शिर्डी यात्रा के कुछ पल

बस अपने निर्धारित समय पर सुबह साढ़े तीन बजे शिर्डी पहुंच गई, मैं पक्की नींद में जा चुका था, शिर्डी मंदिर से कुछ दूर पहले मेरे साथ की सीट पर बैठे एक अन्य मुसाफिर ने मुझे हाथ से हिलाते हुए कहा "शिर्डी आ गया"। शिर्डी का नाम सुनते ही आँखों से नींद ऐसे उड़ गई, जैसे सुबह होते ही परिंदे अपने घोंसलों से। मैंने आँखें पूरी तरह खोलते हुए चलती बस में से शीशे के बाहर देखा, श्री साईं बाबा के विशाल मंदिर का मुख्य दरवाजा। देखने बहुत शानदार, ऐसे दरवाजे मैंने फिल्मों में देखे थे। बस मंदिर से आगे बस स्टेंड की तरफ बढ़ रही थी, मैंने उस अनजान मुसाफिर से पूछा "यहाँ से बस स्टेंड कितनी दूरी पर है"। उसने कहा "बस स्टॉप भी आ गया"। मंदिर से बस स्टेंड कोई बहुत दूर न था, थोड़ी सी दूरी पर जाकर बस मुड़ गई और बस स्टॉप के भीतर चली गई। बस रुकते ही बाहर कुछ लोगों की भीड़ एकत्र हो गई, जैसे ही सवारियाँ बस से बाहर आई, वो उनके इर्दगिर्द घूमने लग गई, जैसे मीठे के ऊपर मक्खियाँ भिनभिनाती है। वो आटो वाले नहीं थे, वो तो प्रसाद की दुकानों वाले थे, जो आपको रहने के लिए किसी निजी संस्था के कमरे तक लेकर जाएंगे, श्री साईं ट्रस्ट की धर्मशाला की तरफ नहीं, बाद में पता चला कि साईं बाबा ट्रस्ट की धर्मशाला भी बहुत बढ़िया है। उसके लिए स्पेशल बसें पूरा दिन मुफ्त मंदिर से वहाँ तक चलती हैं।

इनका लालच इतना होता है कि आप श्री साईं मंदिर जाने से पहले इनकी दुकान से फूल प्रसाद लेकर जाएं। मुझे भी श्री साई ट्रस्ट की धर्मशाला के बारे में पता नहीं, इसलिए मुझे इनका सहारा लेना बेहतर लगा। जो मुझे एक निजी रूम में रहने के लिए फोर्स कर रहा था, वो बेचारा बेहद असाधारण था, आम सा नहीं था, लोगों की तरह चलाक, खूबसूरत और हट्टा कट्टा नहीं था। उसकी आँखें सरकारी बस के टायरों की तरह आपस में संतुलन नहीं बना पा रही थी, उसकी जुबाँ अच्छी तरह से उच्चारण नहीं कर पा रही थी, जिसके कारण उसको बोलने में हड़बड़ा हो रही थी। मैंने उसे कहा, दो मिनट रुकोगे, वो बेचारा पीछे हटकर खड़ा हो गया। मैंने सड़क पर आकर दोनों तरफ देखा, पर मुझे कुछ समझ न पड़ा, मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर, क्योंकि यहाँ पहली बार आया था। जाऊं तो जाऊं किधर। मैंने सोचा, पहले चाय का कट हो जाए, दिमाग की बत्ती भी जल जाएगी।

चाय पीते ही मैंने उसको ढूँढना शुरू कर दिया, वो पता नहीं कहा चला गया था। लेकिन अचानक वो मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया। मैंने उसके साथ चलना शुरू कर दिया। उसने बताया कि उसकी फूलों की दुकान है, उनके खुद के रूम नहीं। मैंने पूछा "इसमें तुम्हारा क्या फायदा होगा"। उसने कहा "आप प्रसाद हमारी दुकान से खरीदें बस"। मैंने कहा "अगर मुझे न प्रसाद लेना हो तो"। उसके पास जवाब न था, वो हँसता हुआ आगे बढ़ता रहा। मैंने कहा कि "मैं तुम्हें पैसे दे दूं तो चलेगा"। उसने कोई उत्तर न दिया। वो तंग गली में ले गया। वहाँ जाकर मेरे पाला लालची लोगों से पड़ गया। जो बेहद रूढ़ हैं। रूम वाला दो सौ रुपया मांग रहा था। मैंने कहा कि मुझे रुकना नहीं, मुझे तो सिर्फ स्नान कर मंदिर के लिए रवाना होना है। आप डेढ़ सौ रुपए ले लेना, सिर्फ मुझे 15 मिनट में निकलना है। बात हो गई। मैंने स्नान के बाद उनके लॉकर में सामान रखा और चल दिया। श्री साईं बाबा की सुबह वाली आरती में शामिल होने के लिए। उनकी दुकान से प्रसाद लिया, वो सुझाव देने लगा। पहली बार आए हो तो ये लेकर जाओ। बाबा पर ये प्रसाद चढ़ता है। मैंने कहा "मुझे सिर्फ एक नारियल और अन्य प्रसाद दे दो बस। उसने 50 रुपए का प्रसाद बना दिया। वहाँ से प्रसाद लेकर श्री साईं बाबा के मंदिर की तरफ चल दिया। पूरा वातावरण महक रहा था, गुलाब के फूलों की महक से। आपको श्री साईं बाबा के मंदिर के इर्दगिर्द चलता फिरता गुलाब गार्डन मिल जाएगा।

शिर्डी मंदिर परिसर में आप मोबाइल और जूते लेकर नहीं जा सकते, ये बात मुझे प्रसाद वाले ने बता दी थी, जिसके चलते मैं जूते और मोबाइल फोन वहीं दुकान पर छोड़ दिया था। मुझे मंदिर परिसर के मुख्य दरवाजे पर जाकर पता चला कि मंदिर के मुख्य दरवाजे के साथ ही मोबाइल और जूते जमा करवाने के लिए लॉकर बने हुए हैं, जिनका शुल्क बहुत कम है। सुबह की आरती में शामिल होने के लिए मंदिर परिसर में पहुंच गया था। मैं खुश था कि आज भीड़ कम है, ये देखकर। लेकिन मुझे नहीं पता था कि लोग मुझसे पहले से भी आए हुए हैं। सुबह पांच बजे के आस पास आरती शुरू हो गई, हम सब कतारों में खड़े हो गए। साईं बाबा जितना साधारण जीवनी शैली में विश्वास करते थे, लेकिन उनके भक्तों के लिए उतनी ही सुविधाएं हैं। अगर आप कतारों में खड़े खड़े थक गए तो आपके बैठने के लिए रेलिंग के साथ साथ बैठने का प्रबंध भी किया हुआ है। हम सब भाग कर आ रहे थे, लेकिन अचानक ब्रेक लग गया। भागती हुई कतारें थम गई। सामने लगे महंगे टैलीविजनों पर संजीव प्रसारण शुरू हो गया। साईं बाबा की प्रतिमा के दर्शन होने शुरू हो गए। सब की निगाहें वहाँ पर टिकने लगी। जै जै कार के नारे लगने शुरू हो गए। अब जब खड़े खड़े आधे घंटे से ऊपर का समय हो गया तो मेरे आगे खड़ा एक बुजुर्ग डेस्क पर बैठ गया, उसके बैठने की देर थी कि मेरे पिछे खड़े चार पाँच नौजवानों के पैर भी जवाब दे गए। वो भी बैठ गए। धीरे धीरे तीनों कतारों में से कुछ लोग बैठ गए। कुछ मेरे जैसे जिद्दी खड़े रहे।

वहाँ पर खड़ा मैं अद्भुत नजारा देख रहा था, पुजारी प्रतिमा को स्नान करवा रहे थे, उसकी आस पास की जगह को साफ कर रहे थे। सब कुछ संजीव प्रसारण में दिखाई दे रहा था। मैंने अपनी नजर तीनों कतारों पर दौड़ाई तो देखा। एक मेरे साथ वाली कतार की एक डेस्क पर एक प्रेमिका अपने प्रेमी के कंधे पर सिर रख नींद का आनंद ले रही है। एक माँ अपनी 18 साल की बेटी के सिर पर हाथ रखे खड़ी है, जिसकी आँखें पूरी तरह बंद हैं। एक पिता बच्ची को गोद में लिए बैठा नींद का आनंद ले रहा है। खड़े खड़े अब एक घंटा हो चला था। घूम फिर कर मेरी निगाह फिर सामने चल रहे टीवी पर आकर रुक गई। प्रतिमा से बस्तर हटाए जा रहे थे, शिर्डी साईं बाबा की प्रतिमा इतनी जीवंत लग रही थी कि मानो साईं खुद बिराजमान हैं। जब उनके भक्तों को उनकी सफाई करते काफी समय निकल गया, तो मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा कि साईं खुद प्रतिमा से उठकर बोलने वाले हैं कि हटो भाई मुझे मेरे भक्तों से मिलने दो। खुद तो दो दो लोटे डालकर नहा लिए, और मुझे पीछे एक घंटे से साफ किए जा रहे हो। सच में वहाँ पर मौजूद पाँच पंडित एक जगह को बार बार साफ कर रहे थे। मुझे नहीं लगता कि वहाँ धूल का एक भी कण जाता होगा। फिर भी उसकी प्रतिमा को साफ करने के लिए एक घंटा निकल चला था। उसी एक घंटे के दौरान मैंने तो बाबा के खुलकर दर्शन कर लिए थे, जब अब अंदर जाने की बारी। प्रतिमा को पास से देखने की बारी आई तो भक्त एक दूसरे को धक्के मारकर सारा मजा किरकिरा कर रहे थे। वहाँ सुरक्षा कर्मचारी स्थिति को सुचारू बनाते हैं, लेकिन भक्त भी सारा मजा किरकिरा करते हैं। जो प्रसाद लिया था, वो वैसे ही लेकर आना पड़ा, पंडित ने हाथ लगाकर आगे चलने को कहा। बाहर निकल आए।..बाकी कल

कुछ मिले तो साँस और मिले...

मुश्‍किल टके हाथ आते हैं
कुछ हज़ार और थोड़े सैकड़े

क्‍या काफ़ी है ज़िंदगी ख़रीदने को
जो नपती है कौड़ियों में.

कौड़ियाँ भी इतनी नसीब नहीं,
कि मुट्ठी भर ज़रूरतें मोल ले सकूँ

कुछ उम्‍मीदें थीं ख्‍़वाब के मानिंद,
वो ख्‍़वाब तो बस सपने हुए.

कुछ मिले तो साँस और मिले
ख्‍़वाबों को हासिल हो तफ़सील.

अब मुश्‍किलों का सबब बन रही है गुज़र
क्‍या ख़बर आगे कटेगी या नहीं.

सिर्फ रात आँखों में कट रही है अभी,
सवेरा होने में कई पैसों की देर है.

(तफ़सील-विस्तार)

अहम बात : युवा सोच युवा खयालात की श्रेणी अतिथि कोना में प्रकाशित इस रचना के मूल लेखक श्री "कनिष्क चौहान" जी हैं।

कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें

अपना ये संवाद न टूटे
हाथ से हाथ न छूटे
ये सिलसिले यूँ ही चलते रहें
कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें
न हो तेरी बात खत्म
न हो ये रात खत्म
ये सिलसिले यूँ ही चलते रहें
कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें

मिलने दे आँखों को आँखों से
दे गर्म हवा मुझको साँसों से
ये सिलसिले यूँ ही चलते रहें
कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें

हाथ खेलना चाहें तेरे बालों से
लाली होंठ माँगते तेरे गालों से
ये सिलसिले यूँ ही चलते रहें
कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें

दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति के नाम 'खुला पत्र'


समय था 26 जनवरी 2010,  दो देशों के राष्ट्रपति दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रिक देश की राजधानी नई दिल्ली में एक साथ बैठे हुए थे। एक भारत की महिला राष्ट्रपति और दूसरा दक्षिण कोरिया का पुरुष राष्ट्रपति। इन दोनों में समानता थी कि दोनों राष्ट्रपति हैं, दोनों एक ही मंच पर हैं, और तो और दोनों की चिंता का मूल कारण भी एक ही चीज से जुड़ा हुआ है, लेकिन उस चिंता से निटपने के लिए यत्न बहुत अलग अलग हैं, सच में।
दक्षिण कोरिया की समस्या भी आबादी से जुड़ी है, और भारत की भी। भारत बढ़ती हुई आबादी को लेकर चिंतित है तो दक्षिण कोरिया अपनी सिमटती आबादी को लेकर। यहाँ भारत को डर है कि आबादी के मामले में वो अपने पड़ोसी देश चीन से आगे न निकल जाए, वहीं दक्षिण कोरिया को डर है कि वो अपने पड़ोसी देश जापान से भी आबादी के मामले में पीछे न रह जाए। अपनी समस्या से निपटने के लिए जहाँ भारत में पैसे दे देकर पुरुष नसबंदी करवाई जा रही है, वहीं दक्षिण कोरिया में दफ्तर जल्दी बंद कर घर जाने के ऑर्डर जारी किए गए हैं, और तो और, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले दम्पतियों को पुरस्कृत किया जा रहा है।
देश के गणतंत्रता दिवस के मौके पर ऐसे दो देश एक साथ थे, जो आबादी को लेकर चिंतित हैं, एक घटती को और एक बढ़ती आबादी को लेकर। आज से कई दशकों पहले भारत में भी कुछ ऐसा ही हाल था, जिस घर में जितनी ज्यादा संतानें, उसको उतना अच्छा माना जाता था। मैं दूर नहीं जाऊंगा, सच में दूर नहीं जाऊंगा। मेरी नानी के घर सात संतानें थी और मेरी दादी के घर छ:, जबकि दादा की आठ, क्योंकि मेरे दादा की दो शादियाँ हुई थी। जितना मेरे दादा-नाना ने अपने समय में परिवार को फैलाने में जोर दिया, उतना ही अब हम महंगाई के जमाने में परिवार को सीमित करने में जोर लगा रहे हैं।
गणतंत्रता दिवस के मौके पर अब जब दक्षिण कोरिया राष्ट्रपति ली म्यूंग बाक भारत यात्रा पर आएं हैं, तो वो केवल नई दिल्ली के राजपथ का नजारा देखकर न जाएं, मेरी निजी राय है उनको। इस यात्रा के दौरान उन्हें भारत की पूरी यात्रा करनी चाहिए, उनको बढ़ती आबादी के बुरे प्रभाव देखकर जाने चाहिए, ताकि कल को म्यूंग का पड़पोता आगे चलकर ऐसा न कहे कि मेरे पड़दादा ने फरमान जारी किया था, आबादी बढ़ाओ, और आज की सत्ताधारी सरकार कह रही है कि आबादी घटाओ।
मुझे यहाँ पर एक चुटकला याद आ रहा है। एक ट्रेन में एक गरीब व्यक्ति भीख माँगता घूम रहा था, उसके कपड़े बहुत मैले थे, वो कई दिनों से नहाया नहीं था। उसकी ऐसी हालत देखकर एक दरिया दिल इंसान को दया आई, और उसने उसको सौ का नोट निकालकर देना चाहा। सौ का नोट देखते ही वो भिखारी बिना किसी देरी के बोला, साहिब कभी मैं भी ऐसे ही दरिया दिल हुआ करता था। इसलिए मेरी दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति को निजी राय है कि वो दरियादिली जरा सोचकर दिखाए, वरना भारत होने में उसको भी कोई ज्यादा समय न लगेगा, वैसे अगर वहाँ काम करने वालों के कमी महसूस हो रही है तो भारत में बेरोजगारों की भी एक बड़ी फौज है, वो चाहें तो जाते जाते भारत का भला कर जाएं।

जय हिन्द

हैप्पी अभिनंदन में 'हरकीरत हीर'



हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से मिलने जा रहे हैं, वो शख्सियत अचानक ब्लॉगवुड के आसमान से उस चाँद की तरह छुप गई, जो बादलों की आढ़ में आते ही हमारी आँखों से ओझल हो जाता है, और फिर वो ही चाँद बादलों को चीरते हुए रात को फिर से रोशनमयी बना देता है। उम्मीद करता हूँ, यहाँ पर भी कुछ ऐसा ही हो..जो चाँद आज हम से दूर जाकर कहीं छुप गया है, वो भी फिर से लौट आए। पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि ये शख्सियत भी इस दिन के इंतजार में थी कि कोई आए और उसके मन को टोटले, और फिर वो दिल खोलकर अपने मन की सभी बातें कहकर कहीं छुप जाए। ऐसा ही कुछ हुआ है इस बार, खुद ही जाने आगे की बात।

कुलवंत हैप्पी : कौन सा वो एक दर्द है...जिसने आपको हरकीरत 'हक़ीर' से कवयित्री बना दिया?
हरकीरत : हरकीरत हक़ीर से नहीं .....हरकीरत कलसी से कहिये .....!!
इक बात कहूँ .....? आपने प्रश्न बेशक छोटा पूछा हो पर जवाब देने जाती हूँ तो सारी ज़िन्दगी सामने आ खड़ी होती है कुछ मेरी हैसियत और औकात दर्शाते शब्द यूँ आस पास रहे कि अपने आप को हकीर से ज्यादा समझ ही नहीं सकी ....' हकीर' का मतलब तो आप जानते ही होंगे ....बहुत ही क्षुद्र तुच्छ सी वस्तु ....!!
               अब रही कवयित्री बनने की बात तो बचपन में शेरो-शायरी का शौक तो रहा ...और उपन्यास भी खूब पढ़ती थी मैं जासूसी से लेकर सामाजिक,साहित्यिक सभी ...किताबों में छिपाकर ... पंजाबी के भी कुछेक उपन्यास पढ़े खासकर नानक सिंह के ....'कोई हरया बूट रहियो री ', 'अद्द खिडिया फुल्ल ' आदि ...पंजाबी उपन्यास के शौकीन थे मेरे पापा ....हम तीनों भाई बहनों को आस - पास बैठा लेते और सुनाने लगते ....तब मैं बहुत छोटी थी ४,५ साल की ...पर उपन्यास की कथा बहुत लगाव से सुनती ....शायद इसी शौक  ने पंजाबी भी सिखा दी ....हाँ मैंने लिखना शुरू किया विवाह के बाद .....जब दर्द करीब रहने लगे .....तब इन दीवारों और कज़ज कलम से प्यार हो गया .....वर्ना जीना कहाँ आता ....!!

कुलवंत हैप्पी : कवयित्री हरकीरत हकीर से हरकीरत हीर कैसे हुई?
हरकिरत : ये तो मैंने ब्लॉग में भी बताया था ....बहुत से मित्रों ने विरोध किया हकीर न लिखा करूँ ....फिर इमरोज़ जी का ख़त ....कवि या कलाकार 'हकीर' नहीं हुआ करते ....वे लिखते भी हकीर ही थे ....तो सोचा क्यूँ न उनका दिया नाम ही अपना लूँ .....!!

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग पढ़ने के बाद 'इक-दर्द' को पढ़ने की इच्छा होती है, ये काव्य संग्रह कहाँ से मिलेगा?
हरकिरत : ऐसा कुछ नहीं है " इक-दर्द " में कि पढ़ा जाये ....बस  जीवन और मृत्यु से संघर्ष करती इक औरत कि दास्तां है ...साहित्यिक जैसा कुछ नहीं ....यहाँ ब्लॉग जगत में मुझ से अच्छा लिखने वाले कई हैं ....फिर भी अगर कोई पढना चाहे तो मेरे प्रकाशक से मंगवाई जा सकती है .....उनका फोन नम्बर है .....०९२३१८४५२८९.

कुलवंत हैप्पी : आपका मनपसंदीदा कवि कौन है, क्या वो ही आपके आदर्श हैं?
हरकिरत : पसंदीदा और आदर्श दोनों अमृता जी रही  हैं ....अमृता जी का लिखा एक -एक शब्द मुझे भीतर तक कचोट जाता है ....इक आग जो बरसों से अपने भीतर कहीं महसूस करती हूँ उनमें आब का कम करतीं हैं अमृता जी की नज्में .....मैं उनमें डूब जाना चाहती हूँ इतनी गहराई से कि मेरा रोआं रोआं अमृता हो जाये .....ताज्जुब देखिये मेरा और अमृता का जन्मदिन भी एक ही है ....क्या पता मौत का दिन भी रब्ब ने वही निश्चित किया हो .....???

कुलवंत हैप्पी : जब आप ने साहित्य को चुना तो क्या आप के परिजनों ने विरोध किया या नहीं....??
हरकिरत : साहित्य के क्षेत्र में बहुत कम महिलाएं होंगी जिनके साथ परिजनों की दुआएं रही हों .....मेरे हिस्से के तो फूल ही जले हुए थे ....सेज के भी ....झोली के भी ....!!

कुलवंत हैप्पी : असम में हिन्दी भाषियों को पसंद नहीं किया जाता , और आपने हिन्दी काव्य की ज्योति को वहाँ पर ही ज्वलित रखा कैसे?
हरकिरत : साहित्य के क्षेत्र में ऐसा नहीं देखा मैंने .....मुझे असमियाँ साहित्य समाज भी सम्मान के साथ बुलाता है ....उनमें मैंने हिंदी साहित्य को पढने जानने की ललक भी देखी ....अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो उनका लिखा बस असम तक ही सिमित रह जायेगा ....यहाँ भी बहुत अच्छे रचनाकार हैं ...जरुरत है उनके लिखे साहित्य को अनुवाद की ....कुछेक अनुवाद का कार्य हाथ में लिया है .....उसके लिए शायद मुझे ब्लॉग बंद करना पड़ जाये ....!!

कुलवंत हैप्पी : 'इक दर्द' की सफलता के बाद दूसरा काव्य संग्रह कब तक आ रहा  हैं आपका ?
हरकिरत : नज्में तो काफी हो चुकी हैं ....पर अब तक कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा कि छपवा पाऊँ  ....देखती हूँ....आप सब की दुआएं चाहिए .....!!

कुलवंत हैप्पी : आप पंजाबी भी जानती हैं, ये कैसे संभव हुआ?
हरकिरत : मैं पंजाबी ही हूँ कुलवंत जी .....सिख परिवार की ....होशियारपुर जिले से हूँ ....हाँ मेरा जन्म यहाँ असम का है ....शिक्षा- दीक्षा यहाँ की है ...पर अपनी मात्र भाषा कोई थोड़े ही भूल जाता है ....यहाँ भी बहुत से सिख परिवार हैं ...गुरूद्वारे  हैं ....और बंदिशें भी सिख परिवारों सी हैं ....हा....हा...हा.....!!

कुलवंत हैप्पी : जिन्दगी का कोई ऐसा लम्हा बताएं, जिसको याद करते हुए मन खुशी से गदगद हो उठता हो?
हरकिरत : कोई ऐसा लम्हा याद नहीं आ रहा .....हाँ एक बात देखी मैंने ....इंसानों में भले ही एक दुसरे से प्रेम हो या  न हो ...पर ये जानवर कई बार इतना स्नेह दे जाते हैं कि ख़ुशी से आँखें छलछला आयें .....मेरे घर में एक कुत्ता है एल्सेशियन ......रोक्की पुकारती हूँ उसे ....जब भी कोई  मुझसे ऊँची आवाज़ में बात करता है  वह मेरे सपोर्ट में आ खड़ा होता है ....मुझे घेरकर ....किसी को मुझे हाथ तक नहीं लगाने देता ....और मैं उसे सीने से लगा फफक पड़ती हूँ .....!!

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगवुड और पाठकों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगी?
हरकिरत : हाँ उनके लिए जो औरत को सम्मान नहीं दे पाते  .......

इतना न सता दुनियाँ वाले
जरा अश्कों  को बह जाने की मोहलत तो दे
कहीं दहक के शोला न बन जाऊं  मैं
शमा हूँ शमा की ही तरह जलने दे .......!!



कौन हूँ मैं


हिन्दु हूँ
या
मुस्लिम हूँ
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
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बस!
इतना जानूँ
मानवता
धर्म मेरा
है यही
कर्म मेरा
बहता दरिया,
चलती पौन हूँ
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
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दुनिया
एक रंगमंच
तो कलाकार हूँ मैं
धर्म रहित
जात रहित
एक किरदार हूँ मैं
जात के नाम पर
अक्सर
होता मौन हूँ मैं
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
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जिन्दगी
है एक सफर
तो मुसाफिर हूँ मैं
जो छुपता नहीं
धर्म की आढ़ में
वो काफिर हूँ मैं
काट दूँ एकलव्य का अंगूठा
न कोई द्रोण हूँ मैं
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
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पौन-पवन,



बस! एक गलती


जाओ, मत रूको और जाओ मत, रूको। इस में सिर्फ और सिर्फ एक अल्पविराम का फर्क है, एक थोड़ा से पहले लग गया और एक थोड़ा सा बाद में, लेकिन इसने पूरे पूरे वाक्य का अर्थ ही बदल दिया। वैसे ही, जैसे आज एक इंग्लिग न्यूज पेपर में प्रकाशित हुए एक विज्ञापन ने। वो था विज्ञापन, लेकिन एक गलती से ख़बर बन गया।

यहां इस विज्ञापन में हुई गलती दृश्य एवं प्रचार निदेशालय के अधिकारियों की लापरवाही को उजागर करती है, वहीं मुझे थोड़ा सा सुकून भी देती है, क्योंकि विज्ञापन का अर्थ होता है किसी भी चीज का प्रचार करना। चूक कहीं से भी हुई हो, चाहे सरकारी दफतरों के अधिकारियों से या फिर दैनिक समाचार पत्र के कर्मचारियों से।

इस छोटी भूल ने इस भ्रूण हत्या विरोधी विज्ञापन को आज जन जन तक पहुंचा दिया। थोड़ी सी भूल हुई, विज्ञापन खुद ब खुद ख़बर बन गया, और ख़बर बन आम जन तक पहुंच गया। जो विज्ञापन का मकसद था। आम तौर पर दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले केवल वो ही विज्ञापन पढ़े जाते हैं, जिनमें कोई फायदे की बात हो...जैसे एक पर एक फ्री, इतने की खरीदी पर इतने का सामान मुफ्त पाएं। सच में ऐसे विज्ञापन ही पढ़े जाते हैं।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित होने वाला अमन की आशा विज्ञापन कितने लोगों ने पढ़ा, जिसमें फिल्म अभिनेता अमिताभ बचन की फोटो के साथ गुलजार की एक शानदार रचना है और एक परिंदा उड़ रहा है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच अमन कायम करने का पैगाम देता है। इस विज्ञापन को किसी न्यूज चैनल ने प्रमुखता के साथ नहीं लिया, अगर गलती से अमिताभ बच्चन की जगह किसी पाकिस्तानी का फोटो लग जाता तो शायद खबर बनते ही अमन का संदेश घर घर पहुंच जाता। अमन की आशा विज्ञापन ऐसे समय में बहुत काम की चीज है, जब आईपीएल के कारण पाकिस्तान और भारत में एक बार फिर से तनाव बढ़ने लगा है।

अब जिन्दगी से प्यार होने लगा

गाने का शौक तो बचपन से है, लेकिन कभी सार्वजनिक प्लेटफार्म पर नहीं गा पाया, तीन बार को छोड़ कर। कल रात गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' जी ने मेरे भीतर के तारों को फिर छेड़ दिया, उनकी पास से  एक यंत्र मिल गया, जिसमें मैं अपनी आवाज रिकॉर्ड करके आप तक पहुंचाने में सक्षम हुआ।

............यहाँ सुने मेरी आवाज में.................

नफरत थी जिन ख्यालों से
नफरत थी जिन ख्यालों से
दिल उन्हीं ख्यालों में खोने लगा
तुमसे क्या मिले, अब जिन्दगी से प्यार होने लगा
तुमसे क्या मिले, अब जिन्दगी से प्यार होने लगा

काट दिया था, जिन उम्मीद के पौधों को
काट दिया था, जिन उम्मीद के पौधों को
मन वो ही बीज बोने लगा
तुमसे क्या मिले, अब जिन्दगी से प्यार होने लगा
तुमसे क्या मिले, अब जिन्दगी से प्यार होने लगा

तुम सपनों में क्या आने लगे
तुम सपनों में क्या आने लगे
दिल सुकून की नींदर सोने लगा
तुमसे क्या मिले, अब जिन्दगी से प्यार होने लगा
तुमसे क्या मिले, अब जिन्दगी से प्यार होने लगा

फेसबुक एवं ऑर्कुट के शेयर बटन

अब आप कोई भी पोस्ट किसी भी ब्लॉग से अपने ऑर्कुट एवं फेसबुक पर बने दोस्तों के साथ बहुत ही आसानी से शेअर कर सकते हैं, बस उसके लिए आपको।

अपने बुकमार्कलेट में जोड़ने होंगे दो बटन। जो मैंने नीचे दिए हैं। इन जोड़ने का तरीका आसान है। जैसे ही लिंक खोलेंगे। आपको फेसबुक और ऑर्कुट के बने हुए दो आइकॉन नजर आएंगे। उनको खींचकर अपने इंटनेट ब्राउजर (मॉजिला फायरफोक्स) के एड्रेस बॉक्स के नीचे लगाएं। जैसे फोटो में नजर आ रहा है।

फेसबुक बॉटन ऑर्कुट बटन



अगर हम बात करेंगे इंटरनेट एक्सप्लॉर्र की तो उस इन बॉटनों को आप उसके लिंक ऑप्शन में लग सकते है। अगर लिंक ऑप्शन दिखाई न दे तो आप इंटरनेट एक्सप्लॉर्र के एड्रेसबार के उपर राईट क्लिक करके उसको ला सकते हैं, और उसके बाद नीचे से माउस क्लिकिंग द्वारा बटन खींच कर उसमें जोड़ दें।



अगर आपके पोस्ट काम आ गई तो मेरे कार्य सफल हो जाएगा।


मैं अकेला नहीं चलता

मैं अकेला नहीं चलता

मैं अकेला नहीं चलता,
साथ सवालों के काफिले चलते हैं।

होती हैं ढेरों बातें मन में
खुली आंखों में भी ख्वाब पलते हैं।

 मन के आंगन में अक्सर
उमंगों के सूर्या उदय हो ढलते हैं।

करता हूं बातें जब खुद से
कहकर पागल लोग निकलते हैं।

वो क्या जाने दिल समद्र में
कितने लहरों से ख्याल मचलते हैं।

एक संवाद, जो बदल देगा जिन्दगी


धूप की चिड़िया मेरे आँगन में खेल रही थी, और मेरी माँ की उंगलियाँ मेरे बालों में, जो सरसों के तेल से पूरी तरह भीगी हुई थी। इतने में एक व्यक्ति घर के भीतर घुस आया, वो देखने में माँगने वाला लगता था। उसने आते ही कहा "माता जी, कुछ खाने को मिलेगा"। घर कोई आए और भूख चला जाए हो नहीं सकता था। मेरी माँ ने मेरी बहन को कहा "जाओ रसोई से रोटी और सब्जी लाकर दो"। वो रोटी और एक कटोरी में सब्जी डालकर ले आई। उसने खाना खाने के बाद और जाने से पहले कहा "मैं हाथ भी देख लेता हूं"। मेरी माँ ने मेरा हाथ आगे करते हुए कहा "इस लड़के का हाथ देकर कुछ बताओ"। उसने कहा "वो हाथ दो, ये हाथ तो लड़कियाँ दिखाती हैं"। उसने हाथ की लकीरों को गौर से देखा, फिर मेरे माथे की तरफ देखा। दोनों काम पूरे करने के बाद बोला "तुम्हारा बच्चा बहुत बड़ा आदमी बनेगा"। वो ही शब्द कहे, जो हर माँ सुनना चाहती है

पढ़ें : बंद खिड़की के उस पार

उस बात को आज 14 साल हो चले हैं, उस माँ का बेटा बड़ा आदमी तो नहीं बना, लेकिन चतुर चोर बन गया, जो अच्छी चीजों को बिना स्पर्श किए चुरा लेता है। जनाब! लड़कियों के दिल नहीं, बल्कि कुछ अच्छे संदेशवाहक शब्द एवं पंक्तियाँ, ताकि इतर की तरह उनको हवा में फैला सके, और सब उसकी खुशबू का आनंद ले सके। एक चोरी, जो मैंने आज से कुछ साल पहले की थी, लेकिन आज उसको सार्वजनिक करने जा रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि मैं अपने मकसद में कामयाब हूँ। बात है कुछ साल पहले की, जब मैं और मेरी छमकछल्लो दीपावली के मौके शाहरुख खान की फिल्म 'ओम शांति ओम' देखने सिनेमाहाल में गए, फिल्म तो कुछ खास न थी परंतु उस फिल्म में एक संवाद था, जो दिल को छू गया। उसको सुनने के बाद दिल ने कहा "लिखने वाले ने कितनी शिद्दत से लिखा होगा"।

पढ़ें : बसंत पंचमी के बहाने कुछ बातें

वो संवाद था 'हमारी हिन्दी फिल्मों की तरह हमारी जिन्दगी में आखिर तक सब कुछ ठीक हो जाता है, और अगर ऐसा न हो तो समझो फिल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त'। इंसान की आदत है कि वो बुरे वक्त के आते ही घुटने टेक देता है। उस स्थिति के साथ दो चार हाथ करने की क्षमता खो देता है। वो ऐसे उसके सामने हथियार डाल देता है, जैसे युद्ध के मैदान में कोई बुजदिल हमलावर, क्योंकि योद्धा कभी हथियार नहीं डालता। बुरे वक्त में इंसान को लगने लगता है कि अब उसका अच्छा वक्त कभी नहीं आएगा, लेकिन ये गलत धारणा है क्योंकि अगर आपका अच्छा वक्त नहीं रहा तो आपका बुरा वक्त भी चिरस्थायी नहीं है। अगर हमारी जिन्दगी में बुरा वक्त न आए तो हमें दुखों को सहन करने का ढंग नहीं आता, इसलिए जब बुरा वक्त पड़े तो मेरे दोस्तों सोचो फिल्म अभी बाकी है। ये शब्द आपको याद दिलाएंगे कि बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त हमेशा आता है, जैसे कि दिन के बाद रात और रात के बाद दिन।

पढ़ें : जब मुश्किल आई, माँ की दुआ ने बचा लिया

जाते जाते बस इतना ही कहूँगा कि एक दफा अकबर ने बीरबल से कहा कि तुम कुछ ऐसा लिखो, जिसको गम में पढ़े तो खुशी हो और खुशी में पढ़े तो गम हो। बीरबल ने तुरंत लिख दिया "ये वक्त गुजर जाएगा"।

बंद खिड़की के उस पार




करने को कल जब कुछ न था
मन भी अपना खुश न था
जिस ओर कदम चले
उसी तरफ हम चले
रब जाने क्यों
जा खोली खिड़की
जो बरसों से बंद थी
खुलते खिड़की
इक हवा का झोंका आया
संग अपने
समेट वो सारी यादें लाया
दफन थी जो
बंद खिड़की के उस पार
देखते छत्त उसकी
भर आई आँखें
आहों में बदल गई
मेरी सब साँसें
आँखों में रखा था जो
अब तक बचाकर
नीर अपने
एक पल में बह गया
जैसे नींद के टूटते
सब सपने

बसंत पंचमी के बहाने कुछ बातें


चारों ओर कोहरा ही कोहरा...एक कदम दूर खड़े व्यक्ति का चेहरा न पहचाना जाए इतना कोहरा। ठंड बाप रे बाप, रजाई और बंद कमरों में भी शरीर काँपता जाए। फिर भी सुबह के चार बजे हर दिशा से आवाजें आनी शुरू हो जाती..मानो सूर्य निकल आया हो और ठंड व कोहरा डरे हुए कुत्ते की तरह पूंछ टाँगों में लिए हुए भाग गया हो। कुछ ऐसा ही जोश होता है..बसंत पंचमी के दिन पंजाब में। बसंत पंचमी के मौके लोग बिस्तरों से निकल घने कोहरे और धुंध की परवाह किए बगैर सुबह चार बजे छत्तों पर आ जाते हैं, और अपनी गर्म साँसों से वातावरण को गर्म करते हैं।

इस दृश्य को पिछले कई सालों से मिस कर रहा हूं, इस बार बसंत पर पंजाब जाने की तैयारी थी, लेकिन किस्मत में गुजरात की उतरायन लिखी थी, जो गत चौदह जनवरी को गुजरात में मनाकर आया। गुजरात में पहली बार कोई त्यौहार मनाया, जबकि गुजरात से रिश्ता जुड़े तो तीन साल हो गए दोस्तों और पत्नि के कारण। गुजरात में उतरायन पर खूब पतंगबाजी की, पतंगबाजी करते करते शाम तो ऐसा हाल हो गया था कि जैसे ही छत्त से उतर नीचे हाल में पड़े सोफे पर बैठा तो आँख लग गई, पता ही नहीं चला कब नींद आ गई। ऐसा आज से कुछ साल पहले होता था, जब खेतों में मिट्टी से मिट्टी हुआ करते थे। उतरायन के दिन तो फिर भी शानदार सोफा था, लेकिन उन दिनों तो हरे-चारे के ढेर पर ही नींद आ जाती थी, और माँ उठाकर कहती बेटा गर्म पानी बाल्टी में डाल दिया है, जल्दी से नहा ले। खाना बिल्कुल तैयार है और फिर सो जाना।

गुजरात में उतरायन के दिन सब लोगों छत्तों पर थे, लेकिन पंजाब की तरह सुबह चार बजे कोहरे और ठंड को चैलेंज देने छत्तों पर कोई नहीं चढ़ा। गुजरात में पतंगबाजी करने वाले करीबन सात आठ बजे छत्तों पर आए, जबकि महिलाएं स्पेशल खाना तैयार करने के बाद छत्तों पर आई, जबकि पंजाब में सुबह चार बजे तो पतंगबाज छत्तों पर आ जाते हैं, और महिलाएं करीब आठ नौ बजे के आस पास आती हैं, जब नीला आसमां पूरी तरह रंग बिरंगे पतंगों से भर जाता है। एक बार सुबह सुबह मेरी मौसी का बड़ा लड़का छत्त पर चला गया, और पतंगबाजी शुरू कर दी, कोहरा इतना के पतंग एक कदम दूर जाते ही लापता हो जाए। उसने कैसे न कैसे पतंग उड़ा लिया, लेकिन पतंग सामने एक पेड़ में फंस गया जाकर, वो सूर्य उदय होने तक इस लालच में ठुमके तुनके मारता रहा कि उसका पतंग कोहरे की परवाह किए बगैर ही आसमां में उड़ारी मार रहा है। जब सूर्य देव ने थोड़े से दर्शन दिए तो पता चला कि जनाब का पता तो सामने वाले पेड़ की एक डाल में फँस हुआ है। ऐसा कईयों के साथ होता है, लेकिन बताता कोई नहीं।

आप सबको बसंत पंचमी की शुभकामनाएं।

जब मुश्किल आई, माँ की दुआ ने बचा लिया


हैप्पी अभिनंदन में बीएस पाबला


हैप्पी अभिनंदन में आप और मैं हर बार किसी न किसी नए ब्लॉगर से मिलते हैं और जानते हैं उनके दिल की बातें। इस बार हमारे बीच जो ब्लॉगर हस्ती है, वो किसी पहचान की मोहताज तो नहीं, लेकिन सम्मान की हकदार जरूर है। आज किसका जन्मदिन (हिंदी ब्लॉगरों के जनमदिन  ) है और आज कौन सा ब्लॉगर साथी किस अखबार में छाया हुआ है आदि की जानकारी मुहैया करवाने वाली इस ब्लॉगर हस्ती को हम जिन्दगी के मेले, कल की दुनिया, बुखार ब्लॉग, इंटरनेट से आमदनी, पंजाब दी खुशबू आदि ब्लॉगों पर भी अलग अलग रूप में हुए देखते हैं। युवा सोच युवा खयालात की ओर से मेहनती ब्लॉगर 2009 पुरस्कार हासिल करने वाले ब्लॉग प्रिंट मीडिया पर ब्लॉगचर्चा के संचालक बीएस पाबला से हुई ई-मेल के मार्फत एक विशेष बातचीत के मुख्य अंश :-

कुलवंत हैप्पी : आपके बहुत सारे ब्लॉग हैं, आप इनको नियमित अपडेट कैसे कर पाते हैं? क्या आपके पास जादू की छड़ी है?
बीएस पाबला : जादू की छड़ी तो नहीं है, लेकिन जुनून और सनक अवश्य है। जिस तारीख में सोता हूँ, उसी तारीख में उठ भी जाता हूँ और दिन में सोने के लिए तो नहीं जाता बिस्तर पर!

कुलवंत हैप्पी : आप कम्प्यूटर तकनीक में काफी दक्षता रखते हैं, कोई विशेष रुचि के कारण या फिर ऐसे ही सिखते सिखते सीखे?
बीएस पाबला : यह बता दूँ कि मैं कम्प्यूटर तकनीक में दक्ष नहीं हूँ। बस यूँ ही तोड़-फोड़ कर लेता हूँ। जैसे किसी बच्चे को कोई खिलौना मिल जाए तो उसे तोड़ कर देखे कि इसमें आखिर है क्या? रूचि तो बचपन से है ऐसी तकनीकों में।

कुलवंत हैप्पी : आप पत्रकार भी रह चुके हैं, और अब शानदार ब्लॉगर हैं। पत्रकारिता और ब्लॉगिंग दुनिया में से कौन सी दुनिया ज्यादा अच्छी लगी?
बीएस पाबला : निश्चित तौर पर ब्लॉगिंग की दुनिया ज्यादा अच्छी है।

कुलवंत हैप्पी : कौन से अखबार में कौन सा ब्लॉगर छाया हुआ है, कैसे पता लगा लेते हैं और इस ब्लॉग को शुरू करने का ख्याल कहां आया?
बीएस पाबला : बहुतेरे अखबारों के नियमित स्तंभ हैं। उनके ऑनलाईन संस्करण यदि मौजूद हो तो खबर वहाँ से लग जाती है। कई ब्लॉगर साथी भी जानकारियाँ देते रहते हैं। मेरे ब्लॉग जिन्दगी के मेले का जिक्र एक बार हुआ था प्रिंट मीडिया में। उसे तलाशने की मारामारी में ही इस ब्लॉग का ख्याल आया।

कुलवंत हैप्पी : छत्तीसगढ़ में ब्लॉगर्स संगठन बनाने के चर्चे भी सुनने में आ रहे हैं तो आप उसमें कौन सा पद लेने वाले हैं? पाठक जन जानने के लिए उत्सुक है।
बीएस पाबला : बड़े-बुजुर्ग कहते रहे हैं कि जो मजा देने में है वह मज़ा लेने में नहीं। बस इसी बात का खयाल रखता आया हूँ अभी तक। फिर बात चाहे किसी पद की हो या तनाव की :-)

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगर्स के जन्मदिन पर आधारित ब्लॉग आपका शानदार यत्न है, इसका ख्याल कैसे दिमाग में आया?
बीएस पाबला: वास्तविक जीवन में मेरा यह मानना रहा है कि आजकल की आपाधापी वाली दिनचर्या में किसी को उसके महत्वपूर्ण समय पर उचित बधाई देना आपसी संबंधों को प्रगाढ़ करता है। बस इसी भावना को मैं अपने ब्लॉगर साथियों से सांझा करता हूँ।

कुलवंत हैप्पी : आप ज्वलत मुद्दों पर कलम क्यों नहीं घसीटते ? जैसे कि कुछ ब्लॉगर्स करते हैं।
बीएस पाबला : ज्वलंत? माने ज्वलनशील!! भई जो मुद्दा वैसे ही आग लगा देने में सक्षम हो, तो उसकी बात कर होम करते हाथ क्यों जलाऊँ मैं? और वैसे भी मेरा व्यक्तिगत मत है कि केवल लिखने से कुछ नहीं होगा। लिखा तो हमारे पुराणों, ग्रंथों, स्कूल-कॉलेज की किताबों, संविधान में बहुत कुछ गया है। पालन कौन करता है, मानता कौन है

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगर्स कभी कभी आपस में उलझ जाते हैं, ऐसे स्थिति में आपकी क्या राय है?
बीएस पाबला : इसका कारण पूर्वाग्रह हो सकता है या किसी विशिष्ट घटना का प्रभाव। वैसे भी, ऐसे मौकों पर जब बात की जाती है तो उसकी पृष्ठभूमि में, विषय से हटकर, किसी अन्य संदर्भ में, अवचेतन रूख की प्रतिध्वनि ही होती है।

कुलवंत हैप्पी : वो बात, किस्सा एवं अन्य घटना जो दिल के बहुत करीब हो, उसको हमारे साथ शेयर करें।
बीएस पाबला : जिन्दगी के मेले में आते रहिए! जो बीत चुका वह शेयर हो चुका, बाकी भविष्य में होगा।

कुलवंत हैप्पी : आपके ब्लॉग पर बहुत सारे विज्ञापन देखने को मिलते हैं, क्या इनसे आपको कमाई होती है या नहीं।
बीएस पाबला : इसका जवाब बस चार शब्दों में- "इनसे कमाई होती है"

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग में आपके साथ घटी कोई घटना जिससे आपको परेशानी हुई हो?
बीएस पाबला : अभी तक तो ऐसा कुछ नहीं हुआ है।

चक्क दे फट्टे : दैनिक समाचार पत्र में शरद पवार का बयान 'मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूँ' पढ़ने के बाद ज्योतिषी शाम लाल की पत्नि तुरंत बोली 'जी महंगाई कब तक कम हो गई'?। ज्योतिषी शाम लाल ने झुंझलाहट में जवाब दिया 'मैं कोई मंत्री नहीं'।


कोकिला का कुछ करो

कोकिला का कुछ करो


'हम दोनों कितने कमीने हैं' उसने मेरी थाली से एक बर्फी का टुकड़ा उठाते हुए कहा।'वो तो ठीक है कि बेटा तुमको गुजराती आती है, वरना अब लोग चुस्त हो चुके हैं, खासकर आमिर खान की नई फिल्म 'थ्री इडियट्स' देखने के बाद" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा। 'उसमें ऐसा क्या है' उसने उस बर्फी के पीस को अपने मुँह के पास ले जाते हुए पूछा। 'उसमें दिखाया गया है कि कैसे शादी में कोई ऐरा गैरा घुसकर खाने का लुत्फ लेता है, तुमको पता है जब तुम थाली उठा रहे थे तो एक व्यक्ति अपनु को संदिग्ध निगाह से देख रहा था' मैंने चमच से चावल उठाते हुए कहा। 'मुझे पता चल गया था, इसलिए तो मैं गुजराती में बोला था तुमको' उसने पुरी से एक निवाला तोड़ते हुए कहा। 'हम दोनों के पीछे बैग टंगे हुए हैं, ऐसा लगता है कि हम किसी कॉलेज या ट्यूशन से आए हैं, इस हालत में देखकर शक तो होगा ही' मैंने उसको कहा। दोनों दरवाजे के बाहर बनी फर्श की पट्टी पर बैठे मुफ्त के खाने का लुत्फ ले रहे थे, जो जमीं से नौ इंच ऊंची थी। मुफ्त के खाने का लुत्फ लेने के बाद अब बारी थी, नाट्य मंचन देखने की। शनिवार की रात को तो टिंकू टलसानिया एवं वंदना पाठक ने कमाल कर दिया था, लेकिन रविवार की रात को नए कलाकार आने वाले थे। जिनको मैं तो क्या वो गुजराती मानस भी नहीं जानता था, लेकिन फिर विश्वास था कि कुछ अच्छा ही होगा। टिंकू टलसानिया एवं वंदना पाठक का गुजराती नाटक 'जेनू खिस्सा गरम ऐनी सामे सहू नरम' देखने के बाद लगा कि रविवार की रात भी नाट्य मंचन के लेखे लगा देते हैं, अगर कुछ समझ आया तो ठीक, वरना सोच लेंगे कि एक पंजाबी गुजराती समाज में गलती से घुस गया।

'जेनु खिस्सा गरम ऐनी सामे सहू नरम' अर्थात जिसकी जेब गरम उसके सामने सब नरम एक जोरदार कटाक्ष आज के समय पर, सचमुच एक जोरदार कटाक्ष, भले ही इसकी विषय वस्तु पर कई फिल्में बन गई हों विशेषकर बागबाँ, लेकिन इसकी संवाद शैली सोचने पर मजबूर करती थी। टिंकू टलसानिया को टीवी पर तो बहुत देखा, लेकिन शनिवार की रात जो देखा वो अद्भुत था, और वंदना पाठक का अभिनय भी कोई कम न था। कहूँ तो दोनों एक से बढ़कर एक थे। टिंकू टलसानिया और वंदना पाठक का नाटक जहां एक स्वार्थी परिवार का वर्णन करता है, वहीं हेमंत झा, संजय गारोडिया अभिनीत एवं विपुल मेहता द्वारा निर्देशित 'आ कोकिला नूं क्योंक करो' एक दर्पण का काम कर गया।

इस नाटक का संदेश सिर्फ इतना था कि सब कुछ तुम्हारे पास है, लेकिन फिर भी तुम उसकी तलाश इधर उधर भटकते रहते हो, जैसे जंगल में हिरण। जिसकी वजह से हम खुद को पहचान ही नहीं पाते। सच में हकीकत है। प्रतिभा और सुंदरता सबके भीतर है, लेकिन उसको जानने की क्षमता हम अन्य वस्तुओं पर खर्च कर देते हैं और जिन्दगी को बोझ समझकर उस बोझ के तले खुद को दबाकर धीरे धीरे आत्महत्या कर लेते हैं। हम सब आत्महत्या ही करते हैं, सच में फर्क इतना है कि हम धीरे धीरे करते हैं, कुछ लोग एक पल में आत्महत्या कर लेते हैं।

'कोकिला' एक ऐसी लड़की है, जो दो भाईयों और एक पिता के स्नेह की छाँव तले पली, और तो और उसकी भाभी ने उसको कभी रसोई नहीं जाने दिया। बस कोकिला के हिस्से आई तो पूरा दिन खेलकूद, इस खेलकूद में वो भूल गई कि उसको एक दिन ससुराल जाना है, वहां जाने के लिए उसका लड़कों सा व्यवहार बदलना होगा। खेलकूद में मस्त कोकिला लड़की होकर भी लड़कियोँ सी न हो सकी, जो भी लड़का उसको देखे, और न बोल जाए। एक तो कोकिला का व्यवहार लड़कों जैसा हो गया और दूसरा उसकी कुंडली में मंगल। ऐसे में परिवार की दिक्कत और बढ़ गई। लड़के आएं और जाएं। कोकिला का पूरा परिवार दुख में पड़ जाता है, लेकिन इस दौरान उनके घर एक ड्रीममेकर आता था, जिसकी फीस दस हजार रुपए प्रति समस्या, बशर्ते अगर समस्या हल न हो तो दस गुना वापिस। दुनिया पैसे के लिए कुछ भी कर लेती है, घरवालों ने सोचा कि जाएंगे तो दस हजार, लेकिन अगर समस्या हल न हुई तो आएंगे एक लाख। ड्रीममेकर कहाँ हारने वाला था, वो तो आईना दिखाने का काम ही तो करता था। अंत में सब समस्या हल हो जाती हैं, लेकिन एक समस्या खुद ड्रीममेकर के सामने आकर खड़ी हो जाती है। उस समस्या का हल जानने के लिए अगर मौका मिले तो एक बार गुजराती नाटक आ कोकिला नु क्योंक करो जरूर देखें।

प्रेम की परिभाषा

"अगर मैं तुम्हें फोन न कर सकूँ समय पर, या फिर समय पर फोन न उठा सकूँ, तो तुम बुरा मत मनाना, और कुछ भी मत सोचना। अगर सोचना हो तो बस इतना सोचना कि मैं किसी काम में व्यस्त हूँ।" फोन पर उसने महोदयजी के कुछ कहने से पहले ही सफाई देते हुए कह दिया। अब अगर गिला करने की इच्छा भी हो, तो गिला न कर सकोगे।


इतना सुनते ही महोदयजी शुरू पड़ गए, 'तुमसे कई सालों तक बात न करूँ या हररोज करूँ, मुझे उसमें दूर दूर तक कोई फर्क दिखाई ही नहीं पड़ता। आज तुमसे ढेर सारी बातें कर रहा हूँ, आज भी तुम मेरे लिए वो ही हो, जो तुम पहले हुआ करती थी, जब  मेरे पास तेरा मोबाइल नम्बर भी न था।'

मेरा पतंगवा



चले पवन
छूए गगन
मेरा पतंगवा
(पतंगवा-पतंग)

हैप्पी अभिनंदन में अविनाश वाचस्पति


 आज जिस ब्लॉगर से आप रूबरू होने जा रहे हैं, वो हस्ती फ़िल्म समारोह निदेशालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली में कार्यरत तो है, लेकिन हमारी और उनकी मुलाकात हमेशा तेताला, बगीची, अविनाश वाचस्पति, झकाझक टाइम्स, नुक्कड़, पिताजी के अलावा भी कई जगहों पर हो जाती है। हरियाणवी फ़ीचर फ़िल्मों 'गुलाबो', 'छोटी साली' और 'ज़र, जोरू और ज़मीन' में प्रचार और जन-संपर्क तथा नेत्रदान पर बनी हिंदी टेली फ़िल्म 'ज्योति संकल्प' में सहायक निर्देशक रह चुके अविनाशजी को काव्य से इतना लगाव है कि टिप्पणी रूप में भी काव्य ही लिखते हैं और कविता अपने विभिन्‍न रूपों यथा गीत, गाना के माध्‍यम से जन-जन को सदा से लुभाती रही है।

कल+आज= सुनहरा भविष्य


कुछ लोगों को आपने अतीत से नफरत होती है, क्योंकि वह सोचते हैं कि अतीत को देखने से उनको उनका बीता हुआ बुरा कल याद आ जाएगा, किंतु मेरी मानो तो अतीत को इंसान नहीं संवार सकता परंतु अतीत इंसान को सीख देकर उसके आने वाले कल को जरूर सुधार सकता है।

आपने अकसर सुना या पढ़ा होगा कि उसने इस सफलता के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा, ये बहुत गलत बात होती है, लिखने वाले और सुनाने वाले को क्या पता उसने अपने हर लम्हे में अतीत को याद किया या नहीं, उसके मन में लिखते या सुनाते समय जो आया उसने लिख और सुनाया दिया, लेकिन खरा सच तो ये है कि सफल इंसान हमेशा आपने अतीत से कुछ न कुछ सीखते हुए सफलता की ओर कदम बढ़ता है। इस कहावत को मैंने तो जन्म न दिया कि 'दूध का जला, छाछ फूंक कर पीता है'। दूध का जला अतीत है, उसको पता चल गया कि दूध गर्म होगा तो मुँह फिर जलेगा। ये वाला अतीत उसका अनुभव हो गया, उसके लिए भविष्य में काम आ रहा है। अतीत में जो हुआ वो अनुभव ही होता, बस उससे कुछ सीखने की जरूरत है। जैसे कि हम जब एक बार पत्थर से ठोकर खाकर गिरते हैं तो दूसरी बार ध्यान से चलते हुए आगे बढ़ते है, हमें पता है कि जब हम गिरे थे तो वह क्षण हमारे लिए कितना बुरा था, मगर सोचो उसने हमें ध्यान से चलना तो सिखाया, इसलिए अतीत को याद रखना बहुत अच्छा है क्योंकि वह आपको भविष्य के लिए सुचेत करता है।

जो लोग अतीत को याद नहीं करते वो बार बार गलतियाँ करते हैं और पछ्ताते हैं, शायद 1947 के विभाजन की बात तो सबको याद होगी, जिनको वो कतलेआम और लहू से लथपथ लाशें जमीं पर पड़ी हुई याद न थी, वे लोग ही 1984, 1993 जैसे घटनाक्रम को अंजाम देते हैं, अगर उनको 1947 वाला कतलेआम याद होता, उस कतलेआम में बेटों की लाशों पर चीखती माताओं की चीख पुकार याद होती, सुहागनों की टूटती चूड़ियों की आवाज याद होती तो वे लोग उसको दूसरी बार न दोहराते, उन लोगों के दिमाग में महज बदले की आग थी, जिसमें वह खुद तो जले ही कुछ मासूमों को भी जला दिया, अगर वो सोचते कि उस कतलेआम में जब उनके माता पिता या भाई बहन जले होंगे तो तब उन पर या उनके अन्य परिजनों पर क्या गुजरी होगी, क्या पता वो ये सोचकर आपने अंदर के शैतान को मारकर प्यार के रंग में रंग जाते. इसलिए अतीत देखो वो तुम्हारा आइना है।

जिन्दादिली



रोते हुए चेहरे बिकते नहीं
दुनिया के बाज़ार में
क्योंकि जिन्दादिली जीने का नाम है

हो सके तो बचाओ दमन अपना
बदनामी की आंच से
चूंकि यहां बद से बुरा बदनाम है

सोचो मत, मंजिल की तरफ बढ़ो
चढ़ते की टांग खींचना तो,
यहां लोगों का काम है

हर कोई अपने घर में राजा
किसी के पास अल्लाह,
तो किसी के पास राम है

नई दुनिया में कुलवंत हैप्पी

नई दुनिया में कुलवंत हैप्पी

रक्तरंजित लोकतंत्र मेरे देश का।



बहुत छेद हैं
तन पे, मन पे
टुकड़ों में बिखरा कराह रहा है

रक्तरंजित लोकतंत्र मेरे देश का।
आओ युवाओं तुम्हें बुला रहा है।

बे-आबरू हुई औरतों सा
बे-लिबास है
उदास है
अपनी बेबसी पे अश्क बहा रहा है।
रक्तरंजित लोकतंत्र मेरे देश का।
आओ युवाओं तुम्हें बुला रहा है।


देख रहा है रास्ता,
कोई आए, ढके मेरे तन को
लिए मन में चाह
रक्तरंजित लोकतंत्र मेरे देश का।
आओ युवाओं तुम्हें बुला रहा है।


मत बनो पितामा युवाओ
सच देखो, आगे आओ
सोया अंदर युवा जगाओ
 ऊँची उँची आवाज लगा रहा है
रक्तरंजित लोकतंत्र मेरे देश का
आओ युवाओं तुम्हें बुला रहा है।

टीम वर्क मीन्स मोर वी एंड लैस मी

आज बात करते हैं एक और चोरी की, जो मैंने एक इंदौर के टीआई स्थित गिफ्ट शॉप में से की। बात है उस दिन की, जब मैं और मेरी छमक छल्लो घूमने के लिए घर से निकले और चलते चलते स्थानीय टीआई पहुंच गए, टीआई मतलब इंदौर का सबसे बड़ा मॉल। मेरी छमक छल्लो की नजर वहां एक गिफ्ट शॉप पर पड़ी, मेरी चोरी करने की कोई मंशा नहीं थी और नाहीं कोई गिफ्ट शिफ्ट खरीदने की, बस उसके साथ ऐसे ही चल दिया।

जैसे हम दुकान के अंदर गए तो वहां पर बहुत सारे सुन्दर सुन्दर गिफ्ट पड़े हुए थे, जिनको देखकर हर इंसान की आंखें भ्रमित हो जाती और दिल ललचा जाता है। मैं भी अन्य लोगों की तरह हर गिफ्ट को बड़ी गंभीरता से देख रहा था परंतु इसी दौरान मेरी नज़र एक बड़े कॉफी पीने वाले कप पर गई, मैंने उस कप को नहीं चुराया बल्कि उसके ऊपर लिखी एक पंक्ति को चुरा लिया। वो पंक्ति 'टीम वर्क मीन्स मोर वी एंड लैस मी' ये थी।

दुकान में गिफ्ट देख रही मेरी छमक छल्लो को मैंने पास बुलाया और कहा कि इस पंक्ति को पढ़कर सुनना, उसने पढ़ा और मुस्करा दिया क्योंकि वह जानती है कि मैं जानबुझकर उसको इस तरह के अच्छे संदेशवाहक वाक्य को पढ़ने को कहता हूं। दरअसल, मैंने भी जानबुझकर उसको पढ़ाया था क्योंकि जब हम किसी कार्यालय काम करते हैं तो वहां टीम वर्क स्थापित करने की काफी जरूरत होती है और ऐसे में इस तरह के वाक्य स्थिति को समझ के लिए काफी फायदेमंद साबित होते हैं।

अगर हम टीम वर्क में यकीन नहीं करते तो हम दुखी होते हैं, पता है क्यों, क्योंकि हम आपने काम की तुलना अन्य साथी जनों से करने लग जाते हैं, जिसके चलते हमारे अंदर गलत ख्याल जन्म लेने लगते हैं। इसके चलते काम पर असर पड़ता है, इसलिए टीम वर्क पर ही विश्वास करके चलो क्योंकि तुम या मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता, अगर ऐसा होता तो हम किसी कंपनी में काम न कर रहे होते और हम अपने कारोबार में भी अन्य कर्मचारी न रखते। तुम किसी और को देखकर खुद की क्षमता को कम मत करो क्योंकि तुम्हारा काम तुम्हारी जिन्दगी संवारेगा और दूसरे काम का उसकी जिन्दगी। हो सके तो अपने साथी को साथ लेकर आगे बढ़ने की कोशिश करो, क्या पता वह आपके प्रोत्साहन से काम करने लग जाए।

मैं टीम वर्क पर विश्वास करता हूं, पिछले दिनों मेरी टीम किसी निजी मतभेद के चलते टूट गई थी परंतु मैं फिर से उसको पटरी पर लाने के लिए संघर्षशील हो गया, इस दौरान मेरा साथ किसी और ने नहीं बल्कि ओम शांति ओम के संवाद फिल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त ने दिया। इस संवाद ने मुझे बताया कि कोई बात नहीं तुम लगे रहो, जल्द ही अच्छा वक्त आएगा और वह आया।

नोट : इस लेख को बहुत पहले लिखा गया था, लेकिन युवा सोच युवा खयालात पर पहली बार प्रकाशित हो रहा है।

दोषी कौन औरत या मर्द?

जब श्री राम ने सीता मैया को धोबी के कहने पर घर से बाहर निकल दिया, तब सीता रूप में चुप थी औरत। जब जीसस को प्रभु मान लिया गया, और मरियम को कुछ ईसाईयों ने पूजने लायक न समझा, तब मरियम रूप में चुप थी औरत। मुस्लिम समुदाय ने औरतों को पर्दे में रहने का हुक्म दे दिया, तब मुलिस्म महिला के रूप में चुप थी औरत। बस औरत का इतना ही कसूर है। अगर वो तब सहन न करती तो आज कोई विवाद न होता, और आजादी की बात न आती।

कल एक महोदय का लेख पढ़ा, जिसमें लिखा था कि महिलाओं का कम कपड़े पहनकर निकलना छेड़खानी को आमंत्रित करना है। जैसे ही लेख पढ़ा दिमाग खराब हो उठा। समझ नहीं आया कि आखिर लिखने वाला किस युग का युवा है। एक ही पल में औरत पर पाबंदी लगा रहा है, जैसे आज भी औरत इसकी दासी हो। ऐसे लोग हमेशा सिक्के का एक पहलू देखते हैं, और शुरू कर देते हैं सलाह देना।

बड़े बड़े कुछेक साधू संत महात्माओं ने अपने निकट महिलाओं को नहीं आने दिया, इसका मतलब ये मत समझो कि वो महान थे। इसलिए उन्होंने ऐसा किया, बल्कि सत्य तो ये है कि वो औरत का सामना कर ही न सकते थे, औरत को देखते ही उनका मन कहीं डोल न जाए, इसलिए वो औरत से दूर रहते थे। सन्यासी जंगल तप के लिए क्यों जाता है, वो औरत की छवि को दिमाग से निकालने के लिए, लेकिन वो ऐसा कर पाने में हमेशा असफल होता है। वो जब तक औरत से दूर है, तब तक वो ठीक है, लेकिन जब वो औरत के सामने आता है तो खुद को संभाल भी नहीं पाता। तुम औरत को दोष मत दो। तुम अपने भीतर काम के बीज को खत्म ही नहीं कर सकते, इसलिए औरत को देखते ही तिलमिलाना शुरू कर देते हो। और फिर सारा दोष औरत के सिर पर मढ़ा देना तो सब अच्छी तरह जानते हैं। वो बुरी कैसे हो सकती है, जिसने पीरों पैगम्बरों संत महात्माओं को जन्म दिया हो।

कम कपड़े पहनकर लड़कियाँ इसलिए नहीं निकलती कि आते जाते लड़के उन पर फब्तियां कसें, बल्कि वो इसलिए पहनती हैं कि आज उसका चलन है। असल में परिवर्तन जीवन का नियम है, और इस बदलाव को समय के साथ स्वीकार करना सीखना होगा। क्या आज भी हम कच्चे मकानों में रहते हैं? क्या आज भी हमारे घर दीयों की रौशनी से जगमगाते हैं? क्या आज भी हम चूल्हे पर बनी हुई रोटी खाते हैं? क्या आज भी मर्द पहले की तरह स्वदेशी कपड़े पहनते हैं? अगर सबका जवाब नहीं है तो औरत पर ये सब क्यों थोपा जाए। उसकी कोख से जनने वाले उसी पर पाबंदी क्यों लगाते हैं?

अगर कोई लड़की कम कपड़े पहनकर निकलती है और कोई लड़का कमेंट्स करता है तो उसके लिए लड़की नहीं बल्कि लड़का जिम्मेदार है। वो दोषी है। उसके भीतर का काम जाग उठा है। अगर मर्द खुद को दोषमुक्त करना चाहता है तो खुद को ऐसा कर ले, कि अगर औरत मर्दों की तरह कपड़े उतार कर भी घूमे तो उसको कोई फर्क न पड़े। एक और सवाल जब कभी बहन या भाभी बच्चे को दूध पिला रही होती है, क्या तब वैसा ख्याल दिमाग में आता है, जैसा कि वैसी ही अवस्था में बैठी किसी अन्य महिला को देखकर आता है।

अंत में कुछ सवाल करता हुआ मैं उस युवक की बात मान लेता हूं, अगर महिला पर्दे में भी रहेगी तो क्या पुरुष की नजरें, उसकी कमर के ठुमकों पर आकर नहीं अटकेगी? क्या उसकी उभरी हुई छाती पर जाकर नहीं अटकेंगी। अगर तुम्हारा उत्तर है कि "हाँ अटकेंगी" है, तो अब क्या इन दोनों चीजों को औरत के शरीर अलग कर देना चाहिए। बोलो क्या करें? दोष किसका है?

क्या हो पाएगा मेरा देश साक्षर ऐसे में?

हिन्दुस्तान में गाँवों को देश की रूह कहा जाता है, लेकिन उस रूह की तरफ कोई देखने के लिए तैयार नहीं। देश की उस रूह में रहने वाले किसान सरकार की अनदेखियों का शिकार होकर आत्महत्याएं कर रहे हैं और बच्चे अपने अधूरे ख्वाबों के साथ अपनी जिन्दगी का सफर खत्म कर देते हैं। देश के पूर्व राष्ट्रपति श्री कलाम 2020 तक सुनहरे भारत का सपना देखते हैं, वैसे ही जैसे कि 1986 के बाद से क्रिकेट प्रेमी विश्वकप जीतने का सपना देख रहे हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत विश्व के नक्शे पर अपनी अनोखी पहचान बना रहा है, इसमें शक भी कैसा? चीन के बाद जनसंख्या में भारत का नाम ही आता है। जहां जनसंख्या होगी, वहां बाजार तो होगा ही और कोई बनिया अपने ग्राहक को बुरा भलां कैसे कहेगा? श्री सिंह जी विश्व के नक्शे से नजर हटाते हुए आप भारत के नक्शे पर नजर डालिए, उस नक्शे के भीतर जाते हुए देश की रूह पर नजर दौड़ाईए, जहां देश के लिए अनाज पैदा करने वाला व्यक्ति एक वक्त भूखा सोता है। जहां पर बच्चों में प्रतिभाएं तो हैं, लेकिन उनको निखारने के लिए सुविधाएं नहीं। जहां गरीबी का अजगर उनके सपनों को आए दिन निगल जाता है। कभी जाकर देखो देश की रूह के भीतर जहां स्कूल केवल चारदीवारी बनकर रह गए हैं, टीचरों का नामोनिशान तक नहीं। कैसी है देश की शिक्षा प्रणाली कि गांव से पढ़कर निकला हुआ टीचर किसी गाँव के स्कूल में पढ़ाना ही पसंद नहीं करता। मुझे याद है जब एक बार पंजाबी की टीचर ने अपनी बदली किसी दूसरी जगह करवा ली थी, और उसकी जगह एक नए टीचर को हमारे स्कूल में तैनात किया गया था, लेकिन हुआ क्या, वो टीचर कभी स्कूल आया ही नहीं और छ: महीनों के भीतर अपनी ऊंची पहुंच के चलते उसने अपनी बदली कहीं दूसरी जगह करवा ली। रूह को मैं जड़ कहता हूं, अगर वो जड़ ही कमजोर हो गई तो किसी पेड़ का खड़े रहना असंभव है। देश की घटिया शिक्षा प्रणाली का एक और किस्सा, चार पांच गांव में एक स्कूल जो बारहवीं तक है। वहां दाखिला लेने पहुंचे तो स्वेटर बुन रही कुछ महिला टीचरों ने कहा, तुम किसी और स्कूल में दाखिला क्यों नहीं ले लेते? यहां अच्छी पढ़ाई नहीं होती। हो सके तो तुम लोग मंडी में किसी प्राईवेट स्कूल में दाखिला ले लो। क्या बात है! जिस स्कूल में टीचर ही ऐसे होंगे, तो बच्चों का भविष्य क्या होगा आप सोच सकते हैं। उस स्कूल में एक ही टीचर काम का था, जो कभी किताब देखकर नहीं पढ़ाता था, उसका मानना था जिन्दगी में कभी रट्टा मत मारो। अगर रट्टा मारोगे तो तुम जिन्दगी के असली अध्याय को कभी समझ न पाओगे। बस वो ही एक अकेला टीचर था, जो बिना किताब के पढ़ाता, बाकी टीचर तो आँख मूंदकर पढ़ाते थे, एक बच्चा ऊंची ऊंची पढ़ता और बाकी सब किताबों पर निगाहें टिका लेते। कोई सवाल जवाब नहीं, बस पढ़ते जाओ समझ आए चाहे न। क्या ऐसी शिक्षा प्रणाली देश को किसी सफलता की तरफ लेकर जा सकती है। देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं, कहते हर किसी को सुनता हूँ, लेकिन वो प्रतिभाएं आखिर हैं कहाँ? गरीब का अजगर, सरकार की लोक विरोधी नीतियाँ उन प्रतिभाओं को उभरने से पहले ही मार देती हैं। शिक्षा नीति में सुधार करना है तो पहले देश की रूह यानि गाँवों के स्कूलों को सुधारो। शहरी अभिभावक नम्बरों के खेल में उलझकर रह गए और गांव के गरीब अपने बच्चों को हस्ताक्षर करने योग्य ही कर पाते हैं?

पंजाबी है जुबाँ मेरी, शेयर-ओ-शायरी

पंजाबी है जुबाँ मेरी, शेयर-ओ-शायरी

(1)
पंजाबी है जुबाँ मेरी,
लेकिन हिन्दी भी बोलता हूँ।
बनाता हूँ शरबत-ए-काव्य जब
ऊर्दू की शक्कर घोलता हूँ॥

(2)
मैं वो बीच समुद्र
एक तूफाँ ढूँढता हूँ।
हूँ जन्मजात पागल
तभी इंसाँ ढूँढता हूँ॥

(3)
गूँगा, बहरा व अन्धा
है कानून मेरे देश का।
फिर भी चाहिए इंसाफ
देख जुनून मेरे देश का।

(4)
खिलते हुए गुलाबों से प्यार है तुमको
काँटों से भरी जिन्दगी में
तुम आकर क्या करोगी।

देता नहीं जमाना तुमको आजादी जब
फिर इन आँखों में सुनहरे ख्वाब
सजा क्या करोगी।

'हैप्पी अभिनंदन' में समीर लाल "समीर"


जिस शख्सियत से आप आज रूबरू होने जा रहे हैं, वो शख्सियत उन लोगों के लिए किसी प्रेरणास्रोत से कम न होगी, जो लकीर के फकीर हुए फिरते हैं। भगवान ने हर व्यक्ति को किसी न किसी कला से नवाजा है, लेकिन लकीर के फकीर हुए लोग उस हुनर एवं कला को बाहर निकालने के चक्कर में जिन्दगी का असली स्वाद खो बैठते हैं। दुनिया में हमेशा ही दो तरह के लोग पाए जाते हैं, एक तो जिनकी बात मैंने ऊपर की, और दूसरे समीर लाल 'समीर' जैसे, जो शौक के कारण अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी बर्बाद नहीं करते, और रोजमर्रा की जिन्दगी को पटड़ी पर लाने के बाद शौक को नया आयाम देते हैं। आपको यकीन न हो शायद कि अपनी लेखनी के कारण तरकश सम्मान 2006, बेस्ट इंडिकाब्लॉग (हिन्दी) 2006, वाशिंगटन हिन्दी समिति की ओर साहित्य गौरव, शिवना सारस्वत सम्मान, पुरस्कार ब्लॉग ऑफ दी मन्थ फाऊंडेशन नवम्बर 2009, ताऊ डॉट कॉम के पहेली पुरस्कार एवं युवा सोच युवा खयालात द्वारा  स्थापित वर्ष 2009 हरमन प्यारा ब्लॉगर पुरस्कार पा चुके समीर लाल 'समीर' असल जिन्दगी में भारत से चार्टड एकाउन्टेन्ट, अमरीका से सी एम ए (CMA), अमरीका से प्रोजेक्ट मैनेजमेन्ट प्रोफेशनल (PMP), माईक्रोसॉफ्ट सर्टिफाईड एमएस एक्सेल एक्सपर्ट, कनाडा से अनेक शेयर बाजार संबंधित सर्टिफीकेशन से साथ प्रोफेशन फाईनेशियल प्लानर करने के बाद कनाडा की सबसे बड़ी बैंक से साथ तकनीकी सलाहकार के तौर पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा इनके डॉट नेट तकनीकी पर तकनीकी आलेख अनेकों पेपरों में प्रकाशित होते हैं. तकनीकी पत्रिकाओं के लिए नियमित लेखन जारी है।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग का नाम उड़नतश्तरी रखा जाए, ये विचार कब और कैसे दिमाग में आया?
उत्तर :-जब मार्च २००६ में अपना ब्लॉग बनाया तब बस, एक सोच थी कि जो भी ख्याल दिमाग में उभरेंगे, उन्हें जस का तस इस माध्यम पर रख दूँगा और फिर ख्यालों की उड़ान, उसका तो कोई ओर छोर होता नहीं तो कुछ अजूबा ही सही और मन में कौंधा-उड़न तश्तरी. बस, नामकरण हो गया. वैसे अगर मैं इसका नाम चाँद रखता तो आपके सवाल के जबाब में कविता सुनाने का मौका हाथ लग जाता. किसी भी कविमना को इससे ज्यादा क्या चाहिए :)

कुलवंत हैप्पी : "कविता लिखी, उनकी नासमझी, कहानी लगी" ये हायकू कैसे बनी, इसके पीछे का रहस्य क्या है?
समीर : अग्रज ने सलाह दी थी कि कविता मन के भाव हैं, जो मन को अच्छा लगे वो लिखो और पढने वालों को पसन्द आ जाए तो बोनस. बस हमने भी ठान ली कि अब कविता लिखेंगे. उस रोज शाम को स्नान ध्यान करके माँ सरस्वती की आगे दो अगरबत्ती जलाई और कविता लिखने बैठ गए. तीन घंटे मशक्कत की, ढेरों कविताओं की साईट पर जा जा कर कठिन कठिन शब्द बटोरे, आपस में उनके ताने बाने बुने और बस कविता तैयार की और भेज दी एक पत्रिका में छपने. संपादक या तो बिल्कुल फुरसतिया थे या एकदम प्राम्पट. तुरंत जवाब आ गया संपादक जी की टिप्पणी के साथ. लिखा था, " आपकी कहानी पढ़ी, मगर एसा प्रतीत होता है कि कहानी का अंत पृष्ठ भूमि से भटक गया है. लघु कथाओं की सारगर्भिता लेखक की सजगता पर आधारित होती है. सजगता के साथ लिखने का प्रयास करें. शुभकामनाओं सहित-"सर्वप्रथम तो मुझे यह नहीं समझ आया कि मैंने तो कविता लिखी थी उसे संपादक जी ने कहानी कैसे मान लिया और वो भी लघु कथा. दूसरा, मैंने तो लिखते वक्त कोई पृष्ठ भूमि ही नही बनाई तो मै भटका काहे से. यहीं से जन्म हुआ हायकू
कविता लिखी
उनकी नासमझी
कहानी लगी.

कुलवंत हैप्पी : आप समीर लाल 'प्रेमी' से समीर लाल 'समीर' कैसे बने?
समीर : उसी मोड़ पर जहाँ हर प्रेमी आदमी बन जाता है यानि विवाहोपरांत. :) यकीन जानो, न शादी होती न हमारा प्यारा उपनाम प्रेमी स्वर्गवासी होता. आज आप किसी और का ही इन्टरव्यू ले रहे होते, हाय!!

कुलवंत हैप्पी : आपके विल्स कार्ड पर लिखे शेर हिट हुए, अब कौन सी सिगरेट चलती है विल्स या कोई अन्य?
समीर : माँ जनवरी, २००५ में गई. हर वक्त उसकी एक ही मांग होती थी कि मैं सिगरेट पीना छोड़ दूँ. बस, तो सिगरेट उसके साथ ही चली गई. तब से आज तक, लगभग ५ साल होने को आये, कभी सिगरेट की तरफ मुड़ कर नहीं देखा. विल्स कार्ड बस पुरानी यादें हैं, जिन गलियों एं मैं अब जाता नहीं, के प्रतीक!! मुझे लगता है कि जिस तरह मेरे विल्स कार्ड युवा वर्ग से ले हर वर्ग में पसंद किये जा रहे हैं और रेडियो मिष्टी सिक्किम से उनका नियमित प्रसारण हो रहा है, मुझे भी एक संवेधानिक चेतावनी हर नये अंक के साथ लिख देना चाहिये, जस्ट बतौर सुरक्षा कवच के लिए.

वैसे तो वो शेर हैं भी नहीं और उनके लिए मेरी कुछ ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं:
जब जब भी मैंने
अपने दिल की बात को
किसी कागज पर उतारा है....
न जाने क्यूँ...
लोगों ने..
उसे कविता कह कर पुकारा है!!!

कुलवंत हैप्पी : अगले काव्य संग्रह का नाम विल्स कार्ड रखेंगे या कुछ और?
समीर :- अव्वल तो अगला संग्रह कहानियों का आ रहा है जल्द ही शायद इसी जून तक किन्तु इन विल्स कार्डों को ले एक गद्य और पद्य का संमिश्रण करते हुए सीडी निकालने के योजना पर कार्य चल रहा है. देखिये, योजना कब मूर्त रूप लेती है मगर जल्दी ही लाने की फिराक में हूँ. सुना है २०१२ में दुनिया खत्म होने वाली है, तो उसके पहले एकाध साल तो कम से कम से लोग सुन लें.

कुलवंत हैप्पी : "मैं एक हारा हुआ योद्धा हूँ" जब आपने इस लेख को लिखा, क्या आप उन दिनों किसी खास वजह से परेशान थे ?
समीर : कई दिनों से मिस करते करते, सहते सहते जब मिसिंग समेटने की और सहनशक्ति सीमा के बाहर हो जाती, तब ऐसा विस्फोट होता है. ऐसा ही कुछ हुआ था. मेरी जिन्दगी की खुली किताब के वो ही कुछ आपस में चिपके पन्ने हैं, जिन्हें मैं उधेड़ कर न पढ़ना और न ही पढ़वाना चाहता हूँ. आप तो मेरे चेहरे की मुस्कान देखो, कहीं कोई कमी नजर आये तो बताना. तुरंत डेन्टिंग पेन्टिंग करवाई जायेगी, वादा. :)

कुलवंत हैप्पी : भारत छोड़कर विदेश जाने का संयोग कैसे हुआ और मीठी जेल कैसी लगती है?
समीर : सन 1999 में बेटे दोनों 12वीं कर चुके थे. इच्छा थी कि वो कनाडा आकर विश्वविद्यालय की पढ़ाई करें. इसके पूर्व भी घूमने कनाडा कई बार आना हुआ था. बड़ा मजा आता है और उस समय तो उम्र से भी काबिल थे. बहुत से मित्र यहाँ थे. बस, मचल उठे चमक दमक देख और आड़ अच्छी और सभ्य थी कि बच्चों के कैरियर का सवाल है मगर ज्यादा कुछ तो अपने मन की दबी चाह ही रही होगी कि वहाँ भी किस्मत आजमाई जाए, रह कर देखा जाए, यहाँ ले आई. आने के बाद वैसा ही यथार्थ दर्शन हुआ जैसा प्रेम के बाद विवाह करके होता है. तब जिन्दगी की असल आपाधापी आपको धरातल दिखाती है. घूमने आते थे तो बात अलग थी, बस घूमना और मस्ती छानना. अब तो काम भी करना होता था. नौकरी बजाने से लेकर बरफ साफ करते दिन में ही वो चमकीले तारे दिखने लग गए जो घसीट कर हमें यहाँ लाए थे. वापस लौटने की राह न थी. क्या मूँह दिखाते तो बस, नौकरी में लगे रहे और वाकई जो आड़ थी वो उद्देश्य बन गया. बच्चे पढ़ लिख कर कायदे की नौकरी और व्यापार में लगे. अब हम जुगाड़ में लगे हैं कि कैसे भारत लौट जाएं पूरे से, मगर सुविधाओं की जंजीरें बड़ी मोटी और मजबूत होती हैं, काटते काटते ही कटेंगी. हम तो झटका मार कर जंजीर तोड़ कर भाग भी निकले, लेकिन पत्नी के तो पैर भी नाजुक हैं, कहीं बेचारी मोच न खा जाए इसलिए धीरे धीरे जंजीर के कटकर अलग होने का दिवा स्वपन पाले जिए जा रहे हैं. हर बार भारत जाते हैं, हालात, दुर्दशा, बिजली पानी की जूझन, ट्रेफिक का बुरा हाल, रोज रोज की जहमतें झेल कर जब वापस आते हैं तो इन जंजीरों को और मजबूत होता देखते हैं. कभी तो हालात बेहतर होंगे और यह जंजीरें कमजोर. देखिए, कब सपना साकार होता है.

कुलवंत हैप्पी- आप पिछले चार सालों से निरंतर लगे हुए हैं, आज सबसे बड़े ब्लॉगर भी हैं, फिर भी टिप्पणी देने से गुरेज नहीं करते अन्य बड़े ब्लॉगरों की भांति क्यों?
समीर : इस प्रश्न का जबाब प्रश्न के हिज्जे करके देता हूँ. :) चार साल से लगे हुए हैं-मगर उतना सीरियस नहीं थे इसलिये शरीर से सबसे बड़े ब्लॉगर बन गए. वाकई और कोई इतना बड़ा, ब्लॉगजगत में अभी तक तो नहीं टकराया. अब सीरियस हुए हैं, रोज सुबह टहलने जाते हैं. रामदेव बाबा से शरण मांगी हुई है. ट्रेड मिल खरीद लाये हैं. इस वर्ष खाने का बजट घटा कर ७५% कर दिया है जबकि खाद्य सामग्री की कीमतें ३० % बढ़ी हैं, आप समझ सकते हैं. इन उपायों से आशा ही नहीं पूर्व वर्षों की भांति पूर्ण विश्वास है कि वर्षांत तक आपको हमें सबसे बड़ा ब्लॉगर कहने का मौका नहीं मिलेगा.

हाँ, आपकी सोच सही है कि भारी भरकम शरीर लेकर चल, उठ बैठ ले रहे हैं, उतना ही काफी है उस पर से टिप्पणी देना-वाकई बहादुरी का काम है. जब दुबला हो जाऊँगा और सबसे बड़ा वाला ब्लॉगर नहीं रहूँगा, तब तो और ज्यादा टिप्पणी कर पाऊँगा. उर्जा और स्फूर्ति दोनों ज्यादा होगी. वैसे हमारी सबसे बड़े ब्लॉगर होने की पदवी कई बार कुछ लोगों का बढ़ता घेरा यानि शरीर देख लुट जाने से घबराती है. आप तो समझदार पाठक हो, समझ ही गए होंगे. मगर टिप्पणी जिसे मैं प्रोत्साहन का स्वरुप ज्यादा मानता हूँ, वो जारी रहेगा शायद कोई ज्यादा मोटा हो जाए तो हम सबसे बड़े न रह जाए, इसी उद्देश्य से लगे हैं. बचपन में एक डाकूमेन्ट्री आया करती थी जिसमें कई छोटी छोटी मछलियाँ मिलकर बड़ी मछली बनकर चला करती थी, और वाकई वाली बड़ी मछली डरकर छिप जाती थी. बस, उसी तरह की साजिश से डरता हूँ जो रोज दिखती है. :)

कुलवंत हैप्पी : जिन्दगी का कोई ऐसा पल जो हम सब के साथ बांटना चाहते हों?
समीर : जिन्दगी का हर वो पल, जो मेरी मुस्कान का सबब बनता है, उसे सबके साथ बांटना चाहता हूँ और हर आँसू अपने पास समेट कर रख़ लूँ, यही इच्छा रहती है हालांकि दर्ज तो सभी कर देता हूँ. आज आप जैसे महारथी (जो भी मेरा इन्टरव्यू लेता है, उसे ऐसा ही कहता हूँ ताकि आगे भी याद रखे और इन्टव्यू लेता रहे:)) को इन्टरव्यू दे रहा हूँ-देखिए न कितना खुशनुमा पल है, यह सबको बांट देना चाहता हूँ. वैसे मेरा सीए बनना, मेरा प्रेम करना और फिर उसी से मेरी शादी, बेटों का इंजीनियर बनना, बिटिया (बहु) का घर आना, पुस्तक का विमोचन, विभिन्न सम्मानों से विभूषित होना आदि अनेकानेक मौके हैं जिन्हें मैं अपनी जिन्दगी के सबसे खुशनुमा पलों में गिनता हूँ.

कुलवंत हैप्पी : शायद सब जानना चाहेंगे कि आप भारत अब कब आ रहें हैं?
समीर : बहुत जल्द, पूरी ताकत लगा रखी है कि फरवरी/मार्च में आ जाएं, मगर हमारे चाहे क्या होता है? हमारे चाहे ही सब हो जाए तो हम तो कल ही आ जाएं. शायद नौकरी के एडजस्टमेन्ट, परिवार की जरुरतें आदि ऐसी बातें है जिन्हें यूँ ही नहीं नकारा जा सकता. अतः यदि किसी वजह फरवरी/मार्च में आने में व्यवधान हुआ तो ठीक है, नहीं नवम्बर तो पक्का है ही. मई/जून में भारत की गरमी से इसलिए भी ज्यादा डर लगता है कि उसके साथ बिजली भी गुम रहती है, पसीने में पूरा पाऊडर पुंछ जाने का खतरा रहता है फिर हमारा रंग तो...सूर्य की गरमी को विशेष आकर्षित करता है. :)

अंत में आपका बहुत आभार जो आपने मुझे इस इन्टरव्यू के काबिल समझा. सभी मित्रों और पाठकों का आभार जिन्होंने इन वर्षों में इतना स्नेह दिया और मुझे निरंतर प्रोत्साहित किया. सभी से निवेदन है कि ऐसा ही स्नेह बनाए रखिये.

व्यवसायिक शौक : लगातार कुछ नया सीख लेने की ललक हर साल नये कोर्स करवाती रहती है. फिलहाल सलाहकारी के साथ साथ कुछ एक्जामस की तैयारियों में व्यस्त हूँ.


चक्क दे फट्टे  : मैंने अपने पिता जी से कहा "मुझे गायक बनना है"। वो झटपट बोले "तुम लेखक बन जाओ"। "आपने कभी मेरा लिखा हुआ तो कुछ पढ़ा ही नहीं" मैंने कहा। उन्होंने मेरी तरफ न देखते हुए कहा "तभी तो कह रहा हूँ बेटा जी"।


सर्वोत्तम ब्लॉगर्स 2009 पुरस्कार

लाजमी है कि आज ज्यादातर दीवारों से पुराने कलेंडरों की जगह नए कलेंडर आ गए होंगे। मोबाइल, कम्प्यूटर में तो कलेंडर बदलने की जरूरत ही नहीं पड़ती वहां तो आटोमैटिक ही बदल जाता है। साल बदलने के साथ ही कलेंडर बदल जाता है, लेकिन शायद कुछ लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी नहीं बदलती, जैसे कि आज मैंने देखा कि ऑफिस में कुछ लोग पहले की तरह ही कीबोर्ड के बटनों को अपनी ऊंगलियों से दबा रहे थे, उनमें नया कुछ न था। इसके अलावा रोड़ किनारे लगी फल, सब्जी एवं अन्य वस्तुओं की लारियों पर खड़े विक्रेता पहले जैसे ही थे, उनमें मुझे तो कोई बदलाव नजर नहीं आया।

मुझे लगता है कि हमें याद रहता है कि नया साल आएगा, और कुछ नया लाएगा, लेकिन हम भूल जाते हैं कि 365 दिनों को मिलाकर एक साल बनता है, जो एक दिन के बिना असम्भव है। जैसे कि हम किसी मंजिल तक पहुंचने के लिए एक साथ हजारों कदम नहीं उठाते, बस केवल एक कदम उठाते हैं, कदम दर कदम उठाते जाते हैं और पहुंचते हैं मंजिल के पास।

मुझे लगता है कि नए साल की समय सीमा किसी ने सोच विचार कर बनाई होगी, ताकि हम इतने दिन गुजरने के बाद सोच सकें कि आखिर हमने इतने दिनों में आखिर क्या खो दिया और क्या पा लिया। हममें से किसी को भी पता नहीं कि कौन से साल में कौन इस दुनिया को अलविदा कह जाएगा, फिर भी हम कहते हैं ये अच्छा गुजर गया तो ठीक, अगला भी जल्द जल्द अच्छे से गुजर जाए। लेकिन कभी किसी ने ये सोचने की हिम्मत न जुटाई कि आखिर हमें रुकना कहां है, जिन्दगी की समय सीमा अनिश्चित है, जिन्दगी तो ऐसा कार्ड है जिसकी वैधता न जाने कब खत्म हो जाए। इसलिए साल भर का लेखा जोखा एक बार कर लेना चाहिए, मेरी तो राय है दोस्तो हर दिन जिन्दगी का लेखा जोखा करना चाहिए।

हम सब देखते हैं कि दुकानदार हर शाम को अपने गोलक के पैसे गिनता है, वो पूरे महीने के एक साथ नहीं गिनता। उसको भी पता है कि एकसाथ गिनने से उसके पैसे बढ़ेंगे नहीं, लेकिन अगर वो रोज गिनेगा इतना तो पक्का है कि अगर एक रुपया भी उसके गोलक से इधर उधर हुआ तो उसको पता चल जाएगा। इसके अलावा वो अपने गोलक के हिसाब से रोजमर्रा की जिन्दगी को भी सही तरीके से हैंडल कर सकेगा।


जैसे कि आप सब जानते हैं कि गुरूवार की रात करीबन 12 बजे 2010 शुरू हो गया था, जो कुछ भी उससे पहले हुआ वो सब 2009 का हिस्सा हो गया। इस साल में मैंने ढेरों ब्लॉग पढ़ें, जिन पर मैंने बेफिक्र होकर टिप्पणियाँ भी खूब दागी। सोचा क्यों न उनमें से कुछ को उनके विशेष कारणों के चलते सर्वोत्तम श्रेणी में रखा जाए। क्यों न उनको सार्वजनिक तौर पर सम्मान दिया जाए। मैं कोई भगवान नहीं, मैं कोई बड़ा जज नहीं, मैं तो बस एक आम पाठक हूं, और उसी पाठक की नजर से देखते हुए मुझे तो कुछ ब्लॉग सर्वप्रिय लगे, मैं उनको अपने इस ब्लॉग के जरिए सम्मान देना चाहता हैं। आप बुरा न मनाएं, क्योंकि आप भी बुरा नहीं लिखते, लेकिन चुनना तो कुछ विशेष को ही पड़ता है।

हम सब हररोज इंटरनेट पर हजारों शब्दों में अपने विचार प्रकट करते हैं, लेकिन वो किस नगर के किस अखबार में जगह बनाते हैं। इसकी जानकारी एकत्र करना बहुत मुश्किल होता, अगर हमारे पास बीएस पाबला जैसा कोई मेहनती ब्लॉगर न होता। वो मेहनत इस लिए करते हैं कि हम ब्लॉगरों का हौंसला निरंतर बना रहे और ब्लॉगिंग का सिलसिला निरंतर चलता रहे। ऐसे में तो मेहनती ब्लॉगर का पुरस्कार उनको देना बनता है।

वर्ष 2009 मेहनती ब्लॉगर पुरस्कार








प्रिंट मीडिया पर ब्लॉगचर्चा के संचालक बीएस पाबला



जहां अपनी विशेष प्रतिक्रियाओं से नए एवं पुराने ब्लॉगरों का निरंतर मनोबल बढ़ाते रहते हैं, वहीं उड़न तश्तरी पर अच्छे लेखक, कवि एवं अच्छे व्यक्ति होने का परिचय भी देते हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि वो दूर विदेश में बैठे हुए भी अपनी भाषा के साथ एवं अपने देश के साथ निरंतर जुड़े हुए हैं। उनके ब्लॉग पर टिप्पणियों का माऊंट एवरेस्ट देखने को मिलता है, जो उनकी लोकप्रियता की निशानी है। इसलिए हरमन प्यारा ब्लॉगर पुरस्कार उनको देना बनता है।

वर्ष 2009 हरमन प्यारा ब्लॉगर पुरस्कार









उड़न तश्तरी संचालक समीर लाल समीर




नंगल जैसी खूबसूरत जगह में रहने वाली निर्मला कपिला कम्प्यूटर को अच्छी तरह से आपरेटर नहीं कर पाती, फिर भी निरंतर हिन्दी ब्लॉग जगत को अपनी अनमोल सेवा प्रदान कर रही हैं, उनकी कविताएं, गजलें एवं कहानियाँ हम निरंतर पढ़ते हैं। इतना ही नहीं, वो ब्लॉगरों का हौसला अफजाई करने में भी कोई कंजूसी नहीं करती। इसके अलावा वो विवादों से दूर रहकर सार्थक ब्लॉगिंग कर रही हैं। जिसके लिए महिला ब्लॉगर पुरस्कार उनको देना बनता है।

वर्ष 2009 महिला ब्लॉगर पुरस्कार












वीर बाहुटी संचालिका निर्मला कपिला


ब्लॉग जगत में कवियों की कमी नहीं विनोद कुमार पांडे, ललित शर्मा, ओम आर्य जैसे कई नाम है मेरे जेहन में, लेकिन फिर भी मैं इस बार का काव्य ब्लॉगर पुरस्कार दो कवित्रियों (हरकीरत हीर एवं पारूल) को देना पसंद करूंगा। दोनों ही निरंतर काव्य ब्लॉग संचालित कर रही हैं, दोनों की रचनाएं बहुत अद्भुत हैं।

वर्ष 2009 काव्य ब्लॉगर पुरस्कार












हरकीरत हीर संचालिका हरकीरत हीर,













Rhythm of words...  संचालिका पारूल


साल 2009 में कई नए ब्लॉगरों ने ब्लॉग जगत में कदम रखा होगा। सब ही बहुत अच्छा लिखते हैं, खासकर मुझसे तो बेहतर ही हैं। मिथिलेष दुबे ने सार्थक ब्लॉगिंग के जरिए ब्लॉग जगत में बहुत अच्छी पहचान हासिल कर ली है। ऐसे में इस बार का नवोदित ब्लॉगर पुरस्कार उनको देना बनता है।

वर्ष 2009 नवोदित ब्लॉगर पुरस्कार












दुबे संचालक मिथिलेष दुबे


साल 2009 में ब्लॉग जगत में उस समय स्थिति बहुत भयंकर हो गई थी, जब अचानक ही किसी कारण ब्लॉगवाणी ने अपनी साँसें रोक ली थी, जिसके कारण ब्लॉग जगत चिंता में पड़ गया था, लेकिन दुआएं काम आई, ब्लॉगवाणी फिर से तंदरुस्त हो गई। जो सेवा ब्लॉगवाणी मुहैया करवा रही है, वो कोई कम सराहनीय नहीं है। इसलिए इस बार का ब्लॉगर्स प्लेटफार्म पुरस्कार उनको देना बनता है।

वर्ष 2009 "ब्लॉगर्स प्लेटफार्म पुरस्कार" पुरस्कार
सबको मिलाता है जो "ब्लॉगवाणी"

ये केवल पंजाबी पसंद करने वालों के लिए  ਹੁਣ ਮੋਰਨੀਆਂ ਕੌਣ ਪਾਉਂਦਾ ਐ