लंडन ड्रीम्स- द बेस्ट मूवीज


विपुल अमृतलाल शाह मेरी उम्मीदों पर खरा उतरा, बाकी का तो पता नहीं, बेशक हाल में तालियों की गूंज सुनाई दे रही थी और ठहाकों की भी। आँखें, वक्त, नमस्ते लंडन, सिंह इज किंग के बाद विपुल शाह की लंडन ड्रीम्स को भी शानदार फिल्मों की सूची में शुमार होने से कोई नहीं रोक सकता, खासकर मेरी मनपसंद शानदार फिल्मों की सूची से। सिंह इज किंग भले ही अनीस बज्मी ने निर्देशित की हो, लेकिन विपुल शाह का योगदान भी उसमें कम नहीं था, क्योंकि एक अच्छा निर्माता एक निर्देशक को अपने ढंग से काम करने के लिए अवसर देता है। लंडन ड्रीम्स शुरू होती है अजय देवगन (अर्जुन) से, जो संघर्ष कर सफलता की शिखर पर है, लेकिन वो अपने सपनों के लिए अपनों को खोने से भी भय नहीं खाता। वो बचपन से माईकल जैक्सन बनना चाहता है, लेकिन उसके पिता को गीत संगीत से नफरत है। वो भगवान से दुआ करता है कि उसके रास्ते की सब रुकावटें दूर हो जाएं। अचानक उसके पिता की मौत हो जाती है और उसका चाचा ओमपुरी उसको लंडन ले जाता है, जो उसका ख्वाब है। वो एयरपोर्ट से ही अपने चाचा का साथ छोड़कर सपनों को पूरा करने के लिए निकल पड़ता है। संघर्ष करते करते वो अपने सपने की तरफ अग्रसर होता है। इस दौरान उसको अपने दोस्त की याद आती है, जो पंजाब के एक गांव में रहता है। अर्जुन अपने दोस्त मनु को मिलने के लिए गांव आता है, अजुर्न ने संगीत सीखने के लिए संघर्ष किया। मगर मनु (सलमान खान) को गाने की कला भगवान ने गिफ्ट में दी है, लेकिन मस्तमौला स्वभाव का मनु अपने हुनर को नहीं जानता, वो गांव में ही अन्य नौजवानों की तरह मस्ती करते हुए ही जीवन गुजार देना चाहता है। जैसे ईगल साँप को अपने पंजों में फंसाकर आस्मां में ले जाती है, वैसे ही मनु का दोस्त अर्जुन अपने दोस्त को लंडन ले जाता है और शामिल कर लेता है लंडन ड्रीम्स बैंड में। ये बात तो कुदरती ही है कि कुदरत द्वारा बख्सी गई कला तालीम द्वारा हासिल की गई कला से बेहतर होती है। वो बिना मिलावट के होती है। मनु की सफलता अर्जुन के लिए जहर बनती जा रही थी। ये जहर ही मनु और अजुर्न की दोस्ती के बीच दरार बन जाता है। वो मनु को नशे की आदत डलवा देता है, तांकि वो गाना गा न सके और मनु को चाहने वाली असिन भी उसको छोड़ दे। आखिर राज खुल जाता है, सत्य सामने आ जाता है। जिसके बाद मनु अपने गांव वापिस आ जाता है और अर्जुन विदेश में अकेला पड़ जाता है। फिल्म का अंत आम फिल्मों की तरह सुखद होता है, लेकिन एक संदेश छोड़ते हुए। उस संदेश को समझने के लिए फिल्म देखनी होगी मेरे यारों। सलमान खान ने पंजाब के गांवों में बसने वाले मस्तमौला युवकों का रोल खूब निभाया तो अजय देवगन ने गंभीर रोल अदा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, गंभीर किरदारों में जान डालना तो अजय की खासियत है। फिल्म में असिन ने काम पूरी ईमानदारी के साथ किया है, वो भी बिल्कुल बिना ओवरएक्टिंग के। ओमपुरी का रोल छोटा है। सलमान खान और असिन पर निर्देशिक ने ज्यादा ध्यान दिया। फिल्म संगीत में थोड़ी मार खाती है, लेकिन कलाकारों के लिए पहनावा बिल्कुल को सही चुना गया है।


जाने अनजाने में ही सही, लेकिन विपुल शाह ने एक सच तो सबके सामने रख दिया है कि पंजाब के युवाओं में कला की कोई कमी नहीं, लेकिन इनको शराब और लापरवाहपने ने मार डाला।


गुरदास मान वो दीया है जो तूफानों में....

दूसरा माइकल जैक्सन, दूसरा अमिताभ बच्चन, दूसरा सचिन तेंदुलकर जैसे मिलना मुश्किल है, वैसे ही पंजाबी संगीतप्रेमियों को दूसरा गुरदास मान मिलना मुश्किल है। मुश्किल ही नहीं मुझे तो नामुमकिन लगता है। आने वाली 4 जनवरी 2010 को गुरदास मान 53 वर्ष के हो जाएंगे, लेकिन उनकी स्टेज पर्फामेंस (लाईव शो) आज भी युवा गुरदास मान जैसी है। वर्ष 1980 को पंजाबी संगीत जगत में कदम रखने वाले गुरदास मान ने पिछले तीन दशकों में पंजाबी संगीत को इतना कुछ दिया है, जिसकी कल्पना कर पाना भी मुश्किल है। गीतों में खुद को 'मरजाना मान' कहने वाले गुरदास मान ने अपनी आवाज और अपने लिखे हुए गीतों की बदौलत पंजाबी संगीत में वो रुतबा हासिल कर लिया है जो यमले जट्ट ने हासिल किया था। जट्ट यमला की तूंबी की तरह गुरदास की डफली भी संगीत में अपनी अनूठी छाप छोड़ चुकी है। उसके गाए हुए गीत लोकगीत बनते जा रहे हैं, यमले जट्ट के गाए गीतों की तरह। इन तीन दशकों में पता ही नहीं कितने गायक आएं और चले गए, मगर गुरदास मान समय के साथ साथ सफलता की शिखर की तरफ बढ़ता चला गया।

इन दशकों में ड्यूट का आंधी आई, पॉप की आंधी आई, फिर ड्यूट की आंधी, लेकिन गुरदास मान ने सोलो गीत गाए, वो भी लीक से हटकर। गुरदास मान वो दीया है जो तूफानों में भी जगमगाना नहीं छोड़ता। गुरदास मान ने पैसा कमाने के लिए या सफलता अर्जित करने के लिए नंगेज का सहारा नहीं लिया, बल्कि उसने तो पंजाबी मां बोली का सिर ऊंचा करने के लिए साफ सुथरी भाषा का उपयोग किया।

समय बदल गया, वक्त बदल गया लेकिन गुरदास मान नहीं बदला, वो आज भी वैसा है जैसा पंजाबी संगीत जगत को मिला था। हाथ में डफली, कमर पर कमरकस्सा (देसी बेल्ट), पंजाबी चादरा (जिसको हिन्दी में धोती कह सकते हैं), कुर्ता, शानदार जॉकेट, नंगे पांव और दाएं पैर में घुंघरू स्टेज पर गुरदास मान की स्टेजी पहचान है।

पंजाबी गीतकार लड़के लड़की के प्रेम संबंधों पर गीत लिखने की प्रथा या चक्रव्यूह से बाहर निकल ही नहीं पाए, जिसे तोड़कर गुरदास मान तीन दशक पहले ही बाहर निकल आया। गुरदास का हर गीत कुछ न कुछ संदेश देता है, किसी न किसी समस्या को उभरता है। मुझे याद है कि जब बाबरी मस्जिद को लेकर भारत में हंगामा हुआ था तो गुरदास की कलम ने एक ऐसे गीत को जन्म दिया, जिसको सुनने वाले कहते हैं वाह गुरदास वाह। वो था 'अल्लाह वालों राम वालों, राजनीति से अपने मजहब को बचा लो' । इसके अलावा भारत विभाजन का दर्द भी गुरदास मान ने अपनी कलम से खूब बयान किया 'मैं बसदी उजड़ गई' के जरिए। गुरदास मान का ये गीत जब पंजाब की किसी स्टेज पर बजता है तो अच्छे अच्छों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं।

युवाओं के दिलों पर ही नहीं बुजुर्गों के दिलों पर भी राज करता है पंजाबी मां बोली का सेवादार गुरदास मान। पंजाबी साहित्य में खुद को बड़ा तीस खां मार समझे वाले भी गुरदास मान की कलम के आगे बौने पड़ जाते हैं। एक साक्षात्कार में गुरदास मान ने कहा था कि जब वो शिमला प्रोग्राम करने के लिए जा रहे थे तो सुबह के चार बजे उनके दिमाग में एक खयाल आया। असल में जब वो खयाल गीत 'कुड़ीए नी किस्मत पुड़ीए नी' बनकर सबके सामने आया तो सब भौंचक्के रह गए। गुरदास मान ने इस गीत में एक औरत का दर्द इस तरह पेश किया है कि पत्थर दिल भी रोने पर मजबूर हो जाएं। इस गीत को गाने के लिए गुरदास मान ने सबसे नीचले सुर पर गाया, जो उनके कैरियर में सबसे पहली बार हुआ।

गुरदास की गायकी के लोग इस तरह मुरीद है कि गुरदास का लाईव शो ( जिसे पंजाबी में अखाड़ा कहते हैं) देखने के लिए कहीं भी जा सकते हैं, पंजाब में जब कभी गुरदास का स्टेज शो होता है तो उसको सुनने के लिए कोई दो तीन सौ नहीं बल्कि लाखों की तादाद में श्रोते उठकर चल देता है। गुरदास के गीतों पर केवल पंजाबी लोग ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों के लोग भी नाच उठतें हैं। गुरदास ने जिस क्षेत्र में भी कदम रखा, उस में सफल होकर दिखा दिया, अगर उसके अभिनय की बात करें तो भी वह सफलता की शिखर पर बैठे हुए हैं।

अगर पंजाब में पंजाबी अभिनेता स्वर्गीय वरिन्दर के बाद लम्बे समय तक कोई अभिनेता टिक पाया है तो वह गुरदास मान है। गुरदास ने अभी तक पंजाबी फिल्म प्रेमियों की झोली में डेढ़ दर्जन के करीबन फिल्में डाली हैं जोकि हिट और सुपरहिट रही हैं। इसके अलावा उनकी शहीद-ए-मुब्बहत को राष्ट्रीय अवार्ड भी मिला तो फिल्म वारिस शाह इश्क दा वारिस को चार राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। गुरदास मान ने एक हिन्दी फिल्म 'जिन्दगी खूबसूरत है' बनाई थी, जिसमें उसके साथ तब्बू ने काम किया। यहां पर गुरदास इस लिए मात खा गए क्योंकि उनको बालीवुड में फिल्म प्रचार करना नहीं आता था। गुरदास ने हिन्दी फिल्म वीरजारा और सिर्फ तुम के लिए भी गाया।

गुरदास मान का एक और हिन्दी गीत

बे-लिबास बेबो, बुरे वक्त की निशानी


"पैसा मारो मुंह पर, कुछ भी करूंगा" यह संवाद अरुण बख्सी छोटे पर्दे पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक 'जुगनी चली जलंधर' में बोलते हैं, ये वो ही अरुण बख्सी हैं जो कभी 'अजनबी' नाम के एक हिन्दी धारावाहिक में "बोल मिट्टी दे बावेया" गुनगुनाते हुए नजर आते थे। उस संवाद में भी एक खरा सत्य था और इस नए संवाद में भी बहुत सत्य है।

किसी दूसरे पर यह संवाद फिट बैठे न बैठे, लेकिन कपूर खानदान की बेटी करीना कपूर पर तो बिल्कुल सही बैठता है। यकीनन न आता हो तो पिछले कुछ सालों पर निगाह मारो। शाहरुख के साथ डॉन में फिल्माया गया गीत हो, या अजनबी में अक्षय कुमार के साथ फिल्माए कुछ दृश्य। यशराज बैनर्स की सुपर फ्लॉप फिल्म टश्न में बिकनी पहनकर सबको हैरत में डाल देने वाली करीना ने इस पर आलोचना होते देख कहा था कि अब को बिकनी नहीं पहनेगी।

देखो वादे की कितनी पक्की हैं, बिल्कुल सही, उन्होंने बिकनी पहनना भी छोड़ दिया। अब तो वो टॉपलेस हो गई हैं। कमबख्त इश्क में अक्षय के साथ कई किस सीनों से जब मन नहीं भरा तो कुर्बान में सैफ अली खान के साथ सब से लम्बा किस और फिल्म की चर्चा के लिए टॉपलेस फोटो दे दिया।

ये पैसे कमाने का जरिया भी हो सकता है और अपनी स्टार्डम को बचाने का फंडा भी। या फिर इसे बॉलीवुड में एक काले युग की नई शुरूआत भी कह सकते हैं। जब कपूर खानदान की बेटी इस राह पर चल सकती है तो मायानगरी में सफलता के लिए संघर्ष कर रही गैर-फिल्मी घरानों से आई अभिनेत्रियां गुरेज क्यों करेगी?

करीना कपूर जिस युग की शुरूआत करने जा रही है उसको बॉलीवुड की तरक्की या प्रगति नहीं माना जा सकता, उसको दुर्गति कहा जा सकता है। बॉबी से ऋषि कपूर ने एक नए युग की शुरूआत की थी, उस युग ने कपूर खानदान की बेटियों को तो अपने चुंगल में लेना ही था। समय हिसाब किताब बराबर ही रखता है, इसका उदाहरण है करीना और करिश्मा कपूर। कल तक कपूर खानदान के छोकरे दूसरे घरों की लड़कियों को अपने इशारों पर नचाते थे, आज उनकी बेटियां अपने दिलों की हरसतें पूरी कर रही हैं। बिकनी पहनकर, किस देकर जीरो फिगर करके देख लिया, लेकिन नतीजा जीरो। अब तो लास्ट दाँव है टॉपलेस।

इसके बाद करीना के लिए बची हैं ए ग्रेड की फिल्में है, जिसमें वो अपना भविष्य तलाश सकती है। अब तो प्रसारण मंत्रालय भी रात को इन फिल्मों को प्रसारित करने की मंजूरी देने के करीब है। लगी रहो करीना लगी रहो। आग तो तुम्हारे ही घर से शुरू हुई थी।


क्या है राहुल गांधी का उपनाम?

सुबह उठा तो सिर भारी भारी था, जैसे किसी ने सिर पर पत्थर रख दिया हो। सोचते सोचते रात को सो जाना भी कोई सिर पर रखे पत्थर से कम नहीं होता। रात ये सोचते सोचते सो गया क्यों न राहुल गांधी को खत लिखा जाए कि मैं कांग्रेस में शामिल होना चाहता हूं, मैं राजनीति में नहीं जननीति में आना चाहता हूं और मैं राजनेता नहीं जननेता बनना चाहता हूं। आती 27 तिथि को मैं 26 का हो जाऊंगा, इतने सालों में मैंने क्या किया कुछ नहीं, अब आने वाले सालों में कुछ करना चाहता हूं। ये सोचते सोचते सो गया या जागता रहा कुछ पता नहीं। सुबह उठा तो सिर भारी भारी था जैसे कि शुरूआत में बता चुका हूं। मैंने कम्प्यूटर के टेबल से पानी वाली मोटर की चाबी उठाई और मोटर छोड़ने के लिए नीचे चल गया, वहां पहुंचा तो दैनिक भास्कर पड़ा हुआ था, मेरा नवभारतटाईम्स के बाद दूसरा प्रिय अखबार। मोटर छोड़ने से पहले अखबार उठाया। मुझे खबरें पढ़ने का बिल्कुल शौक नहीं, इसलिए सीधा अखबार के उस पन्ने पर पहुंच जाता हूं, जहां बड़े बड़े लेखक अपनी कलम घसीटते हैं। आज जैसे ही वहां पहुंचा तो देखा कि रात को जो मन में सवाल उठ रहा था, उसका उत्तर तो यहां वेद प्रताप वैदिक ने लिख डाला। सवाल था कि राहुल का उपनाम क्या है? आप सोचोगे कि राहुल गांधी तो है। पर नहीं, सच तो कुछ और ही है। सत्य तो ये है कि उनका नाम राहुल घंदी है, जो उनके पारसी दादा फिरोजशाह घंदी लिखा करते थे। इस उत्तर देखते ही दिलखुश हो गया। आप सोच रहे हैं कि उपनाम का सवाल मेरे जेहन में कैसे आया। राहुल युवा है, वो सबसे अलहिदा है। उसमें मुझे धीरे धीरे लाठी लेकर चलने वाला महात्मा नहीं बल्कि तेज रफतार क्रांति का प्रतीक भगत सिंह नजर आता है। जो कुछ कर गुजरना चाहता है, जो अपने बलबूते पर कुछ करना चाहता है। शायद इसलिए भी अच्छा लगता है कि वो इंडिया से निकलकर भारत में घुस रहा है, जबकि आज की युवा पीढ़ी इंडिया में घुस रही है। चेतन भगत, अरविंद अडिगा जैसे उपन्यासकार भारत के लिए नहीं बल्कि इंडिया के लिए लिखते हैं, बेशक इंडिया 70 करोड़ लोगों को छोड़कर बनता है, लेकिन फिर भी युवा लेखक इंडिया के लिए लिखते हैं। राहुल उन 70 करोड़ तक पहुंचने के लिए मचल रहा है जो भारत में बसते हैं।


आखिर ये देश है किसका

1.
दूर है मंजिल, और नाजुक हालात हैं
हम भी चल रहें ऐसे ही दिन रात हैं

फिर आने का वायदा कर सब चले गए
न भगत सिंह आया, न श्रीकृष्ण
बस इंतजार में हम रेत बन ढले गए

जहर का प्याला लबों तक आने दो
और मुझे फिर से सुकरात होने दो
झूठ का अंधेरा अगर डाल डाल
तो रोशनी बन मुझे पात पात होने दो



2.
कैसे हो..घर परिवार कैसा है
तुम्हारा यार वो प्यार कैसा है

भाई बहन की पढ़ाई कैसी है
मां बाप की चिंता तन्हाई कैसी है

तुम्हारा ऑफिस में काम कैसा चल रहा है
ये जीवन तुम्हारा किस सांचे में ढल रहा है

3. महाभारत में पांडवों की अगुवाई करने वाले कृष्णा का
या यौवन में हँस हँसकर फांसी चढ़ने वाले भगत का
या फिर लाठी ले निकलने वाले महात्मा गांधी का
आखिर ये देश है किसका

श्री कृष्णा का लगता नहीं
ये देश
क्योंकि दुश्मन पर वार करने से कतराता है
जैसे देख बिल्ली कबूतर आंखें बंद कर जाता है

भगत सिंह का भी ये देश नहीं
वो क्रांति का सूर्य था,
यहां तो अक्रांति की लम्बी रात है

ये देश गांधी का भी नहीं
बाबरी हो, या 1984
लाशें ही लाशें
बिखरी जमीं पर
आती हैं नजर
आखिर ये देश है किसका




वो क्या जाने

सोचते हैं दोस्त जिन्दगी में, बड़ा कुछ पा लिया मैंने।
वो क्या जाने इस दौड़ में कितना कुछ गंवा लिया मैंने॥

मशीनों में रहकर, आखिर मशीन सा हो गया हूं।
मां बाप के होते भी एक यतीम सा हो गया हूं।।
बचपन की तरह ये यौवन भी यूं ही बिता लिया मैंने।
वो क्या जाने इस दौड़ में कितना कुछ गंवा लिया मैंने॥

खेतों की फसलों से खेलकर अब वो हवा नहीं आती।
सूर्य किरण घुसकर कमरे में अब मुझे नहीं जगाती॥
मुर्गे की न-मौजूदगी में सिरहाने अलार्म लगा लिया मैंने
वो क्या जाने इस दौड़ में कितना कुछ गंवा लिया मैंने॥

छूट गई यारों की महफिलें, और वो बुजुर्गों की बातें
कच्ची राहों पे सायों के साथ चलना, वो चांदनी रातें
बंद कमरों में कैद अंधेरों की अब हमराही बना लिया मैंने
वो क्या जाने इस दौड़ में कितना कुछ गंवा लिया मैंने॥

मेरे सपनों में नहीं आते गांधी

कुछ दिन पहले एक ब्लॉग पढ़ रहा था, मैं ब्लॉगर के लेखन की बेहद तारीफ करता हूं क्योंकि असल में ही उसने एक शानदार लेख लिखा। मैं उस हर लेख की प्रशंसा करता हूं जो मुझे लिखने के लिए उत्साहित करता है या मेरे जेहन में कुछ सवाल छोड़ जाता है। लेखक के सपने में गांधीजी आते हैं, सत्य तो ये है कि आजकल गांधी जी तो बहुत से लोगों के सपनों में आ रहे हैं, बस मुझे छोड़कर। शुरू से अंत तक गांधी जी मुस्कराते रहते हैं और लेखक खीझकर मुंह मोड़कर बैठ जाता है। जब अब युवा गुस्से होकर मुड़कर बैठ गया तो गांधी जी बोलना शुरू ही करते हैं कि उसका सपना टूटता है और लेख समाप्त हो जाता है। आखिर में लेखक पूछता है कि आखिर गांधी जी क्या कहना चाहते थे? मुझे लगता है कि इस देश को देखने के बाद गांधीजी के पास कहने को कुछ बचा ही नहीं होगा।

हर सरकारी दफतर में तस्वीर रूप में, हरेक जेब में नोट रूप में, हर शहर में गली या मूर्ति के रूप में महात्मा गांधी मिल जाएंगे। इतना ही नहीं, पूरे विश्व में अहिंसा दिवस के रूप में फैल चुके हैं गांधी जी, कितना बड़ा आकार हो गया गांधी जी। कितनी खुशी की बात है कि कितना फैल गए हैं भारत के राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी, लेकिन कितनी शर्म की बात है कि अहिंसा का कोई नामोनिशान नहीं मिल रहा। जिसके लिए महात्मा गांधी को याद किया जाता है, उनका आदर सम्मान से नाम लिया जाता है।

जब चीन भारत को निगलने की बात करता है, जब पाकिस्तान अपने वायदों से मुकरता है, तो शायद हर भारतीय कह उठता है कि कुचल डालो चीनी एवं पाकिस्तान के नाग इस फन को। तब हर भारतीय क्यों नहीं कहता कि शांति रखो, धैर्य रखो, हमारा राष्ट्रपिता अहिंसावादी था। हम हिंसावादी कैसे हो सकते हैं? हमको तो अहिंसा के पथ पर चलना चाहिए। एक थप्पड़ पड़े तो दूसरा करना चाहिए। गांधी जी ने तो पूरा देश लाठी और चरखे से आजाद करवा दिया था, लेकिन कितनी शर्म की बात है कि उस आजादी को कायम रखने के लिए इस साल आर्थिक तंगी के बावजूद रक्षा खर्च अप्रत्याशित तौर पर 34.4 प्रतिशत बढ़ाकर 1,41,703 करोड़ रुपये कर दिया है।

शायद गांधीजी उस लेखक के लेख में इस लिए मुस्करा रहे थे कि उनको अपने बेटों पर नाज नहीं शर्म आ रही थी, उन बेटों पर जो अपने राष्ट्रपिता को स्वदेशी लिबासों में देखकर गर्व से सिर ऊंचा करते हैं, लेकिन उसी बापू के लिए वो एक विदेशी पुरस्कार की लालसा रखते हैं। जिसने अंग्रेजों को दौड़ाने के लिए स्वदेशी वस्तुओं को स्वीकार लिया था, उसके लिए के एक विदेशी पुरस्कार चाहिए। है ना कितनी शर्म की बात।

कभी कभी सोचता हूं कि गांधी जी का नाम विदेशी पुरस्कार के लिए पांच बार को भेजा गया, और स्वदेशी वस्तुओं से प्यार करने वाले हमारे महात्मा जी ने भेजने वाले को रोका भी नहीं।

क्यों?
ये आपके लिए


दीवाली की शुभकामनाएं





काव्य रूप में कुछ सुलगते सवाल

नाक तेरी तरह थी, लेकिन ठोडी थोड़ी सी लम्बी, मेरी तरह..मैं सिनोग्राफी की बात कर रहा था। अगर ऐसा हुआ तो मैं उसको दबा दबा उसका चेहरा गोल कर दूंगी..पत्नी बोली। फिर मैं चुप हो गया। उसको मुझे से दूर रखना, क्योंकि उसका पिता सनकी है, पागल है..कुछ देर के बाद मैं चुप्पी तोड़ते हुए बोला। मैं उसको उसके नाना के घर छोड़ आऊंगी..वहीं पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बन जाएगा..पत्नी थोड़े से रौ में आते हुई बोली। ठीक है तुम भी वहीं को जॉब बगैरा कर लेना, तुम बहुत समझदार हो..तुम को अब मेरी जरूरत नहीं। अब देश को मेरी जरूरत है, मैं चला जाऊंगा..अब मैं बोल रहा था। उसने बात काटते हुए कहा..कल क्यों अभी जाओ ना। मैंने कहा कि नहीं उसका चेहरा देखकर जाऊंगा। शायद मेरी ऊर्जा में इजाफा हो जाए। अब बातें खत्म हुई और मैं सो गया...मुझे नहीं पता कि मैं सोया या फिर रात भर जागता रहा। जब सुबह होश आई तो एक तरफ आलर्म बज रहा था और दूसरी तरह मेरे जेहन से कुछ शब्द निकलकर मेरी जुबां पर दौड़ रहे थे। मुझे लग रहा था कि मैं रात भर सोया नहीं और किसी ध्यान में था।..वो शब्द आपकी खिदमत में हाजिर हैं।

आंखों में है समुद्र अगर, तो आंसू कोई ढलकता क्यों नहीं।
भूखे सोते हैं करोड़ों लोग, मगर कोई बिलकता क्यों नहीं॥

जिन्दा है अगर पाश युवाओं में, तो कोई आग लिखता क्यों नहीं।
गर गांधी की हैं नाती हम, तो लाठी ले कोई निकलता क्यों नहीं।।

अगर आदर्श है शहीद-ए-आजम, तो खून उबलता क्यों नहीं।
जागृत है अगर भारत मेरा, तो अंधेरे को निगलता क्यों नहीं॥

पैसा हमारा, ऐश वो करते हैं मगर ये हमें अखरता क्यों नहीं।
सोचते हैं कुत्ते की नस्ल वाले कि ये 'हैप्पी' मरता क्यों नहीं।।

ओबामा को प्राईज नहीं, जिम्मा मिला

अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा उस समय हैरत में पड़ गए, जब नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनका नाम घोषित कर दिया गया। ज्यादातर लोग खुश होते हैं, जब उनको सम्मानित किया जाता है, लेकिन ओबामा परेशान थे। शायद उन्होंने सोचा नहीं था कि उनकी राह और मुश्किल हो जाएगी, उनके कंधों पर अमेरिका के अलावा विश्व में शांति कायम करने का जिम्मा भी आ जाएगा। अगर ओबामा को पहले पता चल जाता कि नोबेल शांति पुरस्कार देने के लिए उनके नाम पर विचार किया जा रहा है तो शायद विचार को वो उसी वक्त ही खत्म कर देते, और ये पुरस्कार हर बार की तरह किसी ऐसे व्यक्ति के हाथों में चला जाता, जो काम कर थक चुका था, जो आगे करने की इच्छा नहीं रखता। बस वो थका हुआ, इस पुरस्कार को लेकर खुशी खुशी इस दुनिया से चल बसता। मगर अबकी बार ऐसा कुछ नहीं होने वाला, क्योंकि कमेटी ने पासा ही कुछ ऐसा फेंका है कि अब पुरस्कार की कीमत चुकानी होगी। अब वो करना होगा जो पुरस्कार की कसौटी पर खरा उतरता है।

जब ओबामा को पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो हर जगह खलबली सी मच गई, इसको पुरस्कार क्यों दिया जा रहा है। आखिर इसने क्या किया है? ये कैसी पागलभांति है? लेकिन लोग क्यों भूल गए उस दिन को जब बाराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे, उनको कैच करने के लिए विश्व भर का मीडिया हड्डी को देख भूखे कुत्तों की तरह झपट पड़ा था। तब तो वे राष्ट्रपति बनने जा रहे थे, बने नहीं थे। लेकिन आज तो वो अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, फिर आज लोगों को हैरानी क्यों हो रही है।

कितनी हैरत की बात है कि जैसे ही ओबामा का नाम सामने आया तो सबने अपनी अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करनी शुरू कर दी, किसी ने कहा कि ओबामा ही क्यों, लेकिन किसी ने ये नहीं कहा कि फलां व्यक्ति इसके लिए उपयुक्त है, बड़े बड़े बहस करने वालों को विद्वानों को कोई और नाम नहीं सुझा तो इस कमेटी के कुछ लोगों को कोई ओर कैसे दिखाई पड़ता। उनकी भूल कहो या फिर नई रीति, लेकिन ओबामा के लिए ये पुरस्कार नहीं, कांटों का ताज है। कल तक ओबामा अश्वेत लोगों के लिए उम्मीद की किरण थे, लेकिन इस पुरस्कार की घोषणा के बाद उनके सिर शांति स्थापित करने का जिम्मा आ गया है।

जब आप कोई काम कर चुके होते हैं और उसके लिए आपको सम्मानित किया जाए तो आप बेफिक्र हो जाते हैं, और लोग भी आप पर उंगली नहीं उठाते, दिक्कत तब खड़ी होती है जब आप शुरूआत कर रहे होते हैं, तब आपके सिर एक ऐसी जिम्मेदारी थोप दी जाए जो आप को हर हाल में पूरी करनी होगी। तो सिर पर रखा ताज भी पहाड़ से भारी हो जाता है। अब ओबामा को वो करना होगा, जो शांति पुरस्कार की कसौटी पर खरा उतरता हो, वो नहीं जो ओबामा प्रशासन चाहता है।

बाजारवाद में ढलता सदी का महानायक

इसमें कोई शक नहीं कि रुपहले पर्दे पर अपने रौबदार एवं दमदार किरदारों के लिए हमेशा ही वाहवाही बटोरने वाला सदी का महानायक अमिताभ बच्चन अब बाजारवाद में ढलता जा रहा है, या कहूं वो पूरी तरह इसमें रमा चुका है। ऐसा लगता है कि या तो बाजार को अमिताभ की लत लग गई या फिर अमिताभ को बाजार की।

एक समय था जब अमिताभ की जुबां से निकले हुए शब्द लोगों के दिल-ओ-दिमाग में सीधे उतर जाते थे, उस वक्त के उतरे हुए शब्द आज भी उनकी जुबां पर बिल्कुल पहले की तरह तारोताजा हैं। उस समय कि दी यंग एंग्री मैन की छवि को आज का बिग बी टक्कर नहीं दे सकता। सत्य तो ये है कि आज का बिग बी तो उसके सामने बिल्कुल बौना नजर आता है।

सदी के इस महानायक का हाल एक शराबी जैसा हो गया है, जिसको देखकर कभी समझ नहीं आती कि शराब को वो पी रहा है या फिर शराब उसको पी रही है। आज बाजार अमिताभ को खा रहा है या अमिताभ बाजार को समझ नहीं आ रहा है, बस सिलसिला दिन प्रति दिन चल रहा है। असल बात तो यह है कि बीस तीस साल पुराना लम्बू और आज के बिग बी या अमिताभ बच्चन में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है।

जहां बीस तीस साल पहले लम्बू बड़े पर्दे पर गरीबों दबे कुचले लोगों की आवाज बनता या उनका प्रतिनिधित्व करता हुआ एक दी यंग एंग्री मैन बन गया था, वहीं आज का अमिताभ बच्चन एक पूंजीवादी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए बाजार के लिए वस्तु बनकर रह गया या फिर टैग बनकर रह गया।

आज का बिग बी किसी को याद नहीं, अगर याद है तो सब को बीस तीस साल पुराना वो ऊर्जावान और शक्तिशाली अमिताभ बच्चन या फिर विजय दीना नाथ चौहान। जिसकी आवाज लोगों के कानों में आज भी गूंजती है, जिसके होने का आज भी अहसास होता है। वो कई साल पुराना हो चुका है, लेकिन आज भी तारोताजा है खेतों में लगी हुई सब्जियों की भांति। इस बात की पुष्टि तो पिछ्ले दिनों बिग बॉस के पहले दिन ही हो गई थी, जब बिग बी के सामने आने वाले बिग बॉस के मेहमान कल वाले अमित जी को याद कर रहे थे, जब अमिताभ उनकी उम्र का हुआ करता था। इन प्रतियोगियों को आज का अमित तो दिखाई ही नहीं देता। आज का बिग बी तो दी यंग एग्री मैन के कारण दौड़ रहा है।

अमिताभ बच्चन के 'दी यंग एंग्री मैन' से 'बिग बी' बनने के पीछे शायद '90 के दशक दौरान हुआ घाटा ही है, इसके बाद जब अमिताभ फिर से उदय हुआ तो उसका नया रूप था बिग बी। उसने विजय दीना नाथ चौहान का पल्लू छोड़ दिया, और खुद को बिग बी में ढाल लिया। जो अब पैसे की कीमत को समझने लगा था, उसको समझ आ गया था कि अब उसको बाजारवाद में ढलना होगा, नहीं तो वो खत्म हो जाएगा। किसी ने सत्य ही कहा है कि पैसा कुछ नहीं, अगर समझो तो खुदा से कम नहीं।

बीपीएल के विज्ञापन से विज्ञापन जगत में कदम रखने के बाद अमिताभ ने कई उत्पादों की बिक्री को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया, जिसके साथ अमिताभ का नाम जुड़ गया, उसका नसीबा खुल गया। इस दौर में अमिताभ पैसा खींच रहा है खुद के लिए और कुछ कारोबारी कंपनियों के लिए। शायद इस लिए लोगों के जेहन में दी यंग एंग्री मैन का नया रूप नहीं उतर रहा, बिग बी भा रहा है तो उसके पिछले युग के कारण, वैसे भी भारत में एक धारणा तो है कि आदमी अपने पिछले जन्मों का किया हुआ इस जन्म में खाता है, वैसे भी अमिताभ बच्चन का बिग बी दूसरा जन्म ही है। एक सवाल छोड़कर जा रहा हूं आपके सामने कि बाजारवाद में ढलना अमिताभ की मजबूरी है या समय की जरूरत?


शेयर-ओ-शायरी

आज ज्यादातर ब्लॉगरों के ब्लॉगों पर धर्म युद्ध चल रहा है। जिनको पढ़ने के बाद मन में कुछ शेयर उभरकर आए। जो आपकी नजर करने जा रहा हूं। वैसे उन ब्लॉगों पर भी छोड़ आया।

मेरा धर्म बड़ा और तेरा छोटा, जब तक कमबख्त बहस चलती रहेगी।
जलते रहेंगे मासूम परवाने, जब तक शमां नफरत की जलती रहेगी॥

धर्म के नाम पे तुम दुकानदारी यूं ही चलाते रहो।
दंगे फसादों में इंसां को पुतलों की तरह यूं जलाते रहो॥


'XXX' से घातक है 'PPP'

'ट्रिपल एक्स' ने देश के युवाओं को बिगाड़कर रख दिया, खासकर गांव वाले अशिक्षित वर्ग के युवाओं,
जो भूल जाते हैं कि रियल और रील जिन्दगी में क्या फर्क है। उनको दोनों ही एक जैसी नजर आती हैं खासकर ट्रिपल एक्स रील और रियल लाईफ। मगर मेरे देश को बर्बाद करने में ट्रिपल एक्स से ज्यादा योगदान 'ट्रिपल पी' का है, जिस दिन इस ट्रिपल पी में सुधार हो गया, उस दिन देश अन्य देशों के लिए प्रेरणास्रोत बनकर उभरेगा।

आप सोच रहें होंगे कि ट्रिपल एक्स तो समझ में आ रहा है, लेकिन ये मूर्ख ट्रिपल पी कहां से लेकर आए। मगर सच कहता हूं ट्रिपल एक्स में तो नहीं ट्रिपल पी में तो मैं भी आता हूं और आप भी। हां, अगर आप ट्रिपल एक्स का पूरा नाम ढूंढने जाओगे तो नहीं मिलेगा, मगर मेरे ट्रिपल पी का पूरा नाम है पुलिस पब्लिक और प्रेस।

जिस दिन इन तीनों ने अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभानी शुरू कर दी, उस दिन भारत को बदलने से कोई नहीं रोक सकेगा, भारत का ही नहीं हर देश का भविष्य ट्रिपल पी पर ही टिका है। जनसेवा के लिए बनी पुलिस अगर असल में ही जनसेवा करने लगे, और जनता की आवाज बुलंद करने के लिए बनी प्रेस उसकी आवाज को दबने से रोक पाए और पब्लिक एक सही सरकार चुन सके तो वो दिन दूर न होंगे। जब भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाएगा।

देश का बेड़ा गर्क करने में बिगड़ चुकी ट्रिपल पी का बहुत बड़ा दु-योगदान है। आज की प्रेस पैसे वाले की हो गई, इसलिए तो जनमत तैयार करने वाली प्रेस लोगों को भ्रमित करने के लिए अलावा कुछ नहीं करती। सनसनी फैलानी हो, किसी को स्टार बनाना हो, वोट बैंक तैयार करना हो तो आज की प्रेस सबसे अच्छा साधन है, लेकिन बुराइयों के खिलाफ जनमत नहीं बना सकती, पैसे वालों के हाथ की कठपुतली बन चुकी ये प्रेस।

जन सेवा के लिए बनी पुलिस धनवानों के दरवाजे पर गाढ़े हुए खूंटे पर कुत्ते की तरह पहरा देती है, और गली से निकले वाले गरीबों पर भौंकती है, इतना ही नहीं कभी कभी तो नोंचने से भी बाज नहीं आती।
पैसों की लालसा में अंधी हुई पुलिस गरीब को ऐसे लेती है कि जैसे कुत्ता हड्डी को।

पब्लिक तो हमेशा की तरह मौन ही है, और पता नहीं कब इस का मौन टूटेगा। कब अपने वोट का सही इस्तेमाल कर पाएगी। कुछ रुपयों के लिए पांच साल की खातिर अपना भविष्य बेचने वाली पब्लिक को जागना होगा। वरना, गांव के युवाओं को जैसे ट्रिपल एक्स ने बिगाड़ दिया, वैसे ही देश को ट्रिपल पी खत्म कर देगी।


मैं बार बार गांव के बिगड़ैल युवाओं की बात क्यों कर रहा हूं, आपके जेहन में सवाल उठ रहा होगा, मैंने अपनी जिन्दगी के कई साल भारत की रूह माने जाने वाले गांवों में गुजारें हैं, ज्यादातर गांवों में शादी से पहले ही युवा ट्रिपल एक्स यानी नीली फिल्में कई दफा देख लेते हैं और उसको वो रियल लाईफ में उतारने की कोशिश भी करते हैं। जिसके कारण उनकी लाईफ पार्टनर उम्र भर किसी गुप्त रोग का शिकार हो जाती है। ऐसी हजारों उदाहरणें मेरे जेहन में हैं, जिनका उदाहरण दूंगा तो आपको शर्म आएगी, क्या ऐसे होता है महिलाओं के साथ, सच पूछो तो गांव में आज भी औरत एक सैक्स की वस्तु है और कुछ नहीं।

तब तक पैदा होंगे जिन्ना

कोई माने या ना माने, लेकिन मेरा तो यही माना है कि किसी को जिन्ना करार देने में और खुद को गांधी कहने में केवल दो मिनट लगते हैं। अगर यकीन न आता हो तो बाल ठाकरे का वो लेख देखा जा सकता है जो पिछले दिनों सामना में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने अपने ही भतीजे को जिन्ना का नाम दे दिया। इस लेख के प्रकाशित होने के बाद राज ठाकरे एक बार फिर से चर्चा में आ गया, वो कहां कम था, उसने भी पोल खोल दी कि संपादकीय कौन लिखता है सब जानते हैं। लेकिन राज ठाकरे को जिन्ना कहकर खुद को गांधी साबित करना कहां तक ठीक है। शायद 6वीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद रंगों की दुनिया में रहने वाले बाल ठाकरे भूल गए कि उन्होंने भी जवानी के जोश में वो ही किया था, जो आज राज ठाकरे कर रहा है, वो कार्टूनों का सहारा नहीं ले रहा, ये बात दूसरी है।

जिन कार्टूनों से बाल ठाकरे अपना घर चलाते थे, अब उन्होंने उन्हीं कार्टूनों से एक राजनेता बनने की तरफ कदम बढ़ा लिया, अपने हुनर को हथियार बना लिया। जिस मुम्बई के स्कूल ने उनको फीस न भरने के चलते निकाल दिया था, उन्होंने जवानी पार करते करते उस मुम्बई पर अपनी पकड़ बना ली। एक कार्टूनिस्ट शिव सेना के गठन से एक नेता बन गया। जब वो मराठीवाद के हक में लड़ाई लड़ रहे थे, शायद उनको तब जिन्ना का खयाल नहीं आया होगा क्योंकि अगर उनको जिन्ना का खयाल आ जाता तो शायद वो शिव सेना प्रमुख कभी न बन पाते।

बाल ठाकरे ने भाजपा के साथ हाथ मिलाकर राजनीति में कदम रखते हुए मराठीवाद को थोड़ा सा खुद से दूर कर शिवसेना को विशाल करने का मन बना लिया। मुश्किल तब आई, जब उनकी पार्टी के लिए दिन रात काम करने वाले राज ठाकरे उनके भतीजे ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया, कोई बोले भी
क्यों न। बाल ठाकरे ने शिव सेना के उस पद पर अपने छोटे बेटे को बिठा दिया, जिस पर बिराजमान होने के लिए राज ठाकरे उत्सुक थे।

इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि राज ठाकरे ने बाल ठाकरे की संगत में रहते हुए कई गुर हासिल किए, वरना राज ठाकरे खुद की पार्टी बनाने की सोच भी नहीं सकता था। उसने वो ही हथियार उठाया, जिसको लेकर एक कार्टूनिस्ट शिव सेना प्रमुख बन गया।

अब जब राज ठाकरे मराठियों के हितों की बात करता है, तो वो जिन्ना लगने लगा है शिव सेना को, क्योंकि अब शिव सेना की शाख हिलने लगी है। लोगों को राज ठाकरे के रूप में खोया हुआ बाल ठाकरे मिल गया, जो कभी मराठीवाद की आवाज बना था।

कभी कभी मुझे लगता है कि जिन्ना का जन्म भी इन्हीं हालातों में हुआ होगा, वरना मुस्लिम हिंदु भाईचारे का प्रतीक माना जाने वाला व्यक्ति देश के बंटवारे का जिम्मेदार कैसे बन सकता है। जिन्ना को अच्छे लोगों में गिने वाले गोखले से महात्मा गांधी भी प्रभावित थे, फिर गोखले की निगाहें धोखा कैसे खा सकती हैं। देश की आजादी में भगत सिंह से लेकर हजारों नौजवानों ने जान की बाजियाँ लगा दी, लेकिन देश का राष्ट्रपिता कौन बना माहत्मा गांधी? जब देश को आजाद करवाने के लिए बच्चा बच्चा जान देने को तैयार हो, आप किसी एक को श्रेय कैसे दे सकते हैं। शहीद-ए-आजम भगत सिंह को पुत्र का रुतबा भी ये देश नहीं दे सका, क्योंकि वो कांग्रेस के करीबी नहीं थे, लाला लाजपत राय को भूल गया ये समाज क्यों कि वो राजनीतिक दाँवपेज नहीं जानते थे, कभी किसी ने सवाल क्यों नहीं उठाया कि राहुल गांधी, वरुण गांधी, सोनिया गांधी, क्या वो गांधी की संतान हैं। इंदिरा गांधी के पति देव फिरोज शाह को महात्मा गांधी ने अपना नाम दे दिया। अगर नेहरू की बेटी को गांधी अपना नाम दे सकता है तो क्या वो गांधी को बदले में कुछ नहीं देगा क्यों उसके बाद तो गांधी उनके रिश्तेदार जो बन गए थे। अगर आज भी भारत में कोई फारंगी घूमने के लिए आए और जब वो पूरा देश घूम ले। उसके बाद कोई जाकर उससे पूछे आपको भारतीय कैसे लगे, वो शायद हैरान हो जाएगा। मुझे कोई भारतीय नहीं मिला, मुझको मराठी, पंजाबी, गुजराती, असमी, बंगाली लोग मिले, लेकिन भारतीय तो कोई न था। ये भी डायोजनीज की तरह रह जाएगा, जो दिन में भी लैंप लेकर घूमता था, और तलाश करता था मानव की, उसको मरते दम तक मानव नहीं मिला।

महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि देने वाले आज तक राष्ट्र को एक लड़ी में नहीं पिरोय सके, जब पूरा देश एक लड़ी में नहीं आ सकता, तब तो वो राष्ट्र कैसे हो सकता है। अगर राष्ट्र नहीं तो राष्ट्रपिता कैसा।

मेरा मानना है कि जब जब किसी को छोटा कर आंका जाएगा, या नजरंदाज किया जाएगा, तब तब जिन्ना पैदा होंगे। हर राज्य में जिन्ना बैठे हैं, हर घर में जिन्ना बैठा है। राज ठाकरे भी उसकी नजरंदाजगी का मारा हुआ है, पंजाब में भी जिन्नाओं की कमी नहीं, सिमरनजीत सिंह मान भी अलग देश की मांग कर रहा है क्या वो भी जिन्ना है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी भी अब टुकड़ियों में बंटती जा रही है, क्या उसको तोड़ने वाले जिन्ना हैं। हर जिन्ना के पैदा होने के पिछे कोई न कोई तो कारण है। जिसकी पड़ताल करनी जरूरी है।



पंजाबी जानने वालों के लिए धमाका न्यूज



मैं पंजाब का रहने वाला हूं और पंजाबी माँ बोली को कैसे भूल सकता हूं। इस लिए मैंने बहुत पहले ब्लॉग तो शुरू कर लिया था,लेकिन सरगर्म अब हुआ हूं। मैंने उस पर ऑनलाइन नावल पंजाबी में इश्क दे वरके भाव इश्क के पन्ने शुरू किया है। पढ़ने के लिए एक बार जरूर आओ। अच्छा लगे तो टिप्पणी छोड़ जाना, बुरा लगे तो वो भी लिख जाना। मुझे दोनों चीजें पसंद हैं।