कहां छुपा गया फिजा का चांद ?

सच्चा प्यार हर किसी को नहीं मिलता और जिसे यह मिलता है वह खुशनसीब होता है. ये शब्द किसी और के नहीं थे, बल्कि फिजा के चांद के थे, जो आजकल मीडिया और अपनी फिजा से दूर कहीं जाकर छुप गया. आलम ये है कि इधर दिसम्बर महीने में फिजा की मोहब्बत को सीना ठोककर स्वीकार करने वाले चांद मोहम्मद पता नहीं आजकल किन बादलों की ओड़ में जाकर छुप गया. उधर, प्यार में मिली बेवफाई से दुखी चांद की फिजा ने नींद की ज्यादा गोलियां खाकर आत्महत्या करने का प्रयास किया. आखिर किस मोड़ पर पहुंच गई चांद फिजा की प्रेम कहानी. इस प्रेम कहानी पर तो एक फिल्म बनने वाली थी, जिसका नाम था 'फिजा पर फिदा चांद', इस फिल्म का तो पता नहीं लेकिन ऐसा लगता है कि इस प्रेम कहानी में आए मोड़ के कारण बॉलीवुड में जरूर कोई फिल्म बने गई. ये वो ही फिजा है, जिसके लिए हरियाणा के पूर्व डिप्टी सीएम चंद्रमोहन से चांद मोहम्मद में बदल गए थे. चांद तो नजर नहीं आ रहा, लेकिन उसके डूबने के बाद फिजा ने मौत को गले लगाने की कोशिश की. यहां पर मैं एक बात तो कहूंगा कि जो अपने मां बाप का नहीं हुआ, अपने बीवी बच्चों का नहीं हुआ एवं अपने धर्म का नहीं हुआ तो वो चांद फिजा का कैसे हो सकता है. कहते हैं जिनकी फिदरत में हो दगा देना, ऐसे लोगों का क्या करे कोई. चांद में भी दाग होता है, इस बात को तो चांद मोहम्मद ने बाखूबी बता दिया. दोनों में प्यार हुआ, एक होने के सपने देखे और रास्ते में जो दीवार आई फांद गए. इतना ही नहीं धर्म आड़े न आए तो दोनों ने धर्म बदल दिया. अनुराधा बाली बन गई फिजा और चंद्रमोहन बन गया चांद मोहम्मद. प्यार में पागल हुए दोनों एक दूसरे के तो हो गए, लेकिन एक होने के इस बंधन को निभाने में न-कामयाब हो गए. चांद फिजा की कहानी दिसम्बर महीने में सामने आई थी, जब दोनों ने मीडिया के बीच आकर खुद की मोहब्बत को स्वीकार करते हुए एक साथ रहने के दावे किए थे, और अभी इन बातों को पौने दो महीने भी नहीं हुए कि हिन्दी फिल्मों की तरह इस प्रेम कहानी में भी नया मोड़ आ गया. चांद कहीं बादलों में छुप गया और फिजा ने मौत को गले लगने की कोशिश की. फिजा ने तो जान देकर अपने सच्चे प्यार का सबूत दिया, लेकिन दाग वाला चांद तो कमबख्त सामने ही नहीं आ रहा.

नहीं चाहिए ऐसी सेना

हिन्दुस्तान को गांधी का देश कहा जाता है, जो अहिंसा के पुजारी के रूप में पूरे विश्वभर में प्रसिद्ध हैं. इस धरती पर भगवान श्री राम, रामभगत हनुमान, श्री कृष्ण एवं गुरू नानक देव जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया, जिन्होंने समय समय पर जनता का कल्याण किया. लेकिन उस वक्त बहुत दुख होता है, जब कुछ घटिया मानसिकता एवं गंदी सोच के मालिक इन महान शख्सियतों को अपना आदर्श बताकर उसकी आढ़ में बुरे एवं निंदनीय कृत्यों को अंजाम देते हैं.पिछले दिनों मंगलूर के एक पब में जो कुछ श्रीराम सेना के वर्करों ने किया, उसको देखकर लगता है कि वो राम की सेना नहीं बल्कि किसी रावण की सेना है, जो राम के नाम का मखौटा पहनकर राम के नाम को कलंकित कर रही है. जैसे कुछ अन्य हिन्दुवादी संगठन हिन्दुत्व को बदनाम कर रहे हैं. ओशो ने सही कहा था कि किसी महात्मा को भय अपने आलोचकों से नहीं बल्कि अपने उन कुछ न-समझ भगतों एवं मानने वालों से होता है, जो उसको मारने के लिए तत्पर्य रहते हैं। अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी को किसी गोडसे ने नहीं बल्कि उनको मानने वालों ने तिल तिलकर मारा है. गोडसे ने तो केवल गांधी के शरीर की हत्या की, लेकिन कुछ घटिया किस्म के गांधीवादी लोगों ने गांधी के विचारों की हत्या की, जो कि गांधी का अस्तित्व था. पिछले दिनों जो कुछ श्री राम सेना वर्करों ने मंगलूर के एक पब में किया, वो कोई राम की जय जयकार करवाने वाला कार्य नहीं था बल्कि राम के नाम को धब्बा लगाने वाला था. भगवान श्री राम ने कब कहा था कि उसके नाम पर सेना का गठन कर निहत्थे एवं निर्दोष लोगों पर लाठियां, थप्पड़ एवं डंडे बरसाओ. और कब कहा था रामभगत हनुमान ने मेरे नाम पर बजरंग दल बनाकर इसाइयों को पीट पीटकर हिन्दुत्व की धज्जियां उड़ाओ. भगवान के नाम पर सेना का नाम रखकर आदमी की प्रवृत्ति नहीं बदलती जैसे शेर की खल पहनने से गिद्दड़ कोई शेर नहीं बन जाता. भारत में इसके अलावा और भी कई संगठन हैं, जो धर्म एवं संस्कृति को बचाने के नाम पर दिल खोलकर हिंसा फैलाते हैं. जो खुद को जनता रक्षक कहते हुए थकते नहीं, किंतु काम हमेशा जनता को दिक्कतों में डालने वाले करते हैं. इन संगठनों के कारण त्योहार वाले दिन भी लोग घरों से बाहर निकलना मुनासिफ समझते, क्योंकि उनके मन के अंदर एक बात एक डर घर कर गया, कि ना-जाने शहर में कब हिंसा भड़क जाए एवं वो मुश्किल में फंस जाएं. आज से कुछ दिन बाद वेलेनटाइन डे आने वाला है. इस दिन भी भगवा लिबास पहने, हाथों में लठ पकड़े एवं माथे पर बड़े बड़े तिलक लगाएं हुए लोगों के दल हिन्दुत्ववादी शहरों में घूमते हुए आम मिल जाएंगे. किसी को कुछ पता नहीं इनका कहर कब कहां और किस पर बरपा जाए. बात है पिछले साल की, जब भोपाल में एक दम्पति इन लोगों का शिकार हो गया था. जब इन लोगों की इस हरकत का लोगों को पता चला तो सबने इनकी इस घटिया कार्रवाई पर थू थू किया. इसके अलावा महाराष्ट्र में भी दो निजी सेनाएं हैं, जो लोगों की सुरक्षा कम और नुकसान ज्यादा करती है. ये सेनाएं जब निकलती हैं तो तबाही करती हैं, देश की, शांति की एवं भाईचारे की. अगर सेनाएं ऐसी होती हैं तो हम को ऐसी सेना की जरूरत नहीं, नहीं चाहिए ऐसी सेना, जो निहत्थे एवं निर्दोष लोगों को निशाना बनाए.

प्यार के लिए चीर पहाड़


प्यार के लिए साला कुछ भी करेगा, यह बात तो आम ही है. आशिक को अपनी महबूबा के पांव में लगे कांटे की चुम्बन भी सूली से ज्यादा लगती है. कुछ ऐसे ही प्यार की मिसाल है गांव गहलौर का स्वर्गीय दशरथ मांझी. यह व्यक्ति अपनी पत्नी को आई चोट से इतना प्रभावित हो गया कि उसने गुस्से में आकर पहाड़ का सीना ही चीर डाला. चलो आओ तुम को एक कहानी सुनाता हूं, मुझे नहीं पता कितने लोग इसको बुरा कहेंगे और कितने अच्छा. पर मेरा मकसद एक गुमनाम आशिक को लोगों तक पहुंचाना है.

बिहार के गया जिले के एक अति पिछड़े गांव गहलौर में रहने वाले दशरथ मांझी अपनी पत्नी फगुनी देवी को अत्यंत प्यार करता था. फगुनी भी और महिलाओं की तरह पानी लेने के लिए रोज गहलौर पहाड़ पार जाती थी. मगर एक सुबह फगुनी पानी के लिए घर से निकलीं. जब वो घर वापिस आई तो उसके सिर पर हर रोज की तरह पानी का भरा हुआ घड़ा नहीं था. ये देखकर मांझी ने पूछा कि घड़ा कहाँ है? पूछने पर फगुनी ने बताया कि पहाड़ पार करते समय पैर फिसल गया. चोट तो आई ही, पानी भरा मटका भी गिर कर टूट गया. शायद पहाड़ को भी इसी दिन का इंतजार था कि कोई उसको चीरकर एक रास्ता बनाए. पत्नी का दर्द मांझी से देखा न गया और उसने ठान लिया कि वो अब पहाड़ का सीना चीरकर एक रास्ता बनाएगा.

फिर क्या था दशरथ अकेले ही पहाड़ काटकर रास्ता बनाने में जुट गए. हाथ में छेनी-हथौड़ी लिए वे दो दशकों तक पहाड़ काटता रहा. रात-दिन, आंधी पानी की चिंन्ता किए बिना मांझी नामुमकिन को मुमकिन करने में जुटा रहा. आखिर आशिक की जिद्दी आगे पहाड़ भी चकनाचूर हो गया. मांझी ने अपने गांव से अमेठी तक 27 फुट ऊंचाई में पहाड़ काटकर 365 फीट लंबा एवं 30 फीट चौडा़ रास्ता बना दिया. पहाड़ काटकर रास्ता बनाए जाने से करीब 80 किलोमीटर लंबा रास्ता लगभग 3 किलोमीटर में सिमट गया.

मांझी की हिम्मत एवं जजबे को देखते हुए लोगों ने उन्हें 'माउन्टेन कटर' का नाम दे दिया. पहाड़ का सीना चीरकर मांझी ने रास्ता तो बना दिया, मगर जिसके लिए उसने पहाड़ से माथा लगाया था वो तो काम खत्म होने से पहले ही चल बसी. इस दीवाने के बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने भरी लोक अदालत में अपनी कुर्सी छोड़कर बैठने के लिए कहा और उन्होंने इस मौके पर मांझी को जीवंत शाहजहां का नाम देकर भी पुकारा था.

देखो इस दीवाने की दीवानगी कि अगर यह पहाड़ तोड़कर सरकार को रास्ता बना होता तो शायद बीस तीस लाख रुपए खर्च होते, मगर इस आशिक ने सिर्फ अपनी प्यारी पत्नी की छोटी सी चोट के बदले उस पहाड़ का सीना ही चीरकर रास्ता बना दिया. यह आशिक शनिवार 18 अगस्त 2007 को इस दुनिया को सदा के लिए अलविदा कहकर अपनी फगुनी के पास पहुंच गया, जो उसका सालों से स्वर्ग में इंतजार कर रही थी.

प्यार की भी एक मर्यादा हो

भावुकता में न बहकें
क्या हुआ रोशनी? तुम उदास क्यों हो? कुछ नहीं रोहिणी...रोशनी मुझसे तो झूठ मत बोलो। मैं तुम्हारी सहेली हूँ, तुम्हारी रग-रग से वाकिफ हूँ, तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो। बोला न नहीं, कुछ भी कहो रोशनी तुम मुझे कुछ छुपा रही हो। बोलो न क्या बात हुई, कहते हैं दुख बाँटने से कम होता है और खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं। तुम्हें पता है न रोहित के बारे में? हाँ तुम दोनों का प्रेम प्रसंग काफी चर्चा में है। क्या झगड़ा हो गया उससे। प्यार में रूठना-मनाना तो लगा ही रहता है। जिन्दगी में सुख-दुःख दोनों होते हैं। नहीं रोहिणी, बात वह नहीं। कल रोहित और मेरे बीच शुरू हुई तकरार ने एक बड़े झगड़े का रूप ले लिया।हुआ यह कि कल मैं और रोहित फिल्म देखने गए थे। फिल्म देखकर हम जब थिएटर से बाहर निकले तो रोहित ने मुझे कहा कि घर में बहाना बनाकर एक दिन के लिए उसके घर जाऊँ क्योंकि उसके माता-पिता बाहर जा रहे हैं। मैंने उसको मना कर दिया, जिससे वो चिढ़ गया और कहने लगा क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करतीं, तो मैंने भी कह दिया क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करते। वो शारीरिक संबंध बनाने के लिए पिछले कई दिनों से दबाव डाल रहा है, मैंने उसको कई बार कहा है कि ये सब शादी के बाद, लेकिन वो है कि मानने को तैयार नहीं। बस इस बात को लेकर दोनों में झगड़ा हो गया। तुमने सही किया रोशनी, अगर मैं भी वहाँ पर होती तो शायद ऐसा ही कहती, क्योंकि अगर उसको तुझसे प्यार होगा तो वो इंतजार करेगा और तुमसे इसके लिए माफी माँगेगा। रोशनी तुमको हमारे मोहल्ले वाली किरण तो याद होगी? हाँ वो जिसका लवली के साथ प्यार चल रहा था। वो प्यार नहीं था, लवली उसके साथ धोखा कर रहा था। मैंने उसको कई बार समझाया लेकिन वो सुनती कहाँ थी। लवली ने उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए और जब किरण ने शादी का प्रस्ताव रखा तो लवली ने इनकार कर दिया और बोला उसके घरवाले इसके लिए मना कर रहे हैं। बताओ अब बेचारी किरण कहाँ जाए। तुमने सही कहा रोहिणी, आज अनेक लड़कियाँ नासमझी में अपने प्रेमी पर विश्वास कर शादी से पहले ही गर्भधारण कर लेती हैं और फिर कलंकित होने के डर से गर्भ निरोधक गोलियाँ लेती हैं जिसका असर उनकी आने वाली जिन्दगी पर पड़ता है। इसलिए मैंने सोचा है कि अगर रोहित मुझे प्यार करता है तो वह इस प्यार को शादी तक बिना शारीरिक संबंधों के कायम रखेगा, वरना तो मेरे दिल में भी उसके लिए कोई जगह नहीं। हम लड़कियों को एक विश्वास मार लेता है, हम एक अनजान व्यक्ति के हाथों में खुद को ऐसे सौंप देते हैं, जैसे वो हमारा जनम-जनम का साथी है, लेकिन कितने प्रेमी होते हैं, जो अपनी प्रेमिका को अपने घर के आँगन में दुल्हन बनाकर ले जाते हैं। रोहिणी प्यार करना बुरी बात नहीं, लेकिन प्यार करते समय मर्यादा में रहना बहुत जरूरी है। प्रेमी की बातों में बहकर जो गलतियाँ हम करते हैं, बेशक उनके बारे में हम और वो जानता है, लेकिन जब वो प्यार झूठा निकलता है तो खुद को आईने के सामने हम लुटी हुई पाती हैं। रोहिणी, जिसकी सहेली तेरी जैसी हो, वो जिन्दगी के किसी भी मोड़ पर लड़खड़ाएगी नहीं। किसी ने सही कहा है, अच्छा दोस्त तो वही होता है, जो आपको गलत रास्ते पर जाने से रोके और आज तुमने वही काम किया है।

ओबामामय हुआ अमेरिका

बेशक ये शीर्षक केवल अमेरिका के ओबामामय होने की बात कर रहा हो, लेकिन हकीकत तो ये है कि ब्लॉग से लेकर न्यूज पोर्टल एवं प्रिंट मीडिया से लेकर इलैक्ट्रोनिक मीडिया तक ओबामा छाए हुए हैं. ओबामा अमेरिकावासियों के लिए उम्मीद की एक किरन नहीं बल्कि उम्मीद का सूर्य है. अमेरिकावासियों के अलावा भी बड़े बड़े राजनीतिक विशेषज्ञों का भी ये मानना है कि ओबामा रूपी सूर्य की रोशनी से अमेरिका एक बार फिर से चमक उठेगा. वहीं कुछ लोग इस को ओबामा के लिए कांटों भरा ताज भी मान रहे हैं क्योंकि ओबामा के आगे बहुत गंभीर चुनौतियां हैं, जिन पर पार पाने का मादा उनमें है कि नहीं ये तो आने वाले साल ही बताएंगे, फिलहाल तो अमेरिका वासी खुशी से इस तरह लबालब हैं जैसे उनको आजादी मिल गई हो या फिर किसी नए अवतार ने इस धरती पर जन्म ले लिया हो.वैसे भी ओबामा को किसी अवतार से कम नहीं आंका जा रहा. अब देखना तो ये दिलचस्प होगा कि विश्वशक्ति की हॉट सीट पर बैठने वाला ओबामा चुनौतियों पर विजय कैसे पाता है.

ओबामा के लिए चुनौतियों
अमेरिका को मंदी की मार से उभरना, इराक से अमेरिकी सैना की वापसी, अफगानिस्तान में शांति लाना, आतंकवाद के विरुद्ध जंग, इसराइल व फिलीस्तानी के मुद्दे को सुलझाना, रूस अमेरिका के रिश्तों में कड़वाहट को खत्म करना, उत्तर कोरिया के प्रति अपने रुख में सुधार, विश्व में अमेरिका की भूमिका में बदलाव लाना, चीन से अच्छे संबंध बरकरार रख पाना आदि॥

अमेरिकावासियों का विश्वास
टाइम्स सीबीएस न्यूज सर्वेक्षण के अनुसार ज्यादातर अमेरिकियों को यकीन है कि ओबामा एक अच्छे राष्ट्रपति साबित होंगे वह अमेरिका में वास्तविक परिवर्तन लाएंगे और वह अर्थव्यवस्था और इराक पर सही फैसले करेंगे और देश को आतंकवादी हमलों से बचाएंगे। परिणामों के अनुसार सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 70 प्रतिशत अमेरिकियों ने कहा कि ओबामा ने अपने मंत्रिमंडल के लिए जो चयन किए हैं वे उन्हें मंजूर करते हैं.

ओबामा की तेजतर्रार टीम
दुनियाभर में छाए आर्थिक संकट और बड़े पैमाने पर जारी दो युद्धों के बीच सुपर पावर अमेरिका की कमान संभालने जा रहे बराक ओबामा की टीम पहले ही दिन अपना कामकाज संभाल लेगी और त्वरित आधार पर एजेंडे को लागू करने की दिशा में काम किया जाएगा। ओबामा के अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद उनके महत्वपूर्ण सहयोगियों की एक टीम प्रशासन के एजेंडे को तेजी से शुरू करने के लिए सीधे व्हाइट हाउस रवाना हो जाएगी, हालांकि बाकी समारोह पूर्ववर्त जारी रहेगा। इसके अलावा 21 जनवरी को राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल का पहला पूर्ण दिन होगा और उसी दिन ओबामा ने पहले से ही अपने दो प्रमुख चुनौतीपूर्ण मुद्दों पर बैठक बुलायी हुई है। इनमें आर्थिक तथा विदेश नीति खासतौर से इराक और अफगानिस्तान के युद्ध शामिल हैं।

खेल हस्तियां भी उत्सुक :टाइगर वुड्स से लेकर मुहम्मद अली डेव विनफील्ड से लेकर दिकेंबे मुटोम्बो जैसे खेलों की दुनिया के कई दिग्गज हैं जो अमेरिकी के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा बनना चाहते हैं। जार्जटाउन में पहली बार श्वेतों के दबदबे वाली टीम उतारने पर नस्ली टिप्पणियों का सामना करने वाले हाल आफ फेम में शामिल दिग्गज कोच जान थाम्पसन के पास शपथ ग्रहण समारोह का टिकट है। दुनिया के नंबर एक गोल्फर टाईगर वुड्स भी ओबामा को लेकर बेहद उत्सुक हैं।

व्हाइट हाउस की तैयारीअमेरिका में भावी राष्ट्रपति के लिए व्हाइट हाउस के तैयार होने में आमतौर पर करीब छह महीने का समय लगता है लेकिन इस बार यह काम रिकार्ड छह घंटों के भीतर पूरा हो जएगा। ओबामा परिवार के लिए लगभग 100 कर्मचारी राष्ट्रपति के आधिकारिक निवास में फर्नीचर कपड़े भोजन से लेकर कारपेट आदि सामानों को सुगमता से बदल देंगे. व्हाइट हाउस में इस काम को 93 कर्मचारी आज पूर्वाह्न 11 बजे से शुरू करेंगे और शाम पांच बजे तक अंजाम दे देंगे.

संघर्ष का दूसरा नाम 'अक्षय'


'कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' यह पंक्ति उस वक्त बिल्कुल हकीकत नजर आती है, जब हम पिछले साल चार हिट फिल्में देकर सफलता की शिख़र पर बैठने वाले अक्षय कुमार की जिन्दगी में झाँकते हैं. आज अक्षय कुमार का नाम सफलतम सितारों में शुमार हो गया, हर किसी को उसका हर लुक भा रहा है, चाहे वो एक्शन हो, चाहे रोमांटिक या चाहे कामेडी. आज दर्शक उसकी सफलता देखकर वाह अक्षय वाह कह रहे हैं, मगर ज्यादातर दर्शकों को अक्षय के संघर्षशील दौर के बारे में पता नहीं, हां मगर, जिनको पता है वो अक्षय को संघर्ष का दूसरा नाम मानते हैं. गौरतलब है कि होटलों, ट्रेवल एजेंसी व आभूषण बेचने जैसे धंधों में किस्मत आजमाने वाले राजीव भाटिया ने बच्चों को मार्शल आर्ट भी सिखाया. इसी संघर्ष के दौर में उनको मॉडलिंग करने का ऑफर मिला. जिसके बाद दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाला राजीव भाटिया अक्षय कुमार के रूप में ढल गया और बड़े पर्दे पर अपनी अदाकारी के जलवे दिखाने लगा. अक्षय कुमार ने फिल्म 'सौगंध' के मार्फत बालीवुड में कदम रखा, उसके बाद खिलाड़ी, सैनिक, मोहरा, हम हैं बेमिसाल, वक्त हमारा है, एलान, मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी, मैदान-ए-जंग जैसी कई एक के बाद एक एक्शन फिल्में दी. इस दौर में अक्षय की ज्यादातर फिल्में हिट या औसत रहती थी, जिसके चलते अक्षय बालीवुड में टिका रहा, मगर फिर एक दौर आया, जब अक्षय की हर फिल्म बॉक्स आफिस पर आकर दम तोड़ने लगी. इसके बाद फिर अक्षय की डुबती नैया को संघर्ष, जानवर, धड़कन, हेराफेरी, आँखें जैसी फिल्मों ने बचा लिया. इस दौरान अक्षय कुमार का नाम रवीना टंडन और फिर शिल्पा शेट्टी के साथ जुड़ने लगा, मगर अक्षय ने समझदारी से काम लेते हुए ट्विंकल खन्ना से शादी करके सभी अटकलों पर अंकुश लगा दिया. शादी के बाद अक्षय कुमार की जिन्दगी धीरे धीरे सफलता की तरफ बढ़ने लगी, बॉक्स आफिस पर आने वाली अक्षय कुमार की ज्यादातर फिल्में हिट होने लगी, मगर वर्ष 2006 और 2007 ने तो अक्षय कुमार को सफलता के रथ पर सवार करवा ही दिया. इन सालों के दौरान अक्षय कुमार की 'हम को दीवाना कर गए', 'फिर हेराफेरी', 'जानेमन', 'भागमभाग', 'नमस्ते लंदन', 'हे बेबी', 'भूल भुलैया', 'ओम शांति ओम' (मेहमान भूमिका) और वैलकम आदि फिल्में रिलीज हुई, जिन्होंने अक्षय कुमार की तकदीर के पत्ते ही पलट दिए. आज अक्षय कुमार के पास बड़े बड़े निर्माता निर्देशक आ रहे हैं, मगर अक्षय कुमार के पास वक्त नहीं,सफलता की शिख़र पर बैठे अक्षय कुमार अपने कैरियर को लेकर कितना सजग हो चुके हैं, इस बात का पता तो पिछले दिनों सामने आई एक घटना से लगाया जा सकता है. हुआ यूं कि पिछले दिनों यशराज बैनर ने अक्षय कुमार को टशन के अलावा एक और फिल्म के लिए साईन करना चाहा, मगर जब अक्षय ने फिल्म की कहानी सुनी तो फिल्म करने से इंकार कर दिया. इस बात से आदित्य काफी नाराज हुए, हों भी क्यों न, क्योंकि बालीवुड के बड़े बड़े स्टार यशराज बैनर तले काम करने के दौड़े दौड़े जो आते हैं. मगर अक्षय कुमार उनमें शामिल नहीं. कुछ समय पहले अक्षय ने एक अख्बार को दिए साक्षात्कार में कहा था कि आज वो जिस मुकाम पर हैं, उसके पीछे बड़े बैनर नहीं बल्कि छोटे छोटे बैनर और निर्माता-निर्देशकों का हाथ है. इतना ही नहीं साल अक्षय कुमार और यशराज फिल्मस की पहली फिल्म टशन रिलीज होगी, जिसको लेकर लोगों में क्रेज है. इस फिल्म के बढ़े क्रेज के पीछे यशराज बैनर नहीं बल्कि अक्षय कुमार की बढ़ती लोकप्रियता है. याद हो तो पिछले साल यशराज की चार फिल्में बुरी तरह फ्लाप हुई थी जबकि अक्षय की चार फिल्में हिट गई थी. इसके अलावा अक्षय कुमार की लोकप्रियता का अंदाजा तो छोटे पर्दे के कार्यक्रम 'फीयर फैक्टर' के प्रति ऐपीसोड 1.5 करोड़ रुपए मिलने से लगाया जा सकता है. इसके अलावा खिलाड़ी के हाथ में ऐसी फिल्में है, जोकि बॉक्स पर धमाल मचाए बिना नहीं जाएंगी, जिनमें 'सिन्ह इज किंग' 'ब्लू' 'दिल्ली चाँदनी चौक टू बैंकॉक' 'एक्शन रिप्ले' 'टेन वाय एट' 'हेराफेरी 4' और साजिद खान की अनाम फिल्म आदि शामिल हैं. अक्षय कुमार का जन्म पंजाब के पवित्र शहर अमृतसर में 9 सितम्बर 1967 को हरीओम भाटिया के घर हुआ, उनके पिता सरकारी नौकरी करते थे. जिसके चलते वो अमृतसर साहिब से दिल्ली चाँदनी चौक में आकर रहने लगे. इसके बाद अक्षय कुमार (राजीव भाटिया) ने अपने पांव पर खड़ा होने के लिए यूनिसेफ के कार्ड बेचने शुरू कर दिए. अक्षय कुमार को प्रति कार्ड पचास पैसे मिलते थे. इसके बाद आभूषण, ट्रैवल एजेंसी, होटल, आर्ट मार्शल और पार्टियों में डांस कर पैसे कमाने का जुगाड़ लगाया, मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. दिल्ली के राजीव भाटिया को तय करना था अक्षय कुमार तक का सफर. इस सितारे ने एक्शन, कामेडी और रोमांटिक हर तरह की भूमिका निभायी, जिसको दर्शकों ने खूब सराहा, इतना ही नहीं इस सितारे ने अजनबी फिल्म में अदाकारी के ऐसे जलवे दिखाए कि बेस्ट विलेन का अवार्ड भी अपने नाम कर लिया.

पता नहीं

कब दिन, महीने साल गुजरे
पता नहीं,
कैसे और किस हाल गुजरे
पता नहीं,

कितना कुछ खो दिया
कितना पा लिया
पता नहीं,
कब घर छोड़ा, अपने छोड़े
और परदेस में काम से मन लगा लिया
पता नहीं
जिसे समझे रोशने साधन
उसी दीये से कब घर जला लिया
पता नहीं

सूर्यादय और अस्त होता
देखे कितने दिन हुए
पता नहीं
कितने मिलकर बिछड़े
और कितने दोस्तों में गिन हुए
पता नहीं

कब खत्म होगा
सफर ये अलबेला
पता नहीं

कब देखूंगा वो गलियां,
वो अपनों का मेला
पता नहीं