मैं था अज्ञानी

1-
मेरे काफिले में बहुत समझदार थे,
बहुत विद्वान थे,
सब चल दिए भगवान की तलाश में
जंगल की ओर,
और मैं था अज्ञानी
बस माँ को ही ताँकता रहा।

2-
कहूँ तो क्या कहूँ,
चुप रहूँ तो कैसे रहूँ,
शब्द आते होठों पर
नि:शब्द हो जाते हैं।
ढूँढने निकल पड़ता हूँ
जो खो जाते हैं।
फिर मिलता है एक शब्द
अद्बुत
वो कमतर सा लगता है
तुम ही बतला देना
सूर्य को क्या दिखाऊं।

1. समीर लाल समीर के काव्य संग्रह बिखरे मोती से कुछ पंक्तियाँ पढ़ने के बाद जो दिल में आया लिख डाला, 2. खुशदीप सहगल की एक पोस्ट पढ़ने के बाद लिखा था।
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कुलवंत हैप्पी

चीन का एक और काला अध्याय

बाघों की सुरक्षा को लेकर भारत में चिंतन किया जा है। मोबाइल संदेशों के मार्फत उनको बचाने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं, कुछ दिनों बाद 7 अप्रैल टाईगर प्रोजेक्ट स्थापना दिवस है, बाघ बचाओ परियोजना की स्थापना 7 अप्रैल 1973 हुई। इस स्थापना भी कोई खास रंग नहीं ला सकती, यही कारण है कि भारत में बाघों की संख्या 1411 रह गई है। जहाँ भारत में बाघ बचाओ के लिए एसएमएस किए जा रहे हैं, वहीं भारत से आबादी और ताकत के मुकाबले में आगे निकल चुका चीन उन बाघों को अपने स्वार्थ के लिए खत्म किए जा रहा है।

ऐसा ही कुछ खुलासा डेली मेल नामक वेबसाईट में प्रकाशित एक खबर में किया गया है। डेली मेल में प्रकाशित ख़बर के अनुसार चीन के गुइलिन शहर में एक ऐसा फार्म है जहां अनुमानों के मुताबिक करीब 1500 बाघ बाजार में उपयोग के लिए पाले जा रहे हैं। इन बाघों की हड्डियों से शराब तैयार की जा रही है, पहले तो चीन केवल दवाईयाँ तैयार करता था इनकी हड्डियों से। गौरतलब है कि यह संख्या दुनिया में आज बचे कुल बाघों की संख्या की आधी है। एक ही पिंजरे में कई-कई बाघों को रखा जा रहा है और मौत ही इनकी नियति है।

जबकि इस काले अध्याय के सामने आने से पहले वन्य जीव संरक्षण संगठन की निदेशक इ यान ने बताया था कि दक्षिण पश्चिमी युन्नान प्रांत में करीब 10 बाघ, तिब्बत में 15 और पश्चिमोत्तर जिलिन और हिलोगजियान प्रांत में करीब 20 बाघ बचे हैं। यान ने कहा कि दक्षिणी चीन में बाघ तो संभवत: विलुप्त हो चुका है। उन्होंने कहा कि बाघों की संख्या कम होना दुखद है। तिब्बत और दक्षिण में इनकी संख्या में गिरावट आ रही है, उन्होंने बताया कि पूर्वात्तर में बाघ की संख्या फिलहाल स्थिर है और कुछ प्रयासों से इनकी संख्या बढाई गई है लेकिन यह बहुत कम है।

डेली मेल के खोजी पत्रकार Richard Jones In Guilin को दाद देता हूँ, जिसने साँप की बिल में हाथ डालकर सच को बाहर निकाला, चीन जैसा देश अभिव्यक्ति को दबाने के हर बड़ा कदम उठाता है। वहाँ अभिव्यक्ति को कुचल दिया जाता है, ऐसे में अगर कोई सच को बाहर निकाल लाए, उसको दाद देनी तो बनती है। हिन्दुस्तानी पत्रकारों से तो बेहतर ही हैं, विदेशी खोजी पत्रकार, वो किसी को आग में झुलसते हुए देख अपनी पत्रकारिता की शौर्य तो प्रकट नहीं करते। एक इंसान जिन्दा जल रहा है, हिन्दुस्तानी पत्रकार उसका वीडियो उतारकर गर्व महसूस करते हैं, वो किसी जीवंत सीन को कैप्चर जो कर रहे हैं, थू ऐसे घटिया सोच के पत्रकारों पर। शर्म आती है, भारतीय पत्रकारिता को देखते हुए। इसको पत्रकारिता नहीं, कायरता कहिएगा जनाब। एक दूसरे को संदेश भेजकर चुप मत बैठो, एक जनमत तैयार करो, अगर बाघों को बचाना है, नहीं तो टाईगर प्रोजक्ट केवल प्रोजेक्ट बनकर रह जाएगा। हर देशों को अपनी सरकारों पर दबाव बनाना होगा, और उन सरकारों को चीन जैसे घटिया सोच के देश पर दबाव बनाना होगा।

 भार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में ललित शर्मा

हैप्पी अभिनंदन में आज आपको जिस ब्लॉगर हस्ती से रूबरू करवाने जा रहा हूँ, वैसे तो आप उन्हें अच्छी तरह वाकिफ होंगे, लेकिन किसी शख्स के बारे में जितना जाना जाए, उतना कम ही पड़ता है। वो हर रोज किसी न किसी ब्लॉगर का चर्चा मंच ,चर्चा हिन्दी चिट्ठों की !!! जैसे अन्य ब्लॉगों के जरिए प्रचार प्रसार करते हैं। कई क्षेत्रीय भाषाओं का ज्ञान भी रखते हैं, ताऊ और फौजी उनको बेहद प्यारे हैं, सच में उनकी मुछें जहाँ ताऊ की याद दिलाती हैं, वहीं उनके ब्लॉगों पर लगे स्वयं के फौजी वाले कार्टून उनके देश भक्ति के जज्बे को उजागर करते हैं, वैसे हरियाणा के घर घर में एक फौजी पैदा होता है, ऐसी बात भी प्रचलन में है। अगर देखा जाए तो अभनपुर छत्तीसगढ़ की शान ब्लॉगर ललित शर्मा जी भी फौजी से कम नहीं, वो बात अलहदा है कि उनकी हाथ में बंदूक की जगह कलम है, वैसे एक महान एवं महरूम पत्रकार प्रभाष जोशी ने कहा है कि जब तोप न चले तो अखबार निकालो, मतलब कलम उठाओ, क्रांति लाओ। आओ चर्चा पान की दुकान पर करने वाले एक कलम के फौजी से जानते हैं उनके दिल की बातें।

कुलवंत हैप्पी : पंजाबी बापू के खुंडे 'लठ' की तरह हरियाणा का ताऊ बड़ा फेमस है, ताउ के शै है बतलाईए?
ललित शर्मा: वाह! भाई हैप्पी वाह! - सवाल भी ढूंढ़ के लाया गजब का, ताऊ शब्द हरियाणा, राजस्थान, यु.पी. के कुछ हिस्सों, दिल्ली, आदि में प्रचलित है. ताऊ शब्द सुनते ही मन में एक मूछ वाले बुजुर्ग माणस की तश्वीर उभरती है, जिसके हाथ में लठ हो. ताऊ एक ऐसी शख्सियत है जिसका कहा छोटे हो या बड़े सब मानते हैं. ताऊ भतीजों की तो दोस्ती मशहूर होती है. जो चीज बालक अपने बाप से नहीं मांग सकता वो ताऊ से मांग ले तो सहज उपलब्ध हो जाती है. अगर ताऊ एकाध लठ भी मार दे तो परसाद समझ के खाना भी पड़ जाता है. ताऊ से बड़ी कोई अदालत नहीं होती इसके बाद तो भगवान ही मालिक है. मेरे हिसाब से तो ताऊ एक संस्कृति और विचार धारा का नाम है. जिसमे प्यार, सम्मान, रौब-रुतबा सब समाया हुआ है. ताऊ एक जिम्मेदार आदमी का प्रतीक है. इसलिए मै ताऊ का भरपूर सम्मान करता हूँ और भरपूर स्नेह पाता हूँ.
   
कुलवंत हैप्पी : आप कितनी भाषाओं में लिखते हैं?
ललित शर्मा-  विभिन्न भाषाओँ को पढ़ने लिखने का शौक है मुझे अवधी, भोजपुरी गुजराती भी बड़ी प्यारी लगती है. मैंने संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, गुरमुखी का अक्षर ज्ञान पाया है, अब अभ्यास छुट गया है फ़िर भी जीवन के इन वषों में भाषाओं में सिद्ध होने की कोशिश रहूँगा. अभी भी मैं भाषाओं का विद्यार्थी हूँ. तथा जीवन पर्यंत विद्यार्थी ही रहना चाहता हूँ. तमिल और मलयालम सीखने की कोशिश कर रहा हूँ। अब मुझे समय कम मिल पाता है. ब्लाग पर हिंदी, हरियाणवी और छत्तीसगढ़ी में लिख रहा हूँ निरंतर, पंजाबी में लिखी रचनाएँ भी हैं, अब उन्हें भी प्रकाशित करना चाहूँगा. विद्या अध्यन से कभी आलस नहीं करना चाहिए. नीतिकारों ने कहा है-
आलस्यं मदमोहौ च चापल्यं गोष्ठिरेव च्।
स्तब्धता चाभिनित्वं तथाSत्यागित्वमेव च।।
सुखार्थिन: कुतो विद्या नास्ति विद्या्र्थिन: सुखम्।
सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेतसुखम्॥
एते वै सप्त दोषा: स्यु: सदा विद्यार्थिनां मता। 

कुलवंत हैप्पी : आप चिट्ठा चर्चाओं पर भी एक ब्लॉग संचालित करते हैं, ज्यादा चिट्ठा चर्चाएं पक्षपात करती हैं। इस बारे में आपकी क्या राय है?
ललित शर्मा :  आपने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया? मैं नहीं मानता की चिटठा चर्चाओं में कोई पक्षपात होता है. सभी के पठनीय लेखों का समवेश किया जाता है. जब मैं ब्लॉग जगत में आया था तो रवि रतलामी जी ने मेरे ब्लॉग "शिल्पकार के मुख से" में प्रकाशित एक गजल "शाहकार बनने पर वे कटवा देंगे मेरे हाथ" की चर्चा की थी. जबकि मेरा आज भी उनसे रूबरू परिचय नही है. वो मेरे ब्लॉग पे आते हैं और मै उनके ब्लॉग पे जाता हूँ. अगर पक्षपात होता तो हमारा जिक्र ही नही होता. मै अभी "चर्चा मंच"-"समय चक्र" एवं "चर्चा हिंदी चिट्ठों की" पर ब्लाग चर्चा कर रहा हूँ. सभी के उत्कृष्ट एवं पठनीय लेखन का चिटठा चर्चा में उल्लेख किया जाता है.

कुलवंत हैप्पी : व्यंगकार, कवि और लेखक आप हैं ये तो सब जानते हैं, लेकिन असल जिन्दगी में क्या करते हैं कुछ बतलाईए?
ललित शर्मा - अभी मेरा प्रमुख कार्य अध्यन और अध्यापन ही है और यह जीवन ही असल जिंदगी है. जो सबके सामने है.

कुलवंत हैप्पी : जब आपकी रचनाएं संपादकों द्वारा आपको वापिस भेजी गई तो आपको कैसा लगा ?
ललित शर्मा - हा हा हा! जब मैंने कवितायेँ लिखना प्रारम्भ किया तो उस समय मेरी उमर १३-१४ साल की थी. बस धुन सवार रहती थी लिखने की्। उसके बाद श्रोता ढूँढना पड़ता था सुनाने के लिए. बस जो भी जहाँ भी पकड में आ गया दो चार कविता सुना ही देता था. उस समय कविता के शिल्प की समझ भी नहीं थी. जो आया लिख मारा. उसके बाद उसे अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में भेजता था. मौलिक होने का प्रमाण पत्र और एक टिकिट लगे लिफाफे के साथ. अधिकांश कवितायेँ वापस आ जाती थी. खेद का सन्देश साथ में होता था. तब बड़ी कोफ़्त होती थी. सम्पादकों पर गुस्सा भी आता था कि मेरी कवितायेँ क्यूँ नहीं छापते. मेरा गांव लग-भग उस समय ८००-९०० की आबादी का था. जिसमे लिखने वाला कोई भी नहीं था कि मुझे कोई उस्ताद मिल जाता और मुझे कविता लेखन का रास्ता दिखाता. अब तो सब मिल गए और जितने मिले सब उस्ताद ही मिले.

कुलवंत हैप्पी : ढाई अक्षर प्रेम के तो सुने थे, लेकिन ढाई पंक्ति कविता आपने कब और कैसे लिखने की सोची?
ललित शर्मा- ढाई अक्षर प्रेम का राग तो अब बहुत ही पुराना हो चूका है. रिकार्ड घिस चूका है. अब इसे बदल देना चाहिए कुछ नया होना चाहिए ढाई पंक्ति की प्रेरणा मुझे बड़े भाई जैसे मित्र शरद कोकास जी से मिली तथा जब से आपने पढ़ी तब से ही लिखी.    

कुलवंत हैप्पी : रोचक हो या गम्भीर एक यादगार पल, जो सबके साथ सांझा करना चाहते हों?
ललित शर्मा - एक बहुत ही रोचक किस्सा है, सुनिए-सभी पंथों एवं धर्मों की मान्यता है कि शवयात्रा में शामिल होना पुण्य का काम है. दोस्त हो या दुश्मन, परिचित हो या अपरिचित सभी की अंतिम यात्रा में शामिल होना चाहिए, ये बात मैंने भी गांठ बांध रखी थी. किसी की भी शव यात्रा घर के सामने से निकले मैं अपना पंछा (अंगोछा) उठा कर उसमें शामिल हो जाता हूँ, एक दिन ऐसी ही एक शव यात्रा घर के सामने से निकली, उसमें सभी परिचित लोग दिखे, तो मैंने सोचा कि गांव में किसी की मृत्यु हो गयी और नाई मुझ तक नहीं पहुंच पाया मुझे जाना चाहिए तो मैंने अपना अंगोछा उठाया और चल दिया, श्मशान जाने के बाद मैंने किसी से नहीं पूछा कि कौन मरा है? अपने हिसाब से कयास लगाया. हमारे मोहल्ले में एक फौजी रहता था और वो काफी वृद्ध हो गया था, वो लगातार बीमार भी रहता था, उसके नाती लोग उसके साथ रहते थे. श्मशान में फौजी के नाती लोग सभी क्रिया कर्मों को अंजाम दे रहे थे. अब मैंने सोच लिया कि फौजी की ही शव यात्रा है. अंतिम संस्कार के बाद घर आया तो मेरी दादी ने पूछा कि कौन मर गया? मैंने कहा फौजी. उन्हें बता कर मैं नहा कर पूजा पाठ करके किसी काम से बस स्टैंड चला गया. जब वापस घर आया तो देखा घर के सब लोग एक साथ बैठे थे. मैं देखते ही चक्कर में पड़ गया कि क्या बात हो गयी इतनी जल्दी? मैं तो अभी ही घर से गया हूं बाहर. दादी ने पूछा " तू किसकी काठी "अंतिम यात्रा"में गया था. मैंने कहा "फौजी की. तो वो बोली "फौजी तो अभी आया था. रिक्शा में बैठ के और मेरे से 100 रूपये मांग कर ले गया है. वो बीमार है और इलाज कराने के लिए पैसे ले गया है. अब मैं भी सर पकड़ कर बैठ गया "आखिर मरा वो कौन था? जिसकी मैं शव यात्रा में गया था. मैंने कहा ये हो ही नहीं सकता मैं अपने हाथों से लकडी डाल के आया हूँ. वो किधर गया है? उन्होंने कहा कि बस स्टैंड में डाक्टर के पास गया होगा. मैंने फिर अपनी बुलेट उठाई और बस स्टैंड में उसको ढूंढने लगा. एक जगह पान ठेले के सामने वो मुझे रिक्शे में बैठे मिल गया. मैंने उतर के देखा और उससे बात की. अब मैं तो सही में पागल हो चूका था कि "मैं आखिर किसी शव यात्रा में गया था" मेरी तो समझ में नहीं आ रहा था, क्या किया जाये? फिर मेरे दिमाग में आया कि फौजी के नाती लोगों से पूछा जाये. अब पूछने में शरम भी आ रही थी कि वे क्या सोचेंगे? महाराज का दिमाग खसक गया है. काठी में जा के आने के बाद पूछ रहा है कौन मरा था? किसकी काठी थी? मैं इसी उधेड़ बुन में कुछ देर खडा रह फिर सोचा कि चाहे कुछ भी पूछना तो पड़ेगा. ये तो बहुत बड़ी मिस्ट्री हो गयी थी.आखिर मैं उनके घर गया. दूर में मोटर सायकिल खड़ी करके उसके छोटे नाती को वहीँ पर बुलाया और उससे पूछा. तो उसने बताया कि उसके पापा (फौजी के दामाद) की मौत हुयी है वो भी काफी दिन से बीमार चल रहे थे.

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग दुनिया में कब आए, और इस दुनिया को आप कितना समय देते हैं? उस समय में से कितना पढ़ने और कितना लिखने में को देते हैं?
ललित शर्मा-
ब्लोगिंग की दुनिया में आए तो साल हो गया. लेकिन सक्रिय रूप से जुलाई में आया. तब से लेकर आज तक मैं ब्लॉगिंग को लगभग ६ घंटे देता हूँ जिसमें लिखना पढ़ना दोनों शामिल है. मतलब जब भी समय होता है, उसे पूरी गंभीरता से ब्लॉगिंग को समर्पित करता हूँ. 

कुलवंत हैप्पी : आपकी राय में कितने प्रतिशत ब्लॉगर सार्थक ब्लॉगिंग करते हैं?
ललित शर्मा-
सभी ब्लॉगर ही अपनी-अपनी मति के अनुसार सार्थक ब्लॉगिंग ही कर रहे हैं. हमारे पास ऐसा कोई पैमाना नहीं है किसी की ब्लॉगिंग का मुल्यांकन कर सकें। जो भी ब्लागिंग में है वह अपने जीवन का महत्वपुर्ण समय और धन इसमे अर्पित कर रहा है, सभी की पसंद और उद्देश्य एक नहीं हो सकते। इसलिए जिसको जो अच्छा लगता है वो वही लिखता है और वैसा ही उन्हें पाठक वर्ग मिल जाता है।  

कुलवंत हैप्पी : क्या आपने स्वयंलिखित व्यंग्य लेख पर विचार करते हुए शौचालय को सोचालय बना या नहीं?
ललित शर्मा-
हा हा हा! मारा पापड़ वाले को। ये राज की बात है इसे राज ही रहने दो, हमारे घर मे ४-४ सो्चालय हैं।
अंत मे कुछ पंक्तिया जिन से में नाता रखता हूँ।
परिचय क्या दूं मैं तो अपना
नेह भरी जल की बदरी हुँ
किसी पथि्क की प्यास बुझाने
बंधी हुई कुंवे पर गगरी हुँ
मीत बनाने जग मे आया
मानवता का सजग प्रहरी हुँ
हर दुवार खुला है घर का
सबका स्वागत करती नगरी हुँ
:-राम राम

चक्क दे फट्टे : भूरा मिस्त्री गप्पे भी बड़े बड़े छोड़ता है। इस बात का पता तब चला। उसकी और भजने अमली की बात चल रही थी। भजना अमली जब बहुत ज्यादा अफीम खा लेता है तो झूठ बहुत बोलता है। भजने अमली ने कहा "भूरे तुम्हें पता है मेरे ससुराल वालों का घर इतना बड़ा है कि वहाँ माल गाड़ी पार्क की जा सकती है"। भूरा मिस्त्री भी कहाँ कम था, उसने भी तुरंत कह डाला, मेरे ससुराल वालों का घर तो इतना बड़ा है कि दूसरे कोने में जाते ही रोमिंग शुरू हो जाती है।

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कुलवंत हैप्पी

हे माँ तेरी शान में

स्कूल से आते जब देरी हो जाती थी।
चिंता में आंखें नम तेरी हो जाती थी।
मेरी देरी पर घर में सबसे अधिक
माँ तू ही तो कुरलाती थी।
गलती पर जब भी डाँटते पिताश्री
तुम ही तो माँ बचाती थी।
खेलते खेलते जब भी चोट लगती
देख चोट मेरी माँ तू सहम जाती थी।
मैं पगला अक्सर ऐसे ही रूठ जाता,
मां तुम बड़े दुलार से मनाती थी।
नहीं भूला, याद है माँ,
एक दफा मारा था जब तुमने मुझे।
मुझसे ज्यादा हुआ था दर्द माँ तुझे।
तूने हमेशा मेरे लिए दुआएं की।
मेरी सब अपने सिर बलाएं ली।
आज शोहरत भी है, दौलत भी है।
खूब सारी पास मेरे मौहलत भी है।
मगर गम है।
सोच आँख नम है।
क्योंकि
उसको देखने के लिए
माँ तुम नहीं इस जहान में।
अगर होता मेरे बस में,
माँ रख लेता,
कर गड़बड़ी रब्ब के विधान में।
जितने भी शब्द लिखूं कम ही है
हे माँ तेरी शान में।


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कुलवंत हैप्पी

गुरू

मैंने इस कविता को बहुत पहले अपने एक पाठक की गुजारिश पर लिखा था, लेकिन युवा सोच युवा खयालात पर पहली बार प्रकाशित कर रहा हूँ, उम्मीद करता हूँ कि मेरे जैसे अकवि की कलम और जेहन से निकले भाव आपको पसंद आएंगे। अकवि इसलिए क्योंकि काव्य की बहुत समझ नहीं, या फिर कभी समझने की कोशिश नहीं की।

गुरू एक मार्ग है,
मंजिल तक जाने का,

गुरू एक साधन है,
भगवान को पाने का

गुरू एक प्रकाशयंत्र है,
अज्ञानता को मिटाने का,

पहले गुरू हैं माता पिता,
जिसने बोलना सिखाया,

दूसरे गुरू शिक्षक हैं,
जिन्होंने जीना बतलाया,

तीसरा वक्त है,
जो पांव पांव पर
सिखाता है
परिस्थितियों से निपटना

है वो हर शख्स गुरू,
सिखाता जो
जीने का सलीका,
इस मतलबी दुनिया में
'हैप्पी' रहने का तरीका,
 
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कुलवंत हैप्पी

एक गुमशुदा निराकार की तलाश

इस दुनिया में इंसान आता भी खाली हाथ है और जाता भी, लेकिन आने से जाने तक वो एक तलाश में ही जुटा रहता है। तलाश भी ऐसी जो खत्म नहीं होती और इंसान खुद खत्म हो जाता है। वो उस तलाश के साथ पैदा नहीं होता, लेकिन जैसे ही वो थोड़ा सा बड़ा होता है तो उसको उस तलाश अभियान का हिस्सा बना दिया जाता है, जिसको उसके पूर्वज, उसके अभिभावक भी नहीं मुकम्मल कर पाए, यह तलाश अभियान निरंतर चलता रहता है। जिसकी तलाश है, उसका कोई रूप ही नहीं, कुछ कहते हैं कि वो निराकार है। कितनी हैरानी की बात है इंसान उसकी तलाश में है, जिसका कोई आकार ही नहीं। इस निराकार की तलाश में इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन उसका अभियान खत्म नहीं होता, क्योंकि उसने अपने खत्म होने से पहले इस तलाश अभियान को अपने बच्चों के हवाले कर दिया, जिस भटकन में वो चला गया, उसकी भटकन में उसके बच्चे भी चले जाएंगे।

ऐसा सदियों से होता आ रहा है, और अविराम चल भी रहा है तलाश अभियान। खोजना क्या है कुछ पता नहीं, वो है कैसा कुछ पता नहीं, हाँ अगर हमें पता है तो बस इतना कि कोई है जिसको हमें खोजना है। वो हमारी मदद करेगा, मतलब उसकी तलाश करो और खुद की मदद खुद करने का यत्न मत करो। मुझे मनुष्य और मृग में कोई ज्यादा फर्क नहीं लगता है, मनुष्य की तरह मृग भी कस्तूरी की तलाश में जंगल में भटकते भटकते मर जाता है, जबकि कस्तूरी तो उसकी नाभी में ही होती है। जैसे मृग की नाभी में कस्तूरी होती है, वैसे ही मनुष्य आत्मा में प्रमात्मा का वास होता है।

इसके बारे में लाईफ पॉजिटिव की संपादिका सुमा वर्गीज ने अगस्त 2009 के अंक में बहुत सुंदर शब्दों में कुछ ऐसे लिखा है। मनुष्य को बनाने और उसे ईश्वर की खोज करने और ईश्वर को जानने का कार्य सौंप कर परमात्मा एक बड़ी उलझन में फंस गए। उनके सामने जो समस्या थी कि वह यह थी कि वह कहाँ जाकर छिपे जहां मनुष्य उन्हें आसानी से न ढूँढ सके, पर्वत में जाकर छिपें या गहरे समुद्र में या मेघों के बीच उड़ते रहें, वह जाएं तो जाएं कहां? आखिरकार उन्हें अपनी उलझन का समाधान मिल ही गया। "मैं आदमी की आत्मा में निवास करूंगा" उन्होंने कहा, "क्योंकि यही एक जगह है, जहां मनुष्य मुझे ढूँढ निकालने की सोच भी नहीं सकेगा"।

सच में कुछ ऐसा ही हुआ, जिन्होंने परमात्मा को जाना है, उन्होंने भीतर से ही जानना है। अगर परमात्मा जंगलों में होते तो शेरों चीतों अन्य जानवरों को मिल जाते, अगर परमात्मा समुद्र में होते तो मछलियों को मिल जाते, अगर परमात्मा आसमां में मेघों के संग उड़ रहे होते तो शायद पक्षियों परिंदों से मिल जाते। मगर परमात्मा ने ऐसी जगह ढूँढ ली, जहाँ पहुंचने के लिए इंसान को खुद के भीतर उतरना होगा, लेकिन वो ऐसा करने में हमेशा असफल हुआ, क्योंकि उसको बाहरी दुनिया ने अंदर लौटने का मौका ही नहीं दिया, तलाश की जिम्मेदारी इतनी सख्त कर दी कि वो दिशाविहीन बस चले जा रहा है। अंत कहाँ है, उसको पहुंचना कहाँ है कोई पता नहीं। उसकी यात्रा का मृत्यु के अलावा कोई अंत है, उसको खुद को पता नहीं बस चले जा रहा है। इस तलाश को रोकने के लिए हम इतना यत्न कर सकते हैं कि हम जिस तलाश में भटक रहे हैं, उस तलाश में नई पीढ़ी को भटकनें से रोकें, अगर एक भी भटकने से बच गया तो समझो। अब कारवां शुरू हो चुका है।


भार
कुलवंत हैप्पी

मुझे माफ कर देना

मुझे माफ कर देना
उतर सकी न पूरी
तेरी मुहब्बत के क्षितिज पर

हाँ, मुझे ले बैठा
लज्जा, शर्म
और बदनामी का डर

जो किए थे वादे
निकले
रेत के टीले
या
पानी पे खींची लकीर
जो तुम समझो

क्षमा चाहती हूँ,
जो, तेरे लिए
जमाने से
मैं लड़ न सकी
कदम से कदम
और
कंधे से मिला कंधा
साथ तेरे खड़ न सकी

बेवफा, खुदगर्ज
धोखेबाज
जो चाहे देना नाम मुझे
लेकिन याद रखना
रिश्ता तोड़ने से पहले
कई दफा
खुद भी टूटी हूँ मैं
मजबूरियों,
बेबसियों के आगे टेक घुटने
माँ बाप के लिए
बन गोलक फूटी हूँ मैं

तेरा सामना कर सकूँ
हिम्मत न इतनी जुटा पाई मैं
हर बार की तरह
अब भी समझ लेना
मेरी बेबसी
लाचारी को
जो बोलकर न सुना पाई मैं।
भार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में कार्टूनिस्ट कीर्तिश भट्ट

हैप्पी अभिनंदन में आज ब्लॉगवुड की जिस हस्ती से आप रूबरू होने जा रहे हैं, वो कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कहने में यकीन रखते हैं। कहूँ तो गागर में सागर भरने की कोशिश करते हैं और सफल भी होते हैं, सच में कोई अतिशोक्ति नहीं। हररोज आप उनके इस हुनर और कला से रूबरू होते हैं। जी हाँ, मैं आज आपकी मुलाकात बामुलाहिजा के संचालक और शानदार कार्टूनिस्ट कीर्तिश भट्ट से करवाने जा रहा हूँ। वो क्या सोचते हैं ब्लॉगवुड के बारे में और कैसे पहुंचे जहाँ तक उनकी कहानी उनकी जुबानी खुद ही पढ़िएगा।

कुलवंत हैप्पी : आपने अपने ब्लॉग पर भारतीय कार्टून और भारतीय कार्टूनिस्ट से सम्बद्ध लेख का लिंक तो दिया है, लेकिन खुद के बारे में कुछ नहीं लिखा, विशेष कारण?
कीर्तिश भट्ट : ज
हाँ तक 'भारतीय कार्टून और भारतीय कार्टूनिस्ट से सम्बद्ध लेख का ' सवाल है तो वो लिंक मैंने इसलिए लगाया है क्योंकि हिंदी विकिपीडिया पर इस विषय से सम्बद्ध लेख मैं लिख रहा हूँ, लिंक पर दिए गए लेख मेरे लिखे हुए हैं. कई पूर्ण है कई आधे अधूरे हैं जिन्हें जानकारी के आभाव मैं पूरा नहीं कर पाया हूँ. लिंक देने कई कारण है जैसे कि अन्य कार्टूनिस्ट भी अपने बारे मैं जानकारी दें. पाठक कार्टूनिस्टों के बारे मैं जानें, और यदि किसी के पास इनसे सबंधित और जानकारी हो तो वाह भी सामने आ जाये.
रही बात अपने बारे मैं लिखने कि तो ईमानदारी से कहूं तो लिखने को कुछ विशेष था ही नहीं सो नहीं लिखा. पढाई से लेकर कार्टूनिंग तक ऐसा कोई तीर नहीं मारा जिसका यहाँ उल्लेख किया जा सके. शकल भी ऐसी नहीं है फोटो दिखाने के बहाने अपने बारे मैं कुछ लिखा जाये. ऐसे मैं अपने ब्लॉग पर एक अनुपयोगी विजेट की बजाय अन्य रोचक सामग्री प्रस्तुत करना ज्यादा उचित समझा  जो पाठको को पसंद भी आए और मेरी साईट की रोचकता और पठनीयता भी बढाए.आप यदि गूगल अनालीटिक्स जैसी सुविधाओं का उपयोग करते हो तो आपको पता चलता रहता है कि आपकी साईट पर क्या पसंद किया जा रहा है तथा कब /कहाँ /कैसे और क्या पढ़ने के लिए आपकी साईट पर ट्राफिक आ रहा है. मैंने उसी प्राथमिकता से अपने ब्लॉग के विजेट सेट किये हुए हैं. इसमें अपने बारे में लिखना मुझे अनावश्यक लगा. वैसे जो लोग जानना ही चाहते हैं उनके लिए मैं यहाँ बता देता हूँ कि मैं मध्यप्रदेश के झाबुआ मैं पैदा हुआ. शिक्षा के नाम पर समाजशास्त्र मैं एमए किया है. कला और कार्टून से सम्बद्ध कोई डिग्री या शिक्षा मैंने नहीं ली. वर्तमान में इंदौर मैं 'नईदुनिया' मैं कार्यरत हूँ. 

कुलवंत हैप्पी : आप ने अपने ब्लॉग से टिप्पणी बॉक्स हटा दिया, उसके पीछे कोई विशेष कारण?
कीर्तिश भट्ट :
फिर वही वजह 'give and take' कम से कम मेरे ब्लॉग पर तो यह गैरजरूरी विजेट था. वैसे भी उसका उपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा हो रहा था. या तो उस पर कोई बेनामी टिपण्णी कर अपनी कुंठा शांत कर रहा था या नए (कुछ पुराने ब्लॉगर भी) अपने ब्लॉग का विज्ञापन कर रहे थे. मेरा समय प्रबंधन जरा ख़राब है ऐसे मैं जितना समय बचा पता हूँ उसमें ज्यादा से ज्यादा पोस्ट पढ़ने  का प्रयास करता हूँ. लेकिन टिप्पणियाँ कम ही कर पाता हूँ. अब जैसी कि प्रथा चल पड़ी है अगर मैं टिप्पणियां कर नहीं कर रहा हूँ तो  आयेंगी भी नहीं. अतः बंद करना बेहतर समझा. इससे कम से कम उन ब्लॉगर बंधुओं क समय बचेगा जो इस आशा मैं टिपण्णी करने यदा कदा आ जाते थे कि बदले में मैं भी टिपण्णी करूँगा.ब्लॉग्गिंग की इस टिपण्णी प्रथा से व्यथित हो कर मैंने अपने गुरुनुमा बड़े भाई (ब्लॉगर मित्र) से चर्चा की और उनसे मार्गदर्शन भी माँगा. टिप्पणियों को लेकर मेरे कदम का उन्होंने समर्थन किया और जो वचन उन्होंने कहे उसे यहाँ पेस्ट किये दे रहा हूँ छोटे से लेकर बड़े ब्लॉगर और बुद्धिजीवी से लेकर टिपण्णीजीवी ब्लॉगर सभी ध्यान से पढ़ें. टिपण्णी के बारे मैं वे कहते हैं "यही तो मानवीय मूल्यों का सर्वोपरि अवलोकन है जो मानव को मानव से दानव बनाने के लिए स्वतः प्रेरित करता है. यही तो वह शाश्वत प्रलोभन है जिसका संशोधन करना है. जैसे पुष्प ही पुष्प की अन्तःतवचा में उद्वेलित होता है. शाश्वत प्रलोभन ही भ्रष्टाचार जनता है और उससे वह प्रभावित होता है जो सानिवि का अधिशासी अभियंता है." ... आशा है समझाने वाले समझ गए होंगे.

कुलवंत हैप्पी : आप ने अपने हुनर को खुद पहचाना या किसी और ने कहा, आप अच्छे कार्टूनिस्ट बन सकते हो?
कीर्तिश भट्ट :
अच्छा या बुरा यह तय होने में अभी बहुत ज्यादा समय बाकी है. रही बात सिर्फ कार्टूनिस्ट बनने की तो उसके लिए तीन लोगों को श्रेय देना चाहूँगा जिन्होंने प्रत्यक्ष तो नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से मुझे मदद की. पहले मेरे प्राइमरी स्कूल (सरकारी) के हेडमास्टर. स्कूल में उनकी सख्ती और अनुशासन इतना भय रहता था कि मेरे जैसे लडके उनके जोर से डांटने पर ही अपनी निक्कर गीली कर दे. एक दिन क्लास मैं कॉपी पर चित्र बनाते हुए नज़र ऊपर कि तो सामने वही खड़े थे. उस वक्त कुछ सेकेंड्स में मेरा छोटा दिमाग जितने भी बुरे परिणाम सोच सकता था सोच रहा था ..और इससे पहले कि निक्कर गीली होती उस कड़क आवाज़ ने हँसते हुए बोला "अरे वाह !! आज तो चित्रकारी हो रही है !!??" ..बस तब से वो चित्रकारी (दरअसल कार्टूनिंग ) चल ही रही है. अगर उस दिन उनकी प्रशंसा की बजाय एक आध थप्पड़ पढ़ जाता तो शायद कार्टूनिंग भूल जाता मैं. दूसरे और तीसरे नम्बर पर मेरे दोनों बढे भाई जिन्होंने पिताजी की सोच के विपरीत मुझे पढाई से ज्यादा कार्टून पर ध्यान देने कि सलाह दी. इसके अतिरिक्त बाकी सफ़र  "एकला चालो रे " की नीति पर जारी है.  

कुलवंत हैप्पी : आपकी वेकसाईट पर कॉमिक स्ट्रिप हैं, लेकिन आप उन्हें ब्लॉग पर क्यों नहीं डालते ?
कीर्तिश भट्ट :
शुरू से ही मैं बामुलाहिजा को ब्लॉग के बजाय वेबसाइट के रूप मैं स्थापित करना चाहता हूँ इसके मद्देनज़र उस पर राजनितिक और सामाजिक हास्य-व्यंग आधारित अन्य कई सामग्री भी उपलब्ध रहती है. कॉमीक्स ही नहीं उस पर और भी कई रोचक सामग्री है मैं लगभग हर रोज जोड़ रहा हूँ. यदि में अपनी साईट का हर आइटम  ब्लॉग पर पोस्ट बनाकर डालूँ तो शायद एग्रीगेटर के पेज पर हर आधे घंटे में  एक पोस्ट मेरी होगी. चूँकि एग्रीगेटर्स पर लगातार पोस्ट प्रकाशित होती रहती है ऐसे मैं मेरे पोस्ट बार बार पेज पर आने से दूसरी महत्वपूर्ण पोस्ट बिनावाजह बगैर पढ़े ही नीचे खिसक जाएँगी. ब्लोग्गेर्स अभी ९० प्रतिशत ट्राफिक एग्रीगेटर्स के माध्यम से ले रहे है. ऐसे मैं कई अच्छी या बेहतरीन पोस्ट सिर्फ इसलिए पाठको से वंचित रह जाती है क्योंकि ढेर सारी पोस्ट उस पोस्ट के बाद आ जाती है और वह पोस्ट पीछे के पेज पर चली जाती है. अतः मैं सिर्फ अपना बनाया कार्टून पोस्ट करता हूँ जो सामयिक होता है. अन्य सामग्री को में इस प्रकार से नियोजित करने का प्रयास करता हूँ कि वे पोस्ट के रूप में एग्रीगेटर्स पर इकट्ठा न हों.  जो लोग कार्टून पढ़ने के लिए ब्लॉग पर आते हैं वे वहां उपलब्ध लिंक को क्लिक करके भी उन्हें पढ़ सकते हैं. हर छोटी छोटी सामग्री के लिए एग्रीगेटर पर ट्राफिक जाम लगाना अजीब  लगता है.

कुलवंत हैप्पी : आप असल जिन्दगी में क्या करते हैं, और ब्लॉग दुनिया के अलावा कहाँ (निवास) रहते हैं?
कीर्तिश भट्ट :
यानी आपको भी पता है कि मेरे जैसे 'कार्टूनिस्ट' का गुजारा सिर्फ कार्टून से तो नहीं चल सकता. सिर्फ कार्टूनिंग पर सरवाईव करने के लिए अभी काफी लम्बा सफ़र तय करना है. मैं एक ग्राफिक डिज़ाईनर हूँ. कुछ वर्षों तक विज्ञापन एजेंसियों के लिए कार्य किया लेकिन अखबारों के लिए ग्राफिक और इन्फोग्रफिक बनाना ज्यादा रुचिकर लगा तो विज्ञापन कि दुनिया छोड़ अख़बार सम्हाल लिए. हाई फाई कोडिंग तो नहीं लेकिन थोडा बहुत वेब डिज़ाईनिंग और फ्लेश अनिमेशन मेरा शौक है. जिसका भरपूर उपयोग मैं बामुलाहिजा पर करता हूँ.

कुलवंत हैप्पी : एक दैनिक समाचार पत्र में आपके कार्टून "चुटकी" सिरलेख के नीचे प्रकाशित होते हैं, ऑनलाइन मीडिया के लिए बामुलाहिजा चुनने की विशेष वजह ?
कीर्तिश भट्ट :
'चुटकी' नाम से पॉकेट कार्टून कालम पहले से समाचार पत्र नई दुनिया में छप रहा था और जब मैंने यहाँ ज्वाइन किया तो वही नाम मेरे कार्टूनों के साथ जुड़ गया. जबकि 'बामुलाहिजा' इस समाचारपत्र में आने से पहले बन चुका था. 'बामुलाहिजा' नाम मुझे एक समाचारपत्र के संपादक ने दिया था जहां पहली बार मेरा नियमित कार्टून स्तम्भ छपना शुरू हुआ था. तभी से मुझे इस नाम से लगाव सा है ये मेरे लिए मेरी पहचान है. बतौर कार्टूनिस्ट मैं अपने नाम से ज्यादा 'बामुलाहिजा' का नाम अपने कार्टूनों के साथ जोड़ता हूँ.

कुलवंत हैप्पी : कोई रोचक लम्हा, जिसको याद करते ही दिल फूलों की तरह खिल उठता हो?
कीर्तिश भट्ट :
निजी तो काफी है ...बतौर कार्टूनिस्ट पूछें तो एक घटना अभी कुछ समय पहले घटी जो मेरे लिए बड़ी अहम् और रोचक भी थी. हुआ यूं कि विष्णु नागर जी का एक दिन प्रेस मैं आगमन हुआ. उनका और कादम्बिनी का मैं बड़ा प्रसंशक था सो खबर मिलते ही मेरी इच्छा हुई कि यदि वे आज आखबार के कार्यालय में है तो उनसे एक बार मिलना हो जाये. मैं इसी जुगाड़ मैं बैठा सोच ही रहा था कि उनसे कैसे मिलूँ ....कि वे हमारे संपादक जी के साथ डिज़ाईनिंग रूम मैं मेरे सामने खड़े थे... हमारे संपादक अन्य साथियों का परिचय कराते उससे पहले ही विष्णु नागर जी पूछ बैठे आपके यहाँ कीर्तिश नाम का कार्टूनिस्ट है वो कहाँ बैठता है? मैं उनके ठीक पीछे खड़ा था तो संपादक ने इशारा करते हुए मेरा परिचय करवाया. उन्होंने आगे बढाकर मुझसे हाथ मिलाया और मुझसे जो भी उन्होंने कहा वो आशीर्वाद स्वरोपस्वरुप मेरे साथ हमेशा रहेगा. उस दिन मेरी ख़ुशी का  ठिकाना नहीं रहा, मैं जिनसे मिलने के लिए रास्ते तलाश रहा था वे अगले ही पल खुद मुझे ढूँढते हुए मेरे सामने खड़े थे.

कुलवंत हैप्पी : क्या एक कार्टूनिस्ट को अच्छा व्यंगकार भी होना लाजमी?
कीर्तिश भट्ट :
बिलकुल! मेरे ख्याल से तो व्यंगकार होना ज्यादा जरूरी है. किसी अख़बार के लिए बनने वाले सम्पादकीय कार्टून में ८० प्रतिशत व्यंग होता है और २० प्रतिशत चित्रांकन. इस लिहाज से व्यंगकार होना ज्यादा जरूरी है.

कुलवंत हैप्पी : पाठकों और ब्लॉगवुड वासियों के लिए कोई संदेश?
कीर्तिश भट्ट :
हिंदी ब्लॉगस पर पाठक नहीं के बराबर है जो भी आ रहे हैं वे एग्रीगेटर्स के द्वारा आ रहे हैं जो कि खुद ब्लॉगर हैं जो एक दुसरे की पोस्ट पर मात्र टिप्पणियां कर रहे हैं. नए ब्लॉगर बनाने और उन्हें प्रोत्साहित करने के काफी प्रयास ब्लॉग जगत में होते आये हैं और हो रहे हैं लेकिन नए पाठक बनने का कोई प्रयास मैंने आज तक ब्लॉग की दुनिया मैं नहीं देखा. जबकि अब जरूरत उसी की है मेरा निवेदन है कि ब्लॉगर थोड़ी सी तकनीकी सुझबुझ या किसी तकनिकी ब्लॉगर बंधू के सहयोग से अपने ब्लॉग के नाम, टाइटल मेटाटेग, कीवर्ड आदि का समायोजन इस प्रकार से करें कि उनके ब्लॉग पर सर्च इंजिन से और डाइरेक्ट ट्राफिक भी आए. सर्च इंजिन और सीधे आने वाला ट्राफिक ही हमारे असली पाठक है और सभी ब्लॉगर्स को अपने ब्लॉग और उसके कंटेंट को सर्च इंजिन से जुड़ने लायक बनाना होगा.

चक्क दे फट्टे : भूरा मिस्त्री शिवरात्रि के दिन भंग पीने के लिए मंदिर में गया, लेकिन भंग तो मिली नहीं। मंदिर से बाहर निकलते उसकी पत्नि ने देख लिया। बोली क्या बात आज मंदिर में। हाजिरजवाबी भूरा मिस्त्री बोला "तेरे लिए कुछ माँगने गया था"। खुशी से फूल की तरह खिल उठी पत्नि बोली तो क्या माँगा। भूरा मिस्त्री ने कहा कि मैंने शिव जी से कहा मेरी पत्नि को सदैव सुहागन रखना।



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कुलवंत हैप्पी

भारत की सबसे बड़ी दुश्मन

कुछ दिन पहले गुजरात प्रवास के दौरान हिम्मतनगर से 29 किलोमीटर दूर स्थित ईडर गया दोस्त से मिलने। ईडर शहर को पत्थर के बीचोबीच बसा देखकर घूमने का मन हुआ। वहाँ एक बहुत ऊंची पत्थरों से बनी हुई पहाड़ी है..जिस पर एक राजा का महल है, जो आजकल खण्डहर हो चुका है। उसके बीच लगा सारा कीमत सामान निकाल लिया गया है। बस वहाँ अगर कुछ बचा है तो केवल और केवल प्रेमी युगलों के नाम, जिनके बारे में कुछ पता नहीं कि वो इन नामों की तरह आज भी साथ साथ हैं या फिर नहीं। सारी दीवारें काली मिली..जैसे दीवारें न हो कोई रफ कापी के पन्ने हों। कुछ कुछ तो ऐसे जिद्दी आशिक भी यहाँ आए, जिन्होंने दीवारों को कुरेद कुरेद नाम लिखे।। तल से काफी किलोमीटर ऊंची इस पहाड़ी पर खण्डहर राजमहल के अलावा दो जैन मंदिर, हिन्दु देवी देवताओं के मंदिर और मुस्लिम पीर बाबा का पीरखाना भी। राजमहल जहाँ आज अंतिम साँसें ले रहा है, वहीं श्वेताम्बर जैन मंदिर का करोड़ों रुपए खर्च कर पुन:निर्माण किया जा रहा है। वहाँ मुझे महावीर की याद आती, जो निर्वस्त्र रूप में मुझे कहीं जगह मिल चुके हैं प्रतिमा के रूप में। महावीर की निर्वस्त्र मूर्ति देखकर मैं आज तक हँसा नहीं, हाँ, लेकिन उक्त मंदिर निर्माण को देखकर महावीर की मूर्ति को याद करते हुए सोच रहा था कि महावीर की मूर्ति से जैन धर्म के लोग शिक्षा क्यों नहीं लेते कि निर्वस्त्र आए थे और निर्वस्त्र जाना है। जिसके लिए लोग दिन रात मरते फिरते हैं, उन सुविधाओं को महावीर ने त्याग दिया था, लेकिन आज उस बुद्ध पुरुष के लिए इतने महंगे आलीशान मंदिर बनाने की क्या जरूरत आन पड़ी है। मंदिरों पर पानी की तरह पैसे बहाना केवल जैन धर्म में ही नहीं, हर धर्म में है। हर धर्म लगा हुआ है अपने धर्म को ऊंचा करने में। जीरा मंडी के रूप में विश्व प्रसिद्ध गुजरात का ऊंझा शहर श्री उमिया माता मंदिर के कारण भी बहुत प्रसिद्ध है। पिछले साल नबम्वर दिसम्बर में वहाँ धार्मिक कार्यक्रम हुआ था। सुना है कि उसमें शामिल होने वालों ने करोड़ों रुपए सिर्फ पूजन के वक्त पहली दूसरी कतार में बैठने के लिए खर्च किए। उस अनुमान से इस मंदिर में चढ़वा अरबों में पहुंचा होगा। भारत में और भी ऐसे सैंकड़ों मंदिर हैं जिनका रोज का चढ़वा लाखों तक तो पहुंच ही जाता होगा। अगर सब धर्मों के मंदिरों में आने वाले पैसे को समाज कल्याण के काम में लगा दिया जाए तो हिन्दुस्तान की शकल रातों रात बदल सकती है। मगर ऐसा होता नहीं। ऐसा तब जाकर होगा। जब हम बाहरी रूप की बजाय भीतरी रूप से धार्मिक हो जाएंगे। जब हम धर्म को व्यवसाय से अहलदा कर लेंगे। धर्म के सही अर्थों की पहचान कर लेंगे। जब एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाना बंद कर देंगे। सभी धर्म उठाकर देख लो। एक ही बात कहते हैं मोह, अंहकार, लोभ, क्रोध और माया त्याग करो। तुम सुखी हो जाओगे। लेकिन धर्म को मानने वालों ने उसकी पालना करने की बजाय उसके विपरीत जाकर काम शुरू कर दिया। भगवान को भी माया जाल में फँस लिया। उसको भी मोह दे दिया। तुम लाखों दो भगवान और हम तुम्हें हजारों देंगे। ऐसी धार्मिकता से बाहर आने की जरूरत है। महावीर की प्रतिमा को जिसने गौर से देखा होगा। उसको जिन्दगी का असली सच समझ में आ गया होगा। अंत कुछ भी साथ नहीं जाता, जब दुनिया से सिकंदर गया उसके हाथ भी खाली थे, हजारों बार सुनना होगा और ताली बजाई होगीं। वाह वाह करते घर चलेंगे होंगे। लेकिन गौर नहीं किया, बात को सुना तो सही, लेकिन अमल नहीं किया। भारत की सबसे बड़ी दुश्मन है हमारी भीतरी अधार्मिकता।

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कुलवंत हैप्पी

शादी मुहब्बत की नहीं, ख्वाहिश की पूर्ति है

अहा! जिन्दगी के फरवरी 2010 अंक में प्रकाशित एवं सुरजीत द्वारा अनुवादित मुमताज मुफ्ती की "वह बच्चा" कहानी के अंत में नायिका नायक से मिलने आती है। नायक नायिका से बहुत नाराज है, लेकिन नायिका नायक को बताती है कि वो घर नहीं गई, सिर्फ उसको मनाने के लिए लाहौर से उसके पास आई है। इस तरह प्रेम भाव से उसने नायक से पहले कभी बात नहीं की थी, नायक को नायिका का प्रेम देखकर गुस्सा आ जाता है, लेकिन नायिका नजाकत को समझते हुए कहती है मुझे पता है तुम मुझसे बेहद मुहब्बत करते हो। नायिका अपनी बात जारी रखते हुए कहती है “मैं जानती हूं कि तुम में एक बच्चा है। मासूम बच्चा, जो बेलाग, बेगर्ज, बेमकसद मुझे चाहता है। अरशी, तुम्हारी मुहब्बत मेरी जिन्दगी का एकमात्र सरमाया है, जिसके सहारे मैं सारी जिन्दगी गुजार सकती हूं। नायक चिल्लाते हुए कहता है “ फिर तुमने उसको ठुकरा क्यों दिया, तुमने उसको रद्द क्यों कर दिया। नायिका कहती है कि मैं उसको नहीं ठुकराया, उस पर तो मुझे गर्व है, मैंने तो केवल तुम्हारी शादी का प्रस्ताव ठुकराया है। गुस्से के कारण आपा खो चुका नायक चिल्लाते हुए पूछता है आखिर क्यों? नायिका बोलती है “अरशी, तुम समझते हो शादी मुहब्बत की पूर्ति है। बिल्कुल गलत है। शादी मुहब्बत की नहीं, ख्वाहिश की पूर्ति है और ख्वाहिश की पूर्ति मुहब्बत की अस्वीकृति है। मैरिज इज नॉट लव रिलेशनशिप। लोग समझते हैं कि यह मुहब्बत का ताल्लुक है। यह खुशफहमी है। अरशी लव इज ए डिप्लोमैटिक रिलेशनशिप। बीवी बनकर मैं तुम्हारी मुहब्बत का गला नहीं घोंट सकती। तुम्हारी मुहब्बत तो मेरी जिन्दगी की पूंजी है। वह तो मेरे लिए राह की मशाल है। इतना कहते हुए नायिका वहाँ से रुकस्त हो जाती है और नायक बैठा सोचता रहता है। मुमताज मुफ्ती की कहानी सच्चे प्रेम का संदेश देती है।

लेकिन आज प्रेम को उजागर करना पड़ता महंगे महंगे गिफ्टों से। गुलाबी फूलों से। नए नए तोहफों से। अगर देखा जाए तो प्रेम रूहों का रिश्ता है, जिस्मों और दिखावे का नहीं। सूफियों ने मुहब्बत को इबादत कहा है, पाक पवित्र कहा है। प्रेम के असली अर्थ गुम होते जा रहे हैं। इसलिए प्रेमी पाकर भी कुछ लोग प्रेम नहीं हासिल कर पाते। ख्वाहिशें प्रेम को जलाकर राख कर देती हैं। अमृत को जहर बना देती हैं। लेकिन मुहब्बत जहर को भी अमृत कर देती है। मुहब्बत फूलों की सेज नहीं माँगती, वो काँटों पर भी सुकून की नींद सो लेती है। जब प्रेम की लगन लगती है..तो जरे जरे से प्रेम के झरने बहने लगते हैं। रूह फूलों सी खिलती उठती है। बेरंग दुनिया में भी रंग ही रंग नजर आते हैं। पतझड़ की ऋतु में भी पेड़ हरे भरे नजर आते हैं। लेकिन जैसे भी इस प्रेम में ख्वाहिशों का आगमन होता है। सब कुछ खत्म सा होने लगता है। फिर बहारें भी पतझड़ जैसी लगती हैं। रंग भी बेरंग हो जाते हैं। फूल सी खिलती रूह भी मुरझाने लगती है।

प्रेम करने के लिए कोई दिन, कोई पल और लम्हा तय करने की जरूरत नहीं। प्रेम का झरना तो निरंतर बहता ही रहता है। प्रेम की नदिया में कभी सूखा नहीं आता। प्रेम की नदिया तो अविराम बहती ही रहती है। कभी कभी सोचता हूँ, जो लोग खुदा का नाम लेते हुए भी हिसाब रखते हैं..वो इंसान से असीम प्रेम मुहब्बत इश्क कैसे कर सकते हैं।
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कुलवंत हैप्पी

गायब हो रहे हैं टिप्पणी बॉक्स

आज सब ब्लॉगरों को पढ़ने की इच्छा थी, लिखने की बिल्कुल नहीं। लेकिन जब पढ़ते पढ़ते पी.सी.गोदियाल जी के ब्लॉग पर पहुंचा तो क्या देखता हूँ कि टिप्पणी बॉक्स गायब है। अब वहाँ पर अपने विचार भी व्यक्त नहीं कर सकता। अब उनके ब्लॉग पर नहीं लिख सकता कि उन्होंने कितना अच्छा लिखा है और कितना साधारण लिखा है। ऐसे ही और कई ब्लॉग हैं, जो ऐसा करने से मना कर देते हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि टिप्पणी बॉक्स गायब हो रहे हैं। ये ब्लॉगवुड है, बठिंडा नहीं कि नगर निगम वालों ने रात को सीवरेजों के ढक्कन लगाए और सुबह होते ही गायब हो गए। यहाँ टिप्पणी बॉक्स खुद हटाए जाते हैं। ऐसा नहीं कि टिप्पणी बॉक्स गलती से गायब हो गए, इनको सोच समझकर एक लम्बे अध्ययन के बाद गायब किया गया है। शायद उन्होंने अध्ययन में पाया कि हमारे कुछ टिप्पणीकर्ता अपने ब्लॉग पते देने के लिए इन टिप्पणी बॉक्सों का गलत इस्तेमाल करते हैं, कहीं कहीं तो पाया गया है कि लेख कुछ और होता है और टिप्पणी कुछ और।

पिछले दिनों ब्लॉगवुड में घुघूती बासूती ब्लॉग पर लिखी एक पोस्ट भी कुछ ऐसा ही बयान करती थी। क्या उस पोस्ट में घुघूती बासूती ने खुद ही पढ़ लीजिए।
 



आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपकी भैंस मर गई।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपके पिताजी मर गए।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपके ऊपर मुकदमा किया गया है।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आप अब ब्लॉगिंग से सन्यास ले रहे हैं।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आप टिप्पणी करने वालों की ठुकाई करेंगे।
टिप्पणी आती है गुड।

अरे भइया कुछ तो 'वेरी गुड' लायक भी होगा! क्या वेरी गुड के लिए अपने पूरे खानदान को मरवाना होगा या भैंसो के पूरे तबेले को? बात यह है कि बचपन से 'वेरी गुड' पाने की आदत पाली हुई है, जब भी अध्यापक बिना 'वेरी' वाला 'गुड' देते थे तो मन असन्तुष्ट ही रहता था, आज भी यह बीमारी लगी ही हुई है।

घुघूती बासूती

एक दिन अन्य ब्लॉगर साथी से बात हुई तो उसने कहा, मैंने टिप्पणी बॉक्स इसलिए बंद कर दिया क्योंकि यहाँ गिव इन टेक का मस्ला है, एक हाथ लो और दूसरे हाथ दो। कुछ टिप्पणी बॉक्स तो ऐसी घटनाओं के कारण बंद हो गए, लेकिन कुछ ब्लॉग इन टिप्पणी बॉक्सों की वजह से बंद हो गए। किसी ने अपनी प्रतिक्रिया जरा सख्ती से दे डाली तो सामने वाला कोर्ट केस करने की धमकी दे डालता है। इतना ही नहीं कुछ लोग तो ब्लॉग बंद कर अपने अपने घरों को चले गए।


बस अंत में इतना ही कहूँगा दोस्तो, जितना मीठा डालोगे, उतनी मिठास आएगी।


भार
कुलवंत हैप्पी

मिल्क नॉट फॉर सेल


आज गुरूवार को सुबह माताजी के दर्शनों के लिए अम्बाजी गया, वहाँ पर माता जी का बहुत विशाल मंदिर है, इस मंदिर में माता जी के दर्शनों के लिए दूर दूर से भक्त आते हैं। मातृदर्शन के बाद वापसी में जब मैं खेड़ब्रह्मा पहुंचा तो मेरी नजर सामने जा रहे एक दूध वाहन पर पड़ी, जिसके पीछे लिखा हुआ था "मिल्क नॉट फॉर सेल"। जिसका शायद हिन्दी में अर्थ दूध बेचने के लिए नहीं, कुछ ऐसा ही निकलता है। इस पंक्ति को पढ़ते ही जेब से मोबाइल निकाला और फोटो खींच डाली।

इस लाइन ने मुझको बारह तेरह साल पीछे धकेल दिया स्कूल के दिनों में। उन दिनों मैंने एक किताब में पढ़ा था कि पाकिस्तान में एक गुजरांवाला नामक गाँव है, जहाँ पर लोग दूध और पूत नहीं बेचते थे। गुजरांवाला के अलावा भी बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में दूध और पूत नहीं बेचे जाते थे, लेकिन आज दूध भी बिकता है और पूत भी। लोग आज अपने घर का सारा दूध डेयरी में डालकर खुद चाय पीते हैं, उस बिके हुए दूध से आज उनके घर चलते हैं। एक समय था जब गाँव में किसी के घर दामाद आता तो आस पड़ोस से दूध के लोटे बिन मंगाए ही आ जाते और विवाह शादियों में दूध खरीदना नहीं पड़ता था, बस एक बार लाउंड स्पीकर में बुलाने की जरूरत पड़ती थी कि फलाँ घर में शादी है, बस फिर क्या शाम तक दूध की नहर बहनी शुरू हो जाती थी, लेकिन समय बदल गया है, अब गाँवों में भी दूध का काल पड़ने लगा है।

पूत तो पंजाब में इस कदर बिकते हैं कि पूछो मत, लाखों रुपए में मनमर्जी का दुल्हा पसंद कर लो। जमीन अच्छी खासी दहेज में मिल रही हो तो लड़की में जितने भी दोष हैं, सब कबूल हैं। मुझे याद है, मेरे रिश्तेदार ने अपनी दो बेटियोँ की शादियाँ की, एक पर पाँच लाख और दूसरी पर पंद्रह लाख रुपए खर्च किए। अब उनके दो बेटे भी शादी लायक हो गए हैं, उनका मूल्य तय हो चुका है तीस से पैंतीस लाख।

ऐसा नहीं कि इनकी इतनी कीमत कोई नहीं लगाएगा। अगर बेचने वाले हैं तो खरीदने वालों की भी कमी नहीं। लेकिन इनकी सौदेबाजी उन मासूम लड़कियों पर भारी पड़ती है, जिनके अभिभावकों के पास अपनी बेटी को विदा करने के लिए लाखों रुपए नहीं। लड़की के ससुराल वालों को देने के लिए मारुति 800 या इंडिका नहीं। आज पूत भी बिकता है और दूध भी बिकता है।
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कुलवंत हैप्पी

"युवा" बनाम "तुम हवा"

मय के साथ साथ "युवा" शब्द का अर्थ भी बदलता जा रहा है, कल तक युवा का मतलब केवल नौजवान से था या कहें युवावस्था से, लेकिन आज युवा का अर्थ उम्मीदों का नया सवेरा और कुछ कर गुजरने वाला व्यक्ति है। "युवा" शब्द में वैसा ही परिवर्तन देखने को मिल रहा है, जैसा "प्रेम" शब्द में देखने को मिल रहा है। पहले "प्रेम" का मतलब एक लड़की और लड़के के बीच का रिश्ता, लेकिन अब प्रेम का अर्थ विशाल हो रहा है। लोग समझने लगें हैं प्रेम के असली अर्थ को, मतलब प्रेम किसी भी वस्तु से हो सकता है चाहे वो संजीव हो और चाहे वो निर्जीव।

प्रेम की तरह युवा का अर्थ भी बहुत विशाल हो गया, अब युवा का अर्थ है वो व्यक्ति जो कुछ कर गुजरने का जोश या फिर लोगों की उम्मीदों को पूरा करने का इरादा रखता हो। याद करो वो समय जब अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर बराक ओबामा बैठा था, तो क्या वो युवावस्था में था, नहीं लेकिन फिर भी लोगों ने उसको युवा की संज्ञा दी। इतना ही नहीं  35 साल का राहुल गांधी भी जनता को युवा ही नजर आता है। इसके अलावा 38 साल का जीवन बसर करने वाले श्री स्वामी विवेकानंद जी कभी युवावस्था से बाहर नहीं निकले, वो भी अंत समय तक युवा रहे।

ओशो कहता था कि हिन्दुस्तान में युवा पैदा नहीं होते, बल्कि बच्चे या बुजुर्ग पैदा होते हैं। ऐसा नहीं कि ओशो के समय में कोई यौवन अवस्था तक नहीं पहुंच पाता था, युवा अवस्था में सब पहुंचते थे, लेकिन सोच से युवा नहीं होते थे। ओशो की नजर में युवा होना केवल युवा अवस्था में पहुंचना मात्र नहीं था।

आज सबसे ज्यादा प्रचलन में युवा शब्द है। युवा शब्द इतना लोकप्रिय हो रहा है कि लोगों को अपनी तरफ खिंचने के लिए कुछ कंपनियाँ अपने ब्रांडों के नाम भी युवा रख रही हैं, कुछ ने तो रख दिए हैं। कंपनियाँ कुछ नया नहीं करने वाली, वो तो अपनी दुकानदारी चला रही हैं, लेकिन एक संदेश जरूर दे रही हैं कि लोगों को अब युवा से उम्मीद है। ऐसे में केवल शब्द के प्रचलन से क्या होगा। युवाशक्ति का इस्तेमाल तो करना ही होगा, तभी जाकर युवा शब्द का वर्तमान अर्थ सार्थक होगा, वरना युवा फिर से एक किशोर अवस्था के बाद की स्थिति का संकेत बनकर रह जाएगा।

युवा शब्द कैसे पैदा हुआ? इसके बारे में तो मुझे पता नहीं, लेकिन मैंने तो युवा शब्द का जन्म दो भाषाओं के दो शब्दों को जोड़कर किया गया, एक इंग्लिश का you और दूसरा पंजाबी का वा। यू का अर्थ तो हम सब जानते हैं तुम और वा का अर्थ है हवा। मतलब तुम हवा। हवा की कोई सीमा नहीं होती और उसको कैद नहीं किया जा सकता है। हवा अपने साथ खुशबूओं को बहा ले जाती है, और चारों दिशाओं में फैला देती है। ऐसे ही युवाओं को अच्छे विचारों को दुनिया में फैला देना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं कि हवा बदबू को भी अपने साथ खींचकर ले जाती है। वो हवा के बस में नहीं, लेकिन हमारे बस में है कि हम सिर्फ अच्छे विचारों को दूर दूर तक फैलाएं।
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कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में रश्मि रविजा

हैप्पी अभिनंदन में आज मैं आपको जिस ब्लॉगर हस्ती के रूबरू करवाने जा रहा हूँ, उनका और लेखन का रिश्ता बहुत पुराना है, लेकिन ब्लॉग जगत से कुछ नया। पुराने रिश्ते के कारण बने इस ने रिश्ते से इतना प्यार हो गया है उनको कि उनकी खुली आँखों ने एक सपना संजोया है ब्लॉग जगत को एक संपूर्ण पत्रिका के रूप में देखने का। 'मन की पाखी' और 'अपनी उनकी सबकी बातें' ब्लॉग पर शब्दों का अद्भुत जाल बुनने वाली रश्मि रविजा आकाशवाणी से जुड़ी हुई हैं, लेकिन प्यार उनका ब्लॉगजगत से भी कम नहीं। वो वहाँ से ब्लॉगवुड के लिए लिखती हैं, जहाँ से बॉलीवुड चलता है, मेरा मतलब मुम्बई नगरिया। ब्लॉग जगत को लेकर वो क्या क्या सोचती हैं और उनकी जिन्दगी के हसीं पल जानते हैं उनकी जुबानी।


कुलवंत हैप्पी : आपने अपनी एक पोस्ट में ब्लॉगवुड पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा था कि ब्लॉग जगत एक सम्पूर्ण पत्रिका है या चटपटी ख़बरों वाला अखबार या महज एक सोशल नेटवर्किंग साईट? इनमें से आप ब्लॉगवुड को किस श्रेणी में रखना पसंद करेंगी और क्यों?
रश्मि रविजा : सबसे पहले तो आपको शुक्रिया बोलूं "आपने मेरा नाम सही लिखा है" वरना ज्यादातर लोग 'रवीजा' लिख जाते हैं। वैसे I don’t mind much ....टाइपिंग मिस्टेक भी हो सकती है, और जहाँ तक आपके सवाल के जबाब की बात है। तो मैं पोस्ट में सब लिखी ही चुकी हूँ। हाँ, बस ये बताना चाहूंगी कि ब्लॉगजगत को मैं एक 'सम्पूर्ण पत्रिका' के रूप में देखना चाहती हूँ। मेरे पुराने प्रिय साप्ताहिक 'धर्मयुग' जैसा हो, जिसमें सबकुछ होता था, साहित्य, मनोरन्जन, खेल, राजनीति पर बहुत ही स्तरीय। और स्तरीय का मतलब गंभीर या नीरस होना बिलकुल नहीं है। वह आम लोगों की पत्रिका थी और उसमें स्थापित लेखकों के साथ साथ मुझ जैसी बारहवीं में पढ़ने वाली लड़की को भी जगह मिलती थी।
मेरा सपना ब्लॉगजगत को उस पत्रिका के समकक्ष देखना है क्यूंकि मैं 'धर्मयुग' को बहुत मिस करती हूँ.


कुलवंत हैप्पी : आपके ब्लॉग पर शानदार पेंटिंगस लगी हुई हैं, क्या चित्रकला में भी रुचि रखती हैं?
रश्मि रविजा : वे शानदार तो नहीं हैं पर हाँ, मेरी बनाई हुई हैं। और मैं अक्सर सोचती थी कि अगर मैं कोई बड़ी पेंटर होती तो अपनी 'चित्रकला' शुरू करने की कहानी जरूर बताती। अब आपने पेंटिंग के विषय में पूछ लिया है, तो कह ही डालती हूँ। बचपन में मुझे चित्रकला बिलकुल नहीं आती थी। सातवीं तक ये कम्पलसरी था और मैं ड्राईंग के एक्जाम के दिन रोती थी। टीचर भी सिर्फ मुझे इसलिए पास कर देते थे क्यूंकि मैं अपनी क्लास में अव्वल आती थी।

चित्रकला के डर से ही बारहवीं तक मैंने बायोलॉजी नहीं, गणित पढ़ा। पर इंटर के फाइनल के बाद समय काटने के लिए मैंने स्कैच करना शुरू कर दिया, क्योंकि तब, खुद को व्यस्त रखने के तरीके हमें खुद ही ईजाद करने पड़ते थे। आज बच्चे, टीवी, कंप्यूटर गेम्स, डीवीडी होने के बावजूद अक्सर कह देते हैं। क्या करें बोर हो रहें हैं, पर तब हमारा इस शब्द से परिचय नहीं था। कुछ भी देख कर कॉपी करने की कोशिश करती अपनी फिजिक्स, केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल्स बुक के सारे खाली पन्ने भर डाले। मदर टेरेसा, मीरा, विवेकानंद, सुनील गावस्कर...के अच्छे स्केच बना लेती थी.

फिर जब एमए करने के लिए मैं होस्टल छोड़ अपने चाचा के पास रहने लगी तो वहाँ कॉलेज के रास्ते में एक पेंटिंग स्कूल था। पिताजी जब मिलने आए तो मैंने पेंटिंग सीखने की इच्छा जताई, पर बिहार में पिताओं का पढ़ाई पर बढ़ा जोर रहता है। उन्होंने कहा,'एमए' की पढ़ाई है, ध्यान से पढ़ो। पेंटिंग से distraction हो सकता है.'पर रास्ते में वह बोर्ड मुझे, जैसे रोज बुलाता था और एक दिन मैंने चुपके से जाकर ज्वाइन कर लिया। हाथ खर्च के जितने पैसे मिलते थे, सब पेंटिंग में लग जाते। उस दरमियान अपने लिए एक क्लिप तक नहीं ख़रीदा. कभी कभी रिक्शे के पैसे बचाकर भी पेंट ख़रीदे और कॉलेज पैदल गई...पर जब पापा ने मेरी पहली पेंटिंग देखी तब बहुत खुश हुए।

ये सारी मेहनत तब वसूल हो गई, जब दो साल पहले मैं अपनी एक पेंटिंग फ्रेम कराने एक आर्ट गैलरी में गयी...और वहाँ SNDT कॉलेज की प्रिंसिपल एक पेंटिंग खरीदने आई थी। उन्हें मेरी पेंटिंग बहुत पसंद आई और उन्होंने मुझे अपने कॉलेज में 'वोकेशनल कोर्सेस' में पेंटिंग सिखलाने का ऑफर दिया। मैं स्वीकार नहीं कर पाई, यह अलग बात है क्यूंकि मेरा बडा बेटा दसवीं में था। ऐसे ही पिछले साल, जब आकाशवाणी से जॉब का ऑफर मिला, फिर नहीं स्वीकार कर पायी, क्योंकि मेरा छोटा बेटा दसवीं में आ गया। शायद ईश्वर की मर्जी है कि मैं बस लेखन से ही जुड़ी रहूँ।

कुलवंत हैप्पी : लेखन आपका पेशा है या शौक, अगर शौक है तो आप असल जिन्दगी में क्या करती हैं?
रश्मि रविजा : लेखन मेरा शौक है। मैं मुंबई आकाशवाणी से जुड़ी हुई हूँ। वहाँ से मेरी वार्ताएं और कहानियाँ प्रसारित होती हैं। और असल ज़िन्दगी में, मैं क्या क्या करती हूँ, इसकी फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि आप बोर हो जाएंगे, सुनते सुनते :)

कुलवंत हैप्पी : आपकी नजर में ब्लॉगवुड में किस तरह के बदलाव होने चाहिए?
रश्मि रविजा : रश्मि : व्यर्थ के विवाद ना हों, सौहार्दपूर्ण माहौल हमेशा बना रहें। कोई गुटबाजी ना हो. सबलोग सबका लिखा पढ़ें और पसंद आने पर खुलकर प्रशंसा करें। हाँ एक और चीज़...लोग अपना 'सेन्स ऑफ ह्यूमर' जरा और विकसित कर लें तो अच्छा...कई बात मजाक समझ कर छोड़ देनी चाहिए..उसे भी दिल पे ले लेते हैं।

कुलवंत हैप्पी : क्या आप आपकी नजर में ज्यादा टिप्पणियोँ वाले ब्लॉगर ही सर्वश्रेष्ठ हैं या जो सार्थक लिखता है?
रश्मि रविजा : ऐसा नहीं है कि ज्यादा टिप्पणियाँ पाने वाले ब्लॉगर सार्थक नहीं लिखते। यहाँ पर कुछ ऐसे लोग भी बहुत हैं, जो अच्छा लिखते हैं, लेकिन उनको टिप्पणियाँ ना के बराबर मिलती है। ऐसे में उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए।

कुलवंत हैप्पी : "मन का पाखी" में आपने नए साल पर उपन्यास लिखना शुरू किया है, क्या आप अब इस ब्लॉग पर निरंतर उपन्यास लिखेंगी?
रश्मि रविजा : सोचा तो कुछ ऐसा ही है कि अपने लिखे, अनलिखे, अधूरे सारे उपन्यास और कहानियां, सब अपने इस ब्लॉग में संकलित कर दूंगी। ज्यादा लोग पढ़ते नहीं या शायद पढ़ते हैं, कमेंट्स नहीं करते। पर मेरा लिखा सब एक जगह संग्रहित हो जाएगा। इसलिए जारी रखना चाहती हूँ, ये सिलसिला।

कुलवंत हैप्पी : आपको ब्लॉगवुड की जानकारी कैसे मिली, और कब शुरू किया?
रश्मि रविजा : 'अजय ब्रह्मात्मज' जी के मशहूर ब्लॉग "चवन्नी चैप" के लिए मैंने हिंदी टाकिज सिरीज के अंतर्गत हिंदी सिनेमा से जुड़े अपने अनुभवों को लिखा था। लोगों को बहुत पसंद आया। कमेन्ट से ज्यादा अजय जी को लोगों ने फोन पर बताया और उन्होंने मुझे अपना ब्लॉग बनाने की सलाह दे डाली। 'मन का पाखी' मैंने 23 सितम्बर को शुरू किया और 'अपनी उनकी सबकी बातें' 10 जनवरी को.


कुलवंत हैप्पी : "मंजिल मिले ना मिले, ये गम नहीं, मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है" आप इस पंक्ति का अनुसरण करती हैं?
रश्मि रविजा : ऑफ कोर्स, बिलकुल करती हूँ। सतत कर्म ही जीवन है, वैसे अब यह भी कह सकती हूँ "तलाश-ओ-तलब में वो लज्ज़त मिली है....कि दुआ कर रहा हूँ, मंजिल ना आए"।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा लम्हा, जब लगा हो बस! भगवान इसकी तलाश थी?
रश्मि रविजा : ना ऐसा नहीं लगा, कभी...क्योंकि कुछ भी एक प्रोसेस के तहत मिलता है, या फिर मेरी तलाश ही अंतहीन है, फिर से मंजिल से जुड़ा एक शेर ही स्पष्ट कर देगा इसे "मेरी ज़िन्दगी एक मिस्ले सफ़र है ...जो मंजिल पर पहुंची तो मंजिल बढा दी."

आपका बहुत बहुत शुक्रिया...मुझे इतने कम दिन हुए हैं, ब्लॉग जगत में फिर भी...मेरे विचार जानने का कष्ट किया और मेरे बारे में जानने की जिज्ञासा जाहिर की। आपने कहा था, जिस सवाल का जबाब ना देने का मन हो, उसे छोड़ सकती हूँ। पर देख लीजिए मैंने एक भी सवाल duck नहीं किया। आपके सवालों से तो बच जाउंगी पर ज़िन्दगी के सवाल से भाग कर कहाँ जाएंगे हम?

क्क दे फट्टे : भूरा मिस्त्री बिन नम्बर प्लेट वाले स्कूटर पर सवार होकर जा रहा था कि एक पुलिस वाले ने उसको रोकते हुए कागजात दिखाने के लिए कहा। भूरे मिस्त्री ने स्पष्ट मेरे पास कागजात तो है नहीं। पुलिस वाला बोला चलो सौ रुपए निकालो। भूरा मिस्त्री लाल पीला होते हुए बोला, क्या महंगाई एक दिन में इतनी बढ़ गई, कल तो पच्चीस रुपए लिए थे, आज सीधे सौ पर आ गए। हाय रब्बा क्या होगा देश का।



आभार
कुलवंत हैप्पी

भारत का एक आदर्श गाँव "कपासी"

चप्पे चप्पे कोने कोने की ख़बर देने का दावा करते हुए भारतीय ख़बरिया टैलीविजन थकते नहीं, लेकिन सच तो यह है कि मसाला ख़बरों के दायरे से बाहर निकलते ही नहीं। वरना, भारत के जिस आदर्श गाँव के बारे में, अब मैं बताने जा रहा हूँ, उसका जिक्र कब का कर चुके होते टैलीविजन वाले। इस गाँव को मैंने खुद तो देखा नहीं, लेकिन पत्रकार एवं लेखक स्वयं प्रकाश द्वारा लिखित किताब "जीना सिखा दिया" से उसके बारे में पढ़ा जरूर है।

श्री स्वयं प्रकाश द्वारा लिखित किताब जीना सिखाया दिया में इस गाँव के बारे में पढ़ने के बाद इसको भारत को आदर्श गाँव कहना कोई अतिशोक्ति न होगी, जो पूने से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। और इस गाँव का नाम कपासी है।

किताब में लिखे अनुसार कपासी पूरी तरह नशामुक्त गाँव है, भारत में शायद ही कोई गाँव नशे की लपेट में आने से बचा हो। लेखक बताते हैं कि इस गाँव में चौबीस घंटे बिजली रहती है, क्योंकि यहाँ बिजली चोरी की आदत नहीं लोगों को, जबकि आम तौर पर भारतीय गाँवों में बिजली बामुश्किल 8 घंटे मिलती है, चाहे वहाँ बिजली चोरी होती हो या न, उनको गाँवों को छोड़कर जो आज भी बिजली से महरूम हैं।

इस गाँव में प्राकृतिक खेती होती है, जो आज के समय में किसानों के लिए एक प्रेरणास्रोत से कम नहीं। पंजाब को कृषि प्रधान सूबा कहा जाता है, लेकिन आज वहाँ के किसान भी ज्यादा उपज हासिल करने के लिए आँखें बंद कर रसायनों का इस्तेमाल जोर शोर से कर रहे हैं, जिससे अन्न नहीं ज़हर पैदा होता है। भारतीय किसानों और खबरिया चैनलों में एक समानता नजर आती है। वो यह है कि किसान ज्यादा उपज लेने के चक्कर में फसल को जहर बना रहा है और खबरिया चैनल टीआरपी के चक्कर में अपने असली मार्ग से भड़क रहे हैं।

इस गाँव में विदेशी लोग अध्यन करने आते हैं, लेकिन भारतीय चैनल कब पहुंचेंगे इस गाँव में अध्यन करने के लिए पता नहीं। इन निज खबरिया चैनलों की तरह हमारी सरकार भी सो रही है, वरना वो इस गाँव को पूरे भारत में फैलाकर जन जन को भी एक आदर्श देश बनाने के लिए प्रेरणा दी जा सकती है। पूरा भारत न बदले तो कोई बात नहीं, लेकिन कुछ तो बदले। कहीं से तो शुरूआत हो।

लेखक बताते हैं कि इस गाँव में करीबन 27 बाँध हैं, जो खुद लोगों द्वारा खुद के पैसे से बनाए गए, इन बाँधों को बनाने के लिए करीबन 25 हजार रुपए खर्च आए। लेखक कहता है कि अगर इन बाँधों का निर्माण प्रशासन करता तो खर्च करीबन एक लाख होता, लेकिन मुझे लगता है कि लाखों खर्च होते, पर कभी बाँध न बन पाते।

इस गाँव में लड़ाई झगड़े नहीं होते, जिसके कारण खाकी वाले इस गाँव में केसों की छानबीन करने नहीं आते। हाँ, अगर कुछ आता है तो शुद्ध हवा, वो गाँव के चारों ओर लगे पेड़ों की वजह से। इस गाँव को बदलने का श्रेय आर्ट ऑफ लिविंग संस्थान या फिर डा. माधव ए पॉल को जाता है।

अगर आप पुने के आस पास रहते हैं तो इस गाँव में एक बार जरूर जाकर आईएगा, और बताईएगा अपने अनुभव।

आभार
कुलवंत हैप्पी


प्रिय शर्मा जी और पुरस्कार

प्रिय शर्मा जी
हम आपको
चाहते हैं पुरस्कार देना
माफ कीजिए
जी जनाब
मुझे नहीं लेना
न मैं सैफ हूँ
न मैं ओबामा
तुम दोगे पुरस्कार
यहाँ होगा हंगामा
अखबारों के ऐसे ही
पन्ने होंगे काले
कम खर्च न करेंगे
समय टीवी वाले
जब होगी हर तरफ  
आलोचना आलोचना
मुश्किल होगा फिर
मुझको सोचना सोचना
घर कैसे जाऊंगा
पत्नि को मुँह
कैसे दिखा लाऊंगा
अच्छा है कदम
अभी से रोकना रोकना

शिर्डी यात्रा के कुछ पल-3

शिंगनापुर से लौटते लौटते तकरीबन बाद दोपहर हो चली थी। भूख जोरों से लग रही थी, भले ही सुबह एक परांठा खा लिया था। भूख मिटाने से पहले जरूरी था, शाम की बस का टिकट कटवाना। इसलिए सबसे पहले बस बुकिंग वाले के पास गया, और टिकट पहले से कटवा लिया। उसके बाद शिर्डी नगर पंचायत द्वारा संचालित अमानती सामान कक्ष में पहुंचा, वहाँ पर सामान करवाते हुए पूछा कि साईं बाबा संस्थान का भोजनालय कहाँ है, उन्होंने बताया कि यहाँ से कुछ दूरी पर स्थित है। लेकिन याद रहे कि उसको प्रसादालय कहा जाता है, भोजनालय तो मैंने बना लिया था। मैं प्रसादालय की ओर चल दिया। अब काफी दूर चलने के बाद जब प्रसादालय न आया तो सड़क किनारे बैठी सूखे अंगूर (दाख) बेच रही एक महिला से पूछा। उसने बड़ी निम्रता के साथ उत्तर दिया, लगा ही नहीं कि मैं उस महाराष्ट्र में घूम रहा हूँ, जो क्षेत्रीय भाषा संरक्षण को लेकर आए दिन सुर्खियों में होता है। थोड़ा सा आगे बढ़ा तो नजर पड़ गया, साईं बाबा का प्रसादालय।
पहले तो मुझे लगा कि यहाँ पर भी अन्य धार्मिक स्थलों की तरह लम्बी लम्बी कतारें लगेंगी भोजन प्राप्त करने के लिए। कुछ सेवादार अपना रौब झाड़ते हुए मिलेंगे, तो कुछ जल्दबाजी में सब्जी या पानी गिराते हुए दिखाई पड़ेंगे, लेकिन यहाँ ऐसा कुछ न था। यहाँ प्रसादालय की व्यवस्था, प्रसादालय के बाहर लगी एक तख्ती पर लिखे वाक्य विश्वस्तरीय व्यवस्था से बिल्कुल मेल खाती है। खाने को लेकर कोई धक्का मुक्की नहीं, बस कतार में जाकर एक दस रुपए की पर्ची कटवाएं और फिर बड़े आराम से भोजनालय के भीतर जाएं। मैं अभी कतार में लगने वाला ही था कि एक व्यक्ति आया, उसने कहा "भोजन खिलाओगे"। उसने पैसे नहीं माँगे। मैंने कहा "क्यों नहीं" वो बेचारा मेरे पीछे हो लिया। मैंने दो पर्चियाँ कटवा ली। मैंने उसको साथ ले लिया। जैसे ही प्रसादालय में प्रवेश किया तो एक नजारा देखते ही आँखें खुली रह गई, स्टील के टेबल सब तरतीब से लगे हुए है। सब लोग शांति के साथ भोजन कर रहे हैं, ऐसा लग रहा था कि मैं किसी क्लास में आ गया हूँ, जहाँ पर पढ़ाई नहीं एक साथ बैठकर खाना खाने का सलीका सिखाया जाता है। सच में बहुत अद्भुत नजारा था, जो व्यक्ति मुझे यहाँ मिला था, वो भी मेरे साथ ही बैठ गया। मुझे लगा कि वो कई दिनों के भूखे व्यक्तियों की तरह खाने को देखते ही टूट पड़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उसने भी बड़ी शांति और प्रेम के साथ अन्य लोगों की तरह खाना खाया। उसके खाना खाने के तरीके ने दिल को सुकून दे दिया। खाना खा रहे थे कि उसने कहा "आप मुझे अपने साथ ले चलो। वहाँ मैं कोई काम करूँगा"। मैंने कहा "अगर काम ही करना है तो यहाँ रहकर क्यों नहीं करते। एक अनजान शहर में मेरे साथ जाकर क्या करोगे। जिन्दगी एक रेलगाड़ी है, न जाने कब छूट जाए। अगर मेरी जिन्दगी की रेल गाड़ी छूट गई तो तुम उस अनजान शहर में क्या करोगे। यहाँ तो तुमको मेरे जैसा एक अधा मिल ही जाता होगा"। उसने कहा "हाँ हाँ"। मैंने खाना समाप्त किया, और उसका चल रहा था। मैंने उससे जाने की आज्ञा ली, और उसने सर हिलाते हुए जाने की आज्ञा दे दी।
भोजन करने के बाद जब बाहर प्रवेश द्वार के समीप लगी साईं बाबा की प्रतिमा के पास आया, तो दिमाग में एक बात अचानक घुस आई। जब इंदौर से चला था तो जनक सिंह झाला ने कहा था "तुम पैसे दान कर देना"। तो मैंने कहा था कि "भूखे को खाना खिला सकता हूँ, जो दान से बेहतर लगता है मुझे"। यहाँ पर मैंने दान भी किया और भूखे को खाना भी खिला दिया। दिल कह रहा था कि अगर तुम उस भूखे व्यक्ति को इंकार कर देते, और वो अचानक आगे से बोलता "क्यों बेटा वायदा भूल गए जो इंदौर निकलने से पहले जनक सिंह झाला के साथ किया था"। पर मैं इंकार न कर सका, और उसके मुँह से वो शब्द न सुन सका। फिर भी एक अहसास रह गया कि शायद वो साईं ही थे, जो बच्चे की परीक्षा लेने के लिए वहाँ उस रूप में पधारे।

ऑस्कर में नामांकित 'कवि' का एक ट्रेलर और कुछ बातें

कुछ दिन पहले दोस्त जनकसिंह झाला के कहने पर माजिद माजिदी द्वारा निर्देशित एक इरानी फिल्म चिल्ड्रन इन हेवन का कुछ हिस्सा देखा था और आज ऑस्कर में नामांकित हुई एक दस्तावेजी फिल्म 'कवि' का ट्रेलर देखा। इन दोनों को देखने के बाद महसूस किया कि भारतीय फिल्म निर्देशक अभी बच्चे हैं, कच्चे हैं।

चाहे वो राजकुमार हिरानी हो, चाहे विशाल भारद्वाज। इन दोनों महान भारतीय निर्देशकों ने अपनी बात रखने के लिए दूसरी बातों का इस्तेमाल ज्यादा किया, जिसके कारण जो कहना था, वो किसी कोने में दबा ही रह गया। जहाँ थ्री इडियट्स एक मनोरंजन फिल्म बनकर रह गई, वहीं इश्किया एक सेक्सिया फिल्म बनकर रह गई।

संगीतकार विशाल भारद्वाज की छत्रछाया के तले बनी अभिषेक चौबे निर्देशित फिल्म इश्किया अंतिम में एक सेक्सिया होकर रह जाती है। किसी फिल्म के सेक्सिया और मजाकिया बनते ही कहानी का मूल मकसद खत्म हो जाता है। और लोगों के जेहन में रह जाते हैं कुछ सेक्सिया सीन या फिर हँसाने गुदगुदाने वाले संवाद।

ऐसे में एक सवाल दिमाग में खड़ा हो जाता है कि क्या करोड़ खर्च कर हम ऐसी ही फिल्म बना सकते है, जो समाज को सही मार्ग न दे सके। क्या कम पैसे और ज्यादा प्रतिभा खर्च कर एक स्माइली पिंकी या कवि फिल्म नहीं बना सकते।

उम्दा निर्देशन के लिए लोग आदित्य चोपड़ा को याद करते हैं, लेकिन क्या आदित्य चोपड़ा दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का दूसरा हिस्सा दिखा सकेंगे, जहाँ पर अधूरा सच तिलमिला रहा है। फिल्म निर्देशक आदित्य चोपड़ा की फिल्म दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे भारतीय युवाओं को वहाँ तक ही पहुंचाती है, यहाँ तक भगवान श्री कृष्ण की कथा अभिमन्यु को। जो हाल अभिमन्यु का हुआ था, वो भी भारतीय युवा पीढ़ी का होता है।

राजू बन गया 'दी एंग्री यंग मैन'

"शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन" हिन्दी फिल्म जगत के वो नाम बन गए, जो सदियों तक याद किए जाएंगे। आपसी कशमकश के लिए या फिर बेहतरीन अभिनय के लिए। दोनों में उम्र का बहुत फासला है, लेकिन किस्मत देखो कि चाहे वो रुपहला पर्दा हो या असल जिन्दगी का रंगमंच। दोनों की दिशाएं हमेशा ही अलग रही हैं, विज्ञापनों को छोड़कर। रुपहले पर्दे पर अमिताभ बच्चन के साथ जितनी बार शाहरुख खान ने काम किया, हर बार दोनों में ठनी है। चाहे गुरूकुल के भीतर एक प्रधानाचार्य एवं आजाद खयालात के शिक्षक के बीच युद्ध, चाहे फिर घर में बाप बेटे के बीच की कलह। अक्सर दोनों किरदारों में ठनी है। असल जिन्दगी में भी दोनों के बीच रिश्ते साधारण नहीं हैं, ये बात तो जगजाहिर है। रुपहले पर्दे पर तो शाहरुख खान का किरदार हमेशा ही अमिताभ के किरदार पर भारी पड़ता रहा है, लेकिन मराठी समाज को बहकाने वाले ठाकरे परिवार को करार जवाब देकर शाहरुख खान ने असल जिन्दगी में भी बाजी मार ली है।
कहने को तो अमिताभ बच्चन के नाम के साथ "दी एंग्री यंग मैन" का टैग लगा हुआ है, लेकिन असल जिन्दगी में उन्होंने हमेशा न्यू टैग 'बिग बी' का इस्तेमाल किया और करते भी हैं। "बिग बी" का असली अर्थ "बिग बिजनसमैन" मैं उस दिन समझा था, जब श्रीमति बच्चन के बयान पर अमिताभ बच्चन ने दो हाथ जोड़कर एक गली के गुंडे से माफी माँग ली थी, वो भी सिर्फ इसलिए कि उनके बेटे की आने वाली फिल्म द्रोण को व्यापारिक हानि न सहन करनी पड़े। वैसे बिग बी का दूसरा अर्थ बिग बच्चन हो नहीं सकता, क्योंकि उनके पिता हिन्दी साहित्य की जान थे। उस वक्त अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग के जरिए विदेश से ही माफी माँग ली थी, जबकि पूरी घटना का अमिताभ बच्चन को पता भी न था। उस घटना को मीडिया वालों ने भी गलत ढंग से दिखाया था, जिसका एक नमूना यहाँ देख सकते हैं। मैंने घटना के वक्त न्यूज चैनलों पर आ रही करवेज को देखा था, जिसमें दिखाया गया था कि प्रियंका और अभिषेक बच्चन इंग्लिश में बोल रहे थे, जिसके कारण जय बच्चन ने लोगों की भावनाओं को भाँपते हुए हिन्दी में बोलने की जरूरत समझी। अगर वैसा न होता तो प्रियंका चोपड़ा भी जय बच्चन के पीछे पीछे दोहराती हुई नजर न आती।
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आज शाहरुख खान भी उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ पर अमिताभ बच्चन थे, उनकी भी फिल्म रिलीज होने वाली थी, और अब शाहरुख की फिल्म भी रिलीज होने वाली है। मगर शाहरुख ने बिग बी की तरह घुटने नहीं टेके, उसने साफ शब्दों में कह डाला कि मैं माफी नहीं माँगूगा। शाहरुख खान ने अपने बयान पर अटल रहने का जो फैसला लिया है, वो ठाकरे परिवार के लिए किसी तमाचे से कम नहीं। राजू, राहुल के किरदार रुपहले पर्दे पर निभाने वाले शाहरुख खान के भीतर दी एंग्री यंग मैन न जाने कहां से जाग आया, चलो कहीं से भी आया, लेकिन एक आवाज तो उठी, जो ठाकरे को मुंह तोड़ जवाब दे सके।
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ठाकरे परिवार आजकल सबको नसीहत देने लगा हुआ है और मुम्बई को अपनी जंगीर बना लिया है। अभिवक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा है, लेकिन मुंह तोड़ जवाब आज तक किसी ने नहीं दिया। जब मुकेश अम्बानी ने कहा कि मुंबई किसी एक की नहीं है बल्कि हर भारतीय की है, तो उसको नसीहत दे डाली कि तुम बिजनस पर ध्यान दो, राजनीति मत करो।
इतना ही नहीं, जब महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने कहा "मैं मराठी हूं, मुझे मराठी होने पर गर्व है लेकिन मुंबई पूरे भारत की है और मैं भारत के लिए खेलता हूं।" तो उसको नसीहत देने के लिए बाला साहिब ठाकरे ने सामना के दो पन्ने काले कर डाले, और कहा कि तुम खेल पर ध्यान दो।
क्या देश को चलाने का ठेका ठाकरे परिवार ने ले रखा है? जो जवाब शाहरुख खान ने शिव सेना को दिया है,वो शिव सेना के लिए किसी तमाचे से कम नहीं, अगर अंत तक शाहरुख उस पर अटल रहे, तो अमिताभ का 'दी एंग्री यंग मैन' का फीता मैं शाहरुख खान के कंधे पर सजा दूँ, कोई और सजाए भले ही न सजाए।

हैप्पी अभिनंदन में निर्मला कपिला

हैप्पी अभिनंदन में आप ब्लॉगवुड की जिस हस्ती से मिलने जा रहे हैं, वे उन युवाओं के लिए किसी प्रेरणास्रोत से कम नहीं, जो समय न होने का बहाना लगाकर अपने कामों को बीच में छोड़ देते हैं। उम्र के जिस पड़ाव पर वीर बहुटी की लेखिका हैं, उस पड़ाव पर आपने ज्यादातर लोगों को राम राम कहते, गप्पे मारते या फिर सुबह की सैर करते हुए देखा होगा, लेकिन उन्होंने उस पड़ाव पर जाकर अपने शौक को नया आयाम दिया, और उम्र के इस छोर पर बैठी निर्मला कपिला जी छूटे हुए कई किनारों पर अफसोस करने की बजाय, उसको कोसने की बजाय, लुत्फ उठा रही हैं। कहें तो गुरदास मान के उस गीत के बोल को सच साबित कर रही हैं, जिसमें गुरदास मान ने कहा था, उम्र 'च की रक्खिया दिल होना चाहीदा जवान, उम्रां तां पूछ दे नादान। ब्लॉगवुड में कई बच्चों से माँ का दर्जा पा चुकी निर्मला कपिला से हुई कुलवंत हैप्पी की छोटी सी वार्तालाप के कुछ अंश :


कुलवंत हैप्पी : सुना है आप कम्प्यूटर ज्यादा नहीं जानती, फिर ब्लॉग अपडेट कैसे कर पाती हैं, ये जरूर जानना चाहेंगे?
निर्मला जी : जब मेरे दामाद ने मेरा ब्लॉग बनाया तो उस दिन उसने मुझे टाईप करना और पोस्टिन्ग करना सिखा दिया। उसके बाद जो भी मुश्किल आती उसे फोन करके पूछ लेती हूँ, बहुत कुछ तो फोन पर ही सीखा और कुछ ब्लॉगवुड के लोगों की मदद से जाना। कई बार team-viewer software लगाकर ललित ही अपडेट कर देते हैं मेरे पास अब इतना समय नहीं कि सीखने के लिए कहीं जाऊँ। क्योंकि ज़िन्दगी के सफर में बहुत पीछे रह गयी हूँ अभी मंज़िल तक पहुँचने के लिये बहुत काम पड़ा है। काम करते हुए धीरे धीरे सब सीख जाऊँगी। अपनी ये कमी बहुत खलती भी है।

कुलवंत हैप्पी : पंजाब में एक छोटे से खूबसूरत शहर नंगल मे होश सम्भाला तब से यहीं हूँ। मतलब सुसराल और मायका एक ही शहर में? ये कैसे सम्भव हुआ?
निर्मला जी :  मेरी कर्मस्थली पंजाब (नंगल) और जन्मस्थली हिमाचल (ऊना जिला) साथ साथ हैं। मेरा पालनपोशण और शिक्षा नंगल (पंजाब) में हुई और मेरे पिताजी का कारोबार भी नंगल में ही था। जब मेरी नौकरी नंगल, भाखड़ा बियास मैनेजमेन्ट बोर्ड के अस्पताल में लग गई तो पिता जी चाहते थे कि लडका भी ऐसी नौकरी में हो जहाँ से ट्राँस्फर न हो सके। क्योंकि चाहे मैं पंजाब सरकार की तरफ से नियुक्त हुई थी मगर यहाँ से ट्रांस्फर कम ही होती है। इसलिए पिताजी ने आसपास नज़र दौडाई तो नंगल में ही नैशनल फर्टेलाईजेशन पाईवेट लिमिटिड में रिश्ता मिल गया और शादी हो गयी। वैसे भी हमारे इलाके में अपने आस पास के गाचों में ही रिश्ता करना अच्छा समझा जाता है। तो बस सड़क के एक तरफ नंगल तो दूसरी तरफ मेरे ससुराल 3-4 कि. मी. के एरिया में ही सब रिश्तेदार हैं। इसके बाद कुछ साल गाँव मे रहने के बाद हम लोग नंगल में ही सरकारी मकान में रहने लगे बच्चों की पढाई की वजह से।

कुलवंत हैप्पी : आप ने अपनी प्रोफाइल में लिखा है "पुस्तकें पढ़ना और ब्लॉग पर लिखना मेरा शौक है" क्या आप ब्लॉग नहीं पढ़ती।
निर्मला जी : अरे पढना मतलब पढ़ना होता है ब्लॉग पढ़े बिना इतने कमेन्ट कैसे देती हूँ? आज कल किताब से अधिक ब्लॉग पढ़े जाते हैं।

कुलवंत हैप्पी : आप गजल, कविता और कहानियाँ लिखती हैं, आपको अभिव्यक्ति का सबसे अच्छा प्रारूप कौन सा लगता है?
निर्मला जी : मुझे कहानी और कविता दोनों ही सबसे अच्छे प्रारूप लगते हैं। अब तक मैं 70 के करीब कहानियां लिख चुकी हूँ। गज़ल तो अभी सीखनी शुरू की हैं।

कुलवंत हैप्पी : आपकी दो सौ के करीब पोस्टें हो चली हैं, और टिप्पणियों की संख्या चार हजार से ज्यादा है। ब्लॉगवुड से मिल रहा स्नेह पाकर कैसा महसूस करती हैं, अपने शब्दों में बयान करें?
निर्मला जी : ब्लॉगवुड का मुझे इतना स्नेह मिला है कि मैं उसे शब्दों मे ब्यान नहीं कर सकती। बस उस स्नेह की अनुभूति से ही मेरी ऊर्जा शक्ति बढ रही है, इस स्नेह को महसूस कर आँखें नम हो जाती हैं। ज़िन्दगी भर की शिकायतें दूर हो गयी। शायद इससे बड़ी अभिव्यक्ति इसे बताने की मेरे पास नहीं।

कुलवंत हैप्पी : कविता संग्रह, कहानी संग्राह के बाद क्या अब ब्लॉगर संग्राह आएगा, या कुछ और?
निर्मला जी : मैंने सोचा तो था कि हर साल एक पुस्तक लिखूँगी। लिखी भी अब भी तीन पुस्तकों का मसौदा मेरे पास है। मगर प्रकाशक पैसा बहुत मांगते हैं और मैं उन किताबों को बेच नहीं पाती इसलिए हर बार 25-30 हजार खर्च करना कुछ अच्छा नहीं लगा। अभी कहानी संग्रह छपने को तैयार है फिर गजल संग्रह के लिए तैयारी कर रही हूँ। कवितायें भी एक और पुस्तक जितनी हो चुकी हैं एक कैलिफोर्निया यात्रा पर संसमरण लिख रही हूँ जिसे अब अप्रैल में दोबारा वहाँ जाने के बाद पूरा करूँगी क्योंकि पिछली बार की जो फोटो वहाँ ली थी वो कैमरे से डिलीट हो गयी थी और तब मुझे इस बात का ध्यान भी नहीं था कि मैं अब लेखन मे सक्रिय रहूँगी। तब तक मेरी एक भी किताब नहीं छपी थी। एक उपन्यास भी शुरू किया हुया है मगर ब्लॉगिन्ग की वजह से समय नहीं मिल पा रहा। अब तो अमेरिका से आने के बाद ही सोचूँगी।

कुलवंत हैप्पी : जिन्दगी का हसीं पल जो हमारे साथ बांटना चाहती हों?
निर्मला जी : वैसे तो मैं ब्लॉग पर अपने संस्मरण लिखती रहती हूँ । मगर कुछ ऐसा खास नहीं है जिसे मैं ज़िन्दगी के हसीन पल कहूँ। शायद मेरी शादी के बाद के तीन दिन ही मेरी ज़िन्दगी के सब से हसीन पल थे, उसके बाद मौतों ने ऐसा समय बान्धा कि ज़िन्दगी क्या है सोच ही न सकीं। बस दूसरों के बच्चे पालते पोसते जीवन निकल गया। कुछ पंक्तियां यहाँ कहना चाहूँगी।

मुझे कुछ पता नहीं कि मैं क्या हूँ
कभी जर्रा तो लगता कभी खुदा हूँ

फुरसत मिली ही नहीं अपनी तलाश की
कभी इधर कभी उधर भटकती सदा हूँ

कभी सर्दियाँ मिली तो कभी तल्खियाँ
पतझड बसंतों का सिलसिला हूँ

हाँ, एक पल जरूर बाँटना चाहती हूँ  जिस दिन मेरा नया ब्लॉग बना, वो पल मेरी ज़िन्दगी की सबसे बडी खुशी थी क्योंकि शायद ही किसी दामाद ने अपनी सासू माँ को  ऐसा तोहफा दिया हो, जो उसकी जिन्दगी बदल दे। जब से ब्लॉगजगत में आयी हूँ सब दुख तकलीफें भूल गयी हूँ आप सब का स्नेह पा कर।


ऐसा सुखद एक और लम्हा... जब मेरे सब से छोटे दामाद ने कहा माँ, मुझे केवल अपना बेटा समझना दामाद नहीं। शायद वो मेरे लिये  खुशी का एक सुनहरा लम्हा था और आज भी वो किसी बेटे से कम मेरी चिन्ता नहीं करता। बाकी दोनों दामाद भी बहुत अच्छे हैं। एक सुखद अनुभूति जो आजकल होती है कि मैं तीन बेटियाँ और अच्छे दामाद पाकर खुद को दुनिया की सब से खुशनसीब औरत समझती हूँ। यूँ मेरे सभी बच्चे मेरे प्रेरणा स्त्रोत हैं। मेरे पति जिन से ज़िन्दगी जीने के बहुत से सूत्र सीखे हैं। उन्ही के कारण आज यहाँ हूँ।

चक्क दे फट्टे : भूरे मिस्त्री को उसका ससुर पीट रहा था। मैं भी पता करने पहुंच गया आखिर भूरे मिस्त्री का कसूर क्या है? पता चला कि भूरे मिस्त्री का सिर्फ इतना क्सूर था, जब उसकी पत्नि को बच्चा हुआ तो नर्स ने जो एसएमएस भूरे मिस्त्री को भेजा था, उसने वो सबको आगे भेज दिया। जिसमें लिखा था "बधाई हो आप बाप बन गए"।

शिर्डी यात्रा के कुछ पल-2

शिर्डी से शिंगनापुर
अब बाहर आया तो सोचा कि प्रसाद किसी अन्य जगह पर चढ़ता होगा शायद, लेकिन प्रसाद चढ़ाने के लिए कोई जगह न मिली। जहाँ अगरबत्तियाँ जल रही थी, वहाँ जाकर जब प्रसाद वाले लिफाफे को टिटोला तो बीच में उसके अगरबत्ती न निकली। अब क्या हो सकता था, केवल एक तिलक अपनी उंगली से अपने माथे पर करने के अलावा, सो किया, और लगते हाथ एक पेड़ के तले बने छोटे मंदिर में माथा भी टेक दिया। अब जनकसिंह झाला की बात याद आ गई "कहीं मंदिर देखें बिना भाग मत आना"। सो मंदिर देखना लाजमी भी हो गया। अपनी नजरें इधर उधर चलते चलते दौड़ाई तो निगाह जाकर एक संग्रहालय पर अटक गई। मैं उसके संग्रहालय के भीतर गया, साईं बाबा से जुड़ी हुई बहुत सी वस्तुएं देखीं, लेकिन इस दौरान मुझे एक बात का दुख हुआ कि इंग्लिश और मराठी के सिवाय किसी भी भाषा में उनका वर्णन न था, खासकर हिन्दी में न होने का दुख हुआ। संग्रहालय में मुझे साईं बाबा की सादगी ने कायल कर दिया। यहाँ पर चक्की, दो मग्गे, एक जोड़ा जूतों का, और पहने वाले बस्तरों के अलावा और भी बहुत कुछ था। कहते हैं कि चक्की साईं जी खुद चलाते थे, एक दिन उनको चक्की चलाते देखकर शिर्डी वासी हैरान रह गए, क्योंकि साईं बाबा अकेले रहते थे, ऐसे में उनको खुद के लिए आटा पीसने की क्या जरूरत है, उनके लिए तो खाना किसी भी घर से आ सकता है। उनके चक्की चलाने की बात जैसे ही आसपास में फैली तो वहाँ पर आकर कुछ महिलाओं ने उनसे चक्की छीन ली और आटा पीसना शुरू कर दिया। जब आटा पीस गया, सबने हिस्सों में बाँट लिया और घर लेकर जाने लगी तो साईं बाबा बोले..तुम इसको घर मत लेकर जाओ। इसको शिर्डी की सीमा पर बिखेर दो। कहते हैं कि उन दिनों शिर्डी में हैजा फैला हुआ था, जिसके बाद हैजे की बीमारी थम गई थी। इस संग्रहालय के बाद पवित्र राख लेने के लिए कतार में लगना पड़ा, मैंने राख वितरण करने वाले से निवेदन किया कि आप मुझे कृप्या दो पुड़िया दें, लेकिन उन्होंने एक ही दी। अब हम भी ठहरे भारतीय, कहाँ मानने वाले थे। लाईन में फिर से लगकर एक और पुड़िया। मैंने अपने घर के एक ही पुड़िया ली, जबकि एक अन्य दोस्त के लिए ली। आप जब भी किसी धार्मिक यात्रा पर जाते हैं, तो साथ में एक दो सिफारिशें तो आई जाती हैं। मंदिर परिसर से बाहर निकला तो मेरी निगाह सामने शिर्डी नगर पंचायत द्वारा संचालित लॉकर रूम पर चली गई। अब मुझ से रहा न गया, और मैं सीधा वहाँ पहुंच गया। मैंने पूछा कि यहाँ सामान रखने का चार्ज क्या है, वहाँ पर बैठे एक ओहदेदार ने बताया कि पाँच रुपए एक बैग के। इतना ही नहीं, उसने साथ साथ में मुझे सिंगनापुर का किराया भी बता दिया, जबकि मैंने तो सिर्फ उसको इतना कहा था कि मुझे शिंगनापुर केवल होकर आना है, तब तक बैग रखने के कितने रुपए लेंगे। सबसे पहले अब उस स्थान पर मैं पहुंचा, जहाँ लॉकर में मेरा बैग अटका हुआ था, और भूख भी लग रही थी, रात से खाना जो नहीं खाया था। रास्ते में बस एक जगह रुकती थी, लेकिन वहाँ के लोगों का बर्ताव देखकर भूख मर गई थी। उसी गली में एक ढाबा था, जिसके बाहर लिखा हुआ था शेर-ए-पंजाब। मैंने सोचा क्यों न सुबह सुबह परांठे हो जाएं। उसके भीतर जाते ही मेरी निगाह सामने लगी हुई श्री गुरू नानक देव जी की फोटो पर पड़ी। मुझे वो व्यक्ति कहीं से भी पंजाबी नहीं लग रहा था। मैंने अपना परांठा खत्म करने के बाद बिल चुकाते हुए धीरे से पूछा, अंकल जी ये कौन हैं? उन्होंने उत्तर नहीं दिया, और ऐसे ही सिर हिला दिया। मैं समझ गया कि श्री गुरू नानक देव जी यहाँ पर इनके ब्रांड दूत हैं, जिनके कारण इनका धन्धा खूब चल रहा है। शिर्डी में शेर-ए-पंजाब के नाम पर कई ढाबे हैं। इन ढाबों की संख्या बताती है कि साईं बाबा के पंजाबी श्रदालुओं की संख्या कितनी है। अब ढाबे से खाना खाकर निकला ही था कि एक गाड़ी वाले ने आकर घेर लिया। आओ जी आपको शिंगनापुर ले चलें, सिर्फ 70 रुपए में। दिल ने कहा, हैप्पी हाँ बोल दे। जब दिल साथ देता है तो मैं फिर सोचना बंद कर देता हूँ, दिमाग का इस्तेमाल नहीं करता। गाड़ी में बैठकर शिंगनापुर के लिए निकल पड़े, शायद अभी शिर्डी से भी बाहर नहीं निकले होंगे कि मेरी आँख लग गई, और आँख तब खुली, जब शिंगनापुर में प्रवेश करने के लिए पाँच रुपए की पर्ची कटवाने के लिए ड्राईवर ने मुझे उठा। 

अच्छा हुआ आँख खुल गई, अब ड्राइवर बताने लगा कि शिंगनापुर में किसी भी घर को दरवाजा नहीं, और यहाँ चोरी नहीं होती। इसके बारे में उससे पहले मुझे मेरे मित्र जनकसिंह झाला ने बताया था, और कहा था कि शिर्डी जाए तो वहाँ भी जरूर होकर आना। शिंगनापुर में किसी भी घर को दरवाजे नहीं, इस बात से मुझे कल रात पढ़े ओम थानवी के लेख की याद आ गई, जो 17 जनवरी को जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था। उसमें लिखा था कि कोपेनहेगन में किसी भी दुकान को ताले नहीं लगते कुछ साल पहले जब कामरेड अरुण महेशवरी वहाँ जाकर आए थे। इतने में शिंगनापुर बस स्टॉप पर पहुंच गए। हमारी गाड़ी जैसे ही रुकी, कुछ नौजवान धोती लेकर आ गए। अगर आपको शनि देव के मंदिर में उनकी दुर्लभ मूर्ति पर तेल चढ़ना है तो आपको बस स्टेंड पर बनी पानी के टंकी के तले स्नान करना होगा, और फिर इस धोती को बांधकर मंदिर में जाना होगा। महिलाएं केवल शनिदेव के दर्शन दूर से ही कर सकती हैं, उनका वहाँ पूजा करना वर्जित है। मैंने भी महिलाओं की तरह ही शनि मंदिर की परिकर्मा की। शिर्डी में आपको गुलाबों की महक से महकता वातावरण मिलेगा, तो यहाँ की हवाओं में आपको बदबू महसूस हो सकती है, क्योंकि मंदिर के साथ वाली नदी अब गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है, और उसमें आप पास का कचरा फेंका हुआ है। कहते हैं कि इस नदी से कभी शनिदेव की दुर्लभ मूर्ति प्राप्त हुई थी, जो अब तेल की नदिया बहा रही है, और ये नदी बेचारी पूरे गाँव का गंदा पानी अपने भीतर लिए संतोष कर रही है। बाकी परसों..कल मिलिए निर्मला कपिला जी से
फोटो गूगल के सौजन्य से

शिर्डी यात्रा के कुछ पल