न हिंदुस्तान बुरा, न पाकिस्तान बुरा

स्नानघर में सुबह जब नहाने के लिए गया, तो दिमाग में कुछ अजीब सी हलचल हुई। जब महसूस किया तो कुछ शब्द उभरकर जुबां पर आ गए। जिनको तुरंत मैंने आपके सामने परोसकर रख दिया। स्वादृष्टि होंगे या नहीं मैं नहीं जानता, लेकिन इन को प्रकट करने मन को सुकून सा मिल गया।

न हिंदुस्तान बुरा, न पाकिस्तान बुरा
यहां धर्म के ठेकेदार,
औ' वहां तालिबान बुरा
न यहां का, न वहां का
इंसान बुरा
बाबा नानक
यहां भी बसता
वहां भी बसता
नुसरत हो या रफी
यहां भी बजता है
वहां भी बजता है
इंसान वहां का भी
और यहां का भी
शांति चाहता है
नहीं मांगती किसी की आंखें तबाही-ए-मंजर
नहीं उठाना चाहता कोई हाथ में खूनी खंजर
कोई नहीं चाहता कि हो दिल-ए-जमीं बंजर
मिट्टी वहां भी वो ही है
मिट्टी यहां भी वो ही है
बांटी गई नहीं जमीं,
बस मां का जिगर लहू लहान हुआ है
तब जाकर एक हिंदुस्तान
और दूसरा पाकिस्तान हुआ है
तबाही यहां हो
चाहे वहां हो
दर्द तो बस एक मां को होता है
जो बट गई टुकड़ों में

दर्द-ए-आवाज मुकेश को मेरा नमन, और आपका


जी हां, पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है, उंगलियां कुछ और लिख रही हैं और दिमाग में कुछ और चल रहा है। मुझे नहीं पता मेरे ऐसा पिछले दिनों से ऐसा क्यों हो रहा है, वो बात मैं आपके साथ बांटना चाहता हूं, इस पोस्ट के मार्फत। पिछले दिनों अचानक मेरे दिमाग में एक नाम आया, वो था मुकेश का। ये मुकेश कोई और नहीं, हमारे होंठों पर आने वाले गीतों को अमर कर देने वाली आवाज के मालिक मुकेश का ही था।

मेरा हिंदी संगीत से कोई ज्यादा रिश्ता नहीं रहा, लेकिन दूरदर्शन की रंगोली और चित्रहार ने मुझे कहीं न कहीं हिन्दी संगीत के साथ जोड़े रखा। पहले पहल तो ऐसा ही लगा करता था कि अमिताभ खुद गाते हैं, और अक्षय कुमार खुद गाते हैं, जैसे जैसे समझ आई, पता चला कि गीतों में जान फूंकने वाला तो कोई और ही होता है, ये तो केवल आवाज पर उन पर गाने का अभिनय करते हैं। पता नहीं, मुझे पिछले कुछ दिनों से क्यों ऐसा लग रहा था कि ‘दर्द-ए-संगीत’ की रूह मुकेश को शायद मीडिया की ओर से उतना प्यार नहीं मिलता जितना मिलना चाहिए, विशेषकर खंडवा के लाल किशोर दा के मुकाबले तो कम ही मिलता है, ये तो सच है। किशोर दा का जन्मदिवस या पुण्यतिथि, उनको प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक खूब दिखाया और याद किया जाता है। उनको याद करने में ब्लॉगर जगत भी पिछे नहीं रहता। ये एक बहुत अच्छी बात है, लेकिन वहीं ये बात बुरी भी है कि मुकेश को उतना याद नहीं किया जाता, जितने के वो हकदार हैं।

यही प्रश्न मुझे पिछले दो तीन दिनों से बेहद परेशान कर रहा था, मैंने इसके लिए वेबर पर सर्च मार कई दफा। मैंने मुकेश के नगमों को ढूंढा, लेकिन उन नगमों में वो नगमे भी शामिल थे, जिनको मैं सुनता रहा हूं और सुनता हूं आज भी, लेकिन इस बात से अनजान था कि वो मुकेश की आवाज में रमे हुए हैं। आज इनकी पुण्यतिथि है, इस बात का पता भी मुझे आज सुबह उस वक्त लगा, जब मैंने खबरें देखने के लिए टीवी ऑन किया, मैं चैनल बदलते बदलते आगे बढ़ रहा था, तो एनडीटीवी पर देखा कि आज मुकेश की पुण्यतिथि है । सुबह सुबह तो एनडीटीवी ने इस संगीत की विशाल हस्ती को पांच मिनट की स्टोरी में सिमट दिया, लेकिन दिन में इस स्टोरी को विस्तारपूर्वक प्रसारित कर एक अद्भुत श्रद्धांजलि दी। वो अपने गीतों के मार्फत आज हर दिल में बसता है, लेकिन उसके बारे में जिक्र बहुत कम होता है। उसके गाए गीत ‘दोस्त दोस्त न रहा’, ‘मैं शायर हूं पल दो पल का’, ‘मिट्टी के मोल’ जैसे तमाम गीत, जिनको सुनते ही कान, दिमाग और दिल सुकून महसूस करता है।

आज का दिन था, जब दर्द-ए-आवाज अमेरिका में हार्ट अटैक का शिकार होने से खामोश हो गई थी। केएल सहगल से प्रेरित मुकेश को मुम्बई तक लाने का शुभ काम अभिनेता मोतीलाल ने किया, उन्होंने ने ही उनको अपनी फिल्म पहली नजर में प्ले-बैक सिंगर के तौर पर चांस दिया, और मुकेश ने अपना हुनर साबित किया। इसके बाद उन्होंने राजकपूर के लिए काफी गीत भी गाया, लेकिन जब मुकेश के खामोश होने की खबर राजकपूर तक पहुंची तो राजकपूर के मुंह से निकला कि आज मैंने अपनी आवाज खो दी। आज सुबह जैसे ही मुझे पता चला कि मुकेश की पुण्यतिथि है, तो मुझे ऐसा अहसास हुआ कि शायद कोई तो रिश्ता होगा मेरा इस आवाज के साथ, वरना मेरे जेहन में मुकेश का नाम क्यों आया? शायद एक संगीत प्रेमी का रिश्ता होगा। चल जो भी हो। आज पुण्यतिथि पर दर्द-ए-आवाज को मेरा नमन।

क्यों नहीं भाते कुंवारे इनको ?

कल अरुण शौरी की खबर पर अचानक एक खबर भारी पड़ गई थी, जी हां वो खबर थी शिल्पा शेट्टी के विवाह की खबर। कल मीडिया में शिल्पा के पिता के हवाले से कुछ खबरें आई, जिनमें कहा गया कि शिल्पा राज कुंदरा की होने वाली हैं, जो एक तलाकशुदा व्यक्ति है। शिल्पा शेट्टी राजकुंदरा से शादी कर ओकलाहामा स्टेट यूनिवर्सिटी की शोध को सच कर रही है या नहीं, “जिसमें कहा गया था कि कुंवरी लड़कियों की पहली पसंद शादीशुदा पुरुष होते हैं”, ये तो पता नहीं। हां, मगर वो बॉलीवुड की उस प्रथा को आगे बढ़ा रही हैं, जिस प्रथा को योगिता बाली, रिया पिल्ले, करिश्मा कपूर, मान्यता ने कड़ी दर आगे चलाया।

संगीत की दुनिया में अमिट छाप छोड़ जाने वाले किशोर दा के साथ योगिता बाली ने शादी रचाई, लेकिन ये विवाह संबंध जल्द ही टूट गए और योगिता बाली मिथुन चक्रवर्ती की हो गई। किशोर कुमार की योगिता बाली के साथ तीसरी शादी थी। एक भारतीय टेनिस खिलाड़ी की पत्नी बन चुकी रिया पिल्ले ने संजय दत्त के साथ रचाई, जो अपनी पहली पत्नी को खोने के बाद तन्हा जीवन जी रहे थे, लेकिन यहां पर भी विवाह संबंध सफल न हुए और रिया ने संजय से अलग होकर एक टेनिस सितारे लिएंडर पेस से शादी कर ली।

अब संजय की जिन्दगी में मान्यता है, जिसकी संजय दत्त के प्रति दीवानगी उक्त यूनीवर्सिटी की द्वारा की गई सर्च को मान्यता देती है। जहां बॉलीवुड के सलमान खान अभी तक अविवाहित घूम रहे हैं, वहीं आमिर खान ने 15 साल पुराना रिश्ता तोड़कर किरण राव से दूसरी शादी रचा ली, जो आजकल धोबीघाट का निर्माण कर रही हैं। इतना ही नहीं, किरण आमिर खान से उम्र में बहुत छोटी हैं, लेकिन फिर भी उनको आमिर खान ही भा रहे हैं।

कभी अजय देवगन तो कभी अभिषेक बच्चन के साथ रोमांस की अफवाहों का शिकार रही करिश्मा कपूर ने भी तो अभिषेक बच्चन जैसे कुंवारे लड़के को सगाई के बाद छोड़कर तलाकशुदा कारोबारी संजय कपूर से जीवन भर का नाता जोड़ लिया। इनके विवाहित जीवन के शुरू में ही शादी टूटने की बातें आने लग गई थी, लेकिन बर्बादी का बम्वडर थम गया।

इसके अलावा आजकल रियालिटी शो में नजर आने वाली फिजा उर्फ अनुराधा बाली ने भी कुछ ऐसा ही किया चांद मुहम्मद के साथ शादी रचाकर, ये शादी तो एक मजाक बनकर रहेगी। और पिछे छोड़ गई बदनामी की कल्ख, जो जिन्दगी भर उनकी संतानों के लिए एक कलंक बनकर रहेगी।

शिल्पा शेट्टी शादी कर रही है, खुशी की बात है कि उसके हाथ पीले हो रहे हैं, लेकिन किसकी उतरन वो क्यों पहनें। क्या हिन्दुस्तान में कुंवारों की कमी पड़ गई, जो वो विदेश में जाकर एक शादीशुदा व्यक्ति को अपना कुंवारा हुस्न सौंप रही है। क्या शिल्पा-राज की शादी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ पाएगी? बेशक ये शिल्पा का एक निजी फैसला है, जिसमें हमें टीका टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं, लेकिन ये कदम सामाजिक ताने बाने को बिगाड़ते हैं। इस लिए मन चिंतित हो उठता है, अगर मारना है तो उन बुराईयों को मारो जो समाज को खराब कर रही हैं, लेकिन नई बुराइयों को जन्म मत दो…

गणेशोत्सव, और मेरा चिंतन


रविवार से गणेशोत्सव शुरू होने वाला है, इस बात का अहसास मुझे उस वक्त हुआ। जब शुक्रवार को मैं शहर के बीच से गुजर रहा था। सड़क किनारे हजारों की तादाद में पड़ी गणेश की मूर्तियां इंदौरवासियों के धार्मिक होने की पुष्टि कर रही थी। दुकानों के बाहर सड़क पर रखी हजारों रंग बिरंगी गणेश की मूर्तियां आंखों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। एक बार तो मेरा भी रुकने का मन हुआ, लेकिन वक्त ने रुकने की इजाजत नहीं दी। बाजारों में भक्तों की पॉकेट हैसियत के अनुकूलन सजी हुई मूर्तियां बहुत प्यारी लग रही थी, लेकिन इनकी मूर्तियों की खूबसूरत चार दिन की चांदनी जैसी है, क्योंकि कुछ दिनों बाद इन मूर्तियों का जलप्रवाह कर दिया जाएगा। नदियों में जल नहीं है, लेकिन फिर भी लोग जलप्रवाह करने जाएंगे, जिसका नतीजा हम सबको को देखने को मिलता है, किसी नदी के किनारे पड़ी खंडित मूर्तियां के रूप में। जहां एक मूर्ति खंडित होने पर पता नहीं कितने इंसानों को खंडित कर दिया जाता है, और नगरों के नगर तबाह हो जाते हैं, मगर वहीं दूसरी तरफ इस तरह नदी किनारे हजारों मूर्ति खंडित होती हैं, उनका की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता।

क्या जलप्रवाह या विसर्जन के बाद उस मूर्ति का वो मूल्य और वो कदर नहीं रहती, जो एक मंदिर में लगी मूर्ति की होती है। मगर इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता क्योंकि बनाने वाले को मूर्तियों को मूल्य मिल गया और भक्तों की भगती संपूर्ण हो गई। जैसे मैंने शुरू में कहा था कि मूर्तियां शहरवासियों की धार्मिकता का सबूत दे रही थी, लेकिन मैंने पिछले तीन सालों में इंदौर के बदले हर मिजाज को देखा है। इन मूर्तियों को देखने बाद मेरे जेहन में एक सवाल आया कि असल में धार्मिक लोगों का शहर है इंदौर ? आप सोचते होंगे कि मेरे दिमाग में ये सवाल इन मूर्तियों को देखते ही क्यों आया? अगर आप भी इस शहर की आवोहवा में कुछ दिन रहे होते तो शायद ये ही सवाल आपके भी जेहन में चटपटाने लगता। मैंने इस शहर को हिंसा की आग में झुलसते हुए कई दफा देखा। छतों से बारिश की तरह पत्थर बरसते देखें हैं। सड़कें लहू से लथ पथ होती देखीं है मैंने। इतना ही नहीं वाहनों को आग में जलते हुए देखा है।

उन घटनाओं याद कर सोचता हूं कि भगवान को मानने वाले लोग क्या इतने उग्र होते हैं? भगवान की पूजा में मगन रहने वाले मार-काट में कैसे विश्वास करते हैं? अगर इनकी धार्मिक सोच इनको हिंसक होने पर मजबूर करती है तो ऐसी धार्मिकता किस काम की। हर धर्म में क्रोध का विरोध किया गया है चाहे वो सिख धर्म हो...चाहे इस्लाम..चाहे हिंदू..या कोई अन्य धर्म। धर्म तो अहिंसा के मार्ग पर चलना सिखाता है तो इतने धार्मिक शहर के लोग इतने उग्र क्यों हो जाते हैं? ये मुझे आज तक समझ नहीं आया। जब सवाल मेरे जेहन में तिलमिला रहे थे, तब मुझे एक लेखक की बात याद आई कि हम लोग बाहरी तौर से धार्मिक हैं, और अंदरूनी तौर से नहीं, शायद मेरी तरह वो लेखक भी सोचने, देखने एवं समझने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हो।

चलो एक बार फिर उसी मुद्दे पर आते हैं कि गणेशोत्सव आने वाला है, और करोड़ों भारतीयों में से अगर लाखों भारतीय भी गणेशोत्सव के मौके पर मूर्तियों का विसर्जन करते हैं तो उन लाखों मूर्तियों में से कितनी मूर्तियां खंडित होंगी। अगर वो मूर्तियां खंडित होंगी, तो क्या तब हिंदुओं की भावनाएं खंडित नहीं हो गई? या यहां पर मूर्ति खंडित होने की परिभाषा बदल जाती है क्या? जब कोई दूसरे समाज का व्यक्ति मूर्ति को खंडित करता है तो हिन्दुत्व की बात आ जाती है और पूरे भारत में होहल्ला मच जाता है, लेकिन यहां बरस हजारों मूर्तियां खंडित होती हैं तो कोई कुछ नहीं बोलता क्यों? अमृत प्रीतम की एक पंक्ति याद आती हैं कि
अज्ज आखां वारिस शाह नू कितों कबरां विच्चों बोल
ते अज्ज किताबे इश्क दा कोई अगला वर्का फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी तू लिख लिख मारे वैण
अज्ज लक्खां धीयां रोंदीयां तैनूं वारिस शाह नू कहण
बेशक अमृता प्रीतम ने इस काव्य को किसी अन्य संदर्भ में लिखा था, लेकिन मैं आज इस काव्य की पंक्तियों को गणेशोत्सव के मौके को ध्यान में रखकर पेश कर रहा हूं। कहने का मतलब है कि एक मूर्ति खंडित होने पर पूरा हिन्दुत्व चिंतित हो उठता है और हर साल जाने अनजाने में लाखों मूर्तियां खंडित होती हैं तो कोई आवाज तक बुलंद क्यों नहीं करता।

बदनाम हुए तो क्या हुआ

'बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ' ये पंक्ति बहुत बार सुनी होगी जिन्दगी में, लेकिन मैंने तो इसको कुछ समय से सत्य होते हुए भी देख लिया। इस बात को सत्य किसी और ने नहीं बल्कि हिंदुस्तानी मनोरंजक चैनलों ने कर दिखाया है। राखी सावंत से लेकर विश्व प्रसिद्धी हासिल शिल्पा शेट्टी तक आते आते कई ऐसे नाम मिल जाएंगे, जो इस बात की गवाही भरते हैं कि बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ। कल तक अनुराधा बाली को कोई नहीं जानता था, लेकिन जैसे ही वो फिजा के नाम से बदनाम हुई तो रियालिटी शो बनाने वालों की निगाह सबसे पहले उस पर पड़ी, बेशक रियालिटी शो बनाने वाले शो का फोर्मेट तक चुराते हैं।

इमरान हाशमी के नाम एक खुला पत्र

फिजा को इस जंगल से मुझे बचाओ में ब्रेक देकर सोनी टेलीविजन वालों ने उस कड़ी को आगे बढ़ाया, जिसको क्लर्स ने मोनिका बेदी, शिल्पा शेट्टी एवं महरूम जेड गुडी को ब्रेक देकर शुरू किया था। मोनिका अबू स्लेम के कारण बदनाम हुई, तो शिल्पा शेट्टी पहले जेड गुडी के कारण और फिर रिचर्ड गेयर के कारण बदनाम हुई, क्लर्स टीवी ने बदनाम महिलाओं को ही नहीं बल्कि राहुल महाजन एवं राजा चौधरी को भी जगह दी, जिन्होंने असल जिन्दगी में अपना घर उजाड़ने के बाद अखबारों में खूब सूर्खियां बटोरी। रविवार को इलेश की होने का दावा करने वाली राखी सावंत कभी मीका द्वारा किस किए जाने, तो कभी अभिषेक अवस्थी के साथ प्यार का ढोंग रचने के कारण सुर्खियों में बरकरार रही। जिसका फायदा एनडीटीवी एमेजिन ने उठाया और रच दिया स्वयंवर।

एक ऐसा रियालिटी शो, जो बयाँ करता रियालिटी

टीवी वाले अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कुछ भी करेंगे, किस भी हद तक जाएंगे। इस बात का पता तो इतने बदनाम लोगों को जगह देने से ही चलता है। मुझे तो लगता है कि अगर अबू सलेम और अफजल गुरू को राहत मिलती है तो कोई न कोई टीवी वाला उनको अपने अगले रियालिटी शो के लिए साईन कर लेगा। और बनाएगा हिंदुस्तान की सैलेब्रिटी। ए टीवी वालों कुछ तो शर्म करो, नहीं कहते के जेब न गर्म करो...पैसा भी कमाओ, जो जी में आए दिखाओ, पर इन बदनामों से तो हम को बचाओ।

एक सोच पर प्रतिबंध कहां तक उचित ?

अब पाकिस्तान में घमासान मचने को तैयार है, क्योंकि इमरान खान की लिखी गई जीवनी में कुछ ऐसी बातें सामने आई हैं, जो भुट्टो परिवार को आहत कर सकती हैं। समझ नहीं आ रही कि हर कोई सच का सामना क्यों करना चाहता है, वो भी उस सच का जिसे किसी का भी घर उजड़ सकता है। हर कोई सुकरात बनने की फिराक में। पिछले सोमवार को रिलीज हुई जसवंत सिंह की किताब ने अपनी रिलीज के बाद ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी, अगर देखा जाए तो जसवंत सिंह ने उस कहावत को सच करने की कोशिश की है, जो हम सब आम सुनते हैं कि एक हाथ से ताली नहीं बजती। ये बिल्कुल सच है कि कभी भी एक हाथ से ताली नहीं बजती, और उस तत्थ को भी उन्होंने सही साबित करने की कोशिश की है कि अगर हम किसी दूसरे की तरफ एक उंगली उठाते हैं तो शायद तीन उंगुलियां हमारी तरफ होती हैं।

जसवंत सिंह ऐसा पहला शख्स नहीं जिसने जिन्ना के बारे में कुछ कहा हो, इससे पहले भाजपा के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवानी भीं जिन्ना की वकालत कर चुके हैं। आडवानी ने तो अपने पद से त्याग पत्र देकर पार्टी को चुप करवा दिया था, लेकिन जसवंत सिंह की बारी तो पार्टी के कायदे कानून ही बदल गए। जिन्ना को लेकर बवाल उस वक्त भी उठा था और आज भी उठा है। जिन्ना को लेकर भाजपा में बिखराव हुआ है, जब ये बात भी कबरों में आराम फरमान रहे जिन्ना तक पहुंचेगी तो वो भी सोच में पड़ जाएंगे कि जीते जी तो हिंदुस्तान के विभाजन का आरोप था और मरने के बाद भी मुझे पर विभाजन का आरोप क्यों ?

एक तरफ तो कहा जाता है कि हिन्दुस्तान में जुबां आजाद है, आपको बोलने और लिखने की आजादी है। अगर हिन्दुस्तान में इस चीज की आजादी है तो गुजरात सरकार द्वारा जसवंत सिंह की किताब पर लगाया गया प्रतिबंध तो इस नियम का उल्लंघन कर रहा है। ऐसे तो लोकतंत्र की धज्जियां उड़ रही हैं, इस लेकर बुद्धिजीवी, साहित्यकार, लेखक चुप क्यों है? आज अगर गाज जसवंत सिंह की किताब पर गिरी है तो कल को किसी और की किताब पर गिरेगी, फिर तो हिन्दुस्तान के खाते में भी तस्लीमा नसरीन और सलमान रसूदी जैसे लेखकों की संख्या बढ़ जाएगी।

कल जेटली का बयान आया कि पार्टी को किताब पर नहीं, उसमें छापे मुद्दे पर आपत्ति है, जबकि दूसरी तरफ जसवंत सिंह का कहना है कि किताब पिछले कई सालों की शोध पर आधारित है। शोध पर आधारित या नहीं, लेकिन ये किताब एक व्यक्ति की सोच है और उस सोच पर रोक लगा देना कहां तक उचित है। आज समाचार पत्रों के पोर्टलों से ज्यादा ब्लॉग पढ़े जाते हैं, क्योंकि यहां पर लिखने वाली कलम आजाद है। ब्लॉग पर व्यक्त की सोच से हर कोई तो सहमत नहीं होता, लेकिन उस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता। ऐसे में जसवंत सिंह की किताब पर प्रतिबंध लगाना बहुत गलत है।

गुजरात सरकार द्वारा लगाया किताब पर बैन तो सरकार की संकरी सोच का सबूत है। गुजरात सरकार ने कहा है कि इससे वल्लभभाई पटेल की छवि को चोट पहुंचेगी, इस किताब में तो नेहरू का भी जिक्र है क्या उसकी छवि को चोट नहीं पहुंचेगी ? लेकिन गुजरात की वोट बटोरने के लिए नेहरू नहीं पटेल का नाम चाहिए। सो गुजरात ने किया। जसवंत को बाहर करना भी वोट बैंक का हिस्सा है, लेकिन भाजपा एक पुरानी हो चुकी चारपाई की खस्ता डोर की तरह एक एक कर टूट रही है। पहले यशवंत सिन्हा, फिर कल्याण सिंह और अब जसवंत सिंह का जाना, वहीं नवजोत सिंह सिद्धू भी नाराज हैं, तो वसुंधरा राजे कहां भाजपा से खुश है। भाजपा के टूटने का कारण है कि वो अतीत से बाहर आना ही नहीं चाहती, वो तो कल में ही जीना चाहती है। आज की जनरेशन अतीत की आवोहवा में सांस भरना चाहती है, कुछ करना चाहती है।

एक ऐसा रियालिटी शो, जो बयाँ करता रियालिटी

रियालिटी शो में होती नहीं रियालिटी...इस धारणा को मानकर नहीं देखता था रियालिटी शो...लेकिन एक रियालिटी शो ऐसा, जिसने बदल डाली मेरी धारणा...जी हां..सच है दूध सा सफेद...खरा नहीं क्योंकि दूध में मिलावट चल रही है। शायद मेरी तरह आपकी इस रिलायिटी शो के दीवाने हों...पक्का नहीं कहता। बात को लम्बी नहीं खींचते हुए बताता हूं कि मैं कलर्स पर प्रसारित होने वाले रियालिटी शो..इंडियाज गोट टेलेंट की बात कर रहा हूं।

छोटे पर्दे पर रियालिटी शो तो और भी हैं, लेकिन इस रियालिटी शो की बात ही कुछ और है.. यहां पर जज आपस में टकराते नहीं बात बात पर..मीडिया की सुर्खियां भी नहीं बटोरते...बस ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। सच में ही इंडियाज़ गोट टेलेंट ने मेरी तो रियालिटी शो के प्रति नकारात्मक सोच को बदल कर रख दिया। इस शो को देखने के बाद लगता है कि हिंदुस्तान में हुनर की कोई कमी नहीं..और इस रियालिटी शो की टेग लाईन भी बड़ी दमदार है 'हुनर ही विनर है'। सचमुच इस शो को देखते हुए लगता है कि भारत में हुनर की कोई कमी नहीं..बस देखने वाली आँख भगवान ने हर किसी को नहीं दी।

15 अगस्त को जब ये शो देख रहा था तो आँख में पानी सा आ गया क्योंकि इस शो पर एक से बढ़कर एक हुनर वाले आते हैं कि आपकी आंखें खुद ब खुद भर आती हैं मेरी तरह...इस दिन विक्ट्री फाउंडेशन का एक्ट देखकर दिल ने कहा कुछ तो है यहां...इस एक्ट को पेश करने वाले सारे प्रतियोगी अपनी तरह स्वस्थ नहीं थे, उनके शरीर में कोई न कोई दोष था, जो उनको हमसे अलग करता था। लेकिन उनका एक्ट कहता था कि हम आपसे दो कदम आगे हैं जनाब..

इस पहले भी एक दिन जब मैंने प्रिंस डांस ग्रुप का एक्ट देखा तो आंखें खुली की खुली रह गई। एक्ट इतना जर्बदस्त था कि मन सोचने पर मजबूर हो गया...यार ये कैसे....फिर क्या था..मैंने मोबाइल उठाया और पेल दिया एक समर्थन में संदेश...हैरानी की बात तो ये थी कि इस एक्ट को करने वाले सब मजदूर वर्ग के लोग थे। भगवान की दुआ से ये ग्रुप अंतिम ग्यारहां में प्रवेश कर चुका है। इसके अलावा भी इस शो में और बहुत से टेलेंट मास्टर हैं...जिनको देखने के लिए 22 अगस्त को रात्रि 9 बजे क्लर्स टीवी ऑन करना मत भूलिए...अगर छूट गया तो शायद आगे जाकर कभी पछतावा हो...

कौन दिशा में ले चला रे पत्रकारिता

कौने दिशा में चला रे 'बटोहिया'...इस गीत को मैंने और आपने बहुत बार सुना होगा, लेकिन आजकल जब अख़बारों एवं खबरिया चैनलों को देखता हूं तो इस गीत को याद करता हूं। आप सोच रहे होंगे कि बात तो कुछ पल्ले नहीं पड़ी। इसका पत्रकारिता से क्या लेना देना है? पर आजकल की पत्रकारिता ही ऐसी हो गई कि कहना पड़ता है कौन दिशा में ले चला रे पत्रकारिता। पत्रकारिता का अर्थ सूचना देना होता है, न कि सनसनी फैलाना।

मगर आज तो हर कोई सनसनी फैलाने पर लगा हुआ है, सूचना की तो कोई बात ही नहीं। पहले तालिबान था और अब स्वाइन फ्लू। टीवी वाले बिना रुकावट निरंतर दिन में कई दफा एक ही बात का प्रचार कर उसको हौवा बना देते हैं । ऐसे में कोई भी कह उठेगा ‘कौन दिशा में ले चला रे पत्रकारिता’, इसमें दोष न्यूज एंकर का नहीं, वो तो मालिक के हाथ की कठपुतली है, उसको तो वो करना है जो मालिक को नफा दे, तभी तो उसकी पगार आएगी। सही में बोलें तो पापी पेट का सवाल है।

पत्रकारिता का क्षेत्र अब उन लोगों के लिए नहीं जो आदर्श पत्रकारिता करना चाहते हैं, क्योंकि उनकी यहां चलती है कहां, यहां तो स्थिति फौज वाली है। बस यस सर, बोलो नो का कोई काम नहीं है। स्वाइन फ्लू से पहले खबरी चैनलों पर तालिबान का भूत सवार था,लेकिन जैसे ही पता चला कि लोगों को डराने के लिए इससे भी बड़ा भूत आ गया तो उन्होंने तालिबान मुखिया की मौत की खबर को भी ज्यादा महत्ता नहीं दी। जो तालिबान की बिलों में जाकर पत्रकारिता करने का दावा करते थे, उन्होंने इस बार बस संदेहवाहक का काम किया। कभी कहा, मारा गया बेतुल्ला मेहसूद, तो कभी कहा जिंदा है मेहसूद। क्या ये पत्रकारिता है। इसमें खुद की खोज कहां है, कौन सी बिल में जाकर छुप गए खोजी पत्रकार?

पत्रकारिता खुद की खोज पर आधारित हो, किसी के बयानों पर नहीं। पत्रकारिता का अस्तित्व तभी जिंदा रहेगा, अगर पत्रकारिता करने वाले जागरूक होंगे। प्रिंट मीडिया से लेकर इलैक्ट्रोनिक मीडिया तक कार्पोरेट जगत में प्रवेश कर गया और कार्पोरेट जगत में अपने फायदे के आगे किसी और बात पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता। देश को तो आजाद हुए 60 साल से ज्यादा का समय हो गया, लेकिन इन 60 सालों में आजाद कलम गुलामी की तरफ बढ़ी है। आज ब्लॉगिंग दिन रात अमरबेल की भांति क्यों बढ़ रही है, इसका यहां कलम, ख्याल सब आजाद हैं।

इमरान हाशमी के नाम एक खुला पत्र


तुमने तो यू-टर्न ले लिया, लेकिन आज के बाद अगर किसी अन्य व्यक्ति ने आवाज उठाई तो उसका क्या होगा? इमरान हाश्मी। क्या तुम्हारे पास कोई जवाब है? तुम तो मिस-कम्यूनिकेशन की बात कहकर निकल गए, अगर तुम्हारे बयान के बाद शहर की स्थिति तनावपूर्ण हो जाती तो फिर कोई क्या करता। तुमको तो मशहूरी मिल गई, चर्चा मिल गई। तुमने तो सच के खिलाफ उठने वाली आवाजों को भी दबने के लिए मजबूर कर दिया। अगर आज के बाद कोई सच के खिलाफ भी आवाज उठाएगा तो लोग उसको झूठ-मशहूरी का फंडा कहकर नकार देंगे।

इमरान हाश्मी तुम तो इस फिल्म जगत में नए हो, लेकिन यहां तो सालों से मुस्लिम भाईचारे के लोग बसे हुए हैं एवं फिल्म जगत पर राज कर रहे हैं। उनके मुम्बई में बड़े बड़े आलीशान महल हैं, यहां तक कि शाहरुख खान के बंगले मन्नत को देखने के लिए सैंकड़ों लोग हर रोज मुम्बई तक आते हैं। वो भी तो मुस्लिम भाईचारे से है, उनको तो किसी ने बाजू पकड़कर बाहर नहीं निकाला। समस्या वो नहीं थी, जो तुमने बताई, मीडिया में जिसका चर्चा किया। समस्या तो ये है कि तुम अभी स्टार बने ही नहीं, तुम तो एक सीरियल किसर हो, जिसको बस वो युवा देखते हैं, जिनको स्क्रीन पर आंखें गर्म करनी होती हैं और बाप का मिला पैसा उड़ाना होता है। तुम्हारी सीरियल किसर वाली छवि ने तुम्हारा रास्ता रोका है, धर्म ने नहीं। तुम कभी किसी बंद कमरे में बैठकर सोचना कि तुमने कभी अभिनय किया है। तुम्हारी कितनी ही फिल्में रिलीज हो चुकी हैं, उनको घर में रखी डीवीडी पर लगाकर देखना और वो भी पूरे परिवार के समेत। फिर पता चलेगा कि महेश भट्ट और तुमने मिलकर समाज को एवं हिन्दी फिल्म जगत को क्या दिया है?

तुम युवा हो और युवाओं की तरह सोचो। जमाना बदल रहा है, तुम भी रूढ़ीवादी सोच को त्याग कर नए समाज में सांस लेने की कोशिश करो। वरना, जो मुकाम तुमको अभी मिला हुआ है वो भी छीनने में कोई ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। अगर तुम को देश के चंद लोग जानते हैं तो तुम उस प्रसिद्धि का फायदा देश को जोड़ने के लिए करो, तोड़ने के लिए नहीं। डा.कलाम शारीरिक तौर पर बूढ़े हो गए, लेकिन सोच आज भी युवा है। हर कोई उनको सर-आंखों पर बिठाता है, तुम एक घर के लिए रो रहे हो..वो हर हिंदुस्तानी के दिल में बसते हैं। कभी किसी ने नहीं कहा कि तुम मुस्लिम हो, तुमको हमारे मन में बसने की कोई जरूरत नहीं। डा.कलाम से कोई सीख लेना, वो भी अभिनेता बनने जा रहे हैं। उम्मीद है तुम से अच्छा अभिनय करेंगे, बेशक उन्होंने कई सालों से कोई फिल्म नहीं देखी।

रक्षा बंधन के रंग में रंगे कुछ ब्लॉग आपकी नज़र

आज रक्षा बंधन है, तो स्वाभिक है कि हमारे ब्लॉग लेखक इस त्यौहार पर अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करने से कैसे पीछे रह सकते हैं। अखबारों से लेकर टेलीविजन तक हर जगह रक्षा बंधन की बातें हो रही हैं। तो ऐसे में हमारा ब्लॉग जगत कैसे पीछे रहेगा, जी हां, हमारे इस जगत के कुछ लेखकों ने अपने अपने ढंग से रक्षा बंधन के मौके पर कुछ कुछ अभिव्यक्ति व्यक्त की हैं। जो मैं इस पोस्ट के जरिए आपके पास भेज रहा हूं। अगर कोई ब्लॉग पढ़ने से छुट गया हो तो अब पढ़ लीजिए, कोई बहाना मत कीजिए। रक्षा बंधन के पलों के साथ जिन्दगी को हसीन ढंग से जीजिए।...

मेरी प्यारी बहना

//कच्चे कचनार के नीचे खड़े भाई खूब याद आते हैं... उस छोटी दुनिया में बड़ी खुशियाँ हासिल थी जहाँ हमे..//

एक राखी ऐसी भी थी

राखी का गीत -आचार्य संजीव 'सलिल'

राखी ...!!!!

मेरे भैया - राखी के इस पावन अवसर पर

एक आध्यात्मिक बंधन- रक्षा बंधन

अटूट विश्वास का बन्धन है राखी

मेरी बहन तु सलामत रहे

बहना मेरी राखी के बंधन को निभाना

अटूट विश्वास का बंधन है राखी

रक्षा बंधन पर एक कार्टून !

याद जो तेरी आई बहना !!

बदनाम हुए तो क्या हुआ

'बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ' ये पंक्ति बहुत बार सुनी होगी जिन्दगी में, लेकिन मैंने तो इसको कुछ समय से सत्य होते हुए भी देख लिया। इस बात को सत्य किसी और ने नहीं बल्कि हिंदुस्तानी मनोरंजक चैनलों ने कर दिखाया है। राखी सावंत से लेकर विश्व प्रसिद्धी हासिल शिल्पा शेट्टी तक आते आते कई ऐसे नाम मिल जाएंगे, जो इस बात की गवाही भरते हैं कि बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ। कल तक अनुराधा बाली को कोई नहीं जानता था, लेकिन जैसे ही वो फिजा के नाम से बदनाम हुई तो रियालिटी शो बनाने वालों की निगाह सबसे पहले उस पर पड़ी, बेशक रियालिटी शो बनाने वाले शो का फोर्मेट तक चुराते हैं। फिजा को इस जंगल से मुझे बचाओ में ब्रेक देकर सोनी टेलीविजन वालों ने उस कड़ी को आगे बढ़ाया, जिसको क्लर्स ने मोनिका बेदी, शिल्पा शेट्टी एवं महरूम जेड गुडी को ब्रेक देकर शुरू किया था। मोनिका अबू स्लेम के कारण बदनाम हुई, तो शिल्पा शेट्टी पहले जेड गुडी के कारण और फिर रिचर्ड गेयर के कारण बदनाम हुई, क्लर्स टीवी ने बदनाम महिलाओं को ही नहीं बल्कि राहुल महाजन एवं राजा चौधरी को भी जगह दी, जिन्होंने असल जिन्दगी में अपना घर उजाड़ने के बाद अखबारों में खूब सूर्खियां बटोरी। रविवार को इलेश की होने का दावा करने वाली राखी सावंत कभी मीका द्वारा किस किए जाने, तो कभी अभिषेक अवस्थी के साथ प्यार का ढोंग रचने के कारण सुर्खियों में बरकरार रही। जिसका फायदा एनडीटीवी एमेजिन ने उठाया और रच दिया स्वयंवर। टीवी वाले अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कुछ भी करेंगे, किस भी हद तक जाएंगे। इस बात का पता तो इतने बदनाम लोगों को जगह देने से ही चलता है। मुझे तो लगता है कि अगर अबू सलेम और अफजल गुरू को राहत मिलती है तो कोई न कोई टीवी वाला उनको अपने अगले रियालिटी शो के लिए साईन कर लेगा। और बनाएगा हिंदुस्तान की सैलेब्रिटी। ए टीवी वालों कुछ तो शर्म करो, नहीं कहते के जेब न गर्म करो...पैसा भी कमाओ, जो जी में आए दिखाओ, पर इन बदनामों से तो हम को बचाओ।

एक आंसू गिरा उसकी आंख से....