पूर्वजों को ऑनलाइन दें श्रद्धांजलि

इंदौर के हवाई अड्डे से करीबन तीन चार किलोमीटर दूर एक ऐसा स्थान है, जहां पूर्वजों की याद में पौधे लगाए जाते हैं. इस जगह का नाम है पितृ पर्वत, जहां पर हजारों पौधे लगे हुए हैं पूर्वजों की याद में, कुछ तो पेड़ बन गए और कुछ अभी अपने शुरूआती पड़ाव पर हैं, मुझे इस जगह जाकर बहुत अंदर मिलता है. इस का मुख्य कारण एक तो वहां का शुद्ध वातावरण और दूसरा शहर के शोर शराबे से दूर, तीसरा यहां पहुंचकर लोगों का अपने पूर्वजों के प्रति प्यार पेड़ पौधों के रूप में झलक था, जिन पर पंछी अपना बसेरा बनाते हैं और इस जगह आने वाले इन पेड़ों की छाया में बैठते हैं, जैसे परिवारजन घर के मुखिया की छांव तले जिन्दगी को बेचिंत बेफिक्र जीते हैं. इस स्थान की देखरेख नगरनिगम के कर्मचारी करते हैं, यहां पर शहर से आने वाले लोगों के लिए एक बढ़िया पार्क भी है और बैठे के लिए अच्छा प्रबंध है. हां, याद आया अब तो पूर्वजों की याद को हम सब इंटरनेट पर भी संभालकर रख सकते हैं, ऐसी ही एक वेबसाइट पिछले दिनों मेरे ध्यान में आई, जिसको भी इंदौर के रहवासी ने तैयार किया है। पुण्य-समरण के नाम से बनी इस वेबसाईट पर पूर्वजों की जीवनी का सारांश भी दे सकते हैं. इतना ही नहीं इस वेबसाईट पर पूर्वजों को ऑनलाइन श्रद्धांजलि भी दे सकते हैं. जैसे देश वैसा भेष आज के युग में किसी के पास मंदिर जाने का वक्त नहीं, पूर्वजों को उनकी समाधि पर जाकर पुष्प अर्पित करने का समय नहीं, तो क्यों न अब पूर्वजों का सम्मान करने के लिए घर में पड़े कम्यूटर पर इंटरनेट खोलकर एक म्यूस क्लिक से श्रद्धांजलि दें. शायद स्वर्ग में भी कम्प्यूटर का चलन बढ़ गया हो, और आपके कम्प्यूटर से दी हुई श्रद्धांजलि वहां तक पहुंच जाए, जिसके पूर्वजों को खुशी महसूस हो॥इतना ही नहीं, अखबारों की तरह अब आप इस वेबसाइट पर उनके तेरहवें, पाठ एवं अन्य की जानकारी अपनों तक पहुंचा सकते हैं. ये सुविधा विदेश में फंसे हुए लोगों के लिए कारगार सिद्ध हो सकती है, क्योंकि वो यहां पर पहुंचकर तो अपने पूर्वजों के अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो सकते, किंतु वहां से बैठकर ऑनलाइन तो श्रद्धांजलि दे सकते हैं. http://www.punyasmaran.com

....जब स्लमडॉग ने लपका ऑस्कर

आखिर भारतीय एक स्लमडॉग की पीठ पर सवार होकर ऑस्कर की शिखर पर पहुंच ही गए. चल ये तो खुशी की बात है कि हिन्दी जगत की कुछ हस्तियों की ऑस्कर पुरस्कार पाने की तमन्ना पूरी हुई, बेशक विदेश फिल्म निर्देशक के सहारे ही सही. सच बोलने को मन चाहता है कि जो काम हिन्दुस्तानी फिल्म निर्माता निर्देशक नहीं कर पाए वो काम डैनी बोएले के एक स्लमडॉग ने कर दिया. बेचारे एआर रहमान ने बॉलीवुड के कई फिल्मों को एक से बढ़कर एक संगीत दिया, लेकिन अफसोस की बात है कि करोड़ों भारतीयों के प्यार के सिवाय रहमान को कुछ नहीं मिला. हो सकता है कि ये करोड़ों प्रेमियों की दुआओं का असर हो, जो एक विदेशी निर्माता निर्देशक की फिल्म की बदौलत उनको ऑस्कर में सम्मान मिल गया. बेशक फिल्म विदेशी निर्देशक की उपज थी, लेकिन उसमें कलाकार तो भारतीय थे, उसकी पृष्ठभूमि तो मुम्बई की झुग्गियां झोपड़ियां थी, चलो कुछ भी हो, एक स्लमडॉग ने हिन्दुस्तान के कलाकारों को जगत के महान हस्तियों से रूबरू तो करवा दिया. इसके अलावा अनिल कपूर ने तो वहां पर जय जय के नारे भी बुलंद किए, अनिल कपूर की खुशी देखने लायक थी, अनिल कपूर के चेहरे वाली खुशी आज से पहले किसी भी फिल्म समारोह में देखने को नहीं मिली. कभी कभी लगता है कि करोड़ों भारतीयों के प्यार से ज्यादा हिंदुस्तानियों को विदेशी सम्मान की ज्यादा भूख है, एक तरफ हम कहते हैं कि मुझे हिंदुस्तानी होने पर गर्व है, फिर वहीं दूसरी तरफ विदेश सम्मान न पाने तक खुद को असहाय, असफल और छोटे कद का क्यों मानते हैं. आज न्यूज चैनलों पर एक ऑस्कर में छाए स्लमडॉग की धूम थी, हर तरफ बस स्लमडॉग की जय हो जय हो के नारे थे. आज सुबह जैसे ही ऑफिस में आया तो देखा तीन टेलीविजन चल रहे थे, एक दूसरे की आवाज आपस में टकराकर कानों को परेशान कर रही थी. धीरे धीरे ऑफिस में कर्मचारियों का आगमन शुरू हुआ, सबकी नजर टीवी सक्रीन पर लगी हुई थी, जैसे ही स्लमडॉग मिलीयनेयर के लिए एआर रहमान को बेस्ट ओरिजन स्कोर का पुरस्कार घोषित किया गया, टेलीविजनों की आवाज के बीच तालियों और ठहाकों की आवाज मिल गई. ऑफिस में एक ऐसा तबका भी है, जो क्रिकट टीम के जीतने एवं ऐसे समारोहों में किसी भी प्राप्ति पर ऑफिस की मार्यादा को भूलकर उच्ची उच्ची ठहाके लगाता है जैसे वो घर में बैठा कोई लाफ्टर चैंलेज शो देख रहा हो. कभी कभी उनका शोर शराबा इस लिए बुरा लगता है कि कभी कभी आदमी किसे विषय पर एकमन होकर लिख रहा होता है और उनकी तालियां ठहाके उसका ध्यान भंग कर देते हैं. अगर ऑफिस में एकमन होकर काम करने वाले व्यक्ति के पास तपस्या कर रहे ऋषियों की तरह शाप देने की शक्ति होती तो ये तबका अब तक खत्म हो जाता है. एक महोदय ने शोर कर रहे दूसरे ऑफिस कर्मी को कहा कि आवाज कम कर लो..तो उसने आगे से गुस्से में जवाब दिया कि हम कोई झख नहीं मार रहे, काम कर रहे हैं. उन्होंने फिर से कहा कि तुम देखो..कोई बात नहीं, मगर आवाज कम करो..लेकिन वो बहस बहस करता था, ऐसा नहीं कि रिमोट उठाकर आवाज कम कर दूं. इससे शांति की जगह अशांति में और ज्यादा इजाफा हो गया. क्या ऑफिस में इस तरह के ठहाके लगाने अच्छी बात है ?

....वो खुशी खुशी लौट आए

आज बुधवार का दिन है, और चिंता की चादर ने मुझे इस कदर ढक लिया है, जैसे सर्दी के दिनों में धूप को कोहरा, क्योंकि आते शनिवार को मेरी पत्नी शादी के बाद पहली बार मायके जा रही है, और वादा है अगले बुधवार को लौटने का. तब तक मेरा इस चिंता की चादर से बाहर आना मुश्किल है. मुझे याद है, जब वो आज से एक साल पहले शादी करने के बाद अपने मायके गई थी, लेकिन आज और उस दिन में एक अंतर है, वो ये कि तब हमने अपनी शादी से पर्दा नहीं उठाया था, और घरवालों की नजर में वो विवाहित नहीं थी. हां, मगर उसके घरवाले ये अच्छी तरह जानते थे कि इंदौर में उसका मेरे साथ लव चल रहा है. वो इंदौर से खुशी खुशी अपनी सहेली की शादी देखने के लिए दिल में लाखों अरमान लेकर निकली, लेकिन जैसे ही वहां पहुंची तो अरमानों पर गटर का गंदा पानी फिर गया. वो एक रात की यात्रा करने के बाद थकी हुई थी और थकावट उतारने के लिए उसने स्नान किया. अभी वो पूरी तरह यात्रा की थकावट से मुक्त नहीं हुई थी कि अचानक उसके सामने एक अजनबी नौजवान खड़ा आकर खड़ा हो गया, जो उसके मम्मी पापा ने उसको देखने के लिए बुलाया था. और जैसे ही उसको पता चला कि वो नौजवान उसको देखने के लिए आया है. वो लाल पीली हो गई, शायद उसी तरह जो उसका रूप मैं भी कभी कभी देखता हूं, उसने उस नौजवान को कहा कि मुझे तुम्हारे बारे में नहीं बताया गया.इस घटनाक्रम के बाद युवक तो वहां से चला गया, लेकिन घर में गुस्सा नफरत और आंसू आ गए. घर का पूरा माहौल ही बदल गया, वो अपने ही घर में कैदी हो गई, अजनबी हो गई और अकेली हो गई. उसके इस तरह के स्पष्ट जवाब से परिवारों को इस कदर कष्ट पहुंचा है कि उसके मम्मी पापा ने उसने बात बंद कर दी. इतना ही नहीं उसको घर से बाहर जाने की भी आज्ञा नहीं थी, जैसे हिन्दी फिल्मों में आम होता है. वो अपनी उस सहेली की शादी में भी नहीं जा पाती, जिसकी शादी में जाने लिए वो इंदौर से निकली थी. कुछ दिन उसने वहां रो-धोकर गुजारे, लेकिन पिता का दिल तो पिता का होता है, बेटी को तिल तिलकर मरते वो कैसे देखते. जिससे उन्होंने नाजों से पला था. उन्होंने बिटिया की जिद्द के आगे घुटने टेकते हुए उसको इंदौर आने के लिए आज्ञा दे दी और वादा किया कि वो उस लड़के से मिलने आएंगे, जिसको पसंद करती है यानी मुझे. जैसे ही वो जहां पहुंची तो मुझे पता लगा कि उसने पिता को सच नहीं बताया. फिर मैंने एक दिन साहस करते हुए मोबाइल किया और बोल दिया कि मैंने आपकी बेटी से शादी कर ली है. बेशक मेरा इस तरह उनको बताना किसी सदमे से कम न होगा. लेकिन मेरा बताना लाजमी था क्योंकि वो मुझसे मिलने के लिए आने वाले थे, ऐसे में लाजमी था कि वो सच्चाई से अवगत हों. उसके कुछ दिनों बाद वो इंदौर आए, हमारे बीच दो दिन तक तर्क वितर्क होते रहे, उन्होंने उसको को अपने साथ लेकर जाने का हरसंभव प्रयास किया, लेकिन वो अटल रही अपनी बात पर, अगर आप इसको अपनाते हो तो मैं चलती हूं, नहीं तो नहीं. वो रिश्ता तोड़कर चले गए, आखिर खून के रिश्ते कभी कहने से टूटे हैं जो टूटेंगे. आज एक साल बाद उन्होंने उसको को सामने से आने के लिए कहा है, उनकी बोलचाल में बदलाव है, लेकिन ऐसे में मन का डरना लाजमी है क्योंकि माता पिता को बेशक इस शादी से एतराज न हो, लेकिन समाज की नफरत का जहर कहीं हंसते बसते घर को बर्बाद न कर दे. फिलहाल दुआ करता हूं कि पिछली बार की तरह इस बार भी वो खुशी खुशी मेरे पास लौट आए, और हिन्दी फिल्मों की तरह इस प्रेम कहानी की भी हैप्पी एंडिंग हो..उसको इस लिए भेज रहा हूं, मुझे अपने ससुर पर भरोसा है, और खुद के प्यार पर, इसके अलावा मेरा मानना है कि डर से जितना जल्दी आमना सामना हो जाएं उतना अच्छा है.

लड़का होकर डरते हो...

बात है आज से कुछ साल पहले की, जब मैं शौकिया तौर पर अपने एक बिजनसमैन दोस्त के साथ रात को मां चिंतपूर्णी का जागरण करने जाया करता था और आजीविका के लिए दैनिक जागरण में काम करता था। एक रात उसका फोन आया कि क्या हैप्पी आज जागरण के लिए जाना है? मैंने पूछा कहां पर है जागरण?, तो उसने कहा कि हरियाणा की डबवाली मंडी में है, जो भटिंडा शहर से कोई 20 30 किलोमीटर दूर है. मैंने आठ बजे तक सिटी के तीन पेज तैयार कर दिए थे, और एक पेज अन्य साथी बना रहा था. मैंने अपने ऑफिस इंचार्ज को बोला सर जी मैं जा रहा हूं. एक पेज रह गया वो बन रहा है. तो उन्होंने हंसते हुए कहा, क्या जोगिंदर काका के साथ जा रहा है, मैंने कहा हां जी. इतने में जोगिंदर ने हनुमान चौंक पहुंचते ही कॉल किया. मैं तुरंत ऑफिस से निकला और हनुमान चौंक पहुंचा, वहां से एक गाड़ी में बैठकर मैं डबवाली के लिए रवाना हुआ. पौने घंटे के भीतर हम सब जागरण स्थल पर पहुंच गए और वहां पर मां के भगत हमारा इंतजार कर रहे थे कि कब भजन मंडली वाले आएं और जागरण शुरू करें. लेकिन पहले पेट पूजा, फिर काम कोई दूजा. इस लिए हम सबसे पहले छत पर पहुंचे, जहां पर खाना सजा हुआ था. हमने पेट पूजा करने के बाद स्टेज संभाली. हर बार की तरह इस बार भी जोगिंदर काका ने जागरण का आगाज अपनी अपनी प्यारी प्यारी मनमोहनी बातों से की. और जागरण का श्रीगणेश किया. भगती रंग में रंगे हुए हमको पता ही नहीं चला कि कब सुबह के दो बज गए और दो बजे घरवालों ने प्रसाद एवं चाय बांटनी शुरू की. सब चाय एवं भुजिए बदाने का आनंद ले रहे थे, मैं पानी पीने के लिए अंदर गया तो एक लड़की ने कहा कि तुम्हारा फोन नंबर क्या है. मैं हैरत में पड़ गया, उसकी उम्र ब-मुश्किल 17 की होगी. गोल मटोल चेहरा बेहर प्यारी सूरत॥तो स्वाभिक था कि मैं उसको अपना मोबाइल नंबर देता. मैंने जोगिंदर से पैन लेकर एक कागज के टुकड़े पर नंबर लिखा एवं फिर अंदर गया और कागज का टुकड़ा उसकी तरफ फेंका. इसके बाद जो उसकी जुबां से बोल निकले..आज भी मुझे याद हैं..वो बोली लड़का होकर डरता है. उसके बाद आज तक न तो उसका फोन आया और नाहीं कभी मुलाकात हुई..उसके बाद एक बार उनके घर जाना हुआ था, तो वहां जोगिंदर ने बात निकाल ली, उसको पता था. तो वहां उपस्थित लड़की ने बोला..वो उसकी सलेही थी. जो आजकल कहीं दूसरे शहर में रहती हैं. लेकिन उस लड़की एक बात आज भी याद है वो है..लड़्का होकर डरता है..

..जब भागा दौड़ी में की शादी

आज से एक साल पहले, इस दिन मैंने भागा दौड़ी में शादी रचाई थी, अपनी प्रेमिका के साथ. सही और स्पष्ट शब्दों में कहें तो आज मेरी शादी के पहली वर्षगांठ है. आज भी मैं उस दिन की तरह दफ्तर में काम कर रहा हूं, जैसे आज से एक साल पहले जब शादी की थी, बस फर्क इतना है कि उस समय हमारा कार्यलय एमजी रोड स्थित कमल टॉवर में था, और आज महू नाका स्थित नईदुनिया समाचार पत्र की बिल्डिंग में है. आप सोच रहे होंगे कि भागा दौड़ी में शादी कैसे ? तो सुनो..शादी से कुछ महीने पहले मुझे भी हजारों नौजवानों की तरह एक लड़की से प्यार हो गया था और हर आशिक की तमन्ना होती है कि वो अपनी प्रेमिका से ही शादी रचाए और मैं भी कुछ इस तरह का सोचता था. लेकिन हमारी शादी को आप समारोह नहीं, बल्कि एक प्रायोजित घटनाक्रम का नाम दे सकते हैं. मुझे और मेरी जान को लग रहा था कि शादी के लिए घरवाले नहीं मानेंगे, इस लिए हम दोनों ने शादी करने का मन बनाया, क्योंकि कुछ दिनों बाद उसको घर जाना था, और उधर घरवाले भी ताक में थे कि अब बिटिया घर आए और शादी के बंधन में बांध दें.क्योंकि उनको मेरे और मेरी प्रेमकहानी के बारे में पता चल गया था. इसकी भनक हमको भी लग गई थी, इस लिए हम दोनों ने पहले कोर्ट से कागजात तैयार करवाए और फिर उनको आर्य मंदिर में देकर शादी की तारीख पक्की की. मेरा तो मन था कि शादी 14 तारीख को करें, लेकिन श्रीमति ने कहा कि नहीं मेरी सहेली ने कहा है 16 का महूर्त शुभ है. मैंने पूरा दिन आफिस में कोहलू के बैल की तरह काम किया और फिर भागा भागा घर गया. वहां से तैयार बयार होकर पैदल उसकी गली से होते हुए इंडस्ट्री बस स्टॉप पहुंचा, जहां से बस पकड़ी और ब-मुश्किल आर्य मंदिर पहुंचा. शायद मैं पहला दुल्हा हूंगा, जिसके बाराती भी देर से आए और दुल्हन भी ऑटो रिक्शा में आई. इस मौके पर एक बात दिलचस्प थी, वो ये थी कि हम सब अलग अलग धर्मों एवं राज्यों से थे. मैं पंजाबी, पत्नी गुजराती, यार पंजाबी, गुजराती, बंगाली, उड़िया, मध्यप्रदेशी आदि. हम सब हम उम्र थे, सब खुश थे, एक दो को छोड़कर, क्योंकि उनको मेरी तरह ये चोरी छुपे की शादी अच्छी नहीं लग रही थी. हमने शादी सिर्फ ये सोचकर की थी कि अगर घरवाले मान जाते हैं तो हम दोनों दूसरी बार शादी कर लेंगे, वरना हम कोर्ट के मार्फत जाकर प्यार को बचा लेंगे. लेकिन शादी के एक महीने बाद हमने शादी का खुलासा कर दिया और एक साथ रहने लग गए. मेरे घरवालों ने तो उसकी वक्त अपना लिया था, लेकिन मेरे सुसराल वालों ने कुछ हद तक तो अपना लिया, लेकिन सस्पेंस अभी भी कायम है...बाकी सब ठीक है. लड़ते झगड़ते, रूठते, मनाते प्यार करते एक साल पूरा कर लिया.

वेलेंटाईन डे पर सरप्राइज गिफ्ट


शनिवार को वेलेंटाइनज डे था, हिन्दी में कहें तो प्यार को प्रकट करने का दिन. मुझे पता नहीं आप सब का ये दिन कैसा गुजरा,लेकिन दोस्तों मेरे लिए ये दिन एक यादगार बन गया. रात के दस साढ़े दस बजे होंगे, जब मैं और मेरी पत्नी बहार से खाना खाकर घर लौटे, उसने मजाक करते हुए कहा कि क्या बच्चा चाकलेट खाएगा, मैं भी मूड में था, हां हां क्यों नहीं, बच्चा चाकलेट खाएगा. वो फिर अपनी बात को दोहराते हुए बोली 'क्या बच्चा चाकलेट खाएगा ?', मैंने भी बच्चे की तरह मुस्कराते हुए शर्माते हुए सिर हिलाकर हां कहा, तो उसने अपना पर्स खोला और एक पैकेट मुझे थमा दिया, मैंने पैकेट पर जेमस लिखा पढ़ते ही बोला. क्या बात है जेमस वाले चाकलेट भी बनाने लग गए. मैंने उसको हिलाकर देखा तो उसमें से आवाज नहीं आई और मुझे लगा क्या पता जेमस वाले भी चाकलेट बनाने लग गए हों, मैंने जैसे ही खोला तो चाकलेट की तरह उसमें से कुछ मुलायम मुलायम सा कुछ निकला, पर वो चाकलेट नहीं था बल्कि नोकिया 7210 सुपरनोवा, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी. मुझे यकीन नहीं हो रहा था, लेकिन उसने कहा ये तुम्हारा गिफ्ट है, पर मुझे यकीन नहीं हो रहा था, फिर उसने मेरे हैरत से लबलब हुए चेहरे को देखते हुए कहा, हां, मैं आज दोपहर के वक्त लेकर आई थी, तभी तो आफिस आते आते दो घंटे लग गए थे, मैंने पूछा कितने का है, वो बोली 5600 का, फिर चुटकी लेते हुए बोली नहीं नहीं 5700 का, मैंने पूछा वो कैसे, वो बोली मोटर साइकिल को पुलिस की गाड़ी उठाकर ले गई थी, जिसका जुर्माना सौ रुपया भरना पड़ा, तो हुआ ना 5700..मैंने बोला हां-हां. वो बोली तुम को कैसा लगा, ये तोहफा पाकर. मुझे याद आ गई एक पुराने दिन की जब अचानक मौसी के लड़के ने कहा था, हैप्पी तुम्हारा लेख दैनिक जागरण के फिल्मी पेज पर लगा है, और मैं उस वक्त भैंस को चारा डाल रहा था, मैंने बोला भाई मजाक मत करो, मैंने ऐसा इस लिए कहा क्योंकि लेख प्रकाशित न होने से मैं पूरी तरह दुखी था, हर बार चापलूस लोगों का छप जाता था और मेरा नहीं. जब मैंने खुद अखबार खोलकर देखा तो मेरी खुशी का कोई टिकाना नहीं रहा, कारण था कि वो लेख मेरी उम्मीद खत्म होने पर लगा, क्योंकि उसको दो महीने हो गए थे जालंधर मुख्य दफ्तर में धूल फांकतेहुए. वो खुशी और पत्नी का सरप्रार्ज वेलेंटाईन गिफ्ट की खुशी एक जैसी थी. ये दिन मेरे सुनहरे दिनों में शुमार हो गया. और आपका वेलेंटाइन डे कैसे रहा जरूर लिखना दोस्तो...इंतजार रहेगा.

मरती नहीं मोहब्बत

विश्वास कैसा वो
टूट गया जो
किसी के बहकाने से


मन का अंधकार
कभी मिटता नहीं,
दीपक जलाने से

कब गई
मैल मन की
एक डुबकी गंगा में लगाने से

यारों
मरती नहीं मोहब्बत कभी,
आशिक को मिटाने से

मरते आएं हैं,
और मरते रहेंगे आशिक
जा कह दो जमाने से

खुद मरना पड़ता है दोस्तों
कब जन्नत नसीब हुई
किसी और के मर जाने से

बचो! बचो! 'स्लमडॉग..' से

बड़े दिनों से दिल कर रहा था कि 'गंदी गली का करोड़पति कुत्ता' फिल्म देखूं बोले तो 'स्लमडॉग मिलीयनेयर', जिसने विदेशों में खूब पुरस्कार बटोरे और हिन्दुस्तान में एक बहस को जन्म दे दिया. जहां एक तबका इस फिल्म की बुराई कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा तबका भी जो बाहर के जोगी को सिद्ध कहकर उसकी तारीफों के पुल बांध रहा था. ऐसे में इस फिल्म को देखने के उत्सुकता तो बढ़ जाती है और उस उत्सुकता को मारने के लिए फिल्म देखना तो जरूरी था, वैसे ही मैंने किया. एक दो बार तो मैं सीडी वाले की दुकान से इस लिए खाली लौट आया कि फिल्म का हिन्दी वर्जन नहीं आया था, लेकिन तीसरी दफा मैंने फिल्म का इंग्लिश वर्जन लेना बेहतर समझा, बेरंग लौटने से. फिल्म के कुछ सीन तो बहुत अच्छे थे, लेकिन फिल्म में जो सबसे बुरी बात लगी वो थी, निर्देशक जब चाहे अपने किरदारों से हिन्दी में बात करवाता है और जब उसका मन करता है तो वो इंग्लिश में उन किरदारों को बुलवाना शुरू कर देता है. फिल्म का सबसे कमजोर ये हिस्सा है. 

           अगर फिल्म निर्देशक विदेशी है तो भाषा भी विदेशी इस्तेमाल करता, बीच बीच में हिन्दी क्यों ठूंस दी, हां अगर वो हिन्दी में बनाना चाहता था तो हिन्दी भाषा में पूरी फिल्म मुकम्मल करता. मुम्बई की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले जमाल नामक बच्चे का पढ़ाई से कोई बा-वास्ता रहा ही नहीं होता, लेकिन जब वो आगरा पहुंचते हैं तो इंग्लिश में बात करते हुए विदेशी पर्यटकों को ताज के बारे में जानकारी देते हैं, और कई स्थानों पर वो हिन्दी बोलते हैं, ऐसा तो बिल्कुल नहीं हो सकता, मुझे लगता है कि फिल्म का निर्देशक किसी उलझन में था, उसको कुछ समझ नहीं आया कि फिल्म को वे पूरी हिन्दी में बनाए या इंग्लिश में. 

फिल्म की उस बात को भी हजम करना मुश्किल है, जब एक चाय वाले को एक कॉल सेंटर का कर्मचारी अपनी सीट देकर बाहर चला जाता है, क्या हिन्दुस्तान में ऐसा होता है ? कभी नहीं. यहां तो उच्च पद पर काम करने वाले लोग दफ्तर में साफ सफाई करने वाले से बात करना भी उचित नहीं समझते और उसको अपनी सीट देकर जाना कहां उचित समझेंगे. ये सब कुदरती मान सकते हैं कि जो सवाल शो में होस्ट ने पूछे वो व्यक्तिगत जीवन से जुड़े हों, लेकिन मेरे हिसाब से सवाल के साथ जुड़े हर अध्याय फिल्म निर्देशक निरंतर जोड़ नहीं पाया, फिल्म में झुग्गी झोपड़ी का ये नौजवान झुग्गी झोपड़ी से निकलकर गुंडों के बीच पहुंच जाता है, यहां पर उसको भीख आदि मांगने के लिए तैयार किया जाना था, वहां से वो बचकर निकलता है तो उसका भाई एक नंबर का गुंडा बन जाता है, तो ऐसे में समझ नहीं आता कि वो दोनों कब स्कूल पढ़ने गए और कब उन्होंने इंग्लिश सीखी. 

अगर इंग्लिश निर्देशक ने फिल्म बनाई है, उनका इंग्लिश बोलना लाजमी था तो बिल्कुल गलत है, फिर वो हिन्दी का इस्तेमाल बीच बीच में नहीं करते. फिल्म में आखरी सवाल का जवाब खुद होस्ट एक आइने पर लिखता है, लेकिन जमाल उत्तर उसके विपरीत देता है. यहां पर समझ आता है कि जमाल ने जवाब उसके विपरीत क्यों दिया, क्योंकि जमाल के पास दो विकल्प रह गए थे और शो का होस्ट उसको जीतने का मौका क्यों देगा, इसलिए जमाल होस्ट के विपरीत वाला उत्तर चुनता है. फिल्म हिन्दुस्तानियों के लिए बिल्कुल नहीं, क्यों ऐसी हजारों फिल्में हिंदुस्तान में बन चुकी हैं. फिल्म निर्देशक अगर इस फिल्म को बनाने से पहले बाम्बे, ट्रैफिक सिग्नल, सुहाग, रोटी आदि जैसी फिल्में देख लेता तो शायद फिल्म इससे बेहतर बन जाती, फिल्म का विषय अच्छा था, लेकिन हिन्दी इंग्लिश उपयोग फिल्म में रास आने वाला नहीं था. 

अगर, इस फिल्म को आस्कर मिलता है तो मुझे हिन्दुस्तान से फिल्में भेजने वालों पर गुस्सा आता है कि इस फिल्म से ज्यादा बेहतर, ज्यादा अच्छी फिल्में हिन्दुस्तान में बनती हैं, तो ऐसे में वो एक सुपर स्टार को नजरंदाज कर छोटे बजट की फिल्मों को ऑस्कर में भेजकर देखो. इस फिल्म में भारतीय गरीबी को तो एक प्रतिशत ही दिखाया गया है, हिन्दी फिल्में तो गरीबी से लबालब होती हैं, एक बात और फिल्म निर्देशक को इसके लिए याद रखना चाहिए कि उसने गंदगी गली के कुत्ते से भी इंग्लिश बुलवा दी. इस फिल्म और ओबामा में कोई ज्यादा अंतर नहीं, उसने भी गरीबी को पीछे छोड़ते हुए अमेरिका के उच्च पद पर अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है, अगर पूरा हिन्दुस्तान के लिए तालियां बजाता है तो स्लमडॉग के लिए क्यों नहीं. दोनों ही विदेशी धरती के जो हैं.

एकता को जमीं पर लाया कलर्स

टेलीविजन जगत की क्वीन मानी जाने वाली एकता कपूर के पांव आज से कुछ पहले जमीं पर नहीं थे, सफलता की हवा में एकता ऐसी उड़ी कि वो भूल गई थी, आखिर आना तो जमीं पर ही पड़ेगा. एक समय था जब सारे धारावाहिक एक तरफ और एकता कपूर के रोने धोने वाले सीरियल एक तरफ, एकता के 'के' शब्द ने अच्छे अच्छे टेलीविजन सीरियल वालों को सोचने पर मजबूर कर दिया था. इसमें कोई शक नहीं कि जितेंद्र की बेटी एकता कपूर ने स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाले अपने सीरियलों के जरिए हर घर में काफी लम्बे समय तक राज किया. मगर अदभुत है समय का चक्कर, किसी को राजा तो किसी को फक्कर (कंगाल) बना देता है. एकता कपूर के सीरियलों ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि एकता को टेलीविजन जगत की क्वीन कहा जाने लगा, मगर कभी कभी सफलता भी इंसान की बुद्धि भ्रष्ट कर देती है, और इंसान को लगता है कि उसका गलत भी सही हो जाएगा, किंतु ऐसा केवल दिमाग का फातूर होता है और कुछ नहीं. दुनिया में हर चीज का तोड़ है, हर सवाल का मोड़ है. सफलता के नशे में धूत मनचहे सीरियल लोगों पर थोपने वाली एकता कपूर को जब होश आया तब तक तो उसकी दुनिया लूट चुकी थी. एकता को सफलता की माउंट एवरेस्ट से उतारने वाला कोई बड़ा चैनल एवं कोई बड़ा सितारा नहीं, बल्कि पिछले साल शुरू हुए नए टेलीविजन चैनल कलर्स के नन्हे कलाकार, जिन्होंने अपने अभिनय का ऐसा लोहा मनवाया कि एकता की रातों की नींद उड़ गई. एक दिलचस्प बात कि एकता कपूर की क्योंकि सास भी कभी बहू थी को बाहर का रास्ता एक बालिका वधू ने दिखलाया. अपने सास बहू के इस सीरियल को बचाने के लिए एकता कपूर ने तो एक बार फिर से न चाहते हुए तुलसी यानी स्मृति इरानी से हाथ मिला लिया था, लेकिन नन्ही नटखट बातूनी वकीलों की तरह बात बात पर सवाल करने वाली बालिका बधू के आगे इसकी एक नहीं चली. इतना ही नहीं टेलीविजन की पिच पर एकता कपूर टीम का एक के बाद एक विकेट गिरता जा रहा है. 'क्योंकि सास भी..' के बाद सुना है कि मार्च में स्टार एक कपूर के दो और सीरियलों को बाहर का रास्ता दिखाने जा रहा है. जिसमें करम अपना अपना एवं कसतूरी शामिल है. स्टार पल्स वालों का रवैया तो एकता पहले ही जान गई थी, तभी तो उसने एनडीटीवी इमेजिन से हाथ मिला लिया था. लेकिन अफसोस की बात है कि एनडीटीवी इमेजिन पर प्रसारित होने वाला कहानी हमारे महाभारत की बुरी तरह पिट चुका है, इसके अलावा कि इस सीरियल के कलाकारों के पहनावे को लेकर भी काफी आलोचना हुई. निरंतर मिल रही असफलता के बाद शायद एकता कपूर को 'के' एवं 'क' शब्द से भी नफरत हो गई लगता है. तभी तो उसने बंदिनी नामक धारावाहिक बनाया, वरना इस धारावाहिक का नाम भी 'के' एवं 'क' से शुरू होता. चल एकता को अब समझ तो आएगी कि सफलता के खुमार में गुणवत्ता के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए. इतना ही नहीं सुन है कि सफलता के खुमार में अंधी हुई एकता अपने कलाकारों के साथ भी एक तानाशाह की तरह बर्ताव करती थी. जिसके कारण स्मृति इरानी एवं एकता के बीच दरार पड़ गई थी एवं ऐसे और भी कई कलाकार हैं, जो न चाहते हुए भी एकता के साथ जुड़े हुए थे.