक सुनते
दौड़ पड़ती हूँ रेलवे स्टेशन की ओर
शायद अतिथि बनकर तुम पधारो,
और मैं तेरा स्वागत करूँ
तुम उजड़ी का भाग सँवारो
वहाँ भी मिलती है तन्हाई
बस स्टेंड पर तो हर रोज
आती हैं बसें ही बसें
पर वो बस नहीं आती
जिस पर से तुम उतरो
सुना है मैंने
एअरपोर्ट पर उतरते हैं हररोज कई हवाई जहाज
पर तुम्हारा जहाज उड़ता क्यों नहीं उतरने के लिए
वक्त की कैंची को, क्यों मैं ही मिली हूँ कुतरने के लिए

तुम्हें याद है
जवानी की शिख़र दोहपर थी
हाथों पर मंहेदी का रंग
और बाँहों में लाल चूड़ा था
कुछ महीने ही हुए थे
दुल्हन बने
तेरे घर का श्रृंगार बने
जब तुम, कागजों के ढेर
जुटाने निकल गए थे
दूर सफर पर
तब से अब तक इंतजार ही किया है
और करती रहूँगी, अंतिम साँस तक
बच्चू दे पापा,
तेरी लाजो...
आभार
कुलवंत हैप्पी