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Showing posts from January, 2009

कहां छुपा गया फिजा का चांद ?

सच्चा प्यार हर किसी को नहीं मिलता और जिसे यह मिलता है वह खुशनसीब होता है. ये शब्द किसी और के नहीं थे, बल्कि फिजा के चांद के थे, जो आजकल मीडिया और अपनी फिजा से दूर कहीं जाकर छुप गया. आलम ये है कि इधर दिसम्बर महीने में फिजा की मोहब्बत को सीना ठोककर स्वीकार करने वाले चांद मोहम्मद पता नहीं आजकल किन बादलों की ओड़ में जाकर छुप गया. उधर, प्यार में मिली बेवफाई से दुखी चांद की फिजा ने नींद की ज्यादा गोलियां खाकर आत्महत्या करने का प्रयास किया. आखिर किस मोड़ पर पहुंच गई चांद फिजा की प्रेम कहानी. इस प्रेम कहानी पर तो एक फिल्म बनने वाली थी, जिसका नाम था 'फिजा पर फिदा चांद', इस फिल्म का तो पता नहीं लेकिन ऐसा लगता है कि इस प्रेम कहानी में आए मोड़ के कारण बॉलीवुड में जरूर कोई फिल्म बने गई. ये वो ही फिजा है, जिसके लिए हरियाणा के पूर्व डिप्टी सीएम चंद्रमोहन से चांद मोहम्मद में बदल गए थे. चांद तो नजर नहीं आ रहा, लेकिन उसके डूबने के बाद फिजा ने मौत को गले लगाने की कोशिश की. यहां पर मैं एक बात तो कहूंगा कि जो अपने मां बाप का नहीं हुआ, अपने बीवी बच्चों का नहीं हुआ एवं अपने धर्म का नहीं हुआ तो वो चांद …

नहीं चाहिए ऐसी सेना

हिन्दुस्तान को गांधी का देश कहा जाता है, जो अहिंसा के पुजारी के रूप में पूरे विश्वभर में प्रसिद्ध हैं. इस धरती पर भगवान श्री राम, रामभगत हनुमान, श्री कृष्ण एवं गुरू नानक देव जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया, जिन्होंने समय समय पर जनता का कल्याण किया. लेकिन उस वक्त बहुत दुख होता है, जब कुछ घटिया मानसिकता एवं गंदी सोच के मालिक इन महान शख्सियतों को अपना आदर्श बताकर उसकी आढ़ में बुरे एवं निंदनीय कृत्यों को अंजाम देते हैं.पिछले दिनों मंगलूर के एक पब में जो कुछ श्रीराम सेना के वर्करों ने किया, उसको देखकर लगता है कि वो राम की सेना नहीं बल्कि किसी रावण की सेना है, जो राम के नाम का मखौटा पहनकर राम के नाम को कलंकित कर रही है. जैसे कुछ अन्य हिन्दुवादी संगठन हिन्दुत्व को बदनाम कर रहे हैं. ओशो ने सही कहा था कि किसी महात्मा को भय अपने आलोचकों से नहीं बल्कि अपने उन कुछ न-समझ भगतों एवं मानने वालों से होता है, जो उसको मारने के लिए तत्पर्य रहते हैं। अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी को किसी गोडसे ने नहीं बल्कि उनको मानने वालों ने तिल तिलकर मारा है. गोडसे ने तो केवल गांधी के शरीर की हत्या की, लेकिन कुछ घटिया किस…

प्यार के लिए चीर पहाड़

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प्यार के लिए साला कुछ भी करेगा, यह बात तो आम ही है. आशिक को अपनी महबूबा के पांव में लगे कांटे की चुम्बन भी सूली से ज्यादा लगती है. कुछ ऐसे ही प्यार की मिसाल है गांव गहलौर का स्वर्गीय दशरथ मांझी. यह व्यक्ति अपनी पत्नी को आई चोट से इतना प्रभावित हो गया कि उसने गुस्से में आकर पहाड़ का सीना ही चीर डाला. चलो आओ तुम को एक कहानी सुनाता हूं, मुझे नहीं पता कितने लोग इसको बुरा कहेंगे और कितने अच्छा. पर मेरा मकसद एक गुमनाम आशिक को लोगों तक पहुंचाना है.

बिहार के गया जिले के एक अति पिछड़े गांव गहलौर में रहने वाले दशरथ मांझी अपनी पत्नी फगुनी देवी को अत्यंत प्यार करता था. फगुनी भी और महिलाओं की तरह पानी लेने के लिए रोज गहलौर पहाड़ पार जाती थी. मगर एक सुबह फगुनी पानी के लिए घर से निकलीं. जब वो घर वापिस आई तो उसके सिर पर हर रोज की तरह पानी का भरा हुआ घड़ा नहीं था. ये देखकर मांझी ने पूछा कि घड़ा कहाँ है? पूछने पर फगुनी ने बताया कि पहाड़ पार करते समय पैर फिसल गया. चोट तो आई ही, पानी भरा मटका भी गिर कर टूट गया. शायद पहाड़ को भी इसी दिन का इंतजार था कि कोई उसको चीरकर एक रास्ता बनाए. पत्नी का दर्द मांझी से देखा …

प्यार की भी एक मर्यादा हो

भावुकता में न बहकें
क्या हुआ रोशनी? तुम उदास क्यों हो? कुछ नहीं रोहिणी...रोशनी मुझसे तो झूठ मत बोलो। मैं तुम्हारी सहेली हूँ, तुम्हारी रग-रग से वाकिफ हूँ, तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो। बोला न नहीं, कुछ भी कहो रोशनी तुम मुझे कुछ छुपा रही हो। बोलो न क्या बात हुई, कहते हैं दुख बाँटने से कम होता है और खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं। तुम्हें पता है न रोहित के बारे में? हाँ तुम दोनों का प्रेम प्रसंग काफी चर्चा में है। क्या झगड़ा हो गया उससे। प्यार में रूठना-मनाना तो लगा ही रहता है। जिन्दगी में सुख-दुःख दोनों होते हैं। नहीं रोहिणी, बात वह नहीं। कल रोहित और मेरे बीच शुरू हुई तकरार ने एक बड़े झगड़े का रूप ले लिया।हुआ यह कि कल मैं और रोहित फिल्म देखने गए थे। फिल्म देखकर हम जब थिएटर से बाहर निकले तो रोहित ने मुझे कहा कि घर में बहाना बनाकर एक दिन के लिए उसके घर जाऊँ क्योंकि उसके माता-पिता बाहर जा रहे हैं। मैंने उसको मना कर दिया, जिससे वो चिढ़ गया और कहने लगा क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करतीं, तो मैंने भी कह दिया क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करते। वो शारीरिक संबंध बनाने के लिए पिछले कई दिनों से दबाव डाल रहा है, मै…

ओबामामय हुआ अमेरिका

बेशक ये शीर्षक केवल अमेरिका के ओबामामय होने की बात कर रहा हो, लेकिन हकीकत तो ये है कि ब्लॉग से लेकर न्यूज पोर्टल एवं प्रिंट मीडिया से लेकर इलैक्ट्रोनिक मीडिया तक ओबामा छाए हुए हैं. ओबामा अमेरिकावासियों के लिए उम्मीद की एक किरन नहीं बल्कि उम्मीद का सूर्य है. अमेरिकावासियों के अलावा भी बड़े बड़े राजनीतिक विशेषज्ञों का भी ये मानना है कि ओबामा रूपी सूर्य की रोशनी से अमेरिका एक बार फिर से चमक उठेगा. वहीं कुछ लोग इस को ओबामा के लिए कांटों भरा ताज भी मान रहे हैं क्योंकि ओबामा के आगे बहुत गंभीर चुनौतियां हैं, जिन पर पार पाने का मादा उनमें है कि नहीं ये तो आने वाले साल ही बताएंगे, फिलहाल तो अमेरिका वासी खुशी से इस तरह लबालब हैं जैसे उनको आजादी मिल गई हो या फिर किसी नए अवतार ने इस धरती पर जन्म ले लिया हो.वैसे भी ओबामा को किसी अवतार से कम नहीं आंका जा रहा. अब देखना तो ये दिलचस्प होगा कि विश्वशक्ति की हॉट सीट पर बैठने वाला ओबामा चुनौतियों पर विजय कैसे पाता है.

ओबामा के लिए चुनौतियों
अमेरिका को मंदी की मार से उभरना, इराक से अमेरिकी सैना की वापसी, अफगानिस्तान में शांति लाना, आतंकवाद के विरुद्ध जंग, इ…

संघर्ष का दूसरा नाम 'अक्षय'

'कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' यह पंक्ति उस वक्त बिल्कुल हकीकत नजर आती है, जब हम पिछले साल चार हिट फिल्में देकर सफलता की शिख़र पर बैठने वाले अक्षय कुमार की जिन्दगी में झाँकते हैं. आज अक्षय कुमार का नाम सफलतम सितारों में शुमार हो गया, हर किसी को उसका हर लुक भा रहा है, चाहे वो एक्शन हो, चाहे रोमांटिक या चाहे कामेडी. आज दर्शक उसकी सफलता देखकर वाह अक्षय वाह कह रहे हैं, मगर ज्यादातर दर्शकों को अक्षय के संघर्षशील दौर के बारे में पता नहीं, हां मगर, जिनको पता है वो अक्षय को संघर्ष का दूसरा नाम मानते हैं. गौरतलब है कि होटलों, ट्रेवल एजेंसी व आभूषण बेचने जैसे धंधों में किस्मत आजमाने वाले राजीव भाटिया ने बच्चों को मार्शल आर्ट भी सिखाया. इसी संघर्ष के दौर में उनको मॉडलिंग करने का ऑफर मिला. जिसके बाद दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाला राजीव भाटिया अक्षय कुमार के रूप में ढल गया और बड़े पर्दे पर अपनी अदाकारी के जलवे दिखाने लगा. अक्षय कुमार ने फिल्म 'सौगंध' के मार्फत बालीवुड में कदम रखा, उसके बाद खिलाड़ी, सैनिक, मोहरा, हम हैं बेमिसाल, वक्त हमारा ह…

पता नहीं

कब दिन, महीने साल गुजरे
पता नहीं,
कैसे और किस हाल गुजरे
पता नहीं,

कितना कुछ खो दिया
कितना पा लिया
पता नहीं,
कब घर छोड़ा, अपने छोड़े
और परदेस में काम से मन लगा लिया
पता नहीं
जिसे समझे रोशने साधन
उसी दीये से कब घर जला लिया
पता नहीं

सूर्यादय और अस्त होता
देखे कितने दिन हुए
पता नहीं
कितने मिलकर बिछड़े
और कितने दोस्तों में गिन हुए
पता नहीं

कब खत्म होगा
सफर ये अलबेला
पता नहीं

कब देखूंगा वो गलियां,
वो अपनों का मेला
पता नहीं