70 साल की लूट, गलती से ही सही, कहीं सच तो नहीं बोल रहे नरेंद्र मोदी

आप कैशलेस को पूरे देश पर थोपना चाहते हैं। आप कैशलेस का आह्वान करते तो समझ में आता। प्रेम में प्रस्‍ताव रखे जाते हैं, और जबरी संबंधों में सबकुछ थोपा जाता है। आप कह रहे हैं कि तकनीक का जमाना है, सब कुछ ऑनलाइन हो सकता है, अब लेन देन भी ऑनलाइन करो।

मैं सहमत हूँ, लेकिन एक फोकट का सवाल है, जब तकनीक का जमाना है, जब हम सब कुछ ऑनलाइन कर सकते हैं तो आपकी रैली ऑफलाइन क्यों?

मेरे झोले में फोकट की सलाह भी है - क्यों ना आप भी रैली भाषण का वीडियो रिकॉर्ड करके यूट्यूब पर डालें, और महसूस करें कि पूरा इंडिया इसको सुन रहा है, देख रहा है, और गर्व महसूस कर रहा है। इससे कथित 4 करोड़ प्रति रैली खर्च बच सकता है, आपकी जान को भी कोई खतरा नहीं होगा, आपकी रक्षा के लिए रैली के बाहर खड़ी होने वाली पुलिस अपने रोजमर्रा के काम निबटा पाएगी।

कड़वी दवा तो नहीं कड़वा सच - जो आप जानते हैं। आपके पीआर जानते हैं कि मोबाइल अभी घर घर की जरूरत है लेकिन इंटरनेट नहीं। आपको पता है कि जो भीड़ रैली में होती है, वो वंचित है उन सुविधाओं से जिसने आपके समर्थक लैस हैं। उस भीड़ में किसी के पास डेटा पैक के पैसे नहीं, तो किसी के पास नेटवर्क नहीं। आपके समर्थक सोशल मीडिया से पढ़े लिखे और इंटरनेट यूजर्स को ख्‍वाब दिखाने का प्रयास करते हैं, और रैलियों से आप उनको जिन तक आपका सोशल मीडिया अभी पहुंचा नहीं। देश आज भी दो हिस्‍सा में बांटा हुआ भारत और इंडिया में, हालांकि, लीक बहुत ही महीन है।

समस्‍या यह है कि यूट्यूब पर आपके एक ही तरह के भाषण सुनने क्यों जायेगा? और आपका हर नया भाषण पुराने का विस्तार या विरोधाभासी होता है।

हाल के बयान को ही ले लो जो काले धन, भ्रष्टाचार और नकली करंसी के खिलाफ आया था और अंत कैशलेस और लेस कैश की ओर मुड़ गया। जैसे आपके विरोधियों के कहने अनुसार हर हर मोदी, घर घर मोदी अंत थर थर मोदी हो गया।

आप संसद में जाने को तैयार नहीं, रैली में आप लंबी लंबी हांकते हैं और नतीजन आपको बहराईच की रैली कम भीड़ के कारण रदद् करनी पड़ी, भले ही मीडिया के एक बड़े तबके ने मौसम खराब का रोना रोया हो।

भाजपा के सीनियर नेता एलके आडवाणी जो कथित तौर पर आपके मार्गदर्शक हैं, वो आज सिर्फ दर्शक हैं, बोलते हैं तो आप गौर नहीं करते, तभी तो इस्तीफा देने तक का मन बना लेते हैं। मनमोहन सिंह की चुप ने नरेंद्र मोदी का उदय किया और आज नरेंद्र मोदी की चुप्पी राहुल गांधी को बोलने का मौका दे रही है। एक हारे हुए नेता व वित्‍त मंत्री अरुण जेटली की अपनी मजबूरियां हैं, लेकिन सुना है कि अमित शाह ने बैठक में जमकर गुस्सा निकाल लिया, उसकी कोई मजबूरी नहीं, क्योंकि बीजेपी के एक बड़े तबके को सम्भल रहे हैं। गुजरात की गद्दी से आनंदीबेन का जाना, अमित की जिद्द थी और आनंदीबेन को लाना आपकी।

सवाल यह नहीं कि आपकी कुर्सी रहे या जाये, सवाल है कि आपके एक फैसले ने देश को जिस तरफ मुड़ गया है उसका क्या? आज एक बड़ा वर्ग लाइन में खड़ा है, जिसको कभी आप अपने साथ बताते हैं तो कभी काले धन वाले लाइन में हैं कहकर अपमानित करते हैं।

अगर इसने आपकी उम्मीद के उल्ट जाकर बीजेपी को अगले कुछ सालों के लिए फिर से लाइन में लगा दिया तो सोचो कि आप ने देश को क्या दिया? गलती से ही सही, लेकिन जब आप कहते हैं देश 70 साल से लूट रहा है तो उन 70 सालों में बीजेपी की सरकारों के साल भी शामिल हो जाते हैं, और आपकी मौजूदा सरकार के 3 साल भी, जिसमें से 2.5 तो हो गये, क्योंकि अगस्त 2017 में आजाद भारत अपने 70 बसन्त पूरे करेगा।

बस ध्यान रखें कि जितना 67 साल में नहीं लूटा, उतना 3 में ना लूट जाए। हम भारतीय हैं, हम तो ऐसे तैसे कर उठ जाएंगे, लेकिन आप झोला लेकर किधर जाएंगे।

जय राम जी की इसके भी दो अर्थ हैं, किसी समझदार से पूछना लेना।

कहो..... भीड़ नहीं हम.....

आस पास के लोगों से..... सतर्क हो जाइए..... क्‍योंकि पता नहीं कौन सा नकाबपोश..... काले धन का मालिक हो..... मखौटों के इस दौर में सब फर्जी हैं..... हां..... मैं..... आप..... हम सब फर्जी हैं।

चौंकिए मत..... सच है.....। कबूतर की तरह आंखें भींचने से क्‍या होगा?.....। याद कीजिए..... 35 लाख का घर..... और 22 लाख के दस्‍तावेज..... आखिर किसने बनवाये। बेरोजगार बेटे बेटी को 3 से 5 लाख रिश्‍वत देकर..... सरकारी नौकरी किसी ने दिलवाई.....। आखिर कौन पूछता है..... दामाद ऊपर से कितना कमा लेता है.....।

ऐसे ही तो..... जमा होता है काला धन..... काले धन वाले भी..... तो शामिल हैं ईमानदारों में..... और नोटबंदी का करते हैं जमकर समर्थन..... कहते हैं..... मिट जाएगा काला धन..... और खत्‍म होगी रिश्‍वतखोरी..... हां..... स्‍लीपर सैल की तरह..... हम में भी..... कहीं न कहीं..... छुपे बैठे हैं चोर.....

दम है तो पकड़िये..... रिश्‍वत लेते..... जो पकड़ा गया..... रिश्‍वत देकर छूट जाएगा..... सड़क पर ट्रैफिक वाला रसीद काटता है..... तो आप बड़े आदमी को फोन लगा लेते हैं..... ईमानदार कर्मचारी की बैंड खूब बजती है..... और तमाश देखते हैं हम सब.....

ट्रैफिक सिग्‍नल पर खड़ा शहरी 60 सैकेंड इंतजार नहीं कर सकता..... लेकिन..... गरीबों को लाइन में लगने पर खूब ज्ञान उड़ेल रहा है.....

युवान बेटा पिता के कहने पर बिजली का बिल भरने नहीं जाता..... कहीं..... लाइन बड़ी हुई तो डार्लिंग बुरा मान जाएगी..... फेसबुक पर उस गरीब को ज्ञान बांटता है..... जो 14 घंटे मजदूरी करता है..... और मिलता है बाबा जी ठुल्‍लू.....

बुरा तो लगता है..... कड़वी बात का..... जो कल तक..... मोदी की नोटबंदी का..... सबसे बड़ा समर्थक था..... पकड़ा गया बड़े नोटों के साथ.....

सब चुप रहेंगे..... कोई नहीं बोलेगा..... क्‍योंकि..... सच बोलने के लिए..... नकाब हटाने होंगें..... अपने स्‍वार्थों की बलि..... देनी होगी.....। इसलिए..... जो चल रहा..... चलने दें..... तमाशा देखें..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम.....

125 करोड़ जनता..... 11 क्रिकेटर..... जमकर देखते हैं..... गाली निकालते हैं..... जीते तो जश्‍न मनाते हैं..... पर्दे पर अजय मेहरा देखकर..... खून खौलने लगता है..... घर आते आते..... थका हरा घसीट पीटा आम आदमी..... भीतर से निकलता है..... जैसे अदालीन के चिराग से जिन्‍न.....

हम को अचानक..... बोलने वाला प्रधानमंत्री मिलता है..... हम खुशी के मारे झूम उठते हैं..... क्‍योंकि..... हम बोल नहीं सकते..... कोई तो आया बोलने वाला.....

फिर अचानक..... बोलना भी..... सिरदर्द करने लगता है.....

फिर..... आशावाद..... फिर..... चलो देखते हैं..... और फिर..... मैं..... आप..... सब..... तमाशबीन हो जाते हैं.....

तमाशबीन होने का भी..... अपना ही एक मजा है.....

टीवी के सामने बैठकर..... सचिन को शॉट मारना सिखाते हैं..... फिल्‍म निर्देशक को..... निर्देशन के गुर..... किसी लड़ने वाले को..... नायक से खलनायक..... खलनायक से नायक बनाते हैं.....

कोई चौपालों में..... कोई ड्राइंग रूम में..... कोई चाय के गल्‍ले पर बैठकर..... देश बदल रहा है..... पान मसाले का पीक..... मुंह से थू थू हुए..... स्‍वच्‍छता का ज्ञान झाड़ा जा रहा है..... सुन रहे हैं हम..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम

असल जीवन में..... काले को सफेद करने की दौड़..... सोशल मीडिया पर..... ज्ञान खूब बघारा जा रहा है..... किसका दामन..... कितना मैला..... हर कोई..... लिए प्रमाण पत्र..... घूम रहा है.....

कांग्रेस के दौर में..... शहीद हुए तो एक के बदले दस..... भाजपा के दौर में शहीद हुए..... तो सवाल मत पूछिए..... रैलियों में सुर ऊंचा है..... संसद में सिर नीचा है.....

क्‍यों नहीं..... हम नेता चुनते..... क्‍यों..... हर बार हम..... कांग्रेस..... बीजेपी..... चुनें..... क्‍यों नहीं..... हम सरकार से..... तीखे सवाल करते..... चाहे कांग्रेस की हो..... चाहे बीजेपी की हो.....

क्‍यों नहीं..... हर सवाल हमारा मौलिक होता..... क्‍यों..... हम पढ़े लिखे होने के बाद भी..... कॉपी पेस्‍ट..... नकल करते हैं..... सभ्‍य समाज हैं..... फिर भी..... चर्चा नहीं..... बहस करते हैं..... तर्क नहीं दे पाते..... तो गाली गालौच करते हैं.....

भीड़ नहीं तो..... क्‍या हैं हम..... एक ने लिखा..... चोर..... तो हम भी..... लिखते हैं..... चोर..... इंटरनेट है..... पर तथ्‍य..... क्‍यों नहीं खोजते हम..... पढ़े लिखे हैं हम..... यह क्‍यों नहीं सोचते..... एक ही वीडियो..... कभी कांग्रेस का हो जाता है..... कभी भाजपा का..... और अंधे हम..... करते हैं..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड.....

कहो..... भीड़ नहीं हैं हम..... बताओ..... भेड़ नहीं हम..... युवा हैं हम..... किसी के गुलाम नहीं हम..... बीरबलता नहीं..... नचिकेतता चाहिये हमें..... बुरे हैं तो बुरा कहो..... सच्‍चे हैं तो सच्‍चे कहो..... झूठ के लिबास में..... तारीफ नहीं चाहिये.....

कहो..... भीड़ नहीं हम.....

और तो कुछ पता नहीं, लेकिन लोकतंत्र ख़तरे में है

जहां लोकतंत्र में सत्‍ता और विपक्ष रेल की पटरी सा होता है। तो वहीं, लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था एक रेल सी होती है। यदि दोनों पटरियों में असंतुलन आ जाए तो पटना इंदौर एक्‍सप्रेस सा हादसा होते देर नहीं लगती, सैंकड़ों जिंदगियां पल भर में खत्‍म हो जाती हैं। और पीछे छोड़ जाती हैं अफसोस कि काश! संकेतों पर गौर कर लिया होता। वक्‍त रहते कदम उठा लिये गए होते।

ये संकेत नहीं तो क्‍या हैं कि देश सिर्फ एक व्‍यक्‍ति पर निर्भर होता जा रहा है। देश में विपक्ष की कोई अहमियत नहीं रह गई। सत्‍ता पक्ष के खिलाफ बोलना अब देशद्रोह माना जाने लगा है। किसी सरकारी नीति की आलोचना करने का साहस करने पर आपको बुरा भला कहा जाता है।

दिलचस्थ तथ्‍य तो देखो कि भारत बंद की घोषणा होने के साथ ही सत्‍ता पक्ष की तरफ से कुछ दुकानों पर एक सरीखे नारे लिखे बोर्ड या बैनर टांग दिये जाते हैं। हर आदमी के गले में कड़वी बात को उतारने के लिए सेना और देशभक्‍ति का शहद की तरह इस्‍तेमाल किया जा रहा है, ताकि कड़वाहट महसूस न हो।

पहले तो ऐसा नहीं होता था, सरकार के खिलाफ भारत बंद भी होते थे। जो लोग आज सत्‍ता में हैं, वो ही लोग लठ लेकर निकला करते थे। कोई प्‍यार से बंद करे तो ठीक, नहीं तो लठवाद जिन्‍दाबाद। सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करने पर कोई किसी को देशद्रोही की संज्ञा तो नहीं देता था।

याद ही होगा, गुजरात के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ से पहले संसद की चौखट पर शीश रखते हुए पूरे देश को भावुक कर दिया था। दरअसल, राजनीति में ऐसा ड्रामा आज तक किसी ने देखा नहीं था। ड्रामा इसलिए कह रहे हैं क्‍योंकि पिछले कई दिनों से उसी मंदिर से आवाज आ रही है कि आओ प्रधान सेवक आओ, जवाब दो हमारे सवालों के, चर्चा करो हमसे, हम भी जन-प्रतिनिधि हैं। लेकिन, प्रधान सेवक रॉक कंसर्ट को संबोधित करने में व्‍यस्‍त हैं, रैलियों में विपक्ष को काले धन का मालक बताने में व्‍यस्‍त हैं।

जो कड़वी दवा जल्‍दबाजी में दे बैठें हैं, कहीं जनता बाहर न निकाल दे, इसलिए आंसुओं व देशभक्‍ति का शहद मिलाकर निगल जाने के लिए प्रेरित करने में व्‍यस्‍त हैं। बड़ी अजीब बात है कि रैलियों से बैंक की कतारों में खड़े लोगों की तुलना सैनिक से तो कर रहे हैं, लेकिन, मन की बात प्रोग्राम में एक भी बैंक की कतार में शहादत पाए गए व्‍यक्‍ति को याद नहीं किया, और दो आंसू तक आंख से नहीं टपकाए।

आंसू टपके तो इस बात पर वो लोग मुझे नहीं छोड़ेंगें, मुझे मार देंगें। मगर, देश के प्रधान सेवक ने सदन में जाकर उन धमकाने वालों का नाम नहीं बताया, जो उनको नहीं छोड़ेंगें, जो उनको मार देंगें। विपक्ष पूछता रहा, यदि ऐसा है तो पूरा भारत आपके साथ है। लेकिन, अफसोस कि सदन में मौन है, देश का पहला बोलने वाला प्रधान मंत्री।

बहुत कम लोगों को याद होगा कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी मार्च 2016 में सदन के अंदर जबरदस्‍त वक्‍तव्‍य में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के बयान (देश में सरकारें तो आती जाती रहती हैं, लेकिन देश चलना चाहिए) की नकल करते हुए विपक्ष को महानुभवियों की संज्ञा दी थी। मगर, अफसोस कि नवंबर 2016 आते आते प्रधान मंत्री अपने ही बयान को भूल गये और उसी विपक्ष को काले धन के मालिक करार दे दिया।

अब स्‍थिति ऐसी हो चली है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कार्य पर उंगुली उठाना भी देशद्रोह है। हाल में ही, जब देश की सर्वोच्‍च अदालत ने सरकार से पूछा कि यदि आप भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने को तैयार हो तो अभी तक लोकपाल की नियुक्‍ति क्‍यों नहीं की? तो नरेंद्र मोदी समर्थक न्‍यायपालिका पर टूट पड़े और पूछा डाला कि अभी तक जो इतने केस लंबित पड़े हैं, उनका क्‍या? अजीब लोकतंत्र है कि अदालतों में जजों की नियुक्‍ति को लेकर भी सरकार और न्‍यायपालिका में ठनी हुई है।

देश में स्‍थिति ऐसी हो चुकी है कि जो नरेंद्र मोदी कहें वो ही सही है। कोई किंतु परंतु करने की जरूरत नहीं। हर बात को सेना से जोड़ा दिया जाता है क्‍योंकि पीआर जो नरेंद्र मोदी को कथित तौर पर संचालित करते हैं, वे अच्‍छी तरह जानते हैं कि किसी भी देश का नागरिक अपनी सेना का अपमान नहीं करेगा। भले ही, भारतीय जनता पार्टी के नेता भारतीय करंसी पर पैर रखकर काले धन की स्‍वच्‍छता का अभियान चलाएं, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

लोकतंत्र में एक व्‍यक्‍ति पर केंद्रित होना और देश के हर मामले में सेना के कंधे का इस्‍तेमाल ख़तरे की घंटियां हैं। इतना ही नहीं, आज विपक्ष बोल नहीं सकता, आज न्‍याय पालिका बोल नहीं सकती, आज मीडिया का एक तबका सरकार के खिलाफ एक शब्‍द लिख नहीं सकता।

चुटकला - 
मैं ट्रेन में सफर कर रहा था। 
मैंने बगल में बैठे व्‍यक्‍ति से कहा, 'यार कितनी ठंड पड़ रही है ना।'
तो अगले डिब्‍बे से आवाज आती है, 'क्‍या कांग्रेस के समय से ठंड नहीं होती थी?'

जब देश में ऐसे चुटकले प्रचलन में आ जाए तो एक बात अच्‍छे से समझ लेनी चाहिये कि लोकतांत्रिक देश यकीनन एक गलत दिशा में अग्रसर हो रहा है।

पहले देश हिन्‍दु मुस्‍लिम के आधार पर दो हिस्‍सों में बंट रहा था। अब देश देशभक्‍त और देशद्रोही के रूप में बंट रहा है। जो कल तक भारत बंद पर लाठियां लेकर निकलते थे, तोड़ फोड़ करते थे, आज उनके हाथों में मिठाईयां थीं। चलो मान लिया हमने कि देश बदल रहा है। जाने अनजाने में ही सही, लेकिन लोकतंत्र की पटरी से उतर रहा है।

'अकीरा' फिल्‍म नहीं, कहानी है एक 'लड़की' के साहस की

अकीरा फिल्‍म नहीं, एक कहानी है, एक दस्‍तां है, एक लड़की के साहस की, जोश की, हिम्‍मत की, संघर्ष की और बलिदान की, जो हमको सिल्‍वर स्‍क्रीन पर सुनाई जाती है। अकीरा सी लड़की पैदा करना हर मां बाप के बस की बात नहीं, ऐसी लड़की को ईश्‍वर किसी किसी को वरदान स्‍वरूप देता है।

अकीरा खूबसूरत है। अकीरा भी आम लड़कियों जैसी है। मगर, एक बात उसको अलग बनाती है, उसके भीतर की हिम्‍मत। फिल्‍म की शुरूआत में ही एक सूफी कहावत का जिक्र है, जिसमें फिल्‍म का पूरा निचोड़ है। ईश्‍वर आपके उस गुण की परीक्षा लेता है, जो आप में मौजूद है।

'अकीरा' की परीक्षा तो दस साल की उम्र से शुरू हो जाती है, जब अकीरा बस स्‍टैंड पर बदतमीजियां कर रहे लड़कों को निपटा देती है। अकीरा की शक्‍ति उसके पिता है, जैसे नीरजा में नीरजा की शक्‍ति उसके पिता थे। अकीरा 3 साल बाल सुधार गृह में गुजारने के बाद खूबसूरत जीवन जीने लगती है।


तभी किस्‍मत अकीरा के जीवन में मुम्‍बई जाना लिख देती है। कहते हैं ना जब पाप हद से ज्‍यादा बढ़ जाए तो पापियों का विनाश करने को एक परम-आत्‍मा जन्‍म लेती है। कुछ ऐसा ही अकीरा के बारे में कह सकते हैं, जब अकीरा मुम्‍बई को अचानक रवाना होती है।

मुम्‍बई पहुंचते ही अकीरा के जीवन में नए तूफान आने शुरू होते हैं। अकीरा की लड़ाई जाने अनजाने में पुलिस के कुछ लालची और घटिया अधिकारियों से हो जाती है, जो एक गलती को छुपाने के लिए पैर पैर नई गलती किए जाते हैं। कॉलेज में पढ़ने वाली अकीरा किस तरह पुलिस वालों के गले का फांस करती है और पुलिस वाले किस तरह अकीरा को खत्‍म करने के लिए अपनी शक्‍ति का इस्‍तेमाल करते हैं - ये फिल्‍म का वो हिस्‍सा है, जिसको प्रकट करना मतलब फिल्‍म की रोचकता या कहानी की रोचकता को मारना है।

निर्देशक एआर मुरुगदास ने अकीरा के माध्‍यम से बहुत सारे मुद्दों को उठाया। पुलिस अधिकारी किस तरह अपनी ताकत का इस्‍तेमाल कर सकते हैं या करते हैं। खूबसूरत लड़कियों के चेहरे की रौनक तेजाब कुछ बदतमीज लड़कों की हरकत के कारण किस तरह छीन लेता है। देखते समझते हुए अभिभावकों का आंख मूंद लेना, बच्‍चों को किस गर्त में फेंकता है।

सोनाक्षी सिन्‍हा, अनुराग कश्‍यप और कोंकणा सेनशर्मा मुख्‍य भूमिका में हैं, जो पूरी फिल्‍म को आगे बढ़ाते हैं। मगर, अन्‍य छोटे छोटे किरदार भी आपको प्रभावित करेंगे, चाहे अकीरा के पिता का किरदार, चाहे अकीरा के दोस्‍त किन्‍नर का किरदार, चाहे अकीरा के भाई-भाभी और भाई के साले का किरदार। हर कलाकार महत्‍वपूर्ण है और हर कलाकार अपने किरदार के साथ ईमानदारी बरतते हुए नजर आता है।

हां, चलते चलते इतना जरूर कहूंगा कि नीरजा भावनात्‍मक दास्‍तां थी जबकि अकीरा एक्‍शन दस्‍तां है।

हलके गुलाबी कुर्ते वाले प्रधानमंत्री और जियो डिजीटल लाइफ

'मन की बात' कहने वाले हमारे माननीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी आज सुबह सुबह आपका तस्‍वीर अखबारों के पहले पृष्‍ठ पर देखा। टचवुड नजर न लग जाए। हलके गुलाबी कुर्ते पर ब्‍लू रंग की मोदी जैकेट जंच रही है, खिला हुआ चेहरा तो मशाल्‍लाह है।

मगर, एक बात खटक गई। बड़ा रोका मैंने खुद को कि चल छोड़ो जाने दो। मगर, मन की बात कहां दबी रहती है जुबां पर आ ही जाती है। मुझे समझ नहीं आया कि जियो डिजीटल लाइफ क्‍या है, जिसका आप चेहरा बने हैं इस विज्ञापन में।


क्‍या जियो डिजीटल आइडिया एयरटेल वोडाफोन टाटा डोकोमो श्रेणी में नहीं आती ? यदि आती है तो फिर क्‍यों आप ने बीएसएनएल का प्रचार करने की बजाय जियो डिजीटल पर फोटो लगाने की अनुमति दी।

हमारा बीएसएनएल मर रहा है। दम तोड़ रहा है। ऐसे हालात में आपका फोटो जियो डिजीटल लाइफ के साथ प्रकाशित होता है। मन दुखी होने लगता है। आप से कोई सवाल नहीं करेगा, क्‍योंकि आप देश के प्रधान मंत्री हैं।

टेलीकॉम कंपनियों में कोई अजय देवगन जैसा बिंदास आदमी नहीं है, वरना किसी सहयोगी से आपको फोन लगवाकर पूछ लेता कि साहेब हमने आपका का क्‍या बिगाड़ा है, जो हमको पछाड़ने के लिए जियो डिजीटल का आह्वान किए जा रहे हैं।

आपकी खूबसूरत फोटो की तारीफ जरूर करूंगा, जैसे कि ऊपर की है। मगर, जहां आपका फोटो लगा है, वहां मुझे हमेशा आपत्‍ति रहेगी क्‍योंकि जियो रियालंस कंपनी है, जो एक प्राइवेट कंपनी है, और प्राइवेट कंपनी के विज्ञापन को यदि देश का पीएम प्रचारित करेगा, तो देश को सोचना होगा।