कागज से बना रावण, कब तक जलाते रहोगे


कागज से बना रावण, कब तक जलाते रहोगे
और कितने दिन खुद को मूर्ख बनाते रहोगे

अब छोड़ो यूं पुतले बनाकर जलाने
हकीकत में रावण को जलाना सिखो
रावण सी हैं कई समस्या देश में
सब जोश के साथ उसको मिटाना सिखो
यूं झूठी जीत का जश्न कब तक मनाते रहोगे
कागज से बना रावण, कब तक जलाते रहोगे

गरीब की इच्छा, आजादी, उड़न
जहां तक नींद अगवा है
मैं अकेला कहता नहीं यारों
पूरा देश इसका गवाह है
झूठी आजादी का स्वांग कब तक रचाते रहोगे
कागज से बना रावण, कब तक जलाते रहोगे

शहीदों को तो बस फूल मिले
मिली कुर्सी स्वार्थियों को
बस वोट बैंक बनाकर रख दिया
अपनों और शर्णार्थियों को
कब तक आंख मूँदे यूं ही बटन दबाते रहोगे
कागज से बना रावण, कब तक जलाते रहोगे


दसमें दिन मां दुर्गा क्यों नहीं

हर बार नवरात्र समाप्त होते ही दसमें दिन श्रीराम एक नायक के रूप में उभरकर सामने आते हैं, और रावण खलनायक के रूप में पेश किया जाता है। विजयदशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी देखा जाता है। मैंने शायद एक दो बार ही रावण को जलते हुए देखा है, शायद एक दफा बठिंडा और एक दफा पिछले साल इंदौर में। आज भी रावण जलेगा, और राम एक नायक के रूप में उभरकर आएंगे, लेकिन पिछले कुछ दिनों से सोच रहा था कि नौ दिन मां के और दसमें दिन नायक बनकर श्रीराम सामने आ जाते हैं। मां दुर्गा को नायक क्यों नहीं बनाया जाता, जिसने नौ दिन तक महिसासुर से युद्ध कर दसमें दिन विजय प्राप्त करते हुए स्वर्ग लोक और अन्य देवी देवताओं को बचाया। महिसासुर के पुतले क्यों नहीं जलाए जाते, क्यों जहां भी महिला के साथ अन्याय होता आ रहा सालों से। क्यों किसी ने आवाज नहीं उठाई। क्यों हर साल रावण को ही जलाया जाता है, क्या मां दुर्गा ने बुराई पर जीत दर्ज नहीं की थी, क्या महिसासुर बुराई का प्रतीक नहीं था। मां के नौ दिन खत्म होते ही पुरुष जाति की अगुवाई करते हुए श्रीराम एक नायक के रूप में उभर आते हैं, मां दुर्गा को क्यों नहीं पेश किया जाता। महिलाओं की शक्ति का प्रदर्शन क्यों नहीं किया जाता, जब सब देवताओं की महिसासुर के आगे एक नहीं चल रही थी, जब स्वर्ग लोक संकट में था, तब मां दुर्गा ने महिसासुर का वध कर स्वर्ग लोक को नया जीवन दिया। रावण और राम की जाति दुश्मनी थी, शास्त्रों के हिसाब से जिसको लक्ष्मण ने शुरू किया और रावण की मौत के साथ अंत हुआ था। हर साल रावण को जलाने के लिए करोड़ों रुपए पानी के तरह बहा दिए जाते हैं, वातावरण को प्रदूषित कर दिया जाता है। लेकिन कभी उस रावण के साथ किसी ने खुद के भीतर बैठे रावण को जलाया, जो अन्य लोगों की भावनाओं को अगवा करने के सिवाय कुछ कर ही नहीं सकता।

शेयर-ओ-शायरी

पिंजरों में बंद परिंदे क्या जाने कि पर क्या होते हैं,
कुएं के मेंढ़क क्या जाने यारों समंदर क्या होते हैं,
जंगलों में भटकने वाले क्या जाने घर क्या होते हैं,

भागती जिन्दगी में अपनों संग वक्त बिताना मुश्किल है,
जैसे मंदिर मस्जिद के झगड़े में इंसां बचाना मुश्किल है,

मैं मंदिर, मस्जिद और चर्च गया,
न जीसस, न अल्लाह और न राम मिला
जब निकल बाहर
तो इनके नाम पर दंगा फसाद आम मिला

सुधारो, बिगाड़ो न हिन्दी को


मुझे गुस्सा आता कभी कभी अखबार समूहों के बड़े बड़े ज्ञानियों पर जब वो लिखते हैं कि 'राहुल का स्वयंवर' ! खुद को हिन्दी के सबसे बड़े हितैषी कहते हैं, लेकिन हिन्दी के शब्दों के सही अर्थ देखे बिना ही बस झेपे जा रहे हैं फटे नोटों पर चेपी की तरह। सीता माता ने स्वयंवर रचा था, वो सही था क्योंकि सीता माता ने स्वयं के लिए वर चुना था, जिसको मिलकर एक शब्द बना स्वयंवर मतलब खुद के लिए वर चुनना।

अगर उस समय श्री राम स्वयं के लिए वधू चुनते तो क्या तब भी उसको स्वयंवर कहा जाता, कदापि नहीं क्योंकि उस समय के लोगों की हिन्दी आज से कई गुना बेहतर थी, वो स्वयंवधू कहलाता। वर लड़की चुनती है और वधू लड़का। शायद मीडिया राखी का स्वयंवर देख भूल गया कि स्वयंवधू नामक भी कोई शब्द होता है।
हां, तब शायद राहुल का स्वयंवर शब्द ठीक लगता, अगर वो भी लड़कों में से ही अपना जीवन साथी चुनते, दोस्ताना फिल्म की तरह।

मुझे लगता है कि राहुल को ऐसा ही करना चाहिए, क्योंकि वो लड़की के साथ तो शादी जैसा संबंध निभा नहीं पाए, शायद लड़कों संग चल जाए जिन्दगी की गाड़ी। कभी कभी सोचता हूं कि कि मीडिया वाले भी इस लिए राहुल का स्वयंवर लिख रहे हैं, उनको भी पता चल गया कि राहुल अब लड़की से नहीं, लड़के से शादी करने जा रहा है।

आशीर्वाद भी बनता है आर्शीवाद
ऐसे ही एक और शब्द, जो हर बार गलती का शिकार होता है और बन जाता है आर्शीवाद। जबकि देखा जाए तो सही शब्द होता है आशीर्वाद। मैं हिन्दी क्षेत्र से नहीं, मैं पंजाब के बहुत पिछड़े हुए क्षेत्र स्थित एक सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं, जहां पर शिक्षक तो ऐसे रेगिस्तान में पानी जैसे। फिर भी शायद इन मीडिया वालों से अच्छी हिन्दी जानता हूं।


पेंटी, बरा और सोच

कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर रात को मंदिर घूमने का मन हुआ, सब घर से मंदिर के लिए निकले। यह मंदिर इंदौर शहर के बीचोबीच राजवाड़ा में स्थित है। जिस गली में मंदिर है, उस गली में लेडीज अंडरगार्मेंट से लैस बहुत सारी लारियां गली की एक साइड खड़ी होती हैं। पेंटी बरा एवं अन्य सामान लारी वालों ने टंग रखा होता है, ये स्थिति तो आपको कहीं भी दिखाई पड़ सकती है। जब हम वहां से गुजर रहे थे, मेरे साथ सबसे अगले चल रहे मेरे दोस्त ने इनको देखते हुए नजरें नीची कर ली और हंसने लगा। मैंने पूछा क्या हुआ? वो बोला देखो, सालों ने कैसे कपड़े लटकाए हुए हैं। मैंने कहा कि महिलाओं के भीतर पहने वाले कपड़े ही तो हैं, तुम जो अंडर गारमेंट पहनते हो, क्या वो अलग कपड़े से बने होते हैं। वो कहने लगा, मुझे याद आ गया जब मैं और वो यहां से गुजरते थे तो बहुत जल्दी से मैं उसके साथ इधर उधर नजर दौड़ाए बिना यहां से निकल जाता था, था इस लिए लिख रहा हूं अब वो किसी और की होने जा रही है। मैंने उसको कहा कि आज तुम 25 साल के हो गए, लेकिन आज भी तेरी सोच पच्चीस पहले वाले लोगों जैसी है।


वो कुछ नहीं बोला, मन ही मन में हंसता हुआ मेरे साथ आगे बढ़ गया। मैंने सोचा शायद, इसने भी अपनी प्रेमिका को पहली बार अन्य भारतीय युवाओं की तरह सबसे पहले पेंटी बरा ही गिफ्ट में दी हो गई। मैंने ज्यादातर युवक देखें हैं, जो सबसे पहले अपनी प्रेमिका को ये वाला गिफ्ट देते हैं। याद रहे मैं सब नहीं कह रहा। इसके भी कई कारण हो सकते हैं, शायद युवाओं का बजट कम होता है, या फिर प्रेमिका को वो गिफ्ट दिया जाए जो उसके घरवालों को भी पता न लगे, या फिर वो अपनी प्रेमिका को इन कपड़ों में देखना चाहते हैं। मैंने आज तक किसी को ऐसा गिफ्ट तो क्या कोई भी गिफ्ट नहीं दिया, जबकि मैंने भी लव मैरिज की है।

मुझे याद आ रहा है, एक दिन टीवी पर विज्ञापन चल रहा था, जिसमें हम साथ साथ हैं वाली अदाकारा आती है, जो फिल्म में सलमान की मां का रोल अदा करती है। वो पेंटी का विज्ञापन कर रही थी, इस विज्ञापन को देख कर मेरे बगल मैं बैठे एक पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करके आए युवक ने जोर जोर से हंसना शुरू कर दिया। बोला साले ये भी क्या दिखाते रहते हैं, मैंने सोचा, बचपन से चड्ढी की मशहूरी देखता आया है तब तो ऐसे कभी नहीं बोला होगा। अगर आज महिलाओं के लिए बने अंडरगार्मेंट की टीवी पर एड आ गई तो ये बोल रहा क्या दिखा रहे हैं। आखिर इसमें बुराई है क्या है, कपड़े ही तो हैं, लेकिन आदमी की सोच का क्या करें। जो आज भी कई साल पहले वाले व्यक्तियों की तरह सोच रखता है। कितनी इत्तफाक की बात है जब मल्लिका शेरावत, करीना कपूर, मनिषा लांबा बिकनी पहनकर समुद्र से निकलती हैं तो सबसे ज्यादा तालियां सिनेमा हाल में युवा ही बजाते हैं, तब इनकी निगाहें इस गली से निकलते वक्त की तरह क्यों नहीं झुकती? तब इनके भीतर की शर्म कहां मर जाती है? महिलाओं के कपड़ों में नहीं दोष तो इनकी आंखों और सोच में है।


जलाल देखा

आज कई दिनों के बाद
तेरे चेहरे पे खुशी का जलाल देखा

ए बिछोह के सुल्तान
फिर तेरे मनांगन को खुशहाल देखा

तुम खुश क्या हुए
हकीकत में बदलता हुआ ख्याल देखा

तेरे चेहरे का नूर देख
दुश्मनों के लबों पर आया सवाल देखा

लौटी तेरे घर खुशी
हैपी ने आँख से कुदरत का कमाल देखा


'अजब प्रेम..' पर टिका संतोषी का भविष्य


अगर हिन्दी फिल्म जगत के फिल्म निर्देशकों की बात की जाए तो राजकुमार संतोषी का नाम न लिया जाए तो शायद बात अधूरी सी लगेगी। उनकी फ्लॉप फिल्मों ने उनके कैरियर में एक काला अध्याय लिख दिया है, लेकिन फिर भी एक समय था जब राजकुमार संतोषी की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर खूब तालियां एवं पैसा बटोरती थी। अब बहुत जल्द राजकुमार संतोषी अपनी अगली फिल्म 'अजब प्रेम की गजब कहानी' लेकर आए रहे हैं, लेकिन मन में सवाल उठता है कि श्री संतोषी जी युवा दर्शकों को संतुष्ट कर पाएंगे ? मेरे दिमाग में ये सवाल इस लिए आया, क्योंकि पिछले साल रिलीज हुई उनकी फिल्म 'हल्ला बोल', उनकी 1993 में रिलीज हुई दामिनी से काफी मिलती जुलती थी। जिसके कारण उनकी ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा समय टिक नहीं पाई, बेशक इस फिल्म में पंकज कपूर के काम को ज्यादा प्रशंसा मिली।


संतोषी और देओल परिवार की जोड़ी बॉक्स ऑफिस पर खूब गजब ढाहती थी, लेकिन आजकल दोनों ही परिवार बुरे दौर से गुजर रहे हैं। संतोषी और देओल नाम की युगलबंदी ने हिन्दी फिल्म जगत को घायल, दामिनी, घातक, बरसात जैसी हिट फिल्में दी। इसके बाद संतोषी ने अजय देवगन से हाथ मिला लिया, वो भी सन्नी देओल की तरह संतोषी के लिए शुभ साबित हुआ। इस जोड़ी ने भी हिन्दी फिल्म जगत को 'लज्जा', द लीजेंड ऑफ भगत सिंह, खाकी जैसी हिट फिल्में दी। लेकिन इस जोड़ी की हल्ला बोल पिछले साल रिलीज हुई, जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिटी, क्योंकि थीम बहुत पुराना था। इसके बाद अजय और संतोषी में अनबन होने की बातें आई। इस दौरान बातों पर विराम लगाने के लिए संतोषी ने अजय काजोल को लेकर रामायण बनाने के घोषणा कर दी।


मगर ये घोषणा भी शायद अजब प्रेम की गजब कहानी पर ही टिकी होगी, अगर न्यू कपूर स्टार रणबीर कपूर और अक्की की लक्की गर्ल कैटरीना कैफ के साथ अजब प्रेम की गजब कहानी बॉक्स ऑफिस पर गजब न कर सकी तो शायद एक समय के सुपर हिट निर्देशक की ताकत पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए बॉलीवुड उनको नकार देगा, क्योंकि बॉलीवुड की आदत है कि चढ़ते सूर्य को सलाम करो। जहां तक खुद फिल्म निर्माण क्षेत्र में उतरने की बात है, ये दाँव तो वो बहुत पहले से ही खेल चुके हैं। लज्जा और चाइना गेट में स्टारों की संख्या भी फिल्म को उस पर लगी लागत वापस नहीं दिला सकी।


मन तो वो भी मैला करते थे

कल जब दो बातें एहसास की पर लोकेन्द्र विक्रम सिंह जी द्वारा लिखत काव्य ""कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं..."" पढ़ रहा था तो अचानक मेरे मन के आंगन में भाव्यों की कलियां खिलने लगी, जिनकी खुशबू मैं ब्लॉग जगत में बिखेरने जा रहा हूं।

धूप सेकने के बहाने, गर हम छत्त पे बैठा करते थे,
वो भी जान बुझकर यूं ही आंगन में टहला करते थे।
हम ही नहीं जनाब, मन तो वो भी मैला करते थे॥

जब जाने अनजाने में नजरें मिला करती थी।
दिल में अहसास की कलियां खिला करती थी।।
बातों के लिए और कहां हुआ तब एयरटेला* करते थे।
हम ही नहीं जनाब, मन तो वो भी मैला करते थे॥

जुबां काँपती, शरीर थर-थर्राता जब पास आते।
कुछ कहने की हिम्मत यारों तब कहां से लाते॥
पहले तो बस ऐसे ही हुआ मंजनू लैला करते थे।
हम ही नहीं जनाब, मन तो वो भी मैला करते थे॥

गूंगी थी दोनों तरफ मोहब्बत फल न सकी।
मैं उसके और वो मेरे सांचों में ढल न सकी॥
पाक थे रिश्ते अफवाह बन हवा में न फैला करते थे।
हम ही नहीं जनाब, मन तो वो भी मैला करते थे॥

इंदौर आएंगे क्या खाएंगे-पार्ट 2

सुबह सुबह जब आप उठते हैं तो शायद आपको चाय और घर में बना हुआ कुछ खाने को मिल जाए। पंजाब में तो ज्यादातर स्कूली बच्चों और आफिस जाने वालों को चाय के साथ पराठे मिल जाते हैं नाश्ते के तौर पर। मगर इंदौर में सुबह सुबह पोहा जलेबी मिलता है, खासकर उनको जो इस शहर में घर परिवार के साथ स्थापित नहीं, बाहर से आए हुए हैं। इंदौर के हर कोने पर सुबह सुबह आपको लोग पोहा जलेबी खाते हुए मिलेंगे। जब मैं इस शहर में आया था तो तब मैं भी इसका आदि हो गया था, लेकिन धीरे धीरे दूरी बढ़ती गई। पोहे के साथ जलेबी बहुत स्वाद लगती है, लेकिन हम तो पोहा जलेबी के बाद चाय भी पीते थे, हमारा चाय के बगैर चलता नहीं। सुबह सुबह छप्पन पर लोगों की भीड़ आपको हैरत में डाल सकती है, पलासिया स्थित छप्पन दुकान पर लड़के लड़कियों की युगलबंदी तो आम ही मिल जाती हैं। वैसे कहूं तो इंदौर में छप्पन दुकान का नाम लव प्वाइंट भी रखा जा सकता था। कुछ लोग सुबह सुबह पेट की भूख मिटाने आते हैं और कुछ लोग यहां आंखें सेकने और दिल जलाने आते हैं। छप्पन पर प्रेमी परिंदों के लिए हर चीज उपलब्ध है, साईबर कैफे, मिठाई शॉप, आईक्रीम शॉप, गिफ्ट शॉप, रेस्टोरेंट वगैरह वगैरह। यहां पर सुबह दोपहर एवं शाम को पेट पूजा की जा सकती है। यहां पर साउथ इंडियन खाने से लेकर प्रसिद्ध राज्यों के व्यंजनों की लिखी हुई लिस्टें मिल जाएंगी। लेकिन आपको मेरा एक निवेदन है कि सरसों का साग और मक्के की रोटी मत खाना। और तो और छप्पन के सपीम बैंक एटीएम भी हैं, अगर बिल ज्यादा हो जाए तो कोई दिक्कत नहीं, आप एटीएम इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर कहीं छप्पन से दिल भर जाए तो छप्पन से कुछ दिन रेलवे स्टेशन की तरफ टीआई है, जहां पर बिग बाजार, सिनेमाघर, भूत बंग्ला, पिज्जा हट, मैकडोनल के अलावा भी बहुत कुछ है, आज तक इंदौर में सब से ज्यादा भीड़ खींचने वाला मॉल था, लेकिन अब इसको टक्कर देने के लिए सैंटरल मॉल, मंगलसिटी, मॉल 21 आदि खुल चुके हैं। बोर होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। टीआई में तो पिज्जा हट एवं मैकडोनल के अलावा राजधानी रेस्टोरेंट भी है, इसका खाना महंगा जरूर है लेकिन स्वादिष्ट भी बहुत है। इसके अलावा आप अगर मंगलसिटी की तरफ रुख करते हैं तो आपको चाट चौपाटी रेस्टोरेंट मिल जाएगा। शाम को यहां पर खूब भीड़ रहती हैं, सब कुछ वाजिब दाम में जो खाने को मिल जाता है। टीआई से मंगलसिटी जाते हुए रास्ते में एबी रोड पर उत्तम भोग है, जिसके व्यंजन भी उत्तम हैं खाने के लिए। अगर आप घासा फूस के अलावा भी कुछ खाते हैं तो आप नफीस जा सकते हैं, ये भी एबी रोड स्थित है। कहते हैं कि नफीस फिल्म सितारे सलमान खान के चाचा है, लेकिन इसमें कितनी सचाई है ये तो सलमान खान को मिलकर ही पता करनी पड़ेगी। नफीस के अलावा इंदौर में मदनी भी नॉन वेज खाने के लिए मशहूर है, बिल्कुल रेलवे स्टेशन के पास। लेकिन मैंने दोनों जगह चखा नहीं क्योंकि मैं तो केवल घास फूस खाता हूं।

इंदौर आएंगे तो क्या खाएंगे ? सोचिए मत

इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया, लेकिन मैंने शहर को क्या दिया अक्सर सोचता हूं? कल जब मैं राजवाड़ा से निकल रहा था तो मैंने सोचा क्यों न, इस शहर की अच्छी चीजों को इतर की तरह हवा में फैलाया जाए ? क्यों न किसी को बातों ही बातों में कुछ बताया जाए? मुझे इस शहर में आए तीन वर्ष होने वाले हैं, लेकिन अब भी सीने में धड़कते दिल में पंजाब ही धड़कता है, उस मिट्टी की खुशबू को मैं आज भी महसूस कर सकता हूं पहले की भांति, लेकिन बुजुर्गों ने कहा है कि जहां का खाईए, वहां का गाईए।

इस लिए मैं इस शहर का भी थोड़ा सा कर्ज उतार रहा हूं। इंदौर मध्यप्रदेश की कारोबारिक राजधानी कहलाता शहर है, इसके दिल में बसता है राजवाड़ा, जहां पर आपको सूई से लेकर जहाज तक मिल जाएगा। जहां पर आप वो बड़े जहाज को भूलकर बच्चों वाला जहाज समझिए बेहतर होगा। जब भी मैं इस बाजार में आता हूं तो सबसे पहले या सबसे बाद में सराफा बाजार जाना नहीं भूलता, सराफा बाजार में जहां दिन के वक्त सोना चांदी बिकता है तो शाम को आपको तरह तरह के व्यंजनों का स्वाद चखने को मिलता है, एक इंदौर में यही स्थान है जो देर रात तक आपको खुला मिलेगा। यहां स्थित एक दुकान पर जाना नहीं भूलता, इस दुकान का मालिक खुद को गुलाम कहता है और ग्राहक को मालिक, लेकिन अपने स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों से आपको अपना गुलाम बना लेता है।

इस गुलाम कर देने वाले गुलाम का नाम है जोशी दही बड़े वाला। जितना स्वादिष्ट इसका दही बड़ा है, उससे कई गुना ज्यादा स्वादिष्ट इसकी जुबां है। जुबां की तरह इसकी दही एकदम मीठी और स्वादिष्ट, मैंने पंजाब में भी ऐसी तो नहीं खाई, जबकि मेरे घर पांच भैंस हुआ करती थी, जब मां थी, अब तो एक है वो भी घरवालों से संभाली नहीं जाती। मां तो मां थी, उसकी तो बात ही कुछ अलग थी।

सच में ऐसी दही तो कहीं नहीं खाई, जहां तक कि मैं गुजारात भी गया हूं, गुजरात में मेरा सुसराल है, मैं पंजाबी, मेरी मां पंजाबी, मेरा पिता पंजाबी, लेकिन मेरी पत्नी बिल्कुल गुजराती। गुजराती से ज्यादा आया, गुजराती खाना भी स्वादिष्ट होता है। वैसे भी जब भूख लगी हो तो कोई भी खाना स्वादिष्ट लगता है, लेकिन अगर आपका इंदौर आना हो, और खाना खाने का मन करे तो गुरूकृपा जाना मत भूलिए, एकदम मस्त खाना, सर्विस भी एकदम फास्टक्लास, जेबखर्ची भी ठीक ठाक, अगर आप संडे और किसी अन्य छुट्टी वाले दिन शाम को खाना खाने यहां पहुंचे तो शायद आपको लाइन में लगकर कई घंटों तक इंतजार करना पड़ सकता है।

गुरूकृपा का खाना और सर्विस दोनों ही बहुत उम्दा हैं, लेकिन मैंने माया रेंजीडेंसी के बारे में भी बहुत सुना है, लेकिन वहां खाना चखने का मौका नहीं मिला, वैसे कहा जाता है कि वहां का मालिक भी पिछले दो दशकों से खाना अपने इस टिकाने पर ही खाता है। इंदौर बहुत बड़ा है, और खाने पीने के और भी हैं टिकाने, मैं अभी गया नहीं, इस लिए अच्छे नहीं बताने, फोकट में पैसे आपके लगवाने, फिर भी चोटी वाले के रेसटोरेंट में भी जा सकते है, खाना अच्छा है, उसका आप खा सकते है। आज के लिए इतना ही।

वो निकलती थी...

वो निकला करती थी
पेड़ों की छाया में,
मैं भी मिला करता था
पेड़ों की छाया में,

अच्छा लगता था,
उसका बल खाकर चलना
पेड़ों की छाया में,

बुरा लगता था
विछड़ना और दिन डलना
पेड़ों की छाया में,

बहुत अच्छा लगता था,
खेतों, खलियानों को चीरते हुए मेरे गांव तलक उसका आना
पेड़ों की छाया में,

पहली मुलाकात सा लगता था,
कड़कती धूप में घर से निकलकर
उसके आगोश में जाना
पेड़ों की छाया में,

याद है मुझे आज भी
इस नहर में डुबकी लगाना
पेड़ों की छाया में,

लहू के धब्बे बनते हैं 'कुमारित्व' के गवाह


पिछले महीने अफगानिस्तान की ओर से खबर आई थी कि अगर पति की सैक्स भूख को एक पत्नी शांत नहीं करती तो उसको भूखे पेट रहना पड़ सकता है, लेकिन कुछ दिन पहले एक ऐसी ही मन को झिंझोड़कर रख देने वाली एक और खबर पढ़ने को मिली। यहां की महिलाओं के लिए शादी के बाद की पहली रात सुहागरात नहीं बल्कि इम्तिहान की रात होती है, अगर इम्तिहान में असफल हुई तो बदले में मिलेगा तलाक।

जी हां, पामीर की खूबसूरत पहाड़ियों की कोख में बसे ताजिकिस्तान की खूबसूरत महिलाओं को एक कड़े इम्तिहान से गुजरना पड़ता है, क्योंकि आज भी वहां के मर्दों की सोच पर वो ही पुरानी कबिलाई मानस्किता हावी है। वो आज भी चादर पर खून के धब्बे देखकर महिला की कौमार्य या कुमारित्व का पता लगाते हैं, अगर वो असफल हुई तो वो अगली सुबह शादीशुदा नहीं बल्कि तलाकशुदा कहलाएगी।

रूस यात्रा पर गई प्रतिभा पाटिल के साथ यात्रा कर रहे नई दुनिया के स्थानीय संपादक जयदीप कार्णिक की 8 सितम्बर को प्रकाशित हुई रिपोर्ट कुछ ऐसा ही खुलासा करती है। जहां ताजिकीस्तान की महिलाओं को इस इम्तिहान से गुजरना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ हॉलीवुड की सुंदरी मैगन फॉक्स बड़े बिंदास ढंग से कहती है कि उसने केवल 17 साल की आयु में ही कुमारित्व खो दिया था, वो किसी के प्यार में पागल थी, जिसका वो नाम नहीं लेती।

आज के समय में अगर भारतीय ताजिकीस्तानियों की इस सोच पर अमल करने लगे तो शायद बहुत कम लड़कियां इस इम्तिहान में पास होंगी। आज की कड़वी सचाई है, लेकिन सवाल तो ये है कि कुमारित्व की परीक्षा केवल लड़कियों को क्यों देनी पड़ती है, मर्दों के लिए कोई मापदंड क्यों नहीं। मुझे याद आ रही है बहुत साल पहले दैनिक जागरण द्वारा पहले पन्ने के बॉटम पर प्रकाशित एक शोध आधारित खबर, जिसमें लिखा गया था कि 70 से ज्यादा फीसदी लड़कियां कौमार्य शादी से पहले ही खो देती हैं, शायद तब मैं तो इसका अर्थ भी न जानता था। उस बात को पांच छ: साल हो गए, आज तो ये संख्या बढ़कर और भी हदें पार कर गई होगी, लेकिन इसके लिए भी दोषी ज्यादा तो मर्द ही होता है।

पिछले दिनों बीबीसी में छापी एक रिपोर्ट के मुताबिक हर तीसरी किशोरी सैक्स की डिमांड पूरी न करने के कारण अपने पुरुष मित्र के गुस्से का शिकार होती है। बहुत सी लड़कियां तो झूठा मूठा प्यार करने वाले फरेबियों के चक्कर में आकर कुमारित्व खो लेती हैं। मैगन फॉक्स जैसी बोल इसलिए देती है कि क्योंकि उनको इससे पब्लिसिटी मिलती है, जबकि आम महिलाओं को इसका खुलासा करने के बाद केवल बदनामी, तिरस्कार ही मिलेगा।


ख़बर से पता चल रहा था कि वहां की महिलाएं मर्दों के मुकाबले ज्यादा कर्मठ, मेहनती एवं हिम्मत वाली हैं, लेकिन फिर भी इस अग्निपरीक्षा से उनको ही गुजरना पड़ता, कितनी हैरानी की बात है। जब मैं इस खबर को पड़ रहा था, तो दिमाग में एक सवाल बार बार उठ रहा था कि वहां कोई भी इस सोच के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला नहीं, क्या इन कोखों ने कोई ऐसा शख्स नहीं जना, जो इनकी वकालत कर सके?


हड़ताल - काव्य

क्यों जी खाली हाथ आ रहे हो,
क्या बताउं भाग्यवान
जब बस स्टेंड पहुंचा तो
पता चला,
बस वालों की हड़ताल है।

पैदल पैदल बैंक पहुंचा तो
पता चला कि
बैंक वालों की हड़ताल है।

अपने गांव वाले बंते से पकड़े
कुछ पैसे उधार मैंने
लेकिन जब दुकान पहुंचा
तो जाना कि
दुकानदारों की हड़ताल है।

बस ठोकरें खाकर
खाली हाथ लौट आया,
चलो, तुम एक कप चाय तो
पिला दो।

कहां से बनाउं जी,
दूध गिरा दिया बच्चों ने,
सुबह से चाय की हड़ताल है।



मेरी मौत की खबर

मैं शिकार हो गया अपनों के ही धोखे का,
न करें इंतजार वो अब किसी मौके का,
मेरी मौत के चश्मदीदों, एक फजल कर दो
मेरे दुश्मनों को मेरी मौत की खबर कर दो

रुक गई सांस और शब्दों का कारवां
मैं धोखों की आंधी में हो गया फनां
मेरी मौत के चश्मदीदों, एक फजल कर दो
मेरे दुश्मनों को मेरी मौत की खबर कर दो

वक्त की साजिश, हुआ एक बड़ा हादसा
पल में रेत हो गया 'हसरतों का बादशाह'
मेरी मौत के चश्मदीदों, एक फजल कर दो
मेरे दुश्मनों को मेरी मौत की खबर कर दो

दुश्मन न मार सके, बस एक तन्हाई ने मारा
जान ली उसने, जो था हैप्पी जान से प्यारा
मेरी मौत के चश्मदीदों, एक फजल कर दो
मेरे दुश्मनों को मेरी मौत की खबर कर दो


आओ कप्म्यूटर के नोटपैड पर लिखें अपनी भाषा

अगर मेरी आज की पोस्ट आपके काम आ सकी तो, इस को आगे भी बढ़ा देना, चाहिए अपने ही ब्लॉग पर अपने ही नाम से। मेरा तो मक्सद सबको सुविधा देना है। इसके लिए आप सब का शुक्रिया होगा।

start से चलकर setting पर पहुंचे और वहां से control panel में प्रवेश करें। इसके बाद यहां पर regional and language options पर क्लिक करें। आपके सामने तस्वीर में दिखाया हुआ एक बॉक्स खुलेगा।

अब इस बॉक्स पर लिखे languages टैब पर क्लिक करें।

यहां पर आपको supplemental language support लिखा दिखाई दे रहा होगा। इसके तले आपको टिक करने के लिए दो ऑप्शन दिखाई दे रहें होंगे। अगर मैं ठीक जा रहा हूं तो आप पहले वाले पर क्लिक करें। बॉक्स के अंत में आपको ok cancel apply तीन ऑप्शन नजर आ रहे होंगे। apply बटन को दबाने से पहले आप अपने कम्प्यूटर में xp की सीडी डालिए, क्योंकि अब आपका कम्प्यूटर एक फाइल मांगेगा। वो आपकी एक्सपी की सीडी में है।

कहीं आप बोर तो नहीं हो रहे, अगर हो रहे हैं तो मुझे माफ करें। अब आप यहां क्लिक कर हिन्दी, पंजाबी, गुजराती एवं अन्य भाषाओं की आईएमई download करें। इस क्रिया के खत्म होते ही आप उस साफ्टफेयर को अपने कम्प्पूटर पर इस्टाल करें। बस अब तो आप करीब पहुंच चुके हैं। अगर भगवान ने चाहा तो बहुत जल्द आप अपने कम्प्यूटर की नोटपेड पर अपनी भाषा में लिख सकेंगे।


अब फिर से वहीं पर लौटें, कहने का भाव है कि regional and language options के languages टैब पर, अब आपको वहां पर डिटेल लिखा नजर आ रहा होगा।

आप कहें कि ये तो पहले भी आ रहा था, इसमें नई बात कौन सी है, लेकिन मैं कहता हूं आप इस पर क्लिक करें।

आपके सामने एक नया बॉक्स खुलता है। आपको जहां पर add और remove लिखा हुआ नजर आ रहा होगा।

आपको add पर क्लिक करना है। और नीचे दिखाई दे रहे बॉक्स के अनुसार आगे की क्रिया करें। दोनों बॉक्सों को क्रमश: देखें। आपके लिए उत्तम होगा।




इस इन सब क्रियाओं के बाद ये इस तरह का आपको नोटपेड खोलते ही नजर आएगा।

और अब यूनीकोड लिखे अपने कम्प्यूटर पर।

कीबोर्ड बदलने के लिए आपको सिर्फ आलट दबाकर सिफ्ट दबाना है। कभी इंग्लिश तो कभी तुम्हारी खुद की भाषा



मौन थी, माँ

आँख मलते हुए
उठा वो बिस्तर से
रोज की तरह

और उठाया
हठों तक लाया
चाय की प्याली को
हैरत में पड़ा,
देख उस अध-खाली को

मां के पास गया
और बोला
आज चाय इतनी कम क्यों है
तू चुप,
और तेरी आंख नम क्यों है

फिर भी चुप थी,
मौन थी, माँ
एक पत्थर की तरह
वो फिर दुहराया
मां चाय कम क्यों है
तेरी आंख नम क्यों है

फिर भी न टूटी
लबों की चुप
कैसे टूटती चुप
ताले अलीगढ़ के
गोरमिंट ने लगा जो दिए

मौन होंगी अब
कई माँएं
शक्कर दूध के भाव बढ़ा जो दिए

औरत

दुख-सुख, उतार-चढाव देखे सीता बन
हर तरह की जिन्दगी जी है औरत ने।

कभी सुनीता तो कभी कल्पना बन
जमीं से आसमां की सैर की है औरत ने।।

बन झांसी की रानी
लड़ी जांबाजों की तरह जंग औरत ने।

कभी मदर टैरेसा बन
भरे औरों के जीवन में रंग औरत ने॥

बेटी, बहू और मां बन
ना-जाने कितने रिश्ते निभाए औरत ने।

परिवार की खुशी के लिए
आपने अरमानों के गले दबाए औरत ने॥

जिन्दगी के कई फलसफे
ए दुनिया वालों पढ़ी है औरत।

फिर भी न जाने क्यों
चुप, उदास, लाचार खड़ी है औरत॥

मीरा, राधा और इन्हें जब जनी है औरत।
फिर क्यों औरत की दुश्मन बनी है औरत॥



सवाल

बादलों की तरह घूमते हैं सवाल
ध्वनि की तरह गूंजते हैं सवाल

पता नहीं आए कहां से कब सवाल
मुमकिन नहीं, समझे हम सब सवाल

रास्तों की तरह जुदा होते हैं सवाल
हम को कहां से कहां ढोते हैं सवाल

एक तूफान की तरह आते हैं सवाल
फिर कहीं गुम हो जाते हैं सब सवाल

कभी कभी रास्ता दिखाते हैं सवाल
कभी कभी कमजोर बनाते हैं सवाल

मन की उपज है या दिमाग की
न जाने कहां से ये आते हैं सवाल


आखिर हट गई सोच से रोक


गुजरात हाईकोर्ट ने जो फैसला जसवंत की किताब को लेकर सुनाया, वो बहुत सारे लेखकों के लिए एक खुशी की बात है, विशेषकर जसवंत सिंह के लिए। अगर गुजरात सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबंध न हटता तो हमको मिले अभिवक्ति के अधिकार का उल्लंघन होता। अपनी बात कहने का लोकतंत्र जब हमें मौका देता है तो उस पर रोक क्यों लगाई जाए? इतना ही नहीं गुजरात सरकार ने तो मूर्खतापूर्ण काम किया था, किताब को पढ़ने के बाद अगर प्रतिबंध लगता तो समझ में आता, लेकिन किताब को बिना पढ़े प्रतिबंध। आखिर कहां की समझदारी है? किताब रिलीज हुई, मीडिया ने बात का बतंगड़ बना दिया, उधर शिमला से हुक्म जारी होते ही इधर गुजरात सरकार ने किताब पर बैन लगा दिया गया वो भी बिना पढ़े।

जिन्होंने किताब पढ़ी सबने एक बात कही कि किताब में नया कुछ नहीं था, चाहे अरुण शौरी हो, या फिर हिन्दी में जिन्ना पर पहली किताब लिखने वाला श्री बरनवाल हो। प्रसिद्ध लेखक वेदप्रताप वैदिक तो यहां तक कहते हैं कि किताब में केवल पटेल का नाम सिर्फ छ: बार आया, और किसी भी जगह पटेल को नीचा नहीं दिखाया गया। जिस बात का रोना रोकर गुजरात सरकार ने किताब पर बैन लगाया था।

अरुण शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस में स्वयंलिखित प्रकाशित एक लेख में लिखा था कि जब इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र ने गुजरात के गृह विभाग से बात की तो उन्होंने कहा कि हमने तो किताब पढ़ी ही नहीं, बस किताब पर बैन लगाया है। कितनी शर्म की बात है कि आप किसी किताब को बिना पढ़े प्रतिबंधित कर देते हो। किताब भी एक सोच है, जिस पर प्रतिबंधित लगाना अभिव्यक्ति अधिकार की अवहेलना है। जसवंत ने तो किताब में वो बातें ही लिखी हैं जो इससे पहले कई लेखकों ने अपनी पुस्तकों में लिखी हैं, ऐसा ही कहना है तमाम किताब पढ़ने वालों का।

लेकिन जिन्ना की किताब पर उठे बवाल के बाद जो कुछ अखबारों में पढ़ने को मिला, वो तो बहुत अद्भुत था, उन्होंने भी जिन्ना को सही करार दे दिया। जी हां, पिछले दिनों जब में दैनिक भास्कर में लिखे कुछ लेख पढ़ रहा था तो मुझे वहां एक सही जिन्ना दिखाई पड़ रहा था, अगर जिन्ना बुरा होता तो गोखले और सरोजनी नायडू जैसी महान हस्तियां जिन्ना को हिन्दु मुस्लिम नेता की संज्ञा न देती। आखिर समय में जिन्ना ने तो वो किया, जो महात्मा गांधी बहुत पहले कर चुके थे, जनभावना का नेता बनना। गांधी की तरह जिन्ना भी मुस्लिम जन भावना का नेता बन गया। और बना लिया अलग देश। लेकिन जो उसने पहले देश के लिए किया। उसको नजरंदाज करना भी तो गलत बात होगा।

सवाल तो ये है कि आखिर हिन्दु मुस्लिम भाईचारे का प्रतीक नेता, एक भाईचारे का क्यों बन गया। आखिर उसने उदारवादी स्वाभाव में क्यों बदलाव किया। कुछ तो कारण रहें होंगे। फिल्मों में बहुत से नायक खलनायक वाला रास्ता चुन लेते हैं, लेकिन उनके पीछे कुछ तो वजह होती है न। वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाएं भी शौक से हर किसी के साथ हमबिस्तर नहीं होती, कुछ तो मजबूरी होती है। ऐसा ही कुछ जिन्ना के साथ हुआ। इसमें कोई दो राय नहीं कि जिन्ना में कुछ तो था, जो आरएसएस की पैदायश एलके आडवानी, गैरसंघी भाजपा नेता को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हुआ। तमाम सवाल हैं? जिनका उत्तर ढूंढने के लिए एक पक्षी सोच को बदलना होगा।

तेरा मेरा रिश्ता

मैं प्यासा हूं, तू नदिया है
मैं भँवरा हूं, तू बगिया है
तेरा मेरा रिश्ता सदियों पुराना
तेरा पता नहीं, मैंने तो ये माना



मैं हूं काव्य, तो तू कवि है
मैं हूं सुबह अगर तू रवि है
मैं कैदी हूं तो तू ही तहखाना
तेरा मेरा रिश्ता सदियों पुराना
तेरा पता नहीं, मैंने तो माना

मैं मुसाफिर तू रस्ता*1 है
मैं किताबें तू बस्ता है
मेरी आदत बस तुझमें समाना
तेरा मेरा रिश्ता सदियों पुराना
तेरा पता नहीं, मैंने तो माना

पिंजर हूं मैं और जान है तू
रिश्ते से क्यों अंजान है तू
राग अगर मैं तू ही तराना
तेरा मेरा रिश्ता सदियों पुराना
तेरा पता नहीं, मैंने तो माना

1.रास्ता

'शब्द'

अंगीठी में कोयलों से जलते शब्द।
आंखों में खाबों से मचलते शब्द।।

दिल में अरमानों से पलते शब्द।
समय के साँचों में ढलते शब्द।।

पकड़, कोरे कागद पे उतार लेता हूं मैं
फिर हौले हौले इन्हें संवार लेता हूं मैं

प्यारी मां के लाड़ प्यार से शब्द।
पिता की डाँट फटकार से शब्द ।।

बचपन के लंगोटिए यार से शब्द।
बहन भाई और रिश्तेदार से शब्द॥

पकड़, कोरे कागद पे उतार लेता हूं मैं
फिर हौले हौले इन्हें संवार लेता हूं मैं

मेरे जैसे यार कुछ बदनाम से शब्द।।
पौष की धूप, जेठ की शाम से शब्द।

करें पवित्र जुबां को तेरे नाम से शब्द।
अल्लाह, वाहेगुरू और राम से शब्द॥

पकड़, कोरे कागद पे उतार लेता हूं मैं
फिर हौले हौले इन्हें संवार लेता हूं मैं


एक ब्लॉगर कहत सब लेखक होए

एक ब्लॉगर कहत सब लेखक होए।
और ब्लॉगर पाठक बचा न कोए।।

तब मोहे मुंह से कुछ ऐसे वचन होए।
पाठक ही पाठक यहां, बस तुम ही सोए॥

तुम न जावत घर किसी के
तो तोरे घर कौन आए।

माना तुम उच्चकोटि के
घमुंडवा तो किसी न भाए॥

अपने घरीं सब राजा, रंक न कोए।
सब जावत वहीं, जहां इज्जत होए॥

टिप्पणी नहीं आई तो का हुआ।
पसंद नहीं चटकाई तो का हुआ॥

वो दर हमार आए तो सही।
ले कर प्यार आए तो सही॥

लिखता हूं

न गजल लिखता हूं, न गीत लिखता हूं।
बस शब्दों से आज औ' अतीत लिखता हूं॥

होती है पल पल, वो ही हलचल लिखता हूं।
गमगीन कभी, कभी खुशनुमा पल लिखता हूं।।

मैं तो शब्दों में बस हाल-ए-दिल लिखता हूं।
आए जिन्दगी में पल जो मुश्किल लिखता हूं॥

बिखरे शब्दों को जोड़, न जाने मैं क्या लिखता हूं।
लगता है कि खुद के लिए दर्द-ए-दवा लिखता हूं ॥

कभी सोचता हूं, क्यों मैं किस लिए लिखता हूं।
मिला नहीं जवाब, लगे शायद इसलिए लिखता हूं॥

शब्दों का कारवां