भारत का एक आदर्श गाँव "कपासी"

चप्पे चप्पे कोने कोने की ख़बर देने का दावा करते हुए भारतीय ख़बरिया टैलीविजन थकते नहीं, लेकिन सच तो यह है कि मसाला ख़बरों के दायरे से बाहर निकलते ही नहीं। वरना, भारत के जिस आदर्श गाँव के बारे में, अब मैं बताने जा रहा हूँ, उसका जिक्र कब का कर चुके होते टैलीविजन वाले। इस गाँव को मैंने खुद तो देखा नहीं, लेकिन पत्रकार एवं लेखक स्वयं प्रकाश द्वारा लिखित किताब "जीना सिखा दिया" से उसके बारे में पढ़ा जरूर है।

श्री स्वयं प्रकाश द्वारा लिखित किताब जीना सिखाया दिया में इस गाँव के बारे में पढ़ने के बाद इसको भारत को आदर्श गाँव कहना कोई अतिशोक्ति न होगी, जो पूने से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। और इस गाँव का नाम कपासी है।

किताब में लिखे अनुसार कपासी पूरी तरह नशामुक्त गाँव है, भारत में शायद ही कोई गाँव नशे की लपेट में आने से बचा हो। लेखक बताते हैं कि इस गाँव में चौबीस घंटे बिजली रहती है, क्योंकि यहाँ बिजली चोरी की आदत नहीं लोगों को, जबकि आम तौर पर भारतीय गाँवों में बिजली बामुश्किल 8 घंटे मिलती है, चाहे वहाँ बिजली चोरी होती हो या न, उनको गाँवों को छोड़कर जो आज भी बिजली से महरूम हैं।

इस गाँव में प्राकृतिक खेती होती है, जो आज के समय में किसानों के लिए एक प्रेरणास्रोत से कम नहीं। पंजाब को कृषि प्रधान सूबा कहा जाता है, लेकिन आज वहाँ के किसान भी ज्यादा उपज हासिल करने के लिए आँखें बंद कर रसायनों का इस्तेमाल जोर शोर से कर रहे हैं, जिससे अन्न नहीं ज़हर पैदा होता है। भारतीय किसानों और खबरिया चैनलों में एक समानता नजर आती है। वो यह है कि किसान ज्यादा उपज लेने के चक्कर में फसल को जहर बना रहा है और खबरिया चैनल टीआरपी के चक्कर में अपने असली मार्ग से भड़क रहे हैं।

इस गाँव में विदेशी लोग अध्यन करने आते हैं, लेकिन भारतीय चैनल कब पहुंचेंगे इस गाँव में अध्यन करने के लिए पता नहीं। इन निज खबरिया चैनलों की तरह हमारी सरकार भी सो रही है, वरना वो इस गाँव को पूरे भारत में फैलाकर जन जन को भी एक आदर्श देश बनाने के लिए प्रेरणा दी जा सकती है। पूरा भारत न बदले तो कोई बात नहीं, लेकिन कुछ तो बदले। कहीं से तो शुरूआत हो।

लेखक बताते हैं कि इस गाँव में करीबन 27 बाँध हैं, जो खुद लोगों द्वारा खुद के पैसे से बनाए गए, इन बाँधों को बनाने के लिए करीबन 25 हजार रुपए खर्च आए। लेखक कहता है कि अगर इन बाँधों का निर्माण प्रशासन करता तो खर्च करीबन एक लाख होता, लेकिन मुझे लगता है कि लाखों खर्च होते, पर कभी बाँध न बन पाते।

इस गाँव में लड़ाई झगड़े नहीं होते, जिसके कारण खाकी वाले इस गाँव में केसों की छानबीन करने नहीं आते। हाँ, अगर कुछ आता है तो शुद्ध हवा, वो गाँव के चारों ओर लगे पेड़ों की वजह से। इस गाँव को बदलने का श्रेय आर्ट ऑफ लिविंग संस्थान या फिर डा. माधव ए पॉल को जाता है।

अगर आप पुने के आस पास रहते हैं तो इस गाँव में एक बार जरूर जाकर आईएगा, और बताईएगा अपने अनुभव।

आभार
कुलवंत हैप्पी


9 प्रतिक्रिया:

  1. बहुत अच्छा लगा इस गाँव की जानकारी पा कर....

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  2. मन को उल्लासित और आशा से भर देने वाली जानकारी के लिए धन्यवाद.

    अभी मीडिया वहां नहीं पहुंचा क्योकि.....बजाज अभी एक लीटर पेट्रोल में १२० किलोमीटर जाने वाली कोई मोटरसाईकल बना नहीं पाए है.

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  3. बहुत अच्छा लगा इस आदर्श गांव के बारे मे जानकार.

    रामराम.

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  4. बहुत बडिया जानकारी है बाकी गाँवों को भी इस से प्रेरणा लेनी चाहिये। मगर बेटा तुम यहां बैठे क्या कर रहे हो परी तुम्हें पुकार रही है? जाओ उसके पास । आशीर्वाद्

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  5. ye to badi anoothi misaal pesh ki hai aapne..intresting :)

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  6. विश्वास नहीं होता कि ऐसा गांव भी हो सकता है
    इस गांव से सन्देश मिलता है --- अपना हाथ जग्गनाथ

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  7. vishal mishra2/08/2010 7:11 PM

    Ichchha huvee udakar kapasi pahunch jaun. jankari ke liye dhnyawad. Media ko to aaj reality show aur thothe vivadon se fursat naheen hai.

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  8. Kapasi Ganv Ke baare mai acchi jankari di aapne.. jaha midia nahi pahochata vaha do log jarur pahunchte hai.. kulwant or Janak..

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  9. Bahut acchaa laga ise gaov kee jaankaree paaker
    bahut bahut dhanyvaad..........

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