तुम तो....

तुम तो दूर चली गई
लेकिन मैं तो
आज भी वहीं हूं
उन्हीं गलियों में,
उन्हीं बगीचों में,
जहां कभी हम तुम एक साथ चला करते थे/

हवाहवा दे जाती है पुरानी यादों को/
हां,आंख भर जाती है याद कर वादों को//

चुप हो जाता हूं,
जब पूछते हैं नदियां के किनारे/
कहां गए नजर नहीं आते तुम्हारे
जानशीं जान से प्यारे//

मैं खामोश हूं,
तुम ही बताओ क्या जवाब दूं/
मुझे तांकता है
किसको तोड़कर वो गुलाब दूं//

तुम्हें देखता था जहां से,
आज उसी छत पर जाने से डरता हूं/
तुम न जानो, मैं किस तरह
प्यार के गवाह सितारों का सामना करता हूं//

हँसने नहीं देती याद तेरी
रोने पर जमाना सौ सवाल करता है/
अब जाना, तुम से दूर होकर
बिरहा कितना बुरा हाल करता है//

छंटनी की सुनामी

छंटनी की सुनामी हमारे पड़ोस में रहने वाले नंबरदार के कुत्ते जैसी है, जो चुपके से राहगीर की टांग को पीछे से आकर पकड़ लेता है, जिसके बाद राहगीर की एक नहीं चलती, बस फिर इलाज के लिए टीके पर टीके लगवाने पड़ते हैं. एक डेढ़ सौ साल पुरानी बैंक लेहमन ब्रदर से शुरू ही छंटनी की सुनामी, अब तक दुनिया भर के लाखों लोगों को आपना शिकार बना चुकी है एवं करोड़ों लोग घर से दुआ करते हुए काम पर निकलते हैं, हे भगवान! उनको छंटनी की सुनामी से बचाकर रखना, क्योंकि नौकरी के अलावा उनके पास अन्य कमाई का कोई साधन नहीं.छंटनी वो सुनामी है जो अब तक करोड़ों लोगों के सपनों को रौंद चुकी है और लगातार अपना कहर बरपा रही है. कुछ दिन पहले मैं एक बड़ी कंपनी में काम करने वाले अपने एक दोस्त से मिला था, जो काम पर महीने में से केवल दस बारह दिन ही दिखाई पड़ता था, इसलिए मैंने व्यंग कसते हुए कहा कि क्या बात है, जनाब आपकी तो ऐश है, आपकी कंपनी बड़ी दियालु है, जो आपको इतने दिन की छुट्टी प्रदान कर देती है. तो उसने कहा कि उसके परिवार में कुछ ऐसे घटनाक्रम लगातार हो रहे थे, जिसके कारण उसको बार बार घर जाना पड़ रहा था. फिर उसने बड़े जोश और उल्लास के साथ कहा, लेकिन यार अब ऐसा नहीं, मैं लगातार अपने काम पर आ रहा हूं पिछले कई दिनों से. मैंने कहा दोस्त काम से बेइमानी मत करना नहीं तो मुश्किल में कभी न कभी आ जाओगे. उसने अपने बॉस की खूब प्रशंसा की क्योंकि उसने कई दफा उसकी जाती जाती जॉब बचाई. मैंने कहा अच्छी बात है, अगर तुमको ऐसा बॉस मिला है, लेकिन मुझको परसों उसके बारे में एक और एवं बुरी ख़बर मिली कि उसकी कंपनी में छंटनी का दौर शुरू हो गया, जिसके कारण उसको नौकरी से निकाल दिया गया. ये बात सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ, शायद आपको भी उससे हमदर्दी हो, वो घर में बड़ा है, उस पर सब जिम्मेदारियां हैं क्योंकि उसके पिता की कुछ महीने पहले मौत हुई है, और वो अपने पूरे परिवार के साथ अपना राज्य, घर बार छोड़ अपनी जॉब स्थल पर आ गया. मगर उसके परिवार को उस जगह आए पंद्रह दिन भी नहीं हुए कि कंपनी ने उसको बाहर निकाल दिया, इसके कारण अब वो उस मोड़ है, जहां से उसको घर वापसी परिवार समेत करना किसी भयानक सपने से कम नहीं होगी. ऐसे ही कुछ महीने पहले मैं पंजाब गया था, मैं जब भी पंजाब जाता हूं तो अपने दोस्तों और जान पहचान वालों से मिलकर आता हूं, ज्यादातर लोग मीडिया लाइन में हैं, इस बार गया था तो पता चला कि अमर उजाला अख़बार में सिर्फ दो व्यक्ति काम कर रहे हैं, जिसमें एक रिर्पोटर मेरा दोस्त था, और दूसरा वो शख्स जिसने मुझे जिन्दगी के असली मायने बताए. उस दौरान मेरे जान पहचान वालों ने कहा कि तुम पंजाब आकर कोई न्यूज पेपर क्यों नहीं ज्वाइन कर लेते और अमर उजाला तो खाली ही पड़ा है. लेकिन मेरे दिल ने कहा, अब जहां है, वहां ठीक हैं. जब वक्त पड़ेगा देख लेंगे. पंजाब से मैं अपने काम पर लौट आया, कुछ दिन बाद मैंने अपने दोस्त को ऐसे ही हाल चाल पूछने के लिए फोन किया तो पता चला कि अमर उजाला बंद हो गया. जिससे दोस्त की नौकरी तो चली गई जबकि ब्यूरो चीफ की बदली अन्य एवं दूर जगह कर दी गई. ऐसे पंजाब में मेरे कई जान पहचान वाले पत्रकार काम से हाथ थो बैठे, जिनके बारे में सुनकर मन दुखी हो जाता है.ऐसा ही एक और किस्सा, कुछ दिन पहले मेरे पड़ोसी के पास उसके घर से फोन आया कि बेटे तुम घर कब आओगे, तुम्हारे लिए हम लड़की ढूंढ रहे हैं, तो उसका जवाब था, मां तुम फिलहाल लड़की ढूंढ़ने की बजाय मेरी नौकरी की सलामती के लिए दुआ करो. उसने युवक ने ये शब्द इस लिए कहे थे, क्योंकि उसकी कंपनी में भी छंटनी की सुनामी आ चुकी थी, कई लोगों को दफ्तर से चलता कर दिया गया. ऐसे में लाजमी है कि उसको भी डर लग रहा था कि कहीं उसकी भी गर्दन न उड़ जाए. सही कहा था उसने, आपको याद हो जब एक हवाई कंपनी से लोगों की छंटनी हुई थी तो एक लड़के की एक दिन पहले हुई सगाई टूट गई थी. सबसे ज्यादा छंटनी का डर उन लोगों को रह रहकर सता रहा है, जिन्होंने लोन पर गाड़ी, बंगला एवं अन्य वस्तुएं खरीदीं, जिसकी किश्त उनकी हर महीने आने वाली पगार से भरी जानी है. ऐसे में अगर नौकरी छीन गई तो किश्त का रुकना लाज़मी है, किश्त रुकी तो समझो उनका बंगला, उनकी गाड़ी उनकी नहीं रहेगी. इतना ही नहीं जब से छंटनी की सुनामी शुरू हुई है, दर्द निवारक गोलियों की बिक्री बढ़ चुकी है, बड़े बड़े पदों पर तैनात लोग तो छंटनी से इतने परेशान हैं कि कि एक दिन में दो दो दर्दनिवारक गोलियां खा रहे हैं. ऐसे समय में सबको ध्यान और धीरज से काम लेना होगा. लोगों के सपने चूर होने से मैनेजमेंट गुरू बचा सकते हैं. छंटनी की सुनामी का दर्द तो वही जान सकता है, जो उसका शिकार हुआ है, क्योंकि छंटनी की सुनामी से होने वाली तबाही का मंजर अन्य लोग नहीं देख सकते, जैसे दिल टूटने की पीड़ा एक आशिक ही जान सकता है.

क्या ये आतंकवाद से गंभीर विषय नहीं ?

पिछले दिनों मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले का विरोध तो हर तरफ हो रहा है, क्योंकि उस हमले की गूंज दूर तक सुनाई दी, लेकिन हर दिन देश में 336 आत्महत्याएं होती हैं, उसके खिलाफ तो कोई विरोध दर्ज नहीं करवाता और सरकार के नुमाइंदे अपने पद से नैतिकता के आधार पर त्याग पत्र नहीं देते. ऐसा क्यों ? क्या वो देश के नागरिक नहीं, जो सरकार की लोक विरोधियों नीतियों से तंग आकर अपनी जान गंवा देते हैं. आपको याद हो तो मुम्बई आतंकवादी हमले ने तो 56 घंटों 196 जानें ली, लेकिन सरकार की लोक विरोधी नीतियां तो हर एक घंटे में 14 लोगों को डंस लेती हैं, अगर देखा जाए तो 24 घंटों में 336 लोग अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं. मगर कभी सरकार ने इन आत्महत्याओं के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराकर नैतिकता के तौर पर अपने नेताओं को पदों से नहीं हटाया, क्योंकि उस विषय पर कभी लोग एकजुट नहीं हुए, और कभी सरकार को खतरा महसूस नहीं हुआ.ऐसा नहीं कि मुम्बई से पहले इस साल भारत में कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ, इस साल कई बड़े बड़े शहरों को निशाना बनाया गया एवं बड़े बड़े धमाके किए, लेकिन उन धमाकों में मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग थे, उनका बड़े घरों से कोई लेन देन नहीं था, इसी लिए धमाकों की गूंज भी उतना असर नहीं कर पाई थी, जितनी आतंकवादियों की गोलियों की आवाज ने कर दिया. करती भी क्यों नहीं, हमला जो इस बार विदेशियों एवं बड़ी हस्तियों को ध्यान में रखकर किया गया था. इस बार तो आतंकवाद के खिलाफ बॉलीवुड के बड़े बड़े सितारों ने भी आवाज बुलंद की, क्योंकि उन्हें पता है कि ये हमला उन होटलों पर हुआ, जिनमें उनका अक्सर आना जाना है. वरन उक्त मायानगरी के सितारे अहमदाबाद, बेंगलूर एवं जयपुर में हुए धमाकों के वक्त कहां सो रहे थे, सड़कों पर क्यों नहीं उतरे? ऐसे तमाम सवालात जेहन में आते हैं, लेकिन उत्तर कुछ नहीं मिलता, बिना आश्वासनों के. अहमदाबाद एवं जयपुर में हुए बम्ब धमाकों में कोई कम आदमी नहीं मरे थे, लेकिन अफसोस की बात ये थी कि उन हमलों का निशाना कोई बड़ा व्यक्ति या विदेश नहीं बना था. नैतिकता की बात करने वाली देश की सरकार तब कहां सो रही थी, जब उक्त शहरों को आतंकवादियों ने दहलाकर रख दिया था, कब तब इस सरकार के भीतर नैतिकता मरी हुई थी. क्या उन हमलों में लोगों की मौत नहीं हुई, उनकी शांति भंग नहीं हुई थी. सब हुआ मगर तब सरकार के खिलाफ ऐसे लोगों ने रोष जाहिर नहीं किया था, लोग चुप थे, सरकार ने सोचा, चल अच्छा है कोई बोला नहीं. इस बार नेताओं के बयानों ने जलती में घी का काम किया, जिसके बाद लोगों का गुस्सा फूटा.आओ चलो, उस विषय पर लौटते हैं, जहां से बात शुरू हुई थी, वो विषय भी ऐसा है, जिसके खिलाफ लोगों को मोर्चा खोलना चाहिए और सरकार को एक और आइना दिखाना चाहिए कि वो एक और मोर्चे पर भी विफल है. क्या! इसके लिए भी मुम्बई तक आने इंतजार करना पड़ेगा, वैसे महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र तो इसकी लपेट में पूरी तरह आ चुका है. विदर्भ के किसानों की स्थिति इतनी पतली हो चुकी है कि उनके पास आत्महत्या कर इस दुख भरी जिन्दगी से पीछा छुड़ने के सिवाय कोई चारा ही नहीं बचता. देश की आर्थिक तरक्की में योगदान देने वाले इस किसान को सरकार ने नजरंदाज क्यों कर रखा है. इतना ही नहीं शहर वर्ग में भी महंगाई के कारण आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ने लगा है, लेकिन फिर सरकार झूठे आश्वासनों के सिवाय कुछ भी नहीं करती.राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट में एक तथ्य उभरकर सामने आया है कि भारत में हर एक घंटे में 14 लोग आत्महत्याएं करते हैं और आत्महत्या करने वाले तीन व्यक्तियों में एक युवा है. युवा देश के विकास में योगदान डालते हैं, लेकिन सरकार की लोक विरोधी नीतियों के कारण नौजवान आत्महत्या कर मृत्यु दर में योगदान डाल रहे हैं. कहां सो रही हैं सरकारें? देश के बिगड़ते हालातों को क्यों नहीं संभालती. आज देश का युवा मरने या मारने के लिए तैयार बैठा है. बेरोजगारी का शिकार नौजवान या तो गलत रास्ते पर चले जाते हैं या फिर मौत की नींद सो जाते हैं. जो नौजवान गलत रास्ते पर निकल जाते हैं, वो कासिब जैसे नौजवान देश का भविष्य बनने की बजाय समाज के लिए नासूर बन जाते हैं. पिछले दिनों जो भी आतंकवादी हमले हुए उन सबके पीछे नौजावान थे, ये नौजवान आए कहां से ? कुछ कहेंगे पाकिस्तान से, और कुछ कहेंगे हिंदुस्तानी लगते हैं. नौजवान कहां के भी हों, सरकारों ने इनको गलत रास्ते चुनने के लिए मजबूर कर दिया. वो सरकार चाहे भारत की हो चाहे पाकिस्तान की.देश की सरकार ने आम नागरिकों की स्थिति ऐसी पैदा कर दी है कि वो कुछ पैसों के लिए अपना ईमान दांव पर लगा देते हैं और फिर मुम्बई जैसे कांड होते हैं. शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन जैसे कितने ही नौजवान देश के लिए हंसते हंसते जान कुर्बान तो कर जाते हैं, लेकिन बाद में सरकार उन शहीरों के परिवारों की बात तक नहीं पूछती. देश की सरहद पर खड़े नौजवानों के घरों में कभी जाकर देखो, वो किस कदर जिन्दगी बतीत करते हैं और नेताओं के घरों में देखो..वो कैसे जिन्दगी बतीत करते हैं. किसी रिष्ट पुष्ट व्यक्ति का बेटा फौज में शामिल नहीं होगा. क्यों ? क्योंकि वहां पर तुम को ऐशोराम नहीं मिलने वाला.आगे रिपोर्ट कहती है कि 23.8 फीसदी लोग आत्महत्या घरेलू झगड़े के कारण करते हैं एवं 22.3 फीसदी लोग आत्महत्या बीमारी से तंग आकर करते हैं. कभी सोचा है कि किन घरों में ज्यादा झगड़े होते हैं, जो पूरी तरह से रिष्ट पुष्ट नहीं, जहां पर हर व्यक्ति की तमन्नाएं पूरी नहीं होती. इसके अलावा बीमारी से तंग आकर वो लोग जान देते हैं, जिनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं, बस एक चारपाई पर लेटे लेटे इलाज का नहीं मौत का इंतजार कर रहे होते हैं. अटल बिहारी जैसे नेता तो विदेश से इलाज करवाकर भी बुढ़ापे का आनंद लेते हैं. कब जागेगा आवाम. कब आएगी क्रांति..कब तक मरता रहे का आमजन....