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Showing posts from April, 2010

इससे बड़ी दुर्घटना क्या होगी?

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जिन्दगी सफर थी, लेकिन लालसाओं ने इसको रेस बनाकर रख दिया। जब सफर रेस बनता है तो रास्ते में आने वाली सुंदर वस्तुओं का हम कभी लुत्फ नहीं उठा पाते, और जब हम दौड़ते दौड़ते थक जाते हैं अथवा एक मुकाम पर पहुंचकर पीछे मुड़कर देखते हैं तो बहुत कुछ छूटा हुआ नजर आता है। उसको देखकर हम फिर पछताने लगते हैं, और हमें हमारी जीत भी अधूरी सी लगती है। अगर जिन्दगी को सफर की तरह लेते और रफतार धीमे रखते तो शायद मंजिल तक पहुंचने में देर होती, लेकिन दुर्घटना न होती। उससे बड़ी दुर्घटना क्या होगी, रूह का दमन हो जाए, और हड्डियों का साँचा बचा रह जाए। जिन्दगी जैसे खूबसूरत सफर को हम दौड़ बनाकर रूह का दमन ही तो करते हैं, जिसका अहसास हमको बहुत देर बाद होता है। जो इस अहसास को देर होने से पहले महसूस कर लेते हैं, वो इस सफर के पूर्ण होने पर खुशी से भरे हुए होते हैं, उनके मन में अतीत के लिए कोई पछतावा नहीं होता।

पिछले दिनों बीबीसी की हिन्दी वेबसाईट पर रेणु अगाल का भूटान डायरी सिरलेख से लिखा एक लेख पढ़कर इसलिए अच्छा लगा क्योंकि उन्होंने अपने लेख के मार्फत दुनिया के विकासशील देशों को आईना दिखाने की कोशिश की, जो आर्थिक मजबूती की हो…

चर्चा विराम का नुस्खा : अधजल गगरी छलकत जाय

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यह कहावत तब बहुत काम लगती है, जब खुद को ज्ञानी और दूसरे को मूर्ख साबित करना चाहते हों। अगर आप चर्चा करते हुए थक जाएं तो इस कहावत को बोलकर चर्चा समाप्त भी कर सकते हैं मेरी मकान मालकिन की तरह। जी हाँ, मेरी जब जब भी मेरी मकान मालकिन के साथ किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो वे अक्सर इस कहावत को बोलकर चर्चा को विराम दे देती है। इसलिए अक्सर मैं भी चर्चा से बचता हूँ, खासकर उसके साथ तो चर्चा करने से, क्योंकि वो चर्चा को बहस बना देती है, और आखिर में उक्त कहावत का इस्तेमाल कर चर्चा को समाप्त करने पर मजबूर कर देती है। मुझे लगता है कि चर्चा और बहस में उतना ही फर्क है, जितना जल और पानी में या फिर आईस और स्नो में।
कभी किसी ने सोचा है कि सामने वाला अधजल गगरी है, हम कैसे फैसला कर सकते हैं? क्या पता हम ही अधजल गगरी हों? मुझे तो अधजल गगरी में भी कोई बुराई नजर नहीं आती। कुछ लोगों की फिदरत होती है, हमेशा सिक्के के एक पहलू को देखने की। कभी किसी ने विचार किया है कि अधजल गगरी छलकती है तो सारा दोष उसका नहीं होता, कुछ दोष तो हमारे चलने में भी होगा। मुझे याद है, जब खेतों में पानी वाला घड़ा उठाते थे, तो वहाँ भरा हु…

नित्यानंद सेक्स स्केंडल के बहाने कुछ और बातें

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नई दिल्ली से इंदौर तक आने वाली मालवा सुपरफास्ट रेलगाड़ी की यात्रा को मैं कभी नहीं भूल सकता, अगर भूल गया तो दूसरी बार उसमें यात्रा करने की भूल कर बैठूँगा। इस यात्रा को न भूलने का एक और दूसरा भी कारण है। वो है, हमारे वाले कोच में एक देसी साधू और उसकी विदेशी चेली का होना। साधू चिलम सूटे का खाया हुआ 32 साल का लग रहा था, जबकि उसके साथ साधुओं का चोला पहने बैठी वो लड़की करीबन 25-26 की होगी। उन दोनों की जोड़ी पूरे कोच मुसाफिरों का ध्यान खींच रही थी, हर कोई देखकर मेरी तरह शायद हैरत में पड़ा सोच रहा था कि आखिर ऐसी कौन सी नौबत आई होगी कि भरी जवानी में साधुओं का साथ पसंद आ गया, और वो भी चिलमबाज साधु का। मैं एक और बात भी सोच रहा था कि अगर एक महिला साथी ही चाहिए तो गृहस्थ जीवन में क्या बुराई है? जिसको त्यागकर लोग साधु सन्यासी बन जाते हैं। शायद जिम्मेदारियों से भाग खड़े होने का सबसे अच्छा तरीका है साधु बन जाना। स्वर्ग सा गृहस्थ जीवन छोड़कर पहले साधु बनते हैं, फिर समाधि छोड़कर संभोग की तरफ आते हैं, और जन्म देते हैं सेक्स स्केंडल को।
स्वामी नित्यानंद जी आजकल सेक्स स्केंडल के कारण ही तो चर्चाओं में हैं। आज तक…

लफ्जों की धूल-5

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(1) अगर हिन्दु हो तो कृष्ण राम की कसम मुस्लिम हो तो मोहम्मद कुरान की कसम घरों को लौट आओ, हर सवाल का जवाब आएगा हैप्पी हथियारों से नहीं, विचारों से इंकलाब आएगा
(2) नजरें चुराते हैं यहाँ से, वहीं क्यों टकराव होता है चोट अक्सर वहीं लगती है हैप्पी यहाँ घाव होता है।
(3) तू तू मैं मैं की लड़ाई कब तक दो दिलों में ये जुदाई कब तक खुशी को गले लगा हैप्पी पल्लू में रखेगा तन्हाई कब तक
(4) जैसे साहिर के बाद हर अमृता, एक इमरोज ढूँढती है वैसे ही मौत हैप्पी का पता हर रोज ढूँढती है

हैप्पी अभिनंदन में सुनील कटारिया

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हैप्पी अभिनंदनमें इस बार आप जिस ब्लॉग हस्ती से रूबरू होने जा रहे हैं, उसने 'कौन कहता है आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' को सच कर दिखाया है असल जिन्दगी में, लेकिन ब्लॉग जगत में तो आए हुए इन्हें बड़ी मुश्किल से ढाई माह हुए हैं। ब्लॉग ख्यालात की कलम से पर लिखने वाले युवा ब्लॉगर सुनील कटारिया यहाँ एक तरफ पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समाचार पत्रों के लिए गैर-वेतन लेखन कार्य करने के साथ - साथ  दूरदर्शन के पंजाब से चलने वाले रीजनल टीवी चैनल जालंधर दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले इवनिंग लाइव शो "पंज बजे लाईव" को होस्ट कर रहे हैं |  उन्होंने अब तक जो हासिल किया, वो खुद के बल पर हासिल किया है, तो ऐसे में लाज़मी है कि सफर रोमांचक रहा होगा, आईये जानते हैं वो क्या कहते हैं अपने निजी जीवन और ब्लॉग जगत के बारे में।
कुलवंत हैप्पी : आपको ब्लॉग जगत में आए कितना समय हो गया और इस प्लेटफार्म पर आकर कैसा लगा? सुनील कटारिया : मुझे करीब ढाई महीने ही हुए हैं इस नए मंच पर आए हुए और इस प्लेटफोर्म पर आकर बहुत अच्छ…

वत्स, तुम रो क्यों रहे हो : पीएम टू शशि थरूर

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एक बार की बात है, एक व्यक्ति रोता हुआ घर जा रहा था, रास्ते में रोककर एक साधु ने उससे पूछा, "वत्स, तुम रो क्यों रहे हो"। तो उसने कहा कि उसका साईकिल चोरी हो गया। साधु ने उसकी बात सुनते ही कहा, "भगवान ने तुमसे साईकिल छीना है, क्योंकि वो साईकिल लेने के बाद ही तो तुमको मोटर साईकिल देगा"। वो व्यक्ति साधु की बात सुनकर खुश हो गया, और इस स्वप्न के साथ घर की तरफ आँखें पौंछता हुआ चल दिया। बहुत से लोगों के साथ यह किस्सा सच साबित हो चुका है, लेकिन शशि थरूर के साथ सच साबित होगा कि नहीं, कुछ भी कह पाना मुश्किल है।
लेकिन हाँ यकीनन ट्विटर मास्टर शशि थरूर ने इस कहानी को पहले कहीं सुना जरूर होगा या फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुना डाला होगा, क्योंकि पंजाब में तो यह किस्सा बेहद लोकप्रिय है, वरना इतनी आसानी से पीएम को अस्तीफा सौंपने का खयाल तो शशि के दिमाग में न आता। शायद पीएम की ओर से ऐसा भरोसा मिल होगा कि इस बार राज्य विदेश मंत्री थे, तो अगली बार तुमको सीधा केंद्रीय विदेश मंत्री बनाया जाएगा, अगर श्री आडवानी की तरह मोदी का जादू भी नेकस्ट इलेक्शन में न चला तो, वरना हारी हुई पार्टि…

जीत है डर के आगे

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ड्यू के टीवी विज्ञापन की टैग-लाईन 'डर के आगे जीत है' मुझे बेहद प्रभावित करती है, नि:संदेह औरों को भी करती होगी। सच कहूँ तो डर के आगे ही जीत है, जीत को हासिल करने के लिए डर को मारना ही पड़ेगा, वरना डर तुम को खा जाएगा।

पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म "माई नेम इज खान" में एक संवाद है 'डर को इतना मत बढ़ने दो कि डर तुम्हें खा जाए'।
असलियत तो यही है कि डर ने मनुष्य को खा ही लिया है, वरना मनुष्य जैसी अद्भुत वस्तु दुनिया में और कोई नहीं।

मौत का डर, पड़ोसी की सफलता का डर, असफल होने का डर, भगवान द्वारा शापित कर देने का डर, जॉब चली जाने का डर, गरीब होने का डर, बीमार होने का डर। सारा ध्यान डर पर केंद्रित कर दिया, जो नहीं करना चाहिए था। एक बार मौत के डर को छोड़कर जिन्दगी को गले लगाने की सोचो। एक बार मंदिर ना जाकर किसी भूखे को खाना खिलाकर देखो। एक बार असफलता का डर निकालकर प्रयास करके देखो। असफलता नामक की कोई चीज ही नहीं दुनिया में, लोग जिसे असफलता कहते हैं वो तो केवल अनुभव।

अगर थॉमस अलवा एडीसन असफलता को देखता, तो वो हजारों बार कोशिश ना करता और कभी बल्ब ईजाद न कर पाता।
दुनिया के सबस…

ओशो सेक्स का पक्षधर नहीं

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खेतों को पानी दे रहा था, और खेतों के बीचोबीच एक डेरा है, वैसे पंजाब के हर गाँव में एकाध डेरा तो आम ही मिल जाएगा। मेरे गाँव में तो फिर भी चार चार डेरे हैं, रोडू पीर, बाबा टिल्ले वाला, डेरा बाबा गंगाराम, जिनको मैंने पौष के महीने में बर्फ जैसे पानी से जलधारा करवाया था, रोज कई घड़े डाले जाते थे उनके सिर पर, और जो डेरा मेरे खेतों के बीचोबीच था, उसका नाम था डेरा बाबा भगवान दास। गाँव वाले बताते हैं कि काफी समय पहले की बात है, गाँव में बारिश नहीं हो रही थी, लोग इंद्र देव को खुश करने के लिए हर तरह से प्रयास कर रहे थे, लेकिन इंद्रदेव बरसने को तैयार ही नहीं था। दुखी हुए लोग गाँव में आए एक रमते साधु भगवान दास के पास चले गए। उन्होंने उनसे बेनती बगैरह किया।

लफ्जों की धूल-4

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(1)
जिन्दगी का जब, कर हिसाब किताब देखा
लड़ाई झगड़े के बिन, ना कुछ जनाब देखा

लफ्जों की धूल-3

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(1)
दिमाग बनिया, बाजार ढूँढता है
दिल आशिक, प्यार ढूँढता है

शशि थरूर से सीखे, सुर्खियाँ बटोरने के ट्रिक

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अखबारों की सुर्खियों में कैसे रहा जाता है आमिर खान या किसी हॉलीवुड हस्ती से बेहतर विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर जानते हैं। यकीन न आता हो, तो पिछले कई महीनों का हिसाब किताब खोलकर देखें, तो पता चलेगा कि शशि थरूर भी राखी सावंत की तरह बिना किसी बात के सुर्खियाँ बटोरने में माहिर हैं।

हैप्पी अभिनंदन में संगीता पुरी

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हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से रूबरू होने जा रहे हैं, वो जहाँ एक तरफ हमें गत्यात्मक ज्योतिष ब्लॉग के जरिए भविष्य व वर्तमान की स्थिति से अवगत करवाती हैं, वहीं दूसरी ओर 'हमारा खत्री समाज' ब्लॉग के जरिए हमें इतिहास के साथ भी जोड़े रखती हैं।

लफ्जों की धूल - 2

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लफ्जों की धूल - 1
 (1)
उसके तो करार भी दमदार निकले,
हम ही कमजोर दिले यार निकले

अलविदा ब्लॉगिंग...हैप्पी ब्लॉगिंग

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कई महीने पहले बुरा भला के शिवम मिश्रा जी  चुपके से कहीं छुपकर बैठ गए, फिरहरकीरत हीर ने अचानक जाने की बात कही, किंतु वो लौट आई। किसी कारणवश मिथिलेश दुबे भी ब्लॉग जगत से भाग खड़े हुए थे, लौटे तो ऐसे लौटे कि न लौटे के बराबर हुए पड़े हैं।

क्या गोलियों व बमों से खत्म जो जाएगा नक्सलवाद?

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पिछले दिनों हुए नक्सली हमले के बाद भाजपा की सीनियर महिला नेता सुषमा स्वराज का बयान आया कि सेना की मदद से नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाए। उनके कहने का भाव था कि नक्सलवादियों की लाशों के ढेर बिछा दिए जाएं। उस बयान को पढ़ने के बाद दिमाग में एकाएक एक सवाल आ टपका।

लफ्जों की धूल

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(1)
भले ही,
तुम लहरों सी करो दीवानगी,
लेकिन मैं अक्सर तेरा,
किनारों की तरह इंतजार करूँगा।

हैप्पी अभिनंदन में विनोद कुमार पाण्डेय

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इस बार हैप्पी अभिनंदन में बनारस की गलियाँ छोड़, नोयडा के 62 सेक्टर में जिन्दगी के हसीं पलों का आनंद लेने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर विनोद कुमार पाण्डेय जी पधारे हैं, जो अक्सर मिलते हैं 'मुस्कराते पल-कुछ सच कुछ सपने' ब्लॉग विला पर। वो किसी पहचान के मोहताज तो नहीं, लेकिन कलम के इस धुरंधर के बारे में कुछ शब्द लिखे बिन कलम मेरी रुकने को तैयार नहीं। जैसे भूमि कितनी उपजाऊ है, इस बात का अंदाजा तो उसकी फसल से ही लगाया जा सकता है। वैसे ही इतनी की सोच कितनी युवा है, वे तो उनकी लेखनी से हम सबको पता ही चल चुकी है। अब कुछ और बातें, जो ब्लॉग जगत से जुड़ी हैं, जो उनके जीवन से जुड़ी हैं, उन पर वो क्या सोचते हैं? चलो जानते हैं उनकी जुबानी।
कुलवंत हैप्पी : आपकी रचनाएं समाज की बुराईयों पर कटाक्ष करती हैं, जो आपके भीतर छुपे हुए एक क्रांतिकारी से रूबरू करवाती हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्रांतिकारी आखिर किससे प्रेरित है?
विनोद पांडेय:
कुलवंत जी, मैं ना तो कोई बहुत पॉपुलर ब्लॉगर ठहरा और ना ही बहुत बड़ा समाज सुधारक। फिर भी आपने हैप्पी अभिनंदन के लिए मेरा चयन किया, आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
अब रही बात मेरी रचनाओं…

मुस्कराते क्यों नहीं

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श्रीगणेश से करते हैं शुरू जब हर काम
तो माँ-बाप को दुनिया बनाते क्यों नहीं।

बुरी बातों को लेकर बहस करने वालों
फिर अच्छी बातें को फैलाते क्यों नहीं।

मन में बातों का अंबार, हाथ में मोबाइल
तो मित्र का नम्बर मिलाते क्यों नहीं।

कॉलेज के दिनों में देखी कई फिल्में
फिर अब दम्पति घूमने जाते क्यों नहीं।

माँ बाप, बहन भाई, दोस्त मित्र सब हैं,
तो खुदा का शुक्र मनाते क्यों नहीं।

अच्छी है, काबिलेतारीफ है कहने वालों
फिर खुलकर ताली बजाते क्यों नहीं।

फेसबुक, ऑर्कुट को देखता हूँ तो सोचता हूँ
लोग मकान बनाने के बाद आते क्यों नहीं

कोई रोज आता है आपके इनबॉक्स में
तो आप उसके यहाँ जाते क्यों नहीं।

हैप्पी लिखता है शेयर, बनता है लतीफा,
इस बात पर मुस्कराते क्यों नहीं।

1. दम्पति-मियाँ बीवी 2.उसके यहाँ-इनबॉक्स
आभार

सेक्स एजुकेशन से आगे की बात

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देश में सेक्स एजुकेशन को लेकर अनूठी बहस चल रही है, कुछ रूढ़िवादी का विरोध कर रहे हैं और कुछ इसके पक्ष में बोल रहे हैं। लेकिन कितनी हैरानी की बात है कि किसी शिक्षा की बात कर रहे हैं हम सब, जो इस देश में आम है। सचमुच सेक्स शिक्षा इस देश में आम है, वो बात अलहदा है कि वो चोरी छिपे ग्रहण की जा रही है। इस देश में सेक्स शिक्षा आम है, इसका सबूत तो नवविवाहित जोड़ों से लगाया जा सकता है। खुद से सवाल करें, जब उनकी शादी होती है कौन सिखाता है उनको सेक्स करना। हाँ, अगर जरूरत है तो सेक्स से ऊपर उठाने वाली शिक्षा की।
इस देश का दुर्भाग्य है कि सेक्स को पाप, पति को परमेश्वर और नारी को नरक का द्वार कहा जाता है। अब सोचो, जब तीनों बातें एक साथ एकत्र होंगी, तो क्या होगा? युद्ध ही होगा और कुछ नहीं। कितनी हैरानी की बात है कि हम उसको युद्ध नहीं बल्कि सात जन्मों का पवित्र बंधन भी कहते हैं। अगर सेक्स पाप है, तो जन्म लेने वाली हर संतान पाप की देन है, अगर वो पाप की देन है तो वो पापमुक्त कैसे हो सकती है? हमने सेक्स को पहले पाप कहा, फिर शादी का बंधन बनाकर उसका परमिट भी बना दिया। हमारी सोच में कितना विरोधाभास है।
हमने कभ…

ह्यूमन एंटी वायरस

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हर बात को लेकर विरोधाभास तो रहता ही है, जैसे आपने किसी को कहते हुए सुना होगा "मुफ्त में कोई दे, तो ज़हर भी खा लें", वहीं किसी को कहते हुए सुना होगा "मुफ्त में कोई दवा भी न लें, सलाह तो दूर की बात"। हम मुफ्त में मिला ज़हर खा सकते हैं, लेकिन मुफ्त में मिली एक सही सलाह कभी निगलना नहीं चाहेंगे। फिर भी मुझ जैसे पागलों की देश में कमी नहीं, जो मुफ्त की सलाह देने में यकीन रखते हैं, जबकि वो जानते हैं कि मुफ्त की सलाह मानने वाले बहुत कम लोग हैं। इसकी स्थिति वैसी ही है जैसे किसी के प्रति सकारात्मक नजरिया, कोई आपसे कहे वो व्यक्ति बुरा है, आप नि:संदेह मान लेंगे, लेकिन अगर कोई कहे बहुत अच्छा है तो संदेह प्रकट हो जाएगा, स्वर्ग को लेकर संदेह हमेशा ही रहा है, लेकिन नरक को लेकर कोई संदेह नहीं।
मानो लो आप अपनी मस्त कार में जा रहे हैं, कार में बैठे हुए आप केवल कार के भीतर ही निगाहें रखें लाजमी तो नहीं, आप बाहर की ओर की देख रहें होते हैं, कार की जगह बस भी मान सकते हैं कोई फर्क नहीं पड़ता। आपको बाहर रोड़ पर एक महिला के पास खड़ा एक रोता हुआ बच्चा दिखाई पड़ता है, और वो रो रहा है, वो बहुत गंदा दि…

तेरे इंतजार में

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आँखें बूढ़ी हो गई, तेरे इंतजार में
और पैर भी जवाब दे चुके हैं
फिर भी दौड़ पड़ती हूँ
डाकिए की आवाज सुनकर
शायद कोई चिट्ठी हो मेरे नाम की
जिसे लिखा तुमने हो
हर दफा निराश होकर लौटती हूँ
दरवाजे से रेल गाड़ी की कूक सुनते
दौड़ पड़ती हूँ रेलवे स्टेशन की ओर
शायद अतिथि बनकर तुम पधारो,
और मैं तेरा स्वागत करूँ
तुम उजड़ी का भाग सँवारो
वहाँ भी मिलती है तन्हाई
बस स्टेंड पर तो हर रोज
आती हैं बसें ही बसें
पर वो बस नहीं आती
जिस पर से तुम उतरो
सुना है मैंने
एअरपोर्ट पर उतरते हैं हररोज कई हवाई जहाज
पर तुम्हारा जहाज उड़ता क्यों नहीं उतरने के लिए
वक्त की कैंची को, क्यों मैं ही मिली हूँ कुतरने के लिए

तुम्हें याद है
जवानी की शिख़र दोहपर थी
हाथों पर मंहेदी का रंग
और बाँहों में लाल चूड़ा था
कुछ महीने ही हुए थे
दुल्हन बने
तेरे घर का श्रृंगार बने
जब तुम, कागजों के ढेर
जुटाने निकल गए थे
दूर सफर पर
तब से अब तक इंतजार ही किया है
और करती रहूँगी, अंतिम साँस तक
बच्चू दे पापा,
तेरी लाजो... आभार