कुछ मन से निकले

जैसे भी चलता हैं चक्कर चलाओ मेरे बेटे को नेता बना ओ----मेंनिका गाँधी

बदनाम हुए तो क्या हुआ यारों नाम तो हुआ --- एल के आडवानी

जी हाँ खलनायक हूँ मैं जुल्मी बड़ा दुखदायक हूँ मैं---वरुण गाँधी

यहाँ भी आईये
खेत और ऑफिस

व्यंग काव्य-नैनोकली

गली गली
एक बात चली
आ गई टाटानी नैनोकली
बेटी अपने डैड से बोली
स्कूटरी छोड़ो ले दो
बस नैनो ओनली
सुनो जी,
इस बार एमएजी ना देना
पति खुश हुए
पत्नी बोली नैनो ला देना
मुश्किल नहीं संता बंता को
समझाना मुश्किल जनता को
कौन समझाए ये सब भेड़ चाल है
ट्रैफिक का तो पहले ही बुरा हाल है
5227 लेकर जब निकलता हूं
मैं ही जानु कितना धूंआं निगलता हूं.
एमएजी (marriag anversy gift)5227 (motor cycle no)

एक कविता ब्लॉगरों के नाम

देखा नहीं,
और कहीं,
नई सड़क स्थित कस्‍बा के रहवासी

हर ब्लॉग पर है पता इनका
सवार रहते हैं उड़न तश्तरी
समीर नाम जिनका

अविनाश हैं
कीबोर्ड के खटरागी,
टिप्पणियों के रूप में
कविताएं जिन्होंने दागी

जैसे जैसे ब्लॉग पढ़ता जाऊं
समयचक्र के साथ आगे बढ़ता जाऊंगा
कभी कभी कुछ ख़ास लेकर आऊंगा

द वरुण-घटिया सोच, जहरीली जुबां

'नफरती ठाकरे' के बाद घटिया सोच की उपज इसकी अगली कड़ी है 'द वरुण-घटिया सोच, जहरीली जुबां, इस फिल्म को बड़े पर्दे पर नहीं बल्कि छोटे पर्दे पर पेश किया जा रहा है। इसका नायक राज ठाकरे की वंश का नहीं, लेकिन उसकी सोच एवं उसके शब्द उसका कनेक्शन राज ठाकरे से जोड़ते हैं. इसका जन्म तो एक गांधी परिवार में हुआ, लेकिन गांधी होने के नाते महात्मा गांधी के बताए हुए रास्ते पर चलना इसको स्वीकार नहीं, जहां महात्मा कहते थे कि अगर कोई एक थप्पड़ मारे तो दूसरी गाल आगे कर दो, लेकिन ये न समझ मियां कहते हैं कि उस हाथ को काट दो॥वो किसी ओर पर भी उठने लायक न रहे. इस फिल्म के नायक का ये बयान सुनकर तो हर कोई दंग रह गया होगा, कहां मानव-जीव हित के लेख लिखने वाली मेनका गांधी और कहां ये जुबां से नफरत का जहर फेंकने वाला वरुण, वरुण के ऐसे 'फूट डालो, राज करो' वाले बयान सुनकर तो लगता है कि मेनका गांधी लिखने में इतना व्यस्त हो गई कि वो अपने बेटे को राजनीति के दांवपेच सिखाने एवं भारतीय संसकार देने ही भूल गई. आज से पहले तो हिंदुस्तान की सरकारी शिक्षा प्रणाली पर क्लर्क पैदा करने का आरोप लगता था, लेकिन विदेश पढ़ाई ने तो हिंदुस्तानी युवक को अंग्रेज बना दिया. उसकी रगों में खून तो हिंदी, लेकिन सोच इंग्लिशस्तानी है. अगर देश का युवा ऐसा होगा, तो देश कैसा होगा? एक सोचने वाली बात, एक दिमाग को झिंझोड़ देने वाला सवाल है. पहले नफरत का जहर प्यार की फिजा में राज ठाकरे ने घोला था, अब वो काम मनेका गांधी के पुत्र कर रहे हैं. वरुण को देखकर तो सोनिया गांधी को दाद देनी होगी कि विदेशी होने के बावजूद भी उसने अपने बच्चों को हिंदुस्तान में रहने की तमीज तो दी. परिवार एक है, लेकिन पार्टियां अलग अलग हैं. सोच अलग अलग है. एक तरफ राहुल गांधी जो अपने व्यक्तित्व के कारण आज लोकप्रिय है, कुछ लोग तो उसको प्रधान मंत्री बनाने के लिए भी हामी भर चुके हैं. और दूसरी तरफ खड़ा वरुण गांधी, जिसकी भाजपा में दो-कौड़ी की औकात नहीं. वरुण मियां बोले कि कोई है इस क्षेत्र में मेरे अलावा हिन्दुत्व को बचाने वाला. अरे न समझ, हिंदुत्व लोगों से नहीं, विचारधाराओं और सिद्धांतों जिंदा रहेगा. महान लोग जिंदा हैं, तो सिर्फ अपनी इच्छाईयों से, विचारों से, न कि शरीर से..

एक चुस्की...
अरे बेटा तुमने ये क्या कर दिया? मैंने तो तुम को अच्छे संवाद लिखकर दिए थे और तुमने ये क्या उलटा सीधा बोल दिया.
तुमको क्या बताऊं? मां, जनसभा में पहुंचकर याद आया कि तुम्हारा लिखा भाषण तो मैं घर भूल आया. बस जितना उसको पढ़ा था, मैंने बोल दिया, और तुम को तो पता ही है कि मेरी याददाश्त कमजोर है. शायद उलटा पुलट गया हूंगा.
अब क्या होगा? मां!
कुछ नहीं. तुम बोल दो कि मीडिया ने बयान तोड़ मरोड़ कर दिया है.
मां ये भी लिखकर दे दो न..
वरना कुछ और बोल दिया तो फिर कोई पंगा पड़ जाएगा।

ऑस्कर विजेता स्लमडॉग एवं चुस्कियां
चैनलों की रंगदार होली
पंजाब में छिड़ने वाला है धर्म युद्ध !
खेत और ऑफिस
ब्‍लॉगर्स जय होली : गुब्‍‍बारों पर रोक लगी : युवा ...
क्रिकेटरों पर हमला-एक चेतावनी
ब्लॉग पर हुए बेकाबू, तो दर्ज होगा केस
पूर्वजों को ऑनलाइन दें श्रद्धांजलि
....जब स्लमडॉग ने लपका ऑस्कर
....वो खुशी खुशी लौट आए लड़का होकर डरते हो...
..जब भागा दौड़ी में की शादी
वेलेंटाईन डे पर सरप्राइज गिफ्ट
मरती नहीं मोहब्बत
बचो! बचो! 'स्लमडॉग..' से
एकता को जमीं पर लाया कलर्स
कहां छुपा गया फिजा का चांद ?
नहीं चाहिए ऐसी सेना
प्यार के लिए चीर पहाड़
प्यार की भी एक मर्यादा हो
ओबामामय हुआ अमेरिका
संघर्ष का दूसरा नाम 'अक्षय'

ऑस्कर विजेता स्लमडॉग एवं चुस्कियां

बच्चे अपनी तमाम मासूमियत के बावजूद इस घिसेपिटे सवाल का टेलीविजन से ही सीखा हुआ जवाब जानते थे। जी हाँ जरूर। हमारे दोस्तों ने देश का नाम रोशन किया है। स्लमडॉग मिलियनेयर का जमाल महात्मा गाँधी के बारे में पूछे जाने पर कहता है कि सुना हुआ सा लगता है नाम। झुग्गी के इन बच्चों से भी देश का इतिहास और भविष्य इतना ही दूर या करीब है तो स्लमडॉग मिलियनेयर की सफलता इनके लिए क्या है...। स्माइल पिंकी नाम की डॉक्यूमेंट्री ने भी ऑस्कर जीता। ये डाक्यूमेंट्री उत्तरप्रदेश के मिरजापुर के एक छोटे से गाँव के गरीब परिवार की पिंकी नाम की जिस बच्ची के जीवन पर आधारित है, उसकी माँ मानती है कि उसकी बेटी ने ‘अफसर’ जीता है और देश का नाम रोशन किया है और अब सरकार को उन्हें कम से कम एक छोटी दुकान खोलने के लिए पैसे देना चाहिए। ऑस्कर की खुशी में महाराष्ट्र सरकार ने भी स्लमडॉग के अजहरुद्दीन और रूबीना को मकान देने का फैसला कर लिया है, मगर हफ्ताभर लॉस एंजेलिस में बिताने वाले अजहरुद्दीन को उसके पिता ने इसलिए तमाचा जड़ दिया, क्योंकि वह पत्रकार को इंटरव्यू देने से मना कर रहा था। खबर अखबारों के पहले पन्ने पर है। कुछ दिनों के लिए इन बच्चों की गरीबी पर हमारी नजर है। आप कैसे देखते हैं इस खबर को, कैसे देखते हैं पिंकी, अजहरुद्दीन और रूबीना जैसे लाखों बच्चों की जिंदगी और उनके सपनों के बीच के फासलों को, ऑस्कर के जादू को। मंच पर दुनिया के बेहद धनी और खूबसूरत कलाकारों के साथ खड़े इन बच्चों को देख कर किसी ने कहा अगर इस फिल्म से करोड़ों बनाने वाले लोग बांद्रा और धारावी की झुग्गियों के इन बच्चों में से एक-एक की शिक्षा का भी भार उठा लें तो कितना कुछ बदल सकता है। ऐसा बदलाव आएगा या नहीं, हम नहीं जानते, लेकिन हाँ एक बदलाव जरूर आया है। वह है 'पावर्टी टूरिज्म'। अब पर्यटक इन बदबूदार बस्तियों को दूर से देख कर महसूस करना चाहते हैं कि यहाँ कैसे जादू शुरू हुआ होगा। अब ये बस्तियाँ टूरिस्ट नक्शे पर हैं, निशान की तरह। यहाँ अंधेरे का सफर सिनेमा के तीन घंटों से कहीं ज्यादा लंबा है। बकौल विस्सवा शिंबोर्सका परदों का गिरना ही नाटक और फिल्म की सबसे कड़वी सच्चाई होता है।
लेखक : अनीश अहलूवालिया, बीबीसी संवाददाता

चैनलों की रंगदार होली

इस बरस की होली चैनलों की होली है। बेपानी की होते हुए भी रंगदार होली है। चैनलों ने अपने अपने नल खोल दिए हैं जिसमें से रंग बिरंगे सनसनीखेज समाचार लगातार बह रहे हैं। तरह तरह के समाचारों के रंग जिसमें बलात्कांर, खुदकुशी, रिश्वरत, घोटाले, मंदी, गंदी राजनीति तो हैं ही, वे भी है जिनका जिक्र करना ठीक नहीं है। वरना होली रंगीन से संगीन हो जाएगी। ऐसी भी कोई रोक नहीं है कि चैनलों के नल सिर्फ दो बजे दोपहर तक ही खुले रहेंगे जिस तरह बसें और मेट्रो दो बजे तक बंद रहती हैं। क्यों इनकी छुट्टी की जाती है जबकि ब्लू लाईन तो रोज ही दिन दहाड़े अपने आने के दिन से ही होली खेल रही हैं। जिस दिन उन्हें होली खेलनी चाहिए उस दिन उनकी छुट्टी कर दी जाती जबकि उस दिन वे होली खेलें तो पब्लिक को पता ही नहीं चलेगा कि रंग है या खून है। वैसे ब्लू लाईन कहने भर की होती है उनमें न लाल खून होता है न नीला ही। पीला हरा तो मिल ही नहीं सकता क्योंकि वे कीड़े मकोड़े नहीं होती हैं क्योंकि कुछ कीड़े मकोड़ों का खून नीला व कुछ का हरे रंग का भी होता है। बसों और मेट्रो के लिए तो तो पब्लिक कीड़े मकोड़े से अधिक है भी नहीं। इसलिए अगर कहीं कुचल भी जाती है तो भी बसें और मेट्रो अपनी रफ्तार से बदस्तूर चलती रहती हैं।
सभी चैनलों से तरह तरह के रंग बह रहे हैं। जैसे चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हों कि होली है। रंग बिरंगी सतरंगी होली है। समाचार वाचक और वाचिकाएं जिस पर अपना दम जमाती रहें उनका खून पिघलाती रहें, वो पब्लिक भी तो उन्हें निरंतर मिलती ही रहनी चाहिए। पता नहीं यह किसने तय किया है कि होली सिर्फ एक दिन और वो भी सिर्फ दो बजे तक ही मनाई जानी चाहिए। वो होली ही क्या जिस पर बंदिशें लगा दी जाएं। होली यानी हंसी मजाक – कोई ठोकर खाकर गिरता है तो तब भी तो लोग हंसते ही हैं। वो भी होली का ही एक रूप है। किसी के चांटा पड़ता है तो पड़ने वाले गाल के लाल होने के सिवाय देखने वाले हंस हंस कर लाल और नौनिहाल हो जाते हैं मारने वाला तो वैसे ही गुस्से से लाल हो ही रहा होता है। हंसना भी एक रंग ही है क्या हुआ जो वो रंग अगर परंपरागत रंग लाल, हरा, नीला, पीला, बैंगनी, गुलाबी नहीं है। जिस तरह रोने का रंग काला है उसी तरह हंसने के रंग काले के सिवाय सारे हैं। होली पूरे साल मनाई जाती रहनी चाहिए। आप कल्पना कीजिए कि दीवाली पर भी होली मनाई जा रही है, वैसे आतंकवादी तो ऐसी होली दिवाली – बेदिवाली मनाते ही रहते हैं, जहां बम फोड़ दिए, वहीं खून की होली, लाशों की होली, शरीर के अंगों की होली, सुरक्षा तंत्रों की पोल खोली होली, बयानों की होली और फिर वही चैनलों पर जीवंत प्रसारण की होली। सब होलीमय हो जाता है।
चैनलों के नलों पर अंकुश लगाने की बात जोरों पर है। मीडिया के नलों में रूकावट लगाने की जद्दोजहद जारी है। कभी यह बयान आ जाता है कि चैनलों के नल शीघ्र ही बंद कर दिए जाएंगे। इनमें फिल्टर लगाया जाएगा जिससे रंगीन पानी अबाध न बह सके। चैनल वालों ने चिल्ला ना शुरू कर दिया कि हमारे रंगीन पानी के बहने पर सेंसर मत लगाओ, हम उसका रंग खुद ही हल्का कर लेंगे। अब भला सादा पानी बहाने से तो टीआरपी बढ़ने से रही। टीआरपी नहीं बढ़ी तो विज्ञापन की पूंछ लंबी कैसे होगी, विज्ञापन की पूंछ ही कट गई, तो समझो चैनल ही पूंछविहीन हो गया। अब भला पूंछविहीन जानवर भला किसी को सुहाता है। जानवर दोषयुक्त हो जाता है। बकरा हुआ तो अंगभंग होने के कारण बलि के काम भी नहीं लाया जा सकेगा। पूंछविहीन जानवर को देखकर वैसे तो होली का नशा छा ही जाता है, हंसी होली का ही विकसित रूप है। मजाक उसका वीभत्स रूप है जबकि वो भी स्वीकार्य है। जिस तरह हंसी मजाक का चोली दामन का साथ है उसी प्रकार होली का और नारी के अंगों को निहारने, छेड़ने का साथ भी दामन का भले न भी हो पर चोली का साथ तो है ही। इससे भला कोई कैसे इंकार करेगा, जो भी इंकार करेगा उसे होली का ऐसा रंगीन आनंद नहीं मिलेगा।
तो होली पर न तो चैनलों के नल ही बंद होंगे, न ब्लूलाईन बसों के शिकार कम होंगे और मेट्रो को भी खुली छूट जारी रहेगी पब्लिक को दबोचने की। जो उसने अभी शुरू नहीं की है पर जिस दिन शुरू कर देगी फिर छोड़ेगी नहीं। पांच महीने पहले उसने एक बंदी जोगेन्द्र पर हमला किया था, एक महीने पहले अपने कर्मचारी सतेन्द्र को धर दबोचा और अगली बारी भी किसी जितेन्द्र, नरेन्द्र , सुरेन्द्र की ही है इसलिए वो पब्लिक जिनके नाम से इन्द्र जुड़े हैं सावधान हो जाएं। वे चाहे होली पर पानी न रोक पाएं पर मेट्रो उनका लाल खून अवश्य बहाने में जुटी रहेंगी।

पंजाब में छिड़ने वाला है धर्म युद्ध !

जहां एक तरफ चुनाव नजदीक आते राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं, वहीं दूसरी तरफ पंजाब को दंगों की आग में झुलसाने की तैयारियां भी पर चल रही हैं। आज रोजाना अजीत में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक सिख समुदाय डेरा प्रेमियों के विरुद्ध एक अभियान चलाने वाला है, जिसका नाम 'धर्म युद्ध' है. इस अभियान में करीबन 11 सदस्यीय 13 दल हैं, जिनको 'शहीदी जत्थों' का नाम दिया गया है. अभियान के नाम से और जत्थों के नाम से एक बात तो सिद्ध हो गई कि इस बार सिख समुदाय के लोग करो या मरो की नीति अपना चुके हैं. युद्ध शब्द शांति एवं अमन का प्रतीक नहीं, जब युद्ध लगता है तो करोड़ों हँसते खेलते लोग शवों में तब्दील हो जाते हैं. घरों में मातम छा जाते हैं, हँसी चीखों में बदल जाती है, चेहरे की मुस्कराहट खामोशी में बदल जाती है. जिस तरह की रणनीति कल तख्त श्री दमदमा साहिब में जत्थेदार बलवंत सिन्ह नंदगढ़ के अध्यक्षता में तैयार की गई है, उससे तो लगता है कि पंजाब एक बार फिर से दंगों की आग में झुलसने वाला है. पिछले साल सिखों एवं डेरा प्रेमियों के बीच हुए खूनी संघर्ष को भूल लोग फिर से अपनी आम जिन्दगी में लौट आए थे, लेकिन जिस तरह अब 22 मार्च से सिख समुदाय डेरे बंद करवाने की कवायद को शुरू करने की घोषणा कर चुका है, उससे लगता है कि पंजाब में डेरा प्रेमियों एवं सिखों के बीच एक बार फिर से तलवारें, गोलियां एवं ईंटचलने वाली हैं. मेरे हँसते खेलते पंजाब में एक बार फिर से गुस्से, हिंसा एवं वैर की हवा चलने वाली है. कुछ लोग इस सिख समुदाय की घोषणा को राजनीति से जोड़कर देख रहा है. क्योंकि चुनावों के दौरान सिख समुदाय का इस तरह से अचानक घोषणा करना, एक तरह सिख समुदाय को अपनी तरफ खींचना है. इसमें कोई शक नहीं कि इतने विवादों के बाद भी मालवा में डेरा सिरसा के संत गुरमीत सिंह राम रहीम की पैठ पहले की तरह जमी हुई है. ये पैठ लोक सभा के चुनावों में बादल परिवार के लिए खतरे की घंटी है. बादल का निवास स्थान मालवा क्षेत्र में है. इस क्षेत्र में आठ जिले आते हैं, जिनमें डेरा सिरसा के अनुयायियों की संख्या काफी है. ऐसे में अनुमान हैं कि सिख वोट को खींचने के लिए बादल परिवार ने अपने सहयोगी एसजीपीसी का सहारा लिया होगा फिलहाल तो पंजाब में शांति बरकरार है और दुआ करते हैं आगे भी बरकरार रहे, क्योंकि इन दिनों शिक्षण संस्थानों के पेपर भी शुरू होने वाले हैं. कहीं इस छिड़ने वाले धर्म युद्ध में देश का भविष्य बलि न चढ़ जाए.

खेत और ऑफिस

खेतों के बीचोबीच
एक पानी वाली मोटर
और पेड़ों से घिरा
एक कमरा

डिग्गी में गिरते
ट्यूबवेल के ताजे ताजे पानी में नहाना
पेड़ों तले पड़ी खटिया पर
तो कभी जमीं पे बिछा कपड़ा लेट जाना
क्या अजब नजारा था


कड़कती धूप में काम करना
और पसीने का
सिर से पांव तक आना
याद है शाम ढले
बैल गाड़ियों की दौड़ लगाते
गांव तक आना

आफिस में
की-बोर्ड की टिकटिक
और सड़क पर
वाहनों की टीं टीं
कानों को झुंझला देती है


आजकल तो ऑफिस में
फर्निचर पर हथौड़ों की ठकठक
सिर दुखा देती है

ब्‍लॉगर्स जय होली : गुब्‍‍बारों पर रोक लगी : युवा कैसे मनाएं होली :

अब तक होली पर सिर्फ
कीचड़रस पर थी पाबंदी
इस बार गुब्‍बारे हैं बंदी
गुब्‍बारे बिना छाई मंदी।

लगे गुब्‍बारा तो होता
मारने वाला है खुश
न लगे तो जी खाने
वाले को आता स्‍वाद।

होली बनी है त्‍योहार अब
रोक का समझ रहे हैं सब
जो थी हास - परिहास का
रंग तरंग भंग हुड़दंग का।


ब्‍लॉगर्स तो पोस्‍ट लगाकर
टिप्‍पणियां भेजकर भी तो
खेलेंगे होली जरूर इस बार
यही परंपरा चलाएं इस बार।

टिप्‍पणी करना ही गुलाल लगाना
माना जाएगा समझ लें शत्रु भी
इसलिए मत करें कोताही और
न करें गुरेज टिप्‍पणी देने में।

तो हो जाए होली की शुरूआत
मैंने लगा दी है पोस्‍ट और
हैं मन से जो युवा वे जरूर
निबाहें टिप्‍पणीधर्म है होली।

जो युवा हैं तन से उनके
होने में युवा कोई शक न
बाकी के ख्‍याल हों जवां
फिर तो सारा जहां जवां।

जय हो जय हो जय हो
जय होली जय होली
हरी नीली काली पीली
होली की जय रंगीली।

क्रिकेटरों पर हमला-एक चेतावनी

एक तरफ यहां भारतीय क्रिकेट टीम के न्यूजीलैंड की पिच पर निरंतर विकेट गिर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान से खबर आई कि श्रीलंकाई टीम पर कुछ हथियारबंद हमलावरों ने गोलीबारी कर दी, जिसमें तकरीबन आठ पुलिसकर्मी चल बसे जबकि श्रीलंका की आधी से ज्यादा टीम बुरी तरह घायल हो गई. इस खबर के एकाएक आने से मुझे इमरान खान का एक बयान याद आ गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में क्रिकेटरों को आतंकवादियों से कोई खतरा नहीं, वो पाकिस्तान की सरजमीं पर बिल्कुल सुरक्षित हैं, लेकिन जब ये ख़बर आज इमरान ने सुनी होगी तो उनको पता चल गया होगा कि देश से दूर बैठकर बयान देना कितना सरल एवं आसान. आज के हमले में महेला जयवर्धने भी घायल हुए, जिन्होंने कभी कहा था कि पाकिस्तान की सरजमीं पर खेलने से वो पाकिस्तान का अहसान लौटा देंगे, जो पाकिस्तान की टीम ने श्रीलंका में बुरे वक्त पर खेलकर उनपर किया था. मगर महेला जयवर्धने को इस बात की बिल्कुल भनक तक न थी कि हमलावर इस तरह उन पर कहर बनकर टूटेगें. आज जो कुछ लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम के समीप घटित हुआ, वो पाकिस्तान की जनता के असुरक्षित होने के अहसास के अलावा भारत के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं. अब भारत को अपनी सीमाएं मजबूत करनी होंगी, वरना बंग्लादेश एवं पाकिस्तान के हालात भारत की शांति में खलल डाल सकते हैं. बंग्लादेश में पिछले दिनों जो बीडीआर का विद्रोह देखने को मिला, वो भी भारत के लिए एक सूचना है कि पड़ोसी देश अपनी गलत नीतियों की वजह से भूखमरी एवं अस्थिरता का शिकार हो रहे हैं. इन अस्थिर देशों की जनता सुरक्षित नहीं, सुरक्षा के अभाव एवं भूखमरी के चलते इन देशों के नागरिक किसी भी कीमत पर अपने देश से निकलकर एक शांत एवं खुशहाल देश की तरफ जाएंगे. बेशक कीमत कुछ भी क्यों न चुकानी पड़े. इन दोनों देशों के नागरिकों का पहला सुरक्षित ठिकाना होगा भारत, भारत ही ऐसा देश है जहां पर अवैध रूप से तिब्बती, नेपाली, बंग्लादेशी एवं पाकिस्तानी लाखों की संख्या में सुख की जिन्दगी बसर कर रहे हैं. कुछ राज्यों में तो बंग्लादेशियों की संख्या इतनी हो गई कि वहां के रहवासियों का अस्तित्व भी खत्म हो रहा है. पाकिस्तान एवं बंग्लादेश की बिगड़ते हालात भारत के लिए चिंता का विषय है. इतना ही नहीं नेपाल में माओवादियों की सरकार है और उनका संबंध चीन के साथ निरंतर अच्छा होता जा रहा है.इसमें कोई शक नहीं कि चीन मन ही मन में भारत की जमीं पर अपना अधिकार करना चाहता है. इसके अलावा पाकिस्तान भी चीन की कठपुतली बनता जा रहा है, बेशक वो अमरीका के करोड़ों डालर हड़प गया हो, लेकिन अंदर खाते वो चीन से अपने संबंध सुधार रहा है. पाकिस्तान का ज्यादातर क्षेत्र अब तालिबान की जकड़ में आ चुका है. पाकिस्तान की सरकार तो तालिबान के साथ किए युद्ध विश्राम का पालन कर रही है, लेकिन स्वात घाटी में सामने आया पिछले दिनीं अपहरण का मामला दर्शाता है कि भले पाकिस्तान सरकार मूक दर्शक बन गई, किंतु तालिबान अपनी टांगे निरंतर फैलाता जा रहा है. पाकिस्तान में आज जो क्रिकेटरों पर हमला हुआ है, क्रिकेट जगत के लिए नहीं बल्कि पूरे जगत के लिए चिंताजनक विषय है. मुम्बई हमलों में खुद का हाथ न मानने वाले पाकिस्तान को इस घटना ने जगत के सामने नंगा कर दिया, क्या अब भी पाकिस्तान कहेगा कि पाकिस्तान में आतंकवाद नहीं पनप रहा ? क्या अब भी पाकिस्तान बोलेगा उसने अमेरिका से आतंकवाद खत्म करने के लिए लिए करोड़ों रुपए सही काम में इस्तेमाल किए ?