ऐश्वर्या के आगे चुनौती

जब पिछले दिनों अमिताभ बच्चन अस्पताल में दाखिल हुए तो ना जाने कितने लोगों ने उनके स्वास्थ्य होने की दुआ की होगी, इन दुआ करने वालों में कुछ ऐसे लोग भी थे, जो खुद शायद पूरी तरह स्वस्थ नहीं थे, लेकिन फिर भी उन्होंने बॉलीवुड के इस महानायक की सलामती के लिए दुआ की. वहीं अमिताभ बच्चन को स्वास्थ्य करने के लिए घरवालों ने पैसे भी पानी की भांति बहाए होंगे, इस में कोई दो राय नहीं. अमिताभ का तंदरुस्त होकर घर आना एक खुशी का लम्हा है, घरवालों और प्रशंसकों के लिए. लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अब अमिताभ साठ के पार पहुंच चुके हैं, इस पड़ाव के बाद आदमी सोचता है कि उसके बच्चे खुश रहें और उसके घर में उसके पोते पोतियां खेलें. इसमें कोई शक नहीं होगा कि अब अमिताभ का भी ये सपना होगा, अमिताभ का ही क्यों, जया बच्चन का भी तो वो घर है, क्या होगा वो टेलीविजन पर ऐश, अभि और अमित जी की तरह हर रोज दिखाई नहीं देती, किंतु हैं तो बिग बी की पत्नी, वे भी इस सपने से अछूती न होंगी. आज अमिताभ के पास दौलत है, शोहरत है, लेकिन जब उसके मन में उक्त ख्याल उमड़ता होगा, कहीं न कहीं वो खुद को बेबस लाचार पाते होंगे, क्योंकि इसको पूरा करने लिए जया अमिताभ का फैसला नहीं बल्कि एश्वर्या राय की हां जरूरी है, बेशक अभिषेक इस बात को स्वीकार ले. प्रश्न तो तब उठता है जब ऐश का नाम आता है, क्या एश्वर्या इस बात को स्वीकार करेगी? ये सवाल इस लिए भी पैदा होता है क्योंकि ज्यादातर लोग तो अभिषेक बच्चन और एश्वर्या राय की शादी को एक सौदा ही मानते हैं, इतना ही नहीं पिछले दिनों एक मैगजीन को दिए साक्षात्कार में जया बच्चन ने कहा था कि उनकी तमन्ना थी कि उनका पुत्र एक संस्कारी लड़की से शादी करता, इस बात से एक जवाब तो मिल जाता है कि एश्वर्या जया बच्चन की पसंदीदा बहू तो नहीं, क्यों जया बच्चन चाहती थी कि उसकी बहू उसकी भांति परिवार को संभाले, जैसे जया ने अपने परिवार को ज्यादा अहमियत दी, फिल्मी कैरियर दरकिनार कर अपने परिवार को अहमियत दी. ऐश्वर्या राय पहले केवल एक सुंदरी थी, लेकिन अब वो बचन परिवार की बहू बन गई. ऐसे में कुदरती है कि उसके पास निर्माता निर्देशकों की तो कतार लगी होगी, और ऐसे में उसके नखरे भी बढ़ें होंगे. जिनको न चाहते हुए भी निर्माता निर्देशक और परिवार वाले झेलते होंगे, जया बच्चन और अमिताभ ने कभी तो हंसते हंसते ऐश के आगे अभी उक्त इच्छा जाहिर की होगी, बेशक ऐश ने भी हंसते हंसते कह दिया हो गया अभी नहीं डैडी जी मम्मी जी. ऐसे में अमिताभ और जया दबाव भी तो नहीं बना सकते कि वो गर्भ धारण करें. इस बात से तो सब भांति जानूं होंगे कि अभिषेक की सगाई करिश्मा कपूर से हुई थी, जो टूट गई, करिश्मा ने उसके बाद कपूर से शादी की और एक बच्चे को जन्म दिया. आज फिर वो दूसरी पारी शुरू करने के लिए हाथ पैर मार रही है. ऐश्वर्या राय को कैरियर की फिक्र छोड़कर अपने परिवार की इच्छापूर्ति पर ध्यान देना होगा. ऐसे समय पर अमिताभ को ऐश्वर्या को अपनी फिल्म वक्त दिखानी चाहिए, जिसमें अमिताभ अपने पोते को देखने के लिए तरसता है. उस फिल्म में अक्षय कुमार ने अमिताभ के बेफिक्र बेटे की भूमिका निभाई जबकि उस फिल्म में शैफाली शाह ने ऐसी माता की जो बेटे के कैरियर को लेकर चिंतित है, जिसको देखकर जया बच्चन की संजीदगी कहीं न कहीं नजर आती है. ऐश्वर्या के लिए यह समय एक चुनौती से कम नहीं, क्योंकि अब उसको सोचना होगा कि वो कैरियर को अहमियत दें या फिर अपने परिवार पर ध्यान केंद्रित करे.

बनते बनते बिगड़ी किस्मत

गज्जन सिआं वो देख बस आ रही है, बस नहीं निहाले, वो तो रूह की खुराक है. पास बैठा करतारा बोलिया. ऐसा क्या है बस में, बूढ़ी उम्र में भी आंखें गर्म करने से बाज नहीं आते, ओ नहीं करतारिया, उस बस में गांव के लिए एकलौता समाचार पत्र आता है, जिसको सारा दिन गांव के पढ़े लिखे लोग पढ़कर देश के हालात को जानते हैं, अच्छा अच्छा, ओ गज्जन सिआं माफ करी, ऐसे ही गलत मलत बोल गया था, नहीं नहीं इसमें तेरा कोई कसूर नहीं, टीवी वालों ने बुजुर्गों का अक्स ही ऐसा बना दिया है. गुफ्तगू चल ही रही थी कि बस पास आई और ले लो बुजुर्ग रूह की खुराक ड्राईवर ने बोलते हुए अख्बार बुजुर्गों की तरफ फेंका. गज्जन सिआं ने अख्बार की परतें खोलते हुए कहा, आज तो पहले पन्ने पर किसी नैनो की खबर लगी है, जल्दी पढ़ो गज्जन सिआं, कोई आँखों का मुफ्त कैंप लगा होगा आस पास में कहीं, समीप बैठा करतारा बोलिया..चुटकी लेते हुए गज्जन सिआं ने कहा नहीं ओ मेरे बाप, ये ख़बर आंखों से संबंधित नहीं बल्कि टाटा ग्रुप द्वारा बनाई जा रही नैनो कार के बारे में है, करतारा नजर झुकाते हुए बोला, चल आप ही बताएं खबर में क्या लिखा है, गज्जन सिआं बोला कि अख्बार में लिखा है कि नैनो अब गुजरात में बनेगी, इसके लिए के वहां पर सरकार ने टाटा को काफी जमीं दे दी है. फिर बीच में कूदते हुए करतारा बोलिया, ये सरकारें भी अपने स्वार्थ के लिए किसानों की जमीं बड़े बड़े उद्योगपतियों को सौंप देती हैं, और किसान न घर के रहते हैं न घाट के, ऐसा कुछ नहीं करतारिया निहाला बोलिया. तुमको पता है कि पहले टाटा इस संयंत्र को पश्चिमी बंगाल में लगाने वाला था. लेकिन तेरे जैसे गंवार किसानों को बातों में उलझाकर ममता बैनरजी ने वहां से प्रोजेक्ट को हटवा दिया, बात अभी खत्म नहीं हुई कि करतारा फिर बोलिया कि ममता ने अच्छा किया, गज्जन सिआं ने अखबार एक तरफ रहते हुए कहा, तेरी मां का सिर अच्छा किया, तुमको पता है, वहां कारखाना लगने से कितने किसानों के बच्चों को नौकरी मिल जाती, इतना ही नहीं कारखाने के वहां लगने से कुछ और भी कारखाने वहां पर लगने की संभावना पैदा हो सकती थी, किसानों की जमीनों के दाम बढ़ जाते, तुम खेती से कितनी कमाई कर पाते हो, पूरा परिवार खेतों में उलझे रहते थे, हां हां बोलते हो तुम गज्जन, हम किसानों को ज्यादा सोच समझ होती थी, पल में किसी की बातों में आ जाते थे, मुझे याद है, मेरे ससुराल के सपीम एक तेल शोधक कारखाना लगा है, जिसके लगने से गांव के नौजवानों को नौकरी तो मिली ही, भूखे मर रहे मेरे सुसराल वाले रातों रात अमीर बन गए, तुमको पता है उन्होंने अपनी पांच एकड़ जमीन कितने रुपयों में एक होटल के लिए बेची है, गज्जन बोलिया हां मुझे बताया था लज्जो ने, एक करोड़ रुपए से उपर में बिकी है. बातचीत चल रही थी कि गज्जन का पोतरा उसको खाना खाने के लिए बुलाने वहां पर आ गया. आज हर तरफ ऐसी ही वार्तालाप हो रही है, ममता ने जो वहां अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के किया वो बहुत निंदनीय है, वहां के किसानों की बन रही किस्मत को बर्बाद करके रख दिया. जैसे बंगाल से टाटा दुखी होकर निकला है, लगता नहीं कि कोई और कंपनी इस राज्य की तरफ जाने की बात करेगी, टाटा के इस फैसले से केवल किसानों को ही नहीं, बल्कि भूमाफिया को बहुत बड़ा झटका लगा है

सिनेमे को समझो, केवल देखो मत

इस साल भी बहुत सारी फिल्में रिलीज हुई, हर साल की तरह. लेकिन साल की फिल्मों में एक बात आम देखने को मिली, वो थी आम आदमी की ताकत, जिसके पीछे था तेज दिमाग, जिसके बल पर आम आदमी भी किसी बड़ी ताकत को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है. इस साल रिलीज हुई एकता कपूर की फिल्म 'सी कंपनी' ने बेशक बॉक्स आफिस पर सफलता नहीं अर्जितकी, लेकिन फिल्म का थीम बहुत बढ़िया था, घर में होने वाली अनदेखी से तंग आकर कुछ लोग मजाक मजाक में 'सी कंपनी' बना बैठते हैं, 'सी कंपनी' की दहश्त शहर में इस कदर फैलती है कि बड़े बड़े गुंडे और सरकारें भी उनके सामने घुटने टेकने लगती हैं, वो लोग बस फोन पर ही धमकी देते हैं, सब काम हो जाते हैं, वो लोग आम जनता के हित में काम करते हैं. फिल्म कहती है कि अगर बुरे काम के लिए 'डी कंपनी' का फोन आ सकता है तो अच्छे काम करवाने के लिए 'सी कंपनी' क्यों नहीं बन सकती.'सी कंपनी' को छोड़कर अगर हम इस साल सबसे ज्यादा समीक्षकों के बीच वाह वाह बटोरने वाली फिल्म 'ए वेनसडे' की बात करें तो वो फिल्म भी एक आम आदमी की ताकत को रुपहले पर्दे पर उतारती है. लेकिन इस फिल्म के नायक को मैं आम आदमी नहीं बल्कि जागरूक नागरिक की उपाधि देता हूं. फिल्म में एक व्यक्ति कम्यूटर और मोबाइल फोन का सहारा लेकर पूरे सिस्टम को हिलाकर रख देता है. पुलिस भी कठपुतली बनकर नाचती है. पुलिस उसके इशारे पर चार आतंकवादियों को रिहा करती है, जिसमें तीन को वो उड़ा है और एक को पुलिस उड़ा देती है. इस फिल्म में दिखाया गया है, जिस व्यक्ति की पुलिस थाने में दो कौड़ी की औकत नहीं होती, वो आदमी जब आतंक फैलाने की धमकी देता है तो पुलिस उसको जी-जी कहती है. मौत के आगे कौन न नाचे भाई. इस फिल्म को देखने के बाद ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने नायक को आम आदमी कहा, लेकिन मैं इस को आम आदमी नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक की उपाधि देता हूं, एक आम नागरिक आज भी अपने घर से बाहर निकलकर दूर की बात सोच ही नहीं सकता, फिल्म में भी शायद निर्देशक ने इस बात को ध्यान में रखा, तभी तो नायक बोलता है, आई एम स्टुपिड कॉमन मैन. इसके बाद एक और फिल्म रिलीज हुई, जो बेशक एक निजी दुश्मनी पर थी, लेकिन उसमें एक नौजवान अपने दिमाग से एक अरबपति को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया. यह फिल्म संजय गड़वी की किडनैप है, जिसको ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने सिरे से नाकार दिया जबकि फिल्म की कहानी अद्भुत है, हां संजय ने एक जगह गलती कर दी, वो कलाकार के चयन में, अगर हम कलाकारों की उम्र को नजरंदाज करते हुए फिल्म देखें तो पता चलता है कि आज के युवा क्या नहीं कर सकते, आज आतंकवादी हर जगह विसफोट करने से पहले मेल भेजकर सबको चौंका देते, इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी में एक से बढ़कर एक हीरे हैं, लेकिन जो आतंकवादियों के हत्थे चढ़कर अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करते हैं. इसका भी एक कारण है, देश में होनहार युवकों की कदर भी तो नहीं होती, कितने ही डिग्री होल्डर नौजवान सड़कों पर नौकरी की तलाश में दिन रात भटकते फिरते रहते हैं, उसमें से कुछ तो जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं, या कुछ अपनी डिग्री को एक तरफ रखकर अपने परिवार का पेट पालने के लिए जो काम मिलता कर लेते हैं, काम तो वो करते हैं, लेकिन उनके मन में जो तमन्नाएं होती हैं, जो अकांशाएं होती हैं, वो कभी नहीं मरती, ऐसे में शरारती अनसरां उनका फायदा उठाते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि फिल्में समाज का आइना हैं, लेकिन फिर दूसरी तरफ इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता कि फिल्म की कहानी भी समाज में पैदा होती है, वो समाज का कल होता है, जो आने वाले कल को संवारने के लिए मददगार हो सकता है. लेकिन आज की तेज जिन्दगी में किसके पास समय है कि वो इन बातों को देखे, वो तो सोचता है कि रविवार है, फिल्म देखकर बस दिमाग तारोताजा कर लें...यहां पर मेरा आपको सुझाव है कि सिनेमे को समझो, केवल देखो मत..

कैसे निकलूं घर से...

रेलवे स्टेशन की तरफ,
बस स्टैंड की तरफ,
आफिस की तरफ
घर से बाहर की तरफ
बढ़ते हुए कदम रुक जाते हैं,
और पलटकर देखता हूं घर को,
अपने आशियाने को,
जिसको खून पसीने की कमाई से बनाया है,
जिसमें आकर मुझे सकून मिलता है,
सोचता हूं,
क्या फिर इस घर लौट पाउंगा
कहीं किसी बम्ब धमाके में उड़ तो न जाउंगा
या फिर किसी भीड़ में कुचला तो न जाउंगा,
रुकते हैं जब कदम
दौड़ने लगता है तब जेहन,
असमंजस में पड़ जाता है मन,
बेशक जान हथेली पर रखने का है जज्बा,
लेकिन बे-मतलबी और अनचाही मौत से डरता है मन
भीड़ को देखकर भी मन घबराता है
कुचले जाने का डर सताता है
कैसे निकलूं बेफ्रिक बेखौफ घर से
लबालब हूं आतंक मौत के डर से