क्या लौटेगी बॉलीवुड की रंगत !

फिल्म निर्माता और मल्टीप्लेक्स वालों के बीच समझौता होने की संभावनाएं बन चुकी है, लगता है जल्द ही बॉलीवुड के लिए खुल जाएंगे मल्टीप्लेक्सों के दरवाजे, और दर्शक पहले की तरह दस्तक देंगे, इस साल के छ: महीने गुजर चुके हैं, और अभी छ: बाकी हैं। पहले छ: महीनों में बॉलीवुड कोई करिश्मा नहीं दिखा सका, बॉक्स ऑफिस पर अक्षय कुमार दो एवं शाहरुख खान एक फ्लॉप दे चुके हैं, अगर इस हफ्ते के दौरान मल्टीप्लेक्सों के कपाट खुलते हैं तो बॉलीवुड से दस्तक देने वालों की लम्बी कतार है, जिनमें सबसे पहले अक्षय कुमार, रितिक रोशन, शाहिद कपूर, जॉन इब्राहिम दस्तक देंगे। अक्षय कुमार ने साल की शुरूआत जनवरी में फिल्म 'चांदनी चौक टू चाइना' से की, लेकिन सफर बिल्कुल उबाऊ था, अक्षय कुमार और दीपिका पादुकोण को चांदनी चौक से चाइना तक सफर करवाने वाली फिल्म निर्माता कंपनी को मोटा नुक्सान झेलना पड़ा, जबकि शाहरुख खान की होम प्रोडक्शन कंपनी रेड चिलीज़ को भी बिल्लू ने तगड़ा झट्टका दिया है। अगर कोई कमाऊ फिल्म निकली तो वो थी अनुराग बासु की कम बजट में जर्बदस्त था फिल्म, जिसने बॉक्स ऑफिस पर मोटी कमाई की और अभय दिओल के डूबते कैरियर तो सहारा दिया, बेशक फिल्म चलने का कारण था, उसमें बोल्ड्नेस। फरहान अख्तर की लक बाय चांस, इमरान हाश्मी की राज दी मिस्ट्री कंटीन्यू भी कोई खास जादू नहीं दिखा सकी, विक्ट्री हासिल करने निकले हरमन बावेजा को दूसरा झटका इस साल भी लगा, अभिषेक बच्चन दिल्ली छ: लेकर बड़े पर्दे पर बड़ी धूम धाम से उतरे, लेकिन लोगों ने दिल्ली छ: को चलती कर दिया, मटककली मटककली तो हर जगह सुनाई दिया, लेकिन फिल्म की बॉक्स ऑफिस पर हवा निकल गई। इस साल के छ: महीने तो गुजर गए, लेकिन आने वाले छ: महीने बॉलीवुड के लिए उम्मीद भरे हैं, क्यों अब आने वाले छ: महीनों में मेगाबज़ट फिल्में और बड़े सितारे बॉक्स ऑफिस पर उतरने वाले हैं, जिनमें आमिर खान, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, शाहरुख खान, रितिक रोशन आदि। आमिर खान ने तो गजनी से ऐसा गजब ढहा कि जनवरी में रिलीज हुई अक्षय कुमार की फिल्म 'चांदनी चौंक टू चाईना' को दर्शक ही नहीं मिले, लेकिन इस साल आमिर खान राजकुमार हिरानी की फिल्म 'थ्री इडियट्स' में नजर आएंगे, उनके साथ करीना कपूर नजर आएंगी, जबकि अक्षय कुमार साजिद नाडियालवाला की अगली फिल्म 'कमबख्त इश्क' में नजर आएंगे, जिसमें भी करीना होगी। शाहरुख खान 'माई नेम इज खान' नामक फिल्म से दर्शकों के रूबरू होंगे, जिसमें उनका साथ देंगी काजोल, जिसके साथ शाहरुख खान ने बहुत सी हिट फिल्में दी हैं। इसके अलावा रितिक रोशन अपनी होम प्रोडक्शन फिल्म 'काइट्स' में नजर आएंगे, जिसमें उनका साथ देंगी बार्बरा मोरी। यह सब फिल्में बड़े बैनरों, बड़े बज़टों और बड़े सितारों से लबालब हैं, लेकिन देखना ये दिलचस्प होगा कि ये मल्टीप्लेक्सों को दर्शकों से लबालब कर पाएंगी या नहीं।

कविता-सड़क

टहल रहा था,
एक पुरानी सड़क पर
सुबह का वक्त था
सूर्य उग रहा था,
पंछी घोंसलों को छोड़
निकल रहे थे
दूर किसी की ओर
इस दौरां
एक आवाज सुनी
मेरे कानों ने
सड़क कुछ कह रही थी
ये बोल थे उसके
कोई पूछता नहीं मेरे हाल को
कोई समझता नहीं मेरे हाल को
आते हैं, जाते हैं हर रोज
नए नए राहगीर
ओवरलोड़ ट्रकों ने, बसों ने
दिया जिस्म मेरा चीर
सिस्कती हूं, चिल्लाती हूं,
बहाती हूं, अत्यंत नीर
फिर भी नहीं समझता कोई
मेरी पीर

नहीं चखी चार दिन से सब्जी

मैं बठिंडा के लिए निकला और नागदा से मुझे फिरोजपुर जनता पकड़नी थी, लेकिन वो गाड़ी रात को दस बजे के करीब आती है, मैंने सात बजे नागदा पहुँच गया, सोचा क्यों न, नागदा की सैर कर ली जाये, मैं बाज़ार घूमते घूमते बाज़ार के बीचों बीच पहुँच गया, यहाँ कुछ महिलाऐं एवं पुरुष धरने पर बैठे हुए, वहां पर लगे बोर्ड पढने के बाद पता चला के वो सब्जी भाजी वाले हैं, जिनकी जगह छीन ली गयी है, कहो तो उनकी रोजीरोटी छीन ली, वो अपनी मांग को लेकर पिछले सोमवार से बैठे हुए हैं, दिलचस्प बात तो ये है के पिछले सोमवार से जयादातर नागदा वासिओं ने सब्जी का स्वाद चखकर नहीं देखा, क्योंकि वो सब्जी नहीं ला रहे, पता नहीं ये कब तक चलेगी, पर मैं तो इस पोस्ट के साथ बठिंडा के लिए रवाना हो जऊंगा, बस दुआ करता हूँ, नागदा वासिओं को सब्जी मिले और सब्जी वालों को उनकी जगह, तब तक के लिए इजाजत चाहूँगा,
मैं गूगल की गूगल इंडिक ट्रांस्लितेरेशन लब्स का अति आभारी हूँ, जो हिंदी लिखने में हर जगह सही हो रही है.

18 वर्ष बाद भी नहीं मिला इंसाफ

राजीव गांधी की पुण्यतिधि पर

18 की उम्र में कदम रखते ही एक भारतीय को मताधिकार हासिल हो जाता है, इंसान किशोरावस्था पार कर यौवन में कदम रखता है, 18 साल का सफर कोई कम नहीं होता, इस दौरान इंसान जिन्दगी में कई उतार चढ़ाव देख लेता है, लेकिन अफसोस की बात है कि 18 साल बाद भी कांग्रेस स्व.राजीव गांधी को केवल एक श्रृद्धांजलि भेंट कर रही है, इन 18 सालों में हिंदुस्तान की सरकारें उस साजिश का पर्दाफाश नहीं कर पाई, जिसके तहत आज से डेढ़ दशक पहले 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक जनसभा के दौरान लिट्टे के एक आत्मघाती हमलावर ने राजीव गांधी की सांसें छीन ली थी. वो हमला एक नेता पर नहीं था, बल्कि पूरे देश के सुरक्षातंत्र को ठेंगा दिखाना था, मगर हिंदुस्तानी सरकारें आई और चली गई, मगर राजीव गांधी की हत्या के पीछे कौन लोग थे, आज भी एक रहस्य है. सच सामने भी आ जाता लेकिन राजीव गांधी की 18वीं पुण्यतिथि से पहले ही श्रीलंकाई सेनाओं ने कुख्यात हिंसक आंदोलन के नेतृत्वकर्ता लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण को सदा के लिए चुप करवा दिया.हत्या के पीछे जिसका सबसे ज्यादा हाथ मानना जा रहा था,अब तो लगता है कि सच भी प्रभाकरन के साथ दफन हो गया. राजीव की हत्या के पिछे केवल लिट्टे का हाथ है, इतना कह देना सत्य नहीं, क्योंकि देश में आज भी ऐसे सीबीआई सेवामुक्त अधिकारी जीवंत हैं, जिनको अहसास था कि राजीव गांधी के साथी ही उसके साथ विश्वासघात करेंगे, जिसके बारे में उन्होंने राजीव गांधी को सूचित किए जाने का दावा भी किया. मगर जांच वहीं पर खड़ी है, क्या दूसरा कार्यकाल शुरू करने वाली मनमोहन सिंह की सरकार 23वीं पुण्यतिथि से पहले सच तक पहुंच पाएगी ?. अगर देश के प्रधान मंत्री की हत्या का सच सामने लाने में इतने साल लग सकते है तो आम आदमी की स्थिति क्या होगी ? राजीव गांधी की हत्या के दिन जन्में हुए बच्चे अब युवा हो गए है, उनको मताधिकार मिल जाएगा, जो राजीव गांधी की ही देन है, लेकिन राजीव को इंसाफ कब मिलेगा.

काले चिट्ठे खोलती 'पत्रकार की मौत'

पिछली बार जब बठिंडा गया था, तो कुछ पंजाबी किताबें खरीदने का मन हुआ, ताकि अपनी जन्मभूमि से दूर कर्मभूमि पर कुछ तो होगा, जो मातृभाषा से मुझे जोड़े रखेगा। बस फिर क्या था, पहुंच गया रेलवे स्टेशन के स्थित एक किताबों वाली दुकान पर, जहां से अक्सर हिन्दी पत्रिकाएं खरीदा करता था, और कभी कभार किताबें, लेकिन इस बार किताबे लेने का मन बनाकर दुकान के भीतर घुसा था। मैंने कई किताबें देखी, लेकिन हाथ में दो किताबें आई, जिसमें एक थी 'पत्रकार दी मौत' हिन्दी में कहूं तो 'संवाददाता की हत्या'। इस किताब का शीर्षक पढ़ते एक बार तो ऐसा लगता है, जैसे ये कोई नावल हो, जिसका नायक कोई पत्रकार, जिसकी किसी ने निजी रंजिश के चलते हत्या कर दी हो, मगर किताब खोलते ही हमारा ये भ्रम दूर हो जाता है, क्योंकि पूरी किताब में कहीं भी पत्रकार की शारीरिक हत्या नहीं होती, हां जब भी होती है तो उसके आदर्शों की हत्या, पत्रकारिता के आदर्शों की हत्या. 'पत्रकार दी हत्या' को शब्दों में बयान करने वाला लेखक गुरनाम सिंह अकीदा खुद भी पत्रकारिता की गलियों से गुजर चुका है. उसने इस किताब में अपने आस पास घटित हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए कई सच सामने रखें हैं. इस किताब में आधुनिक पंजाब में पत्रकारिता की होती दुरगति, दुर्दशा एवं घटिया सोच से उपजी पत्रकारिता के कारण बिगड़ते पंजाब की छवि साफ झलकती है. इसके साथ साथ उन्होंने मीडिया में राजनीतिक घुसपैठ, डेरा सच्चा सौदा सिरसा का राजनीति में प्रवेश, उसके पश्चात हुई पंजाब में सिख समुदाय एवं प्रेमियों की झड़पों में मीडिया का रोल, समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों द्वारा पैसे देकर रखे जा रहे संवाददाताओं के कारण किस हद तक पंजाब में पत्रकारी का स्तर गिरता जा रहा है, को साफ साफ शब्दों में लिखा है. 'पत्रकार दी मौत' में कुछ ऐसे घटनाक्रम भी हैं, जहां पत्रकार इंसानी जिन्दगी से ज्यादा तवज्जो अपनी खबर को देता है. एक व्यक्ति द्वारा आत्मदाह करने की एवं उसको कवरेज दे रहे पत्रकारों की घटना इस बात की ओर संकेत करती है. इसके अलावा बड़े टेलीविजनों, समाचार पत्रों को छोटे समाचार पत्रों के संवाददाताओं के मुकाबले अधिक तवज्जो देने का मुद्दा भी अहम रहा है. गुरनाम सिंह अकीदा की ये पुस्तक मुफ्त का हड़पने वाले पत्रकारों की पोल खोलने के साथ साथ उनके द्वारा किए हुए अच्छे कार्यों की सराहना भी करती है. पंजाब में दिन प्रति दिन धुंधली हो रही पत्रकारिता की छवि के प्रति मन में उठे सवालों के तूफान को किताबी रूप देने वाले लेखक गुरनाम सिंह अकीदा बधाई के हकदार हैं.

अब पंजाबी में भी

ਕਾਲੇ ਚਿੱਠੇ ਖੋਲ੍ਹਦੀ ਹੈ 'ਪੱਤਰਕਾਰ ਦੀ ਮੌਤ'

ब्लॉगरों के लिए विशेष सूचना..

सुनो सुनो, ब्लॉगर भाईयों और बहनों..मैंने ब्लॉगरों को एक मंच पर लाने के लिए orkut पर इंडियन ब्लॉगर लीग बनाई है...अगर आपकी इच्छा हो तो इसमें शीघ्र शामिल हुए..और अपने संपर्क को बढ़ाईए..
शामिल होने के लिए आसान तरीका..ओरकुट पर एक खाता और शामिल हो जाइए. ओरकुट में जाकर सर्च करें.
---Indian blogger league--. और बन जाए दोस्त सबके...

मनीबेन से जुड़ा तुलसी का भविष्य


हर समय ऐसे जैसे हालात नहीं रहते, कभी इंसान सफलता के सातवें आसमां पर होता है, तो कभी वो ही इंसान असफलता की पतन पर होता है. कुछ ऐसी स्थिति में है स्मृति इरानी बनाम तुलसी, अब उसका भविष्य तय करेगा 'मनीबेन डॉट कॉम', जी हां, पंजाबी पिता और बंगाली मां की बेटी स्मृति इरानी बनाम तुलसी अब मनीबेन बनने जा रही है. बालाजी की शाखा को मजबूत करने वाला 'क्योंकि सास भी कभी बहू' के बंद होने के बाद तुलसी अपने पुराने कर्ज उतारने के लिए नया रूप धारण कर छोटे पर्दे पर फिर से दस्तक देने जा रही है, स्टार प्लस की जगह हँसी के ठहाके लगाने वाले चैनल 'सब टीवी' पर. इस बार लोगों को हंसाकर वाह वाह बटोरने वाली है स्मृति इरानी, लेकिन ये तो सीरियल आने के बाद ही पता चलेगा कि तुलसी के बाद मनीबेन स्मृति में कितना दम है. अभिनय के साथ साथ राजनीति में कदम रखने वाली स्मृति इरानी को चांदनी चौंक के बशिंदों ने नकार दिया था, उस हार का मजा चखने के बाद स्मृति ने इस बार चुनाव में अपना भाग्य अजमाने की बिल्कुल नहीं सोची, हां लेकिन भाजपा को जिताने के लिए जुटी रही.

अपने अभिनय के बल पर छोटे पर्दे पर सरदारी करने वाली स्मृति इरानी को प्रोडक्शन हाउस में कदम रखना बेहद महंगा पड़ा, उन्होंने इस दौरान कई सीरियल दिए, 'थोड़ी सी जमीं थोड़ा आसमां, ' विरुद्ध', वारिस' आदि जो 'क्योंकि सास भी कभी बहू' की भांति हिट नहीं हुए. उन सीरियलों की वजह से तो वो आज भी विवादों में फंसी हुई हैं, उन्होंने वारिस नामक सीरियल का निर्माण किया था, लेकिन सीरियल यूनिट के मेंबरों की पेमेंट आज तक नहीं हो पाई.

स्मृति राजनीति में भी कोई गजब नहीं ढह सकी, और इधर बालाजी वालों का डिब्बा गुल हो गया. अब उम्मीदें टिकी हैं, मनीबेन डॉट कॉम पर, नाम से ही पता चलता है कि ये नाटक भी गुजराती महिला पर आधारित है, जो ऐसी वैसी हरकतें करेगी कि दर्शकों को हंसी आएगी, जैसे कि 'तरक मेहता का उलटा चश्मा' में दया, एक गुजराती महिला का किरदार है, जो ऐसी उट पटांग हरकतें करती है, जो लोगों को हंसने पर मजबूर कर देती हैं. कई पुरस्कार अपनी झोली में डाल चुकी स्मृति इरानी के लिए मेनीबेन डॉट कॉम एक मील पत्थर साबित हो सकता है, अगर वो लोगों को हंसने में कामयाब हो गई तो...नहीं तो गई तुलसी.



अभिव्यक्ति आपका अधिकार है, आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए बलवर्धक आषौधि है. अच्छी बुरी जो भी हो अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दर्ज करवाएं. लिखित रूप में और मौखिक रूप में 99935-98986

यहां भी होता है मज़ाक ?

चुनावों के नतीजे आ रहे थे, राजनीति में दिलचस्पी लेने वालों के अलावा अन्य लोगों की निगाहें भी नतीजों पर टिकी हुई थीं, शायद मेरे संस्थान की तरह अन्य मीडिया कार्योलयों में चुनावों के आ रहे रुझानों को गौर से देखा जा रहा होगा, लेकिन टेलीविजन की स्क्रीनों पर कुछ नेताओं के साथ बहुत बुरा मज़ाक हुआ, पहले तो उनको हारे हुए घोषित कर दिया गया, फिर उनको विजेता घोषित किया गया. इस मजाक का शिकारे हुए केंद्र गृहमंत्री पी. चिदंबरम, वरुण गांधी की माताश्री मेनका गांधी, रेणुका चौधरी के साथ भी ऐसा ही हुआ, लेकिन रेणुका चौधरी को पहले विजेता घोषित कर फिर उसको हारा हुआ घोषित कर दिया. इतना ही नहीं, इस तरह का हाल अनंतनाग में भी देखने को मिला, वहां पर पहले एनसी के उम्मीदवार को विजेता घोषित किया गया, अंतिम चरण में पहुंचते वो सीट पीडीपी के खाते में चली गई.

रामू ने चुराई रण की स्टोरी..!

रामगोपाल वर्मा एक ऎसा निर्देशक जो हमेशा विवादो में घिरा रहता है। कभी वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के पीछे पीछे किसी पालतू कुत्ते की तरह मुंबई की उस ताज होटल को देखने (अपनी भविष्य की फिल्मो का प्लोट्स ढूँढने) चला जाता है जहाँ पर आतंकवादी हमला हुआ था, तो कभी बिना मतलब की फिल्मो (नि:शब्द) को बनाकर समाज को गुमराह करता रहता है।

यह वही निर्देशक है जो होलीवुड के महान निर्देशक फ्रांसिस फोर्ड कपोला की फिल्म गोड फाधर से प्रेरित (प्रेरित शब्द बोलने में अच्छा लगता है इसलिए यहाँ पर लिख रहाँ हूँ वरना सही शब्द चोरी और उठांतरी है।) होकर सरकार और सरकार राज जैसी फिल्मे बनाकर सफलता का ताज अपने शिर पर पहन लेता है ।

यह वही शख्स है जो किसी से धोखाधड़ी करने में भी कभी पीछे मुडकर नहीं देखता। सफलता पाने के लिए कभी-कभी यह शख्स अपने नाम (राम) का भी दूरुपयोग करके देश के हितो और गीतो (राष्ट्रगान) को भी अपनी शैली में बेचने पर तैयार हो जाता है।

विश्वास न आ रहा हो तो जरा इस पक्तिं को पढिए..

''जन गण मन रण है, इस रण मैं जख्मी हुआ है भारत का भाग्यविधाता।
पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा एक दूसरे से लड़के मर रहे है।

रामू की अगली फिल्म ''रण'' का ये गीत राष्ट्रगान जन गण मन अधिनायक को आधार बनाकर लिखा और गाया गया है। इस गाने की धुन राष्ट्रगान की है। रामू के कहने पर राष्ट्रगान के शब्दों को भी इस गीत के लेखक ने जमकर इस्तेमाल किया है। अच्छा है कि आज हमारे बीच में आदरणीय गुरूदेव (रविन्द्रनाथ टैगोर) उपस्थित नहीं है वरना वह अपने द्वारा लिखित इस महान रचना के शब्दो पर दूसरे लेखको और निर्देशको के द्वारा किए गए कत्लेआम को कभी भी सह नहीं पाते ।

खैर.. फिलहाल में राष्ट्रगान के अपमान की बात नहीं करना चाहूँगा क्योंकि मेरे कई ब्लोगर भाईयों ने इस बात को लेकर पहले से ही अपना गुस्सा अपने-अपने ब्लोगो में निकाल चूके है। उन्होने अपने ब्लोगों मैं यह भी लिखा है कि किस प्रकार इस निर्देशक ने हमारे राष्ट्रगान का मनमाफिक इस्तेमाल कर लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है।

खैर यहा पर में जो बात करना चाहूँता हूँ वह रामू के द्वारा कि गई धोखाधड़ी की है । मैं बात करना चाहूँगा मिस्टर विपुल राठोड की जो गुजरात के राजकोट शहर के एक सुप्रसिद्ध अखबार के पत्रकार है। विपुल पत्रकारिता के अलावा कभी कभी लेखन में भी अपने हाथ अजमाते है । आज से दो-साल पहले उनके दिमाग में एक स्टोरी आई और उन्होने उसे कागज पर उतारा। स्टोरी अंग्रेजी में लिखी गई जिसका शिर्षक था THE WAR ।

विपुल राठोड ने यह स्टोरी निर्देशक राम गोपाल वर्मा की फिल्म प्रोड्कशन कंपनी को भेजी लेकिन प्रोड्कशन हाउस के सभ्यो ने उस वक्त ऎसा कहाँ कि आपकी कथा का स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह सामान्य कथा है। विपुल ने इस स्टोरी में एक पंच लाईन भी डाली थी वह कुछ इस प्रकार थी ।

SOME TIME TRUTH LOOSES...
AND U HAVE USED
TRUTH IS TERRIBLE...

आश्वर्य की बात तो यह है कि यही पंचलाईन रामू की अगली फिल्म 'रण' से काफी हद तक मिलती जुलती है । इसे हम आश्वर्य कहे या फिर इत्तफाक क्योंकि विपुल ने जो स्टोरी लिखी वह भी रामू की अगली फिल्म 'रण' से काफी हद तक मिलती-जुलती है। विपुल का कहना है कि आज से दो-साल पहले जब उसने राम गोपाल वर्मा के प्रोडकशन हाउस से संपर्क किया तो उनकी बातचीत नीरज नाम के किसी शख्स के साथ हुई। निरज ने उसे बताया कि विपुल को अपनी स्टोरी कहाँ पर भेजनी है। विपुल नें वैसा ही किया जैसा नीरज ने उसे करने के लिए कहाँ । निरज ने अपना इमेल पत्ता (neeraj@factoryatwork.com) विपुल को भेजा ।

लेकिन जब विपुल को लगा कि उनके द्वारा भेजी गई कथा को राम गोपाल वर्मा ने वैसे के वैसे ही उठा लिया है तब उन्होने निरज का संपर्क साधने की कोशिष की लेकिन अफसोस निरज ने जो ई-मेल पत्ता भेजा था वह बाउन्स हो गया है। विपुल ने अपनी स्टोरी का क्या हुआ इस संघर्भ में राम गोपाल वर्मा के ब्लोग पर भी अपनी टिप्पणी भेजी ( http://cid-5187b91811914fb4.profile.live.com/) लेकिन अब तक रामू ने उसका कोई जवाब नहीं भेजा। विपुल अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहै है और मीडिया और हम ब्लोगर भाईयों की मदद चाहते है ता कि हम बोलीवुड मैं मुक्त की वाह वाह बटोरने वाले निर्माता-निर्देशको को जनता के सामने ला पाए ।

विपुल ने जो स्टोरी लिखी है अगर आप सभी लोग उसे पढना चाहते है तो आप उसे इ-मेल (vipul1312@yahoo.com) कर सकते है। उसे पढ़ने के बाद आप खुद जान जाएंगे कि आखिर रामू सफलता पाने के लिए किस हद तक जा सकते है ।

( कृपया यह बात हर ब्लोगरो और अपने मित्रो तक पहुँचाए। पत्रकार भाईयों से गुजारिश है कि कृपया आप भी इसमें अपना योगदान दे ताकि भविष्य मैं कभी किसी पत्रकार के साथ कोई अन्याय न हो सके । अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजे और हिन्दी सुधारके पढ़े । जनक...नाम तो याद रहेगा..शायद )

असली लिंक यहां है..
http://jp.mywebdunia.com/2009/05/12/1242144776001.html

रण को लेकर नया विवाद

जब मैं ब्लॉग लि ख रहा था तो एक बात और सामने आई कि रण फिल्म की कहानी के गुजराती युवक द्वारा लिखी गई है, परंतु संबंधी खुलासा तो अभी नहीं हुआ, मगर युवक का दावा है कि रण की कहानी उसकी है, जिसको उसने रामगोपाल वर्मा को भेजा था, लेकिन उसका क्रैडिट उसको नहीं दिया जा रहा है. हो सकता है कि एक विवाद और राम का इंतजार कर रहा हो..
'रण' का अर्थ युद्ध होता है और रामगोपाल वर्मा की अगली फिल्म 'रण' है. जिसके शीर्षक गीत ने वाकयुद्ध सा छेड़ दिया है. टैलीविजन की स्क्रीन से नजर हटाते हुए अखबारों की सुर्खियों से गुजरने के बाद जब ब्लॉग जगत में पहुंचा तो एक ही चीज़ पाई, वो 'जन गण मन..रण' गीत...जिसने रामगोपाल वर्मा को एक बार फिर विवादों के कटहरे में खड़ कर दिया. 'आग' का झुलसा रामू अभी ठीक नहीं हुआ था कि उसकी फिल्म कंट्रेक्ट के एक दृश्य और अहमदाबाद बंब धमाकों की समानता ने उसको फिर से आलोचनाओं का शिकार बना दिया. 'सरकार राज' एवं 'फूंक' की सफलता ने रामू के भीतर जान फूंकी थी, जो आग में झुलसने के कारण खत्म सी हो गई थी. मुम्बई आतंकवादी हमले के बाद जब पूरा देश आतंकवादियों को कोस रहा था तो रामू की किस्मत उसको खींचकर महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री के साथ उस होटल में ले गई, जहां कुछ दिन पहले आतंकवादियों ने कोहराम बरपाया था. अगर देखा जाए तो अमिताभ बच्चन और रामगोपाल वर्मा का साथ वक्त को गवारा नहीं, एक सरकार राज की सफलता को निकाल दिया जाए तो. जब अमिताभ ने अभिताभ अभिषेक को लेकर सरकार बनाई थी तो कुछ लोगों ने विरोध प्रकट किया था कि ठाकरे परिवार को आधार बना फिल्म बनाई गई है. एक सज्जन बताते हैं कि इस फिल्म को रिलीज होने से पहले बाल ठाकरे ने खुद देखा था, कह सकते है कि रामू को दो सैंसर बोर्डों से गुजरना पड़ा था. इतना ही नहीं जब रामगोपाल वर्मा ने अमिताभ को लेकर निशब्द बनाई तो कुछ बुद्धजीवियों ने इस फिल्म पर आपत्ति जता दी कि ये फिल्म समाज को गलत आइना दिखाएगी. शोले रीमेक रामगोपाल वर्मा की आग का हश्र तो जगजाहिर है, इस फिल्म में काम करने वाले अमिताभ बच्चन पर भी कम उंगलियां नहीं उठी. यहां एक बात और बताने योग्य है कि फिल्म सरकार राज को रिलीज करने से पहले राज ठाकरे को ये फिल्म दिखाई गई थी, लोगों को लग रहा था कि इस फिल्म में राज ठाकरे के किरदार से मिलता जुलता एक किरदार लिया गया है.

पप्पूओं की शिकायत.....

शुक्रवार की सुबह मैं अपने सुसराल में था, मैंने आम दिनों की तरह दुनिया भर का हाल जानने के लिए टीवी शुरू किया, और खबरिया चैनल बदलते बदलते पहुंच गया एनडीटीवी पर, जहां पप्पूओं पर स्पेशल रिपोर्ट चल रही थी, लेकिन ये वो पप्पू नहीं थे, जिनको पप्पू श्रेणी में रखा जाता है, बल्कि ये स्टोरी उन पप्पू पर आधारित थी, जो वोट करने के बाद भी बदनाम हैं. जो डांस में नंबर एक हैं, लेकिन लोग कहते हैं कि 'पप्पू कांट डांस साला', इसको प्रस्तुत कर रहे थे मेरे पसंदीदा संवाददाता एवं न्यूज एंकर रवीश कुमार. गंभीर मुद्दों पर स्पेशल रिपोर्ट पेश करने वाले रवीश कुमार, इस खबर को पेश करते हुए खुद की हँसी को ब-मुश्किल रोके हुए थे. उनकी आंखों में हँसी सफल झलक रही थी, क्योंकि वो जानते थे कि पप्पू शब्द का इस्तेमाल उनके टीवी एवं उनके ब्लॉग पर कितने बार हुआ है, लेकिन कहते हैं ना कि जब जागो तब सुबह. फिर भी रवीश कुमार अपनी हँसी को रोके हुए अपने शब्दों के जरिए बदनाम हुए पप्पूओं को उनका खोया मान दिलाने के लिए बोलना शुरू रखा. वो बार बार कह रहे थे कि वोट बबलू नहीं देता, लेकिन बदनाम पप्पू होता है. दुनिया भर में पप्पू नामक व्यक्तियों की संख्या बहुत होगी, लेकिन आजकल ब्लॉग से लेकर टेलीविजन तक बुद्धू लोगों को पप्पू के नाम से संबोधित किया जा रहा है. स्पेशल रिपोर्ट के दौरान दिखाया गया कि आज से कुछ साल पहले एक चाकलेट की एड के दौरान शब्द उभरा था कि पप्पू पास हो गया. उस वक्त किसी को कोई एतराज न हुआ, क्योंकि उस एड में उस युवक का नाम पप्पू था, और उसने मेहनती की एवं वो पास हो गया. वहां कुदरती था कहा जाना कि पप्पू पास हो गया. लेकिन तब तो सबको ये शब्द खटकना ही था, जब वोट बंता संता नहीं करते, और बदनाम बेचारा पप्पू होता है. उल्लेखनीय है कि पंजाब, हरियाणा बिहार दिल्ली में बनिया एवं अरोड़ा बिरादरी में पप्पू नामक लोगों की भारी संख्या है. विज्ञापन में पप्पू पास क्या हुआ कि 2007 में एस सोनी ने एक फिल्म बना डाली 'और पप्पू पास हो गया'. जब जब कोई निकम्मा आदमी अच्छा काम करने लगा तो कहा जाने लगा पप्पू पास हो गया. पिछले तीन चार सालों से पप्पू का बैंड बज रहा है, लेकिन सबको समझ अब जाकर आई. ब्लॉग पर तो पप्पू शब्द को धड़्ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है, कोई वोट देने नहीं गया ब्लॉगर लिखता है यारों मैं तो पप्पू बन गया. इतना ही नहीं, स्पेशल रिपोर्ट पेश कर रहे हंसमुख मिजाज के रवीश कुमार के कस्बा नामक ब्लॉग पर भी इस चौदह मार्च 2009 को ये पप्पू पास हो गया, आपका क्या होगा जनाबेआली प्रकाशित हुआ था, उसके बाद तीन मई को ये पप्पू फेल हो गया नामक एक और ब्लॉग लिखा गया था. इस बार पंजाब में 65 प्रतिशत मतदान हुआ, और 35 प्रतिशत को लोगों ने पप्पू का नाम दिया होगा, जबकि वो भूल गए कि 65 प्रतिशत हुए मतदान में कितने नामक व्यक्ति थे, पंजाब के तकरीबन हर गांव में एक या दो पप्पू नामक व्यक्ति आपको आम ही मिल जाएंगे.

कभी सीधी सपाट

कभी सीधी सपाट 
तो कभी पहेली लगती है 
कभी बेगानी सी 
तो कभी सहेली लगती है 
ये जिन्दगी भी अजीब है दोस्तों 
पल में सब बिखर बिखर नज़र आता है
अगले ही पल सब निखर निखर नजर आता है 
कभी धुप कभी छाँव जिंदगी 
लगती है मनचाहे दांव 
जिन्दगी कभी खुशियों भरा थाल देती है 
कभी कर गम से मालामाल देती है 
ये जिन्दगी भी अजीब है दोस्तों

sms खोल रहें पोल

अक्सर पंजाब से दोस्त एसएमएस भेजते रहते हैं, और मेरी भी फिदरत है कि एसएमएस को हर हाल में पढ़ा जाए, क्योंकि कुछ एसएमएस असल में भी बहुत अहम होते हैं. जिनका जवाब उसकी मौके पर देना लाजमी होता है. आज ऑफिस में बैठा कीबोर्ड पर अपनी रोजाना की तरह उंगलियां चला रहा था, और कानों में एनडीटीवी इंडिया की आवाज आ रही थी, जिस पर रवीश कुमार द्वारा स्पैशल स्टोरी प्रस्तुति की जा रही थी. इतने में पास पड़े मोबाइल पर एसएमएस आने का अलर्ट सुनाई दिया. मैंने तुरंत मोबाइल उठाया और देखा कि आख़र किसका एसएमएस आया है. मोबाइल पर एक फनी एसएमएस था, जिसको पढ़कर हंसी, लेकिन उसकी अंतिम लाईन ने लिखने पर मजबूर कर दिया.वो कुछ इस तरह था...
A poor man catches a fish. wife can't cook due to..
no gas
no electricity
no oil
man puts fish back in rivar
fish comes up & shouts
Badal Sarkar Zindabad
इसके अलावा कुछ दिन पहले मैंने अपने मित्र पत्रकार फोटोग्राफर की ओरकुट पर बड़े बादल एवं छोटे बादल का गुफतगू करता पिकचर देखा, जब मेरी नजर उसके नीचे लिखे कमेंट पर पढ़ी तो मैं हैरान रह गया. उसमें पंजाबी में लिखा हुआ था, जिसका हिंदी अनुवाद था कि हमने बठिंडा सीट से हरसिमरत को खड़ा कर पंगा मूल्य ले लिया. उस कमेंट में बहुत बड़ी सचाई थी, जो उसने एक लाइन में लिखकर स्पष्ट कर दी. बठिंडा सीट पर खड़ी हरसिमरत कौर बादल को जिताने के लिए बादल परिवार एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है, फिर भी बात नहीं बनती दिखती, सुखबीर तो कहता घूम रहा है कि किसी भी हालत में ये सीट नहीं जाने दी जाएगी, बेशक सब बिक जाए.

शिअद कांग्रेस में नहीं, परिवारों में टक्कर

बठिंडा पिछले एक दो साल से ख़बरों में है सिख-डेरा विवाद के कारण, लेकिन अब बठिंडा अख़बारों की सुर्खियों में डेरा सिख समुदाय विवाद को लेकर नहीं बल्कि राजनीतिक घमासान को लेकर है. पंजाब की 13 लोक सभा सीटों में से बठिंडा सबसे चर्चित एवं अति-संवेदनशील सीट बन चुकी है, क्योंकि इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अरमिंदर सिंह का बेटा रणइंद्र सिंह और उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर है. इस लोक सभा सीट पर लड़ाई कांग्रेस और शिअद के बीच नहीं बल्कि दो बड़े राजनीतिक घरानों के बीच है. ये सीट इज्जत का सवाल बन चुकी है बादल परिवार के लिए, क्योंकि कैप्टन ने अपने बेटे को बादल के गढ़ में उतारकर घर में घुसकर मारने वाली रणनीति अपनाई है. अगर बादल परिवार की बहू इस सीट से हारती है तो बादल परिवार की साख को बहुत बड़ा झटका लगेगा. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बठिंडा सीट को निकालने के लिए शिअद नेता हर हथकंडा अपनाने के लिए तैयार है. ऐसे में चुनावों के दौरान हिंसक घटनाएं होने की भी पूरी पूरी आशंकाएं, जिन्होंने सुरक्षा प्रशासन की नींद उड़ा रखी है. इन आशंकाओं में उस समय और भी इजाफा हो जाता है जब हाल में हुए बठिंडा नगर निगम चुनावों में उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की धक्केशाही को सुरक्षा प्रशासन याद करता है. इसके अलावा पिछले दिनों हुए सिख-डेरा प्रेमियों के बीच में संघर्ष भी चिंताओं को दोगुना कर देते हैं. इन आशंकाओं के बीच बठिंडा में चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से करवाने के लिए करीबन 11 हजार जवानों की तैनाती की जाएगी, अगर और की जरूरत पड़ी तो अन्य जिलों से भी फोर्स मंगवा ली जाएगी. बठिंडा सीट पर चुनाव 7 मई को होना है, लेकिन तीन मई को ही पैरा मिलिट्री फोर्स व शेष पंजाब पुलिस के जवान मोर्चा संभाल लेंगे, ताकि बठिंडा लोक सभा क्षेत्र में को अप्रिय घटना घटित न हो. इतना ही नहीं दो परिवारों की प्रतिद्वंदिता को देखते हुए बठिंडा जिले के कुल 832 पोलिंग बूथों में से 250 बूथ अति संवेदनशील, 406 संवदेनशील और 176 बूथ सामान्य की श्रेणी में रखे गए हैं. बठिंडा सीट पर होने वाली धक्केशाही से कैप्टन अमरिंदर सिंह अच्छी तरह परिचित हैं, तभी तो कैप्टन अमरिंदर सिंह पुलिस कर्मचारियों को बार बार अपील करते हैं कि तुम लोग अपनी ड्यूटी इमानदारी से करना, सरकारें बदलती रहती हैं. कैप्टन के इस तरह के बयानों से साफ झलकता है कि बठिंडा सीट पर नगर निगम चुनावों की तरह धक्केशाही होने की पूरी पूरी संभावना है. दूसरा कारण प्रकाश सिंह बादल का गर्म मिजाज बेटा सुखबीर सिंह बादल भी है, जो अपनी पत्नी को जिताने के लिए हर हथकंडा अपनाने से बाज नहीं आएगा. बठिंडा में चुनावों के चलते सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए अन्य जिलों की सीमाओं पर सघन जांच अभियान शुरू किए गए हैं ताकि शरारती तत्व इस क्षेत्र में पहुंचकर तनाव पैदा न कर सकें.’