लेकिन, मुझे तो इक घर की जरूरत है

(1)

जिस्म के जख्म
मिट्टी से भी आराम आए
रूह के जख्मों के लिए
लेप भी काम न आए

(2)
वक्त वो बच्चा है,
जो खिलौने तोड़कर
फिर जोड़ने की
कला सीखता है

(3)
माँ का आँचल
तो हमेशा याद रहा,
मगर, 
भूल गया बूढ़े बरगद को
छाँव तले जिसकी खेला अक्सर।

(4)
जब कभी भी, टूटते सितारे को देखता हूँ
यादों में किसी, अपने प्यारे को देखता हूँ।

(5)
जब तेरी यादें धुँधली सी होने लगे,
तेरे दिए जख्म खरोंच लेता हूँ।

(6)
तेरे शहर में मकानों की कमी नहीं,
लेकिन, मुझे तो इक घर की जरूरत है
वेलकम लिखा शहर में हर दर पर
खुले जो, मुझे उस दर की जरूरत है

आभार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में संजय भास्कर

हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से रूबरू होने जा रहे हैं, उस ब्लॉगर हस्ती ने बहुत कम समय में बहुत ज्यादा प्यार हासिल कर लिया है, अपने नेक इरादों और अच्छी रचनाओं के बल पर। वो अपनी बात कहने के लिए ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि अपने दिल की बात रखने के लिए वो दो चार पंक्तियाँ ही लिखते हैं, लेकिन पढ़ने का शौक इतना कि वो हर ब्लॉग पर मिल जाएंगे, जैसे सूर्य हर घर में रोशनी कर देता है, वैसे ही हमारे हरमन प्यारे ब्लॉगर संजय भास्कर जी भी हर ब्लॉग अपने विचारों का प्रकाश जरूर डालकर आते हैं। मैंने जब उनके ब्लॉग की पहली पोस्ट देखी, जो 19 जुलाई 2009 को प्रकाशित हुई, वो रोमन लिपि में थी सिर्फ एक लाईन में, लेकिन उनकी 'आदत.. मुस्कुराने की' ने उनको हिन्दी लिपि सीखने के लिए मजबूर कर ही दिया। उनकी मुस्कराने, पढ़ने और कुछ नया सीखने की आदत ने उनको एक शानदार ब्लॉगर बना ही दिया। आगे के बारे में वो क्या सोचते हैं, इसके बारे जाने के लिए पढ़िए, मेरे सवाल, उनके जवाब।

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉगदुनिया में कैसे, कब और क्यों आए? यहाँ आने के बाद क्या कभी कुछ अलग सा महसूस हुआ?
संजय भास्कर :
मुझे ब्लॉगिंग से जोडऩे का श्रेय मैं अपने मित्र मलखान (आमीन) को देना चाहूंगा। कुछ दोस्त बीड़ी सिगरेट शराब आदि का नशा कराते हैं, उन्होंने मुझे ब्लॉगिंग का नशा लगाया। लगभग एक साल हो ही गया है। महसूस करता हूं कि मेरे जीवन में कुछ रंग शामिल हो गए हैं, जिनकी पहले कमी महसूस होती थी।

कुलवंत हैप्पी : एक ब्लॉगर के रूप में आपकी ब्लॉगदुनिया में अच्छी पहचान बन चुकी है, लेकिन हम जानना चाहेंगे असल दुनिया में आप अभी क्या पहचान बनाए हुए हैं?
संजय भास्कर :
ब्लॉगिंग की दुनिया भी तो असल दुनिया का ही हिस्सा है। हर जगह अलग पहचान होती है। मेरे दोस्तों की नजर में मैं क्या हूं, यह तो वही बता सकते हैं। चाहता हूं कि जीवन में किसी के दिल को चोट न पहुंचाऊं। मैं मुस्कुराता रहना चाहता हूं और दूसरों को भी मुस्कुराहट देना चाहता हूं। वैसे आजीविका के लिए टाटा इंडीकॉम के फतेहाबाद (हरियाणा) स्थित ऑफिस में कार्यरत हूँ, पिछले करीबन दो साल से, और साथ साथ पत्रकारिता की पढ़ाई भी चल रही है।

कुलवंत हैप्पी : जैसे कि आपने बताया कि आप टाटा इंडीकॉम में लोगों की दिक्कतों का समाधान करते हैं, क्या कभी लोगों की शिकायतें सुनते सुनते आप अपने ब्लॉग के शीर्षक (आदत..मुस्कराने की) का उल्लंघन करते हैं?
संजय भास्कर :
गुस्सा मानवीय व्यवहार का एक हिस्सा है। कोई इसे ज्यादा इस्तेमाल करता है तो कोई कम। मेरी कोशिश रहती है कि इस शीर्षक का उल्लंघन न करूं, लेकिन अगर कोई बात न समझे तो कभी-कभार हो भी जाता है।

कुलवंत हैप्पी : सुना है कि आप पत्रकारिता की पढ़ाई भी साथ साथ कर रहे हैं, क्या पत्रकारिता की दिशा में कैरियर बनाने के लिए टाटा इंडीकॉम का अनुभव काम आएगा?
संजय भास्कर :
अनुभव हर जगह काम आता है। शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र हो, जहां अनुभव काम न आता हो। मुझे लगता है कि पत्रकारिता का क्षेत्र काफी बड़ा है। दुनिया की हर चीज इसके घेरे में है। मेरा काम लोगों से इंटरेक्शन का भी है, जो हर क्षेत्र में जरूरी है।

कुलवंत हैप्पी : आप ज्यादातर अपने भावों को चार पाँच पंक्तियों में ही व्यक्त करते हैं, इसके पीछे कोई खास वजह?
संजय भास्कर :
पत्रकारिता का नियम है कि कम शब्दों में पूरी बात समझाई जाए। बस इसीलिए।

कुलवंत हैप्पी: कोई ऐसा रोचक लम्हा या सीख देती घटना, जो हमारे साथ बांटना चाहते हों?
संजय भास्कर :
हर लम्हा, हर घटना कुछ सिखाते हैं, किसी लम्हे का जिक्र करूं, किसका नहीं। अभी पिछले दिनों की बात है, जब ऑफिस में पुलिस वाले आ धमके थे और मेरे पैरों के तले से जमीं निकल गई थी। जहाँ इस घटना ने कुछ समय के लिए मेरी साँसें अंदर की अंदर और बाहर की बाहर रोक दी थी, वहीं एक अच्छा अनुभव भी करवाया। हुआ यूँ कि, फतेहाबाद के जितने मोबाइल ग्राहक हैं, उनके पहचान पत्र मुझसे होकर गुजरते हैं, लेकिन एक ग्राहक का पहचान पत्र देखने में छोटी सी चूक कर दी, जिसने उसका गलत इस्तेमाल कर दिया, और पुलिस पहुंच गई हमारे दरबार। जैसे तैसे कर मामला तो सुलझा लिया, लेकिन उसके बाद एक बात पक्की कर ली, अब सगे भाई को भी कनेक्शन बिना पहचान पत्र देखे नहीं देना।

कुलवंत हैप्पी :चलते चलते युवा सोच युवा खयालात के पाठकों और ब्लॉगर साथियों के लिए कोई संदेश जरूर दें?
संजय भास्कर :
हैप्पी जी एंड ऑल, बी हैप्पी।
चक्क दे फट्टे  
संजय के दोस्त आमीन ने बताया कि कोई व्यक्ति संजय को बार बार फोन करके तंग किए जा रहा था। संजय ने तंग आकर पुराना नम्बर बंद कर दिया एवं नया सिम ले लिया। और फिर उस नए नम्बर से उस व्यक्ति को एसएमएस किया, "वो पुराना सिम मैंने बंद कर दिया, अब तेरा बाप भी मुझे तंग नहीं कर सकता'।
आभार
कुलवंत हैप्पी

नेता, अभिनेता और प्रचार विक्रेता

Change Your Brain, Change Your Body: Use Your Brain to Get and Keep the Body You Have Always Wantedजब हम तीनों बहन भाई छोटे थे, तब आम बच्चों की तरह हमको भी टीवी देखने का बहुत शौक था, मुझे सबसे ज्यादा शौक था। मेरे कारण ही घर में कोई टीवी न टिक सका, मैं उसके कान (चैनल ट्यूनर) मोड़ मोड़कर खराब कर देता था। पिता को अक्सर सात बजे वाली क्षेत्रिय ख़बरें सुनी होती थी, वो सात बजे से पहले ही टीवी शुरू कर लेते थे, लेकिन जब कभी हमें टीवी देखते देखते देर रात होने लगती तो बाहर सोने की कोशिश कर रहे पिता की आवाज आती,"कंजरों बंद कर दो, इन्होंने तो पैसे कमाने हैं, तुम्हें बर्बाद कर देंगे टीवी वाले"।

तब पिता की बात मुझे बेहद बुरी लगती, लगे भी क्यों न टीवी मनोरंजन के लिए तो होता है, और अगर कोई वो भी न करने दे तो बुरा लगता ही है, लेकिन अब इंदौर में पिछले पाँच माह से अकेला रह रहा हूँ, घर में केबल तार भी है, मगर देखने को मन नहीं करता, क्योंकि पिता की कही हुई वो कड़वी बात आज अहसास दिलाती है कि देश के नेता, अभिनेता और अब प्रचार विक्रेता (न्यूज चैनल) भी देश की जनता को उलझाने में लगे हुए हैं।

आज 24 घंटे 7 दिन निरंतर चलने वाले न्यूज चैनल वो सात बजे वाली खबरों सी गरिमा बरकरार नहीं रख पा रहे, पहले जनता को नशे की अवस्था में रखने का काम केवल अभिनेता लोग करते थे, लेकिन अब वो काम हमारे प्रचार विक्रेता भी करने लगे हैं। पहले एक को रोते थे हम, अब तो पूरे का पूरा तलाब गंदा हो गया है। देश में सेक्स को तो निरंतर पाप कह कहकर दबाया गया, लेकिन सेक्स को भीतर ज्वालामुखी बनाने वाले सिनेमे रूपी लावे को निरंतर आजादी दी गई, जल्द ही रात को पोर्न फिल्मों का प्रचलन भी शुरू हो जाएगा।

मेरे पिता कोई कॉलेज प्रोफेसर नहीं थे, बल्कि एक आम किसान थे, फिर भी आज उनकी एक एक बात सत्य होती महसूस हो रही है, वो अक्सर कहते थे आँवले और समझदार की बात का स्वाद बाद में मालूम पड़ता है, सच में आज वो स्वाद महसूस हो रहा है। देश की जनता का ध्यान असली मुद्दों की तरफ जाए ही ना, ऐसा करने के लिए मनोरंजन को अश्लीलता की सभी हदें पार करने की आज्ञा दे डाली। इतना ही नहीं, अपनी प्रचारक रैलियों में भी सुंदरियों को लाकर खड़ा करना शुरू कर दिया नेताओं ने। जहाँ जहाँ टीवी मनोरंजन जैसी नशीली वस्तु नहीं पहुंची, वहां वहाँ लोग अपने मुद्दों को बनवाने के लिए, अपने हकों को माँगने के लिए गलत रास्तों की ओर चल दिए, और बन गए नक्सलवादी।

टीवी मनोरंजन के बाद एक आस की किरण बन उभरे थे न्यूज चैनल, लेकिन वो भी एक प्रचार विक्रेता बनकर रह गए, वो भी आम आदमी को भ्रमित करने लगे। आज ख़बरों में क्या है, नेता, अभिनेता और प्रचार विक्रेता। यकीन नहीं आता तो हाल में उठ रहा अमिताभ बच्चन का मसला क्या है? शाहरुख खान बाल ठाकरे का मुद्दा क्या था? प्रचार विक्रेता लगा हुआ है, फुल प्रचार करने में। मैं मीडिया को एक डाकिया मानता था, जो आम जनता की बात खुली चिट्ठी में लिखकर सरकार तक और सरकार की बात आम जन तक पहुंचाता था, लेकिन आज तो जनता तक सिर्फ और सिर्फ गॉशिप पहुंचाया जाता है या फिर सरकारी विज्ञापनों में प्रकाशित मन अनुसार तैयार किए विकास के झूठे आंकड़े।
भार
कुलवंत हैप्पी

कुछ क्षणिकाओं की पोटली से

1.
हम भी दिल लगाते, थोड़ा सा सम्हल
पढ़ी होती अगर, जरा सी भी रमल

-: रमल- भविष्य की घटनाएं बताने वाली विद्या

(2)
मुश्किलों में
भले ही अकेला था मैं,
खुशियों के दौर में,
ओपीडी के बाहर खड़े मरीजों से लम्बी थी
मेरे दोस्तों की फेहरिस्त।

ओपीडी-out patient department

(3)
खुदा करे वो भी शर्म में रहें और हम भी शर्म में रहें
ताउम्र वो भी भ्रम में रहें और हम भी भ्रम में रहें
बेशक दूर रहें, लेकिन मुहब्बत के पाक धर्म में रहें
पहले वो कहें, पहले वो कहें हम इस क्रम में रहें
(4)
मत पूछ हाल-ए-दिल
क्या बताऊं,
बस इतना कह देता हूँ
खेतिहर मजदूर का नंगा पाँव देख लेना
तूफान के बाद कोई गाँव देख लेना

(5)
मुहब्बत के नाम पर
जमाने ने लूटा है कई दफा
मुहब्बत में पहले सी रवानगी लाऊं कैसे

(6)
औरत को कब किसी ने नकारा है
मैंने ही नहीं, सबने औरत को
कभी माँ, कभी बहन,
कभी बुआ, कभी दादी,
कभी नानी, तो कभी देवी कह पुकारा है।
सो किओं मंदा आखिए, जितु जन्महि राजान
श्री गुरू नानक देव ने उच्चारा है।
वो रोया उम्र भर हैप्पी,
जिसने भी औरत को धिधकारा है।


(7)
मोहब्बत मेरी तिजारत नहीं,
प्रपोज कोई बुझारत नहीं,
दिल है मेरा जनाब दिल है
किराए की इमारत नहीं।

(8)
एक ही जगह थे हम दोनों
उसने फूल, मैंने खार देखे
एक ही जगह थे हम दोनों
मैंने गम, उसने गमखार देखे
एक ही जगह थे हम दोनों
मैंने भीड़ ही भीड़ देखी,
और उसने हँसते रुखसार देखे

गमखार - गम दूर करने वाला

आभार
कुलवंत हैप्पी

आओ करते हैं कुछ परे की बात

The Big Short: Inside the Doomsday Machine
विज्ञापन
बहुत रो लिए किसी को याद कर
नहीं करनी, अब मरे की बात

खिलते हुए फूल, पेड़ पौधे बुला रहे
छोड़ो सूखे की, करो हरे की बात

आलम देखो, सोहणी की दीवानगी का
कब तक करते रहेंगे घड़े की बात

आओ खुद लिखें कुछ नई इबारत
बहुत हुई देश के लिए लड़े की बात

चर्चा, बहस में ही गुजरी जिन्दगी
आओ करते हैं कुछ परे की बात


सोहणी- जो अपने प्रेमी महीवाल को मिलने के लिए कच्चे घड़े के सहारे चेनाब नदी में कूद गई थी, और अधर में डूब गई थी।
परे की बात : कुछ हटकर..



आभार
कुलवंत हैप्पी

कंधे बदलते देखे

चिता पर तो अक्सर लाशें जलती हैं दोस्तो,
मैंने तो जिन्दा इंसान चिंता में जलते देखे।

तब जाना, जरूरत न पैरों की चलने के लिए
जब भारत में कानून बिन पैर चलते देखे।

फरेबियों को जफा भी रास आई दुनिया में,
सच्चे दिल आशिक अक्सर हाथ मलते देखे।

सुना था मैंने, चार कंधों पर जाता है इंसाँ
मगर, कदम दर कदम कंधे बदलते देखे।

कुछ ही थे, जिन्होंने बदले वक्त के साँचे
वरना हैप्पी, मैंने लोग साँचों में ढलते देखे। 

चलते चलते : प्रिय मित्र जनक सिंह झाला की कलम से निकले कुछ अल्फाज।
हमारे जनाजे को उठाने वाले कंधे बदले,
रूह के रुकस्त होने पै कुछ रिश्ते बदले,
एक तेरा सहारा काफी था मेरे दोस्त,
वरना, जिंदगी में कुछ लोग अपने आपसे बदले।
Soldier of Love
आभार
कुलवंत हैप्पी

मिलन से उत्सव तक

तुमने मुझे गले से लगा लिया
पहले की भांति फिर अपना लिया
न कोई गिला किया,
ना ही शिकवा शिकायत
ना ही दी मुझे कोई हिदायत
बस पकड़कर चूम लिया मुझे
मानो तुम,
मेरे ही इंतजार में थे
तुम सच जानो,
मैं इस स्पर्श को भूल सा गया था
किसी के किए हुए एहसान की तरह
मैं भी उलझकर रह गया था
मायावी जाल में आम इंसान की तरह
मगर आज मेरे कदम मुझे खींच लाए
छत्त की ओर
मुझे ऐसा खींचा, जैसे पतंग खींचे डोर
छत्त पर आते ही मुझे,
तुमने प्रकाशमयी बाँहों में भर लिया
तेरे इस स्पर्श ने जगा डाला
मेरी सोई आत्मा को
तेरे प्रकाश की किरणें बूँदें बन
बरसने लगी
मेरे रूह की बंज़र जमीं
फिर से हरी भरी हो गई
तुमने मुझे जैसे ही छूआ,
हवाओं ने पत्तों से टकराकर
वैसे ही संगीत बना डाला
पंछियों ने सुर में गाकर
तेरे मेरे मिलन को उत्सव बना डाला।
तेरे प्रकाश ने भीतर का अंधकार
मिटा दिया,
जैसे लहरों ने नदी के किनारे लिखे नाम।
इस रचना द्वारा मैंने सूर्य और मानवी प्रेम को दर्शाने की कोशिश की है। दोनों के बीच के रिश्ते को दर्शाने की कोशिश। सूर्य और मानव में भी एक प्रेमी प्रेमिका का रिश्ता है, लेकिन प्रेम शून्य की अवस्था में उत्पन्न होता है। जब मैं और तुम का फासला खत्म हो जाए, और दोनों एक हो जाएं।
भार
कुलवंत हैप्पी

मन की बातें...जो विचार बन गई

  1. हँसता हुआ चेहरा, खिलता हुआ फूल, उगता हुआ सूर्य व बहता हुआ पानी रोज देखने की आदत डालो। मुस्कराना आ जाएगा। -: कुलवंत हैप्पी
  2. श्वर को आज तक किसी ने परिभाषित नहीं, लेकिन जो मैंने जाना, वो ईश्वर हमारे भीतर है, और कला ही उसका असली रूप है। तुम्हारी कला ही तुम को सुख शांति यश और समृद्धि दे सकती है। जो तुम ईश्वर से पाने की इच्छा रखते हो। -: कुलवंत हैप्पी
  3. बॉस की झूठी जी-हजूरी से अच्छा है, किसी गरीब को सच्चे दिल से थैंक्स कहना। क्योंकि यहाँ प्रकट किया धन्यवाद तुम्हें आत्मिक शांति देगा। -: कुलवंत हैप्पी
  4. गर इंवेस्टमेंट करना ही है, तो क्यों न प्रेम किया जाए, ताकि जब रिटर्न हो, तो हमें कागज के चंद टुकड़ों से कुछ बेहतर मिले। :-कुलवंत हैप्पी
  5. हे ईश्वर, जो भी तुमने मुझे दिया, वो मेरे लिए अत्यंत दुर्लभ है। मैं उसके लिए तेरा सदैव शुक्रिया अदा करता हूँ।:-कुलवंत हैप्पी
आभार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में गिरीश बिल्लोरे

हैप्पी अभिनंदन में आज जिस ब्लॉगर हस्ती से आपकी मुलाकात होने जा रही है, वो लेखन ब्लॉगिंग से पॉडकास्टिंग ब्लॉगिंग तक पहुंच बना चुके हैं। वो जबलपुर में बैठकर भी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे ब्लॉगर साथी के पास कुछ ही मिनटों में पहुंचकर, अपनी मधुर मीठी आवाज से उनके कानों में बातों का शहद खोलते, कुछ सवालों के मार्फत उनके भीतर के विचारों को जन जन तक पहुंचा देते हैं। अब उनके बारे में कुछ और कहने की जरूरत तो रह ही न गई, आप समझ ही गए होंगे मैं उनकी बात कर रहा हूँ, जो ब्लॉगर जगत के साँचे में बिल्कुल फिट बैठ गए, लेकिन गीत लिखने के शौकीन फिर भी कहते हैं गिरीश बिल्लोरे मिसफिट

कुलवंत हैप्पी : आपने ब्लॉगवुड में आगमन कब और कैसे किया?
गिरीश बिल्लोरे :
उस बच्चे के लिए नेट से जुड़ा जिसे आप सब आभास जोशी के नाम से जानतें हैं, बस मुझे नेट पर मिली श्रद्धा जैन जी और फिर पूर्णिमा वर्मा जी फिर छपाक से एक दिन मिले एक उड़न तश्तरी आई तीनों ने बना दिया ब्लॉगर।

कुलवंत हैप्पी : आपका लेखन ब्लॉगिंग से पॉडकास्टिंग ब्लॉगिंग की ओर जाना कैसे हुआ?
गिरीश बिल्लोरे :
किसी कवि नें कहा ''मैं वो परवाना नहीं जो आग में जल के मरे मुझको शम्मा के ज़लाने में मज़ा आता है" बस फिर मैंने पाया की पॉडकास्टिंग एक वो शमा है, जिसकी ओर कोई देख भी नहीं रहा ख़ुशी बेगानी जी और अन्य लोगों के बाद किसी ने इधर नहीं देखा बस दिमाग चल गया और चल निकली पाडकास्टिंग।
 

कुलवंत हैप्पी : एक प्रतिष्ठ ब्लॉगर के रूप में आपकी पहचान से तो हम रूबरू हैं, लेकिन असल जिन्दगी में रोजी रोटी चलाने के लिए  कौन सी जगह सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, हमें बताएं?
गिरीश बिल्लोरे :
भाई, अपनी जन्म कुण्डली में महिलाओं की सेवा का बिंदु दर्ज है, बस महिला बाल विकास में बाल विकास परियोजना अधिकारी सह प्रोटेक्शन-आफिसर डोमेस्टिक वायलेंस फॉर वूमेन एंड चाइल्ड के टूर पर काम कर रहा हूम स्टेट ऑफ़ एम् पी में।

कुलवंत हैप्पी : आप खुद एक प्रतिष्ठ ब्लॉगर हैं, इसके अलावा आप पॉडकास्टिंग साक्षात्कार के दौरान कई ब्लॉगरों से विचारों का आदान  प्रदान भी करते रहते हैं, उसके आधार हम जानना चाहेंगे आपकी ब्लॉग के भविष्य और वर्तमान के बारे में क्या प्रतिक्रिया है?  
गिरीश बिल्लोरे : सभी की नज़र में ब्लॉगिंग का कल बेहद उजियारा है. मुझे भी कोई शक नहीं आप भी शक मत कीजिए हैप्पी जी बी हैप्पी।

कुलवंत हैप्पी : आपने जब से पॉडकास्टिंग ब्लॉगिंग शुरू की है, आपने लेखन ब्लॉगिंग की ओर से ध्यान हट लिया, क्या अब आप इस ओर रुख नहीं करेंगे?
गिरीश बिल्लोरे : कहावत याद है न ''चोर चोरी छोड़ देगा हेरा फेरी कैसे छोड़ेगा?'' हैप्पी जी मूलत: लेखक गीतकार हूँ ! सवाल ही पैदा नहीं होता लेखन से अलविदा कहने का। अरे भाई इस दौरान मैं अपना लेखन जारी रखे हुए हूँ. देखिये मिसफिट पर.

कुलवंत हैप्पी : जहाँ तक मुझे जानकारी है, आप एक अच्छे ब्लॉगर होने के साथ साथ अच्छे गीतकार भी हैं, क्या आप हिन्दी संगीत  जगत में बतौर गीतकार स्थापित होने की सोच रहे हैं?
गिरीश बिल्लोरे : जी, मेरा लक्ष्य भी अपने हिन्दी गीतों को स्वर-बद्ध कराना है, अब तक मेरे दो एलबम निकल चुके हैं एक नर्मदा अमृत वाणी [पंडित रवीन्द्र शर्मा की आवाज़ में ], दूसरा बावरे-फकीरा [आभास जोशी की आवाज़ में ] तीसरे की तैयारी में हूँ जो टंगटविषटर [लिख नहीं पा रहा हूं जीभ-पलट गीत समझिए जी] गीतों/प्रेम गीतों का होगा।

कुलवंत हैप्पी : आप काफी सुलझे हुए ब्लॉगर में शामिल हैं, ऐसे में आप से एक सवाल पूछना चाहूँगा कि ब्लॉगर जगत में आए दिन  किसी न किसी बात को लेकर विवाद होता रहता है, क्या वो ब्लॉगवुड के हित में है?
गिरीश बिल्लोरे : कदापि नहीं-नहीं, यहां तक की उनके हित में भी नहीं, जो गैंगस्टर होते हैं. ऐसा वे सोचतें हैं. की वो जीत गए पर आईने में अपनी शक्ल देखें तो खुद को बांच सकते हैं. कितनी कालिख पुती होती है चेहरों पर।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगर जगत में गुटबाजी भी देखने को मिलती है, क्या आप उस गुटबाजी को उचित मानते हैं, और क्या वो सार्थक  ब्लॉगिंग के लिए नुकसान देह नहीं है?
गिरीश बिल्लोरे :
गुटबाज़ लोग ब्लॉगिंग का नहीं खुद का इतिहास बिगाड़ रहे हैं. देखना कुलवंत भैया खरा सोना ही टिकेगा, बाकी सब ख़त्म हो जाएगा।

कुलवंत हैप्पी : आपकी जिन्दगी का एक रोचक लम्हा, जो आप हमारे साथ बाँटना चाहते हों?
गिरीश बिल्लोरे  :
कई हैं किन्तु हालिया अरे नहीं १४ मार्च २००९ की बात है बावरे-फकीरा लांचिंग की तैयारी के समय ऑडिटोरियम में तैयारीयां चल रही थी। मेरे एक मित्र ने अपनी विशेषज्ञता का परिचय देते हुए मेरे बड़े भाई साहब से लगभग तीन सौ सीट्स तक इशारा करते हुए कहा ''भैया, इस कार्यक्रम में तीन सौ लोग यानी 40 परसेंट सीट भर जाएँ तो समझिए आप सफल हुए'। मैंने देखा भाई साहब उस मित्र की बात सुन कर मुस्कुरा रहे थे। ठीक सात बजे हाल की पूरी बारह सौ कुर्सियां भर गईं और दीवारों से टिके लोग दिखाई दे रहे थे कुछ बाहर से कार्यक्रम सुन रहे थे, मित्र इस चमत्कार से हतप्रभ जब मुझसे कुछ कहने आये तो बस उस वक्त ईश्वर ने मुझसे कहलवा दिया ''भाई, तुमने सतीश भैया से जो कहा था उसे साईं बाबा ने दिल पे ले लिया और भेज दिए इतने लोग '' कुलवंत जी जो मैं कर रहा हूँ सच में मैं नहीं करता ईश्वर ही करता है। मैं तो बस करता हुआ दिखता हूँ जो कदापि घमंड की वज़ह ही नहीं ''बुल्ला की जाणां मैं कौण?'' यही ब्रह्म सत्य है।

कुलवंत हैप्पी : चलते चलते आप युवा सोच युवा खयालात के पाठकों और अन्य ब्लॉगर साथियों के एक संदेश जरूर दें?
गिरीश बिल्लोरे :
युवा सोच युवा खयालात के पाठकों को क्या कहूं सब एक से बढकर एक जबर्दस्त प्रतिभाशाली हैं। बस इतना ज़रूर कहूंगा ''इश्क कीजै सरेआम खुल कर कीजै- भला पूजा भी कोई छिप छिप के किया करता है?

चक्क दे फट्टे  
सुनना है कि एक बार हमारे प्रसिद्ध ब्लॉगर भूरा मिस्त्री की पत्नि अपने मायके गई हुई थी, करीबन बीस दिन बाद पत्नि का फोन आया, आकर ले जाओ, बीस दिन में आधी रह गई। आगे ब्लॉगर साहिब कहाँ कम थे, उन्होंने भी तुरंत कह दिया, कोई बात नहीं बस बीस दिन और ठहर जाओ।

भार
कुलवंत हैप्पी

लव सेक्स और धोखा बनाम नग्न एमएमएस क्लिप

फिल्म के निर्देशक और निर्माता ने फिल्म का शीर्षक समयोचित निकाला है, क्योंकि ज्यादातर दुनिया ऐसी होती जा रही है, प्रेम अभिनय की सीढ़ी जिस्म के बंगले तक पहुंचने के लिए लोग लगाते हैं, स्वार्थ पूरा होते ही उड़ जाते हैं जैसे फूलों का रस पीकर तितलियाँ। मुझे फिल्म के शीर्षक से कोई एतराज नहीं, लेकिन फिल्म समीक्षाएं पढ़ने के बाद फिल्म से जरूर एतराज हो गया है, ऐसा भी नहीं कि मैं कह रहा हूँ कि खोसला का घोंसला और ओए लक्की लक्की ओए जैसी फिल्म देने वाला निर्देशक एक घटिया फिल्म बनाएगा। 
 


मैं जो बात करने जा रहा हूँ, वो फिल्म में न्यूड सीन के बारे में है, कहते हैं कि निर्देशक ने बहुत साधारण वीडियो कैमरों से बहुत ही उम्दा ढंग से इन सीनों को फिल्माया है। अगर कोई साधारण कैमरे से अच्छी चीज का फिल्मांकन करता है तो इस बात के लिए उसकी प्रशंसा कर सकता हूँ, अगर कोई कहता है कि उसने नग्न एमएमएस क्लिप को भी बढ़िया ढंग से शूट किया तो मुझे समझ नहीं आता कि उसकी प्रशंसा कैसे और क्यों करूँ। हाँ, बात कर रहे थे, फिल्म में नग्न दृश्य डालने की, शायद पहली बार ऐसा हिन्दी फिल्म में हुआ, हमबिस्तर होते तो हर फिल्म में दिखाई ही देते हैं, मगर बिल्कुल नग्न दृश्य फिल्माने का साहस तो दिवाकर बनर्जी ने किया है, जबकि इससे पहले फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर एवं अन्य फिल्म निर्माता निर्देशकों की फिल्मों से सेंसर ने ऐसे दृश्य कई दफा हटाए हैं, मगर इस बार सेंसर ने इनको धुंधल करने का आदेश दिया। अगर फिल्म में नग्न दृश्य फिल्माए गए हैं, तो लाजमी में है कि दृश्य भी उस तरह फिल्माए गए होंगे, जैसे नग्न फिल्मों में फिल्माए जाते हैं, या जैसे डीपीएस स्कूल की छात्रा का अश्लील एमएमएस को फिल्मा कर बाजार में भेज दिया गया था, और देश में शोर मच गया था। मगर जब वो ही दृश्य दिवाकर बनर्जी ने साधारण कैमरे द्वारा फिल्माया तो कुछ लोगों ने उसकी तारीफ की, क्या खूब फिल्माया है, लेकिन तारीफ करने वाले भूल गए कि इन दोनों घटनाओं में सिर्फ फर्क इतना है कि इस दृश्य को व्यवसाय के तौर पर फिल्माया गया है, इस दृश्य में काम करने वाला हर व्यक्ति या कलाकार व्यवसाय से जुड़ा हुआ है, और वो एमएमएस में शामिल छात्रा केवल धोखे की शिकार थी। 

मगर दोनों दृश्य में नग्नता तो एक सी ही है, फिर शाबाशी किस बात की दूँ, निर्देशक को। हाँ, अगर नग्न दृश्य फिल्माने के लिए ही शाबाशी देनी है, तो नग्न फिल्में बनाने वाले हर निर्देशक को दे डालो। अगर आप इसको अभिनय कहते हैं तो मैं उसको भी अभिनय कहता हूँ, जो उस दौरान उस लड़की के साथ किया गया, शायद वो करने वाला फिल्म कलाकार न हो, लेकिन असली जिन्दगी का एक घटिया मानसिकता का शिकार कलाकार तो था ही, जो चेहरे पर मित्रता एवं विश्वास का मॉस्क लगाकर अभिनय कर रहा था। दिवाकर बनर्जी का फिल्माया हुआ फिल्म दृश्य और वो एमएमएस वीडियो क्लिप दोनों एक बराबर हैं, लेकिन लोगों की देखने की सोच क्या कहती है मुझे नहीं पता। हो सकता है कि इन दृश्यों को फिल्मा रही लड़कियाँ खुद को बड़ी अभिनेत्रियाँ मान रही हों, लेकिन जिस्म और संवेदनाएं तो इनके दिल में भी वैसी ही हैं, जैसी उस एमएमएस की शिकार लड़की की थी।

कुछ टुकड़े शब्दों के

(1)
तेरे नेक इरादों के आगे,
सिर झुकाना नहीं पड़ता
खुद ब खुद झुकता है
ए मेरे खुदा।

(2)
मेरे शब्द तो अक्सर काले थे,
बिल्कुल कौए जैसे,
फिर भी
उन्होंने कई रंग निकाल लिए।

(3)
कहीं जलते चिराग-ए-घी
तो कहीं तेल को तरसते दीए देखे।

(4)
एक बार कहा था
तेरे हाथों की लकीरों में
नाम नहीं मेरा,
याद है मुझे आज भी,
लहू से लथपथ वो हाथ तेरा

(5)
पहले पहल लगा, मैंने अपना हारा दिल,
फिर देखा, बदले में मिला प्यारा दिल।

(6)
दामन बचाकर रखना
जवानी में इश्क की आग से
घर को आग लगी है
अक्सर घर के चिराग से
कह गया एक अजनबी राहगीर
चलते चलते

लक्ष्य पर रख निगाह
एकलव्य की तरह
जो भी कर अच्छा कर
एक कर्तव्य की तरह
कह गया एक अजनबी राहगीर
चलते चलते

जितनी चादर पैर उतने पसारो,
मुँह दूसरी की थाली में न मारो 
कह गया एक अजनबी राहगीर
चलते चलते

कबर खोद किसी ओर के लिए
वक्त अपना जाया न कर
कहना है काम जमाने का,
बात हर मन को लगाया न कर
कह गया एक अजनबी राहगीर
चलते चलते

भार
कुलवंत हैप्पी

आओ चलें आनंद की ओर

हिन्दुस्तान में एक परंपरा सदियों से चली आ रही है, बचपन खेल कूद में निकल जाता, और जवानी मस्त मौला माहौल के साथ। कुछ साल परिवार के लिए पैसा कमाने में, अंतिम में दिनों में पूजा पाठ करना शुरू हो जाता है, आत्मशांति के लिए। हम सारी उम्र निकाल देते हैं, आत्म को रौंदने में और अंत सालों में हम उस आत्म में शांति का वास करवाना चाहते हैं, कभी टूटे हुए, कूचले हुए फूल खुशबू देते हैं, कभी नहीं। टूटे हुए फूल को फेवीक्विक लगाकर एक पौधे के साथ जोड़ने की कोशिश मुझे तो व्यर्थ लगती है, शायद किसी को लगता हो कि वो फूल जीवित हो जाएगा। और दूसरी बात। हमने बुढ़ापे को अंतिम समय को मान लिया, जबकि मौत आने का तो कोई समय ही नहीं, मौत कभी उम्र नहीं देखती। जब हम बुढ़ापे तक पहुंच जाते हैं, तब हमें क्यों लगने लगता है हम मरने वाले हैं, इस भय से हम क्यों ग्रस्त हो जाते हैं। क्या हमने किसी को जवानी में मरते हुए नहीं देखा? क्या कभी हमने नवजात को दम तोड़ते हुए नहीं देखा? क्या कभी हमने किशोरावस्था में किसी को शमशान जाते हुए नहीं देखा? फिर ऐसा क्यों सोचते हैं  कि बुढ़ापा अंतिम समय है, मैंने तो लोगों को 150 वर्ष से भी ज्यादा जीते हुए देखा है, और वो भी तंदरुस्ती के साथ। मेरी माँ की बुआ करीबन 109 साल की होकर इस दुनिया से गई थी। हमने साठ सतर साल की उम्र को ही क्यों अंतिम सीमा मान लिया, हमने क्यों निर्धारित कर लिया कि हमारा अंतिम समय है। अगर सोचना ही है तो ऐसा सोचो कि आज का दिन अगर हमारा अंतिम दिन होता तो हम समाज को क्या देकर जाते, हम क्या क्या करते, हम किससे मिलते। करना ही है तो ऐसा अवलोकन करो।

चलते चलते मुझे श्री शरद कोकास के ब्लॉग पर जीवन की ओर लेकर जाने वाली एक बहुत बढ़िया कविता मिली है, जिसको मैं आप सबके सामने रखना चाहूंगा। यह कविता आपको आनंद की ओर लेकर जाएगी, आनंद आपको ताउम्र भीतर से युवा रखेगा, आपको युवा रहने के लिए बाहरी मेकअप की जरूरत न पड़ेगी। कविता को पढ़ने के साथ साथ महसूस भी करना। उसके भीतर रहस्य को जानना बेहद जरूरी है।
अपना हाथ दो मुझे

दो अपना हाथ और अपना प्रेम दो मुझे
अपना हाथ दो मुझे और मेरे साथ नाचो
बस एक इकलौता फूल
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
बस एक इकलौता फूल.
साथ नाचते हुए मेरे साथ एक लय में
तुम गीत गाओगे मेरे साथ
हवा में फ़क़त घास
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
हवा में फ़क़त घास.
उम्मीद है मेरा नाम और गु़लाब तुम्हारा
लेकिन अपने अपने नामों को खो कर हम दोनों मुक्त हो जाएंगे
पहाड़ियों पर बस एक नृत्य
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
पहाड़ियों पर बस एक नृत्य

गाब्रीएला मिस्त्राल

भार
कुलवंत हैप्पी

और खुद को जाना

भीड़ से निकल,
शोर-गुल से दूर हो,
जिम्मेदारियों को अलहदा कर खुद से
रात को चुपके से,
नींद के ताबूत में अपने आपको रख
हर रात की तरह
गहरी नींद में सोई
आँखों के बंद दरवाजे पर
ठक ठक हुई,
स्वप्न बन आया कोई
पकड़ हाथ मेरा 

मुझे उठाकर ले गया साथ अपने
वहाँ, देखती थी रोज जिसके सपने
मेरे सूखे, मुरझाए ओंठों पर घिस डाला
तोड़कर गुलाब उसने
गालों पर लगा दिया हल्का सा
स्पर्श का गुलाल उसने
चुपके से खोल दिए बाल उसने
फिर गुम हो गया,
मैं झूमने को तैयार थी
बाँहें हवा में लहराने को बे-करार थी
शायद सुनी हवाओं ने दिल की बात
या फिर वो हवा बन बहने लगा
पता नहीं
मीठी मीठी पवन चलने लगी
जुल्फें उड़ने लगी
बाँहें खुद ब खुद तनने लगी,
मन का बगीचा खिल उठा,
बाहर के बगीचे की तरह
आनंद के भँवर आने लगे
गीत गुनगुनाने लगे
पैर थिरकने लगे, मैं पगलाने लगी
तितलियों के संग उड़ते,
मस्त हवाओं, झूमते पौधों के साथ
झूमते हुए गुनगुनाने लगी
हर तरफ आनंद ही आनंद
जिसकी तलाश थी पल पल
भूल गई, कौन हूँ, किसी दुनिया से आई हूँ,
बस ऐसा लगा, कुदरत ने इसके लिए बनाई हूँ,
जो हूँ, वो ही बनना था मुझे, देर से समझ पाई हूँ,
कौन था? क्या चाहता था?
पता नहीं।
अगर पता था, तो बस इतना, कोई था
जो मुझे मुझे से मिलाने आया था
मेरे सोए मन को जगाने आया था
दुनियावी चमक ने अंधी कर दिया था,
मेरी दृष्टि छीन ली थी,
मेरा चैन छीन लिया था,
मुझे नकारा कर दिया था,
मेरे भीतर जहर भर दिया था,
दर्द से कराह उठी थी,
बेचैन हो गई थी,
अर्थी पर लेटने से पहले ही मर गई थी,
लेकिन फिर जिन्दा हो गई
अपने आपसे मुलाकात हूबहू हो गई
मैंने उस खुद को जाना,
जिसको के लिए भटक रहा है जमाना
जो भीतर था, बाहर न था
वो कोई और न था
बस मैं ही मैं थी।
वो शख्स नहीं, आईना था
जिसमें मैंने देखा खुद को
और खुद को जाना था

भार
कुलवंत हैप्पी

वो रोज मरती रही

र कर सवाल खुद से
वो रोज मरती रही,
अपने दर्द को
शब्दों के बर्तन भरती रही,

कुछ लोग आए
कहकर कलाकारी चले गए
और वो बूंद बूंद बन
बर्तन के इस पार झरती रही।

खुशियाँ खड़ी थी दो कदम दूर,
लेकिन दर्द के पर्दे ने आँखें खुलने न दी
वो मंजिल के पास पहुंच हौंसला हरती रही।

उसने दर्द को साथी बना लिया,
सुखों को देख, कर दिए दरवाजे बंद
फिर सिकवे दीवारों से करती रही।

रोज चढ़ता सूर्य उसके आंगन,
लेकिन अंधेरे से कर बैठी दोस्ती
वो पगली रोशनी से डरती रही।

इक दिन गली उसकी,
आया खुशियों का बनजारा,
बजाए इक तारा,
गाए प्यारा प्यारा,
बाहर जो ढूँढे तू पगली,
वो भीतर तेरे,
कृष्ण तेरा भीतर मीरा,
बैठा लगाए डेरे,

सुन गीत फकीर बनजारे का,
ऐसी लगन लगी,
रहने खुद में वो मगन लगी
देखते देखते दिन बदले,
रात भी सुबह हो चली,
हर पल खुशनुमा हो गया,
दर्द कहीं खुशियों की भीड़ में खो गया।

कई दिनों बाद फिर लौटा बनजारा,
लिए हाथ में इक तारा,
सुन धुन तारे की,
मस्त हुई,
उसके बाद न खुशी की सुबह
कभी अस्त हुई।

भार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में वृंदा गांधी

हैप्पी अभिनंदन में आज मैं आपको जिस ब्लॉगर हस्ती से रूबरू करवाने जा रहा हूँ, उसको ब्लॉग जगत में आए भले ही थोड़ा समय हुआ हो, लेकिन वो हस्ती जिस सोच और जिस ऊर्जा के साथ ब्लॉगिंग की दुनिया में आई है, उसको देखने के बाद नहीं लगता कि वो लम्बी रेस का घोड़ा नहीं। उसके भीतर कुछ अलग कुछ अहलदा करने की ललक है, वो आससान को छूना चाहती है, लेकिन अपने बल पर, शॉर्टकट उसको बिल्कुल पसंद नहीं। वो जहाँ एक तरफ पटियाला यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ब्लॉगिंग की दुनिया में अपने लेखन का लोहा मनवाने के लिए उतर चुकी है। पत्रकारिता और ब्लॉगिंग से रूबरू हो चुकी वृंदा गांधी आखिर सोचती क्या हैं ब्लॉग जगत और बाहरी जगत के बारे में आओ जानते हैं उन्हीं की जुबानी :-

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉग जगत में कैसे आए, और आपको यहाँ आकर कैसा लग रहा है?
वृंदा गांधी :
कुछ समय पहले तक ब्लॉग मेरे लिए एक स्वप्न था क्योंकि इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। मेरा यह स्वप्न हकीकत में तब्दील हुआ, जब में अपनी ट्रेनिंग जनसत्ता समाचार-पत्र में करने गई। वहाँ सबके ब्लॉग देख एक इच्छा जागृत हुई और अरविन्द शेष जो वहाँ के चीफ सब-एडिटर हैं। उन्होंने जाने से पहले यह ब्लॉग नामक उपहार मुझे दिया। बहुत ही अच्छा अनुभव है और बहुत ख़ुशी होती है कि मैं भी इसी ब्लॉगजगत का हिस्सा हूँ।

कुलवंत हैप्पी : क्या ब्लॉग को अभिव्यक्ति का उत्तम जरिया मानती हैं, अगर हाँ तो क्यों?
वृंदा गांधी :
मेरे ख्याल से ब्लॉग अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। मुख्यता नए लेखकों या कहू आने वाले नामों के लिए। किसी समाचार पत्र में भेजे गए लेख, कहानी या किसी रचना को प्रकाशित करने से पहले वह अपनी पॉलिसी देखेंगे। लेकिन ब्लॉग के राही हम अपनी राय, विचार हर मुद्दे पर बेबाकी से दे सकते हैं। यह मंच हमें अपनी बातों व अपनी सोच को बिना दबे सबके सामने रखने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है, ताकि अन्य भी उसे देख अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर सके।

कुलवंत हैप्पी : आपने पत्रकारिता को किस उद्देश्य से चुना और आपके आदर्श कौन है?
वृंदा गांधी :
बीए के समय रेडियो सुनने का बहुत शौक था। सोचती थी कि न-जाने ये कितने बड़े लोग होते होंगे जिनकी कहानियाँ अख़बारों में प्रकाशित होती हैं, लेकिन कभी एहसास नहीं था कि एक दिन मेरा नाम भी उन्ही लोगों के बीच होगा। लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में आकर लगता है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ की शक्ति को अगर सकरात्मक राह की ओर लगाया जाए तो कौन सी समस्या सुलझाई नहीं जा सकती। मगर यहाँ तो पूरा सिस्टम ही खराब है, कोई जन समाज की बात करने को ही तैयार नहीं। रही मेरे आदर्श की बात, तो मेरे आदर्श मेरे पिता जी व मेरी ताई माँ हैं। उन्होंने हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। मेरे पिता जी हमेशा से मेरे बड़े आलोचक भी रहे हैं। मेरी खूबियों से अधिक वो मेरी कमियों पर नजर रखते हैं।

कुलवंत हैप्पी : मीडिया या गैर मीडिया लोगों में से ज्यादा किसी को पढ़ना अच्छा लगता है?
वृंदा गांधी :
मीडिया लोगों को तो पढ़ती ही हूँ, क्योंकि हमारा यह क्षेत्र है। पर गैर-मीडिया लोगों को पढ़कर ज्यादा प्रसन्नता होती है कि वह लेखनी में अपना योगदान दे रहे हैं। वह कुछ नया और उत्तम स्तर का साहित्य सामने लेकर आ रहा हैं।

कुलवंत हैप्पी : अपनी जिन्दगी का कोई ऐसा रोचक लम्हा जो हमारे साथ बाँटना चाहती हों?
वृंदा गांधी :
अभी कुछ समय पूर्व मेरी एक कहानी दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित हुई। मेरे कमरे में वह समाचर-पत्र पड़ा था। एक लड़की आई और उसे देखने लगी, थोड़ी देर बाद उसने कहा क्या मैं इसे ले जाऊं पढ़ना चाहती हूँ। कुछ दिनों बाद वह फिर से आई और धन्यवाद कहने लगी। मैंने हैरानी से पूछा किस लिए? तो वह कहने लगी, मेरी बुआ जी ने आठवीं कक्षा की फेरवेल पर कुछ शब्द कहने थे। मैंने तुम्हारी कहानी उन्हें सुनाई वे बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने यह अपने विद्यार्थियों के साथ भी सांझी की, जिससे वह कुछ शिक्षा ले सके। कहानी का नाम था ' समझदारी से जीत' की पढ़ाई-लिखाई हमारे लिए कितनी आवश्यक है। उसकी यह बातें सुन में भाव-विभोर हो गई और लगा कि शायद मेरी लेखनी भी सार्थक हो गयी।

कुलवंत हैप्पी : ज्यादा टिप्पणियाँ प्राप्त वाले ब्लॉगर क्या ज्यादा सार्थक लिखते हैं?
वृंदा गांधी :
मेरा मानना है की टिप्पणियाँ आवश्यक हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कितने लोगों ने उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा। टिप्पणियों के बारे में मेरा मानना है कि इससे हमें प्रोत्साहन मिलता है। वहीं और बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है, क्योंकि हर व्यक्ति प्रशंसा का भूखा  है, परन्तु इसे मस्तिष्क पर चढ़ाने की बजाय सकरात्मक रूप से ले कि लोगों की अब आपसे उमीदें बढ गयी है और आपको अब पहले से अधिक मेहनत करनी है, जिससे आप उनके विश्वास को पूरा कर सके।

कुलवंत हैप्पी : आपको किस तरह के ब्लॉग पढ़ने अच्छे लगते हैं?
वृंदा गांधी :
निराश न हो, इरादे न बदल, तकदीर किसी वक़्त भी बदल सकती है। मैं हमेशा किसी एक चीज को पढ़ना पसंद नहीं करती, क्योंकि हर विषय के बारे में जानकारी आवश्यक है। वैसे मुझे कुलवंत जी का युवा सोच युवा ख़यालात व मोहल्ला पढ़ना पसंद है, जो में नियमित रूप से पढ़ना पसंद करती हूँ।

कुलवंत हैप्पी : युवा सोच युवा खयालात के पाठकों एवं अन्य ब्लॉगर साथियों के लिए कोई संदेश देना चाहे तो जरूर दें?
वृंदा गांधी :
अंत में सन्देश नहीं, मैं प्रार्थना करना चाहूंगी। नए लोगों को प्रोत्साहन दें, आपके द्वारा की गई एक टिप्पणी किसी को और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित कर सकती है। अत: संकोच न करते हुए बिगड़ैल युवाओं से कहना चाहूंगी कि लड़कियों के साथ शालीनता से पेश आए। यह हमेशा याद रखें कि तुम्हारे घर में भी एक माँ और बहन तुम्हारा इंतजार कर रही है। उसको भी कल भरे बाजार निकलना है। अपनी युवा शक्ति का इस्तेमाल समाज सुधारक कामों में करें। सपने देखें व उन्हें पूरा करने के लिए जान लगा दे।

बुझ जाए शमा तो जल सकती है, तूफान से भी किश्ती निकल सकती है।

क्क दे फट्टे : भूरा मिस्त्री ने एक पढ़ी लिखी लड़की से पूछा, (जो काफी समय विदेश में रहकर भूरे मिस्त्री के गाँव लौटी थी) "आई लव यू" क्या अर्थ क्या होता है। उसने कहा, "मैं तुमसे प्यार करती हूँ"। भूरा मिस्त्री तुरंत बोला, 'तुम गोरियों की यहीं तो दिक्कत है कि कुछ पूछा नहीं कि बोल देती हैं तुमसे प्यार करती हूँ।

भार
कुलवंत हैप्पी

धन्यवाद के बाद थप्पड़ रसीद

मोटर साईकल पर सवार होकर मैं और मेरा मित्र जनकसिंह झाला रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहे थे। सड़क पर मोटर कारों के अलावा काफी साईकिल भी चल रहे थे। उन साइकिलों को देखते ही एक किस्सा याद आ गया मेरे मित्र को, जैसे किसी बच्चे को खेलते देखकर हमारी आँखों के सामने हमारा बचपन जीवंत हो जाता है। उसने चलते चलते मुझे बताया कि जब वो नया नया साईकिल चलाना सीखा था, तो एक दिन अचानक उसका साईकिल एक बूढ़ी महिला से टकरा गया, वो महिला धड़म्म से जमीं पर गिरी। वो भागने की बजाय उस महिला को खड़ी कर उसके घर तक छोड़ने गया, जिसका घर में पास ही था। घर पहुंचे तो माँ के साथ हुए हादसे की बात सुनकर उस बूढ़ी महिला के बेटे ने सबसे पहले मेरे मित्र को धन्यवाद किया, क्योंकि वो उसकी माता को उसके घर तक छोड़ने आया था। और तुरंत ही पूछा,"माँ जिसने तुम्हारे बीच साईकिल मारा, वो कौन था?"। माँ ने कहा, "इसका ही साइकिल था, जो मुझे घर तक छोड़ने आया है"। उस नौजवान लड़के ने जितने प्यार के साथ धन्यवाद कहा था, उतनी ही बेरहमी से घर छोड़ने गए मेरे मित्र की गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया। वास्तव में हमारी अहिंसा, हमारी धार्मिकता और हमारी कृतज्ञता बस इतनी है। इससे ज्यादा कुछ नहीं। हम जो बाहरी रूप से हैं, वो भीतर से नहीं। हम रोज स्नान करते हैं, बाहर बाहर से। अगर वो भीतर से धन्यवाद प्रकट कर रहा होता तो, वो बाद में थप्पड़ रसीद न करता, उसको याद ही न रहा कि वो दो मिनट पहले तो धन्यवाद कहकर हटा है, और अभी थप्पड़ रसीद कर रहा है।
भार
कुलवंत हैप्पी

आमिर खान की सफलता के पीछे क्या?

'तारे जमीं पर' एवं 'थ्री इड्यिटस' में देश के शिक्षा सिस्टम के विरुद्ध आवाज बुलंद करते हुए आमिर खान को रुपहले पर्दे पर तो सबने देखा होगा। इन दोनों फिल्मों की अपार सफलता ने जहां आमिर खान के एक कलाकार रूपी कद को और ऊंचा किया है, वहीं आमिर खान के गम्भीर और संजीदा होने के संकेत भी दिए हैं।

इन दिनों फिल्मों में आमिर खान का किरदार अलग अलग था। अगर 'तारे जमीं पर' में आमिर खान एक अदार्श टीचर था तो 'थ्री इड्यिटस' में एक अलहदा विद्यार्थी था, जो कुछ अलहदा ही करना चाहता था। इन किरदारों में अगर कुछ समानता नज़र आई तो एक जागरूक व्यक्ति का स्वाभाव और कुछ लीक से हटकर करने की जिद्द। इन दोनों किरदारों में शिक्षा सिस्टम पर सवालिया निशान लगाने वाले आमिर खान असल जिन्दगी में केवल 12वीं पास हैं। यह बात जानकर शायद किसी को हैरानी हो, लेकिन यह हकीकत है।

आमिर खान ने अपना कद इतना ऊंचा कर लिया है कि कोई पूछने की हिम्मत भी नहीं कर सकता कि आप कितने पढ़े हैं। शायद यह सवाल उनकी काबलियत को देखते हुए कहीं गुम हो जाता है। कभी कभी लगता है कि आमिर खान ने देश के शिक्षा सिस्टम से तंग आकर स्कूली पढ़ाई को ज्यादा अहमियत नहीं दी या फिर उसने जिन्दगी की असली पाठशाला से इतना कुछ सीख लिया कि स्कूली किताबें उसके लिए आम किताबें बनकर रहेगीं।

ऐसा नहीं कि आमिर खान को पढ़ने का शौक नहीं था, आमिर खान ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि वो घर पहुंचते सबसे पहले टीवी रिमोट नहीं बल्कि किताबें उठाते हैं। उनके बारे में किरण राव तो यहाँ तक कहती हैं, "वो पढ़ने के इतने शौकीन हैं कि टॉयलेट और कार में किताबें साथ ले जाते हैं"। वो बात जुदा है कि वो किताबें स्कूल पाठ्यक्रम की नहीं होती। अगर आज आमिर खान एक सफल अभिनेता, फिल्म निर्माता और फिल्म निर्देशक हैं, तो इसमें उसकी स्कूल पढ़ाई नहीं बल्कि वो किताबी ज्ञान है, जो उसने छ: साल की उम्र से अब तक विद्वानों की किताबें पढ़कर अर्जित किया है।

सफलता की जिस शिखर पर आमिर खान आज पहुंच चुके हैं, वहां पहुंचते बहुत सारे व्यक्ति जमीं छोड़ देते हैं, पैसे और शोहरत के घुम्मड में सोचने की शक्ति तक खो देते हैं, लेकिन जिन्दगी की असल पाठशाला में पढ़े आमिर इसलिए बरकरार हैं कि उन्होंने कभी दौलत और शोहरत को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया। और कभी जमीं नहीं छोड़ी।

आमिर अपने किरदारों में इस तरह ढल जाते हैं, जैसे वो असल जिन्दगी में ही उन किरदारों को जी रहे हो। इस तरह का ढलना उस व्यक्ति के बस में ही हो सकता है, जो महावीर के उस कथन को जानता हो, जिसमें कहा गया है कि अगर कुछ सीखना है तो अपने दिमाग के बरतन को पूरी तरह खाली कर लो। तभी उसमें कुछ नया ग्रहण कर पाओगे। आमिर खान के किरदारों में दोहराव नाम की चीज आज तक नहीं देखने को मिली। यह बात भी इस तरह संकेत करती है कि आमिर खान कुछ नया करने से पहले अपने आपको पूरी तरह खाली कर लेते हैं, और फिर नए किरदार को नए विचार को अपने भीतर समा लेते हैं।

इसके अलावा मुझे आमिर खान की सफलता और उसके युवापन के पीछे उसका स्पष्टवादी सोच का होना बहुत ज्यादा नजर आता है। आमिर खान को कई बार मीडिया से बात करते हुए देखा है, वो अपनी बात पूरी स्पष्टता और निर्भय होकर कहता है। उसकी स्पष्टवादी नीति है, जो उसको 44 साल की उम्र में भी युवा रखे हुए है। किसी विचारक ने लिखा है कि अगर आप ताउम्र युवा रहना चाहते हो तो अपनी सोच को इतना स्पष्टवादी बना दो, अस्पष्टता बाकी न रहे। स्पष्टवादी व्यक्ति चिंतारहित हो जाता है और भयमुक्त हो जाता है, वो करनी में यकीन करता है। आमिर खान युवा पीढ़ी के लिए एक अदार्श व्यक्ति है, और आमिर खान से युवाओं को सीखना चाहिए।
भार
कुलवंत हैप्पी

"स्वप्न दिवस" और "सपनों की बात"

दुनिया में इंसान दो तरह के होते हैं। इस वाक्य को माय नेम इज खान में सुना होगा या उससे पहले भी कई दफा सुना होगा। वैसे देखा जाए तो सिक्के के भी दो पहलू होते हैं, लेकिन मैं बात करने जा रहा हूँ सपनों की, क्योंकि 11 मार्च को ड्रीम डे है मतलब स्वप्न दिवस। इंसान की तरह सपनों की भी दो किस्में होती हैं, एक जो रात को आते हैं, और दूसरे जो हम सब दिन में संजोते हैं। रात को मतलब नींद में आने वाले सपने बिन बुलाए अतिथि जैसे होते हैं। सुखद भी, दुखद भी। लेकिन जो खुली आँख से सपने हम सब देखते हैं, वो किसी मंजिल की तरफ चलने के लिए, कुछ बनने के लिए, कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित करते हैं।

कुछ लोगों कहते हैं कि स्वप्न सच नहीं होते, लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो हर सफल इंसान कहता है कि मैंने बचपन में ऐसा ही सपना संजोया था। मुझे दोनों ही सही लगते हैं, क्योंकि जो सफल हुए वो खुली आँख से देखे हुए सपनों की बात कर रहे हैं, जो कुछ लोग कह रहे हैं कि स्वप्न सत्य नहीं होते वो नींद में अचानक आने वाले सपनों की बात कर रहे हैं।


रात को आने वाले स्वप्न फिल्म जैसे होते हैं, उनमें कुछ भी घटित हो सकता है। आप अकेले किसी फिल्मी हीरो की तरह सात आठ लोगों को एकसाथ पीट रहे हैं। आप बिना किसी कठिनाई के सफलता की शिखर पर पहुंच गए। हर तरफ आपकी चर्चा हो रही है। ऐसे स्वप्न आपको स्कून देते हैं, लेकिन कुछ कुछ स्वप्न आपकी नींद में विघ्न भी डालते हैं, आप काँपकर बिस्तर से उठ खड़े होते हैं। जब कि खुली आँख के स्वप्नों को पूरा करने के लिए सख्त मेहनत की जरूरत होती है, विश्वास की जरूरत होती है। वो रात में आए ख्वाब जैसे नहीं होते। नींद में आए स्वप्न को सिर्फ तुम महसूस कर सकते हो, लेकिन खुली आँख का स्वप्न जब पूरा होता है तो उसमें न जाने कितने लोग शरीक होते हैं, कितने ही चेहरों पर खुशी का जलाल होता है। कितनी ही आँखों में अजब चमक आ जाती है।

इसलिए स्वप्न देखना मुझे तो बुरी बात नहीं लगती, लेकिन रात के स्वप्न से बेहतर है कि आप दिन में खुली आँख से अपने सपने देखें, और उनको पूरा करने के लिए रणनीति बनाएं और परिश्रम करें। आज स्वप्न दिवस है, क्यों न इस बहाने अपने सपनों की समीक्षा की जाए? क्यों न देखा जाए कि हम कहाँ तक पहुंचे हैं? मेरी नजर में स्वप्न के बिन जीवन अधूरा है, जैसे खुशबू के बिन फूल की सुंदरता भी अधूरी सी लगती है। अगर मुम्बई की रफ्तार किसी भी मौसम में मंद नहीं पड़ती तो इसके पीछे मुम्बईवासियों की रोजमर्रा की जरूरतों से ज्यादा उनके स्वप्न हैं, जो वो खुली आँख से देखते हैं। वो स्वप्न ही उनको रुकने नहीं देते, वो स्वप्न ही उनकी रफ्तार को बनाए रखते हैं।

भार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में हरिप्रसाद शर्मा

जैसे आप जानते ही हैं कि हैप्पी अभिनंदन में हर बार हम किसी न किसी ब्लॉगर हस्ती से रूबरू होते हैं हम सब और जानते हैं उनके दिल की बातें। जो ब्लॉग हस्ती इस बार हमारे बीच मौजूद है, वो पेशे से सरकारी अधिकारी हैं, लेकिन शौक से साहित्य अनुरागी, क्रिकेट कमेंटेटर भी हैं। काव्य अनुरागी से बैंक अधिकारी और उसके बाद ब्लॉगर श्री हरि शर्मा से जानते हैं उनके दिल की बातें उनकी जुबानी।

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉगजगत मैं कैसे आए, और आने से पहले क्या सोचा था?
हरि शर्मा : भाई कुलवन्त ब्लॉग से मेरा नाता ३ साल का है और ये तब शुरू हुआ जब मै मैनपुरी जिले में था। सोचा यही था कि ये उस आदमी के लिए जो थोड़े अपने विचारों को पठनीय बनाना चाहता है वो ऐसा कर सकता है ब्लॉग के मार्फत। मैंने सबसे पहले अनीता कुमार जी का ब्लॉग पढ़ा, फिर कोशिश करता रहा। और हिन्दी टाइप करना मुश्किल था, जी और पीछे बहुत जाना पड़ेगा।

कुलवंत हैप्पी : हरि जी पहले से ही कवि थे या बैंक अधिकारी के बाद कवि बने?
हरि शर्मा :
मेरा पहला सार्वजनिक परिचय क्रिकेट कमेन्ट्रेटर के रूप में था मेरे अपने इलाके में, और इस रूप को मेरे चाहने वाले बहुत पसन्द करते थे, लेकिन साथ साथ कविता प्रेम भी अपनी जगह था २००५ तक मैंने कभी भी अपनी लिखी कविता को संगृहित नहीं किया और नाही सार्वजनिक किया। कवि होने का भ्रम आज भी मुझे नहीं है लेकिन प्रथम श्रेणी का कविता प्रेमी मैं अपने आपको डन्के की चोट पर कहता हूँ, बहुत से प्रसिद्ध कवि लगभग पूरे रटे हुए थे उनमें सबसे अन्त में नाम आज के लोकप्रिय कवि डा. कुमार विश्वास है। हाँ! एक और बात, नौकरी की शुरुआत अधिकारी के रूप मे नहीं हुई लम्बे समय तक क्लर्क रहा।

कुलवंत हैप्पी : क्या आप भी अन्य उच्च बैंक अधिकारियों की तरह काले शीशों के पीछे रहते हैं, और आम जन से नहीं मिलते?
हरि शर्मा :
अभी जो दायित्व मेरे पास है उसमें आम जन से कोई सरोकार नही है, लेकिन पहले जब में फ़ील्ड ऑफिसर था बाद में शाखा प्रबंधक बना था, तब शायद अपनी जमात में सबसे ज्यादा आम आदमी के बीच था सिर्फ़ दलाल के अलावा मेरे कमरे में हर किसी का स्वागत था। अभी में जिस कार्यालय में हूँ, वहां समाशोधन का काम होता है। वो केन्द्रीयकृत समाशोधन कार्यालय है।

कुलवंत हैप्पी : क्या ब्लॉग जगत और बैंक कार्य के साथ जुड़ने के बाद आपने क्रिकेट केमेंट्री करना छोड़ दिया?
हरि शर्मा :
अब तो बहुत समय हो गया क्रिकेट केमेंट्री छोड़े। कभी कभी अपने शहर जाता हूँ और कोई मैच देखने जाता हूँ तो पुराने लोग शोर करते हैं कि आप केमेन्ट्री करें तो नए लोग भी जगह छोड़ देते हैं लेकिन अब ये यदा कदा ही होता है। जिन्दगी इस तरफ़ से उदास सी है।

कुलवंत हैप्पी : आपने ऊपर अपने शहर जाने की बात की, तो आप अब कहाँ रहते हैं और आपका शहर कौन सा जरूर जानना चाहेंगे?
हरि शर्मा :
जी मेरे ब्लॉग का शीर्षक है नगरी नगरी द्वारे द्वारे। ये यात्रा हिन्डौन सिटी जो मेरा पारिवारिक निवास स्थान है वहाँ से शुरू हुई और अभी जोधपुर हूँ । 2004 से एक यात्रा पर हूँ, जिसके दौरान जयपुर, अलीगढ, गाज़ियाबाद, आगरा, भोगाव और अलीपुर खेडा ( दोनों मैन्पुरी जिला) घूमा और अब जोधपुर में हूँ। अगली पोस्टिंग की जल्दी उम्मीद है।

कुलवंत हैप्पी :  2004 से यात्रा पर हैं, इस यात्रा के दौरान कई जगहों पर जाना हुआ, लेकिन सबसे सुखद और अच्छा वातावरण कहाँ मिला?
हरि शर्मा
: सुख और दुख साथ चलते रहते है कभी सुख के लिए इन्तेजार करना पड़ता है, हम अगर आने वाली स्थिति के लिए पहले से ही तैयार हों तो बड़े से बड़ा दुख भी छोटा सा लगता है।

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉगिंग की दुनिया में पिछले तीन साल से हैं, इन तीन सालों में ब्लॉगरों की संख्या ग्राफ बहुत तेजी के साथ बढ़ा है, इससे हिन्दी ब्लॉगिंग को फायदा हुआ या नुक्सान?
हरि शर्मा :
सबके ब्लॉग लिखने का मकसद एक नहीं है। मोटे तौर पर ३-४ तरह के लोग यहाँ हैं। पत्रकार जो अपने अतिरिक्त मसाले को यहाँ छाप देते हैं। इसके अलावा साहित्यकार, लिखने की कोशिश करने वाले हम जैसे साहित्य अनुरागी और खुद की अभिव्यक्त करने को तरसते लोग। जितना यहाम हम पढ़ पाते हैं उतना पुस्तके खरीदकर तो पढ़ नहीं सकते तो मेरे लिए तो ब्लॉग का विस्तार एक सुखद सूचना है लेकिन हाँ इसे परिपक्व होने में समय लगेगा जो हर विधा के साथ होता है।

कुलवंत हैप्पी : क्या ब्लॉग केवल ब्लॉगर साथियों के लिए लिखे जाते हैं, उनका आम पाठक से कोई सारोकार नहीं?
हरि शर्मा :
आपने बहुत बढिया प्रश्न किया है। मुझे लगता है कि ब्लॉग को पाठकों के लिए होने चाहिए। इसी में इसकी व्यापक सार्थकता है, लेकिन सफ़ल ब्लॉगर वो हैं जिसे अन्य ब्लॉगर ध्यान से पढ़ते हैं। इसमें कोई विरोधाभास नहीं है, पर इस माध्यम को आम पाठक तक पहुँचने में ही सबकी भलाई है। मै खुद १-२ माह पहले तक ब्लॉगवाणी पर नहीं जाता था और खोजकर ही ब्लॉग पढ़ता था।

कुलवंत हैप्पी : जिन्दगी का कोई रोचक और हसीं लम्हा जो मेरे और युवा सोच युवा खयालात के पाठकों के संग बाँटना चाहते हों?
हरि शर्मा :
२००४ मे हम लोग पूना गए थे ४ सप्ताह के लिए। वहां से आये तो एक साथी को मैंने मुम्बई घुमाई। अमिताभ जी के बंगले पर पहुंचे। तो मस्खरी के मूड में थे। दरवान से पूछा कि अमित भैया हैं क्या? वो अलर्ट हो गया और बोला नहीं, वो तो जलसा में रहते हैं। फिर मैंने पूछा कि यहां कौन रहता है?, तो वे बोला कि यहां अभिषेक बाबा और मालकिन (जया जी) रहती हैं, तो मैंने पूछा कि जलसा में कौन कौन रहता है। उसने बताया कि वहां साहब और उनकी माताजी रहती हैं। मैंने कहा कि यार अमित भैया आए तो कहना कि आदमी के मकान चाहे कितने ही हो कम से कम रहे तो ठीक से। एक बार ऐसे ही सुनील गवास्कर से मुलाकात हुई
मुम्बई में। उनके आटोग्राफ के लिए लम्बी कतार लगी थी। मैं सीधा गया और चमचों के बीच से निकलते हुए बोला और सुनील कैसे हो? चमचे हट गए। चमचे एक तरफ़ हट गए। सुनते ही गवास्कर बोले मैं ठीक हूँ, आप कैसे हैं। ऐसे ही थोड़ी बात करके उनसे बच्चों के लिए आटोग्राफ लिया और चले आए। ऐसे ही माधव राव सिन्धिया जब केन्द्र में मन्त्री थे तब उनसे स्टेज पर जाकर हाथ मिलाया।

कुलवंत हैप्पी : अंतिम सवाल, अगर मैं या कोई अन्य व्यक्ति जयपुर, अलीगढ़, गाज़ियाबाद, आगरा या जोधपुर जाना चाहे तो कौन सी जगह आप उसको देखने घूमने के लिए सुझाव के तौर पर बताना चाहोगे?
हरि शर्मा :
आगरा मे ताज महल को एक तरफ़ रख दें तो शहर के रूप में आकर्षित नही करता, जयपुर शहर भी देखने लायक है और दर्शनीय स्थल भी बहुत हैं। वैसे आपका सूर्य नगरी जोधपुर में भी स्वागत है।

चक्क दे फट्टे : एक बार भगवान जमीं पर आए, वो गलती से भूरा मिस्त्री को मिल गए। वो उसको लेकर शराब के ठेके पर पहुंच गया। वहाँ दोनों ने खूब पी। कुछ देर बाद भूरा मिस्त्री बोला, तुम को चढ़ती क्यों नहीं। आगे से उत्तर आया "मैं भगवान हूँ"। तो भूरा मिस्त्री बोला "चढ़ गई साल्ले नूँ।
आभार
कुलवंत हैप्पी

मशहूर व मरहूम शायर साहिर लुधियानवीं

"मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है।
पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है।

हिन्दी फिल्म संगीत जगत का बेहद लोकप्रिया गीत आज भी लोगों की जुबाँ पर बिराजमान है, लेकिन इस गीत को लिखने वाली कलम के बादशाह साहिर लुधियाणवीं 25 अक्टूबर 1980 को इस दुनिया से सदा के लिए रुखस्त हो गए थे। इस महान शायर और गीतकार का जन्म लुधियाना में 8 मार्च 1921 को हुआ। साहिर लुधियानवीं कितने मजाकिया थे, इस बात का अंदाजा उनकी नरेश कुमार शाद के साथ हुई एक मुलाकात से चलता है। नरेश कुमार शाद ने आम मुलाकातियों की तरह एक रसमी सवाल किया, आप कब और कहाँ पैदा हुए? तो साहिर ने उक्त सवाल को दोहराते हुए और थोड़ा सा मुस्कराते हुए कहा, ये सवाल तो बहुत रसमी है, कुछ इसमें और जोड़ दो यार। क्यों पैदा हुए?। शाद के अगले सवाल पर साहिर कुछ फ़खरमंद और गर्वमयी नज़र आए, उन्होंने कहा कि वो बी.ए. नहीं कर सके, गौरमिंट कॉलेज लुधिआना और दयाल सिंह कॉलेज ने उनको निकाल दिया था, जो आज उस पर बड़ा गर्व करते हैं। साहिर की इस बात से शाद को साहिर का नज़र ए कॉलेज शेअर याद आ गया।
लेकिन हम इन फजाओं के पाले हुए तो हैं।
गर या नहीं, यहाँ से निकाले हुए तो हैं॥
आगे साहिर लुधियानवीं बताते हैं कि 1937 में मैट्रिक की परीक्षा देने और नतीजे आने से पहले, उनके पास काफी समय था, उन दिनों उन्होंने कुछ शेअर लिखे, फिर एक नज़म जो उन्होंने अपने एक दोस्त के मार्फत अपने टीचर फयाज़ हरियाणवीं को दिखाकर उनकी राय मांगी थी, शिक्षक ने कहा कि शेअर बहुत अच्छे हैं, लेकिन नज़्म मामूली है। साहिर ने अच्छी बात पल्ले बाँध ली कि शेअर अच्छे हैं। शायर-ओ-शायरी के दीवाने हो चुके अब्दुल हुई के लिए अब तखल्लुस की जरूरत थी, साहिर के अनुसार उन दिनों तखल्लुस लगाना काफी प्रचलन में था। ऐसे में उनको भी तखल्लुस की कमी ज्यादा महसूस होने लगी, अचानक एक दिन उनकी निगाह इकबाल ने दाग के बारे जो मर्सिया लिखा था, उसके शेअर पर जा पड़ी।
इस चमन में होंगे पैदा बुलबुल-ए-शीराज भी।
सैंकड़ों साहिर भी होंगे, साहिब ए एज़ाज भी।।
अपने गीतों के नशे से हिन्दी संगीतप्रेमियों को धुत्त कर देने वाले साहिर लुधियानवीं शराब पीने के आदी थे, लेकिन उनको शराब पीने की लत आम लोगों की तरह नहीं लगी थी, वो तो शराब के पास से भी नहीं गुजरते थे। जब उनका लो बल्ड प्रेशर होना शुरू हुआ, तो मैडीकल के तौर पर थोड़ी थोड़ी शराब पीने लगे, फिर धीरे धीरे शराब आम हो गई कि छूटे न छूटे। साहिर लुधियानवीं साहिब फिल्म राईटर्स एसोसिएशन के प्रमुख भी रहे हैं, पुराने फिल्मी शायरों में उनको आरजू लखनवीं बेहद पसंद थे। जब अंत में शाद ने साहिर से पूछा कि आपने शादी क्यों नहीं की? उन्होंने अपने उसी हँसते हुए अंदाज में कहा, कुछ लड़कियाँ मुझ तक देर में पहुंची, और कुछ लड़कियों तक मैं देर से पहुंचा। शाद को इस सवाल से पहले साहिर का एक और शेयर याद आ गया था।
तुम में हिम्मत है तो दुनिया से बगावत कर दो।
वरना माँ बाप यहाँ कहते हैं शादी कर लो।
साहिर लुधियानवीं ने तो शादी नहीं की, लेकिन उनके अय्याश और जमींदार पिता चौधरी फजल अहमद ने 12 शादियाँ रचाई, और साहिर का जन्म सरदार बेगम की कोख से हुआ, जो उनके अय्याश पिता की 12वीं पत्नी थी। उनकी माँ और पिता के बीच संपत्ति को लेकर 13 साल तक मुकद्दमा चला, आखिर में मुकद्दमा सरदार बेगम जीत गई, और साहिर भी उनके हिस्से आए। इस गृहयुद्ध ने 13 वर्षीय साहिर के जीवन को बुरा तरह प्रभावित किया। पिछले दिनों प्रकाशित हुई एक किताब में लिखा है कि उसके पिता ने उसको जान से मारने तक की धमकियाँ दे डाली थी। गत दिनों प्रकाशित पुस्तक "जाग उठे कई ख्वाब" में उनकी जीवन की दर्द भरी दास्तां लिखी हुई है।

किताब के अनुसार इन सबका साहिर के दिलोदिमाग पर गहरा असर पड़ा। वह धीरे. धीरे उर्दू के क्रांतिकारी और रूमानी शायर बनते गए। वर्ष 1945 में प्रकाशित "तल्खियां" ने उन्हें इतनी शोहरत दी कि उन्हें आजादी की राह फिल्म में गीत लिखने का निमंत्रण मिला। इस फिल्म के हीरो पृथ्वीराज कपूर थे। उन्होंने भारत-पाकिस्तान पर हुए दंगों को रोकने के लिए 11 सितंबर 1942 को ऑल इंडिया रेडियो से "आज" शीर्षक से लंबी नज्म पढ़ी, जिसमें उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द की अपील की।

पुस्तक के अनुसार साहिर को फिल्मों में सफलता 1951 में नौजवान फिल्म से मिली जिसका गाना ठंडी हवाएं लहरा के आएं काफी लोकप्रिय हुआ। कृष्णचंदर और प्रेम धवन की मदद से उन्हें इस फिल्म में गीत लिखने का काम मिला। ये गीत इतना हिट हुआ कि गुरुदत्त और सचिनदेव बर्मन ने अपनी आने वाली सभी फिल्मों के लिए गीत लिखने का स्थायी निमंत्रण दिया। साहिर और एस डी वर्मन की जोडी ने बाजी, सजा, अरमान, टैक्सी ड्राइवर, हाउस नंबर 44 और प्यासा में सदाबहार गीत लिखे, परन्तु दोनों में ऐसी गलतफहमियां हो गई कि वे बाद में एक साथ कभी नहीं आए। साहिर ने 59 वर्ष के उम्र में 113 फिल्मों के लिए सैकडों गीत लिखे 1उनके जीवन में चार महिलाएं महिन्दर चौधरी. ईश्वर कौर. अमृता प्रीतम और सुधा मल्होत्रा आई, लेकिन उनका कोई भी प्रेमप्रसंग विवाह में परिणत नहीं हो सका।

साहिर फिल्मों में आने से पहले मुशायरों के लोकप्रिय शायर हो चुके थे। वर्ष 1943 से 1945 बीच गांव, कस्बा और शहर का कोई भी महफिल उनके बिना अधूरा माना जाता था। उनकी ..ताजमहल..नज्म काफी लोकप्रिय हुई। साहिर का समाजवाद और आजादी में गहरा यकीन था। वह कम्युनिस्ट पार्टी. उसके छात्र संगठन और प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल हो गए। उन्होंने 1953 में बनी शोले फिल्म के गीत भी लिखे थे। उन्होंने देवदास, नया दौर, सुबह कभी होगी, गुमराह, धूल का फूल, तुमसा नही देखा, बरसात की रात, हम दोनों, बहूरानी, दिली तो है, मुझे जीने दो, ताजमहल, चित्रलेखा, काजल, हमराज, वक्त,  बहूबेगम, आंखे, नील कमल, दाग, दीवार, कभी-कभी, अमानत, त्रिशूल और बर्निंग ट्रेन फिल्मों के लिए सदाबहार गीत लिखे।

चलते चलते : जब साहिर की नज्म ताजमहल दिल्ली के एक सरकारी रसाले आजकल में प्रकाशित हुई तो पुराने खयालातों के अखबारों ने साहिर के विरुद्ध हंगामा खड़ा कर दिया था।

भार
कुलवंत हैप्पी

कच्ची सड़क,,,अमृता प्रीतम और मैं

क सप्ताह पहले पंजाब गया था, और शनिवार को ही इंदौर लौटा। मुझे किताबें खरीदने का शौक तो बहुत पहले से था, लेकिन पढ़ने का शौक पिछले दो तीन सालों से हुआ है। मैं किताब उसका शीर्षक देखकर खरीदता हूँ, लेखक देखकर नहीं। पता नहीं क्यों?। अब तक ऐसा करने से मुझे कोई नुक्सान नहीं हुआ, हर बार अच्छा ही हाथ लगा है। इस बार जब दिल्ली स्टेशन पर बैठा था, तो मेरी निगाह सामने किताबों वाली दुकान पर गई, जबकि मेरे बैग में पहले से ही मैक्सिम गोर्की की विश्व प्रसिद्ध किताब "माँ" पड़ी थी, जिसको भी मैंने केवल शीर्षक देखकर ही खरीदा था। मैं किताबों की दुकान पर गया, वहाँ सजी हुई किताबों पर नजर दौड़ाई, तो मेरी नजर किताबों के बीचोबीच पड़ी एक किताब "कच्ची सड़क" पर गई। कच्ची सड़क अमृता प्रीतम की थी, मुझे तब पता चला जब वो किताब मेरे हाथों में आई। मैंने लेखक को नहीं देखा, केवल किताब का शीर्षक देखा, शीर्षक अच्छा लगा किताब खरीद ली। शीर्षक इसलिए भी ज्यादा भा गया, जब मैं ब्लॉगस्पॉट पर पहली बार आया था, तब मेरे ब्लॉग का नाम कच्ची सड़क था, जो मेरी गलती के कारण मुझसे नष्ट हो गया था। अमृता प्रीतम महिलाओं को बेहद पसंद है, लेकिन मुझे उससे थोड़ी नफरत थी, क्योंकि उसके शब्दों का रंग जिस महिला पर चढ़ा वो गम से निजात पाने की बजाय खुद को और गमगीन महसूस करने लगी। शायद कच्ची सड़क का मेरे तक आना अमृता प्रीतम के प्रति मेरे नजरिए को बदलने का वक्त का एक मकसद हो सकता है। इस उपन्यास की शुरूआत भय से होती है, एक लड़की मीना अपने पुरुष मित्र के घर में खड़ी है, लेकिन वो अचानक अनजाने डर से सहम जाती है। शुरूआत बिल्कुल किसी हॉरर फिल्म जैसी है, धीरे धीरे उपन्यास आगे बढ़ता है, लेकिन सस्पेंस अंत तक बरकरार रहता है। उपन्यास की कहानी एक लड़की ईद गिर्द घूमती है, मीना को अधूरा सच ही पता होता है, जिसके कारण वो किसी अन्य व्यक्ति के हाथों का मोहरा भी बन जाती है। मीना जब अपने प्रेमी के घर से निकलती है, रास्ते में उसको एक लड़की मिलती है, जो उसको कहती है कि उसके असली पिता उसको बुला रहे हैं, मीना पहले डरती है, फिर उसको याद आती अपने पापा के एक दोस्त की, जिसको वो मामा भी कहती थी। लेकिन लड़की की बातों के बात मीना एक उलझन में पड़ जाती है, उसको अपनी माँ का दामन मैला सा लगने लगता है। मीना को लगता है कि वो गैर कानूनी औलाद है। उसके दो पापा हैं, जिसको वो पापा कहती है वो उसके पापा नहीं और जिसको वो पापा नहीं कह सकती वो उसके पापा है। मीना को अपने दूसरे पापा के बारे में अच्छी अच्छी बातें पता चलती हैं, लेकिन उसको लगता है कि उसकी माँ उसको वो बात नहीं बताती, जो उसकी माँ और उसके दूसरे पापा के बीच एक रिश्ता बनाती है। मीना घरवालों को बिना बताए, अपने दूसरे पापा से मिलने जाती है, उनके साथ विदेश घूमने जाती है। जिसके लिए उसको घर में तमाम झूठ बोलने पड़ते हैं। वो विदेश होकर आती है अपने दूसरे पिता के साथ, लेकिन अगले दिन का अखबार पढ़ते ही वो टूट जाती है, जमीं पर गिर जाती है। वो सब अपने प्रेमी को बताती है, जिसके बात उसका प्रेमी धीरे धीरे कर सारी बात को स्पष्ट कर लेता है, और उपन्यास खत्म हो जाता है। अमृता प्रीतम ने उपन्यास को पूरी लय में लिखा है, कहीं से भी लय टूटती नहीं। उपन्यास के जरिए शायद अमृता प्रीतम कहना चाहती थी कि अधूरे सच के साथ मत चलो, वरना मीना की तरह किसी के हाथ का मोहरा बनकर रह जाओगे।

भार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में महफूज अली

हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, उनकी सोच युवा है, लेकिन दिल में आज भी कोई बच्चा बसता है। उनका मिलनसार स्वाभाव, सफलता की शिखर को छूने के बाद भी जमीं से लगाव उनकी शख्सियत को चार चाँद लगाता है। नवाबों की नगरी लखनऊ के पॉश इलाके में जन्में, एक हाई स्टैंडर्ड स्कूल में पढ़े और एक बिजनसमैन के साथ साथ एक शानदार कवि के रूप में अपनी पहचान बनाई, हाँ सही पहचाना वो हैं अपने महफूज अली भाई। अपने बारे में वो और क्या क्या कहते हैं, उनकी कहानी उनकी जुबानी सुनते हैं।

कुलवंत हैप्पी : अभिनेता सलमान खान से सब पूछते हैं, लेकिन महफूज अली से हम पूछना चाहेंगे शादी कब करोगे?
महफूज अली :
शादी इस साल हो जाने की उम्मीद है। भाई

कुलवंत हैप्पी : आपकी नजर में भगवान की क्या परिभाषा है?
महफूज अली :
भगवान वो ताकत है जो सर्वशक्तिमान है....हर जगह है.... और भगवान ही इस दुनिया को चला रहे हैं... इस सम्पूर्ण ब्रम्हांड पर उन्हीं का शासन है...हर क्रिया -प्रक्रिया बिना भगवान् इजाज़त के नहीं होती।

कुलवंत हैप्पी : आप इंग्लिश में भी कविताएं लिखते हैं और हिन्दी में भी, लेकिन असली मजा किसी भाषा में आता है?
महफूज अली :
अब सही कहूँ तो कॉन्वेंट बैकग्राउंड होने की वजह से इंग्लिश में आसानी रहती है। मैं बचपन से इंग्लिश में ही लिखता रहा और इंग्लिश में मेरी वार्ड पॉवर भी स्ट्रोंग है। मुझे चार-चार डिक्शनरी याद हैं, और Wren & Martin की इंग्लिश ग्रामर पूरी याद है। हिंदी में लिखना 1995 में शुरू किया था, और मेरी हिंदी अंग्रेजी मिश्रित होती थी। आज भी है... हिंदी में जबसे लिखना शुरू किया, और जो सफलता मिली फिर पीछे मुड़के नहीं देखा। मैं अब हिंदी और इंग्लिश में सामान रूप से लिखता हूँ, पर यह है कि हिंदी में शब्दों को लेकर अटक जाता हूँ। और जब भी अटकता हूँ,तो शरद कोकास भैया या फिर अजित वडनेरकर भैया को फोन लगाकर पूछ लेता हूँ....आप दोनों से मुझे बहुत मदद मिलती है और आप दोनों को पढ़कर ही मेरी हिंदी और अच्छी हुई है। गिरिजेश राव जी भी बहुत मदद करते हैं, पर अब हिंदी में लिखना ज्यादा अच्छा लगता है और मैं हिंदी में ही अब लिखना चाहता हूँ, इंग्लिश और हिंदी साहित्य में तकरीबन सब कुछ पढ़ा है।

कुलवंत हैप्पी : आप सफल कवि होने के साथ साथ बिजनसमैन भी हैं, आपकी सफलता का राज या गुरूमंत्र?
महफूज अली :
कवि तो मैं बचपन से ही हूँ। मैं चार साल की उम्र से कविता लिख रहा हूँ। फिर कवि से लेखक हुआ, बेसिकली तो मैं academician हूँ। मैं सीनियर प्रवक्ता हूँ, विश्विद्यालय में.... और IIT कानपुर के डिपार्टमेंट ऑफ़ सोशल साइंसेस व IIM लखनऊ में visiting faculty । बिजनेसमैन तो मैं ऐसे हुआ कि मेरा एक सपना था कि मेरा एक बिज़नस भी हो...जिससे कि मैं हमेशा secured रहूँ और कई लोगों को रोज़गार भी प्रदान करूँ....... तो अपनी Phd... के दौरान मैंने एक Pharmaceutical company की स्थापना की... मेरी कम्पनी का नाम Medica Herbal and Research Laboratory है... कृपया वेबसाईट देखें www.medicaherbals.com मेरी सफलता का राज़ Time management (समय प्रबंधन) है... मेरा यह मानना है की इस दुनिया में सबके पास चौबीस घंटे हैं....हर महान काम चौबीस घंटे में ही हुए हैं..मैंने समय को बाँट कर रखा हुआ है .... १० घंटे काम करता हूँ... ६ घंटे सोता हूँ.... १ घंटा एक्सरसाइज़ करता हूँ... ४ घंटे रोज़ पढता हूँ....आधा घंटा सुबह टिप्पणी करता हूँ..आधे से एक घंटा रात को टिप्पणी करता हूँ... बाकी का समय यहाँ वहां के नित्य कामों में ...बस इसी तरह समय को बाँट कर काम करता हूँ... और यही सफलता का राज़ है।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग की दुनिया में किस तरह आए और कैसा लगा ब्लॉगवुड?
महफूज अली :
ब्लॉग्गिंग में मैं सन २००२ में आया.... मैं पहले इंग्लिश ब्लॉगिंग किया करता था... हिंदी ब्लॉगिंग में मैं २००८ में आया...और सक्रिय रूप से सन २००९ से हिंदी ब्लॉगिंग में हूँ...ब्लॉगवुड में आकर तो बहुत अच्छा लगा... यहाँ मुझे इतने रिश्ते और अपने लोग मिले हैं.... अब तो यह ब्लॉगवुड ही मेरा परिवार है।

कुलवंत हैप्पी :  बिजनसमैन, कवि और ब्लॉगर होने के अलावा आप अतिथि लेक्चरार भी हैं, फिर इन सबको मैनेज कैसे करते हैं?
महफूज अली :
इसका जवाब ऊपर ही है.... मैनेज कर लेना भाई।

कुलवंत हैप्पी :  एक बिजनसमैन को साहित्य की तरफ कौन सी वजह खींच लाई और कौन सा कवि या लेखक आपका प्रणेता है?
महफूज अली :
बिज़नेसमैन तो मैं बहुत बाद में बना हूँ...लिखने-पढने का शौक मुझे मेरी माँ ने डलवाया....हमारे घर में हिंदुस्तान की हर पत्रिका का सब्सक्रिप्शन है और था भी। साहित्य की ओर मैं बचपन से ही आकर्षित था...मैं आज भी कॉमिक्स पढता हूँ। मेरे पसंदीदा कवि Percy Byshe Shelly हैं, इनको को ही पढ़कर मुझे लिखने का शौक हुआ और पसंदीदा लेखक E. R. Braithwaite हैं। Brooker T. Washington की लिखी कहानी My Struggle for an Education आज भी मेरे दिमाग पर पूरी तरह छाई हुई है।

कुलवंत हैप्पी : नवाबों के शहर लखनऊ में सबसे बढ़िया जगह कौन सी लगती है?
महफूज अली :
पुराने लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा, लक्ष्मण झूला मैदान और नए लखनऊ में, जहाँ मैं रहता हूँ गोमती नगर में। मुझे बहुत अच्छी लगता है गोमतीनगर, लखनऊ का क्या पूरे उत्तर प्रदेश की सबसे पोश इलाका है और हर सुविधा सिर्फ यहीं हैं। VIP area होने की वजह से गोमतीनगर बहुत अच्छा लगता है।

कुलवंत हैप्पी : कोई प्यारा पल, जो हम से बाँटना चाहते हों?
महफूज अली :
मैं शिमला डगशाई में बोर्डिंग में पढता था। तब फर्स्ट क्लास में था। मम्मी की बहुत याद आ रही थी, मैं रोते रोते सो गया था, पर जब आँख खुली तो सामने मम्मी थीं। जबकि मम्मी को अगले महीने आना था, अब जब रोता हूँ और यही ख्याल आता है कि काश! मम्मी आ जाएँ.... खुदा मेरी मम्मी को जन्नत बख्शें....मम्मी.... मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ।

कुलवंत हैप्पी : जाते जाते कोई ऐसा संदेश जो पूरे ब्लॉग जगत और युवा सोच युवा खयालात के पाठकों को देना चाहते हों?
महफूज अली :
प्यार दो, प्यार पाओगे।

चक्क दे फट्टे : टीचर ने कहा, चलो जुर्माना मुआफी का निवेदन पत्र लिखो। भूरे मिस्त्री ने तुरंत पूछा, मैडम जी जुर्माना कितने रुपए है। मैडम ने कहा, 'पाँच रुपए'। भ्रूरा मिस्त्री अपने कपड़ों से मिट्टी झाड़ते हुए उठा और मैडम के पास आकर बोला "लो पकड़ो, पाँच रुपए, मेरे पिता कहते हैं कि पाँच दस रुपयों के लिए बेइज्जती करवाना अच्छी बात नहीं होती"

भार
कुलवंत हैप्पी